1. परमेश्वर की कलीसिया और धार्मिक समूह क्या हैं

संदर्भ के लिए बाइबल के पद:

"यीशु ने परमेश्‍वर के मन्दिर में जाकर उन सब को, जो मन्दिर में लेन-देन कर रहे थे, निकाल दिया, और सर्राफों के पीढ़े और कबूतर बेचनेवालों की चौकियाँ उलट दीं; और उनसे कहा, 'लिखा है, "मेरा घर प्रार्थना का घर कहलाएगा"; परन्तु तुम उसे डाकुओं की खोह बनाते हो'" (मत्ती 21:12-13)।

"लौदीकिया की कलीसिया के दूत को यह लिख : 'जो आमीन और विश्‍वासयोग्य और सच्‍चा गवाह है, और परमेश्‍वर की सृष्‍टि का मूल कारण है, वह यह कहता है कि मैं तेरे कामों को जानता हूँ कि तू न तो ठंडा है और न गर्म : भला होता कि तू ठंडा या गर्म होता। इसलिये कि तू गुनगुना है, और न ठंडा है और न गर्म, मैं तुझे अपने मुँह में से उगलने पर हूँ। तू कहता है कि मैं धनी हूँ और धनवान हो गया हूँ और मुझे किसी वस्तु की घटी नहीं; और यह नहीं जानता कि तू अभागा और तुच्छ और कंगाल और अंधा और नंगा है'" (प्रकाशितवाक्य 3:14-17)।

"उसने ऊँचे शब्द से पुकारकर कहा, 'गिर गया, बड़ा बेबीलोन गिर गया है! वह दुष्‍टात्माओं का निवास, और हर एक अशुद्ध आत्मा का अड्डा, और हर एक अशुद्ध और घृणित पक्षी का अड्डा हो गया। क्योंकि उसके व्यभिचार की भयानक मदिरा के कारण सब जातियाँ गिर गई हैं, और पृथ्वी के राजाओं ने उसके साथ व्यभिचार किया है, और पृथ्वी के व्यापारी उसके सुख-विलास की बहुतायत के कारण धनवान हुए हैं'" (प्रकाशितवाक्य 18:2-3)।

परमेश्वर के प्रासंगिक वचन:

परमेश्वर के कार्य के प्रत्येक चरण में मनुष्य से तद्नुरूपी अपेक्षाएँ भी होती हैं। जो पवित्र आत्मा की धारा के भीतर हैं वे सभी पवित्र आत्मा की उपस्थिति और अनुशासन के अधीन हैं, और जो पवित्र आत्मा की मुख्य धारा में नहीं हैं वे शैतान के नियन्त्रण में हैं, और वे पवित्र आत्मा के किसी भी कार्य से रहित हैं। जो लोग पवित्र आत्मा की धारा में हैं ये वे लोग हैं जो परमेश्वर के नए कार्य को स्वीकार करते हैं, ऐसे लोग हैं जो परमेश्वर के नए कार्य में सहयोग करते हैं। यदि इस मुख्य धारा के लोग सहयोग करने में अक्षम रहते हैं, और इस समय के दौरान परमेश्वर के द्वारा अपेक्षित सत्य का अभ्यास करने में असमर्थ रहते हैं, तो उन्हें अनुशासित किया जाएगा, और बहुत खराब स्थिति में उन्हें पवित्र आत्मा के द्वारा छोड़ दिया जाएगा। जो पवित्र आत्मा के नए कार्य को स्वीकार करते हैं, वे पवित्र आत्मा की मुख्य धारा में जीवन बिताएँगे, पवित्र आत्मा की देखभाल और सुरक्षा प्राप्त करेंगे। जो लोग सत्य को अभ्यास रूप में लाने के इच्छुक हैं उन्हें पवित्र आत्मा द्वारा प्रबुद्ध किया जाता है, और जो लोग सत्य को अभ्यास में लाने के अनिच्छुक हैं, उन्हें पवित्र आत्मा के द्वारा अनुशासित किया जाता है, और यहाँ तक कि उन्हें दण्ड भी दिया जा सकता है। इस बात की परवाह न करते हुए कि वे किस प्रकार के व्यक्ति हैं, बशर्ते कि वे पवित्र आत्मा की मुख्य धारा के भीतर हों, परमेश्वर उन सभी लोगों की ज़िम्मेदारी लेगा जो उसके नाम के वास्ते उसके नए कार्य को स्वीकार करते हैं। जो लोग उसके नाम की महिमा करते हैं और उसके वचनों को अभ्यास में लाने के इच्छुक हैं वे उसके आशीषों को प्राप्त करेंगे; जो लोग उसकी अवज्ञा करते हैं और उसके वचनों को अभ्यास में नहीं लाते हैं वे उसके दण्ड को प्राप्त करेंगे। जो लोग पवित्र आत्मा की मुख्य धारा में हैं वे ऐसे लोग हैं जो नए कार्य को स्वीकार करते हैं, और चूँकि उन्होंने उस नए कार्य को स्वीकार कर लिया है, तो उनका परमेश्वर के साथ उचित सहयोग होना चाहिए, और उन्हें ऐसे विद्रोहियों के समान कार्य नहीं करना चाहिए जो अपने कर्तव्य को नहीं निभाते हैं। यह मनुष्य से की गई परमेश्वर की एकमात्र अपेक्षा है। यह उन लोगों के लिए नहीं है जो नए कार्य को स्वीकार नहीं करते हैं: वे पवित्र आत्मा की धारा से बाहर हैं, और पवित्र आत्मा का अनुशासन और झिड़की उन पर लागू नहीं होते हैं। पूरा दिन, ये लोग देह में जीवन बिताते रहते हैं, वे अपने मन के भीतर जीवन बिताते हैं, और वे जो कुछ भी करते हैं वह सब उनके स्वयं के मस्तिष्क के विश्लेषण और अनुसंधान के द्वारा उत्पन्न हुए सिद्धान्त के अनुसार होता है। यह पवित्र आत्मा के नए कार्य की अपेक्षाएँ नहीं हैं, और यह परमेश्वर के साथ सहयोग तो बिलकुल भी नहीं है। जो लोग परमेश्वर के नए कार्य को स्वीकार नहीं करते हैं वे परमेश्वर की उपस्थिति से वंचित रहते हैं, और, इसके अतिरिक्त, वे परमेश्वर के आशीषों और सुरक्षा से रहित होते हैं। उनके अधिकांश वचन और कार्य पवित्र आत्मा की पुरानी अपेक्षाओं को थामे रहते हैं; वे सिद्धान्त हैं, सत्य नहीं। ऐसे सिद्धान्त और विनियमन यह साबित करने के लिए पर्याप्त हैं कि इन लोगों का एक साथ इकट्ठा होना धर्म के अलावा और कुछ नहीं है; वे चुने हुए लोग, परमेश्वर के कार्य के लक्ष्य नहीं हैं। उनमें से सभी लोगों की सभा को मात्र धर्म का महासम्मलेन कहा जा सकता है, और उन्हें कलीसिया नहीं कहा जा सकता है। यह एक अपरिवर्तनीय तथ्य है। उनके पास पवित्र आत्मा का नया कार्य नहीं है; जो कुछ वे करते हैं वह धर्म का द्योतक प्रतीत होता है, जैसा जीवन वे जीते हैं वह धर्म से भरा हुआ प्रतीत होता है; उनमें पवित्र आत्मा की उपस्थिति और कार्य नहीं होता है, और वे पवित्र आत्मा से अनुशासन या प्रबुद्धता प्राप्त करने के लायक तो बिलकुल भी नहीं हैं। ऐसे समस्त लोग निर्जीव लाशों और कीड़ों के समान हैं जो आध्यात्मिकता से रहित हैं। उन्हें मनुष्य की विद्रोहशीलता और विरोध का कोई ज्ञान नहीं है, मनुष्य के समस्त कुकर्मों का कोई ज्ञान नहीं है, और वे परमेश्वर के समस्त कार्य और परमेश्वर की वर्तमान इच्छा के बारे में बिलकुल भी नहीं जानते हैं। वे सभी अज्ञानी और अधम लोग हैं, वे कूडा करकट हैं जो विश्वासी कहलाने के योग्य नहीं हैं! वे ऐसा कुछ भी नहीं करते हैं जिसका परमेश्वर के प्रबंधन के कार्य के साथ कोई सम्बन्ध हो, और यह परमेश्वर के कार्य को तो बिलकुल भी नहीं बिगाड़ सकता है। उनके वचन और कार्य अत्यंत घृणास्पद, अत्यंत दयनीय, और उल्लेख करने के लायक मात्र भी नहीं होते हैं। ऐसे लोग जो पवित्र आत्मा की धारा में नहीं हैं उनके द्वारा किए गए किसी भी कार्य का पवित्र आत्मा के नए कार्य के साथ कोई लेना-देना नहीं होता है। इस वजह से, चाहे वे कुछ भी क्यों न करें, वे पवित्र आत्मा के अनुशासन से रहित होते हैं, और, इसके अतिरिक्त, वे पवित्र आत्मा की प्रबुद्धता से रहित होते हैं। क्योंकि वे सभी ऐसे लोग हैं जिन्हें सत्य से कोई प्रेम नहीं है, और वे पवित्र आत्मा के द्वारा घृणा और अस्वीकृत किए जाते हैं। उन्हें कुकर्मी कहा जाता हैं क्योंकि वे देह के अनुसार चलते हैं, और परमेश्वर के नामपट्ट के अधीन जो उन्हें अच्छा लगता है वे वही करते हैं। जब परमेश्वर कार्य करता है, तो वे जानबूझकर उसके विरोध में हो जाते हैं, और उसकी विपरीत दिशा में दौड़ते हैं। परमेश्वर के साथ सहयोग करने में मनुष्य की असफलता अपने आप में चरम रूप से विद्रोही है, इसलिए क्या ऐसे लोग, जो जानबूझकर परमेश्वर के प्रतिकूल चलते हैं, विशेष रूप से प्रतिफल प्राप्त नहीं करेंगे?

— "वचन देह में प्रकट होता है" में 'परमेश्वर का कार्य और मनुष्य का अभ्यास' से उद्धृत

"पर मैं तुम से कहता हूँ कि यहाँ वह है जो मन्दिर से भी बड़ा है। यदि तुम इसका अर्थ जानते, 'मैं दया से प्रसन्न होता हूँ, बलिदान से नहीं,' तो तुम निर्दोष को दोषी न ठहराते। मनुष्य का पुत्र तो सब्त के दिन का भी प्रभु है" (मत्ती 12:6-8)। यहाँ "मन्दिर" किस का इशारा करता है? आसान शब्दों में कहें तो, "मन्दिर" एक शोभायमान, ऊँची इमारत का इशारा करता है, और व्यवस्था के युग में, मन्दिर परमेश्वर की आराधना हेतु याजकों के लिए एक स्थान था। जब प्रभु यीशु ने कहा, "कि यहाँ वह है जो मन्दिर से भी बड़ा है," यहाँ "वह" किसकी ओर इशारा करता है? स्पष्ट रूप से "वह" प्रभु यीशु है जो देह में है, क्योंकि केवल वही मन्दिर से बड़ा था। उन वचनों ने लोगों से क्या कहा? उन्होंने लोगों को मन्दिर से बाहर आने के लिए कहा—परमेश्वर पहले ही बाहर आ चुका था और उसमें अब और कार्य नहीं कर रहा था, इसलिए लोगों को मन्दिर के बाहर परमेश्वर के पदचिह्नों को ढूँढ़ना चाहिए और उसके नए कार्य में उसके कदमों का अनुसरण करना चाहिए। प्रभु यीशु मसीह के इस कथन की पृष्ठभूमि यह थी कि व्यवस्था के अधीन, लोग किसी ऐसी चीज़ के रूप में मन्दिर को देखने के लिए आए थे जो स्वयं परमेश्वर से भी बड़ा था। अर्थात्, लोग परमेश्वर की आराधना करने के बजाए मन्दिर की आराधना करते थे, इसलिए प्रभु यीशु मसीह ने उन्हें सावधान किया कि वे मूर्तियों की आराधना न करें, बल्कि परमेश्वर की आराधना करें क्योंकि वह सर्वोच्च है। इसलिए उसने कहाः "मैं दया से प्रसन्न होता हूँ, बलिदान से नहीं।" यह स्पष्ट है कि प्रभु यीशु की नज़रों में, व्यवस्था के अधीन अधिकांश लोग यहोवा की अब और आराधना नही करते थे, बल्कि मात्र बलिदान की प्रक्रिया से होकर जाते थे, और प्रभु यीशु ने निर्धारित किया था कि यह प्रक्रिया मूर्ति पूजा है। इन मूर्ति पूजकों ने मन्दिर को परमेश्वर से अधिक महान और उच्चतर रूप में देखा था। उनके हृदयों में केवल मन्दिर था, न कि परमेश्वर, और यदि वे मन्दिर को खो देते हैं, तो वे अपने निवास स्थान को भी खो देते हैं। मन्दिर के बिना उनके पास आराधना के लिए कोई जगह नहीं थी और वे बलिदानों को कार्यान्वित नहीं कर सकते थे। उनका तथाकथित निवास स्थान वहाँ है जहाँ से वे यहोवा परमेश्वर की आराधना के झण्डे तले संचालन करते थे, जहाँ उन्हें मन्दिर के टिके रहने और अपने स्वयं के क्रियाकलापों को करने की अनुमति दी जाती थी। उनके तथाकथित बलिदानों को चढ़ाना मन्दिर में उनकी सेवा आयोजित करने के बहाने बस उनके स्वयं के व्यक्तिगत शर्मनाक व्यवहारों को कार्यान्वित करने के लिए था। यही वह कारण था कि उस समय लोग मन्दिर को परमेश्वर से भी बड़ा देखते थे। क्योंकि वे मन्दिर को एक आड़ के रूप में, और बलिदानों को लोगों को धोखा देने और परमेश्वर को धोखो देने के लिए एक बहाने के रूप में उपयोग करते थे, इसलिए प्रभु यीशु ने लोगों को चेतावनी देने के लिए ऐसा कहा था। यदि तुम लोग इन वचनों को वर्तमान में लागू करते हो, तब भी वे उतने ही प्रामाणिक और उतने ही उचित हैं। यद्यपि आज लोगों ने व्यवस्था के युग के लोगों के अनुभव की तुलना में अलग परमेश्वर के कार्य का अनुभव किया है, फिर भी उनके स्वभाव का सार एक समान है।

— "वचन देह में प्रकट होता है" में 'परमेश्वर का कार्य, परमेश्वर का स्वभाव और स्वयं परमेश्वर III' से उद्धृत

यदि, अपने विश्वास में, लोग सत्य को पालन किए जाने वाले विनियमों के एक समुच्चय के रूप में मानते हैं, तो क्या उनका विश्वास धार्मिक अनुष्ठानों में बदलने के लिए उत्तरदायी नहीं है? और इस तरह के धार्मिक अनुष्ठानों और ईसाई धर्म के बीच क्या अंतर है? वे चीज़ों को जिस तरह से कहते हैं उसमें अधिक गहरे और अधिक प्रगतिशील हो सकते हैं, लेकिन यदि उनका विश्वास सिर्फ विनियमों का एक समुच्चय और एक प्रकार का अनुष्ठान बन जाता है, तो क्या इसका यह अर्थ नहीं है कि यह ईसाई धर्म में बदल गया है? (हाँ, ऐसा होता है।) पुरानी और नई शिक्षाओं के बीच अंतर हैं, लेकिन यदि शिक्षाएँ एक तरह के सिद्धांत से ज्यादा कुछ नहीं हों और लोगों के लिए मात्र अनुष्ठान का, सिद्धान्त, का एक रूप बन गयी हों—और, इसी तरह से, यदि वे इससे सत्य प्राप्त नहीं कर सकते हैं या सत्य की वास्तविकता में प्रवेश नहीं कर सकते हैं, तो क्या उनका विश्वास केवल ईसाई धर्म के समान नहीं है? सार रूप में, क्या यह ईसाई धर्म नहीं है? (हाँ, है।) इसलिए, तुम लोगों के व्यवहार में और अपने कर्तव्यों को करने में, किन चीज़ों में तुम्हारे दृष्टिकोण और स्थितियाँ ईसाई धर्म में विश्वासियों के समान या उसी तरह की हैं? (विनियमों का पालन करने में, और वचनों और सिद्धान्तों से सज्जित होने में।) (आध्यात्मिक होने के दिखावे और अच्छा व्यवहार दर्शाने वाला होने, और धर्मपरायण और विनम्र होने पर ध्यान केन्द्रित करने में।) तू बाहरी तौर पर अच्छे व्यवहार वाला होने की तलाश करता है, अपने आप को एक प्रकार के आध्यात्मिकता के आभास से भरने, आध्यात्मिक सिद्धान्त बोलने, ऐसी चीज़ों को कहने जो आध्यात्मिक रूप से सही हों, ऐसी चीज़ों को करने जो सापेक्ष रूप से मानव अवधारणाओं और कल्पनाओं में अनुमोदित हैं, और धार्मिक होने का ढोंग करने के लिए अपनी पूरी कोशिश करता है। तू जो कुछ कहता और करता है उसमें तू ऊँचाई से वचनों और सिद्धांतों को बोलता है, लोगों को अच्छा करने, धार्मिक लोग बनने, और सत्य को समझने के लिए सिखाता है; तू आध्यात्मिक होने के बारे में हवा लगाता है, और तू एक सतही आध्यात्मिकता टपकाता है। हालाँकि अभ्यास में, तूने कभी भी सत्य की तलाश नहीं की है; जैसे ही तू किसी समस्या का सामना करता है, तो तू परमेश्वर को एक तरफ उछालते हुए, पूरी तरह से मानवीय इच्छा के अनुसार कार्य करता है। तूने कभी भी सत्य के सिद्धांतों के अनुसार कार्य नहीं किया, तू कभी भी यह नहीं समझ पाया है कि सत्य में किस बारे में बोला गया है, परमेश्वर की इच्छा क्या है, मनुष्य से उसे किन मानकों की अपेक्षा है—तूने इन मामलों को कभी भी गंभीरता से नहीं लिया है या अपने को उनके साथ चिंतित नहीं किया है। क्या लोगों के ऐसे बाहरी कृत्य और आंतरिक स्थितियाँ—अर्थात्, इस प्रकार का विश्वास—परमेश्वर के लिए भय मानने और बुराई से दूर रहने को शामिल करता है? यदि लोगों की आस्था और उनके सत्य के अनुसरण के बीच कोई संबंध नहीं है, तो क्या वे परमेश्वर में विश्वास करते हैं या नहीं करते हैं? इस बात की परवाह किए बिना कि वे लोग जिनका सत्य का अनुसरण करने से कोई संबंध नहीं है कितने वर्षों तक विश्वास कर सकते हैं, क्या सच्ची, परमेश्वर का भय मानने वाली श्रद्धा प्राप्त कर सकते हैं अथवा नहीं और बुराई से दूर रह सकते हैं या नहीं? (वे ऐसा नहीं कर सकते हैं।) तो ऐसे लोगों का बाहरी व्यवहार क्या होता है? वे किस प्रकार के मार्ग पर चल सकते हैं? (फरीसियों का मार्ग।) वे अपने आप को किस चीज़ से सज्जित करने में अपने दिनों को बिताते हैं? क्या ये चीज़ें वचन और सिद्धांत नहीं हैं? क्या वे अपने आप को फरीसियों की तरह अधिक बनाने, अधिक आध्यात्मिक, और ऐसे लोगों की तरह अधिक बनाने के लिए जो कथित रूप से परमेश्वर की सेवा करते हैं, अपने आप को वचनों और सिद्धांतों से सज्जित, सुशोभित करते हुए, अपने दिनों को नही बिताते हैं? बस इन सभी पद्धतियों की प्रकृति क्या है? क्या यह परमेश्वर की आराधना करना है? क्या यह उस में वास्तविक विश्वास है? (नहीं, यह विश्वास नहीं है।) तो वे क्या कर रहे हैं? वे परमेश्वर को धोखा दे रहे है; वे बस एक प्रक्रिया के चरण को पूरा कर रहे हैं, और धार्मिक अनुष्ठानों में संलग्न हो रहे हैं। वे विश्वास के ध्वज को लहरा रहे हैं और धार्मिक संस्कारों को निभा रहे हैं, आशीष पाने के अपने लक्ष्य को प्राप्त करने के लिए परमेश्वर को धोखा देने की कोशिश कर रहे हैं। वे परमेश्वर की आराधना बिल्कुल नहीं करते हैं। अंत में, क्या ऐसे लोगों के समूह का अंत ठीक कलीसिया के भीतर के उन लोगों की तरह नहीं होगा जो कथित रूप से परमेश्वर की सेवा करते हैं, और जो कथित रूप से परमेश्वर को मानते और उसका अनुसरण करते हैं?

— "मसीह की बातचीत के अभिलेख" में 'यदि तू हर समय परमेश्वर के सामने रह सकता है केवल तभी तू उद्धार के पथ पर चल सकता है' से उद्धृत

क्यों यहोवा पर विश्वास करने वालों को परमेश्वर कौन-सा नाम देता है? यहूदी धर्म। वे एक प्रकार का धार्मिक समूह बन गए। और परमेश्वर उन लोगों को कैसे परिभाषित करता है जो यीशु पर विश्वास करते हैं? (ईसाई धर्म।) परमेश्वर की नज़रों में, यहूदी धर्म और ईसाई धर्म धार्मिक समूह हैं। परमेश्वर उन्हें इस प्रकार क्यों परिभाषित करता है? उन सभी के बीच जो परमेश्वर द्वारा परिभाषित इन धार्मिक निकायों के सदस्य हैं, क्या कोई ऐसा है जो परमेश्वर से डरता है और बुराई से दूर रहता है, परमेश्वर के मार्ग का अनुसरण करता है, और परमेश्वर की इच्छा पूरी करता है? (नहीं।) यह इस बात को स्पष्ट करता है। परमेश्वर की नज़रों में, क्या वे सभी लोग जो परमेश्वर का नाममात्र के लिए अनुसरण करते हैं, ऐसे लोग होते हैं जिन्हें परमेश्वर विश्वासियों के रूप में होना स्वीकार करता है? क्या उन सभी का परमेश्वर के साथ कोई संबंध हो सकता है? क्या वे सभी परमेश्वर के उद्धार के लिए लक्ष्य हो सकते हैं? (नहीं।) तो क्या ऐसा दिन आएगा जब तुम लोग उसमें बदल जाओगे जिसे परमेश्वर धार्मिक समूह के रूप में देखता है? (यह संभव है।) एक धार्मिक समूह के रूप में देखा जाना, यह अचिंतनीय प्रतीत होता है। यदि लोग परमेश्वर की नज़र में एक धार्मिक समूह का हिस्सा बन जाते हैं, तो क्या वे उसके द्वारा बचाए जाएंगे? क्या वे परमेश्वर के घर के हैं? (नहीं वे नहीं।) तो सारांश करने का प्रयास करो: ये लोग, जो नाममात्र के लिए सच्चे परमेश्वर में विश्वास करते हैं लेकिन जिन्हें परमेश्वर एक धार्मिक समूह का हिस्सा मानता है—वे किस रास्ते पर चलते हैं? क्या ऐसा कहा जा सकता है कि ये लोग कभी भी उसके परमेश्वर में विश्वास करने के मार्ग का अनुसरण या उसकी आराधना नहीं करते हुए और उसका त्याग करते हुए, विश्वास के झंडे को लहराने के मार्ग पर चलते हैं? अर्थात्, वे परमेश्वर पर विश्वास करने के मार्ग पर चलते हैं लेकिन परमेश्वर के मार्ग का अनुसरण नहीं करते और उसे त्याग देते हैं; उनका मार्ग ऐसा है जिसमें वे विश्वास तो परमेश्वर पर करते हैं लेकिन शैतान की पूजा करते हैं, वे हैवान की आराधना करते हैं, वे अपने स्वयं के प्रबंधन को अंजाम देने, और अपना राज्य स्थापित करने की कोशिश करते हैं। क्या यही इसका सार है? क्या इस तरह के लोगों का मनुष्य के उद्धार की परमेश्वर की प्रबंधन योजना से कोई संबंध है? (नहीं।) चाहे कितने भी लोग परमेश्वर में विश्वास क्यों न करें, जैसे ही उनके विश्वासों को परमेश्वर द्वारा धर्म या समूह के रूप में परिभाषित किया जाता है, तब परमेश्वर ने निर्धारित किया है कि उन्हें बचाया नहीं जा सकता। मैं ऐसा क्यों कहता हूँ? किसी गिरोह या लोगों की भीड़ में जो परमेश्वर के कार्य और मार्गदर्शन से रहित हैं और जो उसकी आराधना बिल्कुल भी नहीं करते हैं, वे किसकी आराधना करते हैं? वे किसका अनुसरण करते हैं? रूप और नाम में, वे एक इंसान का अनुसरण करते हैं, लेकिन वास्तव में वे किसका अनुसरण करते हैं? अपने हृदय में वे परमेश्वर को स्वीकार करते हैं, लेकिन वास्तव में, वे मानवीय हेरफेर, व्यवस्थाओं और नियंत्रण के अधीन हैं। वे शैतान, हैवान का अनुसरण करते हैं; वे उन ताक़तों का अनुसरण करते हैं जो परमेश्वर के प्रति शत्रुतापूर्ण हैं, जो परमेश्वर की दुश्मन हैं। क्या परमेश्वर इस तरह के लोगों के झुण्ड को बचाएगा? (नहीं।) क्यों? क्या वे पश्चाताप करने में सक्षम हैं? (नहीं।) वे मानव उद्यमों को चलाते हुए, अपने स्वयं के प्रबंधन का संचालन करते हुए विश्वास का झंडा लहराते हैं, और मनुष्यजाति के उद्धार के लिए परमेश्वर की प्रबंधन योजना के विपरीत चलते हैं। उनका अंतिम परिणाम परमेश्वर द्वारा नफ़रत और अस्वीकृत किया जाना है; परमेश्वर इन लोगों को संभवतः नहीं बचा सकता है, वे संभवतः पश्चाताप नहीं कर सकते है, वे पहले से ही शैतान के द्वारा पकड़ लिए गए हैं—वे पूरी तरह से शैतान के हाथों में हैं। ... और इसलिए इस युग के लोग, जिन्होंने बहुत से सत्य सुने हैं, और जो परमेश्वर की इच्छा को समझ पाये हैं, अगर वे परमेश्वर के मार्ग का अनुसरण करने में असमर्थ हैं और उद्धार के मार्ग पर चलने में असमर्थ हैं, तो उनका अंतिम परिणाम क्या होगा? उनका अंतिम परिणाम उन्हीं के समान होगा जो ईसाई और यहूदी धर्म को मानते हैं; कोई अंतर नहीं होगा। यह परमेश्वर का धार्मिक स्वभाव है! चाहे तूने कितने भी धर्मोपदेश सुने हों, और तू कितने सत्यों को समझ चुका हो, यदि अंततः तू अभी भी लोगों का अनुसरण करता है और शैतान का अनुसरण करता है, और अंततः, तू अभी भी परमेश्वर के मार्ग का अनुसरण करने में अक्षम हैं और परमेश्वर का भय मानने और बुराई से दूर रहने में असमर्थ है, तो इस तरह के लोगों से परमेश्वर द्वारा नफ़रत की जाएगी और उन्हें अस्वीकार कर दिया जाएगा। हर पहलू से, ये लोग जो परमेश्वर द्वारा नफ़रत और अस्वीकृत किए जाते हैं वे पत्रों और सिद्धांतों के बारे में ज्यादा बात कर सकते हैं, और बहुत से सत्य समझते हैं और फिर भी वे परमेश्वर की आराधना करने में असमर्थ होते हैं; वे परमेश्वर का भय मानने और बुराई से दूर रहने में असमर्थ हैं, और परमेश्वर के प्रति पूर्ण आज्ञाकारी होने में असमर्थ हैं। परमेश्वर की नज़रों में, परमेश्वर उन्हें धर्म के रूप में, मनुष्य मात्र के एक समूह के रूप में, एक इंसानों का गिरोह और शैतान के लिए एक निवास स्थान के रूप में परिभाषित करता है। उन्हें सामूहिक रूप से शैतान का गिरोह कहा जाता है, और परमेश्वर उनसे पूरी तरह से घृणा करता है।

— "मसीह की बातचीत के अभिलेख" में 'यदि तू हर समय परमेश्वर के सामने रह सकता है केवल तभी तू उद्धार के पथ पर चल सकता है' से उद्धृत

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