2. प्रभु यीशु द्वारा व्यक्त सत्य और सर्वशक्तिमान परमेश्वर द्वारा व्यक्त सत्य के बीच अंतर

संदर्भ के लिए बाइबल के पद:

"मन फिराओ क्योंकि स्वर्ग का राज्य निकट आया है" (मत्ती 4:17)।

"मुझे तुम से और भी बहुत सी बातें कहनी हैं, परन्तु अभी तुम उन्हें सह नहीं सकते। परन्तु जब वह अर्थात् सत्य का आत्मा आएगा, तो तुम्हें सब सत्य का मार्ग बताएगा, क्योंकि वह अपनी ओर से न कहेगा परन्तु जो कुछ सुनेगा वही कहेगा, और आनेवाली बातें तुम्हें बताएगा" (यूहन्ना 16:12-13)।

"यदि कोई मेरी बातें सुनकर न माने, तो मैं उसे दोषी नहीं ठहराता; क्योंकि मैं जगत को दोषी ठहराने के लिये नहीं, परन्तु जगत का उद्धार करने के लिये आया हूँ। जो मुझे तुच्छ जानता है और मेरी बातें ग्रहण नहीं करता है उसको दोषी ठहरानेवाला तो एक है: अर्थात जो वचन मैं ने कहा है, वही पिछले दिन में उसे दोषी ठहराएगा" (यूहन्ना 12:47-48)।

परमेश्वर के प्रासंगिक वचन:

यीशु का काम केवल मनुष्य के छुटकारे और सूली पर चढ़ाये जाने के लिए था, और इस प्रकार, किसी भी व्यक्ति को जीतने के लिए उसे अधिक वचन कहने की कोई जरूरत नहीं थी। उसने मनुष्य को जो कुछ भी सिखाया उसमें से काफी कुछ पवित्र शास्त्रों के वचनों से लिया गया था, और भले ही उसका काम पवित्र शास्त्रों से आगे नहीं बढ़ा, फिर भी वह सूली पर चढ़ाये जाने के काम को पूरा कर पाया। उसका काम सिर्फ वचन का कार्य नहीं था, न ही मानव-जाति पर विजय पाने की खातिर किया गया काम था, बल्कि मानव जाति के छुटकारे के लिए किया गया काम था। उसने मानव-जाति के लिए बस पापबलि का काम किया, और मानव-जाति के लिए वचन के स्रोत का काम नहीं किया। उसने अन्यजातियों का काम नहीं किया, जो कि मनुष्य को जीतने का काम था, बल्कि सूली पर चढ़ने का काम था, वह काम जो उन लोगों के बीच किया गया था जो एक परमेश्वर के होने में विश्वास करते थे। यद्यपि उसका काम पवित्र शास्त्रों की बुनियाद पर किया गया था, और उसने पुराने नबियों की भविष्यवाणी का इस्तेमाल फरीसियों की निंदा करने के लिए किया, फिर भी यह सूली पर चढ़ाये जाने के काम को पूरा करने के लिए पर्याप्त था। यदि आज का काम भी, पवित्र शास्त्रों में पुराने नबियों की भविष्यवाणियों की बुनियाद पर किया जाता, तो तुम लोगों को जीतना नामुमकिन होता, क्योंकि पुराने विधान में तुम चीनियों की कोई अवज्ञा और पाप दर्ज नहीं है, और वहां तुम लोगों के पापों का कोई इतिहास नहीं है। इसलिए, अगर यह काम बाइबल में अब भी होता, तो तुम कभी राजी नहीं होते। बाइबल में इस्राएलियों का एक सीमित इतिहास दर्ज है, जो कि यह स्थापित करने में असमर्थ है कि तुम लोग बुरे हो या अच्छे, या यह तुम लोगों का न्याय करने में असमर्थ है। कल्पना करो कि मुझे तुम लोगों का न्याय इस्राएलियों के इतिहास के अनुसार करना होता—तो क्या तुम लोग मेरा वैसे ही अनुसरण करते जैसा कि आज करते हो? क्या तुम लोग जानते हो कि तुम लोग कितने जिद्दी हो? अगर इस चरण के दौरान कोई वचन न बोले जाते, तो विजय का काम पूरा करना असंभव होता। क्योंकि मैं क्रूस पर चढ़ाये जाने के लिए नहीं आया हूँ, मुझे उन वचनों को बोलना ही होगा जो बाइबल से अलग हैं, ताकि तुम लोगों पर विजय प्राप्त हो सके।

— "वचन देह में प्रकट होता है" में 'परमेश्वर के कार्य का दर्शन (1)' से उद्धृत

यीशु का पहाड़ी उपदेश

धन्य वचन (मत्ती 5:3-12)

नमक और ज्योति (मत्ती 5:13-16)

व्यवस्था की शिक्षा (मत्ती 5:17-20)

क्रोध और हत्या (मत्ती 5:21-26)

व्यभिचार (मत्ती 5:27-30)

तलाक (मत्ती 5:31-32)

शपथ (मत्ती 5:33-37)

प्रतिशोध (मत्ती 5:38-42)

शत्रुओं से प्रेम (मत्ती 5:43-48)

दान (मत्ती 6:1-4)

प्रार्थना (मत्ती 6:5-8)

............

आओ सबसे पहले "यीशु का पहाड़ी उपदेश" के प्रत्येक भाग को देखें। ये सब किससे सम्बन्धित हैं? ऐसा निश्चितता के साथ कहा जा सकता है कि ये सभी व्यवस्था के युग के विधि-विधानों की तुलना में अधिक उन्नत, अधिक ठोस, और लोगों के जीवन के अधिक निकट हैं। आधुनिक शब्दावलियों में कहा जाए, तो यह लोगों के वास्तविक अभ्यास के अधिक प्रासंगिक है।

आओ हम निम्नलिखित के विशिष्ट सन्दर्भ को पढ़ें: तुम्हें धन्य वचनों को किस प्रकार समझना चाहिए? तुम्हें व्यवस्था के बारे में क्या जानना चाहिए? क्रोध को किस प्रकार परिभाषित किया जाना चाहिए? व्याभिचारियों से कैसे निपटा जाना चाहिए? तलाक के बारे में क्या कहा गया है, और उसके बारे में किस प्रकार के नियम हैं, और कौन तलाक ले सकता है और कौन तलाक नहीं ले सकता है? शपथ, प्रतिशोध, शत्रुओं से प्रेम, दान, इत्यादि के बारे में क्या कहेंगे। ये सब बातें मनुष्यजाति के द्वारा परमेश्वर पर विश्वास करने और परमेश्वर का अनुसरण करने के अभ्यास के प्रत्येक पहलू से सम्बन्धित है। इनमें से कुछ अभ्यास आज भी लागू हैं, परन्तु वे लोगों की वर्तमान आवश्यकताओं की अपेक्षा अल्पविकसित अधिक हैं। वे काफी हद तक अल्पविकसित सच्चाईयाँ हैं जिनका सामना लोग परमेश्वर पर विश्वास करने पर करते हैं। जिस समय से प्रभु यीशु ने काम करना आरम्भ किया तब से, वह पहले से ही मनुष्यों के जीवन स्वभाव पर काम शुरू कर रहा था, परन्तु वह व्यवस्था की नींव पर आधारित था। क्या इन विषयों पर आधारित नियमों और कथनों का सत्य के साथ कोई सम्बन्ध था? निस्संदेह था! अनुग्रह के युग के पिछले सभी विधि-विधान, सिद्धांत, और उपदेश परमेश्वर के स्वभाव और स्वरूप से, और निस्संदेह सत्य से सम्बन्धित थे। इससे कोई फर्क नहीं पड़ता कि परमेश्वर क्या प्रकट करता है, वह किस तरह से प्रकट करता है, या किस प्रकार की भाषा का उपयोग करता है, उसकी नींव, उसका उद्गम, और उसका आरम्भिक बिन्दु सभी उसके स्वभाव के सिद्धांतों और उसके स्वरूप पर आधारित हैं। यह बिना किसी त्रुटि के है। इसलिए यद्यपि जिन चीज़ों को उसने कहा था अब वे थोड़ी उथली दिखाई देती हैं, फिर भी तुम नहीं कह सकते कि वे सत्य नहीं हैं, क्योंकि वे ऐसी चीज़ें थी जो परमेश्वर की इच्छा को सन्तुष्ट करने और उनके जीवन स्वभाव में एक परिवर्तन लाने के लिए अनुग्रह के युग के लोगों के लिए अति महत्वपूर्ण थीं। क्या तुम ऐसा कह सकते हो कि उपदेश की बातें सत्य के अनुरूप नहीं है? तुम नहीं कह सकते हो! इनमें से प्रत्येक सत्‍य है क्योंकि वे सभी मनुष्यजाति से परमेश्वर की अपेक्षाएँ हैं; वे सभी किसी व्‍यक्ति को किस प्रकार आचारण करना चाहिए, इस बारे में परमेश्वर के द्वारा दिए गए सिद्धांत और एक अवसर हैं, और वे परमेश्वर के स्वभाव को दर्शाते हैं। हालाँकि, उस समय के उनके जीवन के विकास के स्तर के आधार पर, वे केवल इन चीज़ों को ही स्वीकार करने और समझने में समर्थ थे। क्योंकि अभी तक मनुष्यजाति के पापों का समाधान नहीं हुआ था, इसलिए प्रभु यीशु केवल इन वचनों को ही जारी कर सकता था, और वह इस प्रकार के दायरे के भीतर ही केवल ऐसी साधारण शिक्षाओं का उपयोग कर सकता था जिससे उस समय के लोगों को बताए कि उन्हें किस प्रकार कार्य करना चाहिए, उन्हें क्या करना चाहिए, उन्हें किन सिद्धांतों और दायरे के भीतर चीज़ों को करना चाहिए, और उन्हें किस प्रकार परमेश्वर पर विश्वास करना है और उसकी अपेक्षाओं को पूरा करना चाहिए। इन सब को उस समय की मनुष्यजाति की कद-काठी के आधार पर निर्धारित किया गया था। व्यवस्था के अधीन जीवन जीने वाले लोगों के लिए इन शिक्षाओं को ग्रहण करना आसान नहीं था, इसलिए जो प्रभु यीशु ने शिक्षा दी थी उसे इसी क्षेत्र के भीतर बने रहना था।

— "वचन देह में प्रकट होता है" में 'परमेश्वर का कार्य, परमेश्वर का स्वभाव और स्वयं परमेश्वर III' से उद्धृत

उस समय, यीशु ने अनुग्रह के युग में अपने अनुयायियों को इन विषयों पर बस उपदेशों की एक श्रृंखला दी, जैसे कि कैसे अभ्यास करें, कैसे एक साथ इकट्ठा हों, प्रार्थना में कैसे याचना करें, दूसरों से कैसा व्यवहार करें इत्यादि। उसने अनुग्रह के युग का कार्य किया, और उसने केवल यह प्रतिपादित किया कि शिष्य और वे लोग जो उसका अनुसरण करते हैं, कैसे अभ्यास करें। उसने केवल अनुग्रह के युग का ही कार्य किया और अंत के दिनों का कोई कार्य नहीं किया। जब यहोवा ने व्यवस्था के युग में पुराने नियम निर्धारित किए, तब उसने अनुग्रह के युग का कार्य क्यों नहीं किया? उसने पहले से ही अनुग्रह के युग के कार्य को स्पष्ट क्यों नहीं किया? क्या यह मनुष्यों को इसे स्वीकार करने में मदद नहीं करता? उसने केवल यह भविष्यवाणी की कि एक नर शिशु जन्म लेगा और सामर्थ्य में आएगा, परन्तु उसने पहले से ही अनुग्रह के युग का कार्य नहीं किया। प्रत्येक युग में परमेश्वर के कार्य की स्पष्ट सीमाएँ हैं; वह केवल वर्तमान युग का कार्य करता है और कभी भी कार्य का आगामी चरण पहले से नहीं करता। केवल इस तरह से उसका प्रत्येक युग का प्रतिनिधि कार्य सामने लाया जा सकता है। यीशु ने केवल अंत के दिनों के चिह्नों के बारे में बात की, इस बारे में बात की कि किस प्रकार से धैर्यवान बनें, कैसे बचाए जाएँ, कैसे पश्चाताप करें, कैसे अपने पापों को स्वीकार करें, सलीब को कैसे धारण करें और कैसे पीड़ा सहन करें; उसने कभी इस पर कुछ नहीं कहा कि अंत के दिनों में मनुष्य को किस प्रकार प्रवेश हासिल करना चाहिए या उसे परमेश्वर की इच्छा को किस प्रकार से संतुष्ट करने की कोशिश करनी चाहिए। वैसे, क्या अंत के दिनों के परमेश्वर के कार्य को बाइबल के अंदर खोजना हास्यास्पद नहीं है? महज़ बाइबल को हाथों में पकड़कर तुम क्या देख सकते हो? चाहे बाइबल का व्याख्याता हो या उपदेशक, आज के कार्य को कौन पहले से देख सकता था?

— "वचन देह में प्रकट होता है" में 'वो मनुष्य, जिसने परमेश्वर को अपनी ही धारणाओं में सीमित कर दिया है, किस प्रकार उसके प्रकटनों को प्राप्त कर सकता है?' से उद्धृत

"न्याय" शब्द का जिक्र होने पर संभवत: तुम उन वचनों के बारे में सोचोगे, जो यहोवा ने सभी स्थानों पर कहे थे और फटकार के जो वचन यीशु ने फरीसियों से कहे थे। अपनी समस्त कठोरता के बावजूद, ये वचन परमेश्वर द्वारा मनुष्य का न्याय नहीं थे; बल्कि वे विभिन्न परिस्थितियों, अर्थात् विभिन्न संदर्भों में परमेश्वर द्वारा कहे गए वचन हैं। ये वचन मसीह द्वारा अंत के दिनों में मनुष्यों का न्याय करते हुए कहे जाने वाले शब्दों से भिन्न हैं। अंत के दिनों में मसीह मनुष्य को सिखाने, उसके सार को उजागर करने और उसके वचनों और कर्मों की चीर-फाड़ करने के लिए विभिन्न प्रकार के सत्यों का उपयोग करता है। इन वचनों में विभिन्न सत्यों का समावेश है, जैसे कि मनुष्य का कर्तव्य, मनुष्य को परमेश्वर का आज्ञापालन किस प्रकार करना चाहिए, मनुष्य को किस प्रकार परमेश्वर के प्रति निष्ठावान होना चाहिए, मनुष्य को किस प्रकार सामान्य मनुष्यता का जीवन जीना चाहिए, और साथ ही परमेश्वर की बुद्धिमत्ता और उसका स्वभाव, इत्यादि। ये सभी वचन मनुष्य के सार और उसके भ्रष्ट स्वभाव पर निर्देशित हैं। खास तौर पर वे वचन, जो यह उजागर करते हैं कि मनुष्य किस प्रकार परमेश्वर का तिरस्कार करता है, इस संबंध में बोले गए हैं कि किस प्रकार मनुष्य शैतान का मूर्त रूप और परमेश्वर के विरुद्ध शत्रु-बल है। अपने न्याय का कार्य करने में परमेश्वर केवल कुछ वचनों के माध्यम से मनुष्य की प्रकृति को स्पष्ट नहीं करता; बल्कि वह लंबे समय तक उसे उजागर करता है, उससे निपटता है और उसकी काट-छाँट करता है। उजागर करने, निपटने और काट-छाँट करने की इन विधियों को साधारण वचनों से नहीं, बल्कि उस सत्य से प्रतिस्थापित किया जा सकता है, जिसका मनुष्य में सर्वथा अभाव है। केवल इस तरह की विधियाँ ही न्याय कही जा सकती हैं; केवल इस तरह के न्याय द्वारा ही मनुष्य को वशीभूत और परमेश्वर के प्रति समर्पण के लिए पूरी तरह से आश्वस्त किया जा सकता है, और इतना ही नहीं, बल्कि मनुष्य परमेश्वर का सच्चा ज्ञान भी प्राप्त कर सकता है। न्याय का कार्य मनुष्य में परमेश्वर के असली चेहरे की समझ पैदा करने और उसकी स्वयं की विद्रोहशीलता का सत्य उसके सामने लाने का काम करता है। न्याय का कार्य मनुष्य को परमेश्वर की इच्छा, परमेश्वर के कार्य के उद्देश्य और उन रहस्यों की अधिक समझ प्राप्त कराता है, जो उसकी समझ से परे हैं। यह मनुष्य को अपने भ्रष्ट सार तथा अपनी भ्रष्टता की जड़ों को जानने-पहचानने और साथ ही अपनी कुरूपता को खोजने का अवसर देता है। ये सभी परिणाम न्याय के कार्य द्वारा लाए जाते हैं, क्योंकि इस कार्य का सार वास्तव में उन सभी के लिए परमेश्वर के सत्य, मार्ग और जीवन का मार्ग प्रशस्त करने का कार्य है, जिनका उस पर विश्वास है। यह कार्य परमेश्वर के द्वारा किया जाने वाला न्याय का कार्य है।

— "वचन देह में प्रकट होता है" में 'मसीह न्याय का कार्य सत्य के साथ करता है' से उद्धृत

परमेश्वर द्वारा इस युग में बोले गए वचन, व्यवस्था के युग के दौरान बोले गए वचनों से भिन्न हैं, और इसलिए, वे अनुग्रह के युग के दौरान बोले गए वचनों से भी भिन्न हैं। अनुग्रह के युग में परमेश्वर ने वचन का कार्य नहीं किया, बल्कि केवल यह वर्णन किया कि समस्त मानवजाति को छुटकारा दिलाने के लिए वह सलीब पर चढ़ाया जाएगा। बाइबल में केवल यह वर्णन किया गया है कि यीशु को सलीब पर क्यों चढ़ाया जाना था, और सलीब पर उसने कौन-कौन सी तकलीफें सहीं, और कैसे मनुष्य को परमेश्वर के लिए सलीब पर चढ़ना चाहिए। उस युग के दौरान परमेश्वर द्वारा किया गया समस्त कार्य सलीब पर चढ़ने के आसपास केंद्रित था। राज्य के युग के दौरान देहधारी परमेश्वर उन सभी लोगों को जीतने के लिए वचन बोलता है, जो उस पर विश्वास करते हैं। यह "वचन का देह में प्रकट होना" है; परमेश्वर अंत के दिनों में इस कार्य को करने के लिए आया है, अर्थात् वह वचन के देह में प्रकट होने के वास्तविक अर्थ को संपन्न करने के लिए आया है। वह केवल वचन बोलता है, और तथ्यों का आगमन शायद ही कभी होता है। वचन के देह में प्रकट होने का यही मूल सार है, और जब देहधारी परमेश्वर अपने वचन बोलता है, तो यही वचन का देह में प्रकट होना और वचन का देह में आना है। "आदि में वचन था, और वचन परमेश्वर के साथ था, और वचन परमेश्वर था, और वचन देह बन गया।" यह (वचन के देह में प्रकट होने का कार्य) वह कार्य है, जिसे परमेश्वर अंत के दिनों में संपन्न करेगा, और यह उसकी संपूर्ण प्रबंधन योजना का अंतिम अध्याय है, और इसलिए परमेश्वर को पृथ्वी पर आना है और अपने वचनों को देह में प्रकट करना है। वह जो आज किया जाता है, वह जिसे भविष्य में किया जाएगा, वह जिसे परमेश्वर द्वारा संपन्न किया जाएगा, मनुष्य का अंतिम गंतव्य, वे जिन्हें बचाया जाएगा, वे जिन्हें नष्ट किया जाएगा, आदि-आदि—यह समस्त कार्य, जिसे अंत में हासिल किया जाना चाहिए, सब स्पष्ट रूप से कहा गया है, और यह सब वचन के देह में प्रकट होने के वास्तविक अर्थ को संपन्न करने के लिए है। प्रशासनिक आदेश और संविधान, जिन्हें पहले जारी किया गया था, वे जिन्हें नष्ट किया जाएगा, वे जो विश्राम में प्रवेश करेंगे—ये सभी वचन पूरे होने चाहिए। यही वह कार्य है, जिसे देहधारी परमेश्वर द्वारा अंत के दिनों में मुख्य रूप से संपन्न किया जाता है। वह लोगों को समझवाता है कि परमेश्वर द्वारा पूर्व-नियत लोग कहाँ के हैं और जो परमेश्वर द्वारा पूर्व-नियत नहीं हैं वे कहाँ के हैं, उसके लोगों और पुत्रों का वर्गीकरण कैसे किया जाएगा, इस्राएल का क्या होगा, मिस्र का क्या होगा—भविष्य में, इन वचनों में से प्रत्येक वचन संपन्न होगा। परमेश्वर के कार्य की गति तेज हो रही है। परमेश्वर मनुष्यों पर यह प्रकट करने के लिए वचनों को साधन के रूप में उपयोग करता है कि हर युग में क्या किया जाना है, अंत के दिनों में देहधारी परमेश्वर द्वारा क्या किया जाना है, और उसकी सेवकाई, जो की जानी है, और ये सब वचन, वचन के देह में प्रकट होने के वास्तविक अर्थ को संपन्न करने के उद्देश्य से हैं।

— "वचन देह में प्रकट होता है" में 'परमेश्वर के वचन के द्वारा सब-कुछ प्राप्त हो जाता है' से उद्धृत

इस युग के दौरान परमेश्वर द्वारा किया जाने वाला कार्य मुख्य रूप से मनुष्य के जीवन के लिए वचनों का पोषण देना; मनुष्य के भ्रष्ट स्वभाव और उसकी प्रकृति के सार को उजागर करना; और धर्म संबंधी धारणाओं, सामंती सोच, पुरानी पड़ चुकी सोच, और मनुष्य के ज्ञान और संस्कृति को समाप्त करना है। इन सभी चीजों को परमेश्वर के वचनों द्वारा उजागर करने के माध्यम से शुद्ध किया जाना है। अंत के दिनों में, मनुष्य को पूर्ण करने के लिए परमेश्वर चिह्नों और चमत्कारों का नहीं, वचनों का उपयोग करता है। वह मनुष्य को उजागर करने, उसका न्याय करने, उसे ताड़ना देने और उसे पूर्ण बनाने के लिए वचनों का उपयोग करता है, ताकि परमेश्वर के वचनों में मनुष्य परमेश्वर की बुद्धि और मनोरमता देखने लगे, और परमेश्वर के स्वभाव को समझने लगे, और ताकि परमेश्वर के वचनों के माध्यम से मनुष्य परमेश्वर के कर्मों को निहारे।

— "वचन देह में प्रकट होता है" में 'आज परमेश्वर के कार्य को जानना' से उद्धृत

राज्य के युग में, परमेश्वर नए युग की शुरूआत करने, अपने कार्य के साधन बदलने और संपूर्ण युग के लिये काम करने की ख़ातिर अपने वचन का उपयोग करता है। वचन के युग में यही वह सिद्धांत है जिसके द्वारा परमेश्वर कार्य करता है। वह देहधारी हुआ ताकि विभिन्न दृष्टिकोणों से बातचीत कर सके, मनुष्य वास्तव में परमेश्वर को देख सके, जो देह में प्रकट होने वाला वचन है, उसकी बुद्धि और चमत्कार को जान सके। उसने यह कार्य इसलिए किये ताकि वह मनुष्यों को जीतने, उन्हें पूर्ण बनाने और ख़त्म करने के लक्ष्यों को बेहतर ढंग से हासिल कर सके। वचन के युग में वचन को उपयोग करने का यही वास्तविक अर्थ है। वचन के द्वारा परमेश्वर के कार्यों को, परमेश्वर के स्वभाव को मनुष्य के सार और इस राज्य में प्रवेश करने के लिए मनुष्य को क्या करना चाहिए, यह जाना जा सकता है। वचन के युग में परमेश्वर जिन सभी कार्यों को करना चाहता है, वे वचन के द्वारा संपन्न होते हैं। वचन के द्वारा ही मनुष्य की असलियत का पता चलता है, उसे नष्ट किया जाता है और परखा जाता है। मनुष्य ने वचन देखा है, सुना है और वचन के अस्तित्व को जाना है। इसके परिणाम स्वरूप वह परमेश्वर के अस्तित्व पर विश्वास करता है, मनुष्य परमेश्वर के सर्वशक्तिमान होने और उसकी बुद्धि पर, साथ ही साथ मनुष्यों के लिये परमेश्वर के हृदय के प्रेम और मनुष्यों का उद्धार करने की उसकी अभिलाषा पर विश्वास करता है। यद्यपि "वचन" शब्द सरल और साधारण है, देहधारी परमेश्वर के मुख से निकला वचन संपूर्ण ब्रह्माण्ड को कंपाता है; और उसका वचन मनुष्य के हृदय को रूपांतरित करता है, मनुष्य के सभी विचारों और पुराने स्वभाव और समस्त संसार के पुराने स्वरूप में परिवर्तन लाता है। युगों-युगों से केवल आज के दिन का परमेश्वर ही इस प्रकार से कार्य करता है और केवल वही इस प्रकार से बोलता और मनुष्य का उद्धार करता है। इसके बाद मनुष्य वचन के मार्गदर्शन में, उसकी चरवाही में और उससे प्राप्त आपूर्ति में जीवन जीता है। वह वचन के संसार में जीता है, परमेश्वर के वचन के कोप और आशीषों में जीता है और उससे भी अधिक वह परमेश्वर के वचन के न्याय और ताड़ना के अधीन जीता है। ये वचन और यह कार्य सब कुछ मनुष्य के उद्धार, परमेश्वर की इच्छा को पूरा करने और पुरानी सृष्टि के संसार के मूल रूप रंग को बदलने के लिये है। परमेश्वर ने संसार की सृष्टि वचन से की, वह समस्त ब्रह्माण्ड में मनुष्य की अगुवाई वचन के द्वारा करता है, उन्हें वचन के द्वारा जीतता और उनका उद्धार करता है। अंत में, वह इसी वचन के द्वारा समस्त प्राचीन जगत का अंत कर देगा। तभी उसके प्रबंधन की योजना पूरी होगी।

— "वचन देह में प्रकट होता है" में 'राज्य का युग वचन का युग है' से उद्धृत

उस समय, यीशु ने बहुत से ऐसे कार्य किये जो उसके शिष्यों की समझ से बाहर थे, और बहुत ऐसी बातें कहीं जो लोगों की समझ में नहीं आयीं। इसका कारण यह है कि उस समय उसने कोई स्पष्टीकरण नहीं दिया। इस प्रकार, उसके जाने के कई वर्ष बाद, मत्ती ने उसकी एक वंशावली बनायी, और अन्य लोगों ने भी बहुत से ऐसे कार्य किये जो मनुष्य की इच्छा के अनुसार थे। यीशु मनुष्य को पूर्ण करने और प्राप्त करने के लिए नहीं, बल्कि कार्य का एक चरण करने के लिए आया था: जो कि स्वर्ग के राज्य के सुसमाचार को आगे बढ़ाना और सूली पर चढ़ने का कार्य था। और इसलिए एक बार जब यीशु को सूली पर चढ़ा दिया गया, तो उसके कार्य का पूरी तरह से अंत हो गया। किन्तु वर्तमान चरण—विजय के कार्य—में अधिक वचन बोले जाने चाहिए, अधिक कार्य किया जाना चाहिए, और कई प्रक्रियाएँ होनी चाहिए। इसलिए भी यीशु और यहोवा के कार्यों के रहस्य प्रकट होने चाहिए, ताकि सभी लोगों को अपने विश्वास में समझ और स्पष्टता मिल जाए, क्योंकि यह अंत के दिनों का कार्य है, और अंत के दिन परमेश्वर के कार्य की समाप्ति के हैं, और इस कार्य के समापन का समय है। कार्य का यह चरण तुम्हारे लिए यहोवा की व्यवस्था और यीशु द्वारा छुटकारे को स्पष्ट करेगा, और यह मुख्य रूप से इसलिए है ताकि तुम परमेश्वर की छह हज़ार-वर्षीय प्रबंधन योजना के पूरे कार्य को समझ सको, और इस छह हज़ार-वर्षीय प्रबंधन योजना के अर्थ और सार की सराहना कर सको, और यीशु द्वारा किए गए सभी कार्यों और उसके द्वारा बोले गए वचनों के प्रयोजन, और यहाँ तक कि बाइबल में अपने अंधविश्वास और श्रद्धा को समझ सको। यह सब तुम्हें पूरी तरह से समझने में मदद करेगा। यीशु द्वारा किया गया कार्य और परमेश्वर का आज का कार्य दोनों तुम्हारी समझ में आ जाएँगे; तुम समस्त सत्य, जीवन और मार्ग को समझ और देख लोगे। यीशु द्वारा किए गए कार्य के चरण में, यीशु समापन कार्य किए बिना क्यों चला गया? क्योंकि यीशु के कार्य का चरण समापन का कार्य नहीं था। जब उसे सूली पर चढ़ाया गया, तब उसके वचनों का भी अंत हो गया था; उसके सूली पर चढ़ने के बाद, उसका कार्य पूरी तरह समाप्त हो गया। वर्तमान चरण भिन्न है : केवल वचनों के अंत तक बोले जाने और परमेश्वर के समस्त कार्य का उपसंहार हो जाने के बाद ही उसका कार्य समाप्त हुआ होगा। यीशु के कार्य के चरण के दौरान, ऐसे बहुत-से वचन थे जो अनकहे रह गए थे, या जो पूरी तरह स्पष्ट नहीं थे। फिर भी यीशु ने जो कहा या नहीं कहा, उसकी परवाह नहीं की, क्योंकि उसकी सेवकाई कोई वचन की सेवकाई नहीं थी, और इसलिए सूली पर चढ़ाये जाने के बाद, वह चला गया। कार्य का वह चरण मुख्यतः सूली पर चढ़ने के वास्ते था, और वह वर्तमान चरण से भिन्न है। कार्य का यह चरण मुख्य रूप से पूर्णता, स्वच्छ करने, और समस्त कार्य का समापन करने के लिए है। यदि वचनों को उनके बिल्कुल अंत तक नहीं कहा जायेगा, तो इस कार्य का समापन करने का कोई तरीका नहीं होगा, क्योंकि कार्य के इस चरण में समस्त कार्य को अंत तक लाया जाना है और यह वचनों के उपयोग से किया जाना है। उस समय, यीशु ने बहुत-सा कार्य किया, जो मनुष्य की समझ से बाहर था। वह चुपचाप चला गया, और आज भी ऐसे कई लोग हैं जो उसके वचनों को नहीं समझते, जिनकी समझ त्रुटिपूर्ण है, मगर फिर भी जो उसे सही मानते हैं, और जो नहीं जानते कि वे गलत हैं। अंत में, यह वर्तमान चरण परमेश्वर के कार्य का पूर्णतः अंत करेगा, और इसका उपसंहार करेगा। सभी परमेश्वर की प्रबंधन योजना को समझ और जान लेंगे। मनुष्य के भीतर की धारणाएँ, उसके इरादे, उसकी त्रुटिपूर्ण समझ, यहोवा और यीशु के कार्यों के प्रति उसकी धारणाएँ, अन्यजातियों के बारे में उसके विचार और उसके अन्य विचलन और सभी त्रुटियाँ ठीक कर दी जाएँगी। और जीवन के सभी सही मार्ग, और परमेश्वर द्वारा किया गया समस्त कार्य और संपूर्ण सत्य मनुष्य की समझ में आ जाएँगे। जब ऐसा होगा, तो कार्य का यह चरण समाप्त हो जाएगा।

— "वचन देह में प्रकट होता है" में 'परमेश्वर के कार्य का दर्शन (2)' से उद्धृत

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