1. परमेश्वर की इच्छा का अनुसरण करना क्या है, और क्या परमेश्वर की इच्छा का अनुसरण करना केवल उपदेश देना और प्रभु के लिए कार्य करना है

संदर्भ के लिए बाइबल के पद:

"तू परमेश्‍वर अपने प्रभु से अपने सारे मन और अपने सारे प्राण और अपनी सारी बुद्धि के साथ प्रेम रख। बड़ी और मुख्य आज्ञा तो यही है। और उसी के समान यह दूसरी भी है कि तू अपने पड़ोसी से अपने समान प्रेम रख" (मत्ती 22:37-39)।

"यदि कोई मुझ से प्रेम रखेगा तो वह मेरे वचन को मानेगा, और मेरा पिता उससे प्रेम रखेगा, और हम उसके पास आएँगे और उसके साथ वास करेंगे। जो मुझ से प्रेम नहीं रखता, वह मेरे वचन नहीं मानता" (यूहन्ना 14:23-24)।

"यदि तुम मेरे वचन में बने रहोगे, तो सचमुच मेरे चेले ठहरोगे" (यूहन्ना 8:31)।

"जो मुझ से, 'हे प्रभु! हे प्रभु!' कहता है, उनमें से हर एक स्वर्ग के राज्य में प्रवेश न करेगा, परन्तु वही जो मेरे स्वर्गीय पिता की इच्छा पर चलता है। उस दिन बहुत से लोग मुझ से कहेंगे, 'हे प्रभु, हे प्रभु, क्या हम ने तेरे नाम से भविष्यद्वाणी नहीं की, और तेरे नाम से दुष्‍टात्माओं को नहीं निकाला, और तेरे नाम से बहुत से आश्‍चर्यकर्म नहीं किए?' तब मैं उनसे खुलकर कह दूँगा, 'मैं ने तुम को कभी नहीं जाना। हे कुकर्म करनेवालो, मेरे पास से चले जाओ'" (मत्ती 7:21-23)।

परमेश्वर के प्रासंगिक वचन:

हर युग में, जब परमेश्वर संसार में कार्य करता है तब वह मनुष्य को कुछ वचन प्रदान करता है, मनुष्य को कुछ सत्य बताता है। ये सत्य ऐसे मार्ग के रूप में कार्य करते हैं जिसके मुताबिक मनुष्य को चलना है, ऐसा मार्ग जिसमें मनुष्य को चलना है, ऐसा मार्ग जो मनुष्य को परमेश्वर का भय मानने और दुष्टता से दूर रहने में सक्षम बनाता है, और ऐसा मार्ग जिसे मनुष्य को अभ्यास में लाना चाहिए और अपने जीवन में और अपनी जीवन यात्राओं के दौरान उसके मुताबिक चलना चाहिए। यह इन्हीं कारणों से है कि परमेश्वर इन वचनों को मनुष्य को प्रदान करता है। ये वचन जो परमेश्वर से आते हैं उनके मुताबिक ही मनुष्य को चलना चाहिए, और उनके मुताबिक चलना ही जीवन पाना है। यदि कोई व्यक्ति उनके मुताबिक नहीं चलता है, उन्हें अभ्यास में नहीं लाता है, और अपने जीवन में परमेश्वर के वचनों को नहीं जीता है, तो वह व्यक्ति सत्य को अभ्यास में नहीं ला रहा है। और यदि वे सत्य को अभ्यास में नहीं ला रहे हैं, तो वे परमेश्वर का भय नहीं मान रहे हैं और दुष्टता से दूर नहीं रह रहे हैं, और न ही वे परमेश्वर को संतुष्ट कर सकते हैं। यदि कोई परमेश्वर को संतुष्ट नहीं कर सकता है, तो वह परमेश्वर की प्रशंसा प्राप्त नहीं कर सकता है; इस प्रकार के व्यक्ति के पास कोई परिणाम नहीं होता है।

— "वचन देह में प्रकट होता है" में 'परमेश्वर के स्वभाव और उसका कार्य जो परिणाम हासिल करेगा, उसे कैसे जानें' से उद्धृत

परमेश्वर के मार्ग पर चलना सतही तौर पर नियमों का पालन करने के बारे में नहीं है। इसके बजाय, इसका अर्थ है कि जब तुम्हारा सामना किसी मामले से होता है, तो सबसे पहले, तुम इसे ऐसी परिस्थिति के रूप में देखो जिसकी व्यवस्था परमेश्वर के द्वारा की गई है, ऐसे उत्तरदायित्व के रूप में देखो जिसे उसके द्वारा तुम्हें प्रदान किया गया है, या किसी ऐसी चीज़ के रूप में देखो जो उसने तुम्हें सौंपी है, और जब तुम इस मामले का सामना कर रहे होते हो, तो तुम्हें इसे भी परमेश्वर से आयी किसी परीक्षा के रूप में देखना चाहिए। इस मामले का सामना करते समय, तुम्हारे पास एक मानक अवश्य होना चाहिए, तुम्हें अवश्य सोचना चाहिए कि यह परमेश्वर की ओर से आया है। तुम्हें इस बारे में सोचना चाहिए कि कैसे इस मामले से इस तरह निपटो कि तुम अपने उत्तरदायित्व को पूरा कर सको, और परमेश्वर के प्रति वफ़ादार रह सको; इसे कैसे करो कि परमेश्वर को क्रोधित न करो, या उसके स्वभाव को अपमानित न करो।

— "वचन देह में प्रकट होता है" में 'परमेश्वर के स्वभाव और उसका कार्य जो परिणाम हासिल करेगा, उसे कैसे जानें' से उद्धृत

कार्य के संबंध में, मनुष्य का विश्वास है कि परमेश्वर के लिए इधर-उधर दौड़ना, सभी जगहों पर प्रचार करना और परमेश्वर के लिए स्वयं को खपाना ही कार्य है। यद्यपि यह विश्वास सही है, किंतु यह अत्यधिक एकतरफा है; परमेश्वर इंसान से जो माँगता है, वह परमेश्वर के लिए केवल इधर-उधर दौड़ना ही नहीं है; यह आत्मा के भीतर सेवकाई और पोषण अधिक है। कई भाइयों और बहनों ने इतने वर्षों के अनुभव के बाद भी परमेश्वर के लिए कार्य करने के बारे में कभी नहीं सोचा है, क्योंकि मनुष्य द्वारा कल्पित कार्य परमेश्वर द्वारा की गई माँग के साथ असंगत है। इसलिए, मनुष्य को कार्य के मामले में किसी भी तरह की कोई दिलचस्पी नहीं है, और ठीक इसी कारण से मनुष्य का प्रवेश भी काफ़ी एकतरफा है। तुम सभी लोगों को परमेश्वर के लिए कार्य करने से अपने प्रवेश की शुरुआत करनी चाहिए, ताकि तुम लोग अनुभव के हर पहलू से बेहतर ढंग से गुज़र सको। यही है वह, जिसमें तुम लोगों को प्रवेश करना चाहिए। कार्य परमेश्वर के लिए इधर-उधर दौड़ने को संदर्भित नहीं करता, बल्कि इस बात को संदर्भित करता है कि मनुष्य का जीवन और जिसे वह जीता है, वे परमेश्वर को आनंद देने में सक्षम हैं या नहीं। कार्य परमेश्वर के प्रति गवाही देने और साथ ही मनुष्य के प्रति सेवकाई के लिए मनुष्य द्वारा परमेश्वर के प्रति अपनी निष्ठा और परमेश्वर के बारे में अपने ज्ञान के उपयोग को संदर्भित करता है। यह मनुष्य का उत्तरदायित्व है और इसे सभी लोगों को समझना चाहिए। कोई कह सकता है कि तुम लोगों का प्रवेश ही तुम लोगों का कार्य है, और कि तुम लोग परमेश्वर के लिए कार्य करने के दौरान प्रवेश करने का प्रयास कर रहे हो। परमेश्वर के कार्य का अनुभव करने का अर्थ मात्र यह नहीं है कि तुम जानते हो कि उसके वचन को कैसे खाएँ और पीएँ; बल्कि इससे भी महत्वपूर्ण यह है कि तुम लोगों को यह जानना चाहिए कि परमेश्वर की गवाही कैसे दें और परमेश्वर की सेवा करने तथा मनुष्य की सेवकाई और आपूर्ति करने में सक्षम कैसे हों। यही कार्य है, और यही तुम लोगों का प्रवेश भी है; इसे ही हर व्यक्ति को संपन्न करना चाहिए। कई लोग हैं, जो केवल परमेश्वर के लिए इधर-उधर दौड़ने, और हर जगह उपदेश देने पर ध्यान केंद्रित करते हैं, किंतु अपने व्यक्तिगत अनुभव को अनदेखा करते हैं और आध्यात्मिक जीवन में अपने प्रवेश की उपेक्षा करते हैं। यही कारण है कि परमेश्वर की सेवा करने वाले लोग परमेश्वर का विरोध करने वाले बन जाते हैं।

— "वचन देह में प्रकट होता है" में 'कार्य और प्रवेश (2)' से उद्धृत

परमेश्वर पर अपने विश्वास में, पतरस ने हर एक बात में परमेश्वर को संतुष्ट करने का प्रयास किया था और उन सब में जो परमेश्वर से आया था, उसमें उसने आज्ञा मानने का प्रयास किया। बिना ज़रा सी भी शिकायत के, वह ताड़ना एवं न्याय, साथ ही साथ शुद्धिकरण, क्लेश एवं अपने जीवन में मौजूद कमी को स्वीकार कर सकता था, उसमें से कुछ भी परमेश्वर के लिए उसके प्रेम को पलट नहीं सकता था। क्या यह परमेश्वर के लिए चरम प्रेम नहीं है? क्या यह परमेश्वर के एक प्राणी के कर्तव्य की परिपूर्णता नहीं है? चाहे ताड़ना हो, न्याय हो, या क्लेश—तू मृत्यु तक आज्ञाकारिता हासिल करने में सदैव सक्षम हो, यह वह चीज़ है जिसे परमेश्वर के एक प्राणी के द्वारा हासिल किया जाना चाहिए, यह परमेश्वर के लिए प्रेम की शुद्धता है। यदि मनुष्य इतना कुछ हासिल कर सकता है, तो वह परमेश्वर का एक योग्य प्राणी है, तथा ऐसा और कुछ नहीं है जो सृष्टिकर्ता की इच्छा को बेहतर ढंग से संतुष्ट कर सकता है। कल्पना कर कि तू परमेश्वर के लिए काम कर सकता है, फिर भी तू परमेश्वर की आज्ञा नहीं मानता है, और सच्चाई से परमेश्वर से प्रेम करने में असमर्थ है। इस रीति से, तूने न केवल परमेश्वर के एक प्राणी के अपने कर्तव्य को नहीं निभाया होगा, बल्कि तू परमेश्वर के द्वारा निन्दित भी किया जाएगा, क्योंकि तू ऐसा व्यक्ति है जो सत्य धारण नहीं करता है, जो परमेश्वर की आज्ञा का पालन करने में असमर्थ है, और जो परमेश्वर के प्रति अनाज्ञाकारी है। तू केवल परमेश्वर के लिए कार्य करने के विषय में परवाह करता है, और सत्य को अभ्यास में लाने, या स्वयं को जानने की परवाह नहीं करता है। तू सृष्टिकर्ता को समझता एवं जानता नहीं है, और सृष्टिकर्ता से प्रेम या उसकी आज्ञा का पालन नहीं करता है। तू ऐसा व्यक्ति है जो स्वाभाविक रूप से परमेश्वर के प्रति अनाज्ञाकारी है, और इसलिए ऐसे लोग सृष्टिकर्ता के प्रिय नहीं है।

— "वचन देह में प्रकट होता है" में 'सफलता या असफलता उस पथ पर निर्भर होती है जिस पर मनुष्य चलता है' से उद्धृत

अधिकांश लोग जो परमेश्वर का अनुसरण करते हैं वे केवल इस बात को ज्यादा महत्व देते हैं कि आशीषों को किस प्रकार प्राप्त किया जाए या आपदा से कैसे बचा जाए। परमेश्वर के कार्य और प्रबंधन का उल्लेख करने पर वे चुप हो जाते हैं और उनकी रुचि समाप्त हो जाती है। उन्हें लगता है कि वे इस प्रकार के कुछ उबाऊ प्रश्नों को जानने से वे अपने जीवन में बढ़ नहीं सकते हैं या किसी भी प्रकार का लाभ प्राप्त नहीं कर सकते हैं, और इसलिए हालांकि वे परमेश्वर के प्रबंधन के संदेश के बारे में सुन चुके होते हैं, वे उन्हें बहुत ही लापरवाही से लेते हैं। उन्हें वे इतने मूल्यवान नहीं लगते कि उन्हें स्वीकारा जाए और वे अपने जीवन का अंग तो उन्हें बिल्कुल नहीं लगते। ऐसे लोगों के पास परमेश्वर का अनुसरण करने का बहुत ही साधारण लक्ष्य होता है और वो लक्ष्य है आशीषें प्राप्त करना। ऐसे लोग इस तरह की किसी भी बात पर ध्यान नहीं देते जो इस लक्ष्य से मतलब नहीं रखती। उनके लिए, करने का अर्थ आशीषें प्राप्त करने के लिये परमेश्वर पर विश्वास करना सबसे तर्कसंगत लक्ष्य और उनके विश्वास का आधारभूत मूल्य है। और जो चीज़ें इस लक्ष्य को प्राप्त करने में सहायता प्रदान नहीं करतीं वे उनसे प्रभावित नहीं होते हैं। आज जो लोग परमेश्वर पर विश्वास करते हैं उनके साथ ऐसी ही समस्या है। उनके लक्ष्य और प्रेरणा तर्कसंगत दिखाई देते हैं, क्योंकि वे परमेश्वर पर विश्वास समय ही, परमेश्वर के लिए स्वयं को खपाते भी हैं, परमेश्वर के प्रति समर्पित भी होते हैं और अपने कर्तव्य को भी निभाते हैं। वे अपनी जवानी लगा देते हैं, परिवार और भविष्य को त्याग देते हैं, और यहां तक कि सालों अपने घर से दूर व्यस्त रहते हैं। अपने परम लक्ष्य के लिये, वे अपनी रूचियों को बदल डालते हैं, अपने जीवन के दृष्टिकोण को परिवर्तित कर देते हैं, और यहां तक कि अपनी खोज की दिशा तक को बदल देते हैं, फिर भी वे परमेश्वर पर अपने विश्वास के लक्ष्य को नहीं बदल सकते। वे अपने ही आदर्शों के लिये भाग-दौड़ करते हैं; चाहे मार्ग कितना ही दूर हो, और मार्ग में कितनी भी कठिनाइयां और अवरोध क्यों न आएं, वे डटे रहते हैं और मृत्यु के सामने निडर खड़े रहते हैं। इस प्रकार से अपने आप को समर्पित बनाए रखने के लिए उन्हें किस बात से शक्ति प्राप्त होती है? क्या यह उनका विवेक है? क्या यह उनका महान और कुलीन चरित्र है? क्या यह उनका अटल इरादा है जो उन्हें दुष्ट शक्तियों से अंत तक युद्ध करते रहने की प्रेरणा देता है? क्या यह उनका विश्वास है जिसमें वे बिना प्रतिफल के परमेश्वर की गवाही देते हैं? क्या यह उनकी वफादारी है जिसके लिए वे परमेश्वर की इच्छा को प्राप्त करने के लिए सब कुछ देने के लिए भी तैयार रहते हैं? या यह उनकी भक्ति है जिसमें वे हमेशा व्यक्तिगत असाधारण मांगों को त्याग देते हैं? उन लोगों के लिये जिन्होंने कभी भी परमेश्वर के प्रबंधन को जानने के लिए कभी भी इतना कुछ नहीं दिया, यह किसी आश्चर्य से कम नहीं! कुछ देर के लिये आओ इस पर चर्चा न करें कि इन लोगों ने कितना कुछ दिया है। फिर भी उनका व्यवहार इस योग्य है कि हम उसका विश्लेषण करें। उन लाभों के अतिरिक्त जो उनके साथ इतनी निकटता से जुड़े हैं, क्या इन लोगों के लिए जो कभी भी परमेश्वर को नहीं समझ पाते हैं, उसे इतना कुछ देने का क्या कोई अन्य कारण हो सकता है? इसमें, हम एक पहले से ही अज्ञात समस्या को देखते हैं: मनुष्य का परमेश्वर के साथ सम्बन्ध केवल एक नग्न स्वार्थ है। यह आशीष देने वाले और लेने वाले के मध्य का सम्बन्ध है। सीधे-सीधे, यह कर्मचारी और नियोक्ता के मध्य के सम्बन्ध के समान है। कर्मचारी नियोक्ता के द्वारा पुरस्कार प्राप्त करने के लिए ही कार्य करता है। इस प्रकार के सम्बन्ध में, कोई स्नेह नहीं होता है, केवल एक सौदा होता है; प्रेम करने और प्रेम पाने जैसी कोई बात नहीं होती, केवल दान और दया होता है; कोई आपसी समझ नहीं होती केवल दबा हुआ क्रोध और धोखा होता है; कोई अंतरंगता नहीं होती, केवल एक खाई जो कभी भी भरी नहीं जा सकती। जब चीज़ें इस बिन्दु तक आ जाती हैं, तो कौन इस प्रकार की प्रवृत्ति को बदलने में सक्षम है? और कितने लोग इसे वास्तव में समझने के योग्य हैं कि यह सम्बन्ध कितना निराशजनक बन चुका है? मैं मानता हूं कि जब लोग आशीषित होने के आनन्द में अपने आप को लगा देते हैं, तो कोई भी यह कल्पना नहीं कर सकता कि परमेश्वर के साथ इस प्रकार का सम्बन्ध कितना शर्मनाक और भद्दा होगा।

— "वचन देह में प्रकट होता है" में 'केवल परमेश्वर के प्रबंधन के मध्य ही मनुष्य बचाया जा सकता है' से उद्धृत

लोग कहते हैं कि परमेश्वर एक धर्मी परमेश्वर है, और यह कि जब तक मनुष्य अंत तक उसके पीछे पीछे चलता रहेगा, वह निश्चित रूप से मनुष्य के प्रति निष्पक्ष होगा, क्योंकि वह सबसे अधिक धर्मी है। यदि मनुष्य बिलकुल अंत तक उसके पीछे पीछे चलता है, तो क्या वह मनुष्य को दरकिनार कर सकता है? मैं सभी मनुष्यों के प्रति निष्पक्ष हूँ, और अपने धर्मी स्वभाव से सभी मनुष्यों का न्याय करता हूँ, फिर भी जो अपेक्षाएं मैं मनुष्य से करता हूँ उसके लिए कुछ यथोचित स्थितियाँ होती हैं, और जिसकी अपेक्षा मैं करता हूँ उसे सभी मनुष्यों के द्वारा, चाहे वे जो कोई भी हों, अवश्य ही पूरा किया जाना चाहिए। मैं इसकी परवाह नहीं करता हूँ कि तेरी योग्यताएँ कितनी व्यापक और आदरणीय हैं; मैं सिर्फ इसकी परवाह करता हूँ कि तू मेरे मार्ग में चलता है कि नहीं, और सत्य के लिए तुझमें प्रेम और प्यास है कि नहीं। यदि तुझमें सत्य की कमी है, और उसके बजाय तू मेरे नाम को लज्जित करता है, और मेरे मार्ग के अनुसार कार्य नहीं करता है, और किसी बात की परवाह या चिंता किए बगैर बस नाम के लिए अनुसरण करता है, तो उस समय मैं तुझे मार कर नीचे गिरा दूँगा और तेरी बुराई के लिए तुझे दण्ड दूँगा, तब तेरे पास कहने के लिए क्या होगा? क्या तू ऐसा कह सकता है कि परमेश्वर धर्मी नहीं है? आज, यदि तूने उन वचनों का पालन किया है जिन्हें मैंने कहा है, तो तू ऐसा इंसान है जिसे मैं स्वीकार करता हूँ। तू कहता है कि तूने हमेशा परमेश्वर का अनुसरण करते हुए दुख उठाया है, कि तूने हमेशा हर परिस्थितियों में उसका अनुसरण किया है, और तूने उसके साथ अपना अच्छा और खराब समय बिताया है, किन्तु तूने परमेश्वर के द्वारा बोले गए वचनों के अनुसार जीवन नहीं बिताया है; तू सिर्फ हर दिन परमेश्वर के पीछे पीछे भागना और उसके लिए स्वयं को व्यय करना चाहता है, और तूने कभी भी एक अर्थपूर्ण जीवन बिताने के बारे में नहीं सोचा है। तू यह भी कहता है, "किसी भी सूरत में, मैं विश्वास करता हूँ कि परमेश्वर धर्मी है। मैंने उसके लिए दुख उठाया है, मैं उसके लिए यहाँ वहाँ भागते रहता हूँ, और मैंने उसके लिए अपने आपको समर्पित किया है, और मैंने कड़ी मेहनत की है इसके बावजूद मेरी कद्र नहीं हुई है; वह निश्चय ही मुझे स्मरण रखता है।" यह सच है कि परमेश्वर धर्मी है, फिर भी इस धार्मिकता पर किसी अशुद्धता का दाग नहीं है: इसमें कोई मानवीय इच्छा नहीं है, और इसे शरीर, या मानवीय सौदों के द्वारा कलंकित नहीं किया जा सकता है। वे सभी जो विद्रोही हैं और विरोध में हैं, और जो उसके मार्ग की सम्मति में नहीं हैं, उन्हें दण्डित किया जाएगा; किसी को भी क्षमा नहीं किया गया है, और किसी को भी बख्शा नहीं गया है! कुछ लोग कहते हैं, "आज मैं तुम्हारे लिए यहाँ वहाँ भागता हूँ; जब अंत आता है, तो क्या तू मुझे थोड़ी सी आशीष दे सकता है?" अतः मैं तुझसे पूछता हूँ, "क्या तूने मेरे वचनों का पालन किया है?" वह धार्मिकता जिसकी तू बात करता है वह एक सौदे पर आधारित है। तू केवल यह सोचता है कि मैं धर्मी हूँ, और सभी मनुष्यों के प्रति निष्पक्ष हूँ, और वे सब जो बिलकुल अंत तक मेरा अनुसरण करेंगे उन्हें निश्चित रूप से बचा लिया जाएगा और वे मेरी आशीषों को प्राप्त करेंगे। "वे सब जो बिलकुल अंत तक मेरा अनुसरण करते हैं निश्चित है कि उन्हें बचा लिया जाएगा" मेरे इन वचनों में एक भीतरी अर्थ है: वे जो बिलकुल अंत तक मेरा अनुसरण करते हैं वे ऐसे लोग हैं जिन्हें मेरे द्वारा पूरी तरह ग्रहण कर लिया जाएगा, वे ऐसे लोग हैं जो, मेरे द्वारा विजय पा लिए जाने के बाद, सत्य को खोजते हैं और उन्हें सिद्ध बनाया जाता है। तूने कैसी स्थितियाँ हासिल की हैं? तू बिलकुल अंत तक सिर्फ मेरा अनुसरण करने में कामयाब हुआ है, किन्तु तूने और क्या किया है? क्या तूने मेरे वचनों का पालन किया है? तूने मेरी पाँच अपेक्षाओं में से एक को पूरा किया है, लेकिन बाकी चार को पूरा करने का तेरा कोई इरादा नहीं है। तूने बस सबसे सरल और आसान पथ को ढूँढ़ लिया, और अपने आपको सौभाग्यशाली मानकर उसका अनुसरण किया है। तेरे जैसे इंसान के लिए मेरा धर्मी स्वभाव ताड़ना और न्याय का है, यह एक प्रकार से सच्चा प्रतिफल है, और यह बुरा काम करनेवालों के लिए उचित दण्ड है; वे सभी जो मेरे मार्ग पर नहीं चलते हैं उन्हें निश्चय ही दण्ड दिया जाएगा, भले ही वे अंत तक अनुसरण करते रहें। यह परमेश्वर की धार्मिकता है।

— "वचन देह में प्रकट होता है" में 'पतरस के अनुभव: ताड़ना और न्याय का उसका ज्ञान' से उद्धृत

तुम लोग सोचते होगे कि बरसों अनुयायी बने रहकर तुमने बहुत मेहनत कर ली है, और कुछ भी हो, केवल सेवा-कर्मी होने के नाते ही तुम्हें परमेश्वर के भवन में एक कटोरी चावल मिल जाना चाहिए। मैं कहूँगा कि तुममें से अधिकतर ऐसा ही सोचते हैं, क्योंकि तुम लोगों ने हमेशा इस सिद्धांत का पालन किया है कि चीज़ों का फ़ायदा कैसे उठाया जाए, न कि अपना फायदा कैसे उठाने दिया जाए। इसलिए अब मैं तुम लोगों से बहुत गंभीरता से कहता हूँ : मुझे इस बात की ज़रा भी परवाह नहीं है कि तुम्हारी मेहनत कितनी उत्कृष्ट है, तुम्हारी योग्यताएँ कितनी प्रभावशाली हैं, तुम कितनी निकटता से मेरा अनुसरण करते हो, तुम कितने प्रसिद्ध हो, या तुमने अपने रवैये में कितना सुधार किया है; जब तक तुम मेरी अपेक्षाएँ पूरी नहीं करते, तब तक तुम कभी मेरी प्रशंसा प्राप्त नहीं कर पाओगे। अपने विचारों और गणनाओं को जितनी जल्दी हो सके, बट्टे खाते डाल दो, और मेरी अपेक्षाओं को गंभीरता से लेना शुरू कर दो; वरना मैं अपना काम समाप्त करने के लिए सभी को भस्म कर दूँगा और, सबसे अच्छा यह होगा कि मैं अपने वर्षों के कार्य और पीड़ा को शून्य में बदल दूँ, क्योंकि मैं अपने शत्रुओं और उन लोगों को, जिनमें से दुर्गंध आती है और जो शैतान जैसे दिखते हैं, अपने राज्य में नहीं ला सकता या उन्हें अगले युग में नहीं ले जा सकता।

— "वचन देह में प्रकट होता है" में 'अपराध मनुष्य को नरक में ले जाएँगे' से उद्धृत

अंत में कुछ लोग यह कहेंगे, "मैंने तेरे लिए इतना अधिक कार्य किया है, भले ही गुणगान करने योग्य उपलब्धियां शायद न हों, फिर भी मैं अपने प्रयासों में परिश्रमी रहा हूँ। क्या तू मुझे यों ही स्वर्ग में प्रवेश करने नहीं दे सकता है ताकि मैं जीवन के फल को खाऊं?" तुझे जानना होगा कि मैं किस प्रकार के लोगों की इच्छा करता हूँ; ऐसे लोग जो अशुद्ध हैं उन्हें राज्य में प्रवेश करने की अनुमति नहीं है, ऐसे लोग जो अशुद्ध हैं उन्हें पवित्र भूमि को गंदा करने की अनुमति नहीं है। भले ही तूने अधिक कार्य किया हो, और कई सालों तक कार्य किया हो, फिर भी अन्त में तू दुखदाई रूप से मैला है—यह स्वर्ग की व्यवस्था के लिए असहनीय है कि तू मेरे राज्य में प्रवेश करने की कामना करता है! संसार की स्थापना से लेकर आज तक, मैंने कभी भी उन लोगों को अपने राज्य में आसान प्रवेश नहीं दिया है जो अनुग्रह पाने के लिए मेरी खुशामद करते हैं। यह स्वर्गीय नियम है, और इसे कोई तोड़ नहीं सकता है! तुझे जीवन की खोज करनी ही होगी। आज, जिन्हें पूर्ण बनाया जाएगा वे पतरस के ही समान लोग हैं: वे ऐसे लोग हैं जो अपने स्वयं के स्वभाव में परिवर्तनों की तलाश करते हैं, और वे परमेश्वर के लिए गवाही देने, और परमेश्वर के प्राणी के रुप में अपने कर्तव्य को निभाने के लिए तैयार हैं। केवल ऐसे ही लोगों को सिद्ध बनाया जाएगा। यदि तू केवल पुरस्कार चाहता है, और अपने स्वयं के जीवन स्वभाव को परिवर्तित करने की कोशिश नहीं करता है, तो तेरे सारे प्रयास व्यर्थ होंगे—और यह एक अटल सत्य है!

— "वचन देह में प्रकट होता है" में 'सफलता या असफलता उस पथ पर निर्भर होती है जिस पर मनुष्य चलता है' से उद्धृत

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