2. परमेश्वर का भय मानने और बुराई से दूर रहने तथा बचाए जाने में क्या संबंध है

परमेश्वर के प्रासंगिक वचन :

लोग अपने विश्वास में, अगर उद्धार पाना चाहते हैं, तो यह जानना ज़रूरी है कि वे परमेश्वर से डरते हैं या नहीं, और क्या उनके दिलों में परमेश्वर के लिये जगह है। अगर तुम्हारा दिल उसके सामने रहने के काबिल नहीं है, अगर तुम्हारे और परमेश्वर के बीच कोई सामान्य रिश्ता नहीं है, तो तुम कभी बचाये नहीं जाओगे। तुम्हारे उद्धार का मार्ग अवरुद्ध हो जाएगा; आगे जाने को कोई रास्ता नहीं होगा। परमेश्वर पर तुम्हारा विश्वास अगर बस नाम के लिए है तो यह विश्वास बेकार हो जाएगा, इससे कोई फ़र्क नहीं पड़ेगा कि तुम कितने सिद्धांत बोल सकते हो या तुमने कितना कष्ट उठाया है, या तुम्हारे कुदरती वरदान कितने महान हैं। परमेश्वर यही कहेंगे, "मुझसे दूर हो जाओ, तुम कुकर्मी हो।" तुम्हें एक कुकर्मी के दर्जे में रखा जाएगा। तुम्हारा परमेश्वर के साथ कोई संबंध नहीं है; वह तुम्हारा शासक नहीं है, वह तुम्हारा सृष्टिकर्ता नहीं है, वह तुम्हारा परमेश्वर नहीं है, तुम उसकी आराधना नहीं करते, न ही उसका अनुसरण करते हो। तुम शैतान और राक्षसों का अनुसरण करते हो। तुम स्वयं अपने प्रभु हो। अंत में, परमेश्वर तुम्हारे जैसे लोगों को हटा देगा, उनसे घृणा करेगा, अस्वीकार करेगा और उन्हें दंडित करेगा। वह ऐसे लोगों को नहीं बचाता। जब लोग यह स्वीकार कर लेते हैं कि परमेश्वर ही उनका प्रभु और शासक है, जब वे यह स्वीकार करते हैं कि वह ही सत्य है, वही मनुष्य के मार्ग और जीवन का स्रोत है, केवल जब उनके सारे काम और जिस मार्ग पर वे चलते हैं, वह सत्य से, परमेश्वर से, उसके समक्ष समर्पण से, और उसके मार्ग का अनुसरण करने से जुड़ा होता है—तभी उन्हें बचाया जाएगा। अन्यथा, परमेश्वर उन्हें दंडित करेगा। क्या यह सही है कि लोग यह आशा लगाए बैठे रहें कि भाग्य उनका साथ देगा? क्या उनका हमेशा अपनी धारणाओं से चिपके रहना सही है? क्या उनका अस्पष्ट और अमूर्त कल्पनाओं से निरंतर चिपके रहना सही है? (नहीं।) यह मत सोचो कि भाग्य तुम्हारा साथ दे देगा; परमेश्वर में अपने विश्वास में यदि तुम उद्धार पाना चाहते हो, तो और कोई दूसरा रास्ता नहीं है। ...

इन उपदेशों को सुनकर तुम लोगों के मन में जो भी उत्तेजना पैदा होती है, उससे कोई फर्क नहीं पड़ता; सब कुछ कहने-सुनने के बाद, एकमात्र सही मार्ग वह मार्ग है, जिसके कारण तुम परमेश्वर का भय मानते हो और बुराई से दूर रहते हो। यदि तुम परमेश्वर में विश्वास करते हो मगर तुम्हारी आस्था का परमेश्वर से कोई लेना-देना न हो, यदि वह तुम्हारा प्रभु और सृष्टिकर्ता नहीं है, यदि तुम उसे अपनी नियति का शासक नहीं मानते, यदि तुम उस सबके प्रति समर्पित नहीं होते, जो उसने तुम्हारे लिए व्यवस्थित किया है, यदि तुम उस तथ्य को नहीं मानते कि वह सत्य है, तो तुम्हारा उद्धार पाने का सपना बिखर गया। यदि तुम इस मार्ग पर चलते हो, तो तुम विनाश के पथ पर हो। मान लो, प्रतिदिन जिस पर तुम ध्यान देते हो, जिसे खोजते हो, जिससे प्रार्थना और अनुनय करते हो, उससे तुम्हें लगातार इस बात बोध हो रहा है कि तुम्हें सृष्टिकर्ता के प्रति समर्पित हो जाना चाहिए, परमेश्वर तुम्हारा प्रभु है। और मान लो तुम उसकी प्रभुसत्ता और अपने लिए उसके आयोजनों को सहर्ष स्वीकार कर लेते हो, परमेश्वर ने तुम्हारे लिए जो व्यवस्था की है, तुम उसके प्रति और भी प्रसन्नता से समर्पित हो जाते हो, तो तुम्हारी दशा लगातार सामान्य हो रही है, परमेश्वर के साथ तुम्हारे संबंध और भी निकटता के बन रहे हैं, उसके लिए तुम्हारा प्रेम और भी शुद्ध हो रहा है और तब तुम्हारी निरर्थक इच्छाएँ कम होती हैं, परमेश्वर से शिकायतें कम होती हैं, उसके प्रति तुम्हारी गलतफहमियाँ कम होती हैं, तुम कम से कम बुरे कार्य करते हो, लगातार उन बुराइयों से दूर होते जाते हो और परमेश्वर के प्रति तुम्हारा भय और भी अधिक वास्तविक हो जाता है। इसका अर्थ क्या है? इसका अर्थ है कि तुमने उद्धार के मार्ग पर कदम रख दिया है। यदि तुम्हें लगता है कि तुम जिसे खोज रहे हो, उसमें कुछ गलत नहीं है और तुम्हें लगता है कि तुम्हारा मार्ग सही है, लेकिन फिर तुम्हारी तमाम खोज के बाद, यदि परमेश्वर ने तुम्हें अनुशासित नहीं किया, तुम उसके न्याय और ताड़ना को समझ नहीं पाए, तुम उसकी जाँच के लिए तैयार नहीं हुए, तुमने खुद ही अपना स्वामी बनना चाहा, तो फिर यह मार्ग सही नहीं है। यदि तुम्हारी खोज के साथ यह समझ बढ़ती जाए कि तुम्हें हर समय परमेश्वर के सामने रहना चाहिए, तुम्हें यह डर रहे कि किसी दिन तुमसे कुछ गलत न हो जाए, तुम्हारी लापरवाही कहीं परमेश्वर का अपमान करके तुम्हें मुसीबत में न डाल दे, उस स्थिति में परमेश्वर यकीनन तुम्हें त्याग देगा, और इससे भयंकर बात और कोई नहीं हो सकती और तुम्हें लगे कि जब लोग परमेश्वर में विश्वास करें, तो उन्हें उससे दूर नहीं होना चाहिए और यदि वो उसके अनुशासन, व्यवहार, काट-छाँट, न्याय और ताड़ना से भागते हैं, तो यह परमेश्वर की देखभाल और सुरक्षा को गँवाने के समान है—इन बातों का अहसास होने परतुम परमेश्वर से प्रार्थना करोगे और कहोगे, "हे परमेश्वर! मैं तुझसे विनती करता हूँ कि तू मेरा न्याय कर, मुझे ताड़ना दे, मुझे फटकार, मुझे अनुशासित कर, हर समय मेरी जाँच कर, अपने प्रति मेरे मन में श्रद्धा पैदा कर और मुझे इस योग्य बना कि मैं बुराई से दूर रहूँ।" इस मार्ग के बारे में तुम्हारा क्या ख्याल है? यह सही मार्ग है।

— "अंत के दिनों के मसीह की बातचीत के अभिलेख" में 'यदि तू हर समय परमेश्वर के सामने रह सकता है केवल तभी तू उद्धार के पथ पर चल सकता है' से उद्धृत

वह सब जो परमेश्वर करता है आवश्यक है और असाधारण महत्व रखता है, क्योंकि वह मनुष्य में जो कुछ करता है उसका सरोकार उसके प्रबंधन और मनुष्यजाति के उद्धार से है। स्वाभाविक रूप से, परमेश्वर ने अय्यूब में जो कार्य किया वह भी कोई भिन्न नहीं है, फिर भले ही परमेश्वर की नज़रों में अय्यूब पूर्ण और खरा था। दूसरे शब्दों में, परमेश्वर चाहे जो करता हो या वह जो करता है उसे चाहे जिन उपायों से करता हो, क़ीमत चाहे जो हो, उसका ध्येय चाहे जो हो, किंतु उसके कार्यकलापों का उद्देश्य नहीं बदलता है। उसका उद्देश्य है मनुष्य में परमेश्वर के वचनों, और साथ ही मनुष्य से परमेश्वर की अपेक्षाओं और उसके लिए परमेश्वर की इच्छा को आकार देना; दूसरे शब्दों में, यह मनुष्य के भीतर उस सबको आकार देना है जिसे परमेश्वर अपने सोपानों के अनुसार सकारात्मक मानता है, जो मनुष्य को परमेश्वर का हृदय समझने और परमेश्वर का सार बूझने में समर्थ बनाता है, और मनुष्य को परमेश्वर की संप्रभुता को मानने और व्यवस्थाओं का पालन करने देता है, इस प्रकार मनुष्य को परमेश्वर का भय मानना और बुराई से दूर रहना प्राप्त करने देता है—यह सब परमेश्वर जो करता है उसमें निहित उसके उद्देश्य का एक पहलू है। दूसरा पहलू यह है कि चूँकि शैतान परमेश्वर के कार्य में विषमता और सेवा की वस्तु है, इसलिए मनुष्य प्रायः शैतान को दिया जाता है; यह वह साधन है जिसका उपयोग परमेश्वर लोगों को शैतान के प्रलोभनों और हमलों में शैतान की दुष्टता, कुरूपता और घृणास्पदता को देखने देने के लिए करता है, इस प्रकार लोगों में शैतान के प्रति घृणा उपजाता है और उन्हें वह जानने और पहचानने में समर्थ बनाता जो नकारात्मक है। यह प्रक्रिया उन्हें शैतान के नियंत्रण से और आरोपों, हस्तक्षेप और हमलों से धीरे-धीरे स्वयं को स्वतंत्र करने देती है—जब तक कि परमेश्वर के वचनों, परमेश्वर के बारे में उनके ज्ञान और आज्ञाकारिता, और परमेश्वर में उनके विश्वास और भय के कारण, वे शैतान के हमलों और आरोपों के ऊपर विजय नहीं पा लेते हैं; केवल तभी वे शैतान के अधिकार क्षेत्र से पूर्णतः मुक्त कर दिए गए होंगे। लोगों की मुक्ति का अर्थ है कि शैतान को हरा दिया गया है; इसका अर्थ है कि वे अब और शैतान के मुँह का भोजन नहीं हैं—उन्हें निगलने के बजाय, शैतान ने उन्हें छोड़ दिया है। ऐसा इसलिए है क्योंकि ऐसे लोग खरे हैं, क्योंकि उनमें परमेश्वर के प्रति आस्था, आज्ञाकारिता और भय है, और क्योंकि उन्होंने शैतान के साथ पूरी तरह नाता तोड़ लिया है। वे शैतान को लज्जित करते हैं, वे शैतान को कायर बना देते हैं, और वे शैतान को पूरी तरह हरा देते हैं। परमेश्वर का अनुसरण करने में उनका दृढ़विश्वास, और परमेश्वर के प्रति आज्ञाकारिता और उसका भय शैतान को हरा देता है, और उन्हें पूरी तरह छोड़ देने के लिए शैतान को विवश कर देता है। केवल इस जैसे लोग ही परमेश्वर द्वारा सच में प्राप्त किए गए हैं, और यही मनुष्य को बचाने में परमेश्वर का चरम उद्देश्य है। यदि वे बचाए जाना चाहते हैं, और परमेश्वर द्वारा पूरी तरह प्राप्त किए जाना चाहते हैं, तो उन सभी को जो परमेश्वर का अनुसरण करते हैं शैतान के बड़े और छोटे दोनों प्रलोभनों और हमलों का सामना करना ही चाहिए। जो लोग इन प्रलोभनों और हमलों से उभरकर निकलते हैं और शैतान को पूरी तरह परास्त कर पाते हैं ये वे लोग हैं जिन्हें परमेश्वर द्वारा बचा लिया गया है। कहने का तात्पर्य यह, वे लोग जिन्हें परमेश्वर पर्यंत बचा लिया गया है ये वे लोग हैं जो परमेश्वर की परीक्षाओं से गुज़र चुके हैं, और अनगिनत बार शैतान द्वारा लुभाए और हमला किए जा चुके हैं। वे जिन्हें परमेश्वर पर्यंत बचा लिया गया है परमेश्वर की इच्छा और अपेक्षाओं को समझते हैं, और परमेश्वर की संप्रभुता और व्यवस्थाओं को चुपचाप स्वीकार कर पाते हैं, और वे शैतान के प्रलोभनों के बीच परमेश्वर का भय मानने और बुराई से दूर रहने के मार्ग को नहीं छोड़ते हैं। वे जिन्हें परमेश्वर पर्यंत बचा लिया गया है वे ईमानदारी से युक्त हैं, वे उदार हृदय हैं, वे प्रेम और घृणा के बीच अंतर करते हैं, उनमें न्याय की समझ है और वे तर्कसंगत हैं, और वे परमेश्वर की परवाह कर पाते और वह सब जो परमेश्वर का है सँजोकर रख पाते हैं। ऐसे लोग शैतान की बाध्यता, जासूसी, दोषारोपण या दुर्व्यवहार के अधीन नहीं होते हैं, वे पूरी तरह स्वतंत्र हैं, उन्हें पूरी तरह मुक्त और रिहा कर दिया गया है। अय्यूब बिल्कुल ऐसा ही स्वतंत्र मनुष्य था, और ठीक यही परमेश्वर द्वारा उसे शैतान को सौंपे जाने का महत्व था।

— "वचन देह में प्रकट होता है" में 'परमेश्वर का कार्य, परमेश्वर का स्वभाव और स्वयं परमेश्वर II' से उद्धृत

परमेश्वर श्रद्धेय और आज्ञापालन करने योग्य है, क्योंकि उसका अस्तित्व और उसका स्वभाव सृजित प्राणियों के समान नहीं है, ये सृजित प्राणियों से ऊपर हैं। परमेश्वर स्व-अस्तित्वधारी, चिरकालीन और गैर-सृजित प्राणी है, और केवल परमेश्वर ही श्रद्धा और समर्पण के योग्य है; मनुष्य इसके योग्य नहीं है। इसलिए, जिन लोगों ने उसके कार्य का अनुभव किया है और जिन्होंने सचमुच में उसे जाना है, वे उसके प्रति श्रद्धा रखते हैं। लेकिन, जो लोग उसके बारे में अपनी धारणाएँ नहीं छोड़ते—जो उसे परमेश्वर मानते ही नहीं—उनके अंदर उसके प्रति कोई श्रद्धा नहीं है, हालाँकि वे उसका अनुसरण करते हैं फिर भी उन्हें जीता नहीं जाता; वे प्रकृति से ही अवज्ञाकारी लोग हैं। वह ऐसे परिणाम को प्राप्त करने के लिए इस कार्य को करता है ताकि सभी सृजित प्राणी सृजनकर्ता का आदर करें, उसकी आराधना करें, और बिना किसी शर्त के उसके प्रभुत्व के अधीन हो सकें। उसके समस्त कार्य का लक्ष्य इसी अंतिम परिणाम को हासिल करना है। यदि जिन लोगों ने ऐसे कार्य का अनुभव कर लिया है, वे परमेश्वर का जरा-सा भी आदर नहीं करते हैं, यदि अतीत की उनकी अवज्ञा बिल्कुल भी नहीं बदलती है, तो उन्हें निश्चित ही हटा दिया जाएगा। यदि परमेश्वर के प्रति किसी व्यक्ति की प्रवृत्ति केवल दूर से ही प्रशंसा करना या सम्मान प्रकट करना है और जरा-सा भी प्रेम करना नहीं है, तो यह वो परिणाम है जिस पर वह व्यक्ति आ पहुँचा है जिसके पास परमेश्वर से प्रेम करने वाला हृदय नहीं है, और उस व्यक्ति में पूर्ण किए जाने की शर्तों का अभाव है। यदि इतना अधिक कार्य भी किसी व्यक्ति के सच्चे प्रेम को प्राप्त करने में असमर्थ है, तो इसका अर्थ है उस व्यक्ति ने परमेश्वर को प्राप्त नहीं किया है और वह असल में सत्य की खोज नहीं कर रहा। जो व्यक्ति परमेश्वर से प्रेम नहीं करता, वह सत्य से भी प्रेम नहीं करता और इस तरह वह परमेश्वर को प्राप्त नहीं कर सकता, वह परमेश्वर की स्वीकृति तो बिलकुल भी प्राप्त नहीं कर सकता। ऐसे लोग, पवित्र आत्मा के कार्य का अनुभव चाहे जैसे कर लें, और न्याय का चाहे जैसे अनुभव कर लें, वे परमेश्वर के प्रति श्रद्धा नहीं रख सकते। ऐसे लोगों की प्रकृति अपरिवर्तनीय होती है, और उनका स्वभाव अत्यंत दुष्ट होता है। जो लोग परमेश्वर पर श्रद्धा नहीं रखते, उन्हें हटा दिया जाएगा, वे दण्ड के पात्र बनेंगे, और उन्हें उसी तरह दण्ड दिया जाएगा जैसे दुष्टों को दिया जाता है, और ऐसे लोग उनसे भी अधिक कष्ट सहेंगे जिन्होंने अधार्मिक दुष्कर्म किए हैं।

— "वचन देह में प्रकट होता है" में 'परमेश्वर का कार्य और मनुष्य का कार्य' से उद्धृत

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अब बड़ी-बड़ी विपत्तियाँ आ रही हैं और वह दिन निकट है जब परमेश्वर भलाई का प्रतिफल देगें और बुराई को दण्ड देंगे। हमें एक सुंदर गंतव्य कैसे मिल सकता है?

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