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1. पथभ्रष्ट होकर फिर से सन्मार्ग पर वापस आना

झियाओबिंग झुयान्हौ शहर, अनहुई प्रान्त

"जिसका तुम आज आनन्द उठा रहे हो यही वह चीज़ है जो तुम्हारे भविष्य को बर्बाद कर रही है, जबकि वह दर्द जिसे तुम आज सह रहे हो वही ऐसी चीज़ है जो तुम्हारी सुरक्षा कर रही है। तुम्हें उसके प्रति स्पष्ट रूप से जागरूक अवश्य हो जाना चाहिए ताकि प्रलोभन के काँटे से दूर रहा जाए और उस घने कोहरे में प्रवेश करने से बचा जाए जो धूप को रोक देता है।" जब जब मैं परमेश्वर के वचनों का यह गीत गाता हूँ, "सांसारिक सुखों का आनंद तुम्हारे भविष्य को तहस नहस कर देगा"; तब तब मेरे मन मेँ यह विचार आता है कि परमेश्वर को पाकर भी किस तरह मैंने उनकी परीक्षा ली और उनके साथ विश्वासघात किया, और फिर मुझे काफी पश्चाताप और अविस्मरणीय कृतज्ञता- दोनों का साथ साथ अनुभव होता है।

1997 मेँ, मैंने सर्वशक्तिमान परमेश्वर के अंत के दिनों के कार्य को स्वीकार किया था, और जल्दी ही मैंने पूरे उत्साह के साथ अपने आपको धर्म प्रचार के कार्य में झोंक दिया, और परमेश्वर के सम्मुख मैंने यह संकल्प लिया कि उनकी संतुष्टि के लिए बिना किसी अवरोध के उनके प्रति स्वयं को समर्पित कर दूंगा। लेकिन जब परमेश्वर के कार्य मेँ परिवर्तन हुआ, परमेश्वर का कार्य मेरे विचार और मन के अनुकूल नहीं था तो फिर परमेश्वर मेँ मेरी "भक्ति", बिना कोई चिन्ह छोड़े विलुप्त हो गई और परमेश्वर से विश्वासघात करने वाला मेरा चरित्र पूरी दुनिया के सामने उजागर हो गया।

यह बात 1999 की है। मैं अपना काम करके घर लौट रहा था। लौटते समय रास्ते मेँ मुझे मेरा एक सहपाठी मिला जिससे मैं वर्षों से नहीं मिला था। मैंने उसका सूट, उसकी टाई, उसका सेलफोन देखा। सर से पाँव तक उसकी अमीरी झलक रही थी। मेरा मन असहनीय ईर्ष्या से भर उठा; दूसरी ओर मैं फटेहाल और जर्जर दिख रहा था। कुछ ही दिनों बाद, मेरी दादी ने जो कुछ कहा वह इस जले पर नमक छिड़कने जैसा था: "आजकल तुम कोई काम धंधा नहीं कर रहे हो और न ही पैसा कमा रहे हो। तुम्हें नहीं लगता कि तुम खुद को पीछे की ओर धकेल रहे हो? जब तुम्हारे पास धन नहीं होगा तो तुम्हारे बारे मेँ कोई क्यों सोचेगा? अपने सहपाठी को देखो, बाहर जाकर कितना अधिक पैसे कमा रहा है, दुनिया भर की चीजें खरीदता रहता है...और तुम? कुछ भी नहीं है तुम्हारे पास!" तभी मेरे मन मेँ मेरे सहपाठी की वह विशेष स्वरूप वाली आकृति कौंधी। मैंने अत्यंत दयनीयता का अनुभव किया और मुझे लगा कि धरती फट जाए और मैं उसमें समां जाऊँ! फिर मेरी दादी ने कहा: "तुम्हारे चाचा जो सजावटी सामानों का कारख़ाना चलाते हैं उसमें कुछ लोगों की जरूरत है और वे चाहते हैं कि तुम उसमें काम करो।" मैंने ज़ोर से कहा, "ठीक है! मैं जाऊंगा!" उस रात मुझे रात भर नींद नहीं आई और मैं करवटें बदलता रहा, मेरे मन मेँ यह उथल-पुथल मची हुई थी: क्या मैं सचमुच पैसा कमाने जा रहा हूँ? यदि मैं लोभ के मायाजाल मे फंस गया और उससे मुक्त नहीं हो सका तो क्या होगा? लेकिन अपनी स्वयं की छुद्रता और धन के लोभ के साथ-साथ अपनी वर्तमान दुर्दशा के कारण, मैं परमेश्वर के वचनों पर संदेह करने लगा। मैंने सोचा: ऐसा नहीं है कि थोड़ा सा पैसा कमाने के बाद मैं स्वयं को मुक्त नहीं करा पाऊँगा... कुछ संघर्ष करने के बावजूद भी, मैं पैसों के लोभ को रोक पाने मेँ असमर्थ था, अत: मैंने यह कह कर स्वयं को सांत्वना दिया कि: "यह महत्वपूर्ण नहीं है; जब मैं कुछ पैसे कमा लूँगा और स्थितियों को कुछ बेहतर कर लूँगा तो मैं निश्चित रूप से अपने कर्तव्य को पूरा करने के लिए अपना सब समर्पित कर दूंगा। मैं दुनिया के उन बाकी लोगों की तरह नहीं बनूँगा, जिनके पैसों की भूख कभी शान्त ही नहीं होती है।" और इस तरह अगले दिन मैं सजावटी समान बनाने वाले कारखाने पहुँच गया।

जब मैंने काम शुरू किया तो प्रारम्भिक दौर मेँ मैंने चर्च के जीवन का अनुशासन और वहाँ के आचरण का पालन किया। मैं प्राय: स्वयं को याद दिलाता रहता था: मैं परमेश्वर से विमुख नहीं हो सकता। लेकिन धीरे-धीरे मेरा पतन होता गया और परमेश्वर की वाणी को सुनने और मनन करने मे मुझे अरुचि का अनुभव होने लगा। अब मैं अपने भाइयों और बहनों से मिलना भी नहीं चाहता था। हलाँकि मैं हर प्रवचन सभा मेँ कहता था कि धन उतना महत्वपूर्ण नहीं है जितना कि जीवन, लेकिन मैं जैसे ही कारख़ाने पहुंचता, इस बात पर बिना विचार किए अत्यंत व्यस्त हो जाया करता। कई बार मैं लगातार काम करके खुद को इतना चूर-चूर कर देता था ताकि मुझमें असाधारण बातों को सोचने की हिम्मत ही न रहे, परमेश्वर द्वारा रचित सदियों मेँ एक बार होने वाली आपदा की ओर मेरा ध्यान ही न जाए। इस प्रकार मैं अन्य सांसरिक लोगों की तरह एक निरर्थक जीवन को ज्यादा पसंद करने लगा और परमेश्वर के सुंदर अनमोल वचन को सुनने के लिए अब मेरा मन तैयार नहीं रहता था।

बाद मेँ, एक प्रवचन सभा में, मेरे पेट मेँ अचानक बहुत तेज दर्द हुआ, ऐसा लगा जैसे पेट पर हथौड़े की चोट पड़ी हो। मैं इस दर्द को सह नहीं सका और लेटने के लिए बेडरूम के अंदर चला गया। लेकिन दर्द रुका नहीं – और दर्द के कारण मैं विस्तर पर छटपटा रहा था। जब मेरे भाइयों और बहनों ने मेरी इस दशा को देखा, वे मुझे लेकर अस्पताल भागे। लेकिन डॉक्टर को मुझमें कोई गड़बड़ी नहीं मिली। मेरे भाइयों और बहनों ने मुझे सुझाव दिया कि मैं आत्म चिंतन करूँ। लेकिन, सिर्फ यही नहीं कि मैंने कोई आत्म चिंतन नहीं किया बल्कि मैं और अधिक इस मत पर दृढ़ हो गया कि धन का न होना ठीक नहीं है। मैंने सोचा: "क्या होगा यदि मैं गंभीर रूप से बीमार हो जाऊँ और इलाज़ के लिए पैसे के अभाव मेँ मेरी मृत्यु हो जाए? इस कारण के चलते मुझे इस बात से कुढ़न होने लगी कि सजावटी सामान के कारखाने मे मेरा वेतन मात्र 400 यूआन है और मैंने नया कैरियर शुरू करने के लिए घर वापस लौटने का निर्णय लिया। इसके लिए मैंने 6,000 यूआन का कर्ज़ लिया और सजावट का सामान बनाने का नया कारखाना खोल दिया। लेकिन विगत दिनों की आपदा दुबारा न घटित हो जाए, इसके लिए मैंने एक हाथ मे धन को दबाए रखा और दूसरे हाथ से सत्य को पकड़े रखा। दोनों में से किसी को नहीं छोड़ा। यह किसको पता था कि 6 माह बाद, कमाई के नाम पर मेरे पास एक फूटी कौड़ी नहीं होगी और उल्टे ब्याज समेत मैं 10000 यूआन का कर्जदार बन जाऊंगा। उस समय मेरा विवेक लुप्त हो चुका था और मैंने परमेश्वर से फरियाद किया: "हे परमेश्वर, आप मुझे धन कमाने का आशीर्वाद नहीं देंगे, लेकिन आप मेरा धन डूबने से बचाइए! जब आप मेरे साथ ऐसा कर रहे हैं तो आपका अनुगमन करने की इच्छा शक्ति मुझमें कैसे आएगी? यदि मैं गलत भी हूँ, तो आपको तो मेरी कमजोरियों को समझना चाहिए!..." उस समय मैं धन-दौलत की चकाचौंध से अंधा हो चुका था और मेरे हृदय मेँ परमेश्वर के लिए कोई भी स्थान नहीं था। मैंने यह बिलकुल महसूस नहीं किया कि परमेश्वर के धर्मपरायण स्वभाव का वरदहस्त मुझ पर है। मुझमें पाश्चाताप का कोई भाव नहीं था। एक बार पुन: मैंने परमेश्वर से विश्वासघात किया और चर्च छोड़कर हेयर स्टाइल का काम सीखने चल पड़ा। मैं पाप के कीचड़ मे घुसता गया और परमेश्वर को पूरी तरह भूल गया।

यह सब उस दिन तक चलता रहा जिस दिन मैं अपने पिता से मिलने के लिए सायकिल से जा रहा था। मैं एक चढ़ाई के बिलकुल ऊपरी हिस्से पर पहुंचा, तभी अचानक एक खतरनाक कुत्ता सड़क के एक किनारे से दौड़ा और अत्यंत भयानक ढंग से मुझपर भोंकने लगा। मैं जितनी तेज सायकिल चला सकता था उतनी तेज साइकिल चला रहा था, मैं ढाल के नीचे उतर रहा था। फिर भी वह कुत्ता मेरे काफी करीब आ पहुँचा। उसके दाँत बाहर निकले हुए थे और वह भोंके जा रहा था। मैं इतना डरा हुआ था कि मैं सर से पाँव तक थरथरा रहा था। मेरा शरीर ठंढे पसीने से तर-बतर था और मैंने अपने दोनों पैर साइकिल के ऊपर उठा रखे थे। फिर मैं साइकिल से लड़खड़ा कर धम्म से सड़क पर आ गिरा। सड़क पर नुकीले पत्थर बिछे हुए थे। मैं लुढ़कते-लुढ़कते सड़क के किनारे गड्ढे मे जा गिरा। मैं अपने पाँव नहीं मोड़ पा रहा था, मेरे हाथ सुन्न हो गए थे और मैं भयाक्रांत था। मैंने सोचा: अगर मैं अपाहिज हो गया तो क्या होगा? अगर कोई अनहोनी हो गई तो क्या होगा? गड्ढे में पड़े-पड़े मैंने इस उम्मीद के सहारे दर्द को सहा कि मेरे पिता घर जल्दी लौटेंगे। अंतत: पिता जी घर वापस आए। मुझे इस घायल अवस्था मेँ देखकर उन्होंने पूछा कि यह सब क्या हुआ है। इस दशा मेँ मुझे हँसना चाहिए या रोना चाहिए था – नहीं पता। मैंने बताया "मुझे कुत्ते ने डरा दिया था!" "विचित्र बात है! वह कुत्ता किसी भी और को नहीं काटता है, तो तुम्हें क्यों काटेगा।" अंत मेँ पिताजी ने अपना पूरा ज़ोर लगा कर मुझे गड्ढे से बाहर निकाला और सायकिल पर बैठाया और मुझे लेकर घर आए। बिस्तर पर लेटे-लेटे, मैं अनायास पिताजी के इन शब्दों पर सोचता रहा: "विचित्र बात है! वह कुत्ता किसी भी और को नहीं काटता है, तो तुम्हें क्यों काटेगा।" अचानक, मुझे प्रकाश दिखा और मैंने परमेश्वर के प्रति अपनी कृतज्ञता व्यक्त की! मैंने सोचा कि मेरा इस तरह लुढ़कना मुझे जागृति के पथ पर लाया है! यदि गिरने के बाद आज मैं लुढ़क कर मर गया होता या कुत्ते के काटने से मेरी मौत हो गई होती तो चाहें मैंने जितना भी धन कमाया होता, उसका क्या उपयोग होता? मैं जितना सोच रहा था मैं उतना ही भयभीत होता जा रहा था, और अचानक, मैंने परमेश्वर के शब्दों पर विचार किया: "क्या संसार सचमुच में तुम्हारे आराम करने की जगह है? क्या तुम सचमुच में संसार से, मेरी ताड़ना को नज़रअंदाज़ करके, अपने लिए एक आराम की मुस्कुराहट को प्राप्त कर सकते हो?... मैं तुम्हें सलाह देता हूं: बेहतर होगा कि तुम अपना आधा जीवन मेरे लिए बिताओ न कि अपना पूरा जीवन साधारणत: और शरीर के व्यस्त कामों में, उन सभी दुखों को सहन करते हुए जो एक व्यक्ति के लिए सहन कर पाना मुश्किल है। इसका क्या लाभ होगा कि, अपने आप को बहुमूल्य धन के समान समझ कर संभालने के लिए, तुम मेरी ताड़ना से बचते हुए भागते रहो? इसका क्या लाभ होगा कि, तुम मेरी क्षणिक ताड़ना से अपने आप को छुपाने के लिए, एक अनंतकाल की शर्मिन्दगी, एक अनंतकाल की ताड़ना की फसल को काटो? मैं अपनी इच्छा के लिए, वास्तव में, किसी को भी नहीं झुकाऊँगा। यदि कोई व्यक्ति सचमुच में मेरी सभी योजनाओं के प्रति समर्पण करने के लिए इच्छुक है तो, मैं उसके साथ बुरा बर्ताव नहीं करूँगा।परन्तु मैं चाहता हूं कि सब लोग मुझ में विश्वास करें ..." ("वचन देह में प्रकट होता है" से "एक वास्तविक मनुष्य का क्या अर्थ है" से). "हो सकता है तुमने अतीत में शिकायत की हो, परन्तु तुमने चाहे कितनी ही शिकायत की हो परमेश्वर को तुम्हारे बारे में वह याद नहीं है। आज आ गया है और कल के मामलों को देखने का कोई कारण नहीं है।" ("वचन देह में प्रकट होता है" से "परमेश्वर के लिए सच्चा प्रेम स्वाभाविक है" से). उस समय, मेरे मन मेँ परमेश्वर के प्रति कृतज्ञता का भाव उमड़ने लगा। मनुष्य मात्र का सम्पूर्ण जीवन परमेश्वर के हाथों मेँ है और उसी सर्वशक्तिमान परमेश्वर ने मुझे जीवन दिया है। लेकिन इस मोड़ पर चर्च वापस लौटने की हिम्मत मुझमें कैसे होती! मेरा मन पाश्चाताप से भरा हुआ था और मुझे घृणा हो रही थी कि किस प्रकार से परमेश्वर से विश्वासघात करने का भूत मुझ पर सवार हो गया था। सिर्फ यही नहीं कि जो परिवेश परमेश्वर ने मेरे लिए सृजित किया था, उसमें मैं परमेश्वर के लिए साक्षी नहीं बन सकता था, बल्कि मैंने परमेश्वर के साथ तर्क वितर्क किया और उनसे शिकायत की| तथा शैतान के वशीभूत होकर मैंने अपनी शारीरिक (भौतिक) भूख का अनुसरण किया। जब मैंने यह सोचा कि किस तरह मैं परमेश्वर के स्वभाव की परीक्षा ले रहा था, उनकी सत्ता को, मानव मात्र पर उनकी सूक्ष्म दृष्टि को और उनके अनुशासन को नज़रअंदाज़ कर रहा था और एक के बाद एक करके अनेकों बार ढिठाई से, और निर्लज्जता के साथ परमेश्वर के साथ कुतर्क किया – मेरी आँखों मेँ बरबस पश्चाताप के आँसू छलक पड़े। दर्द के बावजूद मैंने अपने घुटनो को मोड़ा और उन पर बैठकर परमेश्वर से प्रार्थना की: "हे सर्वशक्तिमान परमेश्वर, मैं अत्यंत सिरफिरा अवज्ञाकारी हूँ। मैं आपमें विश्वास करता था लेकिन आप पर संदेह किया, आप पर विश्वास किया लेकिन अपने को आपसे दूर रखा। परमेश्वर को दिया जाने वाला सम्मान मैंने आपको नहीं दिया; मुझे नरक की सज़ा मिलनी चाहिए! अपने कर्मों के आधार पर आज, उस कुत्ते को मुझे काट खाना चाहिए था। चूंकि आप एक व्यक्ति को दो प्रभुओं की सेवा की अनुमति नहीं देते हैं, और विशेष रूप से इस बात की अनुमति नहीं देते हैं कि कोई आपमें विश्वास करे और आपको अपने हृदय मेँ स्थान न दे। सिर्फ आज मुझे यह ज्ञान मिला कि आपके बिना मैं कितना दयनीय हूँ। मैं गंदगी में जी रहा था और उससे फिर भी मुझे घृणा नहीं आई, और मुझे यह आभास नहीं हुआ कि मैं शैतान के जाल मेँ फंस गया हूँ। हे परमेश्वर! मैं अपने सर्वस्व के साथ स्वयं को आपके चरणों मेँ समर्पित करना चाहता हूँ। मैं विनती के साथ याचना करता हूँ कि एक बार फिर से मुझ पर दया कीजिए, मेरे हृदय की रक्षा कीजिए और मेरे हृदय को अपने चरणों मे वापस लौटने की अनुमति दीजिए। जैसे ही मेरे घाव भर जाएंगे, मैं हेयर सैलून का काम छोड़ दूंगा और सृजन के प्रति अपने कर्तव्य को पूरा करने, आपके प्रेम की प्रतिपूर्ति करने, आपके हृदय को संतुष्ट करने के लिए, धर्म प्रचार के काम मेँ अपने को समर्पित कर दूंगा और धन के लिए कभी चिंतित नहीं रहूँगा या भौतिक सुखों के पीछे कभी नहीं भागूंगा।"

मैं सर्वशक्तिमान परमेश्वर के प्रेम के प्रति आभारी हूँ। ताड़ना और न्याय का प्रयोग करके उन्होंने एक बार और मुझे पाप से बचा लिया, उन्होंने पथभ्रष्ट होने के बाद भी मुझे मार्ग पर आने की अनुमति प्रदान किया, मुझे एक सार्थक और प्रतिष्ठित जीवन जीने का अवसर दिया। सर्वशक्तिमान परमेश्वर का प्रेम विराट और अथाह है; इसकी व्याख्या मैं शब्दों से नहीं कर सकता हूँ। मैं परमेश्वर के समक्ष यह संकल्प लेना चाहूँगा: आज से प्रारम्भ करके मैं कभी भी परमेश्वर से विमुख नहीं होऊंगा। जो परमेश्वर मनुष्य को अपने स्वयं के रक्त और मांस की तरह प्रेम करते हैं, उनका ऋण चुकाने के लिए मैं मन, वचन और कर्म से उनका अनुगमन करूंगा।

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