प्रश्न 21: बाइबल में यह लिखा गया है: "यीशु मसीह कल और आज और युगानुयुग एक–सा है" (इब्रानियों 13:8)। तो परमेश्वर का नाम कभी नहीं बदलता है! लेकिन तुम कहते हो कि जब परमेश्वर अंतिम दिनों में फिर से आएगा तो वह एक नया नाम लेगा और उसे सर्वशक्तिमान परमेश्वर कहा जाएगा। तुम इसे कैसे समझा सकते हो?

उत्तर:

बाइबल में कहा गया है, "यीशु मसीह कल और आज और युगानुयुग एक–सा है" (इब्रानियों 13:8)। इससे इस सच्‍चाई का पता चलता है कि ईश्‍वर का स्‍वभाव और उसका मूल सार शाश्‍वत है और यह बदलता नहीं है। इसका मतलब यह नहीं होता कि उसका नाम नहीं बदलेगा। चलिए, सर्वशक्तिमान परमेश्वर के वचनों पर नजर डालते हैं।

सर्वशक्तिमान परमेश्वर कहते हैं, "ऐसे लोग हैं जो कहते हैं कि परमेश्वर अपरिवर्तशील है। यह सही है, किन्तु यह परमेश्वर के स्वभाव और सार की अपरिवर्तनशीलता का संकेत करता है। उसके नाम और कार्य में परिवर्तन से यह साबित नहीं होता है कि उसका सार बदल गया है; दूसरे शब्दों में, परमेश्वर हमेशा परमेश्वर रहेगा, और यह कभी नहीं बदलेगा। यदि तुम कहते हो कि परमेश्वर का कार्य हमेशा अपरिवर्तित रहता है, तो क्या वह अपनी छः-हजार वर्षीय प्रबंधन योजना को पूरा करने में सक्षम होगा? तुम केवल यह जानते हो कि परमेश्वर हमेशा ही अपरिवर्तनीय है, किन्तु क्या तुम जानते हो कि परमेश्वर हमेशा नया रहता है और कभी पुराना नहीं पड़ता है? यदि परमेश्वर का कार्य अपरिवर्तनशील था, तो क्या वह मानवजाति की आज के दिन तक अगुआई कर सकता था? यदि परमेश्वर अपरिवर्तशील है, तो ऐसा क्यों है कि उसने पहले ही दो युगों का कार्य कर लिया है? ... 'परमेश्वर हमेशा नया रहता है और कभी पुराना नहीं पड़ता है' वचन उसके कार्य के संदर्भ में हैं, और 'परमेश्वर अपरिवर्तशील है' वचन उस संदर्भ में हैं जो परमेश्वर का अंतर्निहित स्वरूप है। इसके बावज़ूद, तुम छह-हज़ार-वर्ष के कार्य को एक बिंदु निर्भर नहीं कर सकते हो, या इसे केवल मृत शब्दों से सीमित नहीं कर सकते हो। मनुष्य की मूर्खता ऐसी ही है। परमेश्वर इतना सरल नहीं है जितना मनुष्य कल्पना करता है, और उसका कार्य किसी एक युग में नहीं रुका रह सकता है। उदाहरण के लिए, यहोवा हमेशा परमेश्वर के नाम के लिए नहीं हो सकता है; परमेश्वर यीशु के नाम के तहत भी अपना कार्य कर सकता है। यह एक संकेत है कि परमेश्वर का कार्य हमेशा आगे की ओर प्रगति करते हुए बढ़ रहा है।

"परमेश्वर हमेशा परमेश्वर है, और वह कभी शैतान नहीं बनेगा; शैतान हमेशा शैतान है, और वह कभी परमेश्वर नहीं बनेगा। परमेश्वर की बुद्धि, परमेश्वर की चमत्कारिकता, परमेश्वर की धार्मिकता और परमेश्वर का प्रताप कभी नहीं बदलेंगे। उसका सार और उसकी सत्ता तथा स्वरूप कभी नहीं बदलेगा। किंतु जहाँ तक उसके कार्य की बात है, वह हमेशा आगे बढ़ रहा है, हमेशा गहरा होता जा रहा है, क्योंकि वह हमेशा नया रहता है और कभी पुराना नहीं पड़ता। हर युग में परमेश्वर एक नया नाम अपनाता है, हर युग में वह नया कार्य करता है, और हर युग में वह अपने सृजनों को अपनी नई इच्छा और नया स्वभाव देखने देता है" ("वचन देह में प्रकट होता है" में 'परमेश्वर के कार्य का दर्शन (3)')।

सर्वशक्तिमान परमेश्‍वर के वचनों में हमने देखा है कि, परमेश्‍वर स्‍वयं नहीं बदलता। इसका मतलब परमेश्‍वर के स्‍वभाव और उसके मूल सार से है, न कि उसके नाम से। मानवता की रक्षा के कार्य को करते हुए हर युग में परमेश्‍वर ने तमाम तरह के कार्य किए हैं, और अलग अलग नाम अंगीकृत किये हैं। उसका मूल सार नहीं बदल सकता. परमेश्‍वर सदा परमेश्‍वर ही रहेगा। तो इससे कोई फर्क नहीं पड़ता कि उसका नाम यहोवा है या फिर यीशु, उसका मूल सार कभी नहीं बदल सकता. ईश्‍वर सदा एक सा ही रहता है। तथापि, उस समय यहूदियों और फरीसियों को यह बात पता नहीं थी कि हर बदलते युग के साथ, उसका कार्य और उसका नाम भी बदलता है। उनके अनुसार उनका रक्षक, उनका परमेश्‍वर एकमात्र यहोवा ही था, क्योंकि, पिछले कई युगों से वो यही मानते आ रहें हैं कि, मात्र यहोवा ही एकमात्र परमेश्‍वर है और उसके अलावा कोई भी उनका रक्षक नहीं है। इसके परिणामस्‍वरूप, परमेश्‍वर ने जब अपना नाम बदला और वह "यीशु" के नाम से छुटकारे का कार्य करने आए तो उन्होंने पागलों की तरह प्रभु यीशु की निंदा की, उसके कार्यों में बाधा डाली और अंत में उसे सूली पर चढ़ा दिया, इस तरह एक जघन्‍य अपराध किया, और परमेश्वर ने उन सब को दण्डित किया। इसी तरह से, हम आज अंत के दिनों में हैं, यदि हमने परमेश्‍वर के मूल सार को और यह मानने को नकारा कि यह सब एक ही ईश्‍वर का कार्य है सिर्फ़ इसलिए क्योंकि उसने अपना कार्य और नाम बदल लिया है, तो यह हमारी नासमझी और लापरवाही होगी। हर युग में परमेश्‍वर ने जो नाम अंगीकृत किया है, उसका बड़ा महत्व होता है और उनमें मानवता का अत्यधिक कल्‍याण निहित होता है।

परमेश्‍वर हमेशा नये होते हैं, कभी भी पुराने नहीं। परमेश्‍वर वे हैं जो सबको खुद में समाये हुए है। परमेश्‍वर के अलग-अलग नाम संभवत: उनकी संपूर्णता को नहीं दर्शा सकते हैं। इसलिए जैसे-जैसे युग आगे बढ़ते हैं, उनके नाम भी बदलते रहते हैं। सर्वशक्तिमान परमेश्वर कहते हैं, "यीशु का नाम छुटकारे के कार्य के वास्ते लिया गया था, तो क्या जब वह अंत के दिनों में लौटेगा तो तब भी उसे उसी नाम से बुलाया जाएगा? क्या वह अभी भी छुटकारे का कार्य करेगा? ऐसा क्यों है कि यहोवा और यीशु एक ही हैं, फिर भी उन्हें भिन्न-भिन्न युगों में भिन्न-भिन्न नामों से बुलाया जाता है? क्या यह इसलिए नहीं है क्योंकि उनके कार्य के युग भिन्न-भिन्न हैं? क्या केवल एक अकेला नाम परमेश्वर का उसकी संपूर्णता में प्रतिनिधित्व कर सकता है? ऐसा होने पर, परमेश्वर को भिन्न युग में भिन्न नाम के द्वारा अवश्य बुलाया जाना चाहिए, युग को परिवर्तित करने और युग का प्रतिनिधित्व करने के लिए नाम का उपयोग अवश्य किया जाना चाहिए। क्योंकि कोई भी एक नाम पूरी तरह से स्वयं परमेश्वर का प्रतिनिधित्व नहीं कर सकता है, और प्रत्येक नाम केवल एक दिए गए युग के दौरान परमेश्वर के स्वभाव के उस समय से संबंधित पहलू का ही प्रतिनिधित्व कर सकता है; और प्रत्येक नाम को केवल उसके कार्य का प्रतिनिधित्व ही करना है। इसलिए, समस्त युग का प्रतिनिधित्व करने के लिए परमेश्वर ऐसे किसी भी नाम को चुन सकता है जो उसके स्वभाव के अनुकूल है" ("वचन देह में प्रकट होता है" में 'परमेश्वर के कार्य का दर्शन (3)')। "क्या यीशु का नाम—'परमेश्वर हमारे साथ'—परमेश्वर के स्वभाव को उसकी समग्रता से व्यक्त कर सकता है? क्या यह पूरी तरह से परमेश्वर को स्पष्ट कर सकता है? यदि मनुष्य कहता है कि परमेश्वर को केवल यीशु कहा जा सकता है, और उसका कोई अन्य नाम नहीं हो सकता है क्योंकि परमेश्वर अपना स्वभाव नहीं बदल सकता है, तो ऐसे वचन वास्तव में ईशनिन्दा हैं! क्या तुम मानते हो कि हमारे पास यीशु, परमेश्वर नाम, अकेला परमेश्वर का उसकी समग्रता से प्रतिनिधित्व कर सकता है? परमेश्वर को कई नामों से बुलाया जा सकता है, किन्तु इन कई नामों में से, एक भी ऐसा नहीं है जो परमेश्वर के समस्त को संपुटित कर सकता हो, एक भी ऐसा नहीं है जो परमेश्वर का पूरी तरह से प्रतिनिधित्व कर सकता हो। और इसलिए, परमेश्वर के कई नाम हैं, किन्तु ये बहुत से नाम परमेश्वर के स्वभाव को पूरी तरह से स्पष्ट नहीं कर सकते हैं, क्योंकि परमेश्वर का स्वभाव इतना समृद्ध है, कि यह बस मनुष्य के जानने की सीमा से बढ़ कर है। मनुष्य की भाषा का उपयोग करके, परमेश्वर को पूरी तरह से संपुटित करने का मनुष्य के पास कोई तरीका नहीं है। ... एक विशेष शब्द या नाम परमेश्वर का उसकी समग्रता में प्रतिनिधित्व करने में असमर्थ है, तो क्या तुमको लगता है कि उसके नाम को तय किया जा सकता है? परमेश्वर बहुत महान और बहुत पवित्र है फिर भी तुम उसे प्रत्येक नए युग में अपना नाम बदलने की अनुमति नहीं दोगे? इसलिए, प्रत्येक युग में जिसमें परमेश्वर व्यक्तिगत रूप से अपना स्वयं का कार्य करता है, वह उस कार्य को संपुटित करने के लिए जिसे करने का वह इरादा रखता है, एक नाम का उपयोग करता है जो युग के अनुकूल होता है। वह इस विशेष नाम, एक ऐसा नाम जिसका अस्थायी महत्व है, का उपयोग उस युग के अपने स्वभाव का प्रतिनिधित्व करने के लिए करता है। यह परमेश्वर है जो अपने स्वयं के स्वभाव को व्यक्त करने के लिए मनुष्य की भाषा का उपयोग कर रहा है" ("वचन देह में प्रकट होता है" में 'परमेश्वर के कार्य का दर्शन (3)')। परमेश्‍वर बुद्धिमान, सर्वशक्तिमान शासक हैं। वे महान हैं, वे प्रचुर हैं, और सबको समेटे हुए हैं। कोई एक नाम शायद वह सब नहीं दर्शा सकता जो कि परमेश्‍वर हैं। इन सबसे बढ़कर, हरेक युग में परमेश्‍वर ने अपने कार्य का एक अंश ही पूरा किया है, और उन्होंने अपने स्वभाव का एक अंश ही प्रकट किया है। उन्होंने वो सब व्यक्त नहीं किया है, जो उनका अस्तित्‍व है। इसलिए, अपने कार्य के हर चरण में, वे एक विशेष नाम अपनाते हैं, जिसमें उस युग की महत्ता समायी होती है, ताकि उस युग के उनके कार्य और उनके द्वारा व्यक्त किये जा रहे स्वभाव को दर्शाया जा सके। यह परमेश्‍वर के कार्य का सिद्धांत है, और यही वो बुनियादी वजह है कि वे अपना नाम बदल लेते हैं।

— 'राज्य के सुसमाचार पर विशिष्ट प्रश्नोत्तर' से उद्धृत

हर युग में परमेश्‍वर का नाम परमेश्वर की संपूर्णता को नहीं दर्शा सकता, तो हर युग में उनके नाम की क्या अहमियत है? यह एक बेहद अहम सवाल है। आज, सर्वशक्तिमान परमेश्‍वर ने हमें पहले ही इस सवाल का जवाब दे दिया है। सर्वशक्तिमान परमेश्वर कहते हैं, "'यहोवा' वह नाम है जिसे मैंने इस्राएल में अपने कार्य के दौरान अपनाया था, और इसका अर्थ है इस्राएलियों (परमेश्वर के चुने हुए लोग) का परमेश्वर जो मनुष्य पर दया कर सकता है, मनुष्य को शाप दे सकता है, और मनुष्य के जीवन को मार्गदर्शन दे सकता है। इसका अर्थ है वह परमेश्वर जिसके पास बड़ी सामर्थ्य है और जो बुद्धि से भरपूर है। 'यीशु' इम्मानुएल है, और इसका मतलब है वह पाप बलि जो प्रेम से परिपूर्ण है, करुणा से भरपूर है, और मनुष्य को छुटकारा देता है। उसने अनुग्रह के युग का कार्य किया, और वह अनुग्रह के युग का प्रतिनिधित्व करता है, और वह प्रबन्धन योजना के केवल एक भाग का ही प्रतिनिधित्व कर सकता है। अर्थात्, केवल यहोवा ही इस्राएल के चुने हुए लोगों का परमेश्वर, अब्राहम का परमेश्वर, इसहाक का परमेश्वर, याकूब का परमेश्वर, मूसा का परमेश्वर, और इस्राएल के सभी लोगों का परमेश्वर है। और इसलिए वर्तमान युग में, यहूदा के कुटुम्ब के अलावा सभी इस्राएली यहोवा की आराधना करते हैं। वे वेदी पर उसके लिए बलिदान करते हैं, और याजकीय लबादे पहनकर मन्दिर में उसकी सेवा करते हैं। वे यहोवा के पुनः प्रकट होने की आशा करते हैं। केवल यीशु ही मानवजाति को छुटकारा दिलाने वाला है। यीशु वह पाप बलि है जिसने मानवजाति को पाप से छुटकारा दिलाया है। जिसका अर्थ है, कि यीशु का नाम अनुग्रह के युग से आया, और अनुग्रह के युग में छुटकारे के कार्य के कारण विद्यमान रहा। अनुग्रह के युग के लोगों के पुनर्जीवित किए जाने और बचाए जाने की ख़ातिर यीशु का नाम विद्यमान था, और यीशु का नाम पूरी मानवजाति के उद्धार के लिए एक विशेष नाम है। और इस प्रकार यीशु का नाम छुटकारे के कार्य को दर्शाता है, और अनुग्रह के युग का द्योतक है। यहोवा का नाम इस्राएल के लोगों के लिए एक विशेष नाम है जो व्यवस्था के अधीन जिए थे। प्रत्येक युग में और कार्य के प्रत्येक चरण में, मेरा नाम आधारहीन नहीं है, किन्तु प्रतिनिधिक महत्व रखता हैः प्रत्येक नाम एक युग का प्रतिनिधित्व करता है। 'यहोवा' व्यवस्था के युग का प्रतिनिधित्व करता है, और यह उस परमेश्वर के लिए सम्मानसूचक है जिसकी आराधना इस्राएल के लोगों के द्वारा की जाती है। 'यीशु' अनुग्रह के युग का प्रतिनिधित्व करता है, और यह उन सबके परमेश्वर का नाम है जिन्हें अनुग्रह के युग के दौरान छुटकारा दिया गया था। यदि मनुष्य अब भी अंत के दिनों के दौरान उद्धारकर्त्ता यीशु के आगमन की अभिलाषा करता है, और अब भी उससे अपेक्षा करता है कि वह उसी प्रतिरूप में आए जो उसने यहूदिया में धारण किया था, तो छः हज़ार सालों की सम्पूर्ण प्रबन्धन योजना छुटकारे के युग में रुक जाएगी, और थोड़ी सी भी प्रगति करने में अक्षम होगी। इसके अतिरिक्त, अंत के दिन का आगमन कभी नहीं होगा, और युग का समापन कभी नहीं होगा। ऐसा इसलिए है क्योंकि उद्धारकर्त्ता यीशु सिर्फ मानवजाति के छुटकारे और उद्धार के लिए है। मैंने अनुग्रह के युग के सभी पापियों के लिए यीशु का नाम अपनाया था, और यह वह नाम नहीं है जिसके द्वारा मैं पूरी मानवजाति को समाप्त करूँगा" ("वचन देह में प्रकट होता है" में "उद्धारकर्त्ता पहले ही एक 'सफेद बादल' पर सवार होकर वापस आ चुका है")।

सर्वशक्तिमान परमेश्‍वर के वचनों से हम सबने हर युग में परमेश्‍वर द्वारा अपनाये गये नामों का अर्थ समझा है। व्यवस्था के युग में, उनका नाम यहोवा था, और यह नाम उस युग में मानवजाति के सामने उनकी अभिव्यक्ति को दर्शाता है: प्रताप, क्रोध, श्राप, और दया का उनका स्वभाव। फिर, परमेश्‍वर ने यहोवा नाम अपना कर व्यवस्था के युग का कार्य शुरू किया। उन्होंने अपनी व्यवस्था और आदेश जारी किये और आधिकारिक रूप से नवजात मानवजाति की जीवन जीने में पृथ्वी पर अगुवाई की। उनकी मांग थी कि लोग व्यवस्था का सख्ती से पालन करें और उनकी आराधना करना और उनको महान मान कर उनका सम्मान करना सीख लें। व्यवस्था का पालन करनेवाले किसी को भी आशीष और अनुग्रह मिलना निश्चित था। जो कोई व्यवस्था को तोड़ता, उसे पत्थरों से मार दिया जाता, या स्वर्ग की ज्वाला में राख कर दिया जाता। इसीलिए व्यवस्था में जीनेवाले इस्‍त्राएलियों ने सख्ती से इसका पालन किया, और यहोवा के नाम को पवित्र माना। कुछ हज़ार सालों तक, व्यवस्था के युग की समाप्ति होने तक वे यहोवा नाम के अधीन रहे, व्यवस्था के युग का अंत होने पर, चूंकि मानवजाति अधिक से अधिक भ्रष्ट हो गई थी और वे अधिक से अधिक पाप कर रहे थे, लोगों के सामने व्यवस्था को बनाये रखने का कोई रास्ता नहीं रह गया था। हर किसी के सामने व्यवस्था तोड़ने के लिए दंड पाने का सतत खतरा मंडरा रहा था, जिस वजह से परमेश्‍वर ने यीशु नाम धारण कर पापमुक्ति का कार्य किया। उन्होंने परमेश्‍वर का प्रेम और दया का स्वभाव व्यक्त करके अनुग्रह के युग की शुरुआत की और व्यवस्था के युग का अंत किया। उन्होंने इंसान पर अपना भरपूर अनुग्रह बरसाया और अंत में उन्हें मनुष्य की खातिर सूली पर चढ़ा दिया गया, ताकि मनुष्य को उसके पापों से छुटकारा मिल सके। उसके बाद से, उन्होंने यीशु नाम की आराधना करना और उनके नाम को पवित्र मानना शुरू किया, ताकि उनके पापों के लिए माफी मिल सके और वे उनके भरपूर अनुग्रह का आनंद उठा सकें। यीशु नाम ऐसा है कि अनुग्रह के युग के लोग दोबारा जन्म लेकर उद्धार प्राप्त कर सकें। इसका अर्थ है मानवजाति की पापमुक्ति के लिए दया और प्रेम और पाप की भेंट होना है यीशु नाम परमेश्‍वर की पापमुक्ति के कार्य को दर्शाता है और यह उनकी दया और प्रेम के स्वभाव को भी रूपायित करता है। कार्य के दो चरणों से हम देख सकते हैं कि हर युग में वे जो नाम अपनाते हैं, उसकी अपनी अहमियत है। प्रत्येक नाम परमेश्‍वर के उस युग के कार्य को और उस युग में व्यक्त उनके स्वभाव को दर्शाता है। अनुग्रह के युग में, जब प्रभु आये, तो अगर उन्हें यीशु न कह कर यहोवा कहा जाता, तो परमेश्‍वर का कार्य व्यवस्था के युग में रुक गया होता, और भ्रष्ट मानवजाति को परमेश्‍वर से कभी पापमुक्ति नहीं मिल पायी होती। आखिर में, व्यवस्था तोड़ने के लिए मनुष्य की निंदा हुई होती और उसे दंड मिला होता, और जब परमेश्‍वर अंत के दिनों में आये, तब यदि उन्हें अब भी यीशु कहा जाता, तो भ्रष्ट मानवजाति को केवल अपने पापों से छुटकारा मिल पाया होता, परंतु कभी भी उसे परमेश्‍वर के राज्य में प्रवेश करने के लिए शुद्ध नहीं किया जा पाता। ऐसा इसलिए कि प्रभु यीशु द्वारा छुटकारा दिलाये गये लोगों के पाप क्षमा कर दिए गये हैं, लेकिन उनके भीतर का पापी स्वभाव फिर भी मौजूद रहता है। वे अब भी अक्सर पाप करते हैं, जिस वजह से वे परमेश्‍वर को प्राप्त नहीं हो पाते। इसलिए, मानवजाति को पूरी तरह से पाप से बचाने के लिए, परमेश्‍वर अब एक और चरण का कार्य कर रहे हैं, जो कि प्रभु यीशु के कार्य की बुनियाद पर मानवजाति को पूरी तरह से शुद्ध करने और बचाने का है। परमेश्‍वर का नाम फिर से बदलता है और सर्वशक्तिमान परमेश्वर हो जाता है। जहां तक परमेश्‍वर को अंत के दिनों में सर्वशक्तिमान परमेश्‍वर कहने का सवाल है, दरअसल इसकी भविष्यवाणी बहुत समय पहले ही परमेश्वर द्वारा की जा चुकी थी। आइए, प्रकाशितवाक्य 1:8 को पढ़ कर देखें: "प्रभु परमेश्‍वर, जो है और जो था और जो आनेवाला है, जो सर्वशक्‍तिमान है, यह कहता है, 'मैं ही अल्फ़ा और ओमेगा हूँ।'" और प्रकाशितवाक्य 11:16-17: "तब चौबीसों प्राचीन जो परमेश्‍वर के सामने अपने अपने सिंहासन पर बैठे थे, मुँह के बल गिरकर परमेश्‍वर को दण्डवत् करके यह कहने लगे, 'हे सर्वशक्‍तिमान प्रभु परमेश्‍वर, जो है और जो था, हम तेरा धन्यवाद करते हैं कि तू ने अपनी बड़ी सामर्थ्य को काम में लाकर राज्य किया है।'" प्रकाशितवाक्य 4:8, 16:7, 19:6 और बाइबल में कई दूसरे स्थानों पर भी ये भविष्यवाणी की गयी थी। अंत के दिनों में, परमेश्‍वर का नया नाम सर्वशक्तिमान है, यानी सर्वशक्तिमान परमेश्‍वर।

परमेश्‍वर एक बुद्धिमान परमेश्‍वर हैं, और हर कार्य जो वे करते हैं उसकी बड़ी अहमियत है। सर्वशक्तिमान परमेश्‍वर नाम उनके कार्य को और अंत के दिनों में उनके द्वारा व्यक्त स्वभाव को पूरी तरह से दर्शाता है। अगर परमेश्‍वर ने हमारे सामने खुद ये रहस्य प्रकट नहीं किये होते, तो हम बाइबल पढ़ने में चाहे जितने साल गुज़ार देते, हम ये बातें नहीं जान पाते। आइए, सब मिलकर सर्वशक्तिमान परमेश्‍वर के वचनों को पढ़ें।

सर्वशक्तिमान परमेश्वर कहते हैं, "अपने समस्त प्रबंधन में परमेश्वर का कार्य पूर्णतः स्पष्ट है : अनुग्रह का युग अनुग्रह का युग है, और अंत के दिन अंत के दिन हैं। प्रत्येक युग के बीच सुस्पष्ट भिन्नताएँ हैं, क्योंकि प्रत्येक युग में परमेश्वर उस कार्य को करता है, जो उस युग का प्रतिनिधि होता है। अंत के दिनों का कार्य किए जाने के लिए, युग का अंत करने के लिए ज्वलन, न्याय, ताड़ना, कोप और विनाश होने आवश्यक हैं। अंत के दिन अंतिम युग को संदर्भित करते हैं। अंतिम युग के दौरान क्या परमेश्वर युग का अंत नहीं करेगा? युग समाप्त करने के लिए परमेश्वर को अपने साथ ताड़ना और न्याय लाने आवश्यक हैं। केवल इसी तरह से वह युग को समाप्त कर सकता है। यीशु का प्रयोजन यह था कि मनुष्य का अस्तित्व बचा रह सके, वह जीवित रह सके और एक बेहतर तरीके से विद्यमान रह सके। उसने मनुष्य को पाप से बचाया, ताकि उसका अनैतिकता में डूबना रुक सके और वह अब और अधोलोक व नरक में न रहे, और मनुष्य को अधोलोक व नरक से बचाकर यीशु ने मनुष्य को जीते रहने दिया। अब अंत के दिन आ गए हैं। परमेश्वर मनुष्य का विनाश कर देगा और मनुष्यजाति को पूरी तरह से नष्ट कर देगा, अर्थात्, वह मनुष्यजाति की विद्रोहशीलता को रूपांतरित कर देगा। इस कारण से, अतीत के करुणामय और प्रेममय स्वभाव के साथ परमेश्वर के लिए युग को समाप्त करना या प्रबंधऩ की अपनी छह-हजार-वर्षीय योजना को सफल बनाना असंभव होगा। हर युग में परमेश्वर के स्वभाव का एक विशिष्ट प्रतिनिधित्व होता है, और हर युग में ऐसा कार्य होता है, जिसे परमेश्वर द्वारा किया जाना चाहिए। इसलिए, प्रत्येक युग में स्वयं परमेश्वर द्वारा किए गए कार्य में उसके सच्चे स्वभाव की अभिव्यक्ति शामिल रहती है, और उसका नाम और उसका कार्य दोनों युग के साथ बदल जाते हैं—वे सब नए होते हैं। ... इस प्रकार, व्यवस्था के युग के दौरान परमेश्वर का नाम यहोवा था, और अनुग्रह के युग में यीशु के नाम ने परमेश्वर का प्रतिनिधित्व किया। अंत के दिनों के दौरान उसका नाम सर्वशक्तिमान परमेश्वर—सर्वशक्तिमान है, जो अपने सामर्थ्य का उपयोग मनुष्य का मार्गदर्शन करने, मनुष्य पर विजय प्राप्त करने और मनुष्य को प्राप्त करने, और अंत में, युग का समापन करने के लिए करता है" ("वचन देह में प्रकट होता है" में 'परमेश्वर के कार्य का दर्शन (3)')।

"एक समय मुझे यहोवा के नाम से जाना जाता था। मुझे मसीहा भी कहा जाता था, और लोगों ने कभी मुझे उद्धारकर्त्ता यीशु कहा था क्योंकि वे मुझ से प्रेम करते थे और मेरा आदर करते थे। किन्तु आज मैं वह यहोवा या यीशु नहीं हूँ जिसे लोग बीते समयों में जानते थे—मैं वह परमेश्वर हूँ जो अंत के दिनों में वापस आ गया है, वह परमेश्वर जो युग को समाप्त करेगा। वह परमेश्वर मैं स्वयं हूँ जो अपने स्वभाव की परिपूर्णता के साथ, और अधिकार, आदर एवं महिमा से भरपूर होकर पृथ्वी के छोरों से उदय होता है। लोग कभी भी मेरे साथ संलग्न नहीं हुए हैं, मुझे कभी जाना नहीं है, और मेरे स्वभाव से हमेशा अनभिज्ञ रहे हैं। संसार की रचना के समय से लेकर आज तक, एक मनुष्य ने भी मुझे नहीं देखा है। यह वही परमेश्वर है जो अंत के दिनों के दौरान मनुष्यों पर प्रकट होता है किन्तु वह मनुष्य के बीच में छुपा हुआ है। वह, सामर्थ्य से भरपूर और अधिकार से लबालब भरा हुआ, धधकते हुए सूरज और दहकती हुई आग के समान, सच्चे और वास्तविक रूप में, मनुष्यों के बीच निवास करता है। कोई ऐसा मनुष्य या चीज़ नहीं है जिसका न्याय मेरे वचनों के द्वारा नहीं किया जाएगा, और कोई ऐसा मनुष्य या चीज़ नहीं है जिसे आग की जलती हुई लपटों के माध्यम से शुद्ध नहीं किया जाएगा। अंततः, मेरे वचनों के कारण सारे राष्ट्र धन्य हो जाएँगे, और मेरे वचनों के कारण टुकड़े-टुकड़े भी कर दिए जाएँगे। इस तरह, अंत के दिनों के दौरान सभी लोग देखेंगे कि मैं ही वह उद्धारकर्त्ता हूँ जो वापस लौट आया है, मैं ही वह सर्वशक्तिमान परमेश्वर हूँ जो समस्त मानवजाति को जीतता है, और मैं ही एक समय मनुष्य के लिए पाप बलि था, किन्तु अंत के दिनों में मैं सूरज की ज्वाला भी बन जाता हूँ जो सभी चीज़ों को जला देती है, और साथ ही मैं धार्मिकता का सूर्य भी बन जाता हूँ जो सभी चीज़ों को प्रकट कर देता है। अंत के दिनों का मेरा कार्य ऐसा ही है। मैंने इस नाम को अपनाया है और मैं इस स्वभाव से सम्पन्न हूँ ताकि सभी लोग देख सकें कि मैं धर्मी परमेश्वर हूँ, धधकता हुआ सूरज हूँ, और दहकती हुई आग हूँ। ऐसा इसलिए है ताकि सभी मेरी, एकमात्र सच्चे परमेश्वर की, आराधना कर सकें, और ताकि वे मेरे असली चेहरे को देख सकें: मैं न केवल इस्राएलियों का परमेश्वर हूँ, और न मात्र छुटकारा दिलाने वाला हूँ—मैं समस्त आकाश, पृथ्वी और महासागरों के सारे प्राणियों का परमेश्वर हूँ" ("वचन देह में प्रकट होता है" में "उद्धारकर्त्ता पहले ही एक 'सफेद बादल' पर सवार होकर वापस आ चुका है")।

अंत के दिनों में, परमेश्‍वर, सर्वशक्तिमान परमेश्‍वर नाम से राज्य के युग का अपना न्याय का कार्य कर रहे हैं। उन्होंने मानवजाति के भ्रष्ट स्वभाव का पर्दाफ़ाश किया है और अपने वचनों से हमारी अधार्मिकता पर न्याय किया है ताकि हम इन वचनों को पढ़कर अपने स्वभाव और सार को समझ सकें, इस सच्चाई को देख सकें कि शैतान ने हमें कितनी गहराई तक भ्रष्ट कर दिया है, अपने भ्रष्ट आचरण की जड़ को समझ पायें, और परमेश्‍वर के धार्मिक स्वभाव को जान पायें, जो मनुष्य द्वारा किसी अपमान को बरदाश्त नहीं करता है। वे हमारे स्वभाव को बदलने के लिए एक मार्ग और एक दिशा की ओर भी इशारा करते हैं, ताकि हम बुराई को छोड़ दें, सच्चाई की साधना करें, स्वभाव में बदलाव हासिल करें और परमेश्‍वर द्वारा बचा लिये जाएं। परमेश्‍वर मानवजाति के साथ न्याय करने और उसके शुद्धिकरण का कार्य करने, लोगों के प्रकार के अनुसार उन्हें बांटने, और अच्छे लोगों को पुरस्कृत करने तथा बुरे लोगों को सज़ा देने आये हैं, जिससे कि भ्रष्ट मानवजाति को पाप से पूरी तरह से बचाया जा सके, और मनुष्य को बचाने के परमेश्‍वर के छह हज़ार साल वाली प्रबंधन योजना को समाप्त किया जा सके। परमेश्‍वर अंत के दिनों में मानवजाति के सामने अपने धर्मी स्वभाव, प्रताप, और क्रोध के साथ प्रकट हुए हैं, जो अपमान को बरदाश्त नही करेगा। उन्होंने खुले तौर पर अपने सहज स्वभाव, और उनके पास जो है उसे सबके सामने प्रदर्शित किया है, वे पाप से हमें पूरी तरह से बचाने के लिए और मनुष्य को उसकी मूल पवित्रता लौटाने के लिए, मानवजाति के भ्रष्ट आचरण और अधार्मिकता को ऐसे स्वभाव द्वारा ताड़ना देने और उसका न्याय करने आये हैं। वे चाहते हैं कि सभी लोग न केवल उस बुद्धि को समझें जो उन्होंने स्वर्ग, पृथ्वी, और सभी चीज़ों को रचने में लगायी है, बल्कि उस बुद्धि को और अधिक समझें जो उन्होंने मानवजाति के लिए अपने व्यावहारिक कार्य में लगायी है। उन्होंने न केवल सभी चीज़ों की रचना की है, बल्कि वे सभी चीज़ों पर शासन भी करते हैं। वे न केवल मानवजाति के लिए एक पापबलि बन पाये, बल्कि वे मनुष्य को पूर्णता देने, हमारा रूपांतर करने और शुद्धिकरण करने में भी समर्थ हैं। वे प्रथम और अंतिम हैं। कोई भी उनके आश्चर्यजनक स्वभाव या उनके कार्य की थाह नहीं पा सकता। इसलिए, परमेश्‍वर को उनके सर्वशक्तिमान परमेश्‍वर नाम से पुकारना सबसे उपयुक्त है। अब पवित्र आत्मा का कार्य केवल सर्वशक्तिमान परमेश्‍वर के नाम से किये गये कार्य का मान बनाये रखना है। सर्वशक्तिमान परमेश्‍वर के नाम की प्रार्थना करनेवाला और उनकी आराधना करनेवाला कोई भी इंसान पवित्र आत्मा के कार्य को प्राप्त कर सकता है, और परमेश्‍वर द्वारा दिये गये जीवन के समृद्ध पोषण और सिंचाई का आनंद उठा सकता है। वरना वे सब अँधेरों में डूब जाएंगे और अपना रास्ता भटक जाएंगे। फिलहाल, अनुग्रह के युग में अब तक फंसी हुई कलीसियाओं में पहले कभी न देखी गयी वीरानगी छायी हुई है। विश्वासी अपनी आस्था के प्रति बेरुखे होते जा रहे हैं, प्रचारकों के पास उपदेश देने के लिए कुछ नहीं है, और लोगों के मन में परमेश्‍वर से प्रार्थना करते समय कोई भावना नहीं होती। साथ-ही-साथ, ज़्यादा-से-ज़्यादा लोग दुनिया के बहकावों के शिकार हो रहे हैं। इसकी बुनियादी वज़ह यह है कि उन लोगों ने सर्वशक्तिमान परमेश्‍वर के नाम को स्वीकार नहीं किया है, और वे परमेश्‍वर के नये कार्य के साथ चल नहीं पाये हैं।

— 'राज्य के सुसमाचार पर विशिष्ट प्रश्नोत्तर' से उद्धृत

पिछला: प्रश्न 20: प्रभु यीशु के छुटकारे के कार्य का एक पहलू हमारे पापों को क्षमा और निरस्त करना था, जबकि दूसरा पहलू हमें शांति, आनन्द और भरपूर अनुग्रह प्रदान करना था। इससे हम यह देख पाते हैं कि परमेश्वर एक दयालु और प्रेमी परमेश्वर है। परन्तु तुम यह गवाही देते हो कि सर्वशक्तिमान परमेश्वर अंतिम दिनों में न्याय का कार्य करता है, कि वह सत्य को अभिव्यक्त करता है और मनुष्य को न्याय और ताड़ना देता है, मनुष्य को काटता-छाँटता और उससे निपटता है, मनुष्य को उजागर करता है और सभी प्रकार के बुरे लोगों, बुरी आत्माओं और मसीह-विरोधियों को हटा देता है, जिससे लोगों को यह देखने का अवसर मिलता है कि परमेश्वर का धर्मी स्वभाव किसी भी अपराध को सहन नहीं करता है। प्रभु यीशु के कार्य में प्रकट होने वाला स्वभाव सर्वशक्तिमान परमेश्वर के कार्य में प्रकट होने वाले स्वभाव से बिलकुल अलग क्यों है? हमें परमेश्वर के स्वभाव को यथार्थतः किस प्रकार समझना चाहिए?

अगला: प्रश्न 22: प्रभु यीशु को क्रूस पर मनुष्यों के लिए पाप-बलि के रूप में कीलों से जड़ दिया गया था, जिससे हमें पाप से बचा लिया गया। अगर हम प्रभु यीशु से भटकते हैं और सर्वशक्तिमान परमेश्वर पर विश्वास करते हैं, तो क्या यह प्रभु यीशु के प्रति विश्वासघात नहीं होगा? क्या यह धर्मत्याग नहीं होगा?

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