प्रश्न 18: तुम गवाही देते हो कि अंतिम दिनों में परमेश्वर सत्य को व्यक्त करता है और मनुष्य को पहचानने और शुद्ध करने का कार्य करता है, तो परमेश्वर कैसे न्याय करता है, शुद्ध करता है और मनुष्य को बचाता है?

उत्तर:

हर कोई जो वर्तमान में सच्‍चे मार्ग की खोज और जाँच करता है, वो यह समझना चाहता है कि सर्वशक्तिमान परमेश्‍वर, अंत के दिनों का अपना न्याय कार्य कैसे करते हैं। सत्‍य के इस पहलू के संबंध में सर्वशक्तिमान परमेश्‍वर ने बहुत सारे वचनों को व्यक्त किया है। आइये हम सर्वशक्तिमान परमेश्‍वर के वचन के कुछ अंश पढ़ते हैं।

सर्वशक्तिमान परमेश्वर कहते हैं, "वर्तमान देहधारण में परमेश्वर का कार्य मुख्य रूप से ताड़ना और न्याय के द्वारा अपने स्वभाव को व्यक्त करना है। इस नींव पर निर्माण करते हुए वह मनुष्य तक अधिक सत्य पहुँचाता है और उसे अभ्यास करने के और अधिक तरीके बताता है और ऐसा करके मनुष्य को जीतने और उसे उसके भ्रष्ट स्वभाव से बचाने का अपना उद्देश्य हासिल करता है। यही वह चीज़ है, जो राज्य के युग में परमेश्वर के कार्य के पीछे निहित है" ("वचन देह में प्रकट होता है" की 'प्रस्तावना')।

"अंत के दिनों में मसीह मनुष्य को सिखाने, उसके सार को उजागर करने और उसके वचनों और कर्मों की चीर-फाड़ करने के लिए विभिन्न प्रकार के सत्यों का उपयोग करता है। इन वचनों में विभिन्न सत्यों का समावेश है, जैसे कि मनुष्य का कर्तव्य, मनुष्य को परमेश्वर का आज्ञापालन किस प्रकार करना चाहिए, मनुष्य को किस प्रकार परमेश्वर के प्रति निष्ठावान होना चाहिए, मनुष्य को किस प्रकार सामान्य मनुष्यता का जीवन जीना चाहिए, और साथ ही परमेश्वर की बुद्धिमत्ता और उसका स्वभाव, इत्यादि। ये सभी वचन मनुष्य के सार और उसके भ्रष्ट स्वभाव पर निर्देशित हैं। खास तौर पर वे वचन, जो यह उजागर करते हैं कि मनुष्य किस प्रकार परमेश्वर का तिरस्कार करता है, इस संबंध में बोले गए हैं कि किस प्रकार मनुष्य शैतान का मूर्त रूप और परमेश्वर के विरुद्ध शत्रु-बल है। अपने न्याय का कार्य करने में परमेश्वर केवल कुछ वचनों के माध्यम से मनुष्य की प्रकृति को स्पष्ट नहीं करता; बल्कि वह लंबे समय तक उसे उजागर करता है, उससे निपटता है और उसकी काट-छाँट करता है। उजागर करने, निपटने और काट-छाँट करने की इन विधियों को साधारण वचनों से नहीं, बल्कि उस सत्य से प्रतिस्थापित किया जा सकता है, जिसका मनुष्य में सर्वथा अभाव है। केवल इस तरह की विधियाँ ही न्याय कही जा सकती हैं; केवल इस तरह के न्याय द्वारा ही मनुष्य को वशीभूत और परमेश्वर के प्रति समर्पण के लिए पूरी तरह से आश्वस्त किया जा सकता है, और इतना ही नहीं, बल्कि मनुष्य परमेश्वर का सच्चा ज्ञान भी प्राप्त कर सकता है। न्याय का कार्य मनुष्य में परमेश्वर के असली चेहरे की समझ पैदा करने और उसकी स्वयं की विद्रोहशीलता का सत्य उसके सामने लाने का काम करता है। न्याय का कार्य मनुष्य को परमेश्वर की इच्छा, परमेश्वर के कार्य के उद्देश्य और उन रहस्यों की अधिक समझ प्राप्त कराता है, जो उसकी समझ से परे हैं। यह मनुष्य को अपने भ्रष्ट सार तथा अपनी भ्रष्टता की जड़ों को जानने-पहचानने और साथ ही अपनी कुरूपता को खोजने का अवसर देता है। ये सभी परिणाम न्याय के कार्य द्वारा लाए जाते हैं, क्योंकि इस कार्य का सार वास्तव में उन सभी के लिए परमेश्वर के सत्य, मार्ग और जीवन का मार्ग प्रशस्त करने का कार्य है, जिनका उस पर विश्वास है। यह कार्य परमेश्वर के द्वारा किया जाने वाला न्याय का कार्य है" ("वचन देह में प्रकट होता है" में 'मसीह न्याय का कार्य सत्य के साथ करता है')।

"इस युग के दौरान परमेश्वर द्वारा किया गया कार्य मुख्य रूप से मनुष्य के जीवन के लिए वचनों का प्रावधान करना, मनुष्य की प्रकृति के सार और भ्रष्ट स्वभाव को प्रकट करना, और धार्मिक अवधारणाओं, सामन्ती सोच, पुरानी सोच के साथ ही मनुष्य के ज्ञान और संस्कृति को समाप्त करना था। यह सब कुछ परमेश्वर के वचनों के माध्यम से अवश्य सामने लाया जाना और साफ किया जाना चाहिए। अंत के दिनों में, मनुष्य को पूर्ण करने के लिए परमेश्वर वचनों का उपयोग करता है, न कि चिह्नों और चमत्कारों का। वह मनुष्य को उजागर करने, उसका न्याय करने, उसे ताड़ित करने और पूर्ण बनाने के लिए वचनों का उपयोग करता है, ताकि परमेश्वर के वचनों में, मनुष्य परमेश्वर की बुद्धि और सुन्दरता को देख ले, और परमेश्वर के स्वभाव को समझ जाए, ताकि परमेश्वर के वचनों के माध्यम से, मनुष्य परमेश्वर के कार्यों को निहार ले" ("वचन देह में प्रकट होता है" में 'आज परमेश्वर के कार्य को जानना')।

"परमेश्वर के पास मनुष्य को पूर्ण बनाने के अनेक साधन हैं। मनुष्य के भ्रष्ट स्वभाव से निपटने के लिए वह समस्त प्रकार के वातावरण का प्रयोग करता है, और मनुष्य को अनावृत करने के लिए विभिन्न चीजों का प्रयोग करता है, एक ओर वह मनुष्य के साथ निपटता है और दूसरी ओर मनुष्य को अनावृत करता है, और एक अन्य बात में वह मनुष्य को उजागर करता है, उसके हृदय की गहराइयों में स्थित 'रहस्यों' को खोदकर और ज़ाहिर करते हुए, मनुष्य की अनेक अवस्थाएँ दिखा करके उसकी प्रकृति को प्रकट करता है। परमेश्वर अनेक विधियों जैसे कि प्रकाशन, व्यवहार करने, शुद्धिकरण, और ताड़ना के द्वारा मनुष्य को पूर्ण बनाता है, जिससे मनुष्य जान सके कि परमेश्वर व्यावहारिक है" ("वचन देह में प्रकट होता है" में 'मात्र उन्हें ही पूर्ण बनाया जा सकता है जो अभ्यास पर ध्यान देते हैं')।

सर्वशक्तिमान परमेश्वर के वचनों से हम देखते हैं कि अंत के दिनों में भ्रष्ट मनुष्यजाति का न्याय करते समय, परमेश्वर मनुष्य की शैतानी प्रकृति का न्याय करने, उसे प्रकट करने, और उसकी निंदा करने, मनुष्य के शैतानी स्वभाव को साफ और रूपान्तरित करने और मनुष्य को शैतान के प्रभाव से बचाने के लिए, स्वयं के द्वारा व्यक्त सत्य और धार्मिक स्वभाव के कई पहलुओं का उपयोग करता है। परमेश्‍वर के प्रतापी और कुपित न्याय और ताड़ना के भीतर, हमें ऐसा लगता है मानो कि हम उसके आमने-सामने हों; हम शैतान द्वारा हमारी भ्रष्टता की मौलिक प्रकृति और वास्तविक तथ्यों को स्पष्ट रूप से देख लेते हैं और परमेश्वर के पवित्र सार और उसके धार्मिक स्वभाव को सच में समझ पाते हैं, जिसका अपमान नहीं किया जा सकता। एक साथ कई सत्यों को समझने पर, एक धर्मभीरू हृदय हमारे भीतर पैदा होता है और हम परमेश्वर की वास्तविक समझ भी विकसित करते हैं। इससे हमारे जीवन स्वभाव में परिवर्तन आता है, ताकि हम अंततः एक ईमानदार और परमेश्वर का आज्ञापालन करने वाले सच्चे इंसान की तरह जीवन जी सकें। परमेश्वर द्वारा व्यक्त किए गए सभी वचन मनुष्यजाति के लिए सत्य के कई पहलुओं को प्रकट करते हैं: परमेश्वर का धार्मिक स्वभाव, उसका स्वरूप, उसकी प्रबंधन योजना के रहस्य, परमेश्वर के कार्य के तीन चरणों की अंदरूनी जानकारी, मनुष्यजाति के उद्धार में परमेश्वर के उद्देश्य और उसकी इच्छा, पाप की जड़ और मनुष्यजाति की भ्रष्टता का सच, लोगों की मंजिल और परिणाम, इत्यादि। ये सत्य ऐसे वचन हैं जो हमें जीवन और अनंत जीवन का मार्ग प्रदान करते हैं। जब हम सर्वशक्तिमान परमेश्वर के वचनों को पढ़ते हैं, तो हम उन्हें एक दोधारी तलवार की तरह महसूस करते हैं, जिसमें प्रत्येक वचन और प्रत्येक पंक्ति में से परमेश्वर का प्रताप और कोप निकलता है। वे परमेश्वर के बारे में उन अवधारणाओं को सटीक रूप से इंगित करते हैं जिन्हें हम अपने हृदय की गहराई में धारण करते हैं, इनके ज़रिए हमारे घृणित लक्ष्यों और हमारे विश्वास में छिपे कुटिल इरादों और यहाँ तक कि हमारे ज्ञात हुए बिना हमारी प्रकृति में छिपे हुए शैतानी विषैले तत्वों को भी प्रकट किया जाता है, ताकि हम देख सकें कि हमें शैतान द्वारा पूरी तरह से भ्रष्ट कर दिया गया है। हम सभी मामलों में शैतान के विष, फलसफे, तर्क और नियमों के अनुसार जीवन बिताते हैं। हमारे हृदय क्रूरता, अहंकार, लालच, छल और अन्य शैतानी स्वभावों से भरे हुए हैं। हम सिर्फ़ शैतान के अनुरूप ही जीवन जीते हैं; हम शैतान की संतान, बड़े लाल अजगर के वंशज बन गए हैं, जो परमेश्वर के खिलाफ विद्रोह करते हैं और उसका विरोध करते हैं। परमेश्वर के न्याय और प्रकाशन के वचनों को पढ़ने के बाद, हमारे अंदर परमेश्वर का भय पैदा होता है और हम अपने अंतरतम हृदयों के बारे में उसके अवलोकन को महसूस करते हैं। परमेश्वर के वचन, कभी-कभी हमें याद दिलाते हुए या चेतावनी देते हुए, कभी-कभी हमें झिड़की देते हुए, हमारे साथ निपटते हुए या हमें अनुशासित करते हुए, हर पहलू में हमारे शैतानी स्वभाव पर प्रहार करते हैं मानो कि हम उसके आमने-सामने हों। कभी-कभी परमेश्वर के भयंकर वचन क्रोध से भरे होते हैं, और उनमें हम अपनी भ्रष्टता की सच्चाई को देखते हैं, जो हमें महसूस करवाती है कि हमारे पास छिपने के लिए कोई जगह नहीं है और हम बेहद शर्मिंदा हैं। साथ ही, हम गहराई से महसूस करते हैं कि परमेश्वर के वचन निस्संदेह सत्य, सामर्थ्य और अधिकार से भरे हुए हैं, और यह कि वे परमेश्वर के स्वभाव और उसके जीवन अस्तित्व के प्रकाशन हैं। परमेश्वर के पवित्र सार को अपवित्र नहीं किया जा सकता है, और उसका धार्मिक स्वभाव अपमान किए जाने योग्य नहीं है। हम परमेश्वर के सामने दण्डवत होने और पश्चाताप करने के अलावा और कुछ नहीं कर सकते हैं। हम अपनी स्वयं की शैतानी प्रकृतियों से नफ़रत करते हैं, हम पश्चाताप से भरे हुए हैं और उसके न्याय और उसकी ताड़ना को स्वीकार करने के लिए तत्पर हैं। हम परमेश्वर को संतुष्ट करने हेतु एक नया जीवन जीने के लिए पूरी तरह से आश्वस्त और दृढ़ संकल्प हैं। यह परमेश्वर के चुने हुए लोगों पर परमेश्वर के वचन के न्याय का परिणाम है। इस तरह के न्याय और ताड़ना का अनुभव करने के बाद, जो लोग वास्तव में परमेश्वर पर विश्वास करते हैं और सत्य से प्रेम करते हैं, वे सत्य को प्राप्त कर सकते हैं और परमेश्वर द्वारा सिद्ध बनाए जा सकते हैं। जो लोग सत्य से प्रेम नहीं करते हैं और सच में परमेश्वर के न्याय और ताड़ना का अनुभव नहीं करते हैं, वे परमेश्वर द्वारा हटा दिए जाने के लिए बाध्य हैं।

परमेश्वर अपने वचनों के माध्यम से लोगों का न्याय करता है और उन्हें प्रकट करता है, वह लोगों से निपटने और उनकी काट-छाँट करने, उनका परीक्षण करने और उन्हें प्रकट करने के लिए विभिन्न परिस्थितियों और घटनाओं को भी तैयार करता है। हमारे ऊपर आने वाले न्याय, ताड़ना, कड़ी सजा और अनुशासन के तथ्यों का अनुभव करने के बाद, हम यह मानते हैं कि हमारी शैतानी प्रकृति और शैतानी स्वभाव बहुत ही दुराग्रही है। जब हम परमेश्वर के लिए स्वयं को व्यय कर रहे होते हैं, उसके लिए पीड़ित हो रहे होते हैं और कीमत चुका रहे होते हैं, तब भी हम अनजाने में उसके खिलाफ विद्रोह कर सकते हैं और उसका विरोध कर सकते हैं। उसके धार्मिक, प्रतापी और कुपित न्याय में, हम स्पष्ट रूप से अपने उस घृणित शैतानी रूप को देखते हैं जो परमेश्वर का विरोध करता है। हम देखते हैं कि हम नरक के बच्चे हैं और कि हम परमेश्वर के सामने रहने के लायक नहीं हैं। हमारा हृदय दर्द से सिहर उठता है। हम डर से काँपते हैं और पश्चाताप दर्शाते हैं। हम स्वयं को नकार देते हैं और स्वयं को कोसते हैं। जब हम परमेश्वर के सामने वास्तव में पश्चाताप करते हैं, तो वह हमारे साथ दया और सहिष्णुता दिखाता है; वह हमें प्रकाशित करता है, प्रबुद्ध करता है, सुकून देता है, और सहयोग करता है ताकि हम अपने लिए परमेश्वर के उद्धार के अच्छे इरादों को समझ सकें और उसके प्रेम को जान सकें। हम परमेश्वर को सुकून देने और संतुष्ट करने के लिए उसके वचन की सच्चाई के अनुसार जीवन जीने के लिए तैयार हो जाते हैं। परमेश्वर का न्याय और ताड़ना हमें इस बात पर स्पष्टता प्रदान करता है कि वह किसे पसंद करता है, किसे बचाता है, किसे पूर्ण बनाता है, किसे आशीष देता है, किससे नफ़रत करता है, किसे हटाता है और किसे दंड और शाप देता है, इस तरह हम परमेश्वर के धार्मिक स्वभाव को वास्तव में समझ पाते हैं। परमेश्वर के न्याय और ताड़ना का अनुभव करने के बाद, हम वास्तव में यह समझते हैं कि परमेश्वर द्वारा व्यक्त किए गए सत्य भ्रष्ट मनुष्यजाति का न्याय हैं; वे ताड़ना, अवलोकन और शुद्धिकरण हैं। परमेश्वर को अपने धार्मिक, प्रतापी, कुपित और अपमान न किए जाने योग्य स्वभाव को उस मनुष्यजाति के शैतानी स्वभाव के प्रति प्रकट करना चाहिए जो परमेश्वर का प्रतिरोध करती है। केवल इस तरह से ही हम, परमेश्वर की महिमा करने और उसके लिए गवाही देने हेतु एक सच्चे इंसान की तरह जीवन बिताते हुए, एक धर्मभीरू हृदय विकसित कर सकते हैं, सत्य की खोज कर सकते हैं, परमेश्वर से प्रेम कर सकते हैं, और उसका आज्ञापालन कर सकते हैं और उसकी आराधना कर सकते हैं। ये परमेश्वर के न्याय और ताड़ना के परिणाम हैं। अब हम सभी को यह समझ लेना चाहिए कि सर्वथा भ्रष्ट मनुष्यजाति के लिए, सत्य को व्यक्त करने और न्याय का कार्य करने के लिए परमेश्वर को देहधारण अवश्य करना चाहिए, ताकि मनुष्यजाति को शुद्ध करके बचाया जा सके। अन्यथा, भ्रष्ट मनुष्यजाति उद्धार से परे है। यदि हम अपने विश्वास में केवल अनुग्रह के युग के साथ रुक जाते हैं और अंत के दिनों में परमेश्वर के न्याय के कार्य को स्वीकार करने से इनकार करते हैं, तो हम निकाल बाहर करने और नष्ट कर दिए जाने के लिए बाध्य हैं। यही पूर्ण सत्य है।

— 'राज्य के सुसमाचार पर विशिष्ट प्रश्नोत्तर' से उद्धृत

पिछला: प्रश्न 17: तुम यह गवाही देते हो कि परमेश्वर ने सत्य को व्यक्त करने के लिए और आखिरी दिनों में मनुष्य के न्याय और शुद्धि के कार्य को करने के लिए वापस देहधारण किया है, लेकिन धार्मिक पादरियों और प्राचीन लोगों का विश्वास है कि परमेश्वर बादलों के साथ वापस लौटेगा, और जो लोग प्रभु में विश्वास करते हैं, वे एक पल में रूपांतरित हो जाएँगे और बादलों में परमेश्वर के साथ मिलने के लिए स्वर्गारोहित होंगे, जैसा कि पौलुस ने कहा था: "पर हमारा स्वदेश स्वर्ग पर है; और हम एक उद्धारकर्ता प्रभु यीशु मसीह के वहाँ से आने की बाट जोह रहे हैं। वह अपनी शक्‍ति के उस प्रभाव के अनुसार जिसके द्वारा वह सब वस्तुओं को अपने वश में कर सकता है, हमारी दीन-हीन देह का रूप बदलकर, अपनी महिमा की देह के अनुकूल बना देगा" (फिलिप्पियों 3:20-21)। परमेश्वर सर्वशक्तिमान है और ऐसा कुछ भी नहीं है जो वह नहीं कर सकता है। परमेश्वर हमें बदल देगा और हमें पवित्र बना देगा, वह सिर्फ एक ही वचन के साथ इसे प्राप्त कर लेगा। तो फिर उसे सत्य व्यक्त करने और मनुष्य के न्याय और शुद्धि के कार्य के एक चरण को पूरा करने के लिए अब भी देह बनने की आवश्यकता क्यों है?

अगला: प्रश्न 19: तुम इसकी गवाही देते हो कि अंतिम दिनों में परमेश्वर मनुष्य को पूरी तरह से शुद्ध करने और बचाने के लिए न्याय के अपने कार्य को करता है, परन्तु सर्वशक्तिमान परमेश्वर द्वारा व्यक्त वचनों को पढ़ने के बाद, मुझे लगता है कि उनमें से कुछ मनुष्य की निंदा करते और उसे शाप देते हैं। यदि परमेश्वर मनुष्य को निन्दित और शापित करता है, तो क्या मनुष्य को सजा भुगतनी नहीं होगी? और तुम यह कैसे कह सकते हो कि इस तरह का न्याय मानव जाति को शुद्ध करता और बचाता है?

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