प्रश्न 1: हमारा मानना है कि परमेश्वर की वापसी का अर्थ है कि विश्वासियों को सीधे स्वर्ग के राज्य में उठा लिया जाता है, क्योंकि यह बाइबल में लिखा हुआ है: "तब हम जो जीवित और बचे रहेंगे उनके साथ बादलों पर उठा लिये जाएँगे कि हवा में प्रभु से मिलें; और इस रीति से हम सदा प्रभु के साथ रहेंगे" (1 थिस्सलुनीकियों 4:17)। तुम प्रमाणित कर रहे हो कि प्रभु यीशु वापस आ गया है, तो हम अब पृथ्वी पर क्यों हैं और अभी तक स्वर्गारोहित क्यों नहीं हुए हैं?

उत्तर:

हमें प्रभु की उन भविष्यवाणियों के आधार पर उसकी वापसी की आशा करनी चाहिए जो उसने खुद की थी। यह प्रभु की वापसी का इंतज़ार करने का सबसे मानक तरीका है। आप दरअसल किसे उद्धृत कर रहे हैं? आप प्रभु के वचनों को उद्धृत कर रहे हैं या इंसानों के वचनों का? "तब हम जो जीवित और बचे रहेंगे उनके साथ बादलों पर उठा लिये जाएँगे कि हवा में प्रभु से मिलें," ये बात किसने कही? क्या वे प्रभु यीशु के वचन हैं? प्रभु यीशु ने ऐसी बात कभी नहीं कही। न ही पवित्र आत्मा ने कभी ऐसा कहा। तुम जिन वचनों पर विश्वास करते हो और जिन बातों को उद्धृत करते हो, वे पौलुस के वचन हैं। क्या पौलुस के वचन प्रभु यीशु के वचनों का प्रतिनिधित्व करते हैं? क्या वह परमेश्वर का प्रतिनिधित्व कर सकता है? इस रहस्य का जवाब सिर्फ परमेश्वर ही जानता है। अगर हम भ्रष्ट इंसान आँख मूँदकर इस तरह व्याख्या करने और अनुमान लगाने का साहस करेंगे तो यह एक समस्या गंभीर है। पौलुस मसीह नहीं था। वह सिर्फ एक सामान्य भ्रष्ट व्यक्ति था। उसका लेखन अशुद्ध इंसानी विचारों और कल्पनाओं से भरा हुआ है। चूँकि उसके वचन सत्य नहीं हैं, इसलिए हम सबूत के तौर पर उनका उपयोग नहीं कर सकते हैं। सारे सबूत बाइबिल में परमेश्वर के वचनों पर आधारित होने चाहिए। वह सत्य के अनुरूप है। बाइबल में लोगों के, विशेष रूप से पौलुस के, वचनों के आधार पर, और न कि प्रभु यीशु के वचनों के आधार पर, स्वर्गारोहण और स्वर्ग के राज्य में प्रवेश की जाँच करना ग़लत है, क्योंकि केवल प्रभु यीशु के वचन ही सत्य हैं; सिर्फ उनके वचनों में ही अधिकार है। केवल प्रभु यीशु ही मसीह, स्वर्गिक राज्य का सम्राट है। तुम प्रभु यीशु के वचनों में सत्य और परमेश्वर की इच्छा की खोज क्यों नहीं करते हो? उसके बजाय तुम अपनी खोज का आधार इंसान के वचनों को क्यों बनाते हो? क्या यह परमेश्वर की इच्छा के अनुसार है? इससे तुम्हारा झुकाव इंसान का अनुसरण करने और अपने खुद के रास्ते पर चलने की ओर होने लगता है। परमेश्वर ने इंसान को मिट्टी से बनाया है। उसने इंसान को धरती पर अपने कर्तव्य को निभाने और अपने बाकी सभी सृजित जीवों के प्रबंधन का भार सौंपा। उसने माँग की कि वे उसकी आज्ञा मानें, उनकी आराधना और सम्मान करें और यह अधिदेश दिया कि उनका स्थान धरती पर है, न कि स्वर्ग में। इसके अलावा, परमेश्वर ने हमें बहुत पहले ही बता दिया था कि वह अपना राज्य धरती पर स्थापित करेगा। इसके अलावा, वह हम इंसानों के साथ धरती पर रहेगा और धरती के राज्य मसीह द्वारा शासित राज्यों में अवश्य रूपान्तरित कर बदल दिए जाएँगे। इसलिए, परमेश्वर का राज्य अंततः धरती पर स्थापित हो जाएगा, न कि स्वर्ग में। बहुत से लोग हमेशा चाहते हैं कि उन्हें स्वर्ग में उठाया जाए। यह उनकी अपनी धारणा और कल्पनाएँ, उनकी अपनी ख़्याली इच्छाएँ हैं। यह सत्य या परमेश्वर के कार्य की सच्चाई के अनुसार बिल्कुल भी नहीं है।

आइये देखें प्रभु यीशु ने क्या कहा है: "हे हमारे पिता, तू जो स्वर्ग में है; तेरा नाम पवित्र माना जाए। तेरा राज्य आए। तेरी इच्छा जैसी स्वर्ग में पूरी होती है, वैसे पृथ्वी पर भी हो" (मत्ती 6:9-10)। प्रभु यीशु ने हमें साफ़ तौर पर बताया है परमेश्वर का राज्य धरती पर है, न कि स्वर्ग में। परमेश्वर की इच्छा जैसी स्वर्ग में है वैसी ही धरती पर पूरी की जाएगी। आइये प्रकाशितवाक्य 21:2-3 पढ़ें: "फिर मैं ने पवित्र नगर नये यरूशलेम को स्वर्ग से परमेश्‍वर के पास से उतरते देखा...। देख, परमेश्‍वर का डेरा मनुष्यों के बीच में है। वह उनके साथ डेरा करेगा, और वे उसके लोग होंगे, और परमेश्‍वर आप उनके साथ रहेगा और उनका परमेश्‍वर होगा।" आइये प्रकाशितवाक्य 11:15 पढ़ें: "जगत का राज्य हमारे प्रभु का और उसके मसीह का हो गया, और वह युगानुयुग राज्य करेगा।" इन भविष्यवाणियों में लिखा है, "परमेश्‍वर का डेरा मनुष्यों के बीच में है," "... नये यरूशलेम को स्वर्ग से परमेश्‍वर के पास से उतरते देखा," "जगत का राज्य हमारे प्रभु का और उसके मसीह का हो गया।" इससे सिद्ध होता है कि परमेश्वर अपना राज्य धरती पर बनाएगा, और धरती पर इंसान के साथ रहेगा। धरती के सभी राज्य मसीह के राज्य हो जाएँगे, और वे हमेशा बने रहेंगे। अगर हम अपनी धारणाओं और कल्पनाओं के आधार पर मानते हैं कि परमेश्वर का राज्य स्वर्ग में है, और मानते हैं कि जब प्रभु आएगा तो हमें स्वर्ग में ले जाएगा, तो क्या उसके पहले के वचन बेकार नहीं हो जाएँगे? हकीकत में, मानवता को बचाने की परमेश्वर की प्रबंधन योजना का अंतिम परिणाम परमेश्वर के राज्य को धरती पर स्थापित करना है। सर्वशक्तिमान परमेश्वर—अंत के दिनों का मसीह—धरती पर विजेताओं का एक समूह बनाने के लिए मानवजाति का न्याय करने और उसे शुद्ध करने का कार्य करता है। जो लोग परमेश्वर का उद्धार प्राप्त करते हैं, सिद्ध बना दिये जाते हैं और विजेता बन जाते हैं, वे ऐसे लोग होते हैं जो परमेश्वर के वचनों का अभ्यास कर सकते हैं और धरती पर उसके मार्ग का अनुसरण कर सकते हैं। वे उसके राज्य के लोग होते हैं। इन विजेताओं को बना दिए जाने के बाद, धरती पर परमेश्वर की इच्छा पूरी हो जाएगी। तब धरती पर मसीह का राज्य स्थापित हो जाएगा और परमेश्वर पूरी महिमा को प्राप्त करेगा। अंत में, वह प्रकाशित-वाक्य की पुस्तक की भविष्यवाणियों को पूरा करेगा। क्या इन तथ्यों पर हम लोग अभी स्पष्ट नहीं हैं? प्रभु यीशु ने हमारे लिये कौन-सी जगह तैयार की है? उसने आदेश दिया कि हम लोगों को अंत के दिनों में पैदा होना है, उसके वापस आने पर उससे मिलना है, परमेश्वर के शुद्धिकरण को स्वीकार करना है और सिद्ध होना है, और विजेता बनना है ताकि हम लोग परमेश्वर की इच्छा को पूरा कर सकें, और धरती के सभी राज्यों को मसीह का राज्य बनाया जाएगा। यह परमेश्वर की इच्छा है। परमेश्वर धरती पर आता है किन्तु हम लोग स्वर्ग में जाने की कोशिश करते हैं। ऐसा करके, क्या हम परमेश्वर के कार्य और उसकी इच्छा के विरुद्ध नहीं जा रहे हैं? अगर वह हमें हवा में ऊपर उठा दे, तो सोचो, वहाँ न तो भोजन है, न रहने की जगह है, हम लोग ज़िंदा कैसे रहेंगे? क्या ये सब हमारी अपनी धारणाएँ और कल्पनाएँ नहीं हैं? क्या परमेश्वर इस तरह का कुछ करेगा? यह तथ्य कि हम उस तरह से सोच सकते हैं, दर्शाता है कि हम वाकई बचकाने हैं। हम लोग बस अपने ही ख़्यालों में जीते हैं!

परमेश्वर का राज्य पृथ्वी पर अंत के दिनों में बनाया जाएगा। मानवजाति की आखिरी मंज़िल धरती पर होगी, स्वर्ग में नहीं। यह परमेश्वर द्वारा तय कर दिया है। सर्वशक्तिमान परमेश्वर कहते हैं, "जब परमेश्वर और मनुष्य दोनों एक साथ विश्राम में प्रवेश करेंगे, तो इसका अर्थ होगा कि मानवता को बचा लिया गया है और शैतान का विनाश हो चुका है, कि मनुष्यों के बीच परमेश्वर का कार्य पूरी तरह समाप्त हो गया है। परमेश्वर मनुष्यों के बीच अब और कार्य नहीं करता रहेगा और वे वेअब शैतान के अधिकार क्षेत्र में और नहीं रहेंगे। वैसे तो, परमेश्वर अब और व्यस्त नहीं रहेगा और मनुष्य लगातार गतिमान नहीं रहेंगे; परमेश्वर और मानवता एक साथ विश्राम में प्रवेश करेंगे। परमेश्वर अपने मूल स्थान पर लौट जाएगा और प्रत्येक व्यक्ति अपने-अपने स्थान पर लौट जाएगा। ये वे गंतव्य हैं, जहाँ परमेश्वर का समस्त प्रबंधन पूरा होने पर परमेश्वर और मनुष्य रहेंगे। परमेश्वर के पास परमेश्वर की मंज़िल है, और मानवता के पास मानवता की। विश्राम करते समय, परमेश्वर पृथ्वी पर सभी मनुष्यों के जीवन का मार्गदर्शन करता रहेगा, जबकि वे उसके प्रकाश में, स्वर्ग के एकमात्र सच्चे परमेश्वर की आराधना करेंगे। परमेश्वर अब मानवता के बीच और नहीं रहेगा, न ही मनुष्य परमेश्वर के साथ उसके गंतव्य में रहने में समर्थ होंगे। परमेश्वर और मनुष्य दोनों एक ही क्षेत्र के भीतर नहीं रह सकते; बल्कि दोनों के जीने के अपने-अपने तरीक़े हैं। परमेश्वर वह है, जो समस्त मानवता का मार्गदर्शन करता है और समस्त मानवता परमेश्वर के प्रबंधन-कार्य का ठोस स्वरूप है। मनुष्य वे हैं, जिनकी अगुआई की जाती है और वे परमेश्वर के सार के समान नहीं हैं। 'विश्राम' का अर्थ है अपने मूल स्थान में लौटना। इसलिए, जब परमेश्वर विश्राम में प्रवेश करता है, तो इसका अर्थ है कि परमेश्वर अपने मूल स्थान में लौट जाता है। वह पृथ्वी पर अब और नहीं रहेगा, या मानवता की ख़ुशियाँ या उसके दु:ख साझा नहीं करेगा। जब मनुष्य विश्राम में प्रवेश करते हैं, तो इसका अर्थ है कि वे सृष्टि की सच्ची वस्तु बन गए हैं; वे पृथ्वी से परमेश्वर की आराधना करेंगे और सामान्य मानवीय जीवन जिएंगे। लोग अब और परमेश्वर की अवज्ञा या प्रतिरोध नहीं करेंगे और वे आदम और हव्वा के मूल जीवन की ओर लौट जाएंगे। विश्राम में प्रवेश करने के बाद ये परमेश्वर और मनुष्य के अपने-अपने जीवन और गंतव्य होंगे। परमेश्वर और शैतान के बीच युद्ध में शैतान की पराजय अपरिहार्य प्रवृत्ति है। इसी तरह, अपना प्रबंधन-कार्य पूरा करने के बाद परमेश्वर का विश्राम में प्रवेश करना और मनुष्य का पूर्ण उद्धार और विश्राम में प्रवेश अपरिहार्य प्रवृत्ति बन गए हैं। मनुष्य के विश्राम का स्थान पृथ्वी है और परमेश्वर के विश्राम का स्थान स्वर्ग में है। जब मनुष्य विश्राम में परमेश्वर की आराधना करते हैं, वे पृथ्वी पर रहेंगे और जब परमेश्वर बाकी मानवता को विश्राम में ले जाएगा, वह स्वर्ग से उनका नेतृत्व करेगा न कि पृथ्वी से" ("वचन देह में प्रकट होता है" में 'परमेश्वर और मनुष्य साथ-साथ विश्राम में प्रवेश करेंगे')। सर्वशक्तिमान परमेश्वर ने हमें साफ तौर से बताया है कि जब उसका प्रबंधन कार्य पूरा हो जाएगा, तो परमेश्वर और इंसान दोनों विश्राम में प्रवेश करेंगे। परमेश्वर का विश्राम-स्थल स्वर्ग में है, जबकि हम इंसानों का विश्राम-स्थल अभी भी धरती पर है। लेकिन तब, परमेश्वर बचे हुए लोगों की धरती पर रहने के लिए अगुवाई करेगा। यह एक सुन्दर मंज़िल है जो हम इंसानों के लिए परमेश्वर ने बनाई है। यह भी धरती पर पूरा हुआ परमेश्वर का राज्य है। अगर हम परमेश्वर में कई सालों से विश्वास करते हैं, लेकिन फिर भी यह देख नहीं पाते हैं, तो क्या इसके मायने यह नहीं है कि हम सत्य को या परमेश्वर के वचनों को नहीं समझते हैं?

अच्छा तो, ये स्वर्गारोहण दरअसल है क्या? ज़्यादातर लोग इस बारे बहुत स्पष्ट नहीं हैं। संतों के स्वर्गारोहण का राज़ केवल तभी उजागर हुआ जब सर्वशक्तिमान परमेश्वर का आगमन हुआ। सर्वशक्तिमान परमेश्वर कहते हैं, "'उठाया जाना' निचले स्थान से किसी ऊँचे स्थान पर ले जाया जाना नहीं है जैसा कि लोग सोच सकते हैं; यह एक बहुत बड़ी मिथ्या धारणा है। 'उठाया जाना' मेरे द्वारा पूर्वनियत और फिर चयनित किए जाने को इंगित करता है। यह उन सभी के लिए है जिन्हें मैंने पूर्वनियत और चयनित किया है। उठाए गए लोग वे सभी लोग हैं जिन्होंने पहलौठे पुत्रों या पुत्रों का स्तर प्राप्त कर लिया है या जो परमेश्वर के लोग हैं। यह लोगों की धारणाओं के बिलकुल भी संगत नहीं है। वे सभी लोग जिन्हें भविष्य में मेरे घर में हिस्सा मिलेगा, ऐसे लोग हैं जो मेरे सामने उठाए जा चुके हैं। यह एक सम्पूर्ण सत्य है, कभी न बदलने वाला और जिसे झुठलाया नहीं जा सकता। यह शैतान के विरुद्ध एक जवाबी हमला है। जिस किसी को भी मैंने पूर्वनियत किया है, वह मेरे सामने उठाया जाएगा" ("वचन देह में प्रकट होता है" में 'आरंभ में मसीह के कथन' के 'अध्याय 104')। सर्वशक्तिमान परमेश्वर के वचन बहुत स्पष्ट हैं। "उठा लिये जाने" का अर्थ वह नहीं है जो हम सोचते हैं—धरती से हवा में उठा लिया जाना और बादलों पर प्रभु से मिलना। न ही इसका अर्थ स्वर्ग में ले जाया जाना है। इसका अर्थ है कि जब परमेश्वर धरती पर अपने वचनों को बोलने और अपना कार्य करने केलिए वापस आएगा, तो हम लोग उसकी वाणी को सुनेंगे और अंत के दिनों में उसका अनुसरण और उसके कार्य का पालन कर पाएँगे। परमेश्वर के सिंहासन के सामने उठाए जाने का यही सच्चा अर्थ है। वे सभी जो लोग प्रभु की वाणी में विभेद कर पाते हैं, सर्वशक्तिमान परमेश्वर के वचनों में सत्य ढूँढ पाते हैं, सत्य को स्वीकार कर पाते हैं और सर्वशक्तिमान परमेश्वर की ओर लौट पाते हैं, वे बुद्धिमान कुँवारियाँ हैं। वे लोग सोना, चाँदी और बेशकीमती रत्न हैं, जिन्हें प्रभु ने "चुरा" कर परमेश्वर के भवन में लौटा दिया है क्योंकि वे सभी अच्छी क्षमता वाले हैं और सत्य को समझ और स्वीकार कर सकते हैं। वे लोग परमेश्वर की वाणी को समझ सकते हैं। उन्हीं लोगों ने सही मायने में स्वर्गारोहण पाया है। वे ऐसे विजेता हैं, जो तब बनाए जाते हैं जब परमेश्वर अंत के दिनों में चुपचाप धरती पर उतर कर अपना कार्य करता है। जब से सर्वशक्तिमान परमेश्वर ने अपना अंत के दिनों का कार्य शुरू किया है, तब से, ज़्यादा से ज़्यादा ऐसे लोगों ने जिनमें परमेश्वर के प्रकटन की प्यास है, सर्वशक्तिमान परमेश्वर के वचनों में उनकी वाणी को पहचाना है। एक के बाद एक करके, उन्होंने परमेश्वर के अंत के दिनों के न्याय के कार्य को स्वीकार किया है। परमेश्वर से रूबरू मिलने के लिए उन्हें उसके सिंहासन के सामने उठा लिया गया है और उन्होंने परमेश्वर के वचनों से सिंचाई और पोषण को स्वीकार कर लिया है। उन्होंने परमेश्वर का सच्चा ज्ञान पा लिया है। उनका भ्रष्ट स्वभाव शुद्ध कर दिया गया है और वे लोग परमेश्वर के वचनों के सत्य को जी पाते हैं। उन्हें पहले ही परमेश्वर का भरपूर उद्धार प्राप्त हो गया है। इन लोगों को महाविपदा आने से पहले विजेता बना दिया गया है। वे लोग परमेश्वर द्वारा प्रथम-फल के रूप में प्राप्त कर लिए गए हैं। जो लोग अपनी धारणाओं और कल्पनाओं से चिपके हुए हैं और आँखें मूँद कर प्रभु के आने और उन्हें स्वर्ग में ले जाए जाने का इंतज़ार कर रहे हैं, जो अंत के दिनों के परमेश्वर के न्याय को नकारते हैं, वे मूर्ख कुँवारियाँ हैं। वे ऐसे लोग हैं जिनका परमेश्वर द्वारा परित्याग कर दिया जाएगा। ऐसे लोगों की नियति है कि वे महाविपदा में तड़पेंगे; वे रोएँगे और अपने दाँतों को पीसेंगे। यह सच है।

— 'राज्य के सुसमाचार पर विशिष्ट प्रश्नोत्तर' से उद्धृत

हमें "स्वर्गारोहण" को कैसे समझना चाहिए? हम "स्वर्गारोहण" का उपयोग यह समझाने के लिए करते हैं कि परमेश्वर कैसे मनुष्य को इस स्थिति से और इस अधिकार-क्षेत्र के तहत बचाता है, और उस स्थिति में और उस अधिकार-क्षेत्र के तहत उसे रख देता है। हालांकि, जब भी लोग "स्वर्गारोहण" के बारे में सोचते हैं, तो वे इसे केवल हवा में ऊपर उठाया जाना ही समझते हैं। क्या यह गलत नहीं है? उदाहरण के लिए, यदि तुम एक पिछड़े, दूर-दराज गांव में पैदा हुए थे और बाद में तुम्हें एक बड़े शहर में कार्य करने के लिए नियुक्त किया जाता है, तो हम इंसानों की भाषा में इसे एक दूर-दराज गांव से उठाकर एक बड़े शहर में कार्य करने और रहने के लिए भेज देना ही कहेंगे। क्या यही "ऊपर उठाये जाने" का अर्थ नहीं है? क्या इस तरह उठाया जाना हवा में ऊपर उठाये जाने से अलग है, जैसा कि मनुष्य कल्पना करता है? इनमें से कौन-सी बात यथार्थ है? इसी कारण से हम कहते हैं कि "स्वर्गारोहण" का अर्थ एक प्रकार की स्थिति से उठाकर दूसरी तरह की स्थिति में रखा जाना है—यही ऊपर उठना है! यहाँ उठाये जाने का मतलब जमीन के ऊपर ऊंचा उठाया जाना, अर्थात जमीन से आकाश में उठा लिया जाना नहीं है। इसके बजाए, इसका तात्पर्य एक उच्चतर स्तर पर, एक उच्चतर स्थिति में, एक उच्चतर श्रेणी के स्थान पर उन्नत किया जाना है। यही ऊपर उठना है। उदाहरण के लिए, हम मूल रूप से भ्रष्ट मानवजाति के निम्नतम स्तर पर किसान और श्रमिक थे, हमारी कोई सामाजिक प्रतिष्ठा नहीं थी, हम दूसरों के द्वारा तुच्छ समझे जाते थे, दमन और शोषण से पीड़ित थे, हमें कुछ भी बोलने का अधिकार नहीं था, और अब अचानक एक ही बार में हम राज्य के युग के लोग के रूप में उठा दिए गए हैं, क्या इस स्थिति का होना ऊपर उठाया जाना नहीं है? मूल रूप से, हम भ्रष्ट इंसान थे, हम इस अंधकारमय, बुरे संसार में मानव जाति के निम्नतम स्तर पर थे, और अब अचानक हम स्वर्गारोहण में परमेश्वर के राज्य की प्रजा की तरह, राज्य के युग के नागरिकों के रूप में, उठा दिए गए हैं। अगर हम राज्य के युग की प्रजा बनने के लिए उठाए गए हैं, तो क्या यह स्वर्गारोहण नहीं है? यही असली स्वर्गारोहण है। खैर, कुछ लोग कहते हैं: "क्या मैं अभी भी वहीं नहीं रहता हूँ? क्या मैं अभी भी वही कार्य नहीं कर रहा हूँ? क्या ऐसा नहीं कि मैं जो खाता और पहनता था, वो भी बिलकुल नहीं बदला है? ऐसा कैसे है कि मुझे नहीं लगता कि मैं ऊँचा उठा हूँ?" तुम स्वर्गारोहण में ऊपर उठाये गए हो या नहीं, यह इससे निर्धारित नहीं किया जा सकता कि तुम कितना उल्लसित या ओछा महसूस करते हो। जब इस सच्चाई के सामने आने का दिन आएगा, तो वे जिन्हें तुम ऊंचे लोग मानते हो, हटा दिए जाएँगे और फिर भी तुम यह सोच सकते हो कि तुमको कुछ भी हासिल नहीं हुआ है, तुम अपनी ज़िंदगी जीते रहोगे; तुम इस स्थिति को कैसे समझाओगे? राज्य की प्रजा का यह अर्थ सही है, है ना? एक दिन आएगा जब यह तथ्य सत्यापित किया जाएगा। उस समय तुम कहोगे: "ओह, मुझे वाकई स्वर्गारोहण में ऊपर उठाया गया है, लेकिन मुझे इसके बारे में बोध नहीं है, परमेश्वर का कार्य कितना अद्भुत है।" अगर लोगों के पास सच्चाई नहीं है, तो लोग इस स्वर्गारोहण से अनजान होंगे, वे अनुग्रह को समझे बिना अनुग्रह में रहेंगे। यही स्वर्गारोहण का व्यावहारिक अर्थ है; तुमको इसे समझना चाहिए। परमेश्वर तुम्हारी रक्षा करता है और तुम पर कोई विपदा नहीं आएगी; क्या इससे पता नहीं चलता है कि अब तुम पहले से ही स्वर्गारोहण में उठाये जा चुके हो, कि तुम परमेश्वर के चुने हुए लोग, राज्य के युग की प्रजा हो? क्या तुम इस प्रश्न को समझा सकते हो? एक दिन तुम स्वीकार करोगे कि "यह एक सच्चाई है, मेरी स्थिति निश्चित रूप से अलग है। हालांकि दुनिया के लोग मुझे अभी भी एक मजदूर या एक किसान मानते हैं, परमेश्वर की दृष्टि में मैं राज्य के युग का एक व्यक्ति हूँ; इसलिए मैं वास्तव में स्वर्गारोहण में उठाया गया हूँ और मैं पहले से ही स्वर्गारोहण के अनुग्रह का आनंद ले रहा हूँ।" यही स्वर्गारोहण का व्यावहारिक अर्थ है। अगर तुम्हें यह समझ नहीं आता है कि स्वर्गारोहण किसे कहा जाता है और तुम अपनी कल्पना पर भरोसा करते हुए, यही मानते हो कि स्वर्गारोहण का अर्थ हवा में ऊपर उठाया जाना है, तो ठीक है, तुम बस हवा में उठाये जाने का इंतज़ार करते रहो।

— ऊपर से संगति से उद्धृत

पिछला: 3. परमेश्वर की इच्छा का अनुसरण करने वाला व्यक्ति कैसा होता है, और परमेश्वर में विश्वास की सच्ची गवाही क्या है

अगला: प्रश्न 2: तुम यह प्रमाणित करते हो कि परमेश्वर ने देहधारण किया है और अंतिम दिनों में न्याय का कार्य करने के लिए मनुष्य का पुत्र बन चुका है, और फिर भी अधिकांश धार्मिक पादरी और प्राचीन लोग इस बात की पुष्टि करते हैं कि परमेश्वर बादलों के साथ लौटेगा, और वे इसका आधार मुख्यतः बाइबल की इन पंक्तियों पर रखते हैं: "यही यीशु ... जिस रीति से तुम ने उसे स्वर्ग को जाते देखा है उसी रीति से वह फिर आएगा" (प्रेरितों 1:11)। "देखो, वह बादलों के साथ आनेवाला है, और हर एक आँख उसे देखेगी" (प्रकाशितवाक्य 1:7)। और इसके अलावा, धार्मिक पादरियों और प्राचीन लोगों ने हमें यह भी निर्देश दिया है कि कोई भी प्रभु यीशु जो बादलों के साथ नहीं आता है, वह झूठा है और उसे छोड़ दिया जाना चाहिए। इसलिए हम निश्चित नहीं हो पा रहे हैं कि यह नज़रिया बाइबल के अनुरूप है या नहीं; इसे सच मान लेना उचित है या नहीं?

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