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प्रश्न 11: तुमने प्रमाण दिया कि परमेश्वर वापस आया है और अंतिम दिनों में परमेश्वर के घर से शुरू होने वाले न्याय के कार्य को करता है। यह प्रकाशित वाक्य में लिखित महान श्वेत सिंहासन के न्याय से अलग लगता है। धर्म में ज्यादातर लोग जो सोचते हैं वो यह है कि महान श्वेत सिंहासन का न्याय उन गैर-विश्वासियों पर लक्षित होता है जो शैतान के लोग होते हैं। जब प्रभु आएगा, तो विश्वासियों को स्वर्ग में उठा लिया जाएगा, और फिर वह गैर-विश्वासियों को नष्ट करने के लिए विपत्ति को भेजेगा। यह महान श्वेत सिंहासन के सामने होने वाला न्याय है। तुम अंतिम दिनों में परमेश्वर के न्याय की शुरुआत की गवाही देते हो, लेकिन हमने परमेश्वर को गैर-विश्वासियों को नष्ट करने के लिए विपत्ति लाते हुए नहीं देखा है। तो फिर यह कैसे महान श्वेत सिंहासन का न्याय हो सकता है?

उत्तर:

वे सभी लोग जो वास्तव में बाइबल को समझते हैं जानते हैं कि प्रकाशितवाक्य की किताब में भविष्यवाणी किया गया बड़ा श्‍वेत सिंहासन का न्याय अंत के दिनों में परमेश्वर के न्याय के कार्य का एक दर्शन है। देहधारी सर्वशक्तिमान परमेश्वर, भ्रष्ट मानवजाति की शुद्धि करना और उसे बचाना शुरू करते हुए, अंत के दिनों में सत्य को व्यक्त करने और अपना न्याय का कार्य करने के लिए आया। इसका अर्थ है कि बड़े श्वेत सिंहासन का न्याय पहले ही शुरू हो चुका है। न्याय परमेश्वर के घर से शुरू होता है। परमेश्वर सबसे पहले आपदा से पूर्व विजेताओं का एक समूह बनाएगा। फिर, परमेश्वर महान आपदाएँ गिराएगा और भले लोगों को पुरस्कृत और बुरे लोगों को दंडित करना शुरू करेगा, जब तक कि यह बुरा युग नष्ट नहीं हो जाता है। अंत के दिनों में परमेश्वर के बड़े श्वेत सिंहासन का न्याय तब सर्वथा पूर्ण हो जाएगा। तब एक नया युग शुरू करने के लिए परमेश्वर खुलेआम प्रकट हो जाएगा। हम सभी इसे ठीक अभी बहुत स्पष्ट रूप से देख सकते हैं। महान आपदाओं के अपशकुन—लगातार चार रक्त चंद्रमा—पहले ही प्रकट हो चुके हैं। महान आपदाएँ नज़दीक ही हैं। जब बड़ी आपदाएँ आती हैं, तो जो कोई भी परमेश्वर का प्रतिरोध करता है, परमेश्वर की आलोचना करता है, या परमेश्वर का विरोध करता है, और दुष्ट शैतान का प्रकार है वह आपदाओं में नष्ट हो जाएगा। क्या यह निश्चित रूप से बड़े श्वेत सिंहासन का न्याय नहीं है? बाइबल की भविष्यवाणियों से हम देख सकते हैं कि प्रभु की वापसी गुप्त आगमन और स्पष्ट आगमन के दो चरणों में विभाजित है। सबसे पहले, परमेश्वर चोर की तरह आता है, जिसका अर्थ है कि अंत के दिनों में देहधारी परमेश्वर सत्य को व्यक्त करने और न्याय का अपना कार्य करने के लिए गुप्त रूप से आता है। मुख्य उद्देश्य विजेताओं का एक समूह बनाना है। यह इस भविष्यवाणी को पूरा करता है कि "न्याय अवश्य परमेश्वर के घर पर शुरू होना चाहिए"। अंत के दिनों में न्याय का परमेश्वर का कार्य पहले ही शुरू हो चुका जब देहधारी परमेश्वर सत्य को व्यक्त करने और संपूर्ण मानव जाति का न्याय करने के लिए गुप्त रूप से पहुँचा था। कार्य का पहला हिस्सा परमेश्वर के घर पर न्याय शुरू करना है। इससे, परमेश्वर उन लोगों की शुद्धि करता है और उन्हें बचाता है जो उसकी वाणी को सुनते हैं और जिन्हें उसके सामने लाया जाता है, और उन्हें विजेता बनाता है। इस प्रकार परमेश्वर का महान कार्य सम्पन्न होता है। तब महान आपदाएँ शुरू होती हैं। परमेश्वर इस पुरानी दुनिया को दंडित करने और नष्ट करने के लिए आपदा का उपयोग करेगा। इस प्रकार अंत के दिनों में न्याय का परमेश्वर का कार्य अपने चरम पर पहुँच जाता है। जब परमेश्वर बादलों पर स्पष्ट रूप से प्रकट होगा, तो न्याय का उनका कार्य सर्वथा पूरा हो चुका होगा। बाद में परमेश्वर का राज्य प्रकट होगा। इस प्रकार इससे स्वर्ग से नीचे आने वाले नए यरूशलेम की भविष्यवाणी पूरी होती है। जैसा कि सर्वशक्तिमान परमेश्‍वर कहते हैं: "परमेश्वर के कार्य का एक पहलू समस्त मानवजाति पर विजय प्राप्त करना और चुने हुए लोगों को अपने वचनों के माध्यम से प्राप्त करना है। एक अन्य पहलू है विभिन्न आपदाओं के माध्यम से विद्रोह के सभी पुत्रों को जीतना। यह परमेश्वर के बड़े-पैमाने के कार्य का एक हिस्सा है। केवल इसी तरीके से पृथ्वी पर वह राज्य जिसे परमेश्वर चाहता है, पूरी तरह से प्राप्त किया जा सकता है, और यह परमेश्वर के कार्य का हिस्सा है जो कि शुद्ध सोने की तरह है" ("वचन देह में प्रकट होता है" से "सत्रहवें कथन की व्याख्या")। सर्वशक्तिमान परमेश्‍वर के वचन अंत के दिनों के उसके न्याय के कार्य का सटीकता से खुलासा करते हैं। हम उसे बहुत आसानी से समझ सकते हैं। सर्वशक्तिमान परमेश्‍वर का अंत के दिनों का न्याय प्रकाशितवाक्य की पुस्तक की जिसकी भविष्‍यवाणी की गई थी वह महान श्वेत सिंहासन का न्याय है। सर्वशक्तिमान परमेश्‍वर के अंत के दिनों के न्याय कार्य के अनुसार, मृतक के न्याय के लिए पुस्तकों को खोलने और जीवन की पुस्तक खोलने के बारे में प्रकाशित भविष्‍यवाणी क्या है, हम यह भी समझ सकते हैं। वस्तुतः, मृतक के न्याय के लिए पुस्तकों को खोला जाना परमेश्‍वर द्वारा उन सभी का न्याय है जो उनका इनकार और विरोध करते हैं। यह न्याय उनकी निंदा, उनका दंड, उनका विनाश है। और जीवन की पुस्तक का खोला जाना उस न्याय को दर्शाता है जो परमेश्‍वर के आवास से आरंभ होता है, यानी, अंत के दिनों के मसीह, सर्वशक्तिमान परमेश्‍वर, उन सभी का न्याय करने और उन्हें शुद्ध करने के लिए सत्य व्यक्त करते हैं जो उनके सिंहासन के समक्ष लाए जाते हैं। परमेश्‍वर के ये सभी चुने हुए लोग जो सर्वशक्तिमान परमेश्‍वर के न्याय को स्वीकार करते हैं और उनके समक्ष लाए जाते हैं सभी परमेश्‍वर के न्याय, शुद्धि व उद्धार की विषय हैं। परमेश्‍वर के आवास पर जो न्याय आरंभ होता है वह लोगों के इस समूह को विपत्ति से पहले पूर्ण करने के लिए है। सिर्फ इसी समूह के लोग बुद्धिमान कुंवारियां हैं, ऐसे लोग हैं जिनके नाम जीवन की पुस्तक में दर्ज हैं, वे 144,000 विजेता जिनके बारे में प्रकाशितवाक्‍य की पुस्‍तक में भविष्‍यवाणी की गई थी, वे ऐसे लोग हैं जो अंततः शाश्वत जीवन का उत्तराधिकारी बनने के लिए स्वर्ग के राज्य में प्रवेश करेंगे। इससे प्रकाशितवाक्य 14:1-5 का भविष्यत्कथन पूर्ण होता हैः "फिर मैं ने दृष्‍टि की, और देखो, वह मेम्ना सिय्योन पहाड़ पर खड़ा है, और उसके साथ एक लाख चौवालीस हज़ार जन हैं, जिनके माथे पर उसका और उसके पिता का नाम लिखा हुआ है। और स्वर्ग से मुझे एक ऐसा शब्द सुनाई दिया जो जल की बहुत धाराओं और बड़े गर्जन का सा शब्द था, और जो शब्द मैं ने सुना वह ऐसा था मानो वीणा बजानेवाले वीणा बजा रहे हों। वे सिंहासन के सामने और चारों प्राणियों और प्राचीनों के सामने एक नया गीत गा रहे थे। उन एक लाख चौवालीस हज़ार जनों को छोड़, जो पृथ्वी पर से मोल लिये गए थे, कोई वह गीत न सीख सकता था। ये वे हैं जो स्त्रियों के साथ अशुद्ध नहीं हुए, पर कुँवारे हैं; ये वे ही हैं कि जहाँ कहीं मेम्ना जाता है, वे उसके पीछे हो लेते हैं; ये तो परमेश्‍वर के निमित्त पहले फल होने के लिये मनुष्यों में से मोल लिए गए हैं। उनके मुँह से कभी झूठ न निकला था, वे निर्दोष हैं" (प्रकाशितवाक्य 14:1-5)।

सर्वशक्तिमान परमेश्‍वर के अंत के दिनों का न्याय कार्य प्रकाशितवाक्य की पुस्तक में भविष्यत्कथन किए गए महान श्वेत सिंहासन के न्याय के दर्शन को पूरी तरह से पूर्ण करता है। महान श्वेत सिंहासन परमेश्‍वर की पवित्रता और साथ ही उनके अधिकार का प्रतीक है। तो फिर हम किस तरह से परमेश्‍वर के अधिकार को जान सकते हैं? इसके बारे में मैंने पहले कभी नहीं सोचा। यह हम सब जानते हैं। परमेश्‍वर ने स्वर्ग व पृथ्वी व समस्त वस्तुओं की अपने वचन से रचना की। वे मनुष्यजाति का मार्गदर्शन करने, उसे शुद्ध करने और बचाने, सब कुछ सम्पादित करने के लिए, अपने वचन का उपयोग करते हैं। परमात्मा का वचन उसके अधिकार का प्रतिनिधित्व करता है। जो परमेश्‍वर कहेंगे वह हो जाएगा, वे जो आदेश करेंगे वह स्थिर रहेगा। परमेश्‍वर अपने वचन जैसे ही अच्‍छे हैं, और उनके वचन सम्पादित होंगे, तथा जो सम्पादित होता है वह सदा रहता है। सर्वशक्तिमान परमेश्‍वर के अंत के दिनों का कार्य, वचन का कार्य है। परमेश्‍वर संपूर्ण विश्व को नियंत्रित करने, समस्त मानवजाति को नियंत्रित करने के लिए अपने वचन का उपयोग करते हैं। वे मनुष्य जाति का मार्गदर्शन करने, आपूर्ति करने के लिए अपने वचनों का उपयोग करते हैं, और अब मनुष्यजाति का न्याय करने तथा उसे शुद्ध करने के लिए अपने वचनों का उपयोग कर रहे हैं।

सर्वशक्तिमान परमेश्वर कहते हैं, "मेरी इच्छा है कि मैं पूरी दुनिया से लोगों को कनान की धरती पर लेकर आऊं, अत: मैं पूरे विश्व को नियंत्रित करने के लिए कनान में कथन जारी करता रहता हूं। इस समय, कनान को छोड़कर, पूरी धरती पर रोशनी नहीं है, और सभी लोग भूख और शीत से संकट में हैं" ("वचन देह में प्रकट होता है" से "सात गर्जनाएँ – भविष्यवाणी करती हैं कि राज्य के सुसमाचार पूरे ब्रह्माण्ड में फैल जाएंगे")।

"अंत में दिनों में जब परमेश्वर देहधारी होता है, तो सब कुछ सम्पन्न करने, और सब कुछ स्पष्ट करने के लिए वह मुख्य रूप से वचन का उपयोग करता है" ("वचन देह में प्रकट होता है" से "परमेश्वर के वचन के द्वारा सब कुछ प्राप्त हो जाता है")।

"परमेश्वर के मुँह के वचनों से सभी दुष्ट लोगों को ताड़ित किया जाएगा, और सभी धर्मी लोग उसके मुँह के वचनों से धन्य हो जाएँगे, और उसके मुँह के वचनों द्वारा स्थापित और पूर्ण किए जाएँगे। ना ही वह कोई चिह्न या चमत्कार दिखाएगा; सब कुछ उसके वचनों के द्वारा पूर्ण हो जाएगा, और उसके वचन तथ्यों को उत्पन्न करेंगे। पृथ्वी पर हर कोई परमेश्वर के वचनों का उत्सव मनाएगा, चाहे वे वयस्क हों या बच्चे, पुरुष, स्त्री, वृद्ध या युवा हों, सभी लोग परमेश्वर के वचनों के नीचे झुक जाएँगे" ("वचन देह में प्रकट होता है" से "सहस्राब्दि राज्य आ चुका है")।

सर्वशक्तिमान परमेश्‍वर के वचन की अभिव्यक्ति उस चमकती बिजली की तरह है जो पूर्व से सीधे पश्चिम को जाती है। यह उन सभी को शुद्ध और पूर्ण करती है जो परमेश्‍वर के सिंहासन के सम्मुख वापस आते हैं, व उन पाखंडी फरीसियों को उजागर करती है जो सत्य से घृणा करते हैं। और साथ ही उन सभी दुष्ट लोगों को भी जो परमेश्‍वर का इनकार और विरोध करते हैं। साथ ही, यह सभी अवज्ञाकारी पुत्रों को नष्ट कर देती है। अंत के दिनों में पृथ्वी पर सर्वशक्तिमान परमेश्‍वर का न्याय कार्य दर्शाता है कि परमेश्‍वर पहले से अपने सिंहासन पर बैठ कर शासन कर रहे हैं। हालांकि बुराई व अंधकार की यह पुरानी दुनिया फिलहाल अभी भी अस्तित्व में है, किन्तु ऐसी बड़ी विपत्तियाँ शीघ्र ही पड़ेंगी जो दुनिया को नष्ट कर देंगी। पृथ्वी पर ऐसी कोई भी शक्ति नहीं है जो परमेश्‍वर के राज्य को नष्ट कर सके, और ऐसी कोई भी शक्ति नहीं है जो परमेश्‍वर के कार्य को मिटा सके या उनके कार्य को आगे बढ़ने से रोक सके। परमेश्‍वर द्वारा पृथ्वी पर अपने न्याय का कार्य करने के लिए अपने अधिकार का उपयोग करना स्वर्ग में अपने सिंहासन के लिए उपयोग करने जैसा ही हैः यह ऐसा कुछ है जिसे कोई हिला नहीं सकता और कोई बदल नहीं सकता। यह एक तथ्य है। जैसा कि सर्वशक्तिमान परमेश्‍वर कहते हैं, "परमेश्वर का राज्य मानवता के मध्य विस्तार पा रहा है, यह मानवता के मध्य बन रहा है, यह मानवता के मध्य खड़ा हो रहा है; ऐसी कोई भी शक्ति नहीं है जो मेरे राज्य को नष्ट कर सके" (सम्पूर्ण ब्रह्माण्ड के लिये परमेश्वर के कथन "वचन देह में प्रकट होता है" के "उन्नीसवाँ कथन" से लिया गया)। यही परमेश्‍वर के वचन द्वारा प्रदर्शित अधिकार और शक्ति है। परमेश्‍वर के वचन का पृथ्वी पर अधिकार का उपयोग करना मसीह द्वारा पृथ्वी पर शासन करना है। यह परमेश्‍वर का पृथ्वी के अपने सिंहासन पर पहले से ही शासन करना है। यह इस बात को दर्शाने के लिए काफ़ी है कि परमेश्‍वर का राज्य पहले ही पृथ्वी पर अवतरित हो चुका है। यह ऐसा तथ्य है जिसे कोई इनकार नहीं कर सकता है। हम देखते हैं कि परमेश्‍वर की इच्छा उसी तरह पूरी तरह से पृथ्वी पर पहले ही हो जाती है जैसी यह स्वर्ग में होती है। प्रभु यीशु ने कहा था, "तेरा राज्य आए। तेरी इच्छा जैसी स्वर्ग में पूरी होती है, वैसे पृथ्वी पर भी हो" (मत्ती 6:10)। प्रकाशितवाक्य भी ये भविष्यत्कथन हैः "जब सातवें दूत ने तुरही फूँकी, तो स्वर्ग में इस विषय के बड़े बड़े शब्द होने लगे: 'जगत का राज्य हमारे प्रभु का और उसके मसीह का हो गया, और वह युगानुयुग राज्य करेगा।' तब चौबीसों प्राचीन जो परमेश्‍वर के सामने अपने अपने सिंहासन पर बैठे थे, मुँह के बल गिरकर परमेश्‍वर को दण्डवत् करके यह कहने लगे, 'हे सर्वशक्‍तिमान प्रभु परमेश्‍वर, जो है और जो था, हम तेरा धन्यवाद करते हैं कि तू ने अपनी बड़ी सामर्थ्य को काम में लाकर राज्य किया है'" ये वचन पहले ही वास्तविकता बन चुके हैं। ये सब सर्वशक्तिमान परमेश्‍वर के अंत के दिनों के न्याय के कार्य के द्वारा सम्पादित सत्य हैं।

"राज्य के सुसमाचार पर उत्कृष्ट प्रश्न और उत्तर संकलन" से

"मेरी धार्मिकता, प्रताप और न्याय शैतान के प्रति कोई दया नहीं दिखाते हैं। लेकिन तुम लोगों के लिए, वे तुम लोगों को बचाने के लिए हैं, फिर भी तुम लोग मेरे स्वभाव को समझने में अक्षम हो, न ही तुम लोग मेरे कार्यों के पीछे के सिद्धांतों को जानते हो" (आरंभ में मसीह के कथन और गवाहियाँ)। परमेश्वर के वचनों का यह अंश किसकी बात करता है? यह लोगों पर परमेश्वर की धार्मिकता, महिमा और न्याय के प्रभाव की बात करता है। वह प्रभाव क्या है? कुछ लोग इसे नहीं समझ सकते हैं। " मेरी धार्मिकता, प्रताप और न्याय शैतान के प्रति कोई दया नहीं दिखाते हैं।" इन वचनों का क्या अर्थ है? कुछ लोग कहते हैं: "इन वचनों का अर्थ यह है कि परमेश्वर की धार्मिकता, महिमा और न्याय शैतान की ओर निर्देशित होते हैं, न कि लोगों की ओर।" क्या यह व्याख्या सही है, या गलत है? (गलत।) कुछ लोग इसी तरह से इसकी व्याख्या करते हैं। यह एक गलत या बेतुकी व्याख्या है। यहां यह भी कहा गया है, "लेकिन तुम लोगों के लिए, वे तुम लोगों को बचाने के लिए हैं," इसका क्या अर्थ है? यहाँ "तुम" शब्द परमेश्वर के चुने हुए लोगों को दर्शाता है, उन सभी लोगों को जो परमेश्वर के कार्य को स्वीकार करते हैं। परमेश्वर के सभी चुने हुए लोगों के लिए और उन लोगों के लिए जो वास्तव में परमेश्वर में विश्वास करते हैं, परमेश्वर की धार्मिकता, महिमा और न्याय के क्या मायने हैं? वे उद्धार के लिए हैं। कुछ लोगों का मानना है कि यह विरोधाभासी है, उनका कहना है, "परमेश्वर की धार्मिकता, महिमा और न्याय, शैतान के प्रति कोई दया नहीं दिखाते हैं, बल्कि वे लोगों को बचाने के लिए हैं। ऐसे में सवाल उठता है कि क्या वे वाकई शैतान के लिए हैं या लोगों के लिए?" क्या इस प्रश्न को हल करना आसान है, या नहीं है? कुछ लोग इस तरह से सोच सकते हैं: "लोगों के बीच, कुछ लोगों का संबंध दुष्ट शैतान से है, और कुछ परमेश्वर के चुने हुए लोगों में से हैं जो कि उद्धार के पात्र हैं। ऐसे में, परमेश्वर की धार्मिकता, महिमा और न्याय शैतान के लिए प्रकटन, उन्मूलन या दंड हैं। परमेश्वर के चुने हुए लोगों के लिए, जो वास्तव में परमेश्वर में विश्वास करते हैं, वे पूरी तरह उद्धार के लिए, शुद्ध करने के लिए और पूर्ण करने के लिए हैं।" तो क्या यह व्याख्या सही है, या गलत? यह व्याख्या सही है। ऐसे लोगों को मार्ग मिल गया है। अब मुझे बताओ, परमेश्वर के धार्मिक, महिमामय और क्रोधपूर्ण न्याय की प्रक्रिया से किसे गुजरना चाहिए, शैतान को या परमेश्वर के चुने हुए लोगों को? (उन सभी को गुजरना चाहिए।) सभी को इसे स्वीकार करना चाहिए। किसी के लिए भी इसे अस्वीकार करना ठीक नहीं है। दूसरे शब्दों में, कोई भी इससे बच नहीं सकता; यह सच है। कुछ लोग कहते हैं, "परमेश्वर अपने वचन बोलते हैं, लेकिन न तो अविश्वासी लोग, न ही धार्मिक लोग, और न ही शैतान के लोग उन्हें सुनते या पढ़ते हैं!" अगर वे उन्हें नहीं सुनते या नहीं पढ़ते हैं, तो क्या वे परमेश्वर के न्याय और उनकी ताड़ना से बच सकते हैं? वे परमेश्वर के वचनों के न्याय और ताड़ना से बचते हैं, लेकिन क्या वे परमेश्वर के क्रोध और उनके द्वारा भेजी गई आपदाओं से बच सकते हैं? क्या वे वास्तविक तथ्यों के अनुसार न्याय और ताड़ना से बच पाते हैं? कोई भी नहीं बच सकता है। यदि तुम परमेश्वर के वचनों के न्याय और ताड़ना को स्वीकार नहीं करते हो, तो तुम्हें वास्तविक तथ्यों के न्याय और ताड़ना को स्वीकार करना होगा। तो वास्तविक तथ्यों का न्याय और ताड़ना क्या है? यह आपदा है! इस तरह, अंत के दिनों में परमेश्वर के महान सफेद सिंहासन का न्याय पहले ही शुरू हो चुका है।

परमेश्वर के वचनों का न्याय परमेश्वर के चुने हुए लोगों के लिए है। वास्तविक तथ्यों का न्याय, आपदा के रूप में न्याय और सजा अविश्वासियों के लिए है। इस तरह, न्याय के कार्य के दो पहलू हैं, जो साथ-साथ पूरे किए जाते हैं। इसे अनदेखा नहीं किया जा सकता है। कुछ लोग कहते हैं, "परमेश्वर के परिवार के चुने हुए लोग परमेश्वर के न्याय और ताड़ना के दौर से गुजर रहे हैं, लेकिन अविश्वासी लोग तो खा-पी रहे हैं और सुख भोग रहे हैं, उन्होंने परमेश्वर के न्याय और ताड़ना को स्वीकार नहीं किया है!" वास्तविक तथ्यों से उन्हें प्राप्त न्याय और ताड़ना, वचनों के न्याय और ताड़ना से भिन्न है। वचनों का न्याय और उनकी ताड़ना लंबे समय के लिए होती है, लेकिन वास्तविक तथ्यों का न्याय और उनकी ताड़ना थोड़ी देर में आ जाती है, पल भर में। जैसा कि बड़े भूकंप में होता है, जब लोग खा-पी रहे होते हैं और सुख भोग कर रहे होते हैं, अचानक, "कड़क" की आवाज़ होती है, जमीन हिलती है, लोग भागना चाहते हैं लेकिन वे भाग नहीं पाते हैं, और सब के सब मारे जाते हैं। तुम देखो, वास्तविक तथ्यों का न्याय और उनकी ताड़ना बड़ी तेजी से, क्षणिक, अचानक होती है और उनका पता लगाना मुश्किल होता है। वचनों का न्याय और उनकी ताड़ना इससे अलग है। इसकी एक कालावधि होती है। लोगों को परमेश्वर के वचनों को खाना और पीना पड़ता है। कभी-कभी लोगों ने उन्हें खाया-पिया नहीं होता, या उन्होंने खाया-पिया तो होता है लेकिन उन्हें दिल से ग्रहण नहीं किया होता है। कुछ लोगों ने उन्हें दिल से ग्रहण किया होता है लेकिन उनके न्याय का अनुभव नहीं किया होता है। इसका अनुभव न करना अस्वीकार्य है। पहली बार जब वे इसका अनुभव करते हैं, वे पालन करने में असमर्थ हो सकते हैं, उनके पास इस बारे में कोई ज्ञान या समझ नहीं होती है। कुछ कालावधि के बाद, थोड़ी-सी समझ हो जाती है और कुछ ज़्यादा समय तक अनुभव करने के बाद, वे थोड़ा और समझते हैं। थोड़ा और अनुभव करने के बाद, वे इसे अधिक अच्छी तरह से समझ सकते हैं और फिर वास्तविक पश्चाताप और वास्तविक परिवर्तन हो सकता है। यह सत्य को खोजने की प्रक्रिया है। न समझने से लेकर समझने तक की। समझ से आज्ञाकारिता आती है और आज्ञाकारिता से ज्ञान मिलता है। इस प्रक्रिया में काफी समय लगता है। परिणाम प्राप्त करने के लिए, कुछ लोगों को दस या बीस साल लगते हैं और कुछ को तो बीस से तीस साल लगते हैं। यह ऐसा ही है। जब हम परमेश्वर के वचनों के न्याय और ताड़ना का अनुभव करते हैं, तो अविश्वासी लोग क्या करते हैं? वे खाते-पीते हैं, मौज-मस्ती करते हैं, सोते हैं और सपने देखते है! जब हम पर्याप्त न्याय और ताड़ना से गुजर कर शुद्ध हो चुके होते हैं, जब हम परमेश्वर की स्तुति और प्रशंसा करना शुरू करते हैं, जब परमेश्वर के लोग परमेश्वर द्वारा पूर्ण किये जाते हैं, तब जाकर अविश्वासियों के लिए आपदा झेलने का समय आता है। और एक बार जब आपदा आ जाती है, तो यह उनकी मृत्यु का समय होगा! क्या अंत के दिनों में परमेश्वर के महान सफेद सिंहासन का न्याय और ताड़ना इस तरह की है? (हाँ।) अब तुम समझ चुके हो, "यही महान सफेद सिंहासन का न्याय है! वचनों का न्याय और उनकी ताड़ना आंतरिक होती है और आपदा का आना और उसकी सजा बाहरी होती है। जो लोग परमेश्वर पर विश्वास नहीं करते हैं और जो लोग परमेश्वर का विरोध करते हैं, उन सभी को आपदा में मरना होगा।" वचनों के आंतरिक न्याय और ताड़ना तथा आपदाओं की बाहरी सजा के बीच का कालिक संबंध क्या है? समकालिक। अविश्वासियों को भी अब सभी प्रकार की आपदाएं झेलनी होती हैं, लेकिन वे इतनी बड़ी नहीं हैं, न ही उन्हें विनाशकारी आपदाओं की श्रेणी में रखा जाता है। जब परमेश्वर के चुने हुए लोगों को पूर्ण कर दिया जाता है, जब विजेताओं का एक समूह दिखाई देता है, तो "कड़क" की आवाज़ के साथ, विनाश उतर आएगा। एक बार जब यह उतरता है तो यह विनाशकारी आपदा, अविश्वासियों से निपटने के लिए इस्तेमाल होने वाला न्याय और उनकी ताड़ना होगी। यह न्याय और ताड़ना क्रोध और महिमा से भरपूर है!

जीवन में प्रवेश पर धर्मोपदेश और संगति से (श्रृंखला 121)

पिछला:प्रश्न 10: तुम इसका प्रमाण प्रस्तुत करते हो कि सर्वशक्तिमान परमेश्वर सत्य को अभिव्यक्त करता है और अंतिम दिनों में न्याय का अपना कार्य करता है। मुझे लगता है कि प्रभु यीशु में हमारा विश्वास और पवित्र आत्मा के कार्य की स्वीकृति का मतलब है कि हमने पहले से ही परमेश्वर के न्याय का अनुभव किया है। सबूत के तौर पर यहाँ प्रभु यीशु के वचन दिए गए हैं: "क्योंकि यदि मैं न जाऊँ तो वह सहायक तुम्हारे पास न आएगा; परन्तु यदि मैं जाऊँगा, तो उसे तुम्हारे पास भेजूँगा। वह आकर संसार को पाप और धार्मिकता और न्याय के विषय में निरुत्तर या कायल करेगा" (योहन 16:7-8)। हमारा मानना है कि, हालांकि प्रभु यीशु का कार्य छुटकारे का कार्य था, जब वह स्वर्ग तक पहुंच गया तो पेन्तेकोस्त के दिन, पवित्र आत्मा उतर आया और उसने मनुष्यों पर काम किया: "पाप और धार्मिकता और न्याय के विषय में निरुत्तर या कायल करेगा"। यह आखिरी दिनों में परमेश्वर के न्याय का कार्य होना चाहिए, इसलिए मैं जिस बात का अनुसरण करना चाहता हूँ, वो यह है कि सर्वशक्तिमान परमेश्वर द्वारा अंतिम दिनों में किए गए न्याय के कार्य और प्रभु यीशु के कार्य के बीच वास्तव में क्या भिन्नताएँ हैं?

अगला:प्रश्न 13: बाइबल कहती है: "क्योंकि धार्मिकता के लिये मन से विश्‍वास किया जाता है, और उद्धार के लिये मुँह से अंगीकार किया जाता है" (रोमियों 10:10)। हम मानते हैं कि प्रभु यीशु ने हमारे पापों को क्षमा कर दिया है और विश्वास के द्वारा हमें धर्मी बना दिया है। इसके अलावा, हम मानते हैं कि अगर किसी को एक बार बचाया जाता है, तो वे हमेशा के लिए बचा लिए जाते हैं, और जब परमेश्वर वापस आएगा तो हम तुरंत स्वर्गारोहण कर जाएँगे और स्वर्ग के राज्य में प्रवेश करेंगे। तो तुम क्यों प्रमाण दे रहे हो कि बचाए जाने और स्वर्ग के राज्य में लाये जाने से पहले हमें आखिरी दिनों के परमेश्वर के न्याय को स्वीकार करना चाहिए?