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प्रश्न 18: तुम इसका प्रमाण देते हो कि अंतिम दिनों में परमेश्वर मनुष्य को पूरी तरह से शुद्ध करने और बचाने के लिए न्याय के अपने कार्य को करता है, परन्तु सर्वशक्तिमान परमेश्वर द्वारा व्यक्त वचनों को पढ़ने के बाद, मुझे लगता है कि उनमें से कुछ मनुष्य की निंदा करते और उसे शाप देते हैं। यदि परमेश्वर मनुष्य को निन्दित और शापित करता है, तो क्या मनुष्य को सजा भुगतनी नहीं होगी? और तुम यह कैसे कह सकते हो कि इस तरह का न्याय मानव जाति को शुद्ध करता और बचाता है?

उत्तर:

अंत के दिनों में, परमेश्‍वर सत्‍य को व्यक्त करने और विजेताओं का एक समूह बनाने के लिए न्याय का कार्य करते हैं, ऐसे लोगों का एक समूह जो परमेश्‍वर के साथ एकमना और एकदिल हैं। यह तभी तय कर लिया गया था जब परमेश्‍वर ने दुनिया बनायी थी। तुम कह सकते हो कि परमेश्वर ने पहले से ही जीतने वालों का एक समूह बना लिया है, कि उन्हें परमेश्वर के न्याय और ताड़ना के माध्यम से सिद्ध बनाया जा चुका है, कि वे चीनी कम्युनिस्ट पार्टी के क्रूर उत्पीड़न के दारुण दुःख से बाहर आ गए हैं। यह एक तथ्य है कि परमेश्वर ने पहले से ही यह किया है, कोई भी इससे इनकार नहीं कर सकता है। लेकिन ऐसे कुछ व्यक्ति हैं जो देखते हैं कि परमेश्‍वर के कुछ वचनों में लोगों की निंदा और शाप हैं और वे अवधारणाएं बना लेते हैं। यह बेतुका है। अंत के दिनों में परमेश्‍वर का न्याय महान सफ़ेद सिंहासन का न्याय है जिसकी भविष्‍यवाणी प्रकाशितवाक्‍य की किताब में की गई है। परमेश्‍वर ने धार्मिकता, महिमा, और क्रोध के अपने स्वभाव को प्रकट किया है, और यह पूरी तरह से मानव जाति को उजागर करने के लिए और हर प्रकार के व्यक्ति में भेद करने के लिए है। इससे भी ज्यादा, यह पुराने युग को समाप्त करने और शैतान के लोगों के पूरे सफाये के लिए है। तो शैतान के वे सभी लोग, जो परमेश्‍वर का विरोध करते हैं, क्या परमेश्‍वर उनकी निंदा कर उन्‍हें शाप नहीं दे सकते? हालां‍कि न्याय के कुछ वचन ऐसे हैं जो परमेश्‍वर के चुने गए लोगों द्वारा प्रकट किये गए भ्रष्टाचार को और उनकी असली भ्रष्‍ट समानता को उजागर करते हैं, और ये निंदा की तरह लगते हैं, ये परमेश्‍वर के चुने गए लोगों को उनके भ्रष्ट स्वभाव का सार स्‍पष्‍टता से दिखाने और इस मामले की तह तक पहुंचने के लिए है, साथ ही, यह सत्य को समझने का फल पाने के लिए है। अगर परमेश्‍वर इतने कठोर नहीं होते, अगर उनके वचन हमारे अंदर तक चोट नहीं करते, तो हम अपनी भ्रष्ट समानताओं और शैतानी प्रकृति की पहचान नहीं कर पाते, और अंत के दिनों में परमेश्‍वर के कार्य से मानव जाति को शुद्ध करना और पूर्ण बनाना संभव नहीं होता। इसलिए, जो व्यक्ति सत्‍य से प्रेम करते हैं और तथ्यों का सम्मान करते हैं, वे यह देख पाएंगे कि परमेश्‍वर के वचन तीखे हैं, भले ही वे न्याय और ताड़ना के या निंदा और शाप के वचन हों, लेकिन वे पूरी तरह से वास्तविक तथ्यों के अनुरूप हैं। परमेश्‍वर इस प्रकार से बोलते हैं जो बहुत ही व्यावहारिक और बहुत ही वास्तविक होता है, और यह बिल्कुल बढ़ा-चढ़ा कर बोला गया नहीं है। परमेश्‍वर के इन कठोर वचनों से प्राप्त परिणामों से, हम सब देख सकते हैं कि उनके भीतर मानव जाति के लिए परमेश्‍वर का वास्तविक प्रेम और मानव जाति को बचाने के उनके अच्छे इरादे छिपे हुए हैं। केवल वही लोग जो सत्य से ऊबे हुए हैं, अपनी धारणाएं बना सकते हैं, और जो लोग सच्चाई से घृणा करते हैं, वे ही परमेश्‍वर के कार्य की आलोचना और निंदा कर सकते हैं। परमेश्‍वर 20 से अधिक वर्षों से चीन में कार्य कर रहे हैं और उन्होंने पहले से ही विजेताओं का एक समूह बना लिया है। वे सीसीपी सरकार के क्रूर उत्पीड़न और अत्‍याचार से गुज़र चुके हैं, और वे सभी परमेश्‍वर का पक्ष लेने और गवाही देने में सक्षम हैं। यह पूरी तरह से परमेश्‍वर के वचनों की वज़ह से पाया हुआ फल है। उन सभी ने परमेश्‍वर के प्रेम को उनके वचनों में देखा है, और जाना है कि मानव जाति को बचाने के लिए उन्होंने कैसा दुःख उठाया है। हालांकि उनके कुछ वचन बहुत कठोर हैं लेकिन वे इनका अनुसरण कर पाते हैं, और इससे उन्होंने परमेश्‍वर के स्वभाव का वास्तविक ज्ञान प्राप्त किया है। उन्होंने परमेश्वर के प्रति सम्मान और प्रेम का भाव विकसित किया है। वे सभी अपने कर्तव्यों को ईमानदारी से पूरा करने में सक्षम हैं, और अंत तक पूरी तरह से परमेश्‍वर का अनुसरण करेंगे। यह बात शैतान को सबसे ज्‍़यादा शर्मिंदा करती है, और यह शैतान को हराने का परमेश्‍वर का प्रमाण है। जहां तक सवाल परमेश्‍वर द्वारा अंत के दिनों में लोगों का न्याय करने और उन्हें शुद्ध करने का है, आइये सर्वशक्तिमान परमेश्‍वर के वचनों के कुछ अंश देखते हैं, और हमें यह स्पष्ट हो जाएगा।

सर्वशक्तिमान परमेश्वर कहते हैं, "परमेश्वर के द्वारा मनुष्य की सिद्धता किसके द्वारा पूरी होती है? उसके धर्मी स्वभाव के द्वारा। परमेश्वर के स्वभाव में मुख्यतः धार्मिकता, क्रोध, भव्यता, न्याय और शाप शामिल है, और उसके द्वारा मनुष्य की सिद्धता प्राथमिक रूप से न्याय के द्वारा होती है। कुछ लोग नहीं समझते, और पूछते हैं कि क्यों परमेश्वर केवल न्याय और शाप के द्वारा ही मनुष्य को सिद्ध बना सकता है। वे कहते हैं कि यदि परमेश्वर मनुष्य को शाप दे, तो क्या वह मर नहीं जाएगा? यदि परमेश्वर मनुष्य का न्याय करे, तो क्या वह दोषी नहीं ठहरेगा? तब वह कैसे सिद्ध बनाया जा सकता है? ऐसे शब्द उन लोगों के होते हैं जो परमेश्वर के कार्य को नहीं जानते। परमेश्वर मनुष्य की अवज्ञाकारिता को शापित करता है, और वह मनुष्य के पापों को न्याय देता है। यद्यपि वह बिना किसी संवेदना के कठोरता से बोलता है, फिर भी वह उन सबको प्रकट करता है जो मनुष्य के भीतर होता है, और इन कठोर वचनों के द्वारा वह उन सब बातों को प्रकट करता है जो मूलभूत रूप से मनुष्य के भीतर होती हैं, फिर भी ऐसे न्याय के द्वारा वह मनुष्य को शरीर के सार का गहरा ज्ञान प्रदान करता है, और इस प्रकार मनुष्य परमेश्वर के समक्ष आज्ञाकारिता के प्रति समर्पित होता है। मनुष्य का शरीर पाप का है, और शैतान का है, यह अवज्ञाकारी है, और परमेश्वर की ताड़ना का पात्र है - और इसलिए, मनुष्य को स्वयं का ज्ञान प्रदान करने के लिए परमेश्वर के न्याय के वचनों का उस पर पड़ना आवश्यक है और हर प्रकार का शोधन होना आवश्यक है; केवल तभी परमेश्वर का कार्य प्रभावशाली हो सकता है" ("वचन देह में प्रकट होता है" से "केवल पीड़ादायक परीक्षाओं का अनुभव करने के द्वारा ही तुम परमेश्वर की मनोहरता को जान सकते हो" से)।

"आज परमेश्वर तुम लोगों का न्याय करता है, और तुम लोगों को ताड़ना देता है, और तुम्हारी निंदा करता है, लेकिन जान लो कि तुम्हारी निंदा इसलिए है कि तुम स्वयं को जान सको। निन्दा, अभिशाप, न्याय, ताड़ना—ये सब इसलिए हैं ताकि तुम स्वयं को जान सको, ताकि तुम्हारे स्वभाव में परिवर्तन हो जाए, और, इसके अलावा, ताकि तुम अपने महत्व को जान सको, और देख सको कि परमेश्वर के सभी कार्य धर्मी हैं, और उसके स्वभाव और उसके कार्य की आवश्यकताओं के अनुसार हैं, कि वह मनुष्य के उद्धार के लिए अपनी योजना के अनुसार कार्य करता है, और कि वह ही धर्मी परमेश्वर है जो मनुष्य को प्यार करता है, और मनुष्य को बचाता है, और जो मनुष्य का न्याय करता और उसे ताड़ित करता है। …परमेश्वर मारने, या नष्ट करने के लिए नहीं, बल्कि न्याय करने, श्राप देने, ताड़ना देने, और बचाने के लिए होआया है" ("वचन देह में प्रकट होता है" से "तुम लोगों को हैसियत के आशीषों को अलग रखना चाहिए और मनुष्य के उद्धार के लिए परमेश्वर की इच्छा को समझना चाहिए" से)।

"तुम सभी पाप और दुराचार के स्थान में रहते हो; तुम सभी दुराचारी और पापी लोग हो। आज तुम न केवल परमेश्वर को देख सकते हो, बल्कि उससे भी महत्वपूर्ण, तुम सब ने ताड़ना और न्याय को प्राप्त किया है, ऐसे गहनतम उद्धार को प्राप्त किया है, अर्थात परमेश्वर के महानतम प्रेम को प्राप्त किया है। वह जो कुछ करता है, वह तुम्हारे लिए वास्तविक प्रेम है; वह कोई बुरी मंशा नहीं रखता है। यह तुम्हारे पापों के कारण ही है कि वह तुम्हारा न्याय करता है, ताकि तुम आत्म-परीक्षण करोगे और यह अतिबृहत उद्धार प्राप्त करोगे। यह सब कुछ मनुष्य में कार्य करने के लिए किया गया है। आदि से लेकर अन्त तक, मनुष्य को बचाने के लिए परमेश्वर जितना हो सके वो सब कुछ कर रहा है, और वह निश्चय ही उस मनुष्य को पूर्णतया विनष्ट करने का इच्छुक नहीं है, जिसे उसने अपने हाथों से रचा है। अब कार्य करने के लिए वह तुम्हारे मध्य आया है; क्या यह और अधिक उद्धार नहीं है? अगर वो तुमसे नफ़रत करता, तो क्या फिर भी वो व्यक्तिगत रूप से तुम्हारा संदर्शन करने के लिए इतने बड़े परिमाण का कार्य करता? उसे इस प्रकार दुःख क्यों उठाना चाहिए? परमेश्वर तुम सब से घृणा नहीं करता, न ही तुम्हारे प्रति कोई बुरी मंशा रखता है। तुम सब को जानना चाहिए कि परमेश्वर का प्रेम ही सबसे सच्चा प्रेम है। यह लोगों की अनाज्ञाकारिता के कारण ही है कि उसे उन्हें न्याय के द्वारा बचाना पड़ता है, अन्यथा वे बचाए नहीं जाएँगे। चूंकि तुम नहीं जानते कि एक जीवन का सन्दर्शन कैसे करना है या कैसे जीना है, और तुम इस दुराचारी और पापमय स्थान में जीते हो और दुराचारी और अशुद्ध दानव हो, वह इतना दयाहीन नहीं कि तुम्हें और अधिक भ्रष्ट होने दे; न ही वह इतना दयाहीन है कि तुम्हें शैतान की इच्छानुसार कुचले जाते हुए इस प्रकार के अशुद्ध स्थान में रहने दे, या इतना दयाहीन है कि तुम्हें नरक में गिर जाने दे। वह मात्र तुम्हारे इस समूह को प्राप्त करना और तुम सब को पूर्णतः बचाना चाहता है। यही तुम में जीत लिए जाने के कार्य को करने का मुख्य उद्देश्य है-यह मात्र उद्धार के लिए है" ("वचन देह में प्रकट होता है" से "विजयी कार्यों का आंतरिक सत्य (4)" से)।

सर्वशक्तिमान परमेश्‍वर के वचनों को सुनने के बाद, अब सभी को स्पष्ट होना चाहिए कि आखिरकार, परमेश्‍वर अंत के दिनों में न्याय का कार्य क्यों करते हैं? है न? अब, क्या हम सभी इस तथ्य को देखने में सक्षम नहीं हैं कि मानवजाति कितने संपूर्ण रूप से भ्रष्ट है? मानव जाति शैतान के क्षेत्र में रहती है, पाप में रहती है, और पापों में मज़ा लेती है। धार्मिक समुदायों में से किसी ने भी परमेश्‍वर के आगमन की ओर ध्यान नहीं दिया है और कोई भी सच्चाई से प्रेम या इसे स्वीकार नहीं करता है। चाहे लोगों ने परमेश्‍वर की कैसी भी गवाही दी हो या उनके वचनों को फैलाया हो, ऐसे कितने लोग हैं जिन्‍होंने सक्रिय रूप से परमेश्‍वर के प्रकटन और कार्य की खोज या जांच-पड़ताल की है? और ऐसे कितने व्यक्ति होंगे जो परमेश्‍वर के न्याय और ताड़ना को स्वीकार करके उनके प्रति समर्पित हो पायेंगे? क्या हर कोई यह नहीं कहेगा कि यह मानव जाति दुष्टता का चरम है? अगर अंत के दिनों में परमेश्‍वर के न्याय का कार्य नहीं होता, तो यह मानव जाति जो पूरी तरह से भ्रष्ट है, शैतानी स्वभाव से भरी है, और जो परमेश्‍वर से इंकार और उनका विरोध करती है, क्या व‍ह शुद्ध होकर परमेश्‍वर के उद्धार को प्राप्त कर सकती है? अगर अंत के दिनों के परमेश्‍वर का न्याय नहीं होगा तो कौन विजेताओं का समूह बनाएगा? प्रभु यीशु की भविष्यवाणियां कैसे पूरी होंगी? कैसे मसीह का राज्य साकार होगा? प्रभु में विश्वास रखने वाले बहुत से लोग मानते हैं कि परमेश्‍वर प्रेमपूर्ण और दयालु परमेश्‍वर हैं और इससे कोई फर्क नहीं पड़ता कि हमने कौन से पाप किये हैं, परमेश्‍वर हमें पापमुक्त कर देंगे। वे मानते हैं कि प्रभु जब वापस आयेंगे तो भले ही हम कितने भी भ्रष्ट हों, किसी को भी छोड़ा नहीं जाएगा और हम सभी स्वर्ग के राज्‍य में आरोहित किये जायेंगे। क्या यह एक उचित नज़रिया है? क्या इस बात का समर्थन करने के लिए प्रभु के वचन में कुछ है? क्या यह मनुष्य की धारणाएं और कल्पनाएँ नहीं हैं? परमेश्‍वर पवित्र और धर्मी परमेश्‍वर हैं; क्या वे शैतानी स्वभाव से भरे हुए, गंदगी और भ्रष्टाचार से कलंकित, सत्‍य से इंकार करने वाले लोगों और परमेश्वर के शत्रुओं को अपने राज्‍य में प्रवेश करने की मंज़ूरी देंगे? बिल्कुल नही। इसलिए, प्रभु यीशु ने भविष्यवाणी की थी कि वे वापस आकर अंत के दिनों में सत्‍य व्यक्त करेंगे और अपना न्याय का कार्य करेंगे और मानवता को पूरी तरह शुद्ध करके बचाएँगे। प्रभु यीशु ने कहा था, "यदि कोई मेरी बातें सुनकर न माने, तो मैं उसे दोषी नहीं ठहराता; क्योंकि मैं जगत को दोषी ठहराने के लिये नहीं, परन्तु जगत का उद्धार करने के लिये आया हूँ। जो मुझे तुच्छ जानता है और मेरी बातें ग्रहण नहीं करता है उसको दोषी ठहरानेवाला तो एक है: अर्थात् जो वचन मैं ने कहा है, वही पिछले दिन में उसे दोषी ठहराएगा" (यूहन्ना 12:47-48)। जहां तक मानव जाति का सवाल है, जो भ्रष्टाचार से पूरी तरह दूषित हो गई है, परमेश्‍वर निश्चित रूप से सत्य को आगे बढ़ाएंगे और उनके लिए अपने न्याय और ताड़ना का प्रयोग करेंगे। मनुष्यों के मन और आत्माओं को जगाने के लिए, इंसान को जीतने के लिए और उनके शैतानी स्वभाव को शुद्ध करने का यही एकमात्र तरीका है। हालांकि मानव जाति के खिलाफ गंदगी, भ्रष्टाचार, अवज्ञा और परमेश्‍वर के प्रति विरोध के लिए परमेश्‍वर के न्याय के वचन कठोर हैं, फिर भी इससे परमेश्‍वर के पवित्र और धर्मी स्वभाव का पता चलता है, और यह हमें अपनी शैतानी प्रकृति और इस तथ्य को समझने की भी अनुमति देता है कि हम भ्रष्ट हैं। परमेश्‍वर के न्याय और ताड़ना के अनुभव के माध्यम से, हम सभी परमेश्‍वर के वचन से जीते गये हैं, हम अपनी इच्‍छा से उनके न्याय के प्रति समर्पित होते हैं, धीरे-धीरे सत्य को समझते हैं, और स्पष्ट रूप से हमारे अपने शैतानी स्वभाव और प्रकृति को देखते हैं, हम परमेश्‍वर के धर्मी स्वभाव की सच्ची समझ प्राप्त कर पाते हैं, हमने अपने मन में परमेश्‍वर के प्रति श्रद्धा का भाव विकसित कर लिया है, हमने अनजाने में चीजों को देखने का हमारा तरीका बदल दिया है, हमारे जीवन का स्वभाव बदल गया है, और हम परमेश्‍वर के प्रति श्रद्धा रख कर बुराई से दूर रह सकते हैं। अंत के दिनों में परमेश्‍वर के न्याय के कार्य ने आखिरकार विजेताओं का समूह बनाने का कार्य पूरा कर लिया है, जो अंत के दिनों में परमेश्‍वर के न्याय कार्य का परिणाम है, और परमेश्वर के लोगों से शुरू होने वाले उनके न्याय के कार्य के पीछे का सच्‍चा महत्‍व है। यह हमें क्या समझने में मदद करता है? परमेश्‍वर अपने वचन से लोगों का न्याय करते हैं और उनको उजागर करते हैं, लोगों को दंडित करने और ख़त्म करने के लिए नहीं, बल्कि पूरी तरह से शुद्ध करने, बदलने और मनुष्यों को बचाने के लिए। परन्तु जो लोग सर्वशक्तिमान परमेश्‍वर के वचनों के न्याय और शुद्धिकरण को स्वीकार करने से इनकार करते हैं, वे बड़ी आपदा के आने पर संकट में धंस जायेंगे और दंडित किए जाएंगे।

"स्क्रीनप्ले प्रश्नों के उत्तर" से

पिछला:प्रश्न 41: हमने चीनी कम्युनिस्ट सरकार और धार्मिक दुनिया के कई भाषण ऑनलाइन देखे हैं जो सर्वशक्तिमान परमेश्वर की कलीसिया की बदनामी और झूठी निंदा करते हैं, उन पर आक्षेप और कलंक लगाते हैं (जैसे कि झाओयुआन, शेडोंग प्रांत की "5.28" वाली घटना)। हम यह भी जानते हैं कि सीसीपी लोगों से झूठ और गलत बातें कहने में, और तथ्यों को तोड़-मरोड़ कर लोगों को धोखा देने में माहिर है, साथ ही साथ उन देशों का जिनके यह विरोध में है, अपमान करने, उन पर हमला करने और उन का न्याय करने में भी माहिर है, इसलिए सीसीपी के कहे गए किसी भी शब्द पर बिल्कुल विश्वास नहीं किया जाना चाहिए। लेकिन धार्मिक पादरियों और प्राचीन लोगों के द्वारा कही गई कई बातें सीसीपी के शब्दों से मेल खाती हैं, इसलिए हमें सीपीपी और धार्मिक दुनिया से आने वाले निन्दापूर्ण, अपमानजनक शब्दों को कैसे परखना चाहिए?

अगला:प्रश्न 25: धार्मिक पादरी और प्राचीन लोग बाइबल में पौलुस के इन शब्दों को थामे रहते हैं: "सम्पूर्ण पवित्रशास्त्र परमेश्‍वर की प्रेरणा से रचा गया है", वे ऐसा विश्वास करते हैं कि बाइबल की हर बात परमेश्वर का ही वचन है, लेकिन तुम कहते हो कि बाइबल के शब्द पूरी तरह से परमेश्वर के वचन नहीं हैं, तो यह सब क्या है?

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प्रश्न 27: बाइबल परमेश्वर के कार्य का प्रमाण है; केवल बाइबल पढ़ने के द्वारा ही प्रभु पर विश्वास करने वाले लोग यह जान सकते हैं कि परमेश्वर ने आकाश और पृथ्वी और सभी चीजों को बनाया और इसी से वे परमेश्वर के अद्भुत कार्यों, उसकी महानता और सर्वशक्तिमानता को देख सकते हैं। बाइबल में परमेश्वर के बहुत सारे वचन और मनुष्य के अनुभवों की बहुत सारी गवाहियाँ हैं; यह मनुष्य के जीवन के लिए प्रावधान कर सकती है और मनुष्य के लिए बहुत लाभदायक हो सकती है, इसलिए मुझे जिसकी खोज करनी है वह यह है कि क्या हम वास्तव में बाइबल पढ़ने के द्वारा अनन्त जीवन को प्राप्त कर सकते हैं? क्या बाइबल के भीतर वास्तव में अनन्त जीवन का कोई मार्ग नहीं है? एक धोखेबाज व्यक्ति क्या है? धोखेबाज़ लोगों को क्यों नहीं बचाया जा सकता है? जो लोग बचाए और पूर्ण किये गए हैं उनके लिए परमेश्वर के क्या वादे हैं? सच्चाई को समझने और सिद्धांत को समझने में क्या अंतर है?