2. यदि कोई व्यक्ति परमेश्वर में विश्वास केवल उसके अनुग्रह का आनंद उठाने के लिए करता है, तो क्या उसकी गवाही सच्ची है

परमेश्वर के प्रासंगिक वचन:

आज मनुष्य देखता है कि परमेश्वर के केवल अनुग्रह, प्रेम और उसकी दया के साथ वह स्वयं को पूरी तरह से जान सकने में असमर्थ है, और वह मनुष्य के तत्व को तो जान ही नहीं सकता है। केवल परमेश्वर के शोधन और न्याय के द्वारा, केवल ऐसे शोधन के द्वारा एक व्यक्ति अपनी कमियों को जान सकता है, और जान सकता है कि उसके पास कुछ भी नहीं है। अतः, मनुष्य का परमेश्वर के प्रति प्रेम परमेश्वर की ओर से आने वाले शोधन और न्याय की नींव पर आधारित होता है। शांतिमय पारिवारिक जीवन या भौतिक आशीषों के साथ, यदि तुम केवल परमेश्वर के अनुग्रह का आनंद लेते हो, तो तुमने परमेश्वर को प्राप्त नहीं किया है, और परमेश्वर में तुम्हारे विश्वास को सफल नहीं माना जा सकता। परमेश्वर ने शरीर में अनुग्रह के कार्य के एक चरण को पहले ही पूरा कर लिया है, और मनुष्य को भौतिक आशीषें प्रदान कर दी हैं—परंतु मनुष्य को केवल अनुग्रह, प्रेम और दया के साथ सिद्ध नहीं किया जा सकता। मनुष्य अपने अनुभवों में परमेश्वर के कुछ प्रेम का अनुभव करता है, और परमेश्वर के प्रेम और उसकी दया को देखता है, फिर भी कुछ समय तक इसका अनुभव करने के बाद वह देखता है कि परमेश्वर का अनुग्रह और उसका प्रेम और उसकी दया मनुष्य को सिद्ध बनाने में असमर्थ हैं, और उसे प्रकट करने में भी असमर्थ हैं जो मनुष्य में भ्रष्ट है, और न ही वे मनुष्य के भ्रष्ट स्वभाव से उसे आज़ाद कर सकते हैं, या उसके प्रेम और विश्वास को सिद्ध बना सकते हैं। परमेश्वर का अनुग्रह का कार्य एक अवधि का कार्य था, और मनुष्य परमेश्वर को जानने के लिए परमेश्वर के अनुग्रह का आनंद उठाने पर निर्भर नहीं रह सकता।

— "वचन देह में प्रकट होता है" में 'केवल पीड़ादायक परीक्षाओं का अनुभव करने के द्वारा ही तुम परमेश्वर की मनोहरता को जान सकते हो' से उद्धृत

वह कौन-सा मार्ग है, जिसके द्वारा परमेश्वर लोगों को पूर्ण बनाता है? कौन-कौन से पहलू उसमें शामिल हैं? क्या तुम परमेश्वर द्वारा पूर्ण बनाया जाना चाहते हो? क्या तुम परमेश्वर का न्याय और उसकी ताड़ना स्वीकार करना चाहते हो? तुम इन प्रश्नों से क्या समझते हो? यदि तुम ऐसे ज्ञान के बारे में बात नहीं कर सकते, तो यह इस बात का प्रमाण है कि तुम अभी तक परमेश्वर के कार्य को नहीं जान पाए हो और तुम पवित्र आत्मा द्वारा बिलकुल भी प्रबुद्ध नहीं बनाए गए हो। ऐसे व्यक्ति को पूर्ण बनाया जाना असंभव है। उन्हें केवल थोड़ी मात्रा में ही अनुग्रह का आनंद दिया जाता है, और यह लंबे समय तक नहीं रहेगा। यदि लोग केवल परमेश्वर के अनुग्रह का ही आनंद उठाते हैं, तो उन्हें परमेश्वर द्वारा पूर्ण नहीं बनाया जा सकता। कुछ लोग संतुष्ट हो जाते हैं, जब उन्हें शारीरिक शांति और आनंद मिलता है, जब उनका जीवन आसानी से चलता है और उसमें कोई विपत्ति या दुर्भाग्य नहीं होता, जब उनका पूरा परिवार मेल-मिलाप से रहता है और उसमें कोई कलह या विवाद नहीं होता—और वे यह भी विश्वास कर सकते हैं कि यही परमेश्वर का आशीष है। पर सच्चाई यह है कि यह केवल परमेश्वर का अनुग्रह है। तुम लोगों को सिर्फ परमेश्वर के अनुग्रह का आनंद उठाने से ही संतुष्ट नहीं हो जाना चाहिए। ऐसी सोच कितनी भद्दी है। भले ही तुम प्रतिदिन परमेश्वर के वचन पढ़ो, प्रतिदिन प्रार्थना करो, और तुम्‍हारी आत्मा अत्यधिक आनंद और खास तौर से शांति का अनुभव करो, लेकिन यदि अंतत: तुम्हारे पास परमेश्वर और उसके कार्य के अपने ज्ञान के बारे में कहने के लिए कुछ नहीं है, और तुमने कुछ अनुभव नहीं किया है, और चाहे तुमने परमेश्वर का वचन कितना भी क्यों न खाया और पीया हो, यदि तुम केवल आध्यात्मिक शांति और आनंद का अनुभव करते हो और यह भी कि परमेश्वर के वचन अतुलित रूप से मीठे हैं, मानो तुम उसका पर्याप्त आनंद नहीं उठा सकते, पर तुम्‍हें परमेश्वर के वचन का कोई वास्तविक अनुभव नहीं हुआ है और तुम उसके वचनों की वास्तविकता से पूर्णत: वंचित हो, तो परमेश्वर में ऐसे विश्वास से तुम क्या हासिल कर सकते हो? यदि तुम परमेश्वर के वचनों के सार को जीवन में उतार नहीं सकते, तो इन वचनों को खाना-पीना और तुम्‍हारी प्रार्थनाएँ धार्मिक विश्वास के सिवा कुछ नहीं हैं। ऐसे लोग परमेश्वर द्वारा पूर्ण और प्राप्त नहीं किए जा सकते।

— "वचन देह में प्रकट होता है" में 'प्रतिज्ञाएँ उनके लिए जो पूर्ण बनाए जा चुके हैं' से उद्धृत

परमेश्वर लोगों को उनकी आज्ञाकारिता, परमेश्वर के वचनों को उनके खाने-पीने, उनका आनन्द उठाने और उनके जीवन में कष्ट एवं शुद्धिकरण के माध्यम से पूर्ण बनाता है। ऐसे विश्वास से ही लोगों का स्वभाव परिवर्तित हो सकता है और तभी उन्हें परमेश्वर का सच्चा ज्ञान हो सकता है। परमेश्वर के अनुग्रह के बीच रहकर सन्तुष्ट न होना, सत्य के लिए सक्रियता से लालायित होना और उसे खोजना और परमेश्वर द्वारा प्राप्त किए जाने का प्रयास करना—यही जागृत रहकर परमेश्वर की आज्ञा मानने का अर्थ है; और परमेश्वर ऐसा ही विश्वास चाहता है। जो लोग परमेश्वर के अनुग्रह का आनन्द उठाने के अलावा कुछ नहीं करते, वे पूर्ण नहीं बनाए जा सकते, या परिवर्तित नहीं किए जा सकते, और उनकी आज्ञाकारिता, धर्मनिष्ठता, प्रेम तथा धैर्य सभी सतही होते हैं। जो लोग केवल परमेश्वर के अनुग्रह का आनन्द लेते हैं, वे परमेश्वर को सच्चे अर्थ में नहीं जान सकते, यहाँ तक कि जब वे परमेश्वर को जान भी जाते हैं, तब भी उनका ज्ञान उथला ही होता है, और वे "परमेश्वर मनुष्य से प्रेम करता है", या "परमेश्वर मनुष्य के प्रति करुणामय है" जैसी बातें करते हैं। यह मनुष्य के जीवन का द्योतक नहीं है, न ही इससे यह सिद्ध होता है कि लोग सचमुच परमेश्वर को जानते हैं। यदि, जब परमेश्वर के वचन उन्हें शुद्ध करते हैं, या जब उन्हें अचानक परमेश्वर की परीक्षाएँ देनी पड़ती हैं, तब लोग परमेश्वर का आज्ञापालन नहीं कर पाते—बल्कि यदि वे संदिग्ध और ग़लत साबित हो जाते हैं—तब वे रत्ती भर भी आज्ञाकारी नहीं रहते हैं।

— "वचन देह में प्रकट होता है" में 'परमेश्वर में अपने विश्वास में तुम्हें परमेश्वर का आज्ञापालन करना चाहिए' से उद्धृत

क्या तुम शैतान के प्रभाव में, शांति, आनन्द, और थोड़ा बहुत देह के सुकून के साथ जीवन बिताकर संतुष्ट हो? क्या तुम सभी लोगों में सब से अधिक निम्न नहीं हो? उन से ज़्यादा मूर्ख और कोई नहीं है जिन्होंने उद्धार को देखा किन्तु उसे प्राप्त करने के लिए अनुसरण नहीं किया; वे ऐसे लोग हैं जो देह से स्वयं को भरपूर कर लेते हैं और शैतान का आनंद लेते हैं। तुम आशा करते हो कि परमेश्वर पर विश्वास करने से तुम्‍हें चुनौतियाँ और क्लेश, या थोड़ी बहुत कठिनाई विरासत में नहीं मिलेगी। तुम हमेशा ऐसी चीज़ों का अनुसरण करते हो जो निकम्मी हैं, और तुम अपने जीवन में कोई मूल्य नहीं जोड़ते हो, उसके बजाय तुम अपने फिजूल के विचारों को सत्य से ज़्यादा महत्व देते हो। तुम कितने निकम्‍मे हो! तुम एक सूअर के समान जीते हो—तुममें, और सूअर और कुत्तों में क्या अन्तर है? क्या वे जो सत्य का अनुसरण नहीं करते हैं, और उसके बजाय शरीर से प्रेम करते हैं, सब के सब जानवर नहीं हैं? क्या वे मरे हुए लोग जिनमें आत्मा नहीं है, चलती फिरती हुई लाशें नहीं हैं? तुम लोगों के बीच में कितने सारे वचन बोले गए हैं? क्या तुम लोगों के बीच में केवल थोड़ा सा ही कार्य किया गया है? मैंने तुम लोगों के बीच में कितनी आपूर्ति की है? तो फिर तुमने इसे प्राप्त क्यों नहीं किया? तुम्‍हारे पास शिकायत करने के लिए क्या है? क्या मामला ऐसा नहीं है कि तुमने कुछ भी इसलिए प्राप्त नहीं किया है क्योंकि तुम देह से बहुत अधिक प्रेम करते हो? और क्या यह इसलिए नहीं है क्योंकि तुम्‍हारे विचार बहुत ज़्यादा फिजूल हैं? क्या यह इसलिए नहीं है क्योंकि तुम बहुत ही ज़्यादा मूर्ख हो? यदि तुम इन आशीषों को प्राप्त करने में असमर्थ हो, तो क्या तुम परमेश्वर को दोष दोगे कि उसने तुम्‍हें नहीं बचाया? तुम परमेश्वर पर विश्वास करने के बाद शांति प्राप्त करने के योग्य होने के लिए अनुसरण करते हो—अपनी सन्तानों के लिए बीमारी से आज़ादी, अपने जीवनसाथी के लिए एक अच्छी नौकरी, अपने बेटे के लिए एक अच्छी पत्नी, अपनी बेटी के लिए एक सज्जन पति, अपने बैल और घोड़े के लिए अच्छे से जमीन की जुताई कर पाने की क्षमता, और अपनी फसलों के लिए साल भर अच्छे मौसम की कामना करते हो। तुम इन्हीं चीज़ों की खोज करते हो। तुम्‍हारा अनुसरण केवल सुकून के साथ जीवन बिताने के लिए है, इसलिए है कि तुम्‍हारे परिवार में कोई दुर्घटना न हो, कि आँधी तुम्‍हारे पास से होकर गुज़र जाये, धूल मिट्टी तुम्‍हारे चेहरे को छू न पाए, तुम्‍हारे परिवार की फसलें बाढ़ में बह न जायें, तुम किसी भी विपत्ति से प्रभावित न हो, कि तुम परमेश्वर की बांहों में रहो, कि तुम आरामदायक घोंसले में रहो। तुम्‍हारे जैसा डरपोक इंसान, जो हमेशा शरीर के पीछे पीछे चलता है—क्या तुम्‍हारे पास एक हृदय है, क्या तुम्‍हारे पास एक आत्मा है? क्या तुम एक पशु नहीं हो? बदले में बिना कुछ मांगते हुए मैं तुम्‍हें एक सच्चा मार्ग देता हूँ, फिर भी तुम अनुसरण नहीं करते हो। क्या तुम उनमें से एक हो जो परमेश्वर पर विश्वास करते हैं? मैं तुम्‍हें वास्तविक मानवीय जीवन देता हूँ, फिर भी तुम अनुसरण नहीं करते हो। क्या तुम कुत्ते और सूअर के समान नहीं हो? सूअर मनुष्य के जीवन का अनुसरण नहीं करते हैं, वे शुद्ध किए जाने का प्रयास नहीं करते हैं, और वे नहीं समझते हैं कि जीवन क्या है? प्रतिदिन, जी भरकर खाने के बाद, वे बस सो जाते हैं। मैंने तुम्‍हें सच्चा मार्ग दिया है, फिर भी तुमने उसे प्राप्त नहीं किया है: तुम्‍हारे हाथ खाली हैं। क्या तुम इस जीवन में, इस सूअर के जीवन में, निरन्तर बने रहना चाहते हो? ऐसे लोगों के ज़िन्दा रहने का क्या महत्व है? तुम्‍हारा जीवन घृणित और नीच है, तुम गन्दगी और व्यभिचार के मध्य रहते हो, और तुम किसी लक्ष्य को पाने का प्रयास नहीं करते हो; क्या तुम्‍हारा जीवन निम्नतम नहीं है? क्या तुम्‍हारे पास परमेश्वर की ओर देखने की धृष्टता है? यदि तुम लगातार इस तरह अनुभव करते रहो, तो क्या तुम्‍हें शून्यता प्राप्त नहीं होगी? सच्चा मार्ग तुझे दे दिया गया है, किन्तु अंततः तू उसे प्राप्त कर सकता है कि नहीं यह तेरे व्यक्तिगत अनुसरण पर निर्भर है।

— "वचन देह में प्रकट होता है" में 'पतरस के अनुभव: ताड़ना और न्याय का उसका ज्ञान' से उद्धृत

क्या अब तुम लोग समझते हो कि परमेश्वर पर विश्वास करना क्या होता है? क्या संकेत और चमत्कार देखना परमेश्वर पर विश्वास करना है? क्या इसका अर्थ स्वर्ग पर आरोहण करना है? परमेश्वर पर विश्वास ज़रा भी आसान नहीं है। उन धार्मिक अभ्यासों को निकाल दिया जाना चाहिए; रोगियों की चंगाई और दुष्टात्माओं को निकालने का अनुसरण करना, प्रतीकों और चमत्कारों पर ध्यान केंद्रित करना और परमेश्वर के अनुग्रह, शांति और आनंद का अधिक लालच करना, देह के लिए संभावनाओं और आराम की तलाश करना—ये धार्मिक अभ्यास हैं, और ऐसे धार्मिक अभ्यास एक अस्पष्ट प्रकार का विश्वास हैं। आज परमेश्वर में वास्तविक विश्वास क्या है? यह परमेश्वर के वचन को अपने जीवन की वास्तविकता के रूप में स्वीकार करना, और परमेश्वर का सच्चा प्यार प्राप्त करने के लिए परमेश्वर के वचन से परमेश्वर को जानना है। स्पष्ट कहूँ तो : परमेश्वर में विश्वास इसलिए है, ताकि तुम परमेश्वर की आज्ञा का पालन कर सको, उससे प्रेम कर सको, और वह कर्तव्य निभा सको, जिसे परमेश्वर के एक प्राणी द्वारा निभाया जाना चाहिए। यही परमेश्वर पर विश्वास करने का लक्ष्य है। तुम्हें परमेश्वर की मनोहरता का और इस बात का ज्ञान प्राप्त करना चाहिए कि परमेश्वर कितने आदर के योग्य है, कैसे अपने द्वारा सृजित प्राणियों में परमेश्वर उद्धार का कार्य करता है और उन्हें पूर्ण बनाता है—ये परमेश्वर पर तुम्हारे विश्वास की एकदम अनिवार्य चीज़ें हैं। परमेश्वर पर विश्वास मुख्यतः देह-उन्मुख जीवन से परमेश्वर से प्रेम करने वाले जीवन में बदलना है; भ्रष्टता के भीतर जीने से परमेश्वर के वचनों के जीवन के भीतर जीना है; यह शैतान के अधिकार-क्षेत्र से बाहर आना और परमेश्वर की देखभाल और सुरक्षा में जीना है; यह देह की आज्ञाकारिता को नहीं, बल्कि परमेश्वर की आज्ञाकारिता को प्राप्त करने में समर्थ होना है; यह परमेश्वर को तुम्हारा संपूर्ण हृदय प्राप्त करने और तुम्हें पूर्ण बनाने देना है, और तुम्हें भ्रष्ट शैतानी स्वभाव से मुक्त करने देना है। परमेश्वर में विश्वास मुख्यतः इसलिए है, ताकि परमेश्वर का सामर्थ्य और महिमा तुममें प्रकट हो सके, ताकि तुम परमेश्वर की इच्छा पर चल सको, और परमेश्वर की योजना संपन्न कर सको, और शैतान के सामने परमेश्वर की गवाही दे सको। परमेश्वर पर विश्वास संकेत और चमत्कार देखने की इच्छा के इर्द-गिर्द नहीं घूमना चाहिए, न ही यह तुम्हारी व्यक्तिगत देह के वास्ते होना चाहिए। यह परमेश्वर को जानने की कोशिश के लिए, और परमेश्वर की आज्ञा का पालन करने, और पतरस के समान मृत्यु तक परमेश्वर का आज्ञापालन करने में सक्षम होने के लिए, होना चाहिए। यही परमेश्वर में विश्वास करने के मुख्य उद्देश्य हैं। व्यक्ति परमेश्वर के वचन को परमेश्वर को जानने और उसे संतुष्ट करने के उद्देश्य से खाता और पीता है। परमेश्वर के वचन को खाना और पीना तुम्हें परमेश्वर का और अधिक ज्ञान देता है, जिसके बाद ही तुम उसका आज्ञा-पालन कर सकते हो। केवल परमेश्वर के ज्ञान के साथ ही तुम उससे प्रेम कर सकते हो, और यह वह लक्ष्य है, जिसे मनुष्य को परमेश्वर के प्रति अपने विश्वास में रखना चाहिए। यदि परमेश्वर पर अपने विश्वास में तुम सदैव संकेत और चमत्कार देखने का प्रयास कर रहे हो, तो परमेश्वर पर तुम्हारे विश्वास का यह दृष्टिकोण गलत है। परमेश्वर पर विश्वास मुख्य रूप से परमेश्वर के वचन को जीवन की वास्तविकता के रूप में स्वीकार करना है। परमेश्वर का उद्देश्य उसके मुख से निकले वचनों को अभ्यास में लाने और उन्हें अपने भीतर पूरा करने से हासिल किया जाता है। परमेश्वर पर विश्वास करने में मनुष्य को परमेश्वर द्वारा पूर्ण किए जाने, परमेश्वर के प्रति समर्पण करने में समर्थ होने, और परमेश्वर के प्रति पूर्ण आज्ञाकारिता के लिए प्रयास करना चाहिए। यदि तुम बिना शिकायत किए परमेश्वर का आज्ञापालन कर सकते हो, परमेश्वर की इच्छाओं के प्रति विचारशील हो सकते हो, पतरस का आध्यात्मिक कद प्राप्त कर सकते हो, और परमेश्वर द्वारा कही गई पतरस की शैली ग्रहण कर सकते हो, तो यह तब होगा जब तुम परमेश्वर पर विश्वास में सफलता प्राप्त कर चुके होगे, और यह इस बात का द्योतक होगा कि तुम परमेश्वर द्वारा प्राप्त कर लिए गए हो।

— "वचन देह में प्रकट होता है" में 'परमेश्वर के वचन के द्वारा सब-कुछ प्राप्त हो जाता है' से उद्धृत

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