प्रश्न 19: तुम इसकी गवाही देते हो कि अंतिम दिनों में परमेश्वर मनुष्य को पूरी तरह से शुद्ध करने और बचाने के लिए न्याय के अपने कार्य को करता है, परन्तु सर्वशक्तिमान परमेश्वर द्वारा व्यक्त वचनों को पढ़ने के बाद, मुझे लगता है कि उनमें से कुछ मनुष्य की निंदा करते और उसे शाप देते हैं। यदि परमेश्वर मनुष्य को निन्दित और शापित करता है, तो क्या मनुष्य को सजा भुगतनी नहीं होगी? और तुम यह कैसे कह सकते हो कि इस तरह का न्याय मानव जाति को शुद्ध करता और बचाता है?

उत्तर:

अंत के दिनों में, परमेश्‍वर सत्‍य को व्यक्त करने और विजेताओं का एक समूह बनाने के लिए न्याय का कार्य करते हैं, ऐसे लोगों का एक समूह जो परमेश्‍वर के साथ एकमन और एकदिल हैं। यह तभी तय कर लिया गया था जब परमेश्‍वर ने दुनिया बनायी थी। लेकिन ऐसे कुछ व्यक्ति हैं जो देखते हैं कि परमेश्‍वर के कुछ वचनों में लोगों की निंदा और शाप हैं और वे अवधारणाएं बना लेते हैं। यह खासकर इसलिए है क्योंकि वे परमेश्‍वर के कार्य को नहीं जानते। अंत के दिनों में परमेश्‍वर का न्याय महान सफ़ेद सिंहासन का न्याय है जिसकी भविष्‍यवाणी प्रकाशितवाक्‍य की किताब में की गई है। परमेश्‍वर ने धार्मिकता, महिमा, और क्रोध के अपने स्वभाव को प्रकट किया है, और यह पूरी तरह से मानव जाति को उजागर करने के लिए और हर प्रकार के व्यक्ति में भेद करने के लिए है। इससे भी ज़्यादा, यह पुराने युग को समाप्त करने और शैतान के लोगों के पूरे सफाये के लिए है। तो शैतान के वे सभी लोग, जो परमेश्‍वर का विरोध करते हैं, क्या परमेश्‍वर उनकी निंदा कर उन्‍हें शाप नहीं दे सकते? हालां‍कि न्याय के कुछ वचन ऐसे हैं जो परमेश्‍वर के चुने गए लोगों द्वारा प्रकट किये गए भ्रष्टाचार को और उनकी असली भ्रष्‍ट समानता को उजागर करते हैं, और ये निंदा की तरह लगते हैं, ये परमेश्‍वर के चुने गए लोगों को उनके भ्रष्ट स्वभाव का सार स्‍पष्‍टता से दिखाने और उन्हें इस मामले की तह तक पहुंचाने के लिए है, साथ ही, यह इसलिए है कि वे लोग सत्य को समझने का फल पा सकें। अगर परमेश्‍वर इतने कठोर नहीं होते, अगर उनके वचन हमारे अंदर तक चोट नहीं करते, तो हम अपनी भ्रष्ट समानताओं और शैतानी प्रकृति की पहचान नहीं कर पाते, और अंत के दिनों में परमेश्‍वर के कार्य से मानव जाति को शुद्ध करना और पूर्ण बनाना संभव नहीं होता। जो व्यक्ति सत्‍य से प्रेम करते हैं और तथ्यों का सम्मान करते हैं, वे यह देख पाएंगे कि परमेश्‍वर के वचन भले ही तीखे हैं, वे न्याय और ताड़ना के या निंदा और शाप के वचन हैं, लेकिन वे पूरी तरह से वास्तविक तथ्यों के अनुरूप हैं। परमेश्‍वर इस प्रकार से बोलते हैं जो बहुत ही व्यावहारिक और बहुत ही वास्तविक होता है, और यह बिल्कुल बढ़ा-चढ़ा कर बोला गया नहीं है। परमेश्‍वर के इन कठोर वचनों से प्राप्त परिणामों से, हम सब देख सकते हैं कि उनके भीतर मानव जाति के लिए परमेश्‍वर का वास्तविक प्रेम और मानव जाति को बचाने के उनके अच्छे इरादे छिपे हुए हैं। केवल वही लोग जो सत्य से ऊबे हुए हैं, अपनी धारणाएं बना सकते हैं, और जो लोग सच्चाई से घृणा करते हैं, वे ही परमेश्‍वर के कार्य की आलोचना और निंदा कर सकते हैं। परमेश्‍वर 20 से अधिक वर्षों से चीन में कार्य कर रहे हैं और उन्होंने पहले से ही विजेताओं का एक समूह बना लिया है। वे सीसीपी सरकार के क्रूर उत्पीड़न और अत्‍याचार से गुज़र चुके हैं, और वे सभी परमेश्‍वर का पक्ष लेने और गवाही देने में सक्षम हैं। यह पूरी तरह से परमेश्‍वर के वचनों की वज़ह से पाया हुआ फल है। उन सभी ने परमेश्‍वर के प्रेम को उनके वचनों में देखा है, और जाना है कि मानव जाति को बचाने के लिए उन्होंने कैसा दुःख उठाया है। हालांकि उनके कुछ वचन बहुत कठोर हैं लेकिन वे इनका अनुसरण कर पाते हैं, और इससे उन्होंने परमेश्‍वर के स्वभाव का वास्तविक ज्ञान प्राप्त किया है। उन्होंने परमेश्वर के प्रति सम्मान और प्रेम का भाव विकसित किया है। वे सभी अपने कर्तव्यों को ईमानदारी से पूरा करने में सक्षम हैं, और अंत तक पूरी तरह से परमेश्‍वर का अनुसरण करेंगे। यह बात शैतान को सबसे ज्‍़यादा शर्मिंदा करती है, और यह शैतान को हराने का परमेश्‍वर का प्रमाण है। जहां तक सवाल परमेश्‍वर द्वारा अंत के दिनों में लोगों का न्याय करने और उन्हें शुद्ध करने का है, आइये सर्वशक्तिमान परमेश्‍वर के वचनों के कुछ अंश देखते हैं, और हमें यह स्पष्ट हो जाएगा।

सर्वशक्तिमान परमेश्वर कहते हैं, "परमेश्वर द्वारा मनुष्य की पूर्णता किन साधनों से संपन्न होती है? यह उसके धार्मिक स्वभाव द्वारा पूरी होती है। परमेश्वर के स्वभाव में मुख्यतः धार्मिकता, क्रोध, भव्यता, न्याय और शाप शामिल हैं, और वह मनुष्य को प्राथमिक रूप से न्याय द्वारा पूर्ण बनाता है। कुछ लोग नहीं समझते और पूछते हैं कि क्यों परमेश्वर केवल न्याय और शाप के द्वारा ही मनुष्य को पूर्ण बना सकता है। वे कहते हैं, 'यदि परमेश्वर मनुष्य को शाप दे, तो क्या वह मर नहीं जाएगा? यदि परमेश्वर मनुष्य का न्याय करे, तो क्या वह दोषी नहीं ठहरेगा? तब वह कैसे पूर्ण बनाया जा सकता है?' ऐसे शब्द उन लोगों के होते हैं जो परमेश्वर के कार्य को नहीं जानते। परमेश्वर मनुष्य की अवज्ञा को शापित करता है और वह मनुष्य के पापों का न्याय करता है। यद्यपि वह बिना किसी संवेदना के कठोरता से बोलता है, फिर भी वह उन सबको प्रकट करता है जो मनुष्य के भीतर होता है, और इन कठोर वचनों के द्वारा वह उन सब बातों को प्रकट करता है जो मूलभूत रूप से मनुष्य के भीतर होती हैं, फिर भी ऐसे न्याय द्वारा वह मनुष्य को देह के सार का गहन ज्ञान प्रदान करता है, और इस प्रकार मनुष्य परमेश्वर के समक्ष समर्पण कर देता है। मनुष्य की देह पापमय और शैतान की है, यह अवज्ञाकारी है, और परमेश्वर की ताड़ना की पात्र है। इसलिए, मनुष्य को स्वयं का ज्ञान प्रदान करने के लिए परमेश्वर के न्याय के वचनों से उसका सामना और हर प्रकार का शोधन परम आवश्यक है; केवल तभी परमेश्वर का कार्य प्रभावी हो सकता है" ("वचन देह में प्रकट होता है" में 'पीड़ादायक परीक्षणों के अनुभव से ही तुम परमेश्वर की मनोहरता को जान सकते हो')।

"आज परमेश्वर तुम लोगों का न्याय करता है, तुम लोगों को ताड़ना देता है, और तुम्हारी निंदा करता है, लेकिन तुम्हें यह अवश्य जानना चाहिए कि तुम्हारी निंदा इसलिए की जाती है, ताकि तुम स्वयं को जान सको। वह इसलिए निंदा करता है, शाप देता है, न्याय करता और ताड़ना देता है, ताकि तुम स्वयं को जान सको, ताकि तुम्हारे स्वभाव में परिवर्तन हो सके, और, इसके अलावा, तुम अपनी कीमत जान सको, और यह देख सको कि परमेश्वर के सभी कार्य धार्मिक और उसके स्वभाव और उसके कार्य की आवश्यकताओं के अनुसार हैं, और वह मनुष्य के उद्धार के लिए अपनी योजना के अनुसार कार्य करता है, और कि वह धार्मिक परमेश्वर है, जो मनुष्य को प्यार करता है, उसे बचाता है, उसका न्याय करता है और उसे ताड़ना देता है। यदि तुम केवल यह जानते हो कि तुम निम्न हैसियत के हो, कि तुम भ्रष्ट और अवज्ञाकारी हो, परंतु यह नहीं जानते कि परमेश्वर आज तुममें जो न्याय और ताड़ना का कार्य कर रहा है, उसके माध्यम से वह अपने उद्धार के कार्य को स्पष्ट करना चाहता है, तो तुम्हारे पास अनुभव प्राप्त करने का कोई मार्ग नहीं है, और तुम आगे जारी रखने में सक्षम तो बिल्कुल भी नहीं हो। परमेश्वर मारने या नष्ट करने के लिए नहीं, बल्कि न्याय करने, शाप देने, ताड़ना देने और बचाने के लिए आया है" ("वचन देह में प्रकट होता है" में 'मनुष्य के उद्धार के लिए तुम्हें सामाजिक प्रतिष्ठा के आशीष से दूर रहकर परमेश्वर की इच्छा को समझना चाहिए')।

"तुम सब पाप और व्यभिचार की धरती पर रहते हो; और तुम सब व्यभिचारी और पापी हो। आज तुम न केवल परमेश्वर को देख सकते हो, बल्कि उससे भी महत्वपूर्ण रूप से, तुम लोगों ने ताड़ना और न्याय प्राप्त किया है, तुमने वास्तव में गहन उद्धार प्राप्त किया है, दूसरे शब्दों में, तुमने परमेश्वर का महानतम प्रेम प्राप्त किया है। वह जो कुछ करता है, उस सबमें वह तुम्हारे प्रति वास्तव में प्रेमपूर्ण है। वह कोई बुरी मंशा नहीं रखता। यह तुम लोगों के पापों के कारण है कि वह तुम लोगों का न्याय करता है, ताकि तुम आत्म-परीक्षण करो और यह ज़बरदस्त उद्धार प्राप्त करो। यह सब मनुष्य को संपूर्ण बनाने के लिए किया जाता है। प्रारंभ से लेकर अंत तक, परमेश्वर मनुष्य को बचाने के लिए पूरी कोशिश कर रहा है, और वह अपने ही हाथों से बनाए हुए मनुष्य को पूर्णतया नष्ट करने का इच्छुक नहीं है। आज वह कार्य करने के लिए तुम लोगों के मध्य आया है, और क्या ऐसा उद्धार और भी बड़ा नहीं है? अगर वह तुम लोगों से नफ़रत करता, तो क्या फिर भी वह व्यक्तिगत रूप से तुम लोगों का मार्गदर्शन करने के लिए इतने बड़े परिमाण का कार्य करता? वह इस प्रकार कष्ट क्यों उठाए? परमेश्वर तुम लोगों से घृणा नहीं करता, न ही तुम्हारे प्रति कोई बुरी मंशा रखता है। तुम लोगों को जानना चाहिए कि परमेश्वर का प्रेम सबसे सच्चा प्रेम है। यह केवल लोगों की अवज्ञा के कारण है कि उसे न्याय के माध्यम से उन्हें बचाना पड़ता है; यदि वह ऐसा न करे, तो उन्हें बचाया जाना असंभव होगा। चूँकि तुम लोग नहीं जानते कि कैसे जिया जाए, यहाँ तक कि तुम इससे बिलकुल भी अवगत नहीं हो, और चूँकि तुम इस दुराचारी और पापमय भूमि पर जीते हो और स्वयं दुराचारी और गंदे दानव हो, इसलिए वह तुम्हें और अधिक भ्रष्ट होते नहीं देख सकता; वह तुम्हें इस मलिन भूमि पर रहते हुए नहीं देख सकता जहाँ तुम अभी रह रहे हो और शैतान द्वारा उसकी इच्छानुसार कुचले जा रहे हो, और वह तुम्हें अधोलोक में गिरने नहीं दे सकता। वह केवल लोगों के इस समूह को प्राप्त करना और तुम लोगों को पूर्णतः बचाना चाहता है। तुम लोगों पर विजय का कार्य करने का यह मुख्य उद्देश्य है—यह केवल उद्धार के लिए है" ("वचन देह में प्रकट होता है" में 'विजय के कार्य की आंतरिक सच्चाई(4)')।

सर्वशक्तिमान परमेश्‍वर के वचनों को सुनने के बाद, अब सभी को स्पष्ट होना चाहिए कि आखिरकार, परमेश्‍वर अंत के दिनों में न्याय का कार्य क्यों करते हैं? है न? मानव जाति शैतान के क्षेत्र में रहती है, पाप में रहती है, और पापों में मज़ा लेती है। धार्मिक समुदायों में से किसी ने भी परमेश्‍वर के आगमन की ओर ध्यान नहीं दिया है और कोई भी सच्चाई से प्रेम या इसे स्वीकार नहीं करता है। चाहे लोगों ने परमेश्‍वर की कैसी भी गवाही दी हो या उनके वचनों को फैलाया हो, ऐसे कितने लोग हैं जिन्‍होंने सक्रिय रूप से परमेश्‍वर के प्रकटन और कार्य की खोज या जांच-पड़ताल की है? और ऐसे कितने व्यक्ति होंगे जो परमेश्‍वर के न्याय और ताड़ना को स्वीकार करके उनके प्रति समर्पित हो पायेंगे? क्या हर कोई यह नहीं कहेगा कि यह मानव जाति दुष्टता का चरम है? अगर अंत के दिनों में परमेश्‍वर के न्याय का कार्य नहीं होता, तो यह मानव जाति जो पूरी तरह से भ्रष्ट है, शैतानी स्वभाव से भरी है, और जो परमेश्‍वर से इंकार और उनका विरोध करती है, क्या व‍ह शुद्ध होकर परमेश्‍वर के उद्धार को प्राप्त कर सकती है? अगर अंत के दिनों के परमेश्‍वर का न्याय नहीं होगा तो कौन विजेताओं का समूह बनाएगा? प्रभु यीशु की भविष्यवाणियां कैसे पूरी होंगी? कैसे मसीह का राज्य साकार होगा? प्रभु में विश्वास रखने वाले बहुत से लोग मानते हैं कि परमेश्‍वर प्रेमपूर्ण और दयालु परमेश्‍वर हैं और इससे कोई फर्क नहीं पड़ता कि हमने कौन से पाप किये हैं, परमेश्‍वर हमें पापमुक्त कर देंगे। वे मानते हैं कि प्रभु जब वापस आयेंगे तो भले ही हम कितने भी भ्रष्ट हों, किसी को भी छोड़ा नहीं जाएगा और हम सभी स्वर्ग के राज्‍य में आरोहित किये जायेंगे। क्या यह एक उचित नज़रिया है? क्या इस बात का समर्थन करने के लिए प्रभु के वचन में कुछ है? परमेश्‍वर पवित्र और धर्मी परमेश्‍वर हैं; क्या वे शैतानी स्वभाव से भरे हुए, गंदगी और भ्रष्टाचार से कलंकित, सत्‍य से इंकार करने वाले लोगों और परमेश्वर के शत्रुओं को अपने राज्‍य में प्रवेश करने की मंज़ूरी देंगे? बिल्कुल नही। इसलिए, प्रभु यीशु ने भविष्यवाणी की थी कि वे वापस आकर अंत के दिनों में सत्‍य व्यक्त करेंगे और अपना न्याय का कार्य करेंगे और मानवता को पूरी तरह शुद्ध करेंगे और बचाएँगे। प्रभु यीशु ने कहा था, "यदि कोई मेरी बातें सुनकर न माने, तो मैं उसे दोषी नहीं ठहराता; क्योंकि मैं जगत को दोषी ठहराने के लिये नहीं, परन्तु जगत का उद्धार करने के लिये आया हूँ। जो मुझे तुच्छ जानता है और मेरी बातें ग्रहण नहीं करता है उसको दोषी ठहरानेवाला तो एक है: अर्थात् जो वचन मैं ने कहा है, वही पिछले दिन में उसे दोषी ठहराएगा" (यूहन्ना 12:47-48)। जहां तक मानव जाति का सवाल है, जो भ्रष्टाचार से पूरी तरह दूषित हो गई है, परमेश्‍वर निश्चित रूप से सत्य को ज़ाहिर करेंगे और उनके लिए अपने न्याय और ताड़ना का प्रयोग करेंगे। मनुष्यों के मन और आत्माओं को जगाने के लिए, इंसान को जीतने के लिए और उनके शैतानी स्वभाव को शुद्ध करने का यही एकमात्र तरीका है। हालांकि मानव जाति के खिलाफ गंदगी, भ्रष्टाचार, अवज्ञा और परमेश्‍वर के प्रति विरोध के लिए परमेश्‍वर के न्याय के वचन कठोर हैं, फिर भी इससे परमेश्‍वर के पवित्र और धर्मी स्वभाव का पता चलता है, और यह हमें अपनी शैतानी प्रकृति और इस तथ्य को समझने की भी अनुमति देता है कि हम भ्रष्ट हैं। परमेश्‍वर के न्याय और ताड़ना के अनुभव के माध्यम से, हम सभी परमेश्‍वर के वचन से जीते गये हैं, हम अपनी इच्‍छा से उनके न्याय के प्रति समर्पित होते हैं, धीरे-धीरे सत्य को समझते हैं, और स्पष्ट रूप से हमारे अपने शैतानी स्वभाव और प्रकृति को देखते हैं, हम परमेश्‍वर के धर्मी स्वभाव की सच्ची समझ प्राप्त कर पाते हैं, हमने अपने मन में परमेश्‍वर के प्रति श्रद्धा का भाव विकसित कर लिया है, हमने अनजाने में चीजों को देखने का हमारा तरीका बदल दिया है, हमारे जीवन का स्वभाव बदल गया है, और हम परमेश्‍वर के प्रति श्रद्धा रख कर बुराई से दूर रह सकते हैं। अंत के दिनों में परमेश्‍वर के न्याय के कार्य ने आखिरकार विजेताओं का समूह बनाने का कार्य पूरा कर लिया है, जो अंत के दिनों में परमेश्‍वर के न्याय कार्य का परिणाम है, और परमेश्वर के लोगों से शुरू होने वाले उनके न्याय के कार्य के पीछे का सच्‍चा महत्‍व है। यह हमें क्या समझने में मदद करता है? परमेश्‍वर अपने वचन से लोगों का न्याय करते हैं और उनको उजागर करते हैं, लोगों को दंडित करने और ख़त्म करने के लिए नहीं, बल्कि मनुष्यों को पूरी तरह से शुद्ध करने, बदलने और बचाने के लिए। परन्तु जो लोग सर्वशक्तिमान परमेश्‍वर के वचनों के न्याय और शुद्धिकरण को स्वीकार करने से इनकार करते हैं, वे बड़ी आपदा के आने पर संकट में धंस जायेंगे और दंडित किए जाएंगे।

— 'राज्य के सुसमाचार पर विशिष्ट प्रश्नोत्तर' से उद्धृत

पिछला: प्रश्न 18: तुम गवाही देते हो कि अंतिम दिनों में परमेश्वर सत्य को व्यक्त करता है और मनुष्य को पहचानने और शुद्ध करने का कार्य करता है, तो परमेश्वर कैसे न्याय करता है, शुद्ध करता है और मनुष्य को बचाता है?

अगला: प्रश्न 20: प्रभु यीशु के छुटकारे के कार्य का एक पहलू हमारे पापों को क्षमा और निरस्त करना था, जबकि दूसरा पहलू हमें शांति, आनन्द और भरपूर अनुग्रह प्रदान करना था। इससे हम यह देख पाते हैं कि परमेश्वर एक दयालु और प्रेमी परमेश्वर है। परन्तु तुम यह गवाही देते हो कि सर्वशक्तिमान परमेश्वर अंतिम दिनों में न्याय का कार्य करता है, कि वह सत्य को अभिव्यक्त करता है और मनुष्य को न्याय और ताड़ना देता है, मनुष्य को काटता-छाँटता और उससे निपटता है, मनुष्य को उजागर करता है और सभी प्रकार के बुरे लोगों, बुरी आत्माओं और मसीह-विरोधियों को हटा देता है, जिससे लोगों को यह देखने का अवसर मिलता है कि परमेश्वर का धर्मी स्वभाव किसी भी अपराध को सहन नहीं करता है। प्रभु यीशु के कार्य में प्रकट होने वाला स्वभाव सर्वशक्तिमान परमेश्वर के कार्य में प्रकट होने वाले स्वभाव से बिलकुल अलग क्यों है? हमें परमेश्वर के स्वभाव को यथार्थतः किस प्रकार समझना चाहिए?

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