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प्रश्न 22: प्रभु यीशु ने कहा: "परन्तु जो कोई उस जल में से पीएगा जो मैं उसे दूँगा, वह फिर अनन्तकाल तक प्यासा न होगा; वरन् जो जल मैं उसे दूँगा, वह उसमें एक सोता बन जाएगा जो अनन्त जीवन के लिये उमड़ता रहेगा।" (यूहन्ना 4:14)। अधिकांश लोग सोचते हैं कि प्रभु यीशु ने हमें पहले से ही अनन्त जीवन का मार्ग प्रदान किया है, लेकिन मैंने सर्वशक्तिमान परमेश्वर के इन वचनों को पढ़ा है: "केवल अंतिम दिनों का मसीह ही मनुष्य को अनन्त जीवन का मार्ग दे सकता है।" यह सब क्या है? यह क्यों कहता है कि आखिरी दिनों का मसीह ही मनुष्य को अनन्त जीवन का मार्ग दे सकता है?

उत्तर:

देहधारी बने परमेश्वर ही प्रभु यीशु हैं, परमेश्‍वर का प्रकटन हैं। प्रभु यीशु ने कहा, "और जो कोई भी मुझमें जीता और विश्वास करता है, वह कभी नहीं मरता है।" "परंतु जो पानी मैं उसे दूँगा वह उसमें एक कुएं का निर्माण करेगी जिससे उसे चिरस्थायी जीवन प्राप्त होगा।" बाइबल कहती है, "वह जो पुत्र पर विश्वास करता है, वह शाश्वत जीवन प्राप्त करता है।" ये सभी वचन सत्य हैं, वे सभी तथ्य हैं! क्योंकि देहधारी बने परमेश्वर ही प्रभु यीशु हैं, उनमें परमेश्‍वर का सार और पहचान है। वे स्‍वयं चिरस्थायी जीवन का मार्ग हैं। वे जो कुछ भी कहते हैं और करते हैं वह परमेश्वर के जीवन की एक स्वाभाविक अभिव्यक्ति है। वह जो कुछ व्यक्त करते हैं वह सत्‍य है और वह है जो परमेश्‍वर के पास है और जो परमेश्‍वर है। तो प्रभु यीशु स्‍वयं अनन्त जीवन हैं, और शाश्‍वत जीवन का मार्ग प्रदान कर सकते हैं। वह मृतक को में वापस जीवित कर सकते हैं। प्रभु यीशु में विश्वास करके, हम एकमात्र सच्चे परमेश्वर पर विश्वास करते हैं, और इस तरह शाश्‍वत जीवन प्राप्त कर सकते हैं। इस पर तो सवाल ही नहीं है। प्रभु यीशु का लाज़रस का पुनस्र्ज्जीवन एक अच्छा प्रमाण है। कि प्रभु यीशु हमें शाश्‍वत जीवन का मार्ग प्रदान कर सकते हैं, उनके पास यह अधिकार है। फिर, ऐसा क्यों है कि प्रभु यीशु ने अनुग्रह के युग के दौरान शाश्‍वत जीवन का मार्ग प्रदान नहीं किया? ऐसा इसलिए है क्योंकि, मानवजाति के छुटकारे के लिए प्रभु यीशु सूली पर चढ़ने आये, अंतिम दिनों की तरह शुद्धिकरण और उद्धार का कार्य करने के लिये नहीं। प्रभु यीशु का छुटकारे का कार्य केवल मनुष्यों के पापों को क्षमा करने से संबंधित था, परन्तु इसने मनुष्य को उसकी शैतानी प्रकृति और स्वभाव से छुटकारा नहीं दिलाया। इसलिए, प्रभु पर विश्वास करके, हमें हमारे पापों के लिए माफ़ किया गया था, लेकिन हमारे शैतानी स्वभाव को किसी भी तरह से शुद्ध नहीं किया गया था। हम अभी भी स्वयं के बावजूद पाप करते हैं, परमेश्‍वर का विरोध करते हैं और उनसे विश्वासघात करते हैं। क्‍या यह सच नहीं है? यह सब स्थापित करने के बाद, हमें कुछ किसी चीज पर स्पष्ट होना चाहिए। अनुग्रह के युग के दौरान प्रभु यीशु के छुटकारे के कार्य ने अंतिम दिनों में न्‍याय कार्य के लिये मार्ग प्रशस्त किया, इसलिए, जब प्रभु यीशु ने छुटकारे का कार्य पूरा कर लिया, तो उन्‍होने यह भी वादा किया कि वे फिर से आएँगे। प्रभु यीशु ने कहा था, "अभी भी मेरे पास कहने के लिए बहुत सी बातें हैं, लेकिन अभी तुम उन्हें सहन नहीं कर सकते हो। हालाँकि, जब वह, सत्य का आत्मा आएगी, तो वह सच्चाई की ओर तुम्हारा मार्गदर्शन करेगी: क्योंकि वह स्वयं कुछ नहीं बोलेगी; बल्कि वह जो कुछ भी सुनेगी, उसके बारे में वह तुम्हें बताएगी: वह तुम्हें होने वाली घटनाओं के बारे में बताएगी" (यूहन्ना 16:12-13)। प्रभु यीशु के शब्दों से हम देख सकते हैं कि जब परमेश्‍वर अंतिम दिनों में वापस आते हैं केवल तभी वह समस्त सत्य व्यक्त करेंगे जो मनुष्य को शुद्ध करता और बचाता है। यहाँ, "सत्य का आत्मा आएगी, तो वह सच्चाई की ओर तुम्हारा मार्गदर्शन करेगी।" ये सत्य वास्तव में वे सत्य हैं जो अंतिम दिनों के सर्वशक्तिमान परमेश्वर मानवजाति को शुद्ध करने और बचाने में व्यक्त करते हैं। ये वे शब्द हैं जो पवित्र आत्मा कलीसियों से कहती है, और वे शाश्‍वत जीवन के मार्ग हैं जो परमेश्‍वर ने अंतिम दिनों में मानवजाति को प्रदान किये हैं। यही कारण है कि अनुग्रह के युग में प्रभु के अनुयायी शाश्‍वत जीवन का मार्ग प्राप्त करने में असमर्थ थे। प्रभु यीशु ने कहा था, "और जो कोई भी मुझमें जीता और विश्वास करता है, वह कभी नहीं मरता है।" और बाइबल भी कहती है, "वह जो पुत्र पर विश्वास करता है, वह शाश्वत जीवन प्राप्त करता है।" परन्तु वास्तव में, परमेश्‍वर ने यह कहा ताकि वे इस तथ्य को प्रमाणित कर सकें कि वे स्‍वयं परमेश्‍वर का प्रकटन हैं। और केवल वे ही मनुष्य को शाश्‍वत जीवन प्रदान कर सकते हैं। प्रभु यीशु का वादा कि जो लोग उन पर विश्वास करते हैं वे कभी नहीं मरेंगे, परमेश्वर के अधिकार की गवाही है। परमेश्‍वर स्‍वयं शाश्‍वत जीवन का मार्ग हैं, परमेश्‍वर मनुष्य को शाश्‍वत जीवन प्रदान करने में सक्षम है। कहने का यह मतलब नहीं है कि प्रभु यीशु के कार्य को स्वीकार करने पर मनुष्‍य ने शाश्‍वत जीवन प्राप्त किया। मुझे विश्वास है कि हर कोई इस बात को समझता है। लेकिन धार्मिक मंडलियों में, बहुत से लोग मानते हैं कि जब तक तक उनके पापों को माफ किया जाता है,तब तक लोग स्वर्ग के राज्य में प्रवेश कर सकते हैं और शाश्‍वत जीवन प्राप्त कर सकते हैं। क्या परमेश्वर के वचनों में इस परिप्रेक्ष्य के लिये कोई आधार है? प्रभु यीशु ने कभी ऐसा कुछ नहीं कहा है। इसके बारे में सोचें: हमारी कल्पना और अवधारणा के अनुसार, जब तक तक हमारे पापों को माफ कर दिया जाता है, तब तक हम स्वर्ग के राज्य में प्रवेश कर सकते हैं और शाश्‍वत जीवन प्राप्त कर सकते हैं, लेकिन प्रभु यीशु ने कई बार भविष्यवाणी क्यों की कि वे फिर से आएँगे? और उन्होंने अपने शिष्‍यों को इतनी भविष्यवाणियाँ और नीतिकथाएं क्यों बताईं? वे भविष्यवाणियाँ और नीतिकथाएँ वह चीजें हैं जिन्हें वे वापस आने पर पूरा करेंगे। क्या ऐसा हो सकता है कि लोग कई सालों तक परमेश्‍वर पर विश्वास करें लेकिन फिर भी इन चीजों को स्पष्ट रूप से ना देखें? अगर लोग केवल प्रभु को स्‍वीकार करते हैं लेकिन उनकी वापसी को स्वीकार नहीं करते हैं, तो यह किस प्रकार की समस्या है? क्या यह प्रभु से विश्वासघात नहीं है? कोई आश्चर्य नहीं कि प्रभु यीशु ने कहा: "जिन लोगों ने मुझसे कहा, हे प्रभु, हे प्रभु, उसमें से प्रत्येक स्वर्ग के राज्य में प्रवेश नहीं करेगा; परन्तु केवल वे स्वर्ग में प्रवेश करेंगे, जो मेरे पिता की इच्छा का पालन करते हैं। उस दिन बहुत से लोग मुझसे कहेंगे, हे प्रभु, हे प्रभु, क्या हमने आपके नाम की भविष्यवाणी नहीं की है? और क्या आपके नाम पर हमने शैतानों को नहीं निकाल दिया है? और क्या आपके नाम पर कई आश्चर्यजनक काम नहीं किए हैं? और फिर मैं उन्हें खुलकर कहूँगा, मैं तुम लोगों को कभी नहीं जानता था: तुम अधर्मियों, मुझसे दूर चले जाओ" (मैथ्यू 7: 21-23)। परमेश्‍वर के वचन अब पूरी तरह से सत्य हो गए हैं। अगर कोई केवल प्रभु यीशु को स्वीकार करता है लेकिन उसकी वापसी को स्वीकार नहीं करता है, तो क्या यह वह व्यक्ति है जो वास्तव में पुत्र पर विश्वास करता है? यह वह है जो प्रभु को धोखा देता है! पुत्र में सच्चे विश्वासी उनको कहते हैं जो न केवल प्रभु में विश्वास करते हैं बल्कि उनकी वापसी को भी स्वीकार करते हैं, जो अंत तक मसीह का अनुसरण करते हैं। केवल इस प्रकार का व्यक्ति ही शाश्‍वत जीवन प्राप्त कर सकता है। परन्‍तु जो लोग केवल प्रभु यीशु में विश्वास करते हैं, लेकिन सर्वशक्तिमान परमेश्वर को स्वीकार नहीं करते हैं, वे सब लोग हैं जो प्रभु यीशु को धोखा देते हैं। वे परमेश्‍वर में विश्वास करते हैं परन्तु क्योंकि वे अंत तक परमेश्‍वर का पालन नहीं करते हैं, इसलिए उनका विश्वास शून्य हो जाता है - वे सड़क के किनारे से गिरते हैं। प्रभु यीशु यह निर्धारित करते हैं कि वे दुष्टता के कर्म करने वाले हैं क्योंकि वे केवल उनका (प्रभु का) नाम स्वीकार करते हैं लेकिन उनकी वापसी को स्वीकार नहीं करते हैं। और उन्‍होनें कहा: "मैं तुम लोगों को कभी नहीं जानता था: तुम अधर्मियों, मुझसे दूर चले जाओ" (मैथ्यू 7: 21-23)। तो, जो लोग इस प्रकार परमेश्वर द्वारा निंदित किए और त्याग दिए जाते हैं, जो केवल उसका नाम बनाए रखते हैं, क्‍या वे शाश्‍वत जीवन प्राप्त कर सकते हैं? यह निश्चित है कि उन्हें कुछ प्राप्त नहीं होगा। इससे ज्यादा और क्या, कि वे नरक में गिरेंगे और दंडित किये जाएँगे! यह पूरी तरह से परमेश्‍वर की धार्मिकता और पवित्र स्वभाव को प्रकट करता है। क्या आप लोग ऐसा नहीं कहेंगे?

जैसा कि हम सभी जानते हैं, इस तथ्य के बावजूद कि जब मनुष्य ने अनुग्रह के युग में प्रभु यीशु द्वारा छुटकारे को स्वीकार किया, तो उनके पापों को माफ कर दिया गया और उन्हें परमेश्‍वर की प्रार्थना करने और उनके अनुग्रह और आशीषों का आनंद लेने का अधिकार दिया गया, इससे इनकार नहीं किया जा सकता कि इस समय, मनुष्य अभी भी अपनी पापी प्रकृति से विवश है, वे अभी भी पाप में असहायपूर्वक रहते हैं, वे प्रभु के वचनों का पालन करने में पूरी तरह से असमर्थ हैं और उनमें परमेश्‍वर के प्रति कोई वास्तविक श्रद्धा और आज्ञाकारिता नहीं है। इस समय, मनुष्य अक्सर अभी भी झूठ बोल सकता है और परमेश्‍वर को धोखा दे सकता है, वे प्रसिद्धि और भाग्य, पैसे की लालसा के पीछे पड़े रहते हैं, और दुनिया की प्रवृत्ति का पालन करने में लगे रहते हैं। विशेषकर जब परमेश्वर का कार्य मनुष्यों के मतों के अनुरूप नहीं होता है, तो मनुष्य परमेश्‍वर को दोष देता है, उनकी आलोचना करता है और यहाँ तक कि परमेश्‍वर का विरोध भी करता है। ऐसे लोग वास्‍तव में पश्चाताप तक नहीं कर सकते, क्या ऐसे लोग परमेश्‍वर की स्वीकृति प्राप्त कर सकते हैं? यद्यपि बहुत से लोग अनुसरण करने, गवाही देने, यहाँ तक कि प्रभु के लिए अपने जीवन तक बलिदान करने में सक्षम होते हैं, और वास्तव में पश्चाताप करते हैं, वास्तव में, क्या उनके भ्रष्ट स्वभाव को शुद्ध किया गया है ताकि वे पवित्रता प्राप्‍त कर सकें? क्या वे सचमुच प्रभु को जानते हैं? क्या उन्होंने वास्तव में शैतान के प्रभाव से खुद को मुक्‍त कर लिया है परमेश्वर द्वारा प्राप्त कर लिये गए हैं? बिल्कुल नहीं, यह आमतौर पर स्वीकार्य तथ्य है। यह इस बात को साबित करने के लिए पर्याप्त है कि अनुग्रह के युग दौरान प्रभु यीशु का कार्य केवल छुटकारा दिलाने का कार्य था। यह निश्चित रूप से अंतिम दिनों का उद्धार और सिद्धि का कार्य नहीं था। अनुग्रह के युग के दौरान प्रभु यीशु के वचनों ने केवल लोगों को पश्चाताप का तरीका दिया, शाश्‍वत जीवन का मार्ग नहीं। इसलिए यही कारण है कि प्रभु यीशु ने कहा कि वे फिर से आएँगे। प्रभु यीशु की वापसी सत्य को व्यक्त करने के कार्य करने और मनुष्य को शाश्‍वत जीवन का मार्ग प्रदान करने के लिए है, ताकि वे खुद को शैतान के प्रभाव से छुड़ा सकें और जीवन के रूप में सत्य को प्राप्त कर सकें ऐसे मनुष्य बन सकें जो परमेश्वर को जानते हैं, परमेश्वर की आज्ञापालन करते हैं, परमेश्‍वर का आदर करते हैं और परमेश्वर के साथ अनुकूल हो सकें, ताकि वे स्वर्ग के राज्य में प्रवेश कर सकें और शाश्‍वत जीवन प्राप्त कर सकें। प्रभु यीशु द्वारा छुटकारे के कार्य की नींव पर, अंतिम दिनों में सर्वशक्तिमान परमेश्वर ने परमेश्वर के घर से शुरूआत करके न्‍याय का कार्य आरंभ कर दिया है और मानवता को शुद्ध करने और बचाने के लिए समस्त सत्‍य व्यक्त कर दिया है। उसने मानवजाति को परमेश्‍वर के धार्मिक, प्रतापी, और अपमान न किए जाने योग्य स्वभाव को प्रकट कर दिया है, शैतान द्वारा मनुष्य को भ्रष्ट करने के सार और तथ्य को ऊजागर और न्‍याय किया है। उन्होंने परमेश्‍वर के प्रति मनुष्य के विद्रोह और प्रतिरोध के मूल को उघाड़ दिया है, और मनुष्‍य को परमेश्‍वर के सभी इरादों और अपेक्षाओं के बारे में बता दिया है। इसी समय, उन्‍होनें मानवजाति को स्पष्ट शब्दों में उन सभी सत्‍यों के बारे में समझाया है जिनकी उद्धार प्राप्त करने के लिए मुनष्‍य को आवश्यकता है, जैसे कि परमेश्‍वर के उद्धार के कार्य के सभी तीन चरणों की अंदर की कहानी और उनका सार और साथ ही इन तीन चरणों के बीच संबंध, परमेश्वर के कार्य और मनुष्य के कार्य के बीच का अंतर, बाइबल के अंदर की कहानी और सत्य, अंतिम दिनों में न्‍याय का रहस्य, बुद्धिमान कुँवारियों को स्वर्गारोहण किए जाने का रहस्य और आपदाओं से पहले लोगों को विजेताओं में सिद्ध बनाने का रहस्य, देहधारी बने परमेश्वर का रहस्य, और परमेश्वर में वास्तव में विश्‍वास करने, उनकी आज्ञापालन करने और उनसे प्रेम करने का मतलब है, कैसे परमेश्‍वर का आदर करें और मसीह के अनुकूल बनने के लिए कैसे बुराई को दूर रखें, कैसे अर्थपूर्ण जीवन जीयें, और इत्‍यादि। ये सत्‍य, शाश्‍वत जीवन के मार्ग हैं जो अंतिम दिनों में परमेश्‍वर द्वारा मानवजाति को प्रदान किये गए हैं। इसलिए, अगर हम सत्य और जीवन को प्राप्त करना चाहते हैं, उद्धार, शुद्धिकरण को प्राप्त करना और सिद्ध किया जाना चाहते हैं, तो हमें सर्वशक्तिमान परमेश्वर, अंतिम दिनों के मसीह के वचनों और कार्य को स्वीकार और उनका आज्ञापालन अवश्य करना चाहिए। यही एकमात्र तरीका है जिससे हम सत्य और जीवन को प्राप्त कर सकते हैं। आइए सर्वशक्तिमान परमेश्वर के वचनों पर एक नज़र डालें। "परमेश्वर स्वयं ही जीवन है, सत्य है, और उसका जीवन और सत्य साथ ही साथ रहते हैं। जो सत्य को प्राप्त करने में असफल रहते हैं वे कभी भी जीवन को प्राप्त नहीं कर सकते। बिना मार्गदर्शन, सहायता और सत्य के प्रावधान के, आप केवल संदेश, सिद्धांत और मृत्यु को ही प्राप्त करोगे। परमेश्वर का जीवन सतत विद्यमान है, और उसका सत्य और जीवन एक साथ उपस्थित रहते हैं। यदि आप सत्य के स्रोत को नहीं प्राप्त कर पाते, तो आप जीवन के पोषण को प्राप्त नहीं कर पाओगे; यदि आप जीवन के प्रावधान को प्राप्त नहीं कर सकते तो आपके जीवन में निश्चय ही सत्य नहीं होगा, और इसलिए कल्पनाओं और धारणाओं से दूरी होगी, आपकी सम्पूर्ण देह केवल देह होगी, आपकी घिनौनी देह। ध्यान रखिये कि किताबों की बातें जीवन के तौर पर नहीं गिनी जाती हैं, इतिहास के लेखों को सत्य के रूप में चित्रित नहीं किया जा सकता, और अतीत के सिद्धांत आज के समय में परमेश्वर के द्वारा कहे गए वचनों का लेखा-जोखा नहीं माने जा सकते। केवल वही बात जो परमेश्वर ने पृथ्वी पर आकर और लोगों के बीच रहकर कही है, सत्य, जीवन, परमेश्वर की इच्छाजीवन, परमेश्वर की इच्छा है और कार्य करने का असली तरीका है। यदि आप अतीत के युगों में परमेश्वर के द्वारा कहे गए वचनों को आज के संदर्भ में लागू करते हैं, आप ऐतिहासिक विरासत का विशेषज्ञ है। और यदि आपको और बेहतर ढंग से व्यक्त करना हो आप ऐतिहासिक विरासत का एक विशेषज्ञ कहा जा सकता है। क्योंकि आप हमेशा उन कार्यों के सुरागों के बारे में विश्वास करते हैं जो परमेश्वर ने अतीत में किए हैं, केवल उन पदचिन्हों पर विश्वास करते हैं जो तब के हैं जब परमेश्वर लोगों के बीच रह कर कार्य किया करते थे। और आप केवल उसी मार्ग पर विश्वास करते हैं जो परमेश्वर ने पुराने समय में अपने अनुयायियों को दिया था। आज के समय में आप परमेश्वर के कार्य के मार्गदर्शन के बारे में विश्वास नहीं करते, महिमामय मुखाकृति में विश्वास नहीं करते, और परमेश्वर के द्वारा आज के समय में व्यक्त किये गये सत्य के मार्ग पर विश्वास नहीं करते। अत: आप एक ऐसे दिवास्वप्न दर्शी हैं जो सच्चाई से कोसों दूर है। यदि आप अभी भी उन वचनों से चिपके रहेंगे जो जीवन प्रदान करने में असमर्थ हैं, तो आप आशाहीन और एक निर्जीव काष्ठ[क] के समान हैं, क्योंकि आप बहुत ही रूढ़िवादी, असभ्य हैं जो चीजों को तर्क की कसौटी पर नहीं कसते हैं!" ("वचन देह में प्रकट होता है" से "केवल अंतिम दिनों का मसीह ही मनुष्य को अनन्त जीवन का मार्ग दे सकता है" से)।

"अंतिम दिनों के मसीह जीवन लेकर आए, और सत्य का स्थायी एवं अनन्त मार्ग प्रदान किया। इसी सत्य के मार्ग के द्वारा मनुष्य जीवन को प्राप्त करेगा, और एकमात्र इसी मार्ग से मनुष्य परमेश्वर को जानेगा और परमेश्वर का अनुमोदन प्राप्त करेगा। यदि आप अंतिम दिनों के मसीह के द्वारा प्रदान किए गए जीवन के मार्ग को नहीं खोजते हैं, तो आप कभी भी यीशु के अनुमोदन को प्राप्त नहीं कर पायेंगे और कभी भी स्वर्ग के राज्य में प्रवेश करने के योग्य नहीं बन पायेंगे क्योंकि आप इतिहास के कठपुतली और कैदी हैं। जो लोग नियमों, संदेशों के नियंत्रण में हैं और इतिहास की ज़ंजीरों में जकड़े हुए हैं, वे कभी भी जीवन को प्राप्त नहीं कर सकते हैं, और कभी भी सतत जीवन के मार्ग को प्राप्त करने के योग्य नहीं बन सकते हैं। क्योंकि सिंहासन से प्रवाहित जीवन जल की अपेक्षा, उनके भीतर मैला पानी भरा है जो हज़ारों सालों से वहीं ठहरा हुआ है, जिनके पास जीवन का जल नहीं है वे हमेशा के लिए एक लाश, शैतान के खेलने की वस्तु और नरक की संतान बन जाएंगे। फिर वे परमेश्वर को कैसे देख सकते हैं? यदि आप केवल अतीत को पकड़े रहने की कोशिश करेंगे, केवल ठहरी हुई चीज़ों को पकड़ने की कोशिश में लगे रहेंगे, और यथास्थिति को बदलने और इतिहास को तिलांजलि देने की कोशिश नहीं करेंगे, तो क्या आप हमेशा परमेश्वर के विरोध में नहीं रहेंगे? परमेश्वर के कार्य के चरण बहुत ही विशाल और सामर्थी हैं, जैसे कि हिलोरे मारती हुई लहरें और गरजता हुआ तूफान - फिर भी आप बैठकर निष्क्रियता से विनाश का इंतजार करते हैं, अपनी ही मूर्खता से चिपके रहते हैं और कुछ भी नहीं करते। इस प्रकार से, आपकोआंख मूंद्कर अनुसरण करने वाले के रूप में कैसे देखा जा सकता है? आप परमेश्वर को कैसे न्यायोचित ठहरा सकते हो कि आप उस परमेश्वर पर निर्भर रहोगे जो हमेशा नया है और कभी पुराना नहीं होता? और आपकी पीली पड़ चुकी किताब के वचन आपको नए युग में कैसे ले जा सकते हैं? वे कैसे आपको परमेश्वर के चरणबद्ध तरीके से चलने वाले कार्यों तक कैसे लेकर जायेंगे? वे आपको कैसे स्वर्ग लेकर जायेंगे? आपके हाथों में जो संदेश हैं वे आपको केवल अस्थायी सांत्वना ही दे सकते हैं, वह सत्य नहीं दे सकते जो जीवन देने में सक्षम है। जो शास्त्र आप पढ़ते हैं वे आपकी जिव्हा को आनंदित तो कर सकते हैं लेकिन ये वे विवेकपूर्ण वचन नहीं हैं जो आपको मानव जीवन का बोध करा सकें। ये वह मार्ग तो दिखा ही नहीं सकते जो आपको पूर्णता की ओर ले जायें। क्या यह भिन्नता आपके विचार-मंथन का कारण नहीं है? क्या यह आपको अपने भीतर समाहित रहस्यों को समझने के लिए अनुमति नहीं देता है? क्या आप अपने आप को परमेश्वर से मिलने के लिए स्वर्ग में ले जाने के योग्य हैं? परमेश्वर के आये बिना, क्या आप अपने आपको परमेश्वर के साथ पारिवारिक आनन्द मानने के लिए स्वर्ग में ले जा सकते हैं? क्या आप अभी भी स्वप्न देख रहे हैं? आपको सुझाव देता हूं, कि आप स्वप्न देखना बंद कर दो, और उनकी ओर देखो जो अभी कार्य कर रहे हैं, इन अंतिम दिनों में कौन मनुष्यों को बचाने के लिए कार्य कर रहा है। यदि आप ऐसा नहीं करते हैं, तो आप कभी भी सत्य को नहीं प्राप्त कर सकते, और कभी भी जीवन प्राप्त नहीं कर सकते हो" ("वचन देह में प्रकट होता है" से "केवल अंतिम दिनों का मसीह ही मनुष्य को अनन्त जीवन का मार्ग दे सकता है" से)।

"जो मसीह के द्वारा कहे गए सत्य पर भरोसा किए बिना जीवन प्राप्त करने की अभिलाषा करते हैं, वे पृथ्वी पर सबसे हास्यपद मनुष्य हैं और जो मसीह के द्वारा लाए गए जीवन के मार्ग को स्वीकार नहीं करते हैं वे कल्पना में ही खोए हुए हैं। इसलिए मैं यह कहता हूं कि लोग जो अंतिम दिनों में मसीह को स्वीकार नहीं करते हैं वे हमेशा के लिए परमेश्वर के द्वारा तुच्छ समझे जाएंगे। इन अंतिम दिनों में मसीह मनुष्यों के लिए परमेश्वर के राज्य में प्रवेश करने का माध्यम है, जिसकी अवहेलना कोई भी नहीं कर सकता। मसीह के माध्यम बने बिना कोई भी परमेश्वर के द्वारा पूर्णता को प्राप्त नहीं कर सकता। परमेश्वर में आपका विश्वास है, और इसलिए आप उसके वचनों को स्वीकार करें और उसके मार्गों का पालन करें। बिना सत्य को प्राप्त किए या बिना जीवन के प्रावधान को स्वीकार किए आपको सिर्फ़ अनुग्रह प्राप्त करने के बारे में सोचना नहीं है। मसीह अंतिम दिनों में आता है ताकि वे सभी जो सच्चाई से उस पर विश्वास करते हैं उन्हें जीवन प्रदान किया जाए। उसका कार्य पुराने युग को समाप्त करने और नए युग में प्रवेश करने के लिए है और यही वह मार्ग है जिससे नए युग में प्रवेश करने वालों को अपनाना चाहिए। यदि आप उसे पहचानने में असमर्थ हैं, और उसकी भर्त्सना करते हैं, निंदा करते हैं और यहां तक कि उसे पीडा पहुंचाते हैं, तो आप अनन्त समय तक जलाए जाते रहने के लिए निर्धारित कर दिये गए हैं और आप कभी भी परमेश्वर के राज्य में प्रवेश नहीं कर पायेंगे" ("वचन देह में प्रकट होता है" से "केवल अंतिम दिनों का मसीह ही मनुष्य को अनन्त जीवन का मार्ग दे सकता है" से)।

सर्वशक्तिमान परमेश्वर, अंतिम दिनों के मसीह ने सभी सत्यों को व्यक्त किया है जो मानवता को शुद्ध करेंगे और बचाएँगे। ये वचन प्रचुर मात्रा में हैं, व्यापक हैं और इनमें वे सभी जीवनाधार हैं जो परमेश्वर प्रदान करते हैं। वे हमारी आँखें खोलते हैं और हमारे ज्ञान को समृद्ध करते हैं, हमें यह देखने की इजाजत देते हैं कि मसीह ही सत्‍य है, मार्ग है, और जीवन है। मसीह शाश्‍वत जीवन का मार्ग है। ये वचन जो परमेश्वर ने राज्‍य के युग में व्यक्त किये व्‍यवस्‍था के युग और अनुग्रह के युग के दौरान जो कुछ कहा गया उन सबसे परे जाते हैं। विशेष रूप से, जैसा कि "परमेश्‍वर का संपूर्ण ब्रह्माण्ड को कथन" में है वचन देह में प्रकट हुआ में परमेश्‍वर स्‍वयं को समस्त मानवता के लिए पहली बार ज्ञात करवाते हैं। यह भी पहली बार है कि मानवजाति सभी मनुष्यों के लिये सृष्टिकर्ता के कथनों को सुनती है। इसने संपूर्ण ब्रह्माण्ड को आश्चर्यचकित करके मनुष्यों की आँखें खोल दी। यह अंतिम दिनों में महान श्वेत सिंहासन के समक्ष न्याय का काम है। राज्य का युग वह युग है जिसमें परमेश्वर न्याय का कार्य करते हैं, और वह युग है जहाँ परमेश्वर का धर्मी स्‍वभाव समस्त मानव जाति के लिए अभिव्यक्त होता है। इसलिए, राज्य के युग में, परमेश्वर मनुष्य का न्याय करते हुए, उसे शुद्ध और सिद्ध करते हुए अपना वचन व्यक्त करते हैं। वे मनुष्य पर सभी प्रकार की आपदाएँ भेजते हैं, अच्‍छों को पुरस्कृत करते हैं और बुरों को दंड देते हैं। वे परमेश्वर की धार्मिकता, प्रताप और क्रोध को मानव जाति को प्रकट करते हैं। वे सभी सत्यों जो सर्वशक्तिमान परमेश्वर मनुष्‍य को शुद्ध करने, बचाने और सिद्ध करने के लिये व्‍यक्‍त करते हैं शाश्‍वत जीवन के वे मार्ग हैं जिन्हें परमेश्वर अंतिम दिनों में मनुष्य को प्रदान करते हैं। ये सत्य जीवन की नदी का जल है जो सिंहासन से बहता है। इसलिए, हमारे परमेश्वर पर विश्वास में अगर हम शाश्‍वत जीवन का मार्ग हासिल करना चाहते हैं, और स्वर्गारोहण प्राप्त करके स्वर्ग के राज्य में प्रवेश करना चाहते हैं, तो हमें अंतिम दिनों में सर्वशक्तिमान परमेश्वर, मसीह के न्याय के कार्य को स्वीकार अवश्य करना चाहिए, और साथ ही उनके वचनों के न्‍याय और ताड़ना को भी स्वीकार अवश्य करना चाहिए। केवल इसी तरह से हम पवित्र आत्मा के कार्य को हासिल कर सकते हैं, सत्‍य को समझ और हासिल कर सकते हैं, शुद्धि प्राप्त कर सकते हैं, और बचाए जा सकते हैं। केवल जो लोग अंतिम दिनों में सर्वशक्तिमान परमेश्वर के न्‍याय और ताड़ना से गुज़रते हैं, वे ही परमेश्वर के राज्य में प्रवेश करने के हकदार हैं। यह एक परम तथ्य है! यदि हम अपने धार्मिक मतों का अनुसरण करते रहें, तो अंत में हमें ही नुकसान सहना होगा। बुद्धिमान कुँवारियाँ केवल सत्य की खोज और परमेश्‍वर के वचनों को सुनने पर ध्यान केंद्रित करती हैं, लेकिन मूर्ख कुँवारियाँ केवल बाइबल के अक्षरों और अपनी अवधारणाओं और कल्पनाओं का पालन करती हैं, और सत्य की तलाश नहीं करती हैं या परमेश्‍वर की वाणी को नहीं सुनती हैं। फिर एक दिन, वे अचानक विपत्ति में पड़ जाएँगी और विलाप करेंगी और दाँत पीसेंगी। और तब पश्चाताप भी बेकार होगा। इसलिए, वे सभी जो सर्वशक्तिमान परमेश्वर को स्वीकार नहीं करते हैं, वे विपत्ति में पड़ेंगे और दंडित किए जाएँगे। यही है वह जिसका परमेश्वर ने आदेश दिया है और कोई भी इसे बदल नहीं सकता है। विशेष रूप से वे जो अंतिम दिनों में सर्वशक्तिमान परमेश्वर के कार्य की बेतहाशा निंदा करते हैं पहले से ही परमेश्वर के द्वारा प्रकट कर दिये गए हैं कि वे अंतिम दिनों के ईसा-विरोधी हैं - वे लोग शाश्‍वत दंड भुगतेंगे और उन्‍हें परमेश्‍वर से मिलने का अब और अवसर नहीं मिलेगा। यह स्पष्ट है कि अंतिम दिनों में सर्वशक्तिमान परमेश्वर का कार्य, लोगों के परिणामों का निर्धारण करने और युग का समापन करने के लिए, मनुष्य को प्रकारों के अनुसार वर्गीकृत करना है। आज हम अंतिम दिनों में सर्वशक्तिमान परमेश्वर के कार्य को स्वीकार करने में सक्षम हैं, इसमें हमने वास्तव में उनका अनुग्रह और उनकी दया प्राप्त की है। यह परमेश्‍वर के द्वारा परम उत्थान है! हम सभी को सर्वशक्तिमान परमेश्वर को धन्‍यवाद देना चाहिए!

"स्क्रीनप्ले प्रश्नों के उत्तर" से

फुट नोटः

क. मृतक लकड़ी का एक टुकड़ाः एक चीनी मुहावरा है, जिसका अर्थ "मदद से परे" है।

पिछला:प्रश्न 20: बाइबल में यह लिखा गया है: "यीशु मसीह कल और आज और युगानुयुग एक–सा है" (इब्रा 13:8)। तो परमेश्वर का नाम कभी नहीं बदलता है! लेकिन तुम कहते हो कि जब परमेश्वर अंतिम दिनों में फिर से आएगा तो वह एक नया नाम लेगा और उसे सर्वशक्तिमान परमेश्वर कहा जाएगा। तुम इसे कैसे समझा सकते हो?

अगला:प्रश्न 23: तुम यह प्रमाण देते हो कि सर्वशक्तिमान परमेश्वर देहधारी परमेश्वर है, जो अभी अंतिम दिनों में अपने न्याय के कार्य को कर रहा है। लेकिन धार्मिक पादरियों और प्राचीन लोगों का कहना है कि सर्वशक्तिमान परमेश्वर का कार्य वास्तव में मनुष्य का काम है, और बहुत से लोग जो प्रभु यीशु पर विश्वास नहीं करते, वे कहते हैं कि ईसाई धर्म एक मनुष्य में विश्वास है। हम अभी भी यह नहीं समझ पाए हैं कि परमेश्वर के कार्य और मनुष्य के काम के बीच में क्या अंतर है, इसलिए कृपया हमारे लिए यह सहभागिता करो।

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जो भी परमेश्वर में विश्वास करता है, उन्हें झूठे चरवाहों और मसीह-शत्रुओं को पहचानने में सक्षम होना चाहिए ताकि वह धर्म को त्याग कर परमेश्वर की ओर लौट सके। प्रश्न 6: परमेश्वर यीशु देहधारी परमेश्वर था और कोई भी इस से इन्कार नहीं कर सकता। अब तुम यह गवाही दे रहे हो कि सर्वशक्तिमान परमेश्वर ही देह में लौटा हुआ प्रभु यीशु है, परन्तु धार्मिक पादरियों और प्राचीन लोगों का कहना है कि तुम जिसमें विश्वास करते हो वह सिर्फ एक व्यक्ति है, वे कहते हैं कि तुम लोगों को धोखा दिया गया है, और हम इसका भेद समझ नहीं पाते हैं। उस समय जब प्रभु यीशु देह बना और छुटकारे का कार्य करने के लिए आया, यहूदी फरीसियों ने भी कहा कि प्रभु यीशु केवल एक व्यक्ति था, कि जो कोई भी उस पर विश्वास करता था, वह धोखा खा रहा था। इसलिए, हम देह-धारण के बारे में सच्चाई के इस पहलू का अनुसरण करना चाहते हैं। वास्तव में देह-धारण क्या होता है? और देह-धारण का सार क्या है? कृपया हमारे लिए इस बारे में सहभागिता करो। बाइबल में अनन्त जीवन का कोई मार्ग नहीं है; यदि मनुष्य बाइबल को थामे रहता है और उसकी आराधना करता है, तो वह अनन्त जीवन को प्राप्त नहीं करेगा। बाइबल के साथ वास्तव में कैसे पेश आना चाहिए और उसका उपयोग किस तरह से करना चाहिए कि वह परमेश्वर की इच्छा के अनुरूप हो? बाइबल का मूलभूत मूल्य क्या है?