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प्रश्न 13: बाइबल कहती है: "क्योंकि धार्मिकता के लिये मन से विश्‍वास किया जाता है, और उद्धार के लिये मुँह से अंगीकार किया जाता है" (रोमियों 10:10)। हम मानते हैं कि प्रभु यीशु ने हमारे पापों को क्षमा कर दिया है और विश्वास के द्वारा हमें धर्मी बना दिया है। इसके अलावा, हम मानते हैं कि अगर किसी को एक बार बचाया जाता है, तो वे हमेशा के लिए बचा लिए जाते हैं, और जब परमेश्वर वापस आएगा तो हम तुरंत स्वर्गारोहण कर जाएँगे और स्वर्ग के राज्य में प्रवेश करेंगे। तो तुम क्यों प्रमाण दे रहे हो कि बचाए जाने और स्वर्ग के राज्य में लाये जाने से पहले हमें आखिरी दिनों के परमेश्वर के न्याय को स्वीकार करना चाहिए?

उत्तर:

प्रभु के सभी विश्वासियों का मानना है: प्रभु यीशु ने सलीब पर दम तोड़कर हमें मुक्ति दिला दी, तो हम पहले से ही सभी पापों से मुक्त हो चुके हैं। प्रभु अब हमें पापी नहीं मानते। हम अपने विश्वास के ज़रिये धर्मी बन गए हैं। अगर हम अंत तक सहन करते रहे तो हम बचा लिये जाएँगे। जब प्रभु आएँगे तो वे सीधे ही हमें स्वर्ग के राज्य में आरोहित कर देंगे। तो क्या ये वाकई सच है? क्या परमेश्वर ने इस दावे के समर्थन में अपने वचनों में कभी कोई सबूत दिया है? यदि यह दृष्टिकोण सत्य के अनुरूप न हो तो इसके परिणाम क्या होंगे? हम प्रभु के विश्वासियों को हर बात के लिये, अपने आधार के रूप में उनके वचनों का उपयोग करना चाहिए। यह खास तौर से वहाँ ज़्यादा सही है जब सवाल ये आए कि प्रभु की वापसी को किस तरह से लिया जाए। हम उनकी वापसी को किसी भी परिस्थिति में मनुष्य की अवधारणाओं और कल्पनाओं के आधार पर नहीं ले सकते। इस तरह के व्यवहार के नतीजों पर सोचना भी इसे बहुत गंभीर बना देता है। ये बिल्कुल वैसा ही मामला है जब फरीसियों ने प्रभु यीशु को सलीब पर चढ़ा दिया और मसीहा के आने का इंतजार करते रहे। परिणाम क्या होगा? प्रभु यीशु ने मानवजाति को मुक्त करने का कार्य पूरा कर लिया है। इतना तो सच है, लेकिन क्या परमेश्वर द्वारा मानवजाति की मुक्ति का कार्य समाप्त हो गया है? इसका मतलब ये है कि हम सभी प्रभु यीशु के विश्वासी स्वर्ग के राज्य में आरोहित किये जाने योग्य हैं? इस सवाल का जवाब कोई नहीं जानता है। एक बार परमेश्वर ने कहा, "जो मुझ से, हे प्रभु! हे प्रभु! कहता है, उनमें से हर एक स्वर्ग के राज्य में प्रवेश न करेगा, परन्तु वही जो मेरे स्वर्गीय पिता की इच्छा पर चलता है" (मत्ती 7:21)। "… इसलिये तुम पवित्र बनो, क्योंकि मैं पवित्र हूँ" (लैव्यव्यवस्था 11:45)। परमेश्वर के वचनों के अनुसार, हम आश्वस्त हो सकते हैं कि स्वर्गीय राज्य में प्रवेश करने वाले लोगों ने खुद को पाप से मुक्त कर लिया है और वे शुद्ध कर दिये गए हैं। ये वे लोग हैं जो परमेश्वर की इच्छा को पूरा करते हैं, उनकी आज्ञा मानते हैं, उनसे प्रेम करते हैं और उनका आदर करते हैं। क्योंकि परमेश्वर पवित्र हैं और जो स्वर्ग के राज्य में प्रवेश करते हैं वे उनके साथ रहेंगे, अगर हम शुद्ध नहीं किये गए हैं तो हम स्वर्ग के राज्य में प्रवेश करने के योग्य कैसे हो सकते हैं? इसलिए, हमारी ये धारणा कि हम विश्वासियों को पाप से मुक्त कर दिया गया है और हम स्वर्ग के राज्य में प्रवेश कर सकते हैं, परमेश्वर की इच्छा को बिल्कुल गलत तरह से समझना है। ये इंसानी कल्पना से पैदा हुआ इंसानी विचार है। प्रभु यीशु ने हमें पाप से मुक्त किया; यह गलत नहीं है। हालांकि, प्रभु यीशु ने कभी ऐसा नहीं कहा कि हम इस पाप-मुक्ति से पूरी तरह शुद्ध कर दिये गए हैं और अब स्वर्ग के राज्य में प्रवेश करने के योग्य हो गए हैं। इस सच को कोई नहीं नकार सकता। तो फिर सब लोग ऐसा क्यों मानते हैं कि पाप से मुक्त किए गए सभी आस्थावान लोग स्वर्ग के राज्य में प्रवेश कर सकते हैं? उनके पास क्या प्रमाण है? उनके इस दावे के समर्थन का आधार क्या है? बहुत से लोग कहते हैं कि वे बाइबल में लिखे पौलुस और अन्य प्रेरितों के वचनों को अपना आधार मानते हैं। तब ठीक है, मैं आपको पूछता हूं, क्या पौलुस और अन्य प्रेरितों के शब्द प्रभु यीशु के वचनों का प्रतिनिधित्व करते हैं? क्या वे पवित्र आत्मा के वचनों का प्रतिनिधित्व करते हैं? बाइबल में इंसान के शब्द हो सकते हैं, लेकिन क्या इसका मतलब ये है कि वे परमेश्वर के वचन हैं? एक सच्चाई है जिसे हम बाइबल में साफ़ तौर पर देख सकते हैं: परमेश्वर जिन लोगों की प्रशंसा करते हैं, वे लोग परमेश्वर के वचन सुन सकते हैं और उनके कार्य का पालन कर सकते हैं। वही लोग उनके मार्ग का पालन करते हैं, वही लोग परमेश्वर के दिये गए वचन की विरासत को पाने के योग्य हैं। यह एक ऐसी सच्चाई है जिसे कोई नकार नहीं सकता। हम सभी जानते हैं कि भले ही हम आस्थावानों के पापों को क्षमा कर दिया गया हो, लेकिन हम अभी भी शुद्ध नहीं हुए हैं; हम अभी भी पाप करते हैं और अक्सर परमेश्वर का विरोध करते हैं। "परमेश्वर ने हम से स्पष्ट रूप से कहा, "… इसलिये तुम पवित्र बनो, क्योंकि मैं पवित्र हूँ" (लैव्यव्यवस्था 11:45)। "जो मुझ से, 'हे प्रभु! हे प्रभु!' कहता है, उनमें से हर एक स्वर्ग के राज्य में प्रवेश न करेगा, परन्तु वही जो मेरे स्वर्गीय पिता की इच्छा पर चलता है" (मत्ती 7:21)। परमेश्वर के वचनों से, हम आश्वस्त हो सकते हैं कि वे सभी जिनके पापों को माफ कर दिया गया है, स्वर्ग के राज्य में प्रवेश करने के पात्र नहीं हैं। लोगों को शुद्ध होना चाहिये; स्वर्ग के राज्य में प्रवेश करने से पहले उन्हें परमेश्वर की इच्छा का कर्ता बनना चाहिए। इस सच्चाई को काटा नहीं जा सकता। जाहिर है, परमेश्वर की इच्छा को समझना उतना सरल नहीं है जितना लगता है। हमारे पापों के माफ कर दिये जाने मात्र से हम शुद्ध नहीं हो जाते। हमें पहले सत्य की वास्तविकता और परमेश्वर की प्रशंसा को पाना होगा तभी हम स्वर्ग के राज्य में प्रवेश करने योग्य होंगे। अगर हम सत्य को नहीं चाहते, बल्कि इससे ऊब चुके हैं और इससे घृणा करते हैं, अगर हम केवल पुरस्कार और मुकुट के पीछे भागते हैं परमेश्वर की इच्छा को पूरा करने की तो बात ही क्या, परमेश्वर की चिंता तक नहीं करते, तो क्या हम बुराई में लिप्त नहीं हैं? क्या प्रभु ऐसे व्यक्ति की प्रशंसा करेंगे? यदि ऐसा है, तो हम उन्हीं पाखंडी फरीसियों की तरह हैं: हालाँकि हमारे पाप माफ कर दिए गए हैं, फिर भी हम स्वर्ग के राज्य में प्रवेश नहीं कर पाते हैं। यह एक निर्विवाद तथ्य है।

चलिये संगति जारी रखते हैं। प्रभु यीशु ने हमें सभी पापों से छुटकारा दिलाया है। उन्होंने हमें किन "पापों" से मुक्त किया? प्रभु में विश्वास करना शुरू करने के बाद, हम किस तरह के पापों को स्वीकार करते हैं? जिन मुख्य पापों के बारे में बात की जाती है, ये वो वास्तविक पाप हैं जिनसे परमेश्वर की व्यवस्थाओं, आज्ञाओं या वचनों का उल्लंघन होता है। हम मनुष्यों ने परमेश्वर के नियमों और आज्ञाओं का उल्लंघन किया है। इसलिये हमें तिरस्कृत और दंडित किया जाएगा। इसीलिये प्रभु यीशु अपना उद्धार का कार्य करने के लिए आए थे। इस प्रकार, हमें केवल प्रभु यीशु से प्रार्थना करने, अपने पापों को स्वीकार करने और पश्चाताप करने की ज़रूरत है, और वे हमें पाप-मुक्त कर देंगे। उसके बाद उनकी व्यवस्था के अनुसार फिर हमें तिरस्कृत और दंडित नहीं किया जाएगा। परमेश्वर फिर हमें पापी के रूप में नहीं देखेंगे। तो हम सीधे परमेश्वर से प्रार्थना कर सकते हैं; हम परमेश्वर के सामने रो कर उनका भरपूर अनुग्रह और सत्य साझा कर सकते हैं। "उद्धार" का सही अर्थ यही है जिसकी हमने अनुग्रह के युग में अक्सर चर्चा की। इस "उद्धार" का शुद्ध होने और स्वर्ग के राज्य में प्रवेश करने से कुछ लेना-देना नहीं है। आप कह सकते हैं कि ये दो अलग चीजें हैं, क्योंकि प्रभु यीशु ने कभी नहीं कहा कि जो लोग बचाए गए हैं और पाप-मुक्त हो गए हैं, वे स्वर्ग के राज्य में प्रवेश कर सकते हैं। आइए हम सर्वशक्तिमान परमेश्वर के कुछ वचन पढ़ते हैं, "उस समय यीशु का कार्य समस्त मानव जाति का छुटकारा था। उन सभी के पापों को क्षमा कर दिया गया था जो उसमें विश्वास करते थे; जितने समय तक तुम उस पर विश्वास करते थे, उतने समय तक वह तुम्हें छुटकारा देगा; यदि तुम उस पर विश्वास करते थे, तो तुम अब और पापी नहीं थे, तुम अपने पापों से मुक्त हो गए थे। यही है बचाए जाने, और विश्वास द्वारा उचित ठहराए जाने का अर्थ। फिर भी जो विश्वास करते थे उन लोगों के बीच, वह रह गया था जो विद्रोही था और परमेश्वर का विरोधी था, और जिसे अभी भी धीरे-धीरे हटाया जाना था। उद्धार का अर्थ यह नहीं था कि मनुष्य पूरी तरह से यीशु द्वारा प्राप्त कर लिया गया था, लेकिन यह कि मनुष्य अब और पापी नहीं था, कि उसे उसके पापों से क्षमा कर दिया गया था: बशर्ते कि तुम विश्वास करते थे, तुम कभी भी अब और पापी नहीं बनोगे" ("वचन देह में प्रकट होता है" से "परमेश्वर के कार्य का दर्शन (2)" से)।

"मनुष्य को छुटकारा दिये जाने से पहले, शैतान के बहुत से ज़हर उसमें पहले से ही गाड़ दिए गए थे। हज़ारों वर्षों की शैतान की भ्रष्टता के बाद, मनुष्य के भीतर पहले ही ऐसा स्वभाव है जो परमेश्वर का विरोध करता है। इसलिए, जब मनुष्य को छुटकारा दिया गया है, तो यह छुटकारे से बढ़कर और कुछ नहीं है, जहाँ मनुष्य को एक ऊँची कीमत पर खरीदा गया है, परन्तु भीतर का विषैला स्वभाव नहीं हटाया गया है। मनुष्य जो इतना अशुद्ध है, उसे परमेश्वर की सेवा करने के योग्य होने से पहले एक परिवर्तन से होकर अवश्य गुज़रना चाहिए। न्याय और ताड़ना के इस कार्य के माध्यम से, मनुष्य अपने भीतर के गन्दे और भ्रष्ट सार को पूरी तरह से जान जाएगा, और वह पूरी तरह से बदलने और स्वच्छ होने में समर्थ हो जाएगा। केवल इसी तरीके से मनुष्य परमेश्वर के सिंहासन के सामने वापस लौटने में समर्थ हो सकता है। …यद्यपि मनुष्य को छुटकारा दिया गया है और उसके पापों को क्षमा किया गया है, फिर भी इसे केवल इतना ही माना जाता है कि परमेश्वर मनुष्य के अपराधों का स्मरण नहीं करता है और मनुष्य के अपराधों के अनुसार मनुष्य से व्यवहार नहीं करता है। हालाँकि, जब मनुष्य देह में रहता है और उसे पाप से मुक्त नहीं किया गया है, तो वह, भ्रष्ट शैतानी स्वभाव को अंतहीन रूप से प्रकट करते हुए, केवल पाप करता रह सकता है। यही वह जीवन है जो मनुष्य जीता है, पाप और क्षमा का एक अंतहीन चक्र। अधिकांश मनुष्य दिन में सिर्फ इसलिए पाप करते हैं ताकि शाम को स्वीकार कर सकें। वैसे तो, भले ही पापबलि मनुष्य के लिए सदैव प्रभावी है, फिर भी यह मनुष्य को पाप से बचाने में समर्थ नहीं होगी। उद्धार का केवल आधा कार्य ही पूरा किया गया है, क्योंकि मनुष्य में अभी भी भ्रष्ट स्वभाव है …" ("वचन देह में प्रकट होता है" से "देहधारण का रहस्य (4)" से)। सर्वशक्तिमान परमेश्वर के वचनों में इस प्रश्न का स्पष्ट उत्तर है। हम उन्हें सुनते ही समझ जाते हैं। अनुग्रह की आयु में, प्रभु यीशु ने मानवजाति को पापों से मुक्त करने के लिए ही छुटकारे का कार्य किया, आस्था के ज़रिये उन्हें धर्मी बनाया और विश्वास के ज़रिये बचाया। हालांकि, प्रभु यीशु ने कभी नहीं कहा जिस किसी के भी पापों को माफ किया गया है, वह स्वर्ग के राज्य में प्रवेश कर सकता है। क्योंकि हो सकता है प्रभु यीशु ने हमें सभी पापों से मुक्त कर दिया हो, लेकिन उन्होंने हमें हमारे शैतानी स्वभाव से मुक्त नहीं किया है। हमारा अहंकार, स्वार्थ, कपट, बुराई आदि यानी हमारा भ्रष्ट स्वभाव अभी भी शेष है। ये बातें पाप से भी गहरी हैं। इनका समाधान सरल नहीं है। अगर परमेश्वर की विरोधी शैतानी प्रकृति और भ्रष्ट स्वभाव का समाधान न किया जाए, तो हम लोग अनेक पाप कर बैठते हैं। हमसे ऐसे पाप भी हो सकते हैं जो व्यवस्था के उल्लंघन से भी बदतर हों, यानी घोर पाप। फरीसी प्रभु यीशु की निंदा और विरोध क्यों कर पाए? वे उन्हें सलीब पर कैसे चढ़ा पाए? इससे सिद्ध होता है कि अगर इंसान के शैतानी स्वभाव का समाधान न किया जाए तो इंसान अब भी पाप और परमेश्वर का विरोध कर सकता है और परमेश्वर को धोखा दे सकता है।

प्रभु में इतने बरसों के अपने विश्वास में हमने एक बात अनुभव की है, हालाँकि हम पाप-मुक्त हो चुके हैं, उसके बावजूद हम लगातार पाप करते रहते हैं। हम लोग प्रतिष्ठा और रुतबे की तलाश में झूठ बोलते हैं, कपट करते हैं और कुतर्क करते हैं। हम अपनी ज़िम्मेदारियों से बचते हैं और अपने फायदे के लिये दूसरों को मुसीबत में डाल देते हैं। जब प्राकृतिक और मानव निर्मित आपदाएं या परीक्षण और क्लेश आते हैं तो हम परमेश्वर को दोषी मानते हैं और उनसे धोखा करते हैं। जब परमेश्वर का कार्य हमारी धारणाओं के अनुरूप नहीं होता तो हम परमेश्वर को नकार देते हैं, उनकी परख और विरोध करते हैं। हालाँकि हम नाम के लिये परमेश्वर पर विश्वास करते हैं, मगर हम आदर और अनुसरण इंसान का ही करते हैं। अगर हमारे पास पदवी होती है, हम मुख्य पादरियों, धर्म-शिक्षकों और फरीसियों की तरह खुद को ऊँचा उठाते हैं और अपनी गवाही देते हैं। हम परमेश्वर की तरह पेश आते हैं और कोशिश करते हैं कि लोग हमें आदर दें और सराहना करें। हम परमेश्वर की भेंट तक चुराकर अपने लिये ले लेते हैं। हम जलने लगते हैं और अपनी पसंद-नापसंद, अपनी सनक और भावनाओं पर चलते हैं। हम अपने झंडे लगाते हैं, अपने समूह बनाते हैं और अपने छोटे राज्य स्थापित करते हैं। साफ तौर पर ये सब सच्चाई है। हम देख सकते हैं कि अगर हमारी शैतानी प्रकृति और स्वभाव नहीं सुधरते हैं तो भले ही हमारे पाप लाख बार क्षमा कर दिये जाएँ, हम स्वर्ग के राज्य में प्रवेश करने के योग्य नहीं होंगे, इस बात से कि हम अभी भी पाप और परमेश्वर का विरोध कर सकते हैं, ये ज़ाहिर होता है कि हम अब भी शैतान के अंग हैं, और परमेश्वर के दुश्मन हैं, और परमेश्वर निश्चित रूप से हमें निंदित और दंडित करेंगे। जैसा कि बाइबिल में कहा गया है, "क्योंकि सच्‍चाई की पहिचान प्राप्‍त करने के बाद यदि हम जान बूझकर पाप करते रहें, तो पापों के लिये फिर कोई बलिदान बाकी नहीं। हाँ, दण्ड का एक भयानक बाट जोहना और आग का ज्वलन बाकी है जो विरोधियों को भस्म कर देगा" (इब्रानियों 10:26-27)। आइये, परमेश्वर के और वचन पढ़ें। "तुम जैसा पापी, जिसे बस अभी अभी छुड़ाया गया है, और परिवर्तित नहीं किया गया है, या परमेश्वर के द्वारा सिद्ध नहीं किया गया है, क्या तुम परमेश्वर के हृदय के अनुसार हो सकते हो? तुम्हारे लिए, तुम जो अभी भी पुराने मनुष्यत्व के हो, यह सत्य है कि तुम्हें यीशु के द्वारा बचाया गया था, और यह कि परमेश्वर के उद्धार के कारण तुम्हें एक पापी के रूप में नहीं गिना जाता है, परन्तु इससे यह साबित नहीं होता है कि तुम पापपूर्ण नहीं हो, और अशुद्ध नहीं हो। यदि तुमने अपने आपको नहीं बदला है तो तुम संत के समान कैसे हो सकते हो? भीतर से, तुम अशुद्धता के द्वारा घिरे हुए हो, स्वार्थी एवं कुटिल हो, फिर भी तुम चाहते हो कि यीशु के साथ आओ – तुम्हें बहुत ही भाग्यशाली होना चाहिए! तुम परमेश्वर के प्रति अपने विश्वास में एक चरण में चूक गए हो: तुम्हें महज छुड़ाया गया है, परन्तु परिवर्तित नहीं किया गया है। तुम्हें परमेश्वर के हृदय के अनुसार होने के लिए, परमेश्वर को व्यक्तिगत रूप से तुम्हें बदलने एवं शुद्ध करने के कार्य को करना होगा; यदि तुम्हें सिर्फ छुड़ाया गया है, तो तुम शुद्धता को हासिल करने में असमर्थ होगे। इस रीति से तुम परमेश्वर की अच्छी आशीषों में भागी होने के लिए अयोग्य होगे, क्योंकि तुमने मनुष्य का प्रबंध करने के परमेश्वर के कार्य के एक चरण को पाने का सुअवसर खो दिया है, जो बदलने एवं सिद्ध करने का मुख्य चरण है। और इस प्रकार तुम, एक पापी जिसे बस अभी अभी छुड़ाया गया है, परमेश्वर की विरासत को सीधे तौर पर उत्तराधिकार के रूप में पाने में असमर्थ हो" ("वचन देह में प्रकट होता है" से "पद नामों एवं पहचान के सम्बन्ध में" से)। जैसा कि आप देख सकते हैं, प्रभु यीशु ने हमें केवल छुड़ाया है लेकिन फिर भी हम अपने शैतानी स्वभाव में रहते हैं, अक्सर पाप करते हैं और परमेश्वर का विरोध करते हैं। हमें अंत के दिनों में परमेश्वर के न्याय और शुद्धिकरण का अनुभव करना चाहिए ताकि हम पूरी तरह से पाप से मुक्त हो सकें और परमेश्वर के हृदय में स्थान पा सकें। तब हम स्वर्ग के राज्य में प्रवेश करने के पात्र बन सकेंगे। दरअसल, प्रभु यीशु ने एक बार कहा था, "क्योंकि मैं तुम्हारे लिये जगह तैयार करने जाता हूँ। और यदि मैं जाकर तुम्हारे लिये जगह तैयार करूँ, तो फिर आकर तुम्हें अपने यहाँ ले जाऊँगा कि जहाँ मैं रहूँ वहाँ तुम भी रहो" (यूहन्ना 14:2-3)। प्रभु हमारी ख़ातिर जगह तैयार करने के लिए वापस गए हैं और जगह तैयार करने के बाद वे हमें लेने के लिये वापस आएंगे। दरअसल "लेने आने" का अर्थ है अंत के दिनों में हमारे लिये उनका पुनर्जन्म। जब प्रभु अपना कार्य करने के लिये आएंगे तो वे हमें अपने सिंहासन के सामने ले जाएंगे। ताकि परमेश्वर के वचनों से हमारा न्याय किया जा सके, हमें शुद्ध और पूर्ण किया जा सके। आपदाओं के आने से पहले वे हमें विजेता बना देंगे। हमें प्राप्त करने की उनकी प्रक्रिया ही दरअसल हमें शुद्ध और पूर्ण बनाने का तरीका है। अब प्रभु अंत के दिनों में अपना न्याय का कार्य करने के लिए धरती पर आए हैं। हमें उनके साथ रहने के लिए उनके सिंहासन के सामने आरोहित किया गया है। क्या इससे प्रभु के हमें लेने आने की यह भविष्यवाणी पूरी तरह सही साबित नहीं होती? महाआपदाओं के समाप्त होने पर, धरती पर मसीह का राज्य स्थापित होगा। जो लोग महाआपदाओं के परिशोधन के बाद बचेंगे, वे स्वर्ग के राज्य में जगह पाएंगे।

"राज्य के सुसमाचार पर उत्कृष्ट प्रश्न और उत्तर संकलन" से

पिछला:प्रश्न 10: तुम इसका प्रमाण प्रस्तुत करते हो कि सर्वशक्तिमान परमेश्वर सत्य को अभिव्यक्त करता है और अंतिम दिनों में न्याय का अपना कार्य करता है। मुझे लगता है कि प्रभु यीशु में हमारा विश्वास और पवित्र आत्मा के कार्य की स्वीकृति का मतलब है कि हमने पहले से ही परमेश्वर के न्याय का अनुभव किया है। सबूत के तौर पर यहाँ प्रभु यीशु के वचन दिए गए हैं: "क्योंकि यदि मैं न जाऊँ तो वह सहायक तुम्हारे पास न आएगा; परन्तु यदि मैं जाऊँगा, तो उसे तुम्हारे पास भेजूँगा। वह आकर संसार को पाप और धार्मिकता और न्याय के विषय में निरुत्तर या कायल करेगा" (योहन 16:7-8)। हमारा मानना है कि, हालांकि प्रभु यीशु का कार्य छुटकारे का कार्य था, जब वह स्वर्ग तक पहुंच गया तो पेन्तेकोस्त के दिन, पवित्र आत्मा उतर आया और उसने मनुष्यों पर काम किया: "पाप और धार्मिकता और न्याय के विषय में निरुत्तर या कायल करेगा"। यह आखिरी दिनों में परमेश्वर के न्याय का कार्य होना चाहिए, इसलिए मैं जिस बात का अनुसरण करना चाहता हूँ, वो यह है कि सर्वशक्तिमान परमेश्वर द्वारा अंतिम दिनों में किए गए न्याय के कार्य और प्रभु यीशु के कार्य के बीच वास्तव में क्या भिन्नताएँ हैं?

अगला:प्रश्न 14: हम पौलुस के उदाहरण का अनुसरण करते हैं और हम प्रभु के लिए कड़ी मेहनत करते हैं, सुसमाचार फैलाते हैं और प्रभु के लिए गवाही देते हैं, और पौलुस की तरह प्रभु की कलिसियाओं की चरवाही करते हैं: "मैं अच्छी कुश्ती लड़ चुका हूँ, मैं ने अपनी दौड़ पूरी कर ली है, मैं ने विश्‍वास की रखवाली की है।" क्या यह परमेश्वर की इच्छा का अनुसरण करना नहीं है? इस तरह से अभ्यास करने का अर्थ यह होना चाहिए कि हम स्वर्गारोहित होने और स्वर्ग के राज्य में प्रवेश करने के योग्य हैं, तो हमें स्वर्ग के राज्य में लाये जाने से पहले परमेश्वर के अंतिम दिनों के न्याय और शुद्धि के कार्य को क्यों स्वीकार करना चाहिए?

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