प्रश्न 14: बाइबल कहती है: "क्योंकि धार्मिकता के लिये मन से विश्‍वास किया जाता है, और उद्धार के लिये मुँह से अंगीकार किया जाता है" (रोमियों 10:10)। हम मानते हैं कि प्रभु यीशु ने हमारे पापों को क्षमा कर दिया है और विश्वास के द्वारा हमें धर्मी बना दिया है। इसके अलावा, हम मानते हैं कि अगर किसी को एक बार बचाया जाता है, तो वे हमेशा के लिए बचा लिए जाते हैं, और जब परमेश्वर वापस आएगा तो हम तुरंत स्वर्गारोहित हो जाएँगे और स्वर्ग के राज्य में प्रवेश करेंगे। तो तुम क्यों गवाही दे रहे हो कि बचाए जाने और स्वर्ग के राज्य में लाये जाने से पहले हमें आखिरी दिनों के परमेश्वर के न्याय को स्वीकार करना चाहिए?

उत्तर:

प्रभु के सभी विश्वासियों का मानना है: प्रभु यीशु ने सलीब पर दम तोड़कर हमें मुक्ति दिला दी, तो हम पहले से ही सभी पापों से मुक्त हो चुके हैं। प्रभु अब हमें पापी नहीं मानते। हम अपने विश्वास के ज़रिये धर्मी बन गए हैं। अगर हम अंत तक सहन करते रहे तो हम बचा लिये जाएँगे। जब प्रभु आएँगे तो वे सीधे ही हमें स्वर्ग के राज्य में आरोहित कर देंगे। तो क्या ये वाकई सच है? क्या परमेश्वर ने इस दावे के समर्थन में अपने वचनों में कभी कोई सबूत दिया है? यदि यह दृष्टिकोण सत्य के अनुरूप न हो तो इसके परिणाम क्या होंगे? हम प्रभु के विश्वासियों को हर बात के लिये, अपने आधार के रूप में उनके वचनों का उपयोग करना चाहिए। यह खास तौर से वहाँ ज़्यादा सही है जब सवाल ये आए कि प्रभु की वापसी को किस तरह से लिया जाए। हम उनकी वापसी को किसी भी परिस्थिति में मनुष्य की अवधारणाओं और कल्पनाओं के आधार पर नहीं ले सकते। इस तरह के व्यवहार के नतीजों पर सोचना भी इसे बहुत गंभीर बना देता है। ये बिल्कुल वैसा ही मामला है जब फरीसियों ने प्रभु यीशु को सलीब पर चढ़ा दिया और मसीहा के आने का इंतजार करते रहे। परिणाम क्या होगा? प्रभु यीशु ने मानवजाति को मुक्त करने का कार्य पूरा कर लिया है। इतना तो सच है, लेकिन क्या परमेश्वर द्वारा मानवजाति की मुक्ति का कार्य समाप्त हो गया है? इसका मतलब ये है कि हम सभी प्रभु यीशु के विश्वासी स्वर्ग के राज्य में आरोहित किये जाने योग्य हैं? इस सवाल का जवाब कोई नहीं जानता है। एक बार परमेश्वर ने कहा, "जो मुझ से, 'हे प्रभु! हे प्रभु!' कहता है, उनमें से हर एक स्वर्ग के राज्य में प्रवेश न करेगा, परन्तु वही जो मेरे स्वर्गीय पिता की इच्छा पर चलता है" (मत्ती 7:21), "इसलिये तुम पवित्र बनो, क्योंकि मैं पवित्र हूँ" (लैव्यव्यवस्था 11:45)। परमेश्वर के वचनों के अनुसार, हम आश्वस्त हो सकते हैं कि स्वर्गीय राज्य में प्रवेश करने वाले लोगों ने खुद को पाप से मुक्त कर लिया है और वे शुद्ध कर दिये गए हैं। ये वे लोग हैं जो परमेश्वर की इच्छा को पूरा करते हैं, उनकी आज्ञा मानते हैं, उनसे प्रेम करते हैं और उनका आदर करते हैं। क्योंकि परमेश्वर पवित्र हैं और जो स्वर्ग के राज्य में प्रवेश करते हैं वे उनके साथ रहेंगे, अगर हम शुद्ध नहीं किये गए हैं तो हम स्वर्ग के राज्य में प्रवेश करने के योग्य कैसे हो सकते हैं? इसलिए, हमारी ये धारणा कि हम विश्वासियों को पाप से मुक्त कर दिया गया है और हम स्वर्ग के राज्य में प्रवेश कर सकते हैं, परमेश्वर की इच्छा को बिल्कुल गलत तरह से समझना है। ये इंसानी कल्पना से पैदा हुआ इंसानी विचार है। प्रभु यीशु ने हमें पाप से मुक्त किया; यह गलत नहीं है। हालांकि, प्रभु यीशु ने कभी ऐसा नहीं कहा कि हम इस पाप-मुक्ति से पूरी तरह शुद्ध कर दिये गए हैं और अब स्वर्ग के राज्य में प्रवेश करने के योग्य हो गए हैं। इस सच को कोई नहीं नकार सकता। तो फिर सब लोग ऐसा क्यों मानते हैं कि पाप से मुक्त किए गए सभी आस्थावान लोग स्वर्ग के राज्य में प्रवेश कर सकते हैं? उनके पास क्या प्रमाण है? उनके इस दावे के समर्थन का आधार क्या है? बहुत से लोग कहते हैं कि वे बाइबल में लिखे पौलुस और अन्य प्रेरितों के वचनों को अपना आधार मानते हैं। तब ठीक है, मैं आपको पूछता हूं, क्या पौलुस और अन्य प्रेरितों के शब्द प्रभु यीशु के वचनों का प्रतिनिधित्व करते हैं? क्या वे पवित्र आत्मा के वचनों का प्रतिनिधित्व करते हैं? बाइबल में इंसान के शब्द हो सकते हैं, लेकिन क्या इसका मतलब ये है कि वे परमेश्वर के वचन हैं? एक सच्चाई है जिसे हम बाइबल में साफ़ तौर पर देख सकते हैं: परमेश्वर जिन लोगों की प्रशंसा करते हैं, वे लोग परमेश्वर के वचन सुन सकते हैं और उनके कार्य का पालन कर सकते हैं। वही लोग उनके मार्ग का पालन करते हैं, वही लोग परमेश्वर के दिये गए वचन की विरासत को पाने के योग्य हैं। यह एक ऐसी सच्चाई है जिसे कोई नकार नहीं सकता। हम सभी जानते हैं कि भले ही हम आस्थावानों के पापों को क्षमा कर दिया गया हो, लेकिन हम अभी भी शुद्ध नहीं हुए हैं; हम अभी भी पाप करते हैं और अक्सर परमेश्वर का विरोध करते हैं। परमेश्वर ने हम से स्पष्ट रूप से कहा, "इसलिये तुम पवित्र बनो, क्योंकि मैं पवित्र हूँ" (लैव्यव्यवस्था 11:45), "जो मुझ से, 'हे प्रभु! हे प्रभु!' कहता है, उनमें से हर एक स्वर्ग के राज्य में प्रवेश न करेगा, परन्तु वही जो मेरे स्वर्गीय पिता की इच्छा पर चलता है" (मत्ती 7:21)। परमेश्वर के वचनों से, हम आश्वस्त हो सकते हैं कि वे सभी जिनके पापों को माफ कर दिया गया है, स्वर्ग के राज्य में प्रवेश करने के पात्र नहीं हैं। लोगों को शुद्ध होना चाहिये; स्वर्ग के राज्य में प्रवेश करने से पहले उन्हें परमेश्वर की इच्छा का कर्ता बनना चाहिए। इस सच्चाई को काटा नहीं जा सकता। जाहिर है, परमेश्वर की इच्छा को समझना उतना सरल नहीं है जितना लगता है। हमारे पापों के माफ कर दिये जाने मात्र से हम शुद्ध नहीं हो जाते। हमें पहले सत्य की वास्तविकता और परमेश्वर की प्रशंसा को पाना होगा तभी हम स्वर्ग के राज्य में प्रवेश करने योग्य होंगे। अगर हम सत्य को नहीं चाहते, बल्कि इससे ऊब चुके हैं और इससे घृणा करते हैं, अगर हम केवल पुरस्कार और मुकुट के पीछे भागते हैं परमेश्वर की इच्छा को पूरा करने की तो बात ही क्या, परमेश्वर की चिंता तक नहीं करते, तो क्या हम बुराई में लिप्त नहीं हैं? क्या प्रभु ऐसे व्यक्ति की प्रशंसा करेंगे? यदि ऐसा है, तो हम उन्हीं पाखंडी फरीसियों की तरह हैं: हालाँकि हमारे पाप माफ कर दिए गए हैं, फिर भी हम स्वर्ग के राज्य में प्रवेश नहीं कर पाते हैं। यह एक निर्विवाद तथ्य है।

चलिये संगति जारी रखते हैं। प्रभु यीशु ने हमें सभी पापों से छुटकारा दिलाया है। उन्होंने हमें किन "पापों" से मुक्त किया? प्रभु में विश्वास करना शुरू करने के बाद, हम किस तरह के पापों को स्वीकार करते हैं? जिन मुख्य पापों के बारे में बात की जाती है, ये वो वास्तविक पाप हैं जिनसे परमेश्वर की व्यवस्थाओं, आज्ञाओं या वचनों का उल्लंघन होता है। हम मनुष्यों ने परमेश्वर के नियमों और आज्ञाओं का उल्लंघन किया है। इसलिये हमें तिरस्कृत और दंडित किया जाएगा। इसीलिये प्रभु यीशु अपना उद्धार का कार्य करने के लिए आए थे। इस प्रकार, हमें केवल प्रभु यीशु से प्रार्थना करने, अपने पापों को स्वीकार करने और पश्चाताप करने की ज़रूरत है, और वे हमें पाप-मुक्त कर देंगे। उसके बाद उनकी व्यवस्था के अनुसार फिर हमें तिरस्कृत और दंडित नहीं किया जाएगा। परमेश्वर फिर हमें पापी के रूप में नहीं देखेंगे। तो हम सीधे परमेश्वर से प्रार्थना कर सकते हैं; हम परमेश्वर के सामने रो कर उनका भरपूर अनुग्रह और सत्य साझा कर सकते हैं। "उद्धार" का सही अर्थ यही है जिसकी हमने अनुग्रह के युग में अक्सर चर्चा की। इस "उद्धार" का शुद्ध होने और स्वर्ग के राज्य में प्रवेश करने से कुछ लेना-देना नहीं है। आप कह सकते हैं कि ये दो अलग चीजें हैं, क्योंकि प्रभु यीशु ने कभी नहीं कहा कि जो लोग बचाए गए हैं और पाप-मुक्त हो गए हैं, वे स्वर्ग के राज्य में प्रवेश कर सकते हैं। आइए हम सर्वशक्तिमान परमेश्वर के कुछ वचन पढ़ते हैं, "उस समय यीशु का कार्य समस्त मानवजाति को छुटकारा दिलाना था। उन सभी के पापों को क्षमा कर दिया गया था जो उसमें विश्वास करते थे; अगर तुम उस पर विश्वास करते हो, तो वह तुम्हें छुटकारा दिलाएगा; यदि तुम उस पर विश्वास करते, तो तुम पापी नहीं रह जाते, तुम अपने पापों से मुक्त हो जाते हो। यही बचाए जाने और विश्वास द्वारा उचित ठहराए जाने का अर्थ है। फिर विश्वासियों के अंदर परमेश्वर के प्रति विद्रोह और विरोध का भाव था, और जिसे अभी भी धीरे-धीरे हटाया जाना था। उद्धार का अर्थ यह नहीं था कि मनुष्य पूरी तरह से यीशु द्वारा प्राप्त कर लिया गया है, बल्कि यह था कि मनुष्य अब पापी नहीं रह गया है, उसे उसके पापों से मुक्त कर दिया गया है। अगर तुम विश्वास करते हो, तो तुम फिर कभी भी पापी नहीं रहोगे" ("वचन देह में प्रकट होता है" में 'परमेश्वर के कार्य का दर्शन (2)')। "मनुष्य को छुटकारा दिए जाने से पहले शैतान के बहुत-से ज़हर उसमें पहले ही डाल दिए गए थे, और हज़ारों वर्षों तक शैतान द्वारा भ्रष्ट किए जाने के बाद मनुष्य के भीतर ऐसा स्थापित स्वभाव है, जो परमेश्वर का विरोध करता है। इसलिए, जब मनुष्य को छुटकारा दिलाया गया है, तो यह छुटकारे के उस मामले से बढ़कर कुछ नहीं है, जिसमें मनुष्य को एक ऊँची कीमत पर खरीदा गया है, किंतु उसके भीतर की विषैली प्रकृति समाप्त नहीं की गई है। मनुष्य को, जो कि इतना अशुद्ध है, परमेश्वर की सेवा करने के योग्य होने से पहले एक परिवर्तन से होकर गुज़रना चाहिए। न्याय और ताड़ना के इस कार्य के माध्यम से मनुष्य अपने भीतर के गंदे और भ्रष्ट सार को पूरी तरह से जान जाएगा, और वह पूरी तरह से बदलने और स्वच्छ होने में समर्थ हो जाएगा। केवल इसी तरीके से मनुष्य परमेश्वर के सिंहासन के सामने वापस लौटने के योग्य हो सकता है। ... क्योंकि मनुष्य को छुटकारा दिए जाने और उसके पाप क्षमा किए जाने को केवल इतना ही माना जा सकता है कि परमेश्वर मनुष्य के अपराधों का स्मरण नहीं करता और उसके साथ अपराधों के अनुसार व्यवहार नहीं करता। किंतु जब मनुष्य को, जो कि देह में रहता है, पाप से मुक्त नहीं किया गया है, तो वह निरंतर अपना भ्रष्ट शैतानी स्वभाव प्रकट करते हुए केवल पाप करता रह सकता है। यही वह जीवन है, जो मनुष्य जीता है—पाप करने और क्षमा किए जाने का एक अंतहीन चक्र। अधिकतर मनुष्य दिन में सिर्फ इसलिए पाप करते हैं, ताकि शाम को उन्हें स्वीकार कर सकें। इस प्रकार, भले ही पापबलि मनुष्य के लिए हमेशा के लिए प्रभावी हो, फिर भी वह मनुष्य को पाप से बचाने में सक्षम नहीं होगी। उद्धार का केवल आधा कार्य ही पूरा किया गया है, क्योंकि मनुष्य में अभी भी भ्रष्ट स्वभाव है" ("वचन देह में प्रकट होता है" में 'देहधारण का रहस्य (4)')। सर्वशक्तिमान परमेश्वर के वचनों में इस प्रश्न का स्पष्ट उत्तर है। हम उन्हें सुनते ही समझ जाते हैं। अनुग्रह की आयु में, प्रभु यीशु ने मानवजाति को पापों से मुक्त करने के लिए ही छुटकारे का कार्य किया, आस्था के ज़रिये उन्हें धर्मी बनाया और विश्वास के ज़रिये बचाया। हालांकि, प्रभु यीशु ने कभी नहीं कहा जिस किसी के भी पापों को माफ किया गया है, वह स्वर्ग के राज्य में प्रवेश कर सकता है। क्योंकि हो सकता है प्रभु यीशु ने हमें सभी पापों से मुक्त कर दिया हो, लेकिन उन्होंने हमें हमारे शैतानी स्वभाव से मुक्त नहीं किया है। हमारा अहंकार, स्वार्थ, कपट, बुराई आदि यानी हमारा भ्रष्ट स्वभाव अभी भी शेष है। ये बातें पाप से भी गहरी हैं। इनका समाधान सरल नहीं है। अगर परमेश्वर की विरोधी शैतानी प्रकृति और भ्रष्ट स्वभाव का समाधान न किया जाए, तो हम लोग अनेक पाप कर बैठते हैं। हमसे ऐसे पाप भी हो सकते हैं जो व्यवस्था के उल्लंघन से भी बदतर हों, यानी घोर पाप। फरीसी प्रभु यीशु की निंदा और विरोध क्यों कर पाए? वे उन्हें सलीब पर कैसे चढ़ा पाए? इससे सिद्ध होता है कि अगर इंसान के शैतानी स्वभाव का समाधान न किया जाए तो इंसान अब भी पाप और परमेश्वर का विरोध कर सकता है और परमेश्वर को धोखा दे सकता है।

प्रभु में इतने बरसों के अपने विश्वास में हमने एक बात अनुभव की है, हालाँकि हम पाप-मुक्त हो चुके हैं, उसके बावजूद हम लगातार पाप करते रहते हैं। हम लोग प्रतिष्ठा और रुतबे की तलाश में झूठ बोलते हैं, कपट करते हैं और कुतर्क करते हैं। हम अपनी ज़िम्मेदारियों से बचते हैं और अपने फायदे के लिये दूसरों को मुसीबत में डाल देते हैं। जब प्राकृतिक और मानव निर्मित आपदाएं या परीक्षण और क्लेश आते हैं तो हम परमेश्वर को दोषी मानते हैं और उनसे धोखा करते हैं। जब परमेश्वर का कार्य हमारी धारणाओं के अनुरूप नहीं होता तो हम परमेश्वर को नकार देते हैं, उनकी परख और विरोध करते हैं। हालाँकि हम नाम के लिये परमेश्वर पर विश्वास करते हैं, मगर हम आदर और अनुसरण इंसान का ही करते हैं। अगर हमारे पास पदवी होती है, हम मुख्य पादरियों, धर्म-शिक्षकों और फरीसियों की तरह खुद को ऊँचा उठाते हैं और अपनी गवाही देते हैं। हम परमेश्वर की तरह पेश आते हैं और कोशिश करते हैं कि लोग हमें आदर दें और सराहना करें। हम परमेश्वर की भेंट तक चुराकर अपने लिये ले लेते हैं। हम जलने लगते हैं और अपनी पसंद-नापसंद, अपनी सनक और भावनाओं पर चलते हैं। हम अपने झंडे लगाते हैं, अपने समूह बनाते हैं और अपने छोटे राज्य स्थापित करते हैं। साफ तौर पर ये सब सच्चाई है। हम देख सकते हैं कि अगर हमारी शैतानी प्रकृति और स्वभाव नहीं सुधरते हैं तो भले ही हमारे पाप लाख बार क्षमा कर दिये जाएँ, हम स्वर्ग के राज्य में प्रवेश करने के योग्य नहीं होंगे, इस बात से कि हम अभी भी पाप और परमेश्वर का विरोध कर सकते हैं, ये ज़ाहिर होता है कि हम अब भी शैतान के अंग हैं, और परमेश्वर के दुश्मन हैं, और परमेश्वर निश्चित रूप से हमें निंदित और दंडित करेंगे। जैसा कि बाइबिल में कहा गया है, "क्योंकि सच्‍चाई की पहिचान प्राप्‍त करने के बाद यदि हम जान बूझकर पाप करते रहें, तो पापों के लिये फिर कोई बलिदान बाकी नहीं। हाँ, दण्ड का एक भयानक बाट जोहना और आग का ज्वलन बाकी है जो विरोधियों को भस्म कर देगा" (इब्रानियों 10:26-27)। आइये, परमेश्वर के और वचन पढ़ें: "तुम लोगों जैसा पापी, जिसे परमेश्वर के द्वारा अभी-अभी छुड़ाया गया है, और जो परिवर्तित नहीं किया गया है, या सिद्ध नहीं बनाया गया है, क्या तुम परमेश्वर के हृदय के अनुसार हो सकते हो? तुम्हारे लिए, तुम जो कि अभी भी पुराने अहम् वाले हो, यह सत्य है कि तुम्हें यीशु के द्वारा बचाया गया था, और कि परमेश्वर द्वारा उद्धार की वजह से तुम्हें एक पापी के रूप में नहीं गिना जाता है, परन्तु इससे यह साबित नहीं होता है कि तुम पापपूर्ण नहीं हो, और अशुद्ध नहीं हो। यदि तुम्हें बदला नहीं गया तो तुम संत जैसे कैसे हो सकते हो? भीतर से, तुम अशुद्धता से घिरे हुए हो, स्वार्थी और कुटिल हो, मगर तब भी तुम यीशु के साथ अवतरण चाहते हो—क्या तुम इतने भाग्यशाली हो सकते हो? तुम परमेश्वर पर अपने विश्वास में एक कदम चूक गए हो: तुम्हें मात्र छुटकारा दिया गया है, परन्तु परिवर्तित नहीं किया गया है। तुम्हें परमेश्वर के हृदय के अनुसार होने के लिए, परमेश्वर को व्यक्तिगत रूप से तुम्हें परिवर्तित और शुद्ध करने का कार्य करना होगा; यदि तुम्हें सिर्फ छुटकारा दिया जाता है, तो तुम पवित्रता को प्राप्त करने में असमर्थ होंगे। इस तरह से तुम परमेश्वर के आशीषों में साझेदारी के अयोग्य होंगे, क्योंकि तुमने मनुष्य का प्रबंधन करने के परमेश्वर के कार्य के एक कदम का सुअवसर खो दिया है, जो कि परिवर्तित करने और सिद्ध बनाने का मुख्य कदम है। और इसलिए तुम, एक पापी जिसे अभी-अभी छुटकारा दिया गया है, परमेश्वर की विरासत को सीधे तौर पर उत्तराधिकार के रूप में पाने में असमर्थ हो" ("वचन देह में प्रकट होता है" में 'पदवियों और पहचान के सम्बन्ध में')। जैसा कि आप देख सकते हैं, प्रभु यीशु ने हमें केवल छुड़ाया है लेकिन फिर भी हम अपने शैतानी स्वभाव में रहते हैं, अक्सर पाप करते हैं और परमेश्वर का विरोध करते हैं। हमें अंत के दिनों में परमेश्वर के न्याय और शुद्धिकरण का अनुभव करना चाहिए ताकि हम पूरी तरह से पाप से मुक्त हो सकें और परमेश्वर के हृदय में स्थान पा सकें। तब हम स्वर्ग के राज्य में प्रवेश करने के पात्र बन सकेंगे। दरअसल, प्रभु यीशु ने एक बार कहा था, "मैं तुम्हारे लिये जगह तैयार करने जाता हूँ। और यदि मैं जाकर तुम्हारे लिये जगह तैयार करूँ, तो फिर आकर तुम्हें अपने यहाँ ले जाऊँगा कि जहाँ मैं रहूँ वहाँ तुम भी रहो" (यूहन्ना 14:2-3)। प्रभु हमारी ख़ातिर जगह तैयार करने के लिए वापस गए हैं और जगह तैयार करने के बाद वे हमें लेने के लिये वापस आएंगे। दरअसल "लेने आने" का अर्थ है अंत के दिनों में हमारे लिये उनका पुनर्जन्म। जब प्रभु अपना कार्य करने के लिये आएंगे तो वे हमें अपने सिंहासन के सामने ले जाएंगे। ताकि परमेश्वर के वचनों से हमारा न्याय किया जा सके, हमें शुद्ध और पूर्ण किया जा सके। आपदाओं के आने से पहले वे हमें विजेता बना देंगे। हमें प्राप्त करने की उनकी प्रक्रिया ही दरअसल हमें शुद्ध और पूर्ण बनाने का तरीका है। अब प्रभु अंत के दिनों में अपना न्याय का कार्य करने के लिए धरती पर आए हैं। हमें उनके साथ रहने के लिए उनके सिंहासन के सामने आरोहित किया गया है। क्या इससे प्रभु के हमें लेने आने की यह भविष्यवाणी पूरी तरह सही साबित नहीं होती? महाआपदाओं के समाप्त होने पर, धरती पर मसीह का राज्य स्थापित होगा। जो लोग महाआपदाओं के परिशोधन के बाद बचेंगे, वे स्वर्ग के राज्य में जगह पाएंगे।

— 'राज्य के सुसमाचार पर विशिष्ट प्रश्नोत्तर' से उद्धृत

हालांकि हमारे पापों को प्रभु में विश्वास करने के कारण क्षमा कर दिया गया है, और हमें बचाए गए लोगों के रूप में गिना जाता है, परमेश्‍वर की दृष्टि में, हम अभी भी गंदे और भ्रष्ट ही हैं और शुद्धिकरण के लिए पाप से बच नहीं पाए हैं। पापों को क्षमा कर दिये जाने का मतलब सिर्फ यह है कि हम कानून द्वारा दंडित नहीं होंगे। यही "अनुग्रह से बचाए जाने" का अर्थ है। परमेश्‍वर ने भले ही हमारे पापों को क्षमा कर हमें कई आशीष दिया हो, हमें हमारे पापों की क्षमा की शांति और खुशी का आनंद लेने का मौक़ा दिया हो, और हमें परमेश्‍वर से प्रार्थना करने और परमेश्‍वर के साथ बातचीत और संवाद करने का अधिकार दिया हो, लेकिन इससे इनकार नहीं किया जा सकता है कि हम अभी भी अक्सर पाप करते और परमेश्‍वर का विरोध करते हैं, और धार्मिकता तक नहीं पंहुच पा रहे हैं। हमें अभी भी परमेश्‍वर की वापसी की आवश्यकता है ताकि वे मानव जाति को पूरी तरह से शुद्ध करने और बचाने के अपने कार्य को पूरा कर सकें। दूसरे शब्‍दों में कहें तो, प्रभु यीशु का उद्धार कार्य केवल अंत के दिनों के परमेश्‍वर के न्याय के कार्य का मार्ग प्रशस्त करने के लिए है। मानव जाति को बचाने का परमेश्‍वर का कार्य वहीं समाप्‍त नहीं होता है। हमें इस बात को जानना चाहिए। कि ऐसा क्‍यों कि प्रभु में विश्वास करने पर हमारे पापों को क्षमा कर दिये जाने के बाद भी हम अपने पर कोई नियंत्रण नहीं रख पाते और अक्सर पाप करते हैं, और पाप में रहने से खुद को निकाल नहीं पाते हैं? ऐसा इसलिए है क्योंकि शैतान द्वारा हमारा भ्रष्टाचार बहुत गहरा हो गया है, इस हद तक कि हम सभी में शैतानी प्रवृत्ति है और हम शैतानी स्वभाव से भरे हुए हैं। यही कारण है अक्सर पाप करने पर हमारा कोई नियंत्रण नहीं रह पाता। अगर इस शैतानी प्रवृत्ति का हल नहीं निकाला गया, तो हम अभी भी पाप और परमेश्‍वर का विरोध कर सकते हैं, भले ही हमारे पाप क्षमा हो चुके हों। इस तरह, हम कभी भी परमेश्‍वर के साथ अनुकूलता प्राप्त करने में सक्षम नहीं होंगे। यही कारण है कि प्रभु यीशु ने कहा था कि उन्‍हें वापस आना होगा। ऐसा इसलिए है कि वे मानव जाति को शुद्ध करने और बचाने के लिए अंत के दिनों के अपने न्याय कार्य को पूरा करेंगे। जैसा कि सर्वशक्तिमान परमेश्वर कहते हैं, "मनुष्य को छुटकारा दिए जाने से पहले शैतान के बहुत-से ज़हर उसमें पहले ही डाल दिए गए थे, और हज़ारों वर्षों तक शैतान द्वारा भ्रष्ट किए जाने के बाद मनुष्य के भीतर ऐसा स्थापित स्वभाव है, जो परमेश्वर का विरोध करता है। इसलिए, जब मनुष्य को छुटकारा दिलाया गया है, तो यह छुटकारे के उस मामले से बढ़कर कुछ नहीं है, जिसमें मनुष्य को एक ऊँची कीमत पर खरीदा गया है, किंतु उसके भीतर की विषैली प्रकृति समाप्त नहीं की गई है। मनुष्य को, जो कि इतना अशुद्ध है, परमेश्वर की सेवा करने के योग्य होने से पहले एक परिवर्तन से होकर गुज़रना चाहिए। न्याय और ताड़ना के इस कार्य के माध्यम से मनुष्य अपने भीतर के गंदे और भ्रष्ट सार को पूरी तरह से जान जाएगा, और वह पूरी तरह से बदलने और स्वच्छ होने में समर्थ हो जाएगा। केवल इसी तरीके से मनुष्य परमेश्वर के सिंहासन के सामने वापस लौटने के योग्य हो सकता है। आज किया जाने वाला समस्त कार्य इसलिए है, ताकि मनुष्य को स्वच्छ और परिवर्तित किया जा सके; वचन के द्वारा न्याय और ताड़ना के माध्यम से, और साथ ही शुद्धिकरण के माध्यम से भी, मनुष्य अपनी भ्रष्टता दूर कर सकता है और शुद्ध बनाया जा सकता है। इस चरण के कार्य को उद्धार का कार्य मानने के बजाय यह कहना कहीं अधिक उचित होगा कि यह शुद्धिकरण का कार्य है। वास्तव में यह चरण विजय का और साथ ही उद्धार के कार्य का दूसरा चरण है। वचन द्वारा न्याय और ताड़ना के माध्यम से मनुष्य परमेश्वर द्वारा प्राप्त किए जाने की स्थिति में पहुँचता है, और शुद्ध करने, न्याय करने और प्रकट करने के लिए वचन के उपयोग के माध्यम से मनुष्य के हृदय के भीतर की सभी अशुद्धताओं, धारणाओं, प्रयोजनों और व्यक्तिगत आकांक्षाओं को पूरी तरह से प्रकट किया जाता है" ("वचन देह में प्रकट होता है" में 'देहधारण का रहस्य (4)')।

"पापबलि के माध्यम से मनुष्य के पाप क्षमा किए जा सकते हैं, परंतु मनुष्य इस समस्या को हल करने में पूरी तरह असमर्थ रहा है कि वह आगे कैसे पाप न करे और कैसे उसका भ्रष्ट पापी स्वभाव पूरी तरह से मिटाया और रूपांतरित किया जा सकता है। मनुष्य के पाप क्षमा कर दिए गए थे और ऐसा परमेश्वर के सलीब पर चढ़ने के कार्य की वजह से हुआ था, परंतु मनुष्य अपने पुराने, भ्रष्ट शैतानी स्वभाव में जीता रहा। इसलिए मनुष्य को उसके भ्रष्ट शैतानी स्वभाव से पूरी तरह से बचाया जाना आवश्यक है, ताकि उसका पापी स्वभाव पूरी तरह से मिटाया जा सके और वह फिर कभी विकसित न हो पाए, जिससे मनुष्य का स्वभाव रूपांतरित होने में सक्षम हो सके। इसके लिए मनुष्य को जीवन में उन्नति के मार्ग को समझना होगा, जीवन के मार्ग को समझना होगा, और अपने स्वभाव को परिवर्तित करने के मार्ग को समझना होगा। साथ ही, इसके लिए मनुष्य को इस मार्ग के अनुरूप कार्य करने की आवश्यकता होगी, ताकि उसका स्वभाव धीरे-धीरे बदल सके और वह प्रकाश की चमक में जी सके, ताकि वह जो कुछ भी करे, वह परमेश्वर की इच्छा के अनुसार हो, ताकि वह अपने भ्रष्ट शैतानी स्वभाव को दूर कर सके और शैतान के अंधकार के प्रभाव को तोड़कर आज़ाद हो सके, और इसके परिणामस्वरूप पाप से पूरी तरह से ऊपर उठ सके। केवल तभी मनुष्य पूर्ण उद्धार प्राप्त करेगा। ... इसलिए, उस चरण का कार्य पूरा हो जाने के बाद भी न्याय और ताड़ना का कार्य बाकी रह गया था। यह चरण वचन के माध्यम से मनुष्य को शुद्ध बनाने और उसके परिणामस्वरूप उसे अनुसरण हेतु एक मार्ग प्रदान करने के लिए है। यह चरण फलदायक या अर्थपूर्ण न होता, यदि यह दुष्टात्माओं को निकालने के साथ जारी रहता, क्योंकि यह मनुष्य की पापपूर्ण प्रकृति को दूर करने में असफल रहता और मनुष्य केवल अपने पापों की क्षमा पर आकर रुक जाता। पापबलि के माध्यम से मनुष्य के पाप क्षमा किए गए हैं, क्योंकि सलीब पर चढ़ने का कार्य पहले ही पूरा हो चुका है और परमेश्वर ने शैतान को जीत लिया है। किंतु मनुष्य का भ्रष्ट स्वभाव अभी भी उसके भीतर बना रहने के कारण वह अभी भी पाप कर सकता है और परमेश्वर का प्रतिरोध कर सकता है, और परमेश्वर ने मानवजाति को प्राप्त नहीं किया है। इसीलिए कार्य के इस चरण में परमेश्वर मनुष्य के भ्रष्ट स्वभाव को प्रकट करने के लिए वचन का उपयोग करता है और उससे सही मार्ग के अनुसार अभ्यास करवाता है। यह चरण पिछले चरण से अधिक अर्थपूर्ण और साथ ही अधिक लाभदायक भी है, क्योंकि अब वचन ही है जो सीधे तौर पर मनुष्य के जीवन की आपूर्ति करता है और मनुष्य के स्वभाव को पूरी तरह से नया होने में सक्षम बनाता है; कार्य का यह चरण कहीं अधिक विस्तृत है" ("वचन देह में प्रकट होता है" में 'देहधारण का रहस्य (4)')।

सर्वशक्तिमान परमेश्‍वर के वचन बहुत स्पष्ट हैं: अनुग्रह के युग में, प्रभु यीशु ने केवल अपना छुटकारे का कार्य पूरा किया था। प्रभु में विश्वास करने के लिए मानव जाति के पापों को क्षमा कर दिया गया, लेकिन उनकी पापी प्रवृत्ति का समाधान नहीं हो सका। मनुष्य की पापी प्रवृत्ति शैतानी प्रवृत्ति है। यह पहले से ही मनुष्य के अंदर गहराई से जड़ें जमाकर मनुष्‍य के जीवन में समा चुकी है। यही कारण है कि मनुष्य अभी भी पाप और परमेश्‍वर का विरोध करने पर नियंत्रण नहीं कर पाता। मनुष्य का शैतानी स्वभाव से पूर्ण होना परमेश्‍वर के प्रति उसके प्रतिरोध का मूल कारण है। मनुष्य के पापों को क्षमा किया जा सकता है, लेकिन क्या परमेश्‍वर उसकी शैतानी प्रवृत्ति को क्षमा कर सकते हैं? शैतान की प्रवृत्ति सीधे-सीधे परमेश्‍वर और सत्‍य का विरोध करती है। परमेश्‍वर इसे कभी क्षमा नहीं करेंगे। इसलिए, परमेश्‍वर को मानव जाति को शैतान की प्रवृत्ति के बंधन और नियंत्रण से पूरी तरह बचाना होगा, और मानव जाति को न्याय और ताड़ना देने होंगे। अंत के दिनों में परमेश्‍वर का न्याय और उनकी ताड़ना वह कार्य है जो हमारे भीतर की शैतानी प्रवृत्ति और स्वभाव को ख़त्म करने के लिए है। कुछ लोग पूछ सकते हैं, क्या हमारी शैतानी प्रवृत्ति का समाधान केवल न्याय और ताड़ना से किया जा सकता है? क्या हम पीड़ित होने का मूल्‍य चुकाकर, अपने शरीर को वश में करके, और स्‍वयं को संकल्प के साथ रोककर, अपनी शैतानी प्रवृत्ति का समाधान नहीं कर सकते हैं? निश्चित रूप से नहीं। आइए, पूरे इतिहास में कई संतों पर एक नज़र डालें, जिन लोगों ने पीड़ा झेलकर मूल्‍य चुकाया और अपने शरीर को वश में किया, जो सभी पाप के बंधन और नियंत्रण से बचना और देह के परे जाना चाहते थे। लेकिन उनमें से कौन शैतान को परास्त कर ऐसा बनने में सफल रहा जो वास्तव में परमेश्‍वर का आज्ञापालन करता है? कोई भी नहीं। अगर वे ऐसे थे भी, तो वे ऐसे लोग थे जिन्हें परमेश्‍वर ने विशेष रूप से पूर्ण किया था। लेकिन ऐसे कितने लोग थे? ऐसा इसलिए था क्योंकि परमेश्‍वर का न्याय और ताड़ना नहीं थी, इसलिए मनुष्य के शैतानी स्वभाव को शुद्ध नहीं किया जा सकता था। इसलिए मनुष्य का जीवन स्वभाव बदलने में असमर्थ था। यह तथ्य इस बात को साबित करने के लिए पर्याप्त है कि मानव जाति की शैतानी प्रवृत्ति का समाधान करने में मानवीय साधन असमर्थ है। सत्य और जीवन हासिल करने के लिए, अनन्त जीवन का मार्ग प्राप्त करने के लिए, मनुष्य को परमेश्‍वर के न्याय और ताड़ना, काट-छांट और निपटारे, परीक्षण और शुद्धिकरण की प्रक्रिया से गुजरना होगा। केवल तभी मनुष्य की शैतानी प्रवृत्ति का पूरी तरह समाधान हो सकता है। यही कारण है कि, प्रभु यीशु के उद्धार कार्य की नींव पर, सर्वशक्तिमान परमेश्‍वर, मानव जाति को शैतानी प्रकृति के बंधन और नियंत्रण से पूरी तरह से बचाने के लिए, अंत के दिनों में न्याय और ताड़ना का कार्य करते हैं, ताकि मानव जाति को परमेश्‍वर का उद्धार प्राप्त करने और परमेश्‍वर द्वारा उसे प्राप्‍त किए जाने के लिए शुद्ध किया जा सके। इस से हम यह देख सकते हैं कि यह अंत के दिनों में परमेश्‍वर का न्याय और ताड़ना ही है जो मानव जाति को पूरी तरह से शुद्ध करता और बचाता है। यह सच है।

परमेश्वर अंत के दिनों में भ्रष्ट मानवजाति के न्याय और ताड़ना का कार्य क्यों करता है? इस मामले को समझने के लिये, हमें यह जानना ज़रूरी है कि परमेश्वर मात्र कार्य के एक या दो चरणों से मानवजाति को बचाने का कार्य नहीं करता है। बल्कि, यह कार्य के तीन चरणों में होता है: व्यवस्था का युग, अनुग्रह का युग और राज्य का युग। कार्य के ये तीन चरण ही इंसान को शैतान के अधिकार क्षेत्र से पूरी तरह से बचा सकते हैं, और परमेश्वर द्वारा इंसान को बचाये जाने का समग्र कार्य इन्हीं तीनों युगों को मिलाकर बनता है। व्यवस्था के युग में, यहोवा परमेश्वर ने धरती पर इंसान को जीने की राह दिखाने के लिये नियम और आदेश जारी किये, और इनके ज़रिये इंसान जान सकता था कि किस तरह के लोगों को परमेश्वर का आशीष मिलता है, परमेश्वर किस तरह के लोगों को अभिशाप देता है, साथ ही धार्मिक क्या है और पाप-कर्म क्या है। लेकिन, व्यवस्था के युग के बाद के चरणों में हर इंसान पाप में जी रहा था, क्योंकि इंसान शैतान के हाथों बुरी तरह से भ्रष्ट हो गया था। वे लोग इन व्यवस्थाओं का पालन नहीं कर पाये और उनके सामने इन व्यवस्थाओं के द्वारा दण्डित और शापित होने का ख़तरा मंडराने लगा। यही वजह है कि छुटकारे के कार्य के लिये अनुग्रह के युग का प्रभु यीशु आया ताकि इंसान अपने पापों का प्रायश्चित करे, पश्चाताप करे, और अपने पापों के लिये क्षमा पा सके, इस तरह उसे व्यवस्थाओं के अंतर्गत मिलने वाले दण्ड और शाप से बचाया जा सके, इंसान परमेश्वर के सामने आने और प्रार्थना करने के योग्य हो सके, परमेश्वर से संवाद कर सके, और उसके प्रचुर अनुग्रह और सत्य का आनंद ले सके। "बचाये जाने" का यही सच्चा अर्थ है। मगर, प्रभु यीशु ने मात्र हमारे पापों को क्षमा किया था; उसने हमारी पापी प्रकृति को या हमारे शैतानी स्वभाव को क्षमा नहीं किया था। हमारी पापी प्रकृति अभी भी ज्यूँ की त्यूँ बनी हुई है। हम पाप करने के उसी दुष्चक्र में फँसे हुए हैं, पाप-स्वीकार करते हैं, और फिर से पाप करते हैं। हमारे पास अपनी पापी प्रकृति के बंधन और नियंत्रण से निकलने का कोई मार्ग नहीं था। हमने वेदनापूर्ण स्वर में परमेश्वर को पुकारा: "मैं सचमुच दुखी हूँ! मैं पाप की विवशता और नियंत्रण से मुक्त कैसे होऊँ?" यह एक अनुभव है, एक समझ जिसे प्रभु के विश्वासी होने के नाते, हम सब साझा करते हैं। फिर भी, हम लोग अपनी पापी प्रकृति को अपने आप दूर करने के काबिल नहीं हैं। कोई भी इंसान मानवजाति को बचाने का कार्य नहीं कर सकता। मात्र परमेश्वर, सृष्टिकर्ता ही मानवजाति को बचा सकता है, हमें शैतान और पाप से मुक्त कर सकता है। केवल वही हमें शैतान की अधीनता से बचा सकता है। सर्वशक्तिमान परमेश्वर कहते हैं: "चूँकि उसने मनुष्य को सृजा है, इसलिए वह उसकी अगुआई करता है; चूँकि वह मनुष्य को बचाता है, इसलिए वह उसे पूरी तरह से बचाएगा और उसे पूरी तरह से प्राप्त करेगा; चूँकि वह मनुष्य की अगुआई करता है, इसलिए वह उसे उस उपयुक्त मंज़िल पर ले जाएगा, और चूँकि उसने मनुष्य का सृजन किया है और उसका प्रबंध करता है, इसलिए उसे मनुष्य के भाग्य और उसकी भविष्य की संभावनाओं की ज़िम्मेदारी लेनी चाहिए। यही वह कार्य है, जिसे सृजनकर्ता द्वारा किया जाता है" ("वचन देह में प्रकट होता है" में 'मनुष्य के सामान्य जीवन को बहाल करना और उसे एक अद्भुत मंज़िल पर ले जाना')। परमेश्वर विश्वास-योग्य है। चूँकि परमेश्वर इंसान को बचाता है, इसलिये वह इसे पूरी तरह से करेगा। वह यकीनन बीच में नहीं छोड़ेगा। इसलिये सर्वशक्तिमान परमेश्वर अंत के दिनों में इंसान को पूरी तरह से बचाने और उसे शुद्ध करने के लिये सत्य व्यक्त करता है। परमेश्वर इंसान की शैतानी प्रकृति और शैतानी स्वभाव की समस्या को पूरी तरह से सुधारने के लिये परमेश्वर के घर से शुरू होने वाले न्याय के कार्य को करता है। वह इस कार्य को इसलिये करता है ताकि इंसान पाप-मुक्त हो सके, उद्धार पा सके, और परमेश्वर को प्राप्त हो सके। सर्वशक्तिमान परमेश्वर अंत के दिनों में जिस न्याय के कार्य को करता है, भ्रष्ट इंसान को ठीक उसी की ज़रूरत है, और यही कार्य का वह मुख्य चरण भी है जिसे इंसान को बचाने के लिये परमेश्वर को करना है। इससे प्रभु यीशु की यह भविष्यवाणी पूरी होती है: "मुझे तुम से और भी बहुत सी बातें कहनी हैं, परन्तु अभी तुम उन्हें सह नहीं सकते। परन्तु जब वह अर्थात् सत्य का आत्मा आएगा, तो तुम्हें सब सत्य का मार्ग बताएगा" (यूहन्ना 16:12-13)। "सत्य का आत्मा" का तात्पर्य अंत के दिनों में परमेश्वर का मानव शरीर में हधारण करना, सत्य व्यक्त करना और न्याय के कार्य को करना है। हमारा काम सिर्फ़ परमेश्वर के न्याय के कार्य को स्वीकारना और उसकी आज्ञा का पालन करना है ताकि हम उद्धार पा सकें और परमेश्वर को प्राप्त हो सकें। इस बात की पुष्टि हर वह व्यक्ति कर सकता है जिसने सचमुच परमेश्वर के अंत के दिनों के न्याय के कार्य का अनुभव कर लिया है।

— 'राज्य के सुसमाचार पर विशिष्ट प्रश्नोत्तर' से उद्धृत

पिछला: प्रश्न 13: धार्मिक दुनिया में अधिकांश लोग मानते हैं कि क्रूस पर प्रभु यीशु का यह कहना कि "पूरा हुआ" (यूहन्ना 19:30) सबूत है कि परमेश्वर का उद्धार का कार्य पहले ही पूरी तरह से समाप्त हो चुका है। और फिर भी तुम यह गवाही देते हो कि परमेश्वर सत्य को व्यक्त करने के लिए और लोगों को पूरी तरह से बचाने के लिए परमेश्वर के घर से शुरू होने वाले न्याय के कार्य को करने के लिए देह में लौटा है। तो मनुष्य को बचाने के लिए परमेश्वर के कार्य को वास्तव में कैसे समझना चाहिए? हम सत्य के इस पहलू पर स्पष्ट नहीं हैं, इसलिए कृपया हमारे लिए इस पर सहभागिता करो।

अगला: प्रश्न 15: हम पौलुस के उदाहरण का अनुसरण करते हैं और हम प्रभु के लिए कड़ी मेहनत करते हैं, सुसमाचार फैलाते हैं और प्रभु के लिए गवाही देते हैं, और पौलुस की तरह प्रभु की कलिसियाओं की चरवाही करते हैं: "मैं अच्छी कुश्ती लड़ चुका हूँ, मैं ने अपनी दौड़ पूरी कर ली है, मैं ने विश्‍वास की रखवाली की है" (2 तीमुथियुस 4:7)। क्या यह परमेश्वर की इच्छा का अनुसरण करना नहीं है? इस तरह से अभ्यास करने का अर्थ यह होना चाहिए कि हम स्वर्गारोहित होने और स्वर्ग के राज्य में प्रवेश करने के योग्य हैं, तो हमें स्वर्ग के राज्य में लाये जाने से पहले परमेश्वर के अंतिम दिनों के न्याय और शुद्धि के कार्य को क्यों स्वीकार करना चाहिए?

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