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परमेश्वर के वचन के बारे में धर्मोपदेश और सहभागिता "परमेश्वर सम्पूर्ण मानवजाति के भाग्य का नियन्ता है"

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आओ, हम परमेश्वर के इन वचनों को पढ़ें,"परमेश्वर सम्पूर्ण मानवजाति के भाग्य का नियन्ता है"

मानवजाति का सदस्य और सच्चे ईसाई होने के नाते, अपने मन और शरीर को परमेश्वर के आदेश को पूरा करने के लिए समर्पित करना हम सभी की ज़िम्मेदारी और दायित्व है, क्योंकि हमारा सम्पूर्ण अस्तित्व परमेश्वर से आया है, और यह परमेश्वर की संप्रभुता के कारण अस्तित्व में है। यदि हमारे मन और शरीर परमेश्वर के आदेश के लिए नहीं हैं और मानवजाति के धर्मी कार्य के लिए नहीं हैं, तो हमारी आत्माएँ उन लोगों के योग्य नहीं हैं जो परमेश्वर के आदेश के लिए शहीद हुए हैं, परमेश्वर के लिए तो और भी अधिक अयोग्य हैं, जिसने हमें सब कुछ प्रदान किया है।

परमेश्वर ने इस संसार की सृष्टि की, उसने इस मानवजाति को बनाया, और इसके अलावा वह प्राचीन यूनानी संस्कृति और मानव सभ्यता का वास्तुकार था। केवल परमेश्वर ही इस मानवजाति को सांत्वना देता है, और केवल परमेश्वर ही रात-दिन इस मानवजाति का ध्यान रखता है। मानव का विकास और प्रगति परमेश्वर की सम्प्रभुता से अवियोज्य है और मानवजाति का इतिहास और भविष्य परमेश्वर की योजनाओं में जटिल है। यदि तुम एक सच्चे ईसाई हो, तो तुम निश्चय ही इस बात पर विश्वास करोगे कि किसी भी देश या राष्ट्र का उत्थान या पतन परमेश्वर की योजना के अनुसार होता है। केवल परमेश्वर ही किसी देश या राष्ट्र के भाग्य को जानता है और केवल परमेश्वर ही इस मानवजाति के जीवन के ढंग को नियंत्रित करता है। यदि मानवजाति अच्छा भाग्य पाना चाहती है, यदि कोई देश अच्छा भाग्य पाना चाहता है, तो मनुष्य को अवश्य परमेश्वर की आराधना में झुकना चाहिए, पश्चाताप करना चाहिए और परमेश्वर के सामने अपने पापों की स्वीकार करना चाहिए, अन्यथा मनुष्य का भाग्य और मंज़िल अपरिहार्य रूप से तबाह हो कर समाप्त हो जाएँगे।

नूह की नाव के समय में पीछे पलट कर देखें: मानवजाति पूरी तरह से भ्रष्ट थी, परमेश्वर की आशीषों से भटक गई थी, परमेश्वर के द्वारा उनकी देखभाल नहीं की जा रही थी, और परमेश्वर की प्रतिज्ञाओं को खो चुकी थी। वे परमेश्वर की रोशनी के बिना अंधकार में रहते थे। इस प्रकार वे प्रकृति से व्यभिचारी बन गए थे, उन्होंने अपने आप को घृणित चरित्रहीनता के मध्य उन्मुक्त कर दिया था। इस प्रकार के लोग परमेश्वर की प्रतिज्ञाओं को प्राप्त नहीं कर सकते थे; वे परमेश्वर के चेहरे की गवाही देने के अयोग्य थे, न ही वे परमेश्वर की आवाज़ को सुनने के योग्य थे, क्योंकि उन्होंने परमेश्वर को त्याग दिया था, उन सब चीजों को बेक़ार समझ कर छोड़ दिया था जो परमेश्वर ने उन्हें प्रदान की थीं, और परमेश्वर की शिक्षाओं को भूल गए थे। उनका मन परमेश्वर से बहुत दूर भटक गया था, और जैसा कि इससे हुआ, वे अत्यधिक मूर्खतापूर्ण स्तरों तक और मानवता से पथभ्रष्ट हो गए थे, और उत्तरोत्तर दुष्ट होते गए। इस प्रकार से वे मृत्यु के और भी निकट आ गए थे, और परमेश्वर के कोप और दण्ड के अधीन हो गए थे। केवल नूह ने परमेश्वर की आराधना की और बुराई को दूर रखा, और इसलिए वह परमेश्वर की आवाज़ को सुनने और परमेश्वर के निर्देशों को सुनने में सक्षम था। उसने परमेश्वर के वचन के अनुसार नाव बनायी, और सभी प्रकार के जीवित प्राणियों को उसमें एकत्रित किया। और इस तरह, जब एक बार सब कुछ तैयार हो गया, तो परमेश्वर ने संसार पर अपनी विनाशलीला शुरू कर दी। केवल नूह और उसके परिवार के सात लोग इस विनाशलीला में जीवित बचे, क्योंकि नूह ने यहोवा की आराधना की थी और बुराई को दूर रखा था।

फिर वर्तमान युग पर विचार करें: नूह के जैसे धर्मी मनुष्य, जो परमेश्वर की आराधना कर सके और बुराई को दूर रख सके, उनका अस्तित्व समाप्त हो गया है। फिर भी परमेश्वर इस मानवजाति के प्रति दयालु है और इस अंतिम युग में मानवजाति को दोषमुक्त करता है। परमेश्वर उनकी खोज कर रहा है जो उसके प्रकट होने की लालसा करते हैं। वह उनकी खोज करता है जो उसके वचनों को सुनने में सक्षम हों, जो उसके आदेश को नहीं भूले हों और अपने हृदय एवं शरीर को उसके प्रति समर्पित करते हों। वह उनकी खोज करता है जो उसके सामने बच्चों के समान आज्ञाकारी हों, और उसका विरोध न करते हों। यदि तुम परमेश्वर के प्रति अपने समर्पण में किसी भी ताकत से अबाधित हो, तो परमेश्वर तुम्हारे ऊपर अनुग्रह की दृष्टि डालेगा और अपने आशीष तुम्हें प्रदान करेगा। यदि तुम उच्च पद वाले, आदरणीय प्रतिष्ठा वाले, प्रचुर ज्ञान से सम्पन्न, विपुल सम्पदा के मालिक हो, और कई लोगों के द्वारा समर्थित हो, फिर भी ये चीज़ें तुम्हें परमेश्वर के आह्वान और परमेश्वर के आदेश को स्वीकार करने, जो कुछ परमेश्वर तुम से कहता है उसे करने के लिए, उसके सम्मुख आने से नहीं रोकती हो, तब तुम जो कुछ भी करोगे वह पृथ्वी पर सर्वाधिक महत्वपूर्ण होगा और मानवजाति में सर्वाधिक धर्मी होगा। यदि तुम परमेश्वर के आह्वान को अपनी हैसियत और लक्ष्यों के वास्ते अस्वीकार करोगे, तो तुम जो कुछ भी करोगे वह श्रापित हो जाएगा और यहाँ तक कि परमेश्वर द्वारा भी तिरस्कृत किया जाएगा। हो सकता है कि तुम कोई अध्यक्ष, या कोई वैज्ञानिक, कोई पादरी, या कोई बुज़ुर्ग हो, किन्तु इससे कोई फ़र्क नहीं पड़ता है कि तुम्हारा पद कितना उच्च है, यदि तुम अपने ज्ञान और अपने कार्य की योग्यता पर भरोसा रखोगे, तो तुम हमेशा ही असफल रहोगे, और परमेश्वर की आशीषों से हमेशा वंचित रहोगे, क्योंकि तुम जो कुछ भी करते हो परमेश्वर उससे कुछ भी अपेक्षा नहीं करता है, और वह नहीं मानता है कि तुम्हारी वृत्ति धर्मी है, या यह स्वीकार नहीं करता है कि तुम मानवजाति के भले के लिए कार्य कर रहे हो। वह कहेगा कि जो कुछ भी तुम करते हो, वह मानवजाति को परमेश्वर की सुरक्षा से वंचित करने, और परमेश्वर के आशीषों को इनकार करने के लिए मानवजाति के ज्ञान और मानवजाति की शक्ति का उपयोग करना है। वह कहेगा कि तुम मानवजाति को अंधकारी की ओर, मृत्यु की ओर, और एक ऐसे अस्तित्व के आरंभ की ओर ले जा रहे हो जिसकी सीमाएँ नहीं है जिसमें मनुष्य परमेश्वर और उसके आशीष को खो देगा।

जब सबसे पहले मनुष्य को सामाजिक विज्ञान मिला, तब से मनुष्य का मन विज्ञान और ज्ञान में व्यस्त था। फिर विज्ञान और ज्ञान मानवजाति के शासन के लिए उपकरण बन गए, और अब मनुष्य के पास परमेश्वर की आराधना करने के लिए पर्याप्त अवसर नहीं था, और परमेश्वर की आराधना के लिए अब और अनुकूल परिस्थितियाँ नहीं थी। मनुष्यों के हृदय में परमेश्वर की स्थिति और भी नीचे हो गई थी। मनुष्य के हृदय का संसार, जिसमें परमेश्वर के लिये जगह न हो, अंधकारमय, और आशारहित है। और इसलिए, मनुष्य के हृदय और मन को भरने के लिए, सामाजिक विज्ञान के सिद्धांत, मानव विकास के सिद्धांत और अन्य कई सिद्धांतों को व्यक्त करने के लिए कई सामाजिक वैज्ञानिक, इतिहासकार और राजनीतिज्ञ उत्पन्न हो गए जिन्होंने इस सच्चाई की अवहेलना की कि परमेश्वर ने मनुष्य की रचना की। इस तरह, जो यह विश्वास करते हैं कि परमेश्वर ने सब कुछ बनाया है वे बहुत ही कम रह गए, और वे जो विकास के सिद्धांत पर विश्वास करते हैं उनकी संख्या और भी अधिक बढ़ गई। अधिकाधिक लोग पुराने विधान के युग के दौरान परमेश्वर के कार्य के अभिलेखों और उसके वचनों को मिथकों और पौराणिक कथाओं के रूप में मानते हैं। लोग, अपने हृदयों में, परमेश्वर की गरिमा और महानता के प्रति, और इस सिद्धांत के प्रति कि परमेश्वर का अस्तित्व है और सभी चीज़ों पर प्रभुत्व धारण करता है, उदासीन बन जाते हैं। मानवजाति का अस्तित्व और देशों एवं राष्ट्रों का भाग्य उनके लिए अब और महत्वपूर्ण नहीं रह जाते हैं। मनुष्य केवल खाने, पीने और भोग-विलासिता की खोज में चिंतित, एक खोखले संसार में रहता है। ...कुछ लोग स्वयं इस बात की खोज करने का उत्तरदायित्व ले लेते हैं कि आज परमेश्वर अपना कार्य कहाँ करता है, या यह तलाशने का उत्तरदायित्व ले लेते हैं कि वह किस प्रकार मनुष्य के गंतव्य पर नियंत्रण करता और उसे सँवारता है। और इस तरह, मानव सभ्यता मनुष्यों की इच्छाओं को पूर्ण करने में अनजाने में और भी अधिक अक्षम बन जाती है, और कई ऐसे लोग भी हैं जो यह महसूस करते हैं कि इस प्रकार के संसार में रह कर वे, उन लोगों के बजाय जो चले गए हैं, कम खुश हैं। यहाँ तक की उन देशों के लोग भी जो अत्यधिक सभ्य हुआ करते थे इस तरह की शिकायतों को हवा देते हैं। क्योंकि इससे कोई फ़र्क नहीं पड़ता है कि मानवजाति की सभ्यता को सुरक्षित रखने के लिए शासक और समाजशास्त्री अपना कितना दिमाग ख़पाते हैं, परमेश्वर के मार्गदर्शन के बिना, यह किसी लाभ का नहीं है। मनुष्य के हृदय का खालीपन कोई नहीं भर सकता है, क्योंकि मनुष्य का जीवन कोई नहीं बन सकता है, और कोई भी सामाजिक सिद्धांत मनुष्य को उस खालीपन से मुक्ति नहीं दिला सकता है जिससे वह व्यथित है। विज्ञान, ज्ञान, स्वतंत्रता, लोकतंत्र, फुरसत, आराम ये सब मात्र अस्थायी चैन हैं। यहाँ तक कि इन बातों के साथ भी, मनुष्य अपरिहार्य रूप से पाप करेगा और समाज के अन्याय पर विलाप करेगा। ये वस्तुएँ मनुष्य की लालसा और अन्वेषण की इच्छा को शांत नहीं कर सकती हैं। क्योंकि मनुष्य को परमेश्वर के द्वारा बनाया गया है और मनुष्यों के बेहूदे बलिदान और अन्वेषण केवल और भी अधिक कष्ट की ओर लेकर जा सकते हैं। मनुष्य एक निरंतर भय की स्थिति में रहेगा, और नहीं जान सकेगा कि मानवजाति के भविष्य का किस प्रकार से सामना किया जाए, या आगे आने वाले मार्ग पर कैसे चला जाए। मनुष्य यहाँ तक कि विज्ञान और ज्ञान के भय से भी डरने लगेगा, और स्वयं के भीतर के खालीपन से और भी अधिक डरने लगेगा। इस संसार में, इस बात की परवाह किए बिना कि क्या तुम एक स्वंतत्र देश में या बिना मानव अधिकार वाले देश में रहतें हो, तुम मानवजाति के भाग्य से बचकर भागने में सर्वथा अयोग्य हो। चाहे तुम एक शासक हो या शासित, तुम भाग्य, रहस्यों और मानवजाति के गंतव्य की खोज की इच्छा से बच कर भागने में सर्वथा अक्षम हो। खालीपन के व्याकुल करने वाले अनुभव से बचकर भागने में तो बिल्कुल भी सक्षम नहीं हो। इस प्रकार की घटनाएँ जो समस्त मानवजाति के लिए साधारण हैं, समाजशास्त्रियों द्वारा सामाजिक घटनाएँ कही जाती हैं, फिर भी कोई महान व्यक्ति इस समस्या का समाधान करने के लिए सामने नहीं आ सकता है। मनुष्य, आखिरकार, मनुष्य ही है। परमेश्वर का स्थान और जीवन किसी भी मनुष्य के द्वारा प्रतिस्थापित नहीं किया जा सकता है। मानवजाति को न केवल एक निष्पक्ष समाज की, जिसमें हर एक परिपुष्ट हो, और सभी एक समान और स्वतंत्र हों, बल्कि परमेश्वर द्वारा उद्धार और उनके लिए जीवन की उपलब्धता की भी आवश्यकता है। केवल जब मनुष्य परमेश्वर द्वारा उद्धार और अपने जीवन के लिए खाद्य सामग्री प्राप्त कर लेता है तभी मनुष्य की आवश्यकताएँ, अन्वेषण की लालसा और आध्यात्मिक रिक्तता का समाधान हो सकता है। यदि किसी देश या राष्ट्र के लोग परमेश्वर द्वारा उद्धार और उसकी देखभाल प्राप्त करने में अक्षम हैं, तो इस प्रकार का देश या राष्ट्र विनाश के मार्ग पर, अंधकार की ओर, चला जाएगा, और परमेश्वर के द्वारा जड़ से मिटा दिया जाएगा।

शायद तुम्हारा देश वर्तमान में समृद्ध हो रहा हो, किंतु यदि तुम लोगों को परमेश्वर से भटकने देते हो, तो तुम्हारा देश स्वयं को उत्तरोत्तर परमेश्वर की आशीषों से वंचित होता हुआ पाएगा। तुम्हारे देश की सभ्यता उत्तरोत्तर पैरों के नीचे कुचल दी जाएगी, और ज़्यादा समय नहीं लगेगा कि लोग परमेश्वर के विरूद्ध उठकर स्वर्ग को कोसने लगेंगे। और इसलिए देश का भाग्य का अनजाने में ही विनाश कर दिया जाएगा। परमेश्वर शक्तिशाली देशों को उन देशों से निपटने के लिए अधिक ऊपर उठाएगा जिन्हें परमेश्वर द्वारा श्राप दिया गया है, यहाँ तक कि पृथ्वी से उनका अस्तित्व भी मिटा सकता है। किसी देश का उत्थान और पतन इस बात पर आधारित होता है कि क्या इसके शासक परमेश्वर की आराधना करते हैं, और क्या वे अपने लोगों को परमेश्वर के निकट लाने और आराधना करने में उनकी अगुआई करते हैं। और फिर भी, इस अंतिम युग में, क्योंकि वे जो वास्तव में परमेश्वर को खोजते और आराधना करते हैं वे तेजी से दुर्लभ हो रहे हैं, इसलिए परमेश्वर उन देशों पर अपना विशेष अनुग्रह प्रदान करता है जिनमें ईसाईयत एक राज्य धर्म है। वह संसार में एक अपेक्षाकृत धार्मिक शिविर बनाने के लिए उन्हें एक साथ एकत्रित करता है, जबकि नास्तिक देश या जो देश सच्चे परमेश्वर की आराधना नहीं करते हैं वे धार्मिक शिविर के विरोधी बन जाते हैं। इस तरह, परमेश्वर का मानवजाति के बीच न केवल एक स्थान होता है जिससे वह अपना कार्य कर करता है, बल्कि उन देशों को भी प्राप्त करता है जो धर्मी अधिकार का प्रयोग कर सकते हैं, ताकि उन देशों पर शास्तियाँ और प्रतिबंध लगाए जाएँ जो परमेश्वर का विरोध करते हैं। मगर, इसके बावजूद, अभी तक ऐसे लोग अधिक नहीं हैं जो परमेश्वर की आराधना करने के लिए आगे आते हैं, क्योंकि मनुष्य उससे बहुत दूर भटक गया है, और परमेश्वर बहुत लंबे समय से मनुष्यों के विचारों से अनुपस्थित रहा है। पृथ्वी पर ऐसे देश रह जाते हैं जो धार्मिकता का अभ्यास करते हैं और अधार्मिकता का विरोध करते हैं। किन्तु यह परमेश्वर की इच्छा से अत्यंत दूर है, क्योंकि किसी भी देश का शासक अपने लोगों के ऊपर परमेश्वर को नियंत्रण नहीं करने देगा, और कोई राजनीतिक दल परमेश्वर की आराधना करने के लिए अपने लोगों को एक साथ इकट्ठा नहीं करेगा; परमेश्वर ने प्रत्येक देश, राष्ट्र, सत्तारूढ़ दल, और यहाँ तक कि प्रत्येक व्यक्ति के हृदय में अपना न्यायसंगत स्थान खो दिया है। यद्यपि धर्मी ताक़तें इस दुनिया में मौजूद हैं, किन्तु वह शासन जिसमें मनुष्य के हृदय में परमेश्वर का कोई स्थान नहीं हो नाज़ुक होता है। परमेश्वर के आशीष के बिना, राजनीतिक क्षेत्र अव्यवस्था में पड़ जाएँगे और हमले के लिए असुरक्षित हो जाएँगे। मानवजाति के लिए, परमेश्वर के आशीष के बिना होना धूप के न होने के समान है। इस बात की परवाह किए बिना कि शासक अपने लोगों के लिए कितने अधिक परिश्रम से योगदान करते हैं, इस बात पर ध्यान दिए बिना कि मानवजाति कितने धर्मी सम्मेलन आयोजित करती है, इनमें से कोई भी चीज़ों की कायापलट नहीं करेगा या मानवजाति के भाग्य को नहीं बदलेगा। मनुष्य का मानना है कि ऐसा देश जिसमें लोगों को खिलाया जाता है और पहनने के कपड़े दिए जाते हैं, जिसमें वे एक साथ शान्ति से रहते हैं, एक अच्छा देश है, और एक अच्छे नेतृत्व वाला देश है। किन्तु परमेश्वर ऐसा नहीं सोचता है। उसका मानना है कि कोई देश जिसमें कोई भी व्यक्ति उसकी आराधना नहीं करता है एक ऐसा देश है जिसे वह जड़ से मिटा देगा। मनुष्य के सोचने का तरीका परमेश्वर के सोचने के तरीकों से पूरी तरह भिन्न है। यदि किसी देश का मुखिया परमेश्वर की आराधना नहीं करता है, तो उस देश का भाग्य बहुत ही दुःखदायक होगा, और उस देश का कोई गंतव्य नहीं होगा।

परमेश्वर मनुष्य की राजनीति में भाग नहीं लेता है, फिर भी देश या राष्ट्र का भाग्य परमेश्वर के द्वारा नियंत्रित होता है। परमेश्वर इस संसार को और सम्पूर्ण ब्रह्माण्ड को नियंत्रित करता है। मनुष्य का भाग्य और परमेश्वर की योजना बहुत ही घनिष्ठता से जुड़ी हुई हैं, और कोई भी मनुष्य, देश या राष्ट्र परमेश्वर की सम्प्रभुता से मुक्त नहीं है। यदि मनुष्य अपने भाग्य को जानना चाहता है, तो उसे अवश्य परमेश्वर के सामने आना चाहिए। परमेश्वर उन लोगों को समृद्ध करवाएगा है जो उसका अनुसरण करते और उसकी आराधना करते हैं, और उनका पतन और विनाश करेगा जो उसका विरोध करते हैं और उसे अस्वीकार करते हैं।

बाइबल के दृष्य का स्मरण करें जब परमेश्वर ने सदोम पर विनाश का कार्य किया और इस बारे में भी विचार करें कि किस प्रकार से लूत की पत्नी नमक का खम्भा बन गई। वापस विचार करें कि किस प्रकार से नीनवे के लोगों ने टाट और राख में पश्चाताप किया, और स्मरण करें कि 2000 वर्ष पहले यहूदियों द्वारा यीशु को सलीब पर चढ़ा दिए जाने के बाद क्या हुआ था। यहूदियों को इस्राएल से निर्वासित कर दिया गया था और वे दुनियाभर के देशों में भाग गए थे। कई लोगों को मार दिया गया था, और सम्पूर्ण यहूदी देश अभूतपूर्व विनाश के अधीन कर दिया गया था। उन्होंने परमेश्वर को सलीब पर चढ़ाया था—जघन्य अपराध किया था—और परमेश्वर के स्वभाव को उकसाया था। उन्होंने जो किया था उसका उनसे भुगतान करवाया गया था, उनसे उनके कार्यों के परिणामों को भुगतवाया गया था। उन्होंने परमेश्वर की निंदा की थी, परमेश्वर को अस्वीकार किया था, और इसलिए उनकी केवल एक ही नियति थी: परमेश्वर द्वारा दण्डित किया जाना। यही वह कड़वा परिणाम और आपदा है जो उनके शासक अपने देश और राष्ट्र पर लाए।

आज, परमेश्वर अपना कार्य करने के लिए संसार में वापस आ गया है। उसका पहला ठहराव, नास्तिकता का कट्टर गढ़, तानाशाही शासकों का विशाल जमावड़ाः चीन, है। परमेश्वर ने अपनी बुद्धि और सामर्थ्य से लोगों का एक समूह प्राप्त कर लिया है। इस अवधि के दौरान, चीन की सत्तारूढ़ पार्टी द्वारा उसका हर तरह से शिकार किया जाता है और उसे अत्याधिक पीड़ा के अधीन किया जाता है, उसके पास अपना सिर टिकाने के लिए कोई जगह नहीं है और वह किसी भी शरणस्थल को पाने में असमर्थ है। इसके बावजूद, परमेश्वर तब भी उस कार्य को जारी रखता है जिसे करने का उसका इरादा हैः वह अपनी वाणी बोलता है और सुसमाचार का प्रसार करता है। कोई भी परमेश्वर की सर्वशक्तिमत्ता की थाह नहीं ले सकता है। चीन में, जो कि एक ऐसा देश है जो परमेश्वर को एक शत्रु मानता है, परमेश्वर ने कभी भी अपना कार्य बंद नहीं किया है। इसके बजाय, और अधिक लोगों ने उसके कार्य और वचन को स्वीकार कर लिया है, क्योंकि परमेश्वर मानवजाति के हर एक सदस्य को बचाने के लिए वह सब कुछ करता है जो वह कर सकता है। हमें विश्वास है कि परमेश्वर जो कुछ प्राप्त करना चाहता है उस मार्ग में कोई भी देश या शक्ति ठहर नहीं सकता है। वे जो परमेश्वर के कार्य में बाधा उत्पन्न करते हैं, परमेश्वर के वचन का विरोध करते हैं, परमेश्वर की योजना में विघ्न डालते हैं और उसे बिगाड़ते हैं, अंततः परमेश्वर के द्वारा दण्डित किए जाएँगे। वह जो परमेश्वर के कार्य की अवज्ञा करता है नष्ट कर दिया जाएगा; कोई भी देश जो परमेश्वर के कार्य का विरोध करने के लिए उठता है है, वह इस पृथ्वी पर से मिटा दिया जाएगा; और उसका अस्तित्व समाप्त हो जाएगा। मैं सभी देशों, राष्ट्रों और यहाँ तक कि उद्योग के लोगों से विनती करता हूँ, कि परमेश्वर की आवाज़ को सुनें, परमेश्वर के कार्य को देखें, मानवजाति के भाग्य पर ध्यान दें, इस प्रकार परमेश्वर को सर्वाधिक पवित्र, सर्वाधिक सम्माननीय, मानवजाति के बीच आराधना का सर्वोच्च, और एकमात्र लक्ष्य बनाएँ और सम्पूर्ण मानवजाति को परमेश्वर के आशीष के अधीन जीवन जीने की अनुमति दें, ठीक उसी तरह से जैसे अब्राहम के वंशज यहोवा की प्रतिज्ञाओं के अधीन रहे थे और ठीक उसी तरह से जैसे आदम और हवा, जो मूल रूप से परमेश्वर के द्वारा बनाए गए थे, अदन के बगीचे में रहे थे।

परमेश्वर का कार्य बलपूर्वक उमड़ती हुई लहरों के समान है। उसे कोई नहीं रोक सकता है, और कोई भी उसके क़दमों को थाम नहीं सकता है। केवल वे लोग ही जो उसके वचनों को सावधानीपूर्वक सुनते हैं, और उसकी खोज करते हैं और उसके लिए प्यासे हैं, उसके पदचिह्नों का अनुसरण करके उसकी प्रतिज्ञा को प्राप्त कर सकते हैं। जो ऐसा नहीं करते हैं वे ज़बर्दस्त आपदा और उचित दण्ड के अधीन किए जाएँगे।

129-A-2

अभी-अभी हमने पढ़ा "परमेश्वर सम्पूर्ण मानवजाति के भाग्य का नियंता है।" परमेश्वर के इन वचनों ने कई सत्यों की व्याख्या की है, और ये सब वे सत्य हैं, जिन्हें हमें, सृजित किये हुओं को, समझना चाहिए और उनसे सुसज्जित होना चाहिए। परमेश्वर को जानने के लिए, ये सब वे सत्य हैं, जिनसे हमें लैस रहना चाहिए। "परमेश्वर सम्पूर्ण मानवजाति के भाग्य का नियंता है।" यह शीर्षक खुद एक सत्य है, यह एक तथ्य भी है। कोई भी इस तथ्य से बच नहीं सकता, और कोई भी इस तथ्य से भाग नहीं सकता। हमें इस सत्य को कैसे समझना चाहिए? कुछ लोग कहते हैं, "मैं पूरी तरह से स्वीकार करता हूं कि परमेश्वर के इन वचनों में सच्चाई है, क्योंकि परमेश्वर सम्पूर्ण मानवजाति के भाग्य का नियंता है।" भले ही आप इसे स्वीकार करें या नहीं, भले ही आप इसे देखें या न देखें, यह तथ्य है। कई लोगों ने सत्य को पसंद करना शुरू कर दिया है, वे सभी अपने-अपने सत्य के अनुसरण का अभ्यास करने के लिए विभिन्न तरीके अपना रहे हैं। "परमेश्वर सम्पूर्ण मानवजाति के भाग्य का नियंता है।" के सत्य के सम्बन्ध में, हमें इस सच्चाई को कैसे समझना चाहिए? यदि कोई यह कहता है कि "मैं स्वीकार करता हूं कि ये वचन सत्य हैं, मैं पूरी तरह से विश्वास करता हूं कि परमेश्वर के ये वचन सत्य हैं, कि यह तथ्य है," तो क्या यह सत्य की वास्तविक समझ है? यह क्यों नहीं है? यह ऐसा कुछ है जिस पर हमें विचार करना चाहिए, क्या नहीं करना चाहिए? आप सोचते हैं कि चूंकि आप यह स्वीकार करते हैं कि परमेश्वर के वचन सत्य हैं, तो इसका अर्थ है कि आप भी सत्य के लिए तैयार हैं। ऐसा नहीं है। जो वास्तव में परमेश्वर में विश्वास करते हैं, उनमें से कोई भी यह स्वीकारने में असफल नहीं होगा कि परमेश्वर के वचन सत्य हैं, लेकिन क्या आपने इस सत्य को प्राप्त किया है? आपने सत्य को स्वीकार नहीं किया है। सबसे पहले तो आपके दृष्टिकोण से कुछ सत्य ही नहीं है, यह सत्य पर आधारित नहीं है, दूसरा, आपके कर्तव्य आपके सिद्धांतों के अनुसार परिपूर्ण नहीं हुए हैं, आपको पता ही नहीं कि अपने सिद्धांतों को कैसे लागू करें; तीसरा, आपने अपने दैनिक जीवन में सत्य को जिया ही नहीं है, और बाकी लोग भी आपको सत्य के मूल्यों में जीते हुए नहीं देख पा रहे हैं। ये सारी बातें यह प्रमाणित करने के लिए पर्याप्त हैं कि आप यह स्वीकार कर चुके हैं कि परमेश्वर के वचन सत्य हैं, लेकिन इसका अर्थ यह नहीं है कि आप सत्य को समझ चुके हैं, जान चुके हैं, या प्राप्त कर चुके हैं। क्या ऐसा नहीं है? यह मत सोचिए कि आपके स्वीकारकर लेने मात्र से आपको उसकी समझ हो गई है। सत्य की स्वीकृति सत्य की समझ के समरूप नहीं है, जबकि सत्य की समझ भी, सत्य को प्राप्त करने के समान नहीं है। इस मामले में आपके पास अच्छी ग्रहणशीलता अवश्य होनी चाहिए। कोई कहता है, "मैं समझता हूं, मैं इस बारे में कुछ बात भी कर सकता हूं।" जो आप कहते हैं वे मात्र वचन और सिद्धांत हैं, जिन्हें आपने समझा है वे केवल उथले विचार और धारणाएं हैं। क्या आप इसे समझ कह सकते हैं? क्या आपने चीजों के सार की समझ को प्राप्त कर लिया है? अवचेतन के भीतर चीजों को समझना और ग्रहण करना बेकार है। यदि आपके विचार और आपकी समझ केवल अवचेतन तक है, तो इसका अर्थ यह नहीं है कि आपको चीजों की वास्तविक समझ है। इसलिये, परमेश्वर के वचनों को पढ़ना, सत्य को खोजना है। भले ही आप यह स्वीकार कर लें कि परमेश्वर के वचन सत्य हैं, आपको फिर भी सत्य की खोज अवश्य करनी चाहिए, तथा अपनी खोज के माध्यम से इन सत्यो में से कुछ को समझना चाहिए और फिर अनुभवों के माध्यम सेवास्तविक समझ प्राप्त करनी चाहिये। और फिर अनेक अनुभवों से, वर्षों के अनुभव से, आप वास्तविक तौर पर सत्य के सार को समझेंगे, और केवल तभी आप वास्तविकतौर पर सत्य को प्राप्त कर पायेंगे। कई वर्षों के अनुभव के बाद, वह सब जो आपने समझा है, केवल आपके अवचेतन तक ही सीमित नहीं रहेगा बल्कि आप सत्य की वास्तविकता तथा सार को समझ पाने में भी समर्थ हो पायेंगे। इस बिंदु पर, सत्य स्वाभाविक रूप से आपका जीवन बन जायेगा, और आप स्वाभाविक रूप से सत्य में आधारित चीजों को देखने में समर्थ हो पायेंगे। आपके कार्यकलाप, आपके विकल्प, और वे मार्ग जिस पर आप चलते हैं, भी स्वाभाविक रूप से सत्य के अधीन होंगे, सत्य से प्रभावित होंगे, और इस प्रकार वे परिणाम प्राप्त करेंगे। परमेश्वर के वचनों को पढ़ने के बाद, हठी और घमण्डी लोग कहेंगे, "मैं समझता हूं कि यह सत्य है। ऐसी चीजों पर विचार करने की कोई आवश्यकता नहीं है। मैं उन्हें बहुत पहले समझ चुका हूं।" ये किस प्रकार के लोग हैं? क्या हठी और घमण्डी लोग सत्य को समझने में समर्थ हैं? नहीं। वे सोचते हैं कि वे तेज दिमाग के हैं, क्योंकि वे कुछ सिद्धांतों और पत्रों के बारे में बात कर सकते हैं, इसलिये वे किसी से भी बेहतर जानते हैं। वे चीजें जो शाब्दिक स्तर पर समझी जाती हैं, वे वास्तविक अनुभवों की समझ का प्रतिनिधित्व नहीं करती। केवल अनुभव से प्राप्त समझ ही वास्तविक समझ है; परमेश्वर के वचनों की शाब्दिक स्तर की समझ केवल अवचेतन में होती है, वे सच्ची समझ नहीं है। इसलिए, परमेश्वर के वचनों को वास्तव में समझने के लिए, हमें अनुभव लेना चाहिए, हमें साहचर्य करना चाहिए, हमें निरंतर विचार करना चाहिए और उन विचारों पर सोचना चाहिए, जो अंततः पवित्र आत्मा द्वारा प्रबुद्ध और प्रकाशमय हों। पवित्र आत्मा द्वारा प्रबुद्ध और प्रकाशमान किया जाना परम आवश्यक है। एक बार जब कोई व्यक्ति पवित्र आत्मा द्वारा प्रबुद्ध एवं प्रकाशमान कर दिया गया है, तो वह सत्य की वास्तविकता को समझना शुरू कर देता है, वह सत्य के मूल तथा सार को समझना शुरू कर देता है; पवित्र आत्मा द्वारा प्रबुद्ध और प्रकाशमान हुए बिना, जो कुछ भी समझा जाता है, वह शाब्दिक स्तर पर केवल उथला है। क्या ऐसा नहीं है? बहुत से लोगों को देखें, कह सकते हैं, जो सत्य को नहीं समझते हैं, लेकिन एक बार अगर आप उनके साथ साहचर्य कर लें, तो वे सत्य की वास्तविकता को महसूस कर सकते हैं, और वे कहेंगे, "ओह हां, आपका साहचर्य व्यावहारिक है और मैं इसे सुनने का इच्छुक हूं।" कुछ उनसे कुछ पत्रों एवं सिद्धांतों के बारे में बात कर सकते हैं, और वे कहेंगे, "नहीं, आप पत्रों एवं सिद्धांतों के बारे में बात कर रहे हैं, ये चीजें निरर्थक हैं, मैं इन चीजों को नहीं सुन रहा हूं। वे सब चीजें मेरे पास हैं, जिनके बारे में आप बात कर रहे हैं।, मैं उन सबको समझता हूं।" इसलिए, प्रत्येक के पास अपने दिल में एक स्पष्ट तस्वीर है, भले ही आप सत्यों को वास्तव में समझें या न समझें, वे सब अपने मनमें इसे जानते हैं। क्या ऐसा नहीं है?

परमेश्वर के वचनों के इस लेख पर विचार करते हुए, हमें सबसे पहले किस पर विचार करना चाहिए? पहले परमेश्वर के इन वचनों को पढ़ना खत्म करें, और देखें कि परमेश्वर के ये वचन किस बारे में बात कर रहे हैं। ये सभी शब्द, इस तथ्य के चारों ओर घूमते हैं कि "परमेश्वर सम्पूर्ण मानवजाति के भाग्य का नियंता है," और परमेश्वर के वचनों के प्रत्येक अवतरण का अर्थ सीधे ही इस विषय से जुड़ा है जो कहता है कि परमेश्वर ने इन शब्दों को विशेष परिणाम प्राप्त करने के लिए कहा। यह क्या परिणाम है? मनुष्य को यह ज्ञात कराने के लिए कि परमेश्वर वाकई सम्पूर्ण मानवजाति के भाग्य का नियंता है। जब मनुष्य को यह अनुभव हो गया है कि मनुष्य सम्पूर्ण मानवजाति के भाग्य का नियंता है, तथ्य है, जब कोई भी इस तथ्य से इंकार करने में समर्थ नहीं है, जब हम इस तथ्य से पूरी तरह से सहमत हैं, तो इस परिणाम से क्या निकलेगा? सम्पूर्ण मानवजाति इस सच्चे परमेश्वर के अस्तित्व को स्वाभाविक तौर से स्वीकार करेगी, इसके साथ ही यह भी स्वीकार करेगी कि यह सच्चा परमेश्वर वास्तव में सम्पूर्ण मानवजाति के भाग्य का नियंता है, और परिणामस्वरूप सीखेगी कि परमेश्वर के शासन से कोई नहीं बच सकता है। अगर कोई परमेश्वर को स्वीकार नहीं करता, अगर कोई परमेश्वर का विरोध करता है, तो इसकी परवाह किये बगैर कि आप कौन है, आप कौनसेलोग हैं, आप किस राष्ट्र से हैं, अंततः आप परमेश्वर द्वारा नष्ट कर दिये जायेंगे, और यह तथ्य है। व्यवस्था के युग के दौरान, परमेश्वर ने सदोम और अमोरा को नष्ट कर दिया, और अब तक, परमेश्वर ने अध्यक्षों, राजाओं और अगुवाओं सहित सभी लोगों को जिन्होंने परमेश्वर का विरोध किया, नष्ट कर दिया है। ये तथ्य इतिहास में स्पष्टतौर से दर्ज किये जा चुके हैं। एक बार जब मनुष्य वापस मुड़कर देखेगा, तो उसे एहसास होगा कि ये ऐतिहासिक तथ्य बिल्कुल सच हैं। तो मुझे बताओ, ये सभी तथ्य जो परमेश्वर के इन वचनों में दर्ज हैं, जबकि परमेश्वर ने उन्हें लिख दिया है, तो वह क्या परिणाम हासिल कर रहा है? यह आपको दिखाता है कि परमेश्वर वाकई सम्पूर्ण मानवजाति के भाग्य का नियंता है। यदि कोई नहीं जानता है, और कहता है, "हम परमेश्वर के अस्तित्व के बारे में स्पष्ट नहीं हैं। क्या परमेश्वर का वाकई कोई अस्तित्व है?" तो मनुष्य के इतिहास का अध्ययन करें, और देखें कि उन सबको जिन्होंने परमेश्वर का विरोध किया है, नष्ट किया जा चुका है। यदि परमेश्वर का अस्तित्व नहीं है, तो यह तथ्य कैसे सामने आया? वे लोग जिन्होंने परमेश्वर का विरोध किया और नष्ट कर दिए गये, तो वे किसके द्वारा नष्ट किये गये? उन्होंने परमेश्वर का विरोध किया, और स्वाभाविक रूप से परमेश्वर ने उन्हें नष्ट कर दिया। क्या मनुष्य उन्हें नष्ट कर सकता है? क्या मनुष्य सक्षम है? केवल सृजनकर्ता ही मानवजाति के भाग्य का नियंता है, और इस प्रकार, केवल वह ही ऐसी चीजों को अंजाम दे सकता है। एक बार जब मनुष्य इस तथ्य के आधार पर भेद कर लेगा, तो वह समझ जायेगा कि परमेश्वर के शासन की वास्तविकता प्रमाणित की जा चुकी है।

उद्धार का कार्य करने के लिए, परमेश्वर के पहले अवतार के दौरान, रोमन सरकार तथा यहूदी धर्म ने प्रभु यीशु का विरोध और निंदा की, उन्होंने प्रभु यीशु को सूली पर चढ़ाया, और अंततः परमेश्वर द्वारा उन्हें नष्ट कर दिया गया। इस्राएल का राष्ट्र नष्ट हो गया। फिर भी परमेश्वर ने उनसे प्रतिज्ञा की है कि अंत के दिनों के दौरान इस्राएल को बहाल किया जायेगा। परमेश्वर का विरोध करने के लिए इस्राएल को क्षमा नहीं किया गया, और दण्ड स्वरूप इस राष्ट्र को नष्ट कर दिया गया। उन्हें करीब दो हजार वर्षों तक दण्डित किया गया है, इस्राएल को अपने राष्ट्र का नुकसान झेलना पड़ा है, और इस प्रकार वे देख चुके हैं कि परमेश्वर के स्वभाव को नाराज नहीं किया जा सकता। आओ अब हम अन्य राष्ट्रों के अंत पर नज़र डालते हैं, जिन्होंने परमेश्वर का विरोध किया। प्राचीन रोमन साम्राज्य ने परमेश्वर का विरोध किया, बेरहमी से तीन सौ वर्षों तक ईसाइयों को सताया, और अंत में परमेश्वर ने इसे नष्ट कर दिया। पूरे साम्राज्य में एक बड़ा प्लेग फैल गया, इस प्लेग से रोमन साम्राज्य की अधिकांश जनता काल के गाल में समा गई, मृत शव सड़कों पर बिखरे पड़े थे। केवल इन्हीं तथ्यों के आधार पर एक बार फिर यह प्रमाणित हो चुका है कि परमेश्वर सम्पूर्ण मानवजाति का नियंता है। जो कोई भी परमेश्वर की निंदा करता है, वह दण्ड को आमंत्रणदे रहा है, जो कोई भी परमेश्वर की निंदा करेगा, परमेश्वर द्वारा उसे नष्ट कर दिया जायेगा। एक बार जब हम इन्ह तथ्यों को देखते हैं, तो हमारे पास यह प्रमाणित करने के लिए पर्याप्त सबूत हैं कि परमेश्वर सम्पूर्ण मानवजाति के भाग्य का नियंता है। अविश्वासी लोग हमेशा कहेंगे कि मनुष्य प्रकृति की देन है, सभी वस्तुएं प्रकृति की देन हैं। प्रकृति का कोई शासक नहीं है, इसलिए इसमें से हर चीज स्वतः उत्पन्न होती है। क्या इसमें कोई अर्थ निकलता है? क्या ऐसा कुछ है जो स्वतः ही उत्पन्न हो जाए? ऐसी कोई भी वस्तु नहीं है जो प्राकृतिक तौर पर उत्पन्न हो जाए। कुछ लोग कहते हैं, कीचड़ से कीड़े उत्पन्न होते हैं, फिर यह कीचड़ कहां से आती है? इसे परमेश्वर ने बनाया है। क्या मनुष्य स्वयं कीचड़ उत्पन्न कर सकता है? मनुष्य स्वयं कीचड़ उत्पन्न नहीं कर सकता, क्या ऐसा ही नहीं है? बाद में, वैज्ञानिकों ने क्लोन भेड़ें और क्लोन गायें सृजित कीं, और अंत में वैज्ञानिकों ने गर्व से कहा, "क्लोन भेंड़ों और क्लोन गायों को उत्पन्न करने बाद, हम मनुष्य का क्लोन तैयार करेंगे।" अब क्या हुआ? क्या अभी भी क्लोन भेड़ें और क्लोन गायें हैं? वे विफल हो गये हैं। सभी चीजों का सृजन परमेश्वर द्वारा किया गया है, सभी चीजें परमेश्वर द्वारा नियंत्रित हैं, इससे कोई इंकार नहीं कर सकता। इसे स्पष्टतौर से देखने के बाद, "परमेश्वर सम्पूर्ण मानवजाति के भाग्य का नियंता है" का यह सत्य हमारे लिये क्या परिणाम सिद्ध करेगा? एक बार जब हम इस सत्य को समझ गये हैं, तो हम क्या परिणाम सिद्ध करेंगे? मनुष्य अनेक संघर्षों एवं प्रयासों से गुजरता रहा है, और अंत में, मनुष्य देखता है कि उसका भाग्य खुद उसके हाथों में नहीं है, बल्कि परमेश्वर के हाथों में है। इससे कोई फर्क नहीं पड़ता कि मनुष्य किस लक्ष्य को सिद्ध करने की इच्छा रखता है, अगर इसे परमेश्वर द्वारा नियत नहीं किया गया है, तो मनुष्य इसे कभी नहीं प्राप्त कर पायेगा, क्योंकि इसे परमेश्वर द्वारा नियत किया जाना ज़रूरी है। इसलिए, हर एक का भाग्य परमेश्वर द्वारा नियत और नियंत्रित है। यदि परमेश्वर ने आपको किसी खास पेशे के लिए नियत किया है, तो आप इससे कभी नहीं बच सकते। कुछ लोग यह कह सकते हैं, "जब मैं विश्वविद्यालय जाऊंगा, तो अध्ययन करने के लिए, जो चाहूं वह चुन सकता हूं।" कोई व्यक्ति चिकित्सा का अध्ययन करना चुन सकता हैः "चिकित्सा बुरी नहीं है, मैं किसी को जीवित रख सकता हूं, और मैं लोगों का उपचार कर उन्हें बचा भी सकता हूं।" चिकित्सा विद्यालय से स्नातक करने के बाद, उसके विचार बदल गये, "चिकित्सा किसी के शरीर को तो बचा सकती है, किन्तु यह किसी की आत्मा को नहीं बचा सकती, अत: बजाय इसके मुझे राजनीति में जाना चाहिए।" देखिए, यह कैसे बदलता है, "मुझे साहित्य में रूचि लेनी चाहिए, मुझे लेखन कार्य करना चाहिए," और इस तरह उसने लिखना शुरू कर दिया। क्या उसने अपने इस भाग्य के लिए कोई योजना बनाई? ऐसी चीजें मनुष्य के नियंत्रण से बाहर हैं। आप सोच सकते हैं कि आप निर्णय लेते हैं कि आपको क्या पढ़ना है, लेकिन स्नातक करने के बाद, आपके विचार बदल गये हैं, और आपकी योजना ने इतनी तीव्रता से काम नहीं किया जितना कि बदलाव ने। इससे क्या अर्थ निकलता है? मनुष्य खुद अपनी नियति का चयन नहीं करता। यदि परमेश्वर ने इस जीवन की आपके लिए व्यवस्था की है, आपके लिए इस लक्ष्य की व्यवस्था की है, तो आप बच निकल नहीं पायेंगे। कुछ लोग स्वाभाविक रूप से गायन पसंद करते हैं, और वे केवल गायन ही करते हैं। जब वे असफल हो गये, तब भी उन्होंने गायन जारी रखा। और अंत में क्या हुआ? इतने वर्षों तक गायन करने के बाद और इतने वर्षों तक निराश होने के बाद भी वे गायन अलग नहीं हो पाए। उन्होंने स्वयं से कहा, "यह मेरा भाग्य है, इस बारे में, मैं कुछ नहीं कर सकता," और अंत में, वे कर गये। क्या यह भाग्य नहीं है? कुछ लोग लिखना पसंद करते हैं। वे लेखन से थक चुके थे और छोड़ना चाहते थे, "मैं नहीं कर सकता, मैं लेखन नहीं छोड़ सकता। मेरे पास अभी भी इतना कुछ है जिसे मैं कहना चाहता हूं, मुझे लेखन जारी रखना चाहिए!" इसलिए, वे लिखते रहे। देखो! कुछ लोग पढ़ाते हैं, वे पढ़ाना जारी रखते हैं, इस बात से फर्क नहीं पढ़ता कि उन्होंने कितने वर्षों तक पढ़ाया है, वे पढ़ाना जारी रखते हैं, भले ही वे पढ़ाते- पढ़ाते ऊब गए, उन सब लोगों की परवाह किये बगैर जो इसके खिलाफ हैं, फिर भी वे पढ़ाना जारी रखते हैं। यह एक मिशन है जिसे परमेश्वर ने मनुष्य के लिए नियत किया है। प्रत्येक मनुष्य को इस संसार में प्रवेश करते वक्त एक मिशन सौंपा गया है, वह इसका पालन करने के लिए आया है, और अपना मिशन पूरा करने से पहले, वह जायेगा नहीं। ऐसे भी लोग हैं जिन्हें महान कार्य पूरा करने के लिए नियत किया गया है। कुछ राजा, प्रधानमंत्री, अध्यक्ष बनने के लिए आए हैं। जब इनमें से ऐसा कोई व्यक्ति आ जाता है, तो परमेश्वर उसके लिए लोगों का एक समूह बनाताहै। जब उसके छोड़ने का समय आता है, तो इस समूह के लोग मरना शुरू कर देते हैं: एक व्यक्ति कुछ वर्षों में मर जाता है, और फिर दूसरा व्यक्ति अन्य कुछ वर्षों में। जब इस समूह के सभी व्यक्ति मर जाते हैं, तो फिर उसके छोड़ने का समय होता है। इस समूह के लोग अपने मिशन को पूरा कर चुके हैं, इसलिये उसे भी अब छोड़ देनाचाहिए। इसलिये यह कहावत है कि "दरबारी आते हैं और सम्राट के साथ चले जाते हैं।" परमेश्वर द्वारा सभी चीजों को नियत किया गया है। कुछ लोग पति-पत्नी बन गये, और कोई फर्क नहीं पड़ता कि वे कैसे लड़ते-झगड़ते हैं, वे एक-दूसरे को नहीं छोड़ सकते। अंत में, वे कहते हैं: "यह भाग्य है!" यह भाग्य है। परमेश्वर में विश्वास करने वालों के साथ भी ऐसा ही है। एक बार जब आप परमेश्वर में विश्वास करते हैं, तो आप इस परमानंद को अपने हृदय और आत्मा में महसूस करते हैं। यह दृढ़ भावना क्या है? असफलताओं का सामना करते हुए, उत्पीड़न और पीड़ा का सामना करते हुए, आप कहते हैं, "परमेश्वर में विश्वास करना इतना मुश्किल क्यों है? यह संसार कितना दुखमय है! यह कौन सा राष्ट्र है? यह उन लोगों को जो परमेश्वर में विश्वास करते हैं, इतना क्यों सताता है? परमेश्वर में विश्वास करना कितना अद्भुत है।" आप कितनी बार कमजोर पड़े हैं, आप कितनी बार हतोत्साहित हुए हैं, फिर भी, आप बने रहे। हर बार, छोड़ने के पहले विचार के साथ, आपके हृदय में असह्य मंथन शुरू हो जाता है, मानो कलेजा मुंह को आने वाला हो। अंततः, आप कहते हैं: "मैं विश्वास करता हूं। भले ही कितनी पीड़ा हो, भले ही कितनी मुश्किलें हों, मैं फिर भी विश्वास करता हूं।" और आह, आपके हृदय को शांति मिलती है, और अंततः आप समझ जाते हैं: यह सदैव परमेश्वर द्वारा नियत किया गया है, और कोई नहीं बच सकता है। भले ही आप बच जाएं, अंत में आपको लौटना ही होगा। कुछ सांसारिक दुनिया में वापिस आ गए हैं, "मैं व्यवसाय करने जा रहा हूं, किन्तु मैं यह नहीं कह रहा हूं कि मैं विश्वास करना बंद कर दूंगा," फिर भी अंत में वे धन बर्बाद कर चुके हैं, हर जगह विफलता ने उनका पीछा किया है, और अंत में विफल होने के बाद वे लौट आए हैं, और पूछ रहे हैं, "क्या हुआ?" परमेश्वर मानवजाति के भाग्य का नियंता है, और कोई बच नहीं सकता है। क्या ऐसा नहीं है? अविश्वासी कहते हैं: "ये लोग कितने मूर्ख हैं?" क्या यह मूर्खता है? मूर्ख या समझदार होने से इसका कोई लेना-देना नहीं है, यह ऐसा कुछ है, जो परमेश्वर द्वारा नियत है। मूर्खता क्या है? आप सोचते हैं कि जब इन लोगों को इतनी यातना दी जाती है, लेकिन फिर भी वे विश्वास करना जारी रखते हैं, इसलिये यह मूर्खता है? अंत में, जब सभी यातना सहन की जा चुकी हैं, और सभी दुख समाप्त हो गये हैं, जब परमेश्वर द्वारा उन्हें पूर्ण किया जा चुका है और राज्य में प्रवेश कराया जा चुका है, तो क्या यह अभी भी मूर्खता है? यह तो सर्वोच्च चतुराई है, क्या आपको दिखाई नहीं देती? इसलिए, परिणामों तथा अंत के आधार पर आपको निर्धारित करना चाहिए कि क्या मूर्खता है और क्या समझदारी। देह द्वारा सहन की जाने वाली अनिवार्य अस्थाई पीड़ाओं हिए और उस शर्मिंदगी के आधार पर निर्णय न लें जिसे झेलना ही पडता है। वो मायने नहीं रखता, उससे परिणाम पर कोई फर्क नहीं पड़ता है। क्या ऐसा नहीं है?

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