1. शैतान के अंधेरे कारागार में मेरे साथ परमेश्वर का प्रेम था

यांग यी, जियांग्सू प्रांत

मैं सर्वशक्तिमान परमेश्वर की कलीसिया की एक ईसाई हूँ। मैं दस वर्षों से अधिक समय के लिए सर्वशक्तिमान परमेश्वर की अनुयायी रही हूँ। इस अवधि के दौरान, एक दशक पहले, सीसीपी पुलिस द्वारा गिरफ्तार किए जाना वो भयानक विपत्ति थी जिसे मैं कभी नहीं भूलूंगी। उस समय, दुष्ट राक्षसों द्वारा उत्पीड़ित किये जाने, कुचले जाने और मेरे कई बार मौत के करीब आने के बावजूद, सर्वशक्तिमान परमेश्वर ने मेरी रक्षा करने और मेरा मार्गदर्शन करने, मुझे जीवन में वापस ले आने, और मुझे सुरक्षा में वापस लाने के लिए अपने शक्तिशाली हाथ का उपयोग किया था...। इसके माध्यम से, मैंने वास्तव में परमेश्वर की जीवन-शक्ति के उत्कर्ष और प्रभुत्व का अनुभव किया, और परमेश्वर द्वारा मुझे प्रदत्त जीवन की बहुमूल्य संपदा प्राप्त की।

23 जनवरी, 2004 (चीनी नव वर्ष के दूसरे दिन) की बात है। मुझे कलीसिया की एक बहन के पास जाकर उसे मिलने की ज़रूरत थी; वह परेशानी में थी और उसे तत्काल मदद की आवश्यकता थी। एक लंबा रास्ता होने के कारण, मुझे जल्दी उठकर टैक्सी लेनी थी जिससे मैं उसी दिन वापस आ सकूँ। दिन का प्रकाश होते ही मैं घर से निकल गई। सड़कों पर शायद ही कोई था, केवल मजदूर कचरा साफ़ कर रहे थे। मैंने उत्सुकता से एक टैक्सी की खोज की, लेकिन वहाँ कोई भी नहीं मिली। मैं प्रतीक्षा करने के लिए टैक्सी के स्थान पर गई, और जब मैंने एक को आते देखा तो हाथ हिलाकर उसे रोकने के लिए मैं सड़क पर आ गई—लेकिन यह पर्यावरण संरक्षण ब्यूरो से संबंधित एक वाहन था। उन्होंने मुझसे पूछा कि मैं उन्हें क्यों रोका था। मैंने कहा, "मुझे खेद है, यह एक भूल थी, मैंने सोचा था कि यह एक टैक्सी थी"। उन्होंने जवाब दिया, "हमें लगता है कि तुम अवैध पोस्टर लगा रही थी।" मैं बोली, "क्या तुमने मुझे देखा? वे पोस्टर कहाँ हैं जिन्हें मैं लगा रही थी?" मुझे खुद को बचाने का मौका दिए बिना ही, वे तीन लोग आगे बढ़े और उन्होंने ज़बरन मेरे बैग की तलाशी ली। उन्होंने मेरे बैग में रखी हर चीज़ की तलाशी ली—उपदेश की एक प्रति, एक नोटपैड, एक पर्स, एक सेल फोन और एक निष्क्रिय पेजर, इत्यादि। फिर उन्होंने उपदेश और नोटपैड की प्रतिलिपि पर एक क़रीबी नज़र डाली। यह देखकर कि मेरे बैग में कोई पोस्टर नहीं था, उन्होंने उपदेश की प्रतिलिपि उठा ली और कहा, "हो सकता है कि तुम अवैध पोस्टर नहीं लगा रही थी, लेकिन तुम सर्वशक्तिमान परमेश्वर में विश्वास करती हो।" इसके पश्चात्, उन्होंने राष्ट्रीय सुरक्षा ब्रिगेड के धार्मिक प्रभाग को फोन किया। इसके तुरंत बाद, राष्ट्रीय सुरक्षा ब्रिगेड के चार लोग आ पहुंचे। जैसे ही उन्होंने मेरे बैग में वे चीजें देखीं, उन्हें पता चल गया कि मैं सर्वशक्तिमान परमेश्वर में विश्वास करने वाली थी। मुझे कुछ भी कहने का मौका दिए बिना, उन्होंने मुझे अपने वाहन में ज़बरन बिठा दिया, फिर मुझे भागने से रोकने के लिए दरवाज़ा बंद कर दिया।

जब हम लोक सुरक्षा ब्यूरो पहुंचे, तो पुलिस मुझे एक कमरे में ले गई। उनमें से एक, सुराग की तलाश में, मेरे पेजर और मोबाइल फोन से छेड़छाड़ करने लगा। उसने फोन चालू किया लेकिन इसमें बैटरी कम दिखी, फिर पता चला कि बैटरी पूरी तरह से खाली हो चुकी थी। चाहे उसने जितनी भी कोशिश की, वह इसे चालू नहीं कर सका। फोन पकड़कर, वह चिंतित लग रहा था। मैं भी परेशान थी—मैंने उस सुबह फोन चार्ज किया था। इसमें बैटरी खाली कैसे हो सकती है? मुझे अचानक एहसास हुआ कि परमेश्वर ने पुलिस को अन्य भाइयों और बहनों के बारे में कोई जानकारी खोजने से रोकने के लिए चमत्कारिक तरीके से यह व्यवस्था की थी। मैंने परमेश्वर द्वारा कहे गए वचनों को भी समझा: "कोई भी और सभी चीज़ें, चाहे जीवित हों या मृत, परमेश्वर के विचारों के अनुसार ही जगह बदलेंगी, परिवर्तित, नवीनीकृत और गायब होंगी। परमेश्वर सभी चीजों को इसी तरीके से संचालित करता है" ("वचन देह में प्रकट होता है" में "परमेश्वर मनुष्य के जीवन का स्रोत है")। वास्तव में, सभी चीज़ें और घटनाएं परमेश्वर के हाथों में हैं। चाहे सजीव हो या निर्जीव, सभी चीज़ें परमेश्वर के विचारों के अनुसार बदलती हैं। इस पल में, इस बात ने मुझे परमेश्वर की संप्रभुता और सभी चीज़ों की व्यवस्था का सच्चा ज्ञान दिया, और आगे होने वाली पूछताछ का सामना करने के लिए मेरा विश्वास मजबूत किया। बैग की चीज़ों को इंगित करते हुए, पुलिस अधिकारी ने आरोप लगाते हुए पूछा, "ये चीज़ें बताती हैं की तुम कलीसिया की कोई साधारण सदस्या नहीं हो, तुम वरिष्ठ नेताओं में से एक लगती हो, कोई महत्वपूर्ण व्यक्ति हो। छोटे ओहदे के नेताओं के पास पेजर या मोबाइल फोन नहीं होते हैं। क्या मैं सही हूँ?" मैंने जवाब दिया, "मैं समझ नहीं पा रही हूँ कि तुम क्या कह रहे हो"। "तुम नहीं समझने का नाटक कर रही हो", वह गुर्राकर बोला, और मेरे बोलते समय उसने मुझे फ़र्श पर बैठने का आदेश दिया। यह देखकर कि मैं उनके कहे अनुसार नहीं कर रही थी, उन्होंने मुझे घेर लिया और मुझे लातों और घूंसों से मारना शुरू कर दिया—जो मुझे जान से मार देने के लिए काफी लग रहा था। मेरा चेहरा रक्त-रंजित हुआ और सूज गया, मेरे पूरे शरीर में असहनीय दर्द हो उठा, और मैं फ़र्श पर गिर पड़ी। मैं परेशान थी। मैं आक्रोश में आ गई थी। मैं उनसे युक्ति से बात और दलील करते हुए पूछना चाहती थी, "मैंने क्या गलत किया है? तुमने मुझे ऐसे क्यों मारा?", लेकिन मेरे पास उनके साथ तर्क करने का कोई तरीका नहीं था, क्योंकि सीसीपी सरकार तर्कसंगत काम नहीं करती। मैं उलझन में थी, लेकिन मैं उनकी पिटाई के सामने घुटने टेकना भी नहीं चाहती थी। मैं इसी असमंजस में थी कि मैंने अचानक सोचा, चूंकि सीसीपी सरकार के ये दुष्ट अधिकारी इतने बेतुके थे, चूंकि वे मुझे कोई तर्कसंगत बात कहने का मौका नहीं दे रहे थे, इसलिए मुझे उनसे कुछ भी नहीं कहना ठीक होगा। मेरा चुप रहना ही बेहतर था—इस तरह मैं उनके काम नहीं आऊँगी। जब मैंने यह सोच लिया, तो मैंने उनकी बातों की ओर कोई भी ध्यान देना बंद कर दिया।

यह देखकर कि इस तरकीब का मेरे पर कोई असर नहीं हो रहा था, दुष्ट पुलिसकर्मी क्रोध में आपे से बाहर हो गए, तथा और भी बर्बर हो गए: ज़बरन क़बूल करवाने के लिए उन्होंने यातना देनी शुरू कर दी। ज़मीन पर पेच से कसी एक धातु की कुर्सी के साथ उन्होंने मुझे ऐसी स्थिति में बेड़ियों से जकड़ दिया कि मैं न तो बैठ सकी और न ही खड़ी रह पाई। उनमें से एक ने मेरे उस हाथ को जिस पर हथकड़ी नहीं थी, कुर्सी पर रख दिया और जूते से वह उस पर तब तक मारता रहा, जब तक मेरे हाथ के दूसरी ओर का भाग काला और नीला न पड़ गया; दुसरे ने अपने चमड़े के जूते के नीचे मेरे पैर की उंगलियों को कुचल दिया। केवल तभी मैंने अनुभव किया कि उंगलियों का दर्द सीधे दिल तक तेजी से निकल जाता है। उसके बाद, छह या सात पुलिसकर्मी मुझ पर बारी-बारी से टूट पड़े। उनमें से एक ने मेरे जोड़ों पर ध्यान केंद्रित किया, और उन्हें इतनी ज़ोरों से कोंचने लगा कि एक महीने बाद भी मैं अपनी बांह को मोड़ नहीं सकती थी। एक और ने मेरे बालों को पकड़ लिया और मेरे सिर को इधर-उधर झकझोर दिया, फिर उसे पीछे की ओर खींच दिया ताकि मैं ऊपर की तरफ देखने लगी। उसने दुष्टता से कहा, "आकाश की ओर नज़र करो और देखो क्या कहीं कोई परमेश्वर है!" उन्होंने दिन ढलते तक इसे जारी रखा। यह देखकर कि उन्हें मुझ से कुछ भी हासिल नहीं हो रहा था और चूँकि यह चीनी नव वर्ष था, उन्होंने मुझे सीधे हिरासत केंद्र में भेज दिया।

जब मैं हिरासत केंद्र में पहुंची, तो एक संतरी ने एक महिला क़ैदी को मेरे सारे कपड़े उतार कर कूड़ेदान में फेंकने का आदेश दिया। तब उन्होंने मुझे जेल की एक गंदी, दुर्गंधमय वर्दी पहना दी। संतरियों ने मुझे एक कोठरी में रखा और फिर दूसरे कैदियों से झूठ बोलते हुए कहा, "इसने विशेषतः कई परिवार तोड़े हैं। इसके द्वारा कई परिवार बर्बाद हुए हैं। यह झूठी है, ईमानदार लोगों को धोखा देती है, और सार्वजनिक व्यवस्था में खलल डालती है।" क़ैदियों में से एक ने पूछा, "तो वह एक अनाड़ी-सी क्यों दिखती है?", जिस पर संतरी ने जवाब दिया, "वह सजा से बचने के लिए ढोंग कर रही है। तुममें से कौन उसके जितना चालाक है? जो कोई भी सोचता है कि यह मूर्ख है, वही सबसे बड़ा बेवकूफ़ है।" संतरियों के द्वारा इस तरह झांसे में आकर, अन्य सभी क़ैदियों ने कहा कि मुझे बहुत आसानी से छोड़ दिया जा रहा था, और मेरे जैसे बुरे लोगों के लिए तो केवल गोलियां चलाने वाला दस्ता ही ठीक था। यह सुनकर मुझे बहुत आक्रोश हुआ, पर मैं कुछ भी नहीं कर सकती थी। विरोध करने के मेरे प्रयास नाक़ाम रहे थे, उनसे तो यातना और वहशियत और भी बढ़ जाती थी। हिरासत केंद्र में संतरी क़ैदियों से प्रतिदिन इन नियमों को दुहराने के लिए कहते थे: "अपने अपराधों को स्वीकार करो और कानून के सामने समर्पण कर दो। दूसरों को अपराध करने के लिए उकसाने की अनुमति नहीं है। गिरोह बनाने की अनुमति नहीं है। लड़ने की अनुमति नहीं है। दूसरों की धमकाने की अनुमति नहीं है। दूसरों के खिलाफ़ झूठे आरोप लगाने की अनुमति नहीं है। दूसरों के भोजन या संपत्ति को हथियाने की अनुमति नहीं है। दूसरों के साथ चालाकी करने की अनुमति नहीं है। जेल के गुंडों को पकड़ा जाना चाहिए। नियमों के किसी भी उल्लंघन की सूचना फ़ौरन पर्यवेक्षकों या किसी फेरी वाले पहरेदार को दी जानी चाहिए। तुम्हें तथ्यों को छिपाना नहीं चाहिए या उन क़ैदियों की रक्षा करने की कोशिश नहीं करनी चाहिए जिन्होंने नियम का उल्लंघन किया है, और निगरानी मानवीय होनी चाहिए। ..." हकीक़त में, संतरियों ने अन्य क़ैदियों को मुझे सताने के लिए उकसाया, जिससे उन्हें हर दिन मुझ पर चाल चलने की इजाज़त रहती थी: जब तापमान शून्य से 8 या 9 डिग्री होता था, तो वे मेरे जूते भिगो देते; वे छिप कर मेरे भोजन में पानी डाल देते; शाम को, जब मैं सो जाती तो वे मेरे कपास के गद्देदार जैकेट को भिगो देते; वे मुझे शौचालय के बगल में सोने को मजबूर करते, अक्सर रात में मेरी रजाई खींच लेते, मेरे बालों को खींचते और मुझे सोने नहीं देते थे; वे मेरी उबली हुई पाव रोटी छीन लेते; मुझे शौचालय साफ़ करने के लिए मजबूर करते, और अपनी बची हुई दवाई मेरे मुंह में ठूँस देते, वे मुझे शौचालय जाने नहीं देते थे...। अगर मैंने उनका कहा हुआ कुछ भी नहीं किया तो वे गिरोह बना लेते और मुझे पीटते—और अक्सर ऐसे समय में पर्यवेक्षक या ग़श्त लगाने वाले संतरी जल्दी से दूर हो जाते, या यूँ नाटक करते कि उन्होंने कुछ भी नहीं देखा है; कभी-कभी वे कुछ दूरी पर हटकर छिप जाते और देखते रहते। अगर क़ैदियों द्वारा मुझे पीड़ित किए बिना कुछ दिन बीत जाते, तो पर्यवेक्षकों और ग़श्त लगाने वाले संतरियों द्वारा वे पूछे जाते: "वह बेवकूफ़ कुतिया पिछले कुछ दिनों में सयानी हो गई है, ना? फिर तुम लोगों के दिमाग भी ठंडे पड़ गए हैं। जो कोई भी उस बेवकूफ़ कुतिया को क़ाबू में ले आएगा उसे कुछ रियायत दी जाएगी।" संतरियों की क्रूर यातना ने मुझे नफ़रत से भर दिया। आज, अगर मैंने इसे अपनी आंखों से नहीं देखा होता और व्यक्तिगत रूप से इसका अनुभव न किया होता, तो मुझे कभी विश्वास नहीं होता कि सीसीपी सरकार, जो उदारता और नैतिकता से भरी हुई मानी जाती है, इतनी बुरी, भयावह और विकराल हो सकती है—मैंने कभी भी इसका असली चेहरा नहीं देखा होता, एक ऐसा चेहरा जो धोखेबाज और दोगला है। "लोगों की सेवा करने, एक सभ्य और सामंजस्यपूर्ण समाज बनाने"—की ये सभी बातें झूठी हैं और ये लोगों को धोखा देने के लिए रची गई हैं, वे सिर्फ एक साधन, एक चाल थीं, खुद को सुन्दर बनाकर पेश करने की और उस वाह-वाही को प्राप्त करने की जिसके यह लायक ही नहीं है। उस समय, मैंने परमेश्वर के शब्दों के वचनों बारे में सोचा: "यह कोई आश्चर्य की बात नहीं कि देहधारी परमेश्वर पूरी तरह से छिपा हुआ है: इस तरह के अंधियारे समाज में, जहां राक्षस बेरहम और अमानवीय हैं, शैतानों का राजा, जो पलक झपकते ही लोगों को मार डालता है, वो ऐसे परमेश्वर के अस्तित्व को कैसे सहन कर सकता है जो प्यारा, दयालु और पवित्र भी है? वह परमेशवर के आगमन की वाहवाही और जयकार कैसे कर सकता है? ये दास! ये दयालुता का बदला घृणा से चुकाते हैं, उन्होंने लंबे समय से परमेश्वर की निंदा की है, वे परमेश्वर को अपशब्द बोलते हैं, वे चरमसीमा तक क्रूर हैं, उनमें परमेश्वर के प्रति थोड़ा-सा भी सम्मान नहीं है, वे लूटते हैं और डाका डालते हैं, वे सभी विवेक खो चुके हैं, और उनमें दयालुता का कोई निशान नहीं बचा, और वे निर्दोषों को अचेतावस्था की ओर मुग्ध करते हैं। प्राचीनों के पूर्वज? प्रिय नेता? वे सभी परमेश्वर का विरोध करते हैं! उनके हस्तक्षेप ने स्वर्ग के नीचे के सभी लोगों को अंधेरे और अराजकता की स्थिति में छोड़ दिया है! धार्मिक स्वतंत्रता? नागरिकों के वैध अधिकार और हित? ये सब पाप को छिपाने के तरीके हैं" ("वचन देह में प्रकट होता है" में "कार्य और प्रवेश (8)")। वास्तविकता के साथ परमेश्वर के वचनों की तुलना करते हुए, मैंने सीसीपी सरकार के काले और बुरे राक्षसी सार को पूर्ण स्पष्टता से देखा। अपने दुष्ट शासन को बनाए रखने के लिए, यह सरकार अपने लोगों पर कड़ी पकड़ रखती है, और उन्हें भ्रमित करने और धोखा देने के लिए कहीं भी नहीं रुकती है। सतही रूप से, यह धार्मिक स्वतंत्रता प्रदान करने की बातें करती है, लेकिन गुप्त रूप से यह देश भर में जो लोग परमेश्वर में विश्वास करते हैं, उनको गिरफ्तार करती है, उन्हें दंडित करती है, उत्पीड़ित करती है और उनकी हत्या करती है। यह उन सभी को मौत के घात उतारने की भी कोशिश करती है। यह शैतान कितना दुष्ट, क्रूर, और प्रतिक्रियात्मक है! स्वतंत्रता कहाँ है? मानव-अधिकार कहाँ हैं? क्या ये सभी चालें नहीं हैं जिनसे लोगों को धोखा दिया जा सके? क्या इसके अंधेरे शासन के तहत लोग किसी भी आशा की किरण या प्रकाश को देख सकते हैं? वे परमेश्वर में विश्वास करने और सच्चाई का पीछा करने के लिए स्वतंत्र कैसे हो सकते हैं? केवल तब ही मैंने पहचाना कि परमेश्वर ने इस उत्पीड़न और विपत्ति को मुझ पर आने की इजाज़त दी थी, कि उसने मुझे सीसीपी सरकार की दुर्बलता और क्रूरता को दिखाने के लिए इसका इस्तेमाल किया था, ताकि मुझे उन लोगों के राक्षसी सार को दिखाया जा सके जो सच्चाई का शत्रु और परमेश्वर का विरोधी है और मैं यह देख सकूँ कि लोगों की पुलिस, जिसे सरकार बुराई को सख्ती से दंडित करने, भलाई की पैरवी करने और न्याय को बढ़ावा देने के रूप में ज़ोरदार रूप से बढ़ावा देती है और इसे प्रस्तुत करती है, उनकी सह-अपराधी और चापलूस नौकर है जिसे सावधानी से पोषित किया गया है, यह जल्लादों का एक समूह है जिनके चेहरे मनुष्यों के हैं लेकिन जिनके दिल पशुओं के हैं, और जो आंख की एक झपकी में किसी को मार डालते हैं। मुझे परमेश्वर को अस्वीकार करने और उसे धोखा देने और उन लोगों की तानाशाह ताक़त के सामने हार मानने के लिए मजबूर करने में, सीसीपी सरकार मुझे यातना देने और तबाह करने में कहीं भी नहीं रुकी थी—फिर भी उसे बहुत कम पता था कि जितना अधिक इसने मुझे उत्पीड़ित किया, उतनी ही अधिक स्पष्टता से मैंने इसके शैतानी चेहरे को देखा, और उतना ही अधिक मैंने इसे तुच्छ जाना और मेरे दिल की गहराई से ख़ारिज किया, जिससे मुझे परमेश्वर के लिए वास्तव में उत्सुकता हुई और परमेश्वर पर भरोसा हुआ। और भी, यह ठीक उन संतरियों के दिए हुए उत्पीड़न के कारण ही था, जिससे मैं अनजाने में समझ सकी थी कि परमेश्वर जिसे प्यार करता है उसे प्यार करना, और परमेश्वर जिससे नफ़रत करता है उससे नफ़रत करना, क्या होता है, कि शैतान को पीठ दिखाने और परमेश्वर के प्रति दिल को मोड़ने का क्या अर्थ है, बर्बर होना क्या है, अंधेरे की ताक़तें क्या हैं, और इसके अलावा, दुर्भावनापूर्ण और कपटी, और नकली और धोखेबाज बनना क्या होता है। मैं इस माहौल का अनुभव कर पाने के लिए परमेश्वर की आभारी थी, जिससे मैं सही को गलत से अलग पहचान सकी और जीवन के जिस सही मार्ग पर चलना चाहिए उसका निर्धारण कर सकी। मेरा दिल—जो लम्बे समय से अब तक शैतान के द्वारा भ्रमित किया गया था—अंततः परमेश्वर के प्यार से जागृत हो गया था। मुझे लगा कि इस विपत्ति और परीक्षण का अनुभव करने के मेरे सौभाग्य में बहुत बड़ा अर्थ था, कि मुझ पर वास्तव में विशेष अनुग्रह किया गया था।

बाक़ी सब कुछ कर लेने के बाद, दुष्ट पुलिस एक और योजना के साथ आगे आई: उन्हें एक यहूदा मिला जिसने मेरी कलीसिया को धोखा दे दिया था। उस गद्दार ने कहा कि मैं सर्वशक्तिमान परमेश्वर में विश्वास करती हूँ, उसने तो मुझे परमेश्वर से मुंह मोड़ने के लिए भी बहकाया। इस दुष्ट सेवाकर्ता को देखकर, जिसने सुसमाचार फैलाने वाले कई भाइयों और बहनों की शिकायत कर दी थी और उन सभी दुष्ट शब्दों को सुनकर जो उसके मुंह से निकले थे—जो शब्द परमेश्वर की बुराई, बदनामी और निन्दा करते थे—मेरा दिल क्रोधाग्नि से भर गया था। मैं उस पर चिल्लाना चाहती थी, पूछना चाहती थी कि वह इतनी निष्ठाहीनता से परमेश्वर के प्रति वैरी क्यों थी। ऐसा क्यों था कि उसने परमेश्वर की कृपा का आनंद लिया, फिर भी परमेश्वर के चुने हुए लोगों को सताने के लिए दुष्ट राक्षसों के साथ जुड़ गई थी? मेरे दिल में, अकथनीय उदासी और पीड़ा थी। मुझे पछतावे और आभार का एक बड़ा एहसास भी हुआ; मैंने वास्तव में अपने आप से घृणा की कि कैसे, अतीत में, मैंने सच्चाई का अनुसरण करने की कोशिश नहीं की थी, और कैसे एक नासमझ बच्चे की तरह, परमेश्वर की कृपा और आशीर्वाद को भोगने के अलावा कभी कुछ भी नहीं जाना था, कभी उस दर्द और अपमान के बारे में सोचा नहीं था जिसे परमेश्वर ने हमारे उद्धार के लिए सहन किया था। केवल अब, जब मैं इन पिशाचों की गहरी मांद में थी, तो मुझे समझ में आया था कि परमेश्वर के लिए इस गंदे, भ्रष्ट देश में कार्य करना कितना मुश्किल था, और उसने वास्तव में कितना दर्द सहन किया था! सचमुच, मनुष्य के प्रति परमेश्वर का प्यार बहुत पीड़ाजनक होता है। वह मनुष्यों के विश्वासघात को सहने के दौरान ही मानवजाति को बचाने का कार्य करता है। मनुष्य के विश्वासघात ने उसे दर्द और चोट के अलावा कुछ भी नहीं दिया है। कोई आश्चर्य नहीं कि परमेश्वर ने एक बार कहा था: "यहाँ तक कि एक रात के अन्तराल में ही, वे अपने कल के उपकारियों के साथ अचानक बिना किसी तुक या तर्क के अपने घातक शत्रु के समान व्यवहार करते हुए, एक मुस्कुराते हुए, 'उदार हृदय' वाले व्यक्ति से एक कुरूप और जघन्य हत्यारे में बदल जाते हैं" ("वचन देह में प्रकट होता है" में "परमेश्वर का कार्य और मनुष्य का अभ्यास")। आज, हालांकि मैं शैतान की गिरफ़्त में पड़ गई थी, मैं परमेश्वर को धोखा नहीं दूंगी, चाहे कुछ भी हो जाए। चाहे मुझे कितनी भी बड़ी कठिनाई का सामना करना पड़े, उस पर ध्यान दिए बिना, मैं अपनी त्वचा को बचाने के लिए यहूदा नहीं बनूंगी, मैं परमेश्वर के लिए पीड़ा और दुःख पैदा नहीं करूंगी। उस यहूदा द्वारा धोखा दिये जाने के परिणामस्वरूप, दुष्ट पुलिस ने अपनी यातना को बढ़ा दिया। इस बीच, वह महिला एक तरफ खड़ी हो गई और बोली, "तुम्हें भले-बुरे की पहचान नहीं है, तुम्हारे साथ यही होना चाहिए। तुम मेरी दया की कद्र नहीं करती हो, तुम तो यातनाओं से मार दिए जाने के योग्य हो।" इन विद्वेषपूर्ण, दुष्ट शब्दों को सुनकर मैं क्रोध से भड़क उठी—पर साथ ही मुझे एक अकथनीय उदासी के भाव का भी एहसास हुआ। मैं रोना चाहती थी लेकिन मुझे पता था कि मुझे ऐसा नहीं करना चाहिए। मैं नहीं चाहती थी कि शैतान मेरी कमज़ोरी को देखे। मेरे दिल में, मैंने चुपके से प्रार्थना की: "हे परमेश्वर, मैं चाहूंगी कि मेरा दिल तुम्हारा हो जाए। यद्यपि मैं इस समय तुम्हारे लिए कुछ भी नहीं कर सकती हूँ, मैं शैतान और इस दुष्ट व्यक्ति को पूरी तरह से शर्मिंदा कर उनके सामने तुम्हारी विजय की गवाही देना चाहती हूँ, और इससे तुम्हारे दिल को राहत पहुँचाना चाहती हूँ। हे परमेश्वर, मैं चाहती हूँ कि तुम मेरे दिल की रक्षा करो और मुझे मजबूत बनाओ। अगर मुझे रोना आए भी, तो मेरे आँसू भीतर प्रवाहित हों, उन्हें मैं उन लोगों को दिखाना नहीं चाहूंगी। मुझे खुश होना चाहिए क्योंकि मैं सच्चाई को समझती हूँ, क्योंकि तुमने मेरी दृष्टि को परिमार्जित कर दिया है, तुमने मुझे भेद करने की क्षमता दी है, और तुमने शैतान की प्रकृति और सार को जो तुम्हारा विरोध करने, तुम्हें धोखा देने के लिए है, स्पष्ट रूप से मुझे देखने दिया है। शुद्धिकरण के दौरान, मैंने यह भी देखा है कि तुम्हारा प्रज्ञ हाथ कैसे हर चीज़ को व्यवस्थित कर देता है। मैं होने वाली पूछताछ का सामना करने और शैतान को परास्त करने के लिए तुम पर भरोसा करना चाहती हूँ, ताकि तुम मुझमें महिमा पाओ।" प्रार्थना करने के बाद, मेरे दिल में तब तक आराम न करने की ताक़त हो आई, जब तक कि मैं परमेश्वर की गवाही पूरी नहीं कर लेती। मुझे पता था कि यह सब परमेश्वर ने मुझे दिया था, कि परमेश्वर ने मुझे महान सुरक्षा प्रदान की है और मुझे बहुत प्रेरित किया है। दुष्ट पुलिस उस उत्पाती व्यक्ति का उपयोग कर मुझसे परमेश्वर को धोखा दिलवाना चाहती थी, परन्तु परमेश्वर एक बुद्धिमान परमेश्वर है, और उसने इसके बदले में उस उत्पाती व्यक्ति को ही मुझे भ्रष्ट मानवजाति की विद्रोही प्रकृति को दिखा देने के लिए नियुक्त किया, जिससे परमेश्वर को संतुष्ट करने के लिए मेरा संकल्प और विश्वास उद्दीप्त हो गया। इसके अलावा भी, मुझे परमेश्वर के बुद्धिमत्तापूर्ण कार्य के बारे में कुछ जानकारी मिली, मैंने देखा कि परमेश्वर अपनी प्रजा के लोगों को सिद्ध करने के लिए, जो कुछ भी है उस पर शासन करता है और उसको युक्तिपूर्वक इस्तेमाल करता है। यह शैतान को हराने के लिए परमेश्वर द्वारा ज्ञान के उपयोग का लौह-तथ्य है।

यह देखकर कि, जो कुछ भी वे चाहते थे उसे मैं बता दूं, ऐसा वे नहीं कर पा रहे थे, अब उन्होंने कोई भी कसर नहीं छोड़ी—चाहे वह जनशक्ति हो, या भौतिक और वित्तीय संसाधन हो—उन्होंने एड़ी-चोटी का ज़ोर लगा दिया, इस सबूत को पाने के लिए कि मैं परमेश्वर में विश्वास करती थी। तीन महीने बाद, उनकी सारी भाग-दौड़ किसी काम की नहीं रही थी। अंत में, उन्होंने अपना तुरुप का पत्ता खेला: उन्हें पूछताछ का एक विशेषज्ञ मिला। ऐसा कहा जाता था कि जो भी उसके समक्ष लाया गया था, उसे वह अपनी तीन प्रकार की यातनाओं के अधीन करता था, और ऐसा कोई न रहा था जिसने क़बूल न किया हो। एक दिन, चार पुलिस अधिकारी आए और मुझसे बोले, "आज हम तुम्हें एक नए घर पर ले जा रहे हैं"। इसके बाद उन्होंने मुझे एक क़ैदी परिवहन गाड़ी में धकेल दिया, पीठ के पीछे मेरे हाथों पर बेड़ियाँ लगा दीं, और मेरे सिर पर एक टोप लगाया। उस स्थिति में मैंने सोचा कि वे गुप्त रूप से मुझे मौत की सजा देने के लिए बाहर ले जा रहे थे। मेरे दिल में मैं आतंकित हुए बिना न रह सकी। लेकिन बाद में मैंने उस स्तुति-गीत के बारे में सोचा जिसे मैं यीशु में विश्वास करते समय गाया करती थी: "कलीसिया के शुरुआती समय से, जो लोग परमेश्वर का अनुसरण करते हैं, उन्हें एक बड़ी क़ीमत चुकानी पड़ी है। हज़ारों आध्यात्मिक आत्मीयजनों ने सुसमाचार की खातिर ख़ुद को क़ुर्बान दिया है, और इस प्रकार उन्होंने अनन्त जीवन प्राप्त किया है। परमेश्वर के लिए शहीद होना है, मैं परमेश्वर के लिए शहीद होकर मरने के लिए तैयार हूँ।" उस दिन, अंततः मैं इस स्तुति-गीत को समझ गई: जो लोग परमेश्वर का अनुसरण करते हैं, उन्हें एक बड़ी क़ीमत का भुगतान करना होगा। मैं भी परमेश्वर के लिए मरने को तैयार थी। आश्चर्य की बात है कि, गाड़ी में बैठने के बाद, मैंने अनायास दुष्ट पुलिस वालों के बीच होती बातचीत को सुन लिया। ऐसा लगा कि वे पूछताछ करने के लिए मुझे कहीं और ले जा रहे थे। आह, वे मुझे मार डालने के लिए नहीं ले जा रहे थे—और मैं तो परमेश्वर के लिए शहीद होकर मरने की तैयारी कर रही थी! जैसे ही मैं यह सोच रही थी, किसी अज्ञात कारण से पुलिस में से एक ने मेरे सिर पर टोप की डोरियों को और कसकर बाँध दिया। इसके तुरंत बाद, मुझे असहज महसूस होना शुरू हो गया—ऐसा लगा कि मेरा दम घुट रहा था। मैंने मन ही मन सोचा कि क्या वे वास्तव में मुझे मृत्यु तक की यातना देने जा रहे थे। उस पल, मैंने सोचा कि यीशु के शिष्यों ने सुसमाचार फैलाने के लिए कैसे खुद को बलिदान कर दिया था। मैं डरपोक बनने वाली नहीं थी। यहाँ तक कि अगर मैं मर भी गई, तो भी मैं उन्हें टोप को ढीला करने के लिए विनती नहीं करुँगी, और उससे भी कम संभव था कि मैं हार मान लूंगी। लेकिन मैं खुद को नियंत्रित नहीं कर सकी: मैं बेसुध हो गई और उन पर लुढ़क पड़ी। यह सब होते देखकर, पुलिस ने जल्दी ही टोप को कुछ ढीला कर दिया। मेरे मुंह पर झाग आने शुरू हो गए, और फिर मैं उल्टी को रोक न सकी। ऐसा लगा कि मैं अपने अंदर का सब कुछ उल्टी में उगलने जा रही थी। मुझे चक्कर आने लगे, मेरा सिर मुझे खाली लगा, और मैं अपनी आंखें नहीं खोल सकी। मेरे शरीर में कहीं भी कोई ताक़त नहीं थी, जैसे कि मुझे लकवा मार गया हो। ऐसा लगा कि मेरे मुंह में कुछ चिपचिपा-सा था जिसे मैं बाहर नहीं उगल पा रही थी। मैं तो वैसे ही हमेशा नाज़ुक-सी हुआ करती थी, और इस तरह के दुर्व्यवहार के बाद मुझे लगा कि मैं मुसीबत में थी, कि मेरी सांस किसी भी समय बंद हो सकती थी। दर्द के बीच, मैंने परमेश्वर से प्रार्थना की: "हे परमेश्वर! मुझे लगता है अब मैं नहीं बचूंगी। अगर यह दुष्ट पुलिस सच में मुझे यातना देकर मार डालना चाहती है तो मैं खुशी से तुम्हें संतुष्ट करने के लिए मृत्यु का उपयोग करूंगी और तुम्हारी गवाही दूंगी। सीसीपी के शैतान मेरे शरीर को मार सकते हैं आत्मा को नहीं। मुझे भरोसा है कि जो कुछ भी तुम करते हो, वह धर्मी होता है, और मैं चाहती हूँ कि तुम मेरे दिल की रक्षा करो, ताकि मैं तुम्हारे द्वारा आयोजित और व्यवस्थित हर चीज़ को सम्मानपूर्वक स्वीकार कर सकूँ।" कुछ समय बाद, हमारी गाड़ी एक होटल में पहुंची। उस समय, मेरा पूरा शरीर कमज़ोर महसूस हो रहा था और मैं अपनी आंखें नहीं खोल सकी। वे मुझे एक मुहरबंद कमरे में ले गए। सीसीपी सरकार के कई चापलूस मेरे आसपास खड़े थे, और मैं केवल उन्हें मेरे बारे में चर्चा करते हुए सुन सकती थी, वे यह कह रहे थे कि मैं लियू हुलन जैसी दिख रही थी। आँखें खोलने वाली, कितनी प्रभावशाली बात! वह तो लियू हुलन से भी सख्त है! यह सुनकर मेरे दिल में उत्तेजना उमड़ पड़ी। मैंने यह देखा कि आस्था के सहारे रहने और परमेश्वर पर भरोसा करने से शैतान पर निश्चित रूप से विजय हासिल होती ही है, कि शैतान परमेश्वर के चरणों में था! मैंने परमेश्वर का धन्यवाद किया और उसकी प्रशंसा की। इस समय, मैं दर्द को भूल गई। परमेश्वर को महिमा देकर मुझे बहुत ही संतोष महसूस हुआ।

इसके तुरंत बाद, पुलिस ने जिस "पूछताछ विशेषज्ञ" का ज़िक्र किया था, वह पहुंच गया। जैसे ही उसने प्रवेश किया, वह चिल्ला उठा: "वह बेवकूफ़ कुतिया कहाँ है? मैं ज़रा देखूं"! वह मेरे सामने आया और उसने मुझे पकड़ लिया। मेरे चेहरे पर दर्ज़नों थप्पड़ जड़ देने के बाद, उसने मुझे छाती और पीठ पर कई बार घूंसों से मारा, फिर अपने चमड़े के जूतों में से एक को निकाल लिया और उससे मुझे चेहरे पर मारा। इस तरह उसके द्वारा पीटे जाने के बाद, मुझे अब वह एहसास नहीं रहा कि कुछ ऐसा था जो मैं अपने मुंह या पेट से नहीं निकाल सकती थी। धुंध भी मेरे दिमाग़ से हट गई और मैं अब अपनी आंखें खोल सकती थी। धीरे-धीरे मेरे अंगों में सुध वापस आ रही थी, और मेरे शरीर में ताक़त लौटने लगी थी। इसके बाद, उसने बेदर्दी से मेरे कंधों को पकड़ा और मुझे दीवार पर धकेल दिया, उसने मुझे उसकी ओर देखने और उसके सवालों के जवाब देने का आदेश दिया। यह देखकर कि मैं उसकी ओर कोई ध्यान नहीं दे रही थी, वह कुपित हो उठा, और उसने परमेश्वर की बुराई, निंदा और बदनामी करने के माध्यम से मुझसे प्रतिक्रिया प्राप्त करने की कोशिश की। मुझे फँसाने के लिए उसने सबसे ज्यादा घृणास्पद, घटिया तरीकों का उपयोग किया, और अनिष्टता से कहा: "मैं जानबूझकर तुम्हें वे यातनाएं दे रहा हूँ जो तुम्हारे शरीर और आत्मा के लिए असहनीय हो, जिससे तुम्हें ऐसा दर्द हो जिसे कोई भी सामान्य व्यक्ति सहन नहीं कर सकता—तुम चाहोगी कि तुम मर जाओ। अंत में, तुम मुझसे गिड़गिड़ाओगी कि मैं तुम्हें जाने दूँ, और तभी तुम कुछ काम की बात करोगी, और मानोगी कि तुम्हारा नसीब परमेश्वर के हाथों में नहीं—बल्कि मेरे हाथों में है। अगर मैं तुम्हारी मौत चाहूँ, तो यह तुरंत हो जाएगी; अगर मैं तुम्हें जीने देना चाहूँ, तो तुम जीवित रहोगी; और जो भी कष्ट मैं तुम्हें देना चाहूँ, वह तुम्हें भुगतना होगा। तुम्हारा सर्वशक्तिमान परमेश्वर तुम्हें नहीं बचा सकता—तुम तभी जीवित रहोगी जब तुम हमसे तुम्हें बचाने के लिए प्रार्थना करोगी।" इन घृणास्पद, बेशर्म घिनौने ठगों, जंगली जानवरों और दुष्ट राक्षसों का सामना करते हुए, मैंने वास्तव में उनसे लड़ना चाहा। मैंने सोचा, "आकाश और पृथ्वी की सभी चीज़ें परमेश्वर द्वारा सृजित और नियंत्रित हैं। मेरा भाग्य भी परमेश्वर की संप्रभुता और व्यवस्थाओं के अधीन है। परमेश्वर जीवन और मृत्यु का फैसला करने वाला है; क्या तुम लोगों को लगता है कि मैं बस इसलिए मर जाउंगी क्योंकि तुम ऐसा चाहते हो?" उस पल, मेरा दिल आक्रोश से भर गया था। मुझे लगा जैसे मैं इसे अब रोक नहीं पाऊँगी; मैं चीखना चाहती थी, लड़ना चाहती थी, मैं उनके लिए यह घोषित करना चाहती थी: "एक इंसान कभी भी एक कुत्ते से दया के लिए प्रार्थना नहीं करेगा"! मेरा मानना था कि यह एक न्यायोचित भावना थी—लेकिन यह आश्चर्य की बात रही कि जितना अधिक मैंने इस तरह से सोचा, मैं अंदर से उतनी ही अंधकारमय बन गई। मैंने खुद को प्रार्थना के वचनों से विहीन पाया, मैं किसी भी स्तुति-गीत के बारे में सोचने में असमर्थ रही। मेरे विचार धुंधले होते गए, मुझे नहीं पता था कि क्या करना है, और उस समय मुझे थोड़ा डर लगना शुरू हो गया। मैंने जल्दी से परमेश्वर के सामने खुद को शांत किया। मैंने आत्म-निरीक्षण किया, और खुद को जानने की कोशिश की, और उस समय परमेश्वर के न्याय के वचन मेरे पास आए: "आप जिसकी प्रशंसा करते हैं वह मसीह की विनम्रता नहीं...। आप मसीह की सुन्दरता या बुद्धि से प्रेम नहीं करते हैं ..." ("वचन देह में प्रकट होता है" में "क्या आप परमेश्वर के एक सच्चे विश्वासी हैं?")। हाँ—मैंने मसीह को बहुत छोटा माना था, मैंने ताक़त और प्रभाव की सराहना की थी, न कि मसीह की नम्रता की, और भी बहुत कम मैंने परमेश्वर के छिपे कार्य के ज्ञान की प्रशंसा की थी। शैतान को हराने के लिए परमेश्वर अपने ज्ञान का उपयोग करता है, वह शैतान के सच्चे चेहरे को प्रकट करने और दुष्टों को दंडित करने के सबूत इकट्ठा करने के लिए अपनी विनम्रता और छिपेपन का उपयोग करता है। इसी तरह, पुलिसकर्मियों द्वारा मेरे खिलाफ किये गए घृणित कृत्य और आज परमेश्वर की निंदा और विरोध करने वाली जो बातें उन्होंने कही थीं, वे सब उनके उस शैतानी सार को स्पष्ट रूप से उजागर करती हैं जो सत्य से नफरत करता है और परमेश्वर का विरोधी है, और यह वह सबूत है जिसके आधार पर परमेश्वर द्वारा दोषी ठहराया जाना, सज़ा पाना और विनाश निश्चित हो जाता है। फिर भी, मैं मसीह की बुद्धि और विनम्रता को देखने में असफल रही, मैं सोचती थी कि "एक दयालु इंसान पर सभी रोब जमाते हैं, जैसे कि एक शांत घोड़े पर सवारी की जाती है," मैं अपमानित होने और सताये जाने से संतुष्ट नहीं थी। मैं तो यह भी मानती थी कि मुंहतोड़ जवाब देना सबसे उचित, सम्मानजनक, और साहसी बात है। मुझे कहाँ पता था कि शैतान मुझे उनके खिलाफ़ लड़ने के लिए उत्तेजित करना चाहता था, जिससे मुझे परमेश्वर में मेरे विश्वास के तथ्य को स्वीकार करने के लिए मजबूर किया जाए और मुझे दोषी ठहराया जा सके। अगर मैं वास्तव में उनसे आवेगपूर्ण साहस के साथ लड़ती हूँ, तो क्या मैं उनकी धोखाधड़ी की योजनाओं का शिकार नहीं बन जाऊँगी? समय पर मिली ताड़ना और न्याय के लिए मैं परमेश्वर की सचमुच आभारी थी, जिसने मुझे अपने विद्रोह के बीच सुरक्षा प्रदान की, जिससे मैं शैतान की धोखाधड़ी की योजनाओं को देख सकी और शैतान के विष को अपने भीतर पहचान सकी, और जिससे मैंने थोड़ा-सा यह ज्ञान प्राप्त किया कि परमेश्वर क्या है, और मैं परमेश्वर के विनम्र और छिपे हुए जीवन के सार को जान सकी। मैंने सोचा कि कैसे मसीह ने सीसीपी के शैतान के उत्पीड़न का, उसके द्वारा पीछा किये जाने का और मारे जाने का सामना किया, और कैसे पूरी मानव जाति ने उसके बारे में निर्णय पारित किया, और उसकी निंदा की, उसका तिरस्कार किया, और उसे त्याग दिया। इस सभी के दौरान, वह चुपचाप सब कुछ सहता रहा, अपने कार्य को पूरा करने के लिए उसने इस दर्द को धीरज के साथ सहा, और कभी उसने शिकायत नहीं की। मैंने देखा कि परमेश्वर का स्वभाव कितना दयालु, कितना सुंदर, और आदरणीय है! इसके दरम्यान, मैं—एक अशुद्ध, भ्रष्ट व्यक्ति—अपनी अनुमानित गरिमा को कायम रखने के लिए मैं अपने आवेगपूर्ण साहस का उपयोग करना चाहती थी, दुष्ट दानवों द्वारा सताये जाने पर, मैं अपनी ही इच्छा के आधार पर अपने स्वयं के न्याय के लिए लड़ना चाहती थी। इसमें न्याय की भावना कहाँ थी? और चरित्र की ताकत और गरिमा कहाँ थी? इसमें, क्या मैं अपना बदसूरत शैतानिक चेहरा नहीं दिखा रही थी? क्या मैं इसमें अपनी घमंडी प्रकृति को प्रकट नहीं कर रही थी? यह सोचकर, मेरा दिल पछतावे से भर गया। मैंने मसीह का अनुकरण करने के लिए अपना मन पक्का कर लिया। मैं इस माहौल में समर्पित होने के लिए तैयार थी और शैतान के लिए कोई अवसर नहीं छोड़ते हुए, परमेश्वर के साथ सहयोग करने की पूरी कोशिश करना चाहती थी।

मेरा दिल शांत होने लगा, और मैंने चुपचाप राक्षसों के साथ इस युद्ध के अगले दौर का इंतज़ार किया। क़बूल करने से मेरे इनकार ने उस अनुमानित विशेषज्ञ के नाम को बहुत अधिक चोट पहुंचाई थी। उसने मेरी पीठ के पीछे मेरी एक बाँह को मजबूती से मोड़ दिया और दूसरी बाँह को मेरे कंधे के पीछे खींच लिया, फिर कसकर मेरे हाथों को हथकड़ी पहना दी। आधे घंटे से भी कम समय के बाद, पसीने की बड़ी बूंदें मेरे चेहरे से टपक रही थीं, जिससे मैं अपनी आंखें नहीं खोल पा रही थी। यह देखकर कि मैं अभी भी उसके सवालों के जवाब नहीं दे रही थी, उसने मुझे जमीन पर पटक दिया, फिर मुझे मेरी पीठ के पीछे लगी हथकड़ियों से उठा लिया। मेरी बाहें दर्द से बज उठीं, जैसे कि वे टूट ही गई हों। यह इतना दर्दनाक था कि मैं मुश्किल से सांस ले पा रही थी। इसके बाद, उसने मुझे दीवार पर फेंक दिया और मुझे उसके सहारे खड़ा कर दिया। पसीना मेरी आंखों को धुंधला कर रहा था। यह इतना दुखदाई था कि मेरा पूरा शरीर पसीने से ढक गया था—यहाँ तक कि मेरे जूते भी भीग गए थे। मैं वैसे भी हमेशा कमज़ोर रही थी, और इस पल तो मैं लुढ़क ही पड़ी। मैं बस इतना कर सकती थी कि मैं मुंह से हाँफने लगी। वह राक्षस मुझे देखते हुए एक तरफ़ खड़ा था। मुझे नहीं पता कि उसने क्या देखा—शायद वह डर गया था कि अगर मैं मर गई तो उसे दोषी ठहराया जाएगा—उसने जल्दी से मेरे पसीने को दूर करने के लिए कुछ कागज़ के रूमाल उठाये, और फिर मुझे एक कप पानी पिलाया। उसने यह हर आधे घंटे से भी कम समय में इसे बार-बार किया था। मुझे नहीं मालूम कि उस समय मैं कैसी दिख रही थी। मुझे लगता है कि यह बहुत डरावना रहा होगा, क्योंकि मैं केवल अपने मुंह को खोल सकती थी; ऐसा लगता है कि मैंने अपनी नाक से सांस लेने की क्षमता ही खो दी थी। मेरे होंठ सूखे थे और फट गए थे और सांस लेने के लिए मुझे अपनी सारी शक्ति लगानी पड़ रही थी। मुझे एक बार फिर मौत क़रीब आते महसूस हुई—शायद इस बार मैं वास्तव में मर जाऊंगी। लेकिन उस पल में, पवित्र आत्मा ने मुझे प्रबुद्ध किया। मैंने लूका, यीशु के शिष्यों में से एक, के बारे में और जीते-जी फांसी पाने के उसके अनुभव के बारे में सोचा। मेरे दिल में, मैंने सहज रूप से अपनी ताक़त वापस हासिल कर ली, और खुद को याद दिलाने के लिए एक ही बात दुहराती रही: "लूका जीते-जी फांसी दिए जाने से मर गया। मुझे भी लूका जैसा होना चाहिए, मुझे लूका बनना चाहिए, लूका होना ... मैं स्वेच्छा से परमेश्वर के आयोजनों और उसकी व्यवस्थाओं का पालन करुँगी, मैं लूका की तरह मृत्यु पर्यंत परमेश्वर के प्रति वफादार होना चाहती हूँ।" जैसे ही दर्द असहनीय हो लिया और मैं मृत्यु के कगार पर आ गई, मैंने अचानक एक दुष्ट पुलिस को यह कहते हुए सुना कि सर्वशक्तिमान परमेश्वर में विश्वास रखने वाले कई भाइयों और बहनों को गिरफ्तार कर लिया गया था। मेरे दिल में, मैं चौंक गई: कई अन्य भाइयों और बहनों को यह यातना दी जाने वाली है। निश्चित रूप से वे भाइयों पर विशेष रूप से भारी पड़ेंगे। मेरा दिल चिंता से भर गया था। मैं चुपचाप उनके लिए प्रार्थना करती रही, मैंने चाहा कि परमेश्वर उनकी रक्षा करे, कि वे सब शैतान पर विजय की गवाही दे सकें और कभी परमेश्वर को धोखा न दें, क्योंकि मैं नहीं चाहती थी कि अन्य कोई भी भाई या बहन इस तरह पीड़ित हो। शायद मुझे पवित्र आत्मा ने छुआ था; मैंने अनवरत प्रार्थना की, और मैंने जितनी अधिक प्रार्थना की, मैं उतनी ही प्रेरित होती गई। मैं अनजाने में अपना दर्द भूल गई। मैं पूरी तरह से जानती थी कि ये सब परमेश्वर की बुद्धिमान व्यवस्थाएं थीं; परमेश्वर मेरी कमज़ोरी का ध्यान रखता था, और वह मेरी अगुआई करते हुए मेरे सबसे दर्दनाक समय से होकर मुझे आगे ले जा रहा था। उस रात, मैंने अब परवाह नहीं करी कि दुष्ट पुलिस ने मुझसे कैसा व्यवहार किया, और उनके सवालों पर ज़रा-सा भी ध्यान नहीं दिया। यह होते देखकर, दुष्ट पुलिस ने मेरे चेहरे को सख्ती से मारने के लिए अपनी मुट्ठियों का इस्तेमाल किया, फिर कनपटियों के बालों को अपनी उंगलियों में लपेट कर उन्हें खींचा और मरोड़ा। मेरे कान मोड़ने से सूज गए थे, मेरा चेहरा पहचानना मुश्किल था, लकड़ी के मोटे टुकड़े से मारे जाने के कारण मेरे निचले और ऊपरी पैरों पर खरोंचें पड़ गईं थीं और खाल निकल रही थी, मेरे पैर की उंगलियाँ भी लकड़ी से कुचले जाने के कारण काली और नीली हो गई थीं। छः घंटों तक मुझे हथकड़ियों से लटकाने के बाद, जब दुष्ट पुलिस ने हथकड़ियाँ खोलीं, तो उन्होंने मेरे बाएं अंगूठे के नीचे के मांस को खरोंच दिया था—हड्डी पर केवल एक पतली परत छोड़ी गई थी। हथकड़ियों ने मेरी कलाइयों को भी पीले फफोलों से ढक दिया था, और उन्हें फिर से पहन सकने का कोई तरीका नहीं था। उस पल में, एक महत्वपूर्ण दिखने वाली महिला पुलिस अधिकारी अंदर आई। उसने मुझे ऊपर से नीचे तक देखा, फिर उनसे कहा: "अब तुम इसे और नहीं पीट सकते—वह मरने वाली है।"

पुलिस ने मुझे होटल के एक कमरे में बंद कर दिया। इसके पर्दे दिन में चौबीस घंटे कसकर बंद कर दिए गए थे। किसी को दरवाज़े पर पहरा देने के लिए नियुक्त किया गया था, और सेवाकर्मियों में से किसी को भी प्रवेश करने की इजाज़त नहीं थी, और न ही किसी को भी कमरे के अंदर होती ताड़ना और बर्बरता के दृश्यों को देखने की इजाज़त थी। उन्होंने बारी-बारी से बिना किसी राहत के मुझसे पूछताछ की। पांच दिन और रात के लिए, उन्होंने मुझे सोने नहीं दिया, उन्होंने मुझे बैठने की अनुमति नहीं दी, और न ही उन्होंने मुझे मेरे भोजन को खाने की अनुमति दी। मुझे केवल दीवार पर टिक कर खड़े होने की इजाज़त थी। एक दिन, एक अधिकारी मुझसे पूछताछ करने आया। यह देखकर कि मैं उसे अनदेखा कर रही थी, वह आगबबूला हो गया और मुझे एक ठोकर से उड़ाकर मेज के नीचे भेज दिया। इसके बाद, उसने मुझे बाहर खींचा और घूंसों से मारा, जिससे मेरे मुंह के कोने से खून बहने लगा था। अपनी वहशियत को ढकने के लिए, उसने जल्दी से दरवाज़ा बंद कर दिया ताकि कोई अंदर न आ सके। फिर उसने कुछ कागज के कुछ रूमाल लिए और मेरे खून को साफ़ दिया, मेरे चेहरे के खून को पानी से धोया और फर्श से खून को हटा दिया। मैंने जानबूझकर अपने सफेद स्वेटर पर कुछ रक्त छोड़ दिया। जब मैं हिरासत केंद्र में लौट आई, तो दुष्ट पुलिस ने अन्य कैदियों को बताया कि मेरे कपड़ों पर खून तब से था जब मुझे मानसिक अस्पताल में प्रमाणित किया जा रहा था, और उनसे कहा कि मैं पिछले कई दिनों से वहीं थी। मेरे शरीर पर घाव और खून के निशान रोगियों के कारण थे—उन्होंने, अर्थात पुलिस ने मुझे छुआ भी नहीं था...। इन निर्मम तथ्यों ने मुझे "जनता की पुलिस" की क्रूरता, कपटपूर्ण चालाकी और अमानवीयता दिखायी और मैंने उनके हाथों में आने वाले लोगों की लाचारी और निराशा को महसूस किया। साथ ही, मैंने परमेश्वर की धार्मिकता, पवित्रता, रोशनी और भलाई की गहरी सराहना प्राप्त की, और महसूस किया कि परमेश्वर से जो कुछ भी आता है वह प्रेम, संरक्षण, प्रबोधन, प्रावधान, आराम और सहारा है। हर बार जब मेरा दर्द सबसे बुरा होता, तो परमेश्वर हमेशा मेरे ज्ञान और हौसले को बढ़ाता रहता था, जिससे मेरे विश्वास और मेरी शक्ति को बढ़ावा मिलता था, मुझे उन संतों की भावना का अनुकरण करने की इजाज़त मिलती थी जो युग-युगों में परमेश्वर के लिए शहीद हुए थे, और मुझे सच्चाई के लिए खड़े होने का साहस मिलता था। जब दुष्ट पुलिस की वहशियत ने मुझे मौत के दरवाज़े पर छोड़ दिया, तो परमेश्वर ने मुझे अन्य भाइयों और बहनों की गिरफ्तारी की खबर सुनने की इजाज़त दी, ताकि मैं उनके लिए प्रार्थना करने के लिए प्रेरित हो सकूं, जिससे मैं अपना दर्द भूल गई और अनजाने में ही मौत की अड़चनों को पार कर गई। बुरे, दुष्ट शैतान की विषमता के लिए धन्यवाद, मैंने देखा कि केवल परमेश्वर ही सत्य, मार्ग और जीवन है, और केवल परमेश्वर का स्वभाव ही धार्मिकता और अच्छाई का प्रतीक है। केवल परमेश्वर ही सब कुछ नियंत्रित करता है, और सब कुछ व्यवस्थित करता है, और वह राक्षसों की भीड़ की घेराबंदी को पराजित करने के लिए, देह की कमज़ोरी और मृत्यु की बाधाओं पर काबू पाने के लिए, अपनी महान शक्ति और अपने ज्ञान का उपयोग करते हुए मेरे हर बढ़ते कदम का मार्गदर्शन करता है, ताकि मैं इस अँधेरी माँद में दृढ़ता से जीवित रह सकूँ। जैसे ही मैंने परमेश्वर के प्रेम और उद्धार के बारे में सोचा, मुझे बहुत प्रेरित महसूस हुआ, और मैंने शैतान से बिलकुल अंत तक लड़ने का संकल्प किया। यहाँ तक कि अगर मैं जेल में सड़ भी गई, तो भी मैं अपनी गवाही में दृढ़ रहूँगी और परमेश्वर को संतुष्ट करुँगी।

एक दिन, कई दुष्ट पुलिसकर्मी जिनसे मैं पहले कभी नहीं मिली थी, मुझे देखने और मेरे मामले पर चर्चा करने के लिए आए। बिना मकसद के, मैंने उस अनुमानित विशेषज्ञ को यह कहते हुए सुना: "अब तक मैंने जितनों की भी पूछताछ की है, मैंने कभी भी वह सख्ती नहीं की है जो मैंने इस बेवकूफ कुतिया के साथ की। मैंने उसे आठ घंटे तक हथकड़ी से लटकाए रखा था (यह वास्तव में छह घंटे तक था, लेकिन वह अपनी बड़ाई कर रहा था, इस डर से कि कहीं उसका ऊपरी अधिकारी यह न कहे कि वह बेकार था), पर इसने फिर भी कबूल नहीं किया"। मैंने एक महिला को यह कहते हुए सुना, "तुम उस लड़की को इतनी बुरी तरह से कैसे पीट सकते हो? तुम क्रूर हो।" यह पता चला कि गिरफ्तार किये गए सभी लोगों के बीच, सबसे अधिक यातना मैंने ही भोगी थी। मुझे इतना क्यों भुगतना पड़ा था? क्या मैं अन्य लोगों की तुलना में अधिक भ्रष्ट थी? क्या मैंने जो यातना सही, वह परमेश्वर की सजा थी? हो सकता है, मुझमें अत्यधिक भ्रष्टता थी, और मैं पहले ही सजा के बिंदु पर पहुंच चुकी थी? इस बारे में सोचकर, मैं अपने आँसुओं को रोक न सकी। मुझे पता था कि मुझे रोना नहीं चाहिए। मैं शैतान को अपने आँसू नहीं दिखा सकती थी, अगर वह देख लेगा तो वह मानेगा कि मैं हार गई थी। फिर भी मैं अपने दिल में कष्ट की भावना को नहीं रोक सकी, और आँसू मेरे नियंत्रण से परे हो गए। मेरी घोर निराशा के बीच, मैं केवल परमेश्वर को पुकार सकती थी: "हे परमेश्वर! इस समय मैं गहराई से दुखी महसूस कर रही हूँ। मैं रोना चाहते रहती हूँ। कृपया मेरी रक्षा करो, मुझे शैतान के सामने अपना सिर झुकाने से रोको—मैं उसे मेरे आंसुओं को नहीं दिखा सकती। मैं जानती हूँ कि जिस मानसिकता में मैं हूँ वह ग़लत है। मैं तुमसे माँगे जा रही हूँ और शिकायत कर रही हूँ। और मुझे पता है कि तुम चाहे जो भी करो, वही सबसे अच्छा होता है—लेकिन मेरा कद बहुत छोटा है, मेरा विद्रोही स्वभाव बहुत बड़ा है, और मैं खुशी से इस तथ्य को स्वीकार करने में असमर्थ हूँ, और न ही मुझे पता है कि इस ग़लत मानसिकता से बाहर निकलने के लिए मुझे क्या करना चाहिए। मैं चाहती हूँ कि तुम मेरा मार्गदर्शन करो, और मुझे अपनी योजनाओं और व्यवस्थाओं का पालन करने दो, और मैं कभी भी तुम्हें ग़लत न समझूँ या शिकायत न करूँ।" जैसे ही मैंने प्रार्थना की, परमेश्वर के वचनों का एक अंश मेरे दिमाग में उभर आया: "तुझे भी उस कड़वे प्याले से अवश्य पीना चाहिए जिससे मैंने पीया है (उसने पुनरुत्थान के बाद यही कहा था), तुझे भी उस मार्ग पर चलना होगा जिस पर मैं चला हूँ, तुझे मेरे लिए अपना जीवन त्यागना होगा" ("वचन देह में प्रकट होता है" में "पतरस ने यीशु को कैसे जाना")। मेरे आँसू तुरंत बंद हो गए। मसीह की पीड़ा किसी भी सृजित जीव की पीड़ा के सामने अतुलनीय थी, न ही यह सृजित जीव के लिए सहनीय थी—जबकि यहाँ मैं अन्याय महसूस कर रही थी और इस थोड़ी-सी कठिनाई के बाद ही परमेश्वर से शिकायत कर रही थी कि यह सब अनुचित था। इसमें विवेक या तर्कसंगत बोध कहाँ था? मैं कैसे मानव कहलाने के योग्य थी? उसके बाद, मैंने सोचा कि परमेश्वर ने क्या कहा था: "लेकिन, उनकी प्रकृति के भीतर के भ्रष्टाचार का हल परीक्षण के माध्यम से किया जाना चाहिए। जिन-जिन पहलुओं में तुमशुद्ध नहीं किए गए हो, इन पहलुओं में तुम्हें परिष्कृत किया जाना चाहिए—यह परमेश्वर की व्यवस्था है। परमेश्वर तुम्हारे लिए एक वातावरण बनाता है, परिष्कृत होने के लिए बाध्य करता है जिससे तुम अपने खुद के भ्रष्टाचार को जान जाओ" ("मसीह की बातचीतों के अभिलेख" में "परीक्षणों के बीच परमेश्वर को कैसे संतुष्ट करें")। परमेश्वर के वचनों पर चिंतन करते हुए और आत्म-निरीक्षण के द्वारा, मुझे समझ में आया कि जो भी परमेश्वर द्वारा व्यवस्थित किया गया था वह मेरी भ्रष्टता और मेरी कमियों को दूर करने के लिए था—और यह ठीक वही था जिसकी मेरे जीवन को आवश्यकता थी। इस अमानवीय यातना और कष्ट से ही मुझे यह बात समझ आई कि मैं अपने देह की ज़्यादा ही खुशामदी करती हूँ, मैं स्वार्थी, नीच, परमेश्वर से अत्यधिक अपेक्षा रखने वाली इंसान हूँ। मैं परमेश्वर के लिए कष्ट सहकर और उसके लिए शानदार गवाही बनकर संतुष्ट नहीं हूँ। अगर मैं इस कष्ट को नहीं सहती, तो मैं इस ग़लतफहमी में जीती रहती कि मैंने परमेश्वर को पहले ही संतुष्ट कर दिया है; मुझे कभी इस बात का एहसास नहीं होता कि मेरे भीतर बहुत भ्रष्टता और विद्रोह है, मुझे इसका सीधे तौर पर अनुभव तो और भी नहीं होता कि परमेश्वर के लिए भ्रष्ट मानवजाति को बचाने के वास्ते, उनके बीच अपना काम करना कितना दुष्कर है। मैंने कभी पूरी तरह से शैतान को भी नहीं त्यागा होता न ही कभी फिर से परमेश्वर के सामने लौटती। यह कठिनाई ही मेरे लिए परमेश्वर का प्यार था, यह मेरे लिए उसका विशेष आशीर्वाद था। परमेश्वर की इच्छा को समझने के बाद, मेरे दिल ने अचानक स्पष्ट और उज्ज्वल महसूस किया। परमेश्वर के बारे में मेरी ग़लतफ़हमी ग़ायब ही हो गई। मुझे लगा कि उस दिन मेरे द्वारा कठिनाई का सामना कर सकना बहुत मूल्यवान और अर्थपूर्ण था!

हर संभव कोशिश करने के बाद, दुष्ट पुलिस को मुझसे कुछ भी नहीं मिला था। अंत में, उन्होंने दृढ़ विश्वास के साथ कहा: "कम्युनिस्ट लोग इस्पात के बने होते हैं, लेकिन जो लोग सर्वशक्तिमान परमेश्वर में विश्वास करते हैं वे हीरे के बने होते हैं—वे हर मामले में कम्युनिस्टों की तुलना में उच्चतर स्तर के होते हैं।" इन शब्दों को सुनने के बाद मैं अपने दिल में परमेश्वर की वाहवाही और प्रशंसा किये बिना न रह सकी: हे परमेश्वर, मैं तुम्हारा धन्यवाद करती हूँ और तुम्हारी प्रशंसा करती हूँ! अपनी सर्वशक्तिमानता और अपने ज्ञान से तुमने शैतान को दूर किया है और अपने दुश्मनों को हराया है। तुम ही सर्वोच्च सत्ता हो, और तुम्हारी महिमा हो! केवल इस पल में मैंने देखा कि सीसीपी चाहे जितनी भी क्रूर हो, इसका नियंत्रण और आयोजन परमेश्वर के हाथों में है। जैसा कि परमेश्वर के वचन कहते हैं: "आकाश एवं धरती की सभी चीज़ों को उसके प्रभुत्व के अधीन आना होगा। उनके पास कोई विकल्प नहीं हो सकता है, और उन सब को उसी के आयोजनों के अधीन होना होगा। इसकी आज्ञा परमेश्वर ने दी थी, और यह परमेश्वर का अधिकार है" ("वचन देह में प्रकट होता है" में "सफलता या असफलता उस पथ पर निर्भर होती है जिस पर मनुष्य चलता है")।

एक दिन, दुष्ट पुलिस एक बार फिर मुझसे पूछताछ करने आई। इस बार वे सब कुछ अजीब लग रहे थे। बात करते वक़्त वे मेरी ओर देखते थे, लेकिन ऐसा नहीं लगता थे कि वे मुझसे बात कर रहे थे। वे आपस में कुछ चर्चा करते हुए लगे। पिछले मौकों की तरह, यह पूछताछ भी विफलता में समाप्त हुई। बाद में, दुष्ट पुलिस मुझे अपनी कोठरी में वापस ले आई। राह में, मैंने अनायास उन्हें यह कहते हुए सुन लिया कि ऐसा लगता था कि मुझे अगले महीने के पहले दिन रिहा कर दिया जाएगा। यह सुनकर, मेरा दिल उत्साह से लगभग फट गया: इसका मतलब है कि मैं तीन दिनों में बाहर निकल जाउंगी! अंततः मैं इस पैशाचिक नरक को छोड़ सकूँगी। अपने दिल की ख़ुशी को दबाकर, मैंने उम्मीद की और हर गुजरते पल के साथ इंतज़ार किया। तीन दिन, तीन साल की तरह ज्यादा महसूस हुए। अंततः, महीने का पहला दिन भी आ पहुंचा! मैंने दरवाज़े पर टकटकी लगाये रखी, इस बात की प्रतीक्षा करते हुए कि कोई मेरा नाम पुकारेगा। सुबह बीत गई, और कुछ भी नहीं हुआ। मैंने अब अपनी सारी उम्मीदें दोपहर में निकल जाने पर लगा दी—पर जब शाम हो आई, तब भी कुछ नहीं हुआ। जब शाम के भोजन का समय आया, तो मुझे खाने की इच्छा नहीं हुई। मेरे दिल में, एक हानि की भावना थी; उस पल में ऐसा लगा जैसे मेरा दिल स्वर्ग से गिर कर नरक में आ गया था। संतरी ने अन्य क़ैदियों से पूछा, "वह खा क्यों नहीं रही है?" क़ैदियों में से एक ने जवाब दिया, "उस दिन पूछताछ से वापस आने के बाद से उसने कुछ ख़ास नहीं खाया है।" संतरी ने कहा, "उसके माथे को छू कर देखो, क्या वह बीमार है?" एक कैदी ने आकर मेरे माथे पर हाथ रखकर देखा। उसने कहा कि यह बहुत गर्म था, कि मुझे बुखार था। मुझे वास्तव में बुखार था। बीमारी बहुत अचानक आई थी, और यह बहुत गंभीर थी। उसी पल, मैं गिर गई। अगले दो घंटों के दौरान, बुखार और भी बदतर होता गया। मैं रो पड़ी! संतरी सहित सभी ने मुझे रोते देखा। वे सभी हैरान थे: मेरे बारे में उनकी धारणा यह थी कि मैं कुछ ऐसी थी जो उदासीन, भावनाहीन और सुख-दुःख से परे हो, जिसने हर बार घोर यातना के बाद एक भी आंसू नहीं गिराया था, जिसे छह घंटों के लिए हथकड़ियों से लटकाया गया था, बिना किसी कराह के। फिर भी आज, बिना किसी यातना के, मैं रो गई थी। उन्हें नहीं पता था कि मेरे आँसू क्यों आए थे—उन्होंने बस सोच लिया कि मैं बहुत ही बीमार थी। केवल मुझे और परमेश्वर को इसका कारण मालूम था। यह सब मेरे विद्रोह और मेरी अवज्ञा के कारण था। ये आँसू इसलिए बह आए थे कि मुझे निराशा हुई थी जब मेरी उम्मीदें नाकाम हुईं और मेरी आशाओं को धराशायी कर दिया गया था। वे आँसू विद्रोह और शिकायत के थे। उस पल में, मैं अब परमेश्वर के प्रति गवाही देने का अपना संकल्प पक्का करना नहीं चाहती थी। मेरे पास इस तरह की और परीक्षा देने का साहस भी नहीं था। उस शाम को, मैंने दुःख के आँसू रोए, क्योंकि मैं जेल में पर्याप्त रह ली थी, मैंने इन राक्षसों को तुच्छ जाना और उससे भी ज्यादा, मुझे राक्षसों के इस स्थान से नफ़रत थी। मैं वहाँ एक भी पल और रहना नहीं चाहती थी। जितना अधिक मैंने इस बारे में सोचा, मैं उतनी ही मायूस होती गई, और उतनी ही अधिक मुझे शिकायत, दयनीयता और अकेलेपन की एक बड़ी भावना महसूस हुई। मुझे लगा कि मैं समुद्र पर एक अकेली नाव की तरह थी, जिसे किसी भी समय समुद्र का पानी निगल सकता था; इसके अलावा, मुझे लगा कि मेरे आस-पास के लोग इतने कपटी और भयावह थे कि बे किसी भी समय अपने क्रोध को मुझ पर निकाल सकते थे। मैं यह रोदन करने से अपने आप को रोक नहीं पाई: "हे परमेश्वर! मैं तुमसे विनती करती हूँ कि तुम मुझे बचा लो। मैं टूट पड़ने की कगार पर हूँ, मैं तुम्हें कभी भी और कहीं भी धोखा दे सकती हूँ। मैं चाहती हूँ कि तुम मेरे दिल को संभाल लो और मुझे एक बार फिर अपने सामने लौट आने के लिए सक्षम बनाओ, मैं चाहती हूँ कि तुम एक बार और मुझ पर दया करो और मुझे अपने आयोजनों और व्यवस्थाओं को स्वीकार करने दो। यद्यपि मैं समझ नहीं पा रही हूँ कि अभी तुम क्या कर रहे हो, मुझे पता है कि तुम जो भी करोगे वह सब अच्छा होगा, और मेरी इच्छा है कि तुम मुझे एक बार फिर से बचा लो, और मेरे दिल को तुम्हारे पास आने दो।" प्रार्थना करने के बाद, मुझे डर लगना बंद हो गया। मैंने शांत होना शुरू कर दिया और आत्म-विश्लेषण किया, और उस समय परमेश्वर के न्याय और प्रकाशन के वचन मेरे पास आए: "तुझे शरीर चाहिए, या तुझे सत्य चाहिए? तू न्याय की इच्छा करता है या राहत की? परमेश्वर के कार्यों का इतना अनुभव करने के बाद, और परमेश्वर की पवित्रता और धार्मिकता को देखने के बाद, तुझे किस प्रकार अनुसरण करना चाहिए? तुझे इस पथ पर किस प्रकार चलना चाहिए? तू परमेश्वर के प्रति अपने प्रेम को व्यवहार में कैसे ला सकता है? क्या परमेश्वर की ताड़ना और न्याय ने तुझ पर कोई असर डाला है? तुझमें परमेश्वर की ताड़ना और उसके न्याय का ज्ञान है कि नहीं यह इस पर निर्भर करता है कि तू किसे जीता है, और तू किस सीमा तक परमेश्वर से प्रेम करता है! तेरे होंठ कहते हैं कि तू परमेश्वर से प्रेम करता है, फिर भी तू उसी पुराने और भ्रष्ट स्वभाव को जीता है; तुझमें परमेश्वर का कोई भय नहीं है, और तेरे पास विवेक तो बिलकुल भी नहीं है। क्या ऐसे लोग परमेश्वर से प्रेम करते हैं? क्या ऐसे लोग परमेश्वर के प्रति वफादार होते हैं? ... क्या ऐसा कोई इंसान पतरस के समान हो सकता है? क्या वे लोग जो पतरस के समान हैं उनके पास केवल ज्ञान होता है, परन्तु वे उसे जीते नहीं हैं?" ("वचन देह में प्रकट होता है" में "पतरस के अनुभव: ताड़ना और न्याय का उसका ज्ञान")। परमेश्वर के न्याय का हर वचन मेरी कमज़ोर रग पर दुधारी तलवार की तरह था, जो मुझ पर दण्डादेश का ढेर बरसा रहा था: हाँ, कई बार मैंने परमेश्वर के सामने गंभीर शपथ ली थी और कहा था कि मैं सब कुछ छोड़ दूंगी और सच्चाई के लिए हर कठिनाई को सहन करूंगी। फिर भी आज, जब परमेश्वर ने मुझसे कुछ माँगने के लिए तथ्य का इस्तेमाल किया, जब उसे ज़रूरत थी कि मैं पीड़ा उठाऊं और उसे संतुष्ट करने की क़ीमत चुकाऊँ, तो मैंने सच्चाई या जीवन को नहीं चुना था, बल्कि देह के हितों और संभावनाओं को लेकर खुद को अंधाधुंध परेशानी, तनाव और चिंता से जकड़ लिया था। मुझे परमेश्वर पर थोड़ा-सी भी भरोसा नहीं था। इस तरह, मैं कैसे परमेश्वर की इच्छा पूरी कर सकती थी? परमेश्वर चाहता था कि मेरा जीना फलदायी हो। वह अलंकृत, खाली शपथ नहीं चाहता था। फिर भी, परमेश्वर के सामने मुझे जानकारी तो थी, लेकिन कोई वास्तविकता नहीं थी, और परमेश्वर के प्रति, मेरे पास न तो निष्ठा थी और न ही सच्चा प्यार था, मेरे पास आज्ञाकारिता तो और भी कम थी; मैं धोखा, विद्रोह और विरोध के अलावा कुछ भी नहीं जी रही थी। इसमें, क्या मैं कोई ऐसी नहीं थी जिसने परमेश्वर को धोखा दिया हो? क्या मैं कोई ऐसी नहीं थी जिसने परमेश्वर का दिल तोड़ा हो? उस पल में, मैंने उस समय के बारे में सोचा जब प्रभु यीशु को गिरफ्तार किया गया था और क्रूस पर कीलों से जड़ दिया गया था। एक के बाद एक, उन सब लोगों ने जिन्होंने अक्सर उसके अनुग्रह का आनंद लिया था, उसे त्याग दिया। मेरे दिल में, मैं पश्चाताप से अभिभूत हुए बिना न रह पाई। मैंने अपनी विद्रोही अवज्ञा से घृणा की, अपने में मानवता की कमी से नफ़रत की, मैं एक बार फिर खड़ा होना चाहती थी, ठोस कार्यवाही के द्वारा परमेश्वर को दिए गये अपने वादे को सच बनाना चाहती थी। अगर मैं जेल में सड़ भी जाऊं, तो भी मैं कभी परमेश्वर के दिल को फिर से चोट नहीं पहुँचाऊंगी। मैं कभी भी खून की उस क़ीमत को दगा नहीं दे सकती थी जिसका परमेश्वर ने मेरे लिए भुगतान किया था। मैंने रोना बंद कर दिया, और मेरे दिल में मैंने चुपचाप परमेश्वर से प्रार्थना की: हे परमेश्वर, मुझे प्रबुद्ध करने और मार्गदर्शन देने के लिए धन्यवाद, जिससे मैं तुम्हारी इच्छा को समझ सकूँ। मैं देखती हूँ कि मेरा कद बहुत छोटा है, और मुझे तुम्हारे प्रति थोड़ा-सा भी प्यार या कोई आज्ञाकारिता नहीं है। हे परमेश्वर, अभी मैं खुद को पूरी तरह से दे देना चाहती हूँ। यहाँ तक कि अगर मैं अपनी पूरी ज़िंदगी भी जेल में बिता दूं, तो भी मैं शैतान को कोई रियायत नहीं दूंगी। मैं तुम्हें संतुष्ट करने के लिए केवल अपने वास्तविक काम का उपयोग करना चाहती हूँ।

थोड़े समय के बाद, कुछ और भी अफवाहें हुईं कि मुझे रिहा किया जाना था। उन्होंने कहा कि यह केवल कुछ ही दिनों में हो जाएगा। जो सीख मुझे पिछली बार मिली थी, उसके कारण इस बार मैं कुछ हद तक तर्कसंगत और शांत बनी रही। हालांकि मैं बहुत उत्साहित महसूस कर रही थी, मैं प्रार्थना करना और परमेश्वर के सामने रहकर खोज करना चाहती थी, कभी भी फिर अपने ख़ुद के मन की करना नहीं चाहती थी। मैं केवल परमेश्वर से मेरी रक्षा करने के लिए कहूँगी ताकि मैं उनके सभी आयोजनों और व्यवस्थाओं का पालन कर सकूं। कुछ दिनों बाद, अफवाहें एक बार फिर सच नहीं हुईं। और भी, मैंने संतरी को यह कहते हुए सुना कि अगर मैं जेल में मर भी गई, तो भी वे मुझे जाने नहीं देंगे, क्योंकि मैं उन्हें अपने घर का पता और अपना नाम नहीं बता रही थी—इसलिए मुझे हमेशा के लिए जेल में रखा जाएगा। यह सुनना सचमुच बहुत कठिन था लेकिन मुझे पता था कि यह वह दर्द था जिसे मुझे भुगतना होगा। परमेश्वर चाहता था कि मैं उसके प्रति इस गवाही को धारण करूं, और मैं परमेश्वर की आज्ञा मानने और परमेश्वर की इच्छा के सामने नतमस्तक होने के लिए तैयार थी, और मुझे भरोसा था कि सभी बातें और सभी चीजें परमेश्वर के हाथों में ही थीं। यह परमेश्वर की मुझ पर विशेष कृपा और उसके द्वारा मेरी उन्नति थी। इससे पहले, हालांकि मैंने कहा था कि मैं जेल में सड़ जाऊँगी, यह सिर्फ मेरी अपनी आकांक्षाओं और इच्छाओं के कारण था, यह मेरी वास्तविकता नहीं थी। आज, मैं अपने व्यावहारिक जीवन के माध्यम से इस गवाही को सहन करने और परमेश्वर को मुझमें आराम दे देने के लिए तैयार थी। जब मैं शैतान की ओर घृणा से भरी हुई थी, और शैतान के साथ अंत तक लड़ाई करने के लिए कृतसंकल्प थी, वास्तव में जेल में सड़कर असली गवाही देने के लिए तैयार थी, मैंने परमेश्वर की सर्वशक्तिमानता और उसके चमत्कारी कार्यों को देखा। 6 दिसंबर, 2005 को, जेल की गाड़ी ने मुझे हिरासत केंद्र से लिया और मुझे सड़क के किनारे छोड़ दिया। उस समय से, मेरा दो साल का जेल का जीवन समाप्त हो गया।

इस भयानक विपत्ति का सामना करने के बाद, हालांकि मेरे देह ने कुछ कठिनाई सहन की थी, मैंने सौ गुना—हज़ार गुना—अधिक प्राप्त किया था: मैंने केवल अपनी अंतर्दृष्टि और अपने विवेक को ही विकसित नहीं किया था, वास्तव में यह देखते हुए कि सीसीपी सरकार दुष्ट शैतान का मूर्त रूप है, हत्यारों का एक ऐसा गिरोह जो लोगों को पलक झपकते ही मार डाले, बल्कि साथ ही मैंने परमेश्वर की सर्वशक्तिमानता और ज्ञान को, उसकी धार्मिकता और पवित्रता को भी समझ लिया था, मुझे बचाने में परमेश्वर के अच्छे इरादों की, उसकी देखभाल और मुझे दी गई सुरक्षा की, मैं सराहना करने लगी थी, ताकि शैतान की वहशियत के दौरान, मैं उसे कदम-कदम पर परास्त कर सकूँ, और मेरी गवाही में दृढ़ता से खड़े रह सकूँ। उस दिन से, मैं पूरी तरह से परमेश्वर को अपना सब कुछ दे देना चाहती थी। मैं दृढ़ता से परमेश्वर का पालन करुँगी ताकि मैं उसके द्वारा शीघ्रतर प्राप्त हो जाऊं।

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