जीवन में प्रवेश पर उपदेश और वार्तालाप

2 परमेश्वर के वचन के बारे में धर्मोपदेश और सहभागिता "परमेश्वर सम्पूर्ण मानवजाति के भाग्य का नियन्ता है"

129-A2

अभी-अभी हमने पढ़ा "परमेश्वर सम्पूर्ण मानवजाति के भाग्य का नियंता है।" परमेश्वर के इन वचनों ने कई सत्यों की व्याख्या की है, और ये सब वे सत्य हैं, जिन्हें हमें, सृजित किये हुओं को, समझना चाहिए और उनसे सुसज्जित होना चाहिए। परमेश्वर को जानने के लिए, ये सब वे सत्य हैं, जिनसे हमें लैस रहना चाहिए। "परमेश्वर सम्पूर्ण मानवजाति के भाग्य का नियंता है।" यह शीर्षक खुद एक सत्य है, यह एक तथ्य भी है। कोई भी इस तथ्य से बच नहीं सकता, और कोई भी इस तथ्य से भाग नहीं सकता। हमें इस सत्य को कैसे समझना चाहिए? कुछ लोग कहते हैं, "मैं पूरी तरह से स्वीकार करता हूं कि परमेश्वर के इन वचनों में सच्चाई है, क्योंकि परमेश्वर सम्पूर्ण मानवजाति के भाग्य का नियंता है।" भले ही आप इसे स्वीकार करें या नहीं, भले ही आप इसे देखें या न देखें, यह तथ्य है। कई लोगों ने सत्य को पसंद करना शुरू कर दिया है, वे सभी अपने-अपने सत्य के अनुसरण का अभ्यास करने के लिए विभिन्न तरीके अपना रहे हैं। "परमेश्वर सम्पूर्ण मानवजाति के भाग्य का नियंता है।" के सत्य के सम्बन्ध में, हमें इस सच्चाई को कैसे समझना चाहिए? यदि कोई यह कहता है कि "मैं स्वीकार करता हूं कि ये वचन सत्य हैं, मैं पूरी तरह से विश्वास करता हूं कि परमेश्वर के ये वचन सत्य हैं, कि यह तथ्य है," तो क्या यह सत्य की वास्तविक समझ है? यह क्यों नहीं है? यह ऐसा कुछ है जिस पर हमें विचार करना चाहिए, क्या नहीं करना चाहिए? आप सोचते हैं कि चूंकि आप यह स्वीकार करते हैं कि परमेश्वर के वचन सत्य हैं, तो इसका अर्थ है कि आप भी सत्य के लिए तैयार हैं। ऐसा नहीं है। जो वास्तव में परमेश्वर में विश्वास करते हैं, उनमें से कोई भी यह स्वीकारने में असफल नहीं होगा कि परमेश्वर के वचन सत्य हैं, लेकिन क्या आपने इस सत्य को प्राप्त किया है? आपने सत्य को स्वीकार नहीं किया है। सबसे पहले तो आपके दृष्टिकोण से कुछ सत्य ही नहीं है, यह सत्य पर आधारित नहीं है, दूसरा, आपके कर्तव्य आपके सिद्धांतों के अनुसार परिपूर्ण नहीं हुए हैं, आपको पता ही नहीं कि अपने सिद्धांतों को कैसे लागू करें; तीसरा, आपने अपने दैनिक जीवन में सत्य को जिया ही नहीं है, और बाकी लोग भी आपको सत्य के मूल्यों में जीते हुए नहीं देख पा रहे हैं। ये सारी बातें यह प्रमाणित करने के लिए पर्याप्त हैं कि आप यह स्वीकार कर चुके हैं कि परमेश्वर के वचन सत्य हैं, लेकिन इसका अर्थ यह नहीं है कि आप सत्य को समझ चुके हैं, जान चुके हैं, या प्राप्त कर चुके हैं। क्या ऐसा नहीं है? यह मत सोचिए कि आपके स्वीकारकर लेने मात्र से आपको उसकी समझ हो गई है। सत्य की स्वीकृति सत्य की समझ के समरूप नहीं है, जबकि सत्य की समझ भी, सत्य को प्राप्त करने के समान नहीं है। इस मामले में आपके पास अच्छी ग्रहणशीलता अवश्य होनी चाहिए। कोई कहता है, "मैं समझता हूं, मैं इस बारे में कुछ बात भी कर सकता हूं।" जो आप कहते हैं वे मात्र वचन और सिद्धांत हैं, जिन्हें आपने समझा है वे केवल उथले विचार और धारणाएं हैं। क्या आप इसे समझ कह सकते हैं? क्या आपने चीजों के सार की समझ को प्राप्त कर लिया है? अवचेतन के भीतर चीजों को समझना और ग्रहण करना बेकार है। यदि आपके विचार और आपकी समझ केवल अवचेतन तक है, तो इसका अर्थ यह नहीं है कि आपको चीजों की वास्तविक समझ है। इसलिये, परमेश्वर के वचनों को पढ़ना, सत्य को खोजना है। भले ही आप यह स्वीकार कर लें कि परमेश्वर के वचन सत्य हैं, आपको फिर भी सत्य की खोज अवश्य करनी चाहिए, तथा अपनी खोज के माध्यम से इन सत्यो में से कुछ को समझना चाहिए और फिर अनुभवों के माध्यम सेवास्तविक समझ प्राप्त करनी चाहिये। और फिर अनेक अनुभवों से, वर्षों के अनुभव से, आप वास्तविक तौर पर सत्य के सार को समझेंगे, और केवल तभी आप वास्तविकतौर पर सत्य को प्राप्त कर पायेंगे। कई वर्षों के अनुभव के बाद, वह सब जो आपने समझा है, केवल आपके अवचेतन तक ही सीमित नहीं रहेगा बल्कि आप सत्य की वास्तविकता तथा सार को समझ पाने में भी समर्थ हो पायेंगे। इस बिंदु पर, सत्य स्वाभाविक रूप से आपका जीवन बन जायेगा, और आप स्वाभाविक रूप से सत्य में आधारित चीजों को देखने में समर्थ हो पायेंगे। आपके कार्यकलाप, आपके विकल्प, और वे मार्ग जिस पर आप चलते हैं, भी स्वाभाविक रूप से सत्य के अधीन होंगे, सत्य से प्रभावित होंगे, और इस प्रकार वे परिणाम प्राप्त करेंगे। परमेश्वर के वचनों को पढ़ने के बाद, हठी और घमण्डी लोग कहेंगे, "मैं समझता हूं कि यह सत्य है। ऐसी चीजों पर विचार करने की कोई आवश्यकता नहीं है। मैं उन्हें बहुत पहले समझ चुका हूं।" ये किस प्रकार के लोग हैं? क्या हठी और घमण्डी लोग सत्य को समझने में समर्थ हैं? नहीं। वे सोचते हैं कि वे तेज दिमाग के हैं, क्योंकि वे कुछ सिद्धांतों और पत्रों के बारे में बात कर सकते हैं, इसलिये वे किसी से भी बेहतर जानते हैं। वे चीजें जो शाब्दिक स्तर पर समझी जाती हैं, वे वास्तविक अनुभवों की समझ का प्रतिनिधित्व नहीं करती। केवल अनुभव से प्राप्त समझ ही वास्तविक समझ है; परमेश्वर के वचनों की शाब्दिक स्तर की समझ केवल अवचेतन में होती है, वे सच्ची समझ नहीं है। इसलिए, परमेश्वर के वचनों को वास्तव में समझने के लिए, हमें अनुभव लेना चाहिए, हमें साहचर्य करना चाहिए, हमें निरंतर विचार करना चाहिए और उन विचारों पर सोचना चाहिए, जो अंततः पवित्र आत्मा द्वारा प्रबुद्ध और प्रकाशमय हों। पवित्र आत्मा द्वारा प्रबुद्ध और प्रकाशमान किया जाना परम आवश्यक है। एक बार जब कोई व्यक्ति पवित्र आत्मा द्वारा प्रबुद्ध एवं प्रकाशमान कर दिया गया है, तो वह सत्य की वास्तविकता को समझना शुरू कर देता है, वह सत्य के मूल तथा सार को समझना शुरू कर देता है; पवित्र आत्मा द्वारा प्रबुद्ध और प्रकाशमान हुए बिना, जो कुछ भी समझा जाता है, वह शाब्दिक स्तर पर केवल उथला है। क्या ऐसा नहीं है? बहुत से लोगों को देखें, कह सकते हैं, जो सत्य को नहीं समझते हैं, लेकिन एक बार अगर आप उनके साथ साहचर्य कर लें, तो वे सत्य की वास्तविकता को महसूस कर सकते हैं, और वे कहेंगे, "ओह हां, आपका साहचर्य व्यावहारिक है और मैं इसे सुनने का इच्छुक हूं।" कुछ उनसे कुछ पत्रों एवं सिद्धांतों के बारे में बात कर सकते हैं, और वे कहेंगे, "नहीं, आप पत्रों एवं सिद्धांतों के बारे में बात कर रहे हैं, ये चीजें निरर्थक हैं, मैं इन चीजों को नहीं सुन रहा हूं। वे सब चीजें मेरे पास हैं, जिनके बारे में आप बात कर रहे हैं।, मैं उन सबको समझता हूं।" इसलिए, प्रत्येक के पास अपने दिल में एक स्पष्ट तस्वीर है, भले ही आप सत्यों को वास्तव में समझें या न समझें, वे सब अपने मनमें इसे जानते हैं। क्या ऐसा नहीं है?

परमेश्वर के वचनों के इस लेख पर विचार करते हुए, हमें सबसे पहले किस पर विचार करना चाहिए? पहले परमेश्वर के इन वचनों को पढ़ना खत्म करें, और देखें कि परमेश्वर के ये वचन किस बारे में बात कर रहे हैं। ये सभी शब्द, इस तथ्य के चारों ओर घूमते हैं कि "परमेश्वर सम्पूर्ण मानवजाति के भाग्य का नियंता है," और परमेश्वर के वचनों के प्रत्येक अवतरण का अर्थ सीधे ही इस विषय से जुड़ा है जो कहता है कि परमेश्वर ने इन शब्दों को विशेष परिणाम प्राप्त करने के लिए कहा। यह क्या परिणाम है? मनुष्य को यह ज्ञात कराने के लिए कि परमेश्वर वाकई सम्पूर्ण मानवजाति के भाग्य का नियंता है। जब मनुष्य को यह अनुभव हो गया है कि मनुष्य सम्पूर्ण मानवजाति के भाग्य का नियंता है, तथ्य है, जब कोई भी इस तथ्य से इंकार करने में समर्थ नहीं है, जब हम इस तथ्य से पूरी तरह से सहमत हैं, तो इस परिणाम से क्या निकलेगा? सम्पूर्ण मानवजाति इस सच्चे परमेश्वर के अस्तित्व को स्वाभाविक तौर से स्वीकार करेगी, इसके साथ ही यह भी स्वीकार करेगी कि यह सच्चा परमेश्वर वास्तव में सम्पूर्ण मानवजाति के भाग्य का नियंता है, और परिणामस्वरूप सीखेगी कि परमेश्वर के शासन से कोई नहीं बच सकता है। अगर कोई परमेश्वर को स्वीकार नहीं करता, अगर कोई परमेश्वर का विरोध करता है, तो इसकी परवाह किये बगैर कि आप कौन है, आप कौनसेलोग हैं, आप किस राष्ट्र से हैं, अंततः आप परमेश्वर द्वारा नष्ट कर दिये जायेंगे, और यह तथ्य है। व्यवस्था के युग के दौरान, परमेश्वर ने सदोम और अमोरा को नष्ट कर दिया, और अब तक, परमेश्वर ने अध्यक्षों, राजाओं और अगुवाओं सहित सभी लोगों को जिन्होंने परमेश्वर का विरोध किया, नष्ट कर दिया है। ये तथ्य इतिहास में स्पष्टतौर से दर्ज किये जा चुके हैं। एक बार जब मनुष्य वापस मुड़कर देखेगा, तो उसे एहसास होगा कि ये ऐतिहासिक तथ्य बिल्कुल सच हैं। तो मुझे बताओ, ये सभी तथ्य जो परमेश्वर के इन वचनों में दर्ज हैं, जबकि परमेश्वर ने उन्हें लिख दिया है, तो वह क्या परिणाम हासिल कर रहा है? यह आपको दिखाता है कि परमेश्वर वाकई सम्पूर्ण मानवजाति के भाग्य का नियंता है। यदि कोई नहीं जानता है, और कहता है, "हम परमेश्वर के अस्तित्व के बारे में स्पष्ट नहीं हैं। क्या परमेश्वर का वाकई कोई अस्तित्व है?" तो मनुष्य के इतिहास का अध्ययन करें, और देखें कि उन सबको जिन्होंने परमेश्वर का विरोध किया है, नष्ट किया जा चुका है। यदि परमेश्वर का अस्तित्व नहीं है, तो यह तथ्य कैसे सामने आया? वे लोग जिन्होंने परमेश्वर का विरोध किया और नष्ट कर दिए गये, तो वे किसके द्वारा नष्ट किये गये? उन्होंने परमेश्वर का विरोध किया, और स्वाभाविक रूप से परमेश्वर ने उन्हें नष्ट कर दिया। क्या मनुष्य उन्हें नष्ट कर सकता है? क्या मनुष्य सक्षम है? केवल सृजनकर्ता ही मानवजाति के भाग्य का नियंता है, और इस प्रकार, केवल वह ही ऐसी चीजों को अंजाम दे सकता है। एक बार जब मनुष्य इस तथ्य के आधार पर भेद कर लेगा, तो वह समझ जायेगा कि परमेश्वर के शासन की वास्तविकता प्रमाणित की जा चुकी है।

उद्धार का कार्य करने के लिए, परमेश्वर के पहले अवतार के दौरान, रोमन सरकार तथा यहूदी धर्म ने प्रभु यीशु का विरोध और निंदा की, उन्होंने प्रभु यीशु को सूली पर चढ़ाया, और अंततः परमेश्वर द्वारा उन्हें नष्ट कर दिया गया। इस्राएल का राष्ट्र नष्ट हो गया। फिर भी परमेश्वर ने उनसे प्रतिज्ञा की है कि अंत के दिनों के दौरान इस्राएल को बहाल किया जायेगा। परमेश्वर का विरोध करने के लिए इस्राएल को क्षमा नहीं किया गया, और दण्ड स्वरूप इस राष्ट्र को नष्ट कर दिया गया। उन्हें करीब दो हजार वर्षों तक दण्डित किया गया है, इस्राएल को अपने राष्ट्र का नुकसान झेलना पड़ा है, और इस प्रकार वे देख चुके हैं कि परमेश्वर के स्वभाव को नाराज नहीं किया जा सकता। आओ अब हम अन्य राष्ट्रों के अंत पर नज़र डालते हैं, जिन्होंने परमेश्वर का विरोध किया। प्राचीन रोमन साम्राज्य ने परमेश्वर का विरोध किया, बेरहमी से तीन सौ वर्षों तक ईसाइयों को सताया, और अंत में परमेश्वर ने इसे नष्ट कर दिया। पूरे साम्राज्य में एक बड़ा प्लेग फैल गया, इस प्लेग से रोमन साम्राज्य की अधिकांश जनता काल के गाल में समा गई, मृत शव सड़कों पर बिखरे पड़े थे। केवल इन्हीं तथ्यों के आधार पर एक बार फिर यह प्रमाणित हो चुका है कि परमेश्वर सम्पूर्ण मानवजाति का नियंता है। जो कोई भी परमेश्वर की निंदा करता है, वह दण्ड को आमंत्रणदे रहा है, जो कोई भी परमेश्वर की निंदा करेगा, परमेश्वर द्वारा उसे नष्ट कर दिया जायेगा। एक बार जब हम इन्ह तथ्यों को देखते हैं, तो हमारे पास यह प्रमाणित करने के लिए पर्याप्त सबूत हैं कि परमेश्वर सम्पूर्ण मानवजाति के भाग्य का नियंता है। अविश्वासी लोग हमेशा कहेंगे कि मनुष्य प्रकृति की देन है, सभी वस्तुएं प्रकृति की देन हैं। प्रकृति का कोई शासक नहीं है, इसलिए इसमें से हर चीज स्वतः उत्पन्न होती है। क्या इसमें कोई अर्थ निकलता है? क्या ऐसा कुछ है जो स्वतः ही उत्पन्न हो जाए? ऐसी कोई भी वस्तु नहीं है जो प्राकृतिक तौर पर उत्पन्न हो जाए। कुछ लोग कहते हैं, कीचड़ से कीड़े उत्पन्न होते हैं, फिर यह कीचड़ कहां से आती है? इसे परमेश्वर ने बनाया है। क्या मनुष्य स्वयं कीचड़ उत्पन्न कर सकता है? मनुष्य स्वयं कीचड़ उत्पन्न नहीं कर सकता, क्या ऐसा ही नहीं है? बाद में, वैज्ञानिकों ने क्लोन भेड़ें और क्लोन गायें सृजित कीं, और अंत में वैज्ञानिकों ने गर्व से कहा, "क्लोन भेंड़ों और क्लोन गायों को उत्पन्न करने बाद, हम मनुष्य का क्लोन तैयार करेंगे।" अब क्या हुआ? क्या अभी भी क्लोन भेड़ें और क्लोन गायें हैं? वे विफल हो गये हैं। सभी चीजों का सृजन परमेश्वर द्वारा किया गया है, सभी चीजें परमेश्वर द्वारा नियंत्रित हैं, इससे कोई इंकार नहीं कर सकता। इसे स्पष्टतौर से देखने के बाद, "परमेश्वर सम्पूर्ण मानवजाति के भाग्य का नियंता है" का यह सत्य हमारे लिये क्या परिणाम सिद्ध करेगा? एक बार जब हम इस सत्य को समझ गये हैं, तो हम क्या परिणाम सिद्ध करेंगे? मनुष्य अनेक संघर्षों एवं प्रयासों से गुजरता रहा है, और अंत में, मनुष्य देखता है कि उसका भाग्य खुद उसके हाथों में नहीं है, बल्कि परमेश्वर के हाथों में है। इससे कोई फर्क नहीं पड़ता कि मनुष्य किस लक्ष्य को सिद्ध करने की इच्छा रखता है, अगर इसे परमेश्वर द्वारा नियत नहीं किया गया है, तो मनुष्य इसे कभी नहीं प्राप्त कर पायेगा, क्योंकि इसे परमेश्वर द्वारा नियत किया जाना ज़रूरी है। इसलिए, हर एक का भाग्य परमेश्वर द्वारा नियत और नियंत्रित है। यदि परमेश्वर ने आपको किसी खास पेशे के लिए नियत किया है, तो आप इससे कभी नहीं बच सकते। कुछ लोग यह कह सकते हैं, "जब मैं विश्वविद्यालय जाऊंगा, तो अध्ययन करने के लिए, जो चाहूं वह चुन सकता हूं।" कोई व्यक्ति चिकित्सा का अध्ययन करना चुन सकता हैः "चिकित्सा बुरी नहीं है, मैं किसी को जीवित रख सकता हूं, और मैं लोगों का उपचार कर उन्हें बचा भी सकता हूं।" चिकित्सा विद्यालय से स्नातक करने के बाद, उसके विचार बदल गये, "चिकित्सा किसी के शरीर को तो बचा सकती है, किन्तु यह किसी की आत्मा को नहीं बचा सकती, अत: बजाय इसके मुझे राजनीति में जाना चाहिए।" देखिए, यह कैसे बदलता है, "मुझे साहित्य में रूचि लेनी चाहिए, मुझे लेखन कार्य करना चाहिए," और इस तरह उसने लिखना शुरू कर दिया। क्या उसने अपने इस भाग्य के लिए कोई योजना बनाई? ऐसी चीजें मनुष्य के नियंत्रण से बाहर हैं। आप सोच सकते हैं कि आप निर्णय लेते हैं कि आपको क्या पढ़ना है, लेकिन स्नातक करने के बाद, आपके विचार बदल गये हैं, और आपकी योजना ने इतनी तीव्रता से काम नहीं किया जितना कि बदलाव ने। इससे क्या अर्थ निकलता है? मनुष्य खुद अपनी नियति का चयन नहीं करता। यदि परमेश्वर ने इस जीवन की आपके लिए व्यवस्था की है, आपके लिए इस लक्ष्य की व्यवस्था की है, तो आप बच निकल नहीं पायेंगे। कुछ लोग स्वाभाविक रूप से गायन पसंद करते हैं, और वे केवल गायन ही करते हैं। जब वे असफल हो गये, तब भी उन्होंने गायन जारी रखा। और अंत में क्या हुआ? इतने वर्षों तक गायन करने के बाद और इतने वर्षों तक निराश होने के बाद भी वे गायन अलग नहीं हो पाए। उन्होंने स्वयं से कहा, "यह मेरा भाग्य है, इस बारे में, मैं कुछ नहीं कर सकता," और अंत में, वे कर गये। क्या यह भाग्य नहीं है? कुछ लोग लिखना पसंद करते हैं। वे लेखन से थक चुके थे और छोड़ना चाहते थे, "मैं नहीं कर सकता, मैं लेखन नहीं छोड़ सकता। मेरे पास अभी भी इतना कुछ है जिसे मैं कहना चाहता हूं, मुझे लेखन जारी रखना चाहिए!" इसलिए, वे लिखते रहे। देखो! कुछ लोग पढ़ाते हैं, वे पढ़ाना जारी रखते हैं, इस बात से फर्क नहीं पढ़ता कि उन्होंने कितने वर्षों तक पढ़ाया है, वे पढ़ाना जारी रखते हैं, भले ही वे पढ़ाते- पढ़ाते ऊब गए, उन सब लोगों की परवाह किये बगैर जो इसके खिलाफ हैं, फिर भी वे पढ़ाना जारी रखते हैं। यह एक मिशन है जिसे परमेश्वर ने मनुष्य के लिए नियत किया है। प्रत्येक मनुष्य को इस संसार में प्रवेश करते वक्त एक मिशन सौंपा गया है, वह इसका पालन करने के लिए आया है, और अपना मिशन पूरा करने से पहले, वह जायेगा नहीं। ऐसे भी लोग हैं जिन्हें महान कार्य पूरा करने के लिए नियत किया गया है। कुछ राजा, प्रधानमंत्री, अध्यक्ष बनने के लिए आए हैं। जब इनमें से ऐसा कोई व्यक्ति आ जाता है, तो परमेश्वर उसके लिए लोगों का एक समूह बनाताहै। जब उसके छोड़ने का समय आता है, तो इस समूह के लोग मरना शुरू कर देते हैं: एक व्यक्ति कुछ वर्षों में मर जाता है, और फिर दूसरा व्यक्ति अन्य कुछ वर्षों में। जब इस समूह के सभी व्यक्ति मर जाते हैं, तो फिर उसके छोड़ने का समय होता है। इस समूह के लोग अपने मिशन को पूरा कर चुके हैं, इसलिये उसे भी अब छोड़ देनाचाहिए। इसलिये यह कहावत है कि "दरबारी आते हैं और सम्राट के साथ चले जाते हैं।" परमेश्वर द्वारा सभी चीजों को नियत किया गया है। कुछ लोग पति-पत्नी बन गये, और कोई फर्क नहीं पड़ता कि वे कैसे लड़ते-झगड़ते हैं, वे एक-दूसरे को नहीं छोड़ सकते। अंत में, वे कहते हैं: "यह भाग्य है!" यह भाग्य है। परमेश्वर में विश्वास करने वालों के साथ भी ऐसा ही है। एक बार जब आप परमेश्वर में विश्वास करते हैं, तो आप इस परमानंद को अपने हृदय और आत्मा में महसूस करते हैं। यह दृढ़ भावना क्या है? असफलताओं का सामना करते हुए, उत्पीड़न और पीड़ा का सामना करते हुए, आप कहते हैं, "परमेश्वर में विश्वास करना इतना मुश्किल क्यों है? यह संसार कितना दुखमय है! यह कौन सा राष्ट्र है? यह उन लोगों को जो परमेश्वर में विश्वास करते हैं, इतना क्यों सताता है? परमेश्वर में विश्वास करना कितना अद्भुत है।" आप कितनी बार कमजोर पड़े हैं, आप कितनी बार हतोत्साहित हुए हैं, फिर भी, आप बने रहे। हर बार, छोड़ने के पहले विचार के साथ, आपके हृदय में असह्य मंथन शुरू हो जाता है, मानो कलेजा मुंह को आने वाला हो। अंततः, आप कहते हैं: "मैं विश्वास करता हूं। भले ही कितनी पीड़ा हो, भले ही कितनी मुश्किलें हों, मैं फिर भी विश्वास करता हूं।" और आह, आपके हृदय को शांति मिलती है, और अंततः आप समझ जाते हैं: यह सदैव परमेश्वर द्वारा नियत किया गया है, और कोई नहीं बच सकता है। भले ही आप बच जाएं, अंत में आपको लौटना ही होगा। कुछ सांसारिक दुनिया में वापिस आ गए हैं, "मैं व्यवसाय करने जा रहा हूं, किन्तु मैं यह नहीं कह रहा हूं कि मैं विश्वास करना बंद कर दूंगा," फिर भी अंत में वे धन बर्बाद कर चुके हैं, हर जगह विफलता ने उनका पीछा किया है, और अंत में विफल होने के बाद वे लौट आए हैं, और पूछ रहे हैं, "क्या हुआ?" परमेश्वर मानवजाति के भाग्य का नियंता है, और कोई बच नहीं सकता है। क्या ऐसा नहीं है? अविश्वासी कहते हैं: "ये लोग कितने मूर्ख हैं?" क्या यह मूर्खता है? मूर्ख या समझदार होने से इसका कोई लेना-देना नहीं है, यह ऐसा कुछ है, जो परमेश्वर द्वारा नियत है। मूर्खता क्या है? आप सोचते हैं कि जब इन लोगों को इतनी यातना दी जाती है, लेकिन फिर भी वे विश्वास करना जारी रखते हैं, इसलिये यह मूर्खता है? अंत में, जब सभी यातना सहन की जा चुकी हैं, और सभी दुख समाप्त हो गये हैं, जब परमेश्वर द्वारा उन्हें पूर्ण किया जा चुका है और राज्य में प्रवेश कराया जा चुका है, तो क्या यह अभी भी मूर्खता है? यह तो सर्वोच्च चतुराई है, क्या आपको दिखाई नहीं देती? इसलिए, परिणामों तथा अंत के आधार पर आपको निर्धारित करना चाहिए कि क्या मूर्खता है और क्या समझदारी। देह द्वारा सहन की जाने वाली अनिवार्य अस्थाई पीड़ाओं हिए और उस शर्मिंदगी के आधार पर निर्णय न लें जिसे झेलना ही पडता है। वो मायने नहीं रखता, उससे परिणाम पर कोई फर्क नहीं पड़ता है। क्या ऐसा नहीं है?