मसीह की बातचीतों के अभिलेख

विषय-वस्तु

अध्याय 5.परमेश्वर की इच्छा है कि यथासंभव लोगों की रक्षा की जाये

1. इस बात की ज़रा भी चिंता न करें कि परमेश्वर ने पहले से ही आपके जीवन को निर्धारित कर दिया है या नहीं, बल्कि अपनी खोज की चिंता करें।

बहुत से लोग परमेश्वर की इच्छा को नहीं समझते; वे सोचते हैं कि परमेश्वर ने जिसके जीवन को भी पूर्वनिर्धारित कर दिया है, परमेश्वर अवश्य ही उसकी रक्षा करेंगे और सोचते हैं जिनके जीवन को पूर्वनिर्धारित नहीं किया है, परमेश्वर उनकी रक्षा नहीं करेंगे, भले ही वह अच्छे काम करते हों। उन्हें लगता है कि परमेश्वर लोगों के काम और व्यवहार के आधार पर नियति तय नहीं करेंगे। यदि आप इस तरह सोचते हैं, तो फिर आपने परमेश्वर को गलत समझा है। यदि परमेश्वर ऐसा करते, तो क्या वह न्यायसंगत हो सकते हैं? परमेश्वर लोगों की नियति एक सिद्धांत के आधार पर करते हैं: आखिरकार लोगों की नियति उनके व्यक्तिगत कामों और व्यवहार के अनुसार तय होगी। आपको परमेश्वर का धर्मी स्वभाव नज़र नहीं आता है, और आप हमेशा ही परमेश्वर को गलत समझ लेते हैं और उनकी आकांक्षाओं को तोड़-मरोड़ देते हैं, यही कारण है कि आप निराशावादी होकर उम्मीद छोड़ बैठते हैं। क्या यह खुद पर थोपा हुआ नहीं है? वस्तुत, क्या आप वाकई परमेश्वर को समझते हैं, और क्या आप परमेश्वर की आकांक्षाओं के प्रति आश्वस्त हैं? आपने हमेशा “परमेश्वर के पूर्वनिर्धारण” को एक खाका खींचने के लिये इस्तेमाल किया है और परमेश्वर के वचनों को नकारा है। यह परमेश्वर के विषय में एक गंभीर भ्रम है! आप परमेश्वर के कार्यों को और परमेश्वर की इच्छाओं को बिल्कुल भी नहीं समझते हैं; बल्कि आप परमेश्वर की उन आकांक्षाओं को भी नहीं समझते हैं जो उन्होंने 6000 सालों के अपने प्रबंधन कार्य में समाहित कर दी हैं! आप निराशा से घिर जाते हैं, पूर्वानुमान लगाते हैं और परमेश्वर पर संदेह करते हैं; आप सेवाकर्ता बनने से डरते हैं, यह सोचकर “मुझमें कौन सी खास बात है; मुझे इस काम के लायक क्यों समझा जा रहा है? क्या परमेश्वर मेरा इस्तेमाल कर रहे हैं? कहीं ऐसा तो नहीं कि वह मुझसे सेवा करवा लें और जब मैं किसी काबिल न रहूं तो मुझसे छुटकारा पा लें।” क्या ऐसा सोचकर आप परमेश्वर को उन्हीं लोगों की श्रेणी में नहीं रख रहे हैं जो सत्ता में हैं? आपने हमेशा परमेश्वर को गलत समझा है; आपने परमेश्वर के बारे में गलत धारणा बनाकर उनसे घृणा की है। आपने परमेश्वर के वचनों और बेबाकी पर विश्वास ही नहीं किया, आपने सेवाकर्ता बनने की पहल तो की है, आपने सेवाकर्ता बनने की राह पर चलने की पहल तो की है, लेकिन आपने अपना स्वभाव बदलने का प्रयास नहीं किया और न ही सच्चाई की राह पर चलने के लिये कठिनाइयों का सामना किया। आखिरकार, आपने अपना सारा दायित्व यह कहते हुए परमेश्वर पर डाल दिया कि परमेश्वर ने आपको पूर्वनिर्धारित नहीं किया था, और यह कि परमेश्वर आपके साथ निष्ठावान नहीं रहे। समस्या क्या है? आपने परमेश्वर की आकांक्षाओं को ठीक से समझा नहीं, आपको परमेश्वर के वचनों पर भरोसा नहीं है, आप सत्य का पालन नहीं कर रहे, न ही आप अपना दायित्व निभाने के प्रति पूरी तरह से समर्पित हैं। आप परमेश्वर की इच्छा को कैसे पूरा करेंगे? इस तरह के कर्मों से आप ज़रा भी सेवाकर्ता बनने के योग्य नहीं हैं, तब आप उसके साथ सौदे-बाज़ी कैसे करोगे? यदि आप मानते हैं कि परमेश्वर धर्मी नहीं हैं, तो फिर आप उन पर विश्वास क्यों करते हैं? आप हमेशा चाहते हैं कि आप परमेश्वर के परिवार के लिये परिश्रम करने से पहले ही परमेश्वर आपसे कहें, “आप परमेश्वर के साम्राज्य के लोगों में से हैं और यह स्थिति कभी बदलेगी नहीं।” यदि परमेश्वर ऐसा नहीं कहते, तो आप कभी भी परमेश्वर को अपना सच्चा हृदय समर्पित नहीं करेंगे। ऐसा व्यक्ति कितना विद्रोही है! मैंने ऐसे अनेक लोग देखे हैं जो अपने स्वभाव को बदलने पर ज़रा भी ध्यान नहीं देते, सच्चाई को अपने जीवन में उतारने की तो बात ही क्या है। उनका सारा ध्यान इसी ओर रहता है कि उनका अंतिम गंतव्य अच्छा रहेगा या नहीं, परमेश्वर उनके साथ कैसा बर्ताव करेंगे, अपने लोगों में शामिल करने के लिये उन्हें परमेश्वर ने पूर्वनिर्धारित किया है क्या, तथा और भी सुनी-सुनाई बातें। जो लोग नेक कामों में नहीं लगे हैं उन्हें शाश्वत जीवन कैसे मिल सकता है? वे परमेश्वर के परिवार में कैसे रह सकते हैं? मैं आपसे दृढ़तापूर्वक कहता हूं: यदि कोई पूर्वनिर्धारित व्यक्ति सच्चाई का पालन नहीं करता है तो अंतत: उसे हटा दिया जायेगा; और कोई ऐसा व्यक्ति जो पूर्वनिर्धारित नहीं है और पूरी निष्ठा से सच्चाई का पालन करता है- भले ही लोग उसे वहां रहने के लिये पूर्वनिर्धारित न मानें- उसका अंतिम गंतव्य परमेश्वर की धर्मिता के कारण, उन लोगों की तुलना में बेहतर होगा जो तथाकथित रूप से पूर्वनिर्धारित हैं, लेकिन जिनमें निष्ठा का अभाव है। क्या आपको इन वचनों पर विश्वास है? अगर आपको इन वचनों पर विश्वास नहीं है और अनुचित मार्ग पर ही चलना जारी रखते हो, तो मैं कहूंगा कि आप बच नहीं पायेंगे, क्योंकि आप परमेश्वर की चाहत नहीं है और आप सच्चाई प्रिय नहीं है। चूंकि यह इस तरह से है, तो लोगों का परमेश्वर द्वारा पूर्वनिर्धारण महत्वपूर्ण नहीं है। मेरा ऐसा कहने का कारण यह है कि अंत में, लोगों के कर्मों और बर्ताव के ज़रिये परमेश्वर उनकी नियति तय करेंगे; तो पूरी निष्पक्षता से कहता हूं, परमेश्वर के पूर्वनिर्धारण की भूमिका बहुत छोटी-सी है, मुख्य नहीं। क्या आप इन वचनों को समझते हैं?

2. अंतिम दिनों में परमेश्वर का उद्देश्य लोगों को निंदित या दंडित करना नहीं बल्कि उनकी रक्षा करना है

कुछ लोग कहते हैं: “मेरा स्वभाव अच्छा नहीं है, कुदरत को जो करना है करे!” क्या आप देह त्याग नहीं कर पाते? क्या आपके पास दिल और दिमाग नहीं है? आप प्रतिदिन प्रार्थना कैसे करते हैं? “देह, बाहर आ जाओ! कुदरत को जो करना है करे, परमेश्वर ने इसे पूर्वनिर्धारित कर दिया है; मुझे कुछ करने की आवश्यकता नहीं।” क्या यही आपकी प्रार्थना है? नहीं! तो फिर आप परमेश्वर के संग कार्य क्यों नहीं करते? जिन कुछ लोगों ने थोड़ा आज्ञा का उल्लंघन किया है, वे अनुमान लगायेंगे: क्या परमेश्वर मुझे समाप्त कर देंगे? इस बार परमेश्वर लोगों को समाप्त करने नहीं, बल्कि यथासम्भव उनकी रक्षा करने आये हैं। गलतियां किससे नहीं होतीं? यदि सभी को समाप्त कर दिया जायेगा तो फिर इसे उद्धार कैसे कहेंगे? कुछ आज्ञालंघन जान-बूझकर किये जाते हैं और कुछ अनजाने में हो जाते हैं। अनजाने में हुये मामलों में, पहचानने के बाद आप उन्हें बदल सकते हैं, तो क्या परमेश्वर बदलने से पहले ही आपको समाप्त कर देंगे? क्या ऐसे ही परमेश्वर लोगों की रक्षा करते हैं? नहीं, ऐसा बिल्कुल नहीं है! इससे कोई अंतर नहीं पडता कि आज्ञा का उल्लंघन अनजाने में हुआ है कि विद्रोही स्वभाव के कारण, केवल इतना याद रखें: शीघ्रता करें और वास्तविकता को पहचानें! आगे बढने का प्रयास करें; हालात कुछ भी हों, आप आगे बढने का प्रयास करें। परमेश्वर लोगों की रक्षा करने के कार्य में लगे हैं और वह जिनकी रक्षा करना चाहते हैं उन्हें अंधाधुंध तरीके से कैसे मार देंगे? आपके अंदर चाहे कितना भी परिवर्तन आया हो, अंत में अगर परमेश्वर ने आपको समाप्त भी कर दिया तो उनका वह निर्णय धर्मितापूर्ण होगा; जब वह समय आयेगा तो वह आपको समझने का अवसर देंगे। लेकिन इस समय आपका दायित्व है कि आगे बढ़ने का प्रयास करें, रूपांतरण की कोशिश में लग जायें और परमेश्वर को संतुष्ट करने की कामना करें; आपको केवल परमेश्वर की इच्छा के अनुसार ही अपना दायित्व निभाते रहने की चिंता करनी चाहिये। और इसमें कोई दोष नहीं है! अंतत:, परमेश्वर आपके साथ जैसा चाहें बर्ताव करें, वह हमेशा न्यायसंगत ही होता है; आपको इस पर न तो संदेह करना चाहिये और न ही इसकी चिंता करनी चाहिये; भले ही परमेश्वर की धर्मिता अभी आपकी समझ से बाहर हो, लेकिन वह दिन आयेगा जब आप पूरी तरह से आश्वस्त हो जायेंगे। परमेश्वर किसी सरकारी अधिकारी या राक्षसों के सम्राट की तरह बिल्कुल नहीं है! यदि आप गौर से इस पहलू को समझने की कोशिश करेंगे तो आप दृढ़ता से विश्वास करने लगेंगे कि परमेश्वर का कार्य लोगों की रक्षा करना और उनके स्वभाव को रूपांतरित करना है। चूंकि यह लोगों के स्वभाव के रूपांतरण का कार्य है, यदि लोग अपने स्वभाव को प्रकट नहीं करेंगे, तो कुछ नहीं किया जा सकता और फिर परिणाम भी कुछ नहीं निकलेगा। लेकिन एक बार अपना स्वभाव प्रकट करने के बाद, पुरानी आदतें जारी रखना कष्टकर होगा, यह प्रबंधन आदेश की अवमानना होगी और परमेश्वर इससे अप्रसन्न होंगे। परमेश्वर अलग-अलग स्तर के दंड का विधान करेंगे और आपको आज्ञा के उल्लंघन की कीमत चुकानी होगी। कभी-कभी आप अनजाने में भ्रष्ट आचरण करने लगते हैं, तो परमेश्वर आपको आगाह करते हैं, आपको सुधारते हैं, आपसे व्यवहार करते हैं; अगर आप अच्छा करते हैं तो परमेश्वर आपको उत्तरदायी नहीं ठहरायेंगे। यह रूपांतरण की सामान्य प्रक्रिया है; इस प्रक्रिया में उद्धार का कार्य सही मायनों में अभिव्यक्त होता है। यही कुंजी है! मिसाल के तौर पर स्त्री और पुरुष के बीच की सीमायें; आज आप आवेग में किसी स्त्री का हाथ पकड़ लेते हैं, लेकिन जब लौटते हैं तो सोचते हैं: क्या मेरा यह व्यवहार अनैतिक नहीं है? क्या यह पाप नहीं है? स्त्री और पुरुष के बीच सीमायें नहीं रख पाना क्या परमेश्वर की अवमानना नहीं है? मैं ऐसी हरकत कैसे कर सकता हूं? तब आप परमेश्वर के समक्ष आते हैं और प्रार्थना करते हैं: “हे परमेश्वर मैंने फिर से पाप किया है; यह चीज़ सत्य के अनुरूप नहीं है और मुझे इस भ्रष्ट देह से घृणा है।” बाद में आप संकल्प करते हैं कि आप उन्हें स्पर्श नहीं करेंगे या उनके निकट नहीं जायेंगे। क्या यह रूपांतरण नहीं है? यदि इस प्रकार से आपका रूपांतरण होता है, तो क्या उनका हाथ पकड़ने के लिये परमेश्वर तब भी आपकी भर्त्सना करेंगे? यदि आपने उनका हाथ पकड़ा और आपको ऐसा करना उचित नहीं लगा, और आपने अपने पाप को परमेश्वर के समक्ष स्वीकार नहीं किया, यह सोचकर कि यह कोई लज्जाजनक कार्य नहीं है, और आपने स्वयं से घृणा नहीं की, सतर्क नहीं रहे, या संकल्प नहीं किया, तो उसके बाद आप न केवल उनका हाथ पकड़ेंगे बल्कि आप उन्हें आलिंगनबद्ध कर लेंगे! यह चीज़ें अधिक गम्भीर रूप धारण करती जायेंगी और पाप की ओर धकेलती चली जायेंगी, और ऐसा करते रहने पर, परमेश्वर आपके पापों के लिये आपकी भर्त्सना करेंगे; आप पाप पर पाप करते चले जायेंगे जिसका कोई इलाज नहीं है। यदि आप अनायास ही अपने भ्रष्ट स्वभाव को थोड़ा-सा भी सच्चे मन से प्रकट कर दें, यदि आप पश्चाताप कर सकें, तो परमेश्वर आपकी भर्त्सना नहीं करेंगे और तब भी आपकी रक्षा सम्भव है। परमेश्वर लोगों की रक्षा करना चाहते हैं, और यह असम्भव है कि लोगों का मिज़ाज थोड़ी मात्रा में भी प्रकट न हो; मगर आपको पश्चाताप और तेज़ी से बदलाव की ओर ध्यान देना चाहिये। क्या इससे परमेश्वर की इच्छा को तृप्ति नहीं मिलेगी? कुछ लोगों को इस पर विश्वास नहीं होता और वे परमेश्वर के प्रति सदा एक एहतियात बरतने की प्रवृत्ति बना लेते हैं; ऐसा व्यक्ति कभी न कभी कष्ट उठायेगा।

यह पहले कहा गया है: अतीत की घटनाओं को कलम से खारिज किया जा सकता है; अतीत का स्थान भविष्य ले सकता है; परमेश्वर में असीम सहिष्णुता है। लेकिन इन वचनों में सिद्धांत निहित हैं; ऐसा नहीं है कि अंतत: आप कितना भी बडा पाप करें, परमेश्वर उसे एक ही झटके में नष्ट कर देंगे; परमेश्वर के सभी कार्य सिद्धांतों पर चलते हैं। अतीत में इस प्रकार का प्रबंधनकारी आदेश था: यदि किसी ने परमेश्वर का नाम स्वीकारने से पहले कोई पाप किया है, तो उसे जुड़ने दें; यदि वह प्रवेश करने के बाद भी उस पाप को करता है उसके साथ विशेष प्रकार से पेश आयें; यदि वह उस पाप को बार-बार करता है तो उसे निष्कासित कर दें। परमेश्वर ने लोगों को सदा ही अपने कार्यों में यथासंभव क्षमा किया है; इस दृष्टिकोण से यह देखा जा सकता है कि यह वास्तव में लोगों की रक्षा का कार्य है। लेकिन इस अंतिम अवस्था में यदि आप कोई अक्षम्य पाप करते हैं, तो आपका सुधार या परिवर्तन संभव नहीं है। लोगों का स्वभाव बदलने और उनकी रक्षा करने की परमेश्वर की अपनी एक प्रक्रिया है। लोग जब एक प्रक्रिया के तहत अपने स्वभाव को प्रकट करेंगे तो परमेश्वर उनका रूपांतरण करेंगे; जब लोग निरंतर अपने स्वभाव को प्रकट करते हैं और रूपांतरित करते हैं, तो परमेश्वर को उद्धार का अपना लक्ष्य हासिल होता है। कुछ लोग सोचते हैं: चूंकि यह मेरा मिज़ाज है, तो मैं इसे यथासंभव प्रकट कर दूंगा! बाद में इसे पहचानकर, सत्य को ग्रहण कर लूंगा। क्या यह प्रक्रिया आवश्यक है? यदि आप वास्तव में सत्य का पालन करने वाले व्यक्ति हैं, और आपको लगता है कि आपके साथ भी वही समस्यायें हैं जो अन्य लोगों के साथ हैं, तब आप उन कार्यों को न करने का भरसक प्रयास करेंगे। क्या यह अप्रत्यक्ष रूप से रूपांतरण नहीं है? कभी-कभी आप उस कार्य को उसी प्रकार से करने की सोचते हैं, लेकिन उसे करने से पहले आप सतर्क हो जाते हैं और छोड़ देते हैं। तो क्या यह उद्धार की ओर अग्रसर नहीं करेगा? हर सत्य के पालन की एक प्रक्रिया है; आपके लिये पूर्णता असम्भव है और जब आप सत्य का पालन आरंभ करें और आपके विचारों में खोट न हो, यह संभव नहीं। अभी भी ऐसी अनेक बातें है जिनके लिये आप पूरी तरह से अपने विचारों पर भरोसा करोगे, लेकिन व्यवहार में आने और सुधरने पर, आप आखिरकार पूर्णत: परमेश्वर की आकांक्षाओं और वचनों के अनुसार कार्य करने लगेंगे। यही परिवर्तन और रूपांतरण है।