32. अलविदा, ऐ सितारा बनने के सपने!

सर्वशक्तिमान परमेश्वर कहते हैं, "जीवधारियों में से एक होने के नाते, मनुष्य को अपनी स्थिति को बना कर रखना होगा और शुद्ध अंतःकरण से व्यवहार करना होगा। सृष्टिकर्ता के द्वारा तुम्हें जो कुछ सौंपा गया है, कर्तव्यनिष्ठा के साथ उसकी सुरक्षा करो। अनुचित ढंग से आचरण मत करो, या ऐसे काम न करो जो तुम्हारी क्षमता के दायरे से बाहर हों या जो परमेश्वर के लिए घृणित हों। महान या अद्भुत व्यक्ति बनने की चेष्टा मत करो, दूसरों से श्रेष्ठ होने की कोशिश मत करो, न ही परमेश्वर बनने की कोशिश करो। लोगों को ऐसा बनने की इच्छा नहीं करनी चाहिए। महान या अद्भुत व्यक्ति बनने की कोशिश करना बेतुका है। परमेश्वर बनने की कोशिश करना और भी अधिक लज्जाजनक है; यह घृणित है और नीचता भरा है। जो काम तारीफ़ के काबिल है और जिसे प्राणियों को सब चीज़ों से ऊपर मानना चाहिए, वह है एक सच्चा जीवधारी बनना; यही वह एकमात्र लक्ष्य है जिसे पूरा करने का निरंतर प्रयास सब लोगों को करना चाहिए" ("वचन देह में प्रकट होता है" में 'स्वयं परमेश्वर, जो अद्वितीय है I')। परमेश्वर के वचनों के इस अंश को पढ़ना मेरे लिए वाकई दिल को छूने वाला है। इससे मुझे अपने कुछ अनुभवों की याद आती है।

बचपन से ही मुझे अभिनय कलाओं से बहुत प्यार था और मैं मशहूर हस्तियों और फ़िल्मी सितारों की वाकई प्रशंसक थी। तमाम लोगों का प्यार और प्रशंसा बटोरते उनके मंच पर आने का ढंग देख कर मैं बेहद प्रभावित होती। मिडिल स्कूल ख़त्म करने से पहले ही मैंने एक थिएटर स्कूल में नाम लिखवा लिया था, और तीन साल होते ही मैं एक अभिनेत्री बन गयी थी। हर कला-प्रदर्शन में, मुझे उन तमाम दर्शकों को देख कर सचमुच बड़ा संतोष होता, जो हमारे अभिनय में खो जाते थे। परमेश्वर में विश्वास रखने के बाद कलीसिया द्वारा बनायी गयी फिल्मों में कुछ भूमिकाएं अदा करके, मैंने एक अभिनेत्री के रूप में अपना कर्तव्य निभाया। मुझे बहुत खुशी हुई जब भाई-बहनों ने मुझे बहुत अच्छी अभिनेत्री कहा, तब मैंने सोचा,"काश! किसी फिल्म में मैं मुख्य भूमिका निभा सकूं, तो वे सब मुझे देखेंगे, और यकीनन मेरी इज़्ज़त करेंगे। कमाल हो जाएगा!"

आगे चल कर जब कलीसिया एक और फिल्म बनाने की तैयारी कर रही थी, तब एक भाई ने मुझे एक भूमिका के लिए ऑडिशन करवाने को कहा। मुझे लगा मैं तो अभिनेत्री हूँ ही और थोड़ा अनुभव भी है, तो वह भूमिका अवश्य मुझे ही मिलेगी। बाद में, मैं खुशी-खुशी इंतज़ार करती रही कि अगुआ मुझे फिल्मांकन में भाग लेने की सूचना देगी। कुछ दिन तक मैं उस दृश्य की कल्पना करती रही कि सभी लोग मुझे प्रशंसा की नज़रों से देख रहे हैं। इस ख्याल ने मुझे बहुत खुशी दी। लेकिन कुछ दिन बाद अगुआ ने मुझे बताया कि मैं ऑडिशन में पास नहीं हुई और मुझे सुसमाचार टीम में शामिल होना है क्योंकि वहां लोगों की कमी है। मैं भौंचक्की रह गयी मेरे अंदर एक प्रतिरोध का भाव जागा, मैं हैरान रह गयी, "उन्होंने मुझे कैसे नहीं चुना? मैं पहले बड़ी भूमिकाएं निभा चुकी हूँ, और सभी लोगों ने कहा था कि मैंने अच्छा काम किया। उन्होंने मुझे क्यों नहीं चुना? उनसे कोई ग़लती तो नहीं हो गयी? सुसमाचार के कार्य में तो मैं अलग नहीं दिख पाऊँगी, न ही दिखावा कर पाऊँगी। अभिनेत्री की तरह उसमें कोई गौरव नहीं है।" इस बारे में मैं जितना सोचती, मेरे अंदर उतना ही प्रतिरोध का भाव जागता, मैं इस नतीजे को स्वीकार ही नहीं कर पायी। लेकिन मैंने सोचा कि किस प्रकार सुसमाचार साझा करना परमेश्वर की इच्छा है, एक ज़िम्मेदारी है जो मुझे संभालनी चाहिए। मुझमें अंतरात्मा और समझ होनी चाहिए, मुझे समर्पण करना चाहिए, इसलिए मैं इच्छा न होने पर भी राज़ी हो गयी। भले ही मैं सुसमाचार साझा कर रही थी, पर मैं हमेशा यही सोचती कि अभिनय करते वक्त किस प्रकार भाई-बहनों ने मेरी प्रशंसा की थी, ख़ास तौर से तब जब मैं उन दूसरे अभिनेताओं को देखती, जिनके साथ मैंने एक फिल्म में अभिनय किया था, तो मुझे बहुत जलन होती। मैं सोचती, "कितना बढ़िया होगा अगर मैं फिर से अभिनय के काम में लग सकूं। तब मैं भी, उन्हीं की तरह हर वक्त फिल्मों में अभिनय करती रहूँगी। मेरे परिचित भाई-बहन मुझे देखेंगे और आदर करेंगे। उन्होंने मुझे क्यों नहीं चुना?" इस बारे में जितना सोचती, उतनी ही ज़्यादा दुखी होती। अपने कर्तव्य में मैं ज़िम्मेदारी नहीं उठा रही थी, और मैं सुसमाचार के कार्य में मैं सत्य का पालन करने पर ध्यान नहीं दे रही थी। जब परमेश्वर के अंत के दिनों के कार्य की खोज और जांच करने वाले किसी व्यक्ति ने एक सवाल पूछा, तो मुझे मालूम नहीं था कि इसका समाधान करने के लिए किस सत्य पर संगति करूं। धीरे-धीरे मैं परमेश्वर से और भी अधिक दूरी महसूस करने लगी, और परमेश्वर के वचन पढ़ते वक्त, मुझमें पवित्र आत्मा की प्रबुद्धता का अभाव हो गया। प्रार्थना करते वक्त मैं परमेश्वर की मौजूदगी भी महसूस नहीं कर पा रही थी, मेरा दिमाग़ हमेशा चक्कर खाता रहता था। दुखी होकर, मैंने परमेश्वर से प्रार्थना की, और बोली, "हे परमेश्वर, मैं बेहद दुखी हूँ। मैं तो बस एक अभिनेत्री के रूप में अपना कर्तव्य निभाना चाहती हूँ, अपनी कला दिखाना चाहती हूँ, और तुमने जो व्यवस्था की है, उसके आगे समर्पण नहीं कर पा रही हूँ। मुझे खुद को जानने और तुम्हारी इच्छा को समझने का रास्ता दिखाओ।"

प्रार्थना के बाद मैंने परमेश्वर के वचनों के ये दो अंश पढ़े: "सच्चा समर्पण क्या है? जब कभी भी परमेश्वर ऐसी चीज़ें करता है जो तुम्हारे अनुरूप चली जाती हैं, और तुम्हें ऐसा महसूस होता है कि सब कुछ संतोषजनक और उचित है, और तुम्हें भीड़ से अलग खड़े होने दिया गया है, तुम्हें यह सब काफी गौरवशाली लगता है और तुम कहते हो, "परमेश्वर को धन्यवाद" और उसके आयोजनों एवं व्यवस्थाओं के प्रति समर्पित हो पाते हो। हालांकि, जब कभी भी तुम्हें मामूली जगह पर तैनात कर दिया जता है, जहाँ तुम दूसरों से अलग दिखने में अक्षम होते हो, और जिसमें कोई भी कभी तुम्हें अभिस्वीकृत नहीं करता, तो तुम खुश नहीं रहते और समर्पण करना तुम्हें कठिन लगता है। ... जब परिस्थितियां अनुकूल हों, तब समर्पण करना आम तौर पर आसान होता है। अगर तुम प्रतिकूल परिस्थितियों में भी समर्पण दिखा सकते हो—उन मामलों में जहां चीज़ें तुम्हारे अनुकूल नहीं हो रही हैं और जब तुम्हारी भावनाओं को ठेस पहुँचती है, जो तुम्हें कमजोर करते हैं, जो तुम्हें शारीरिक रूप से तकलीफ़ देते हैं और तुम्हारी प्रतिष्ठा को आघात पहुंचाते हैं, जो तुम्हारे मिथ्याभिमान और गौरव को संतुष्ट नहीं कर पाते है, और जो तुम्हें मानसिक रूप से कष्ट पहुंचाते हैं—तब सही मायनों में तुम्हारे पास आध्यात्मिक कद है" (परमेश्‍वर की संगति)। "जैसे ही पद, प्रतिष्ठा या रुतबे की बात आती है, हर किसी का दिल प्रत्याशा में उछलने लगता है, तुममें से हर कोई हमेशा दूसरों से अलग दिखना, मशहूर होना, और अपनी पहचान बनाना चाहता है। हर कोई झुकने को अनिच्छुक रहता है, इसके बजाय हमेशा विरोध करना चाहता है—इसके बावजूद कि विरोध करना शर्मनाक है और परमेश्वर के घर में इसकी अनुमति नहीं है। हालांकि, वाद-विवाद के बिना, तुम अब भी संतुष्ट नहीं होते हो। जब तुम किसी को दूसरों से विशिष्ट देखते हो, तो तुम्हें ईर्ष्या और नफ़रत महसूस होती है, तुम्हें लगता है कि यह अनुचित है। 'मैं दूसरों से विशिष्ट क्यों नहीं हो सकता? हमेशा वही व्यक्ति दूसरों से अलग क्यों दिखता है, और मेरी बारी कभी क्यों नहीं आती है?' फिर तुम्हें कुछ नाराज़गी महसूस होती है। तुम इसे दबाने की कोशिश करते हो, लेकिन तुम ऐसा नहीं कर पाते, तुम परमेश्वर से प्रार्थना करते हो। और कुछ समय के लिए बेहतर महसूस करते हो, लेकिन जब एक बार फिर तुम्हारा सामना इसी तरह के मामले से होता है, तो तुम इससे जीत नहीं पाते हो। क्या यह एक अपरिपक्व कद नहीं दिखाता है? क्या किसी व्यक्ति का इस तरह की स्थिति में गिर जाना एक फंदा नहीं है? ये शैतान की भ्रष्ट प्रकृति के बंधन हैं जो इंसानों को बाँध देते हैं" ("मसीह की बातचीत के अभिलेख" में 'तू अपने सच्चे हृदय को परमेश्वर की ओर मोड़ने के बाद सच्चाई को प्राप्त कर सकता है')। परमेश्वर के वचनों को पढ़ने के बाद, मैंने महसूस किया कि मैं परमेश्वर की व्यवस्थाओं के आगे समर्पण इसलिए नहीं कर पा रही हूँ क्योंकि शोहरत और रुतबे की मेरी ख्वाहिश बहुत मज़बूत है और मैं हमेशा से मशहूर होना चाहती रही हूँ। जब कलीसिया ने मुझे अभिनेत्री के रूप में चुना, तो मैं कैमरे के सामने दिखावा कर सकती थी, इसलिए मैंने इसे खुशी-खुशी स्वीकार कर लिया और उसका पालन किया। लेकिन अब जबकि मुझे सुसमाचार को फैलाने का काम दिया गया है, तो इस सोच ने कि अपने काम में सबसे अलग नहीं दिख पाऊँगी या दिखावा नहीं कर पाऊँगी और मैं चाहे जितना भी करूं, कोई मुझे नहीं देखेगा, मुझे विरोधी और समर्पण करने में असमर्थ बना दिया। हालांकि मैं सुसमाचार को साझा करती दिखाई पड़ती थी, लेकिन मेरा दिमाग़ एक अभिनेत्री के रूप में अपने गौरवशाली दिनों के ख्यालों से भरा रहता, और जब कभी मैं सोचती कि वह काम अब नहीं कर पाऊँगी, तो बेचैन हो जाती और सोचती कि मेरे साथ ग़लत हुआ है। अपना सुसमाचार का कर्तव्य मैं बस यूं ही निभा रही थी, नकारात्मक और ढीली-ढाली, और कुछ भी हासिल नहीं कर पा रही थी। मुझे अच्छी तरह पता था कि सुसमाचार को फैलाना परमेश्वर की दिली इच्छा है, मैं अभिनय करूं या सुसमाचार साझा करूं, यह सब अलग-अलग ढंग से परमेश्वर के कार्य की गवाही देना ही है। मैं उस अभिनय भूमिका के लिए उपयुक्त नहीं थी, इसलिए अगुआ ने मुझे सुसमाचार के काम में लगाया। यह भी मेरा कर्तव्य है, इसलिए मुझे इसे स्वीकार करना चाहिए और इसे सही ढंग से करने के लिए पूरा दिल लगाना चाहिए। लेकिन मैं परमेश्वर की इच्छा के प्रति विचारशील नहीं थी। मैं अपनी निजी पसंद का काम चाहती थी, और यही विचार कर रही थी कि क्या मैं दिखावा कर पाऊँगी और क्या दूसरे मुझे आदर से देखेंगे। मैंने सिर्फ अपनी महत्वाकांक्षाओं और लालसाओं को संतुष्ट करने के बारे में सोचा। मैं सिर्फ नाम के वास्ते अपना कर्तव्य निभा रही थी, लेकिन असलियत में, मैं परमेश्वर के प्रति बिना किसी समर्पण के अपनी शोहरत और रुतबे के पीछे ही भाग रही थी। क्या यह परमेश्वर का विरोध करना और उसको धोखा देने की कोशिश करना नहीं था? इससे परमेश्वर में चिढ़ और घृणा कैसे पैदा न होती?

इसके बाद, मैंने परमेश्वर से प्रार्थना की और उसके वचनों में अभ्यास का रास्ता पाया। परमेश्वर अपने वचनों में कहते हैं: "यदि तुम अपने हर काम में परमेश्वर की इच्छा को पूरा करने के लिए समर्पित रहना चाहते हो, तो केवल एक ही कर्तव्य करना काफी नहीं है; तुम्हें परमेश्वर द्वारा दिये गए हर आदेश को स्वीकार करना चाहिए। चाहे यह तुम्हारी पसंदों के अनुसार हो या न हो, और चाहे यह तुम्हारी रूचियों में से एक हो या न हो, या चाहे यह कुछ ऐसा काम हो जो तुम्हें करना अच्छा नहीं लगता हो या तुमने पहले कभी न किया हो, या कुछ मुश्किल काम हो, तुम्हें इसे फिर भी स्वीकार कर इसके प्रति समर्पित होना होगा। न तुम्हें केवल इसे स्वीकार करना होगा, बल्कि अग्रसक्रिय रूप से अपना सहयोग देना होगा, और इसे सीखना होगा, इसमें प्रवेश पाना होगा। यदि तुम कष्ट उठाते हो, यदि तुम इसके लिए वाहवाही तक नहीं पा सके हो, तुम्हें फिर भी समर्पण के लिए प्रतिबद्ध रहना होगा। तुम्हें इसे अपना व्यक्तिगत कामकाज नहीं बल्कि कर्तव्य मानना चाहिए; कर्तव्य जिसे पूरा करना ही है। लोगों को अपने कर्तव्यों को कैसे समझना चाहिए। जब सृष्टिकर्ता—परमेश्वर—किसी को कोई कार्य सौंपता है, तब उस समय, वह उस व्यक्ति का कर्तव्य बन जाता है। जिन कार्यों और आदेशों को परमेश्वर तुम्हें देता है—वे तुम्हारे कर्तव्य हैं। जब तुम उन्हें अपने लक्ष्य बनाकर उनके पीछे जाते हो, और जब तुम्हारा दिल वास्तव में परमेश्वर-प्रेमी होता है, तब क्या तुम परमेश्वर के आदेश से इनकार कर सकोगे? तुम्हें इंकार नहीं करना चाहिए। तुम्हें इसे स्वीकार करना चाहिए, है न? यही अभ्यास का पथ है" ("मसीह की बातचीत के अभिलेख" में 'एक ईमानदार इंसान होकर ही कोई व्यक्ति सच में खुश हो सकता है')। मैंने परमेश्वर के वचनों में देखा कि एक कर्तव्य इंसान के लिए परमेश्वर का आदेश होता है, एक ज़िम्मेदारी होती है जिसे छोड़ा नहीं जा सकता। हमें पसंद हो या न हो, हम दिखावा कर सकें या नहीं, इसे स्वीकार कर हमें समर्पण करना चाहिए, और पूरी लगन से इसे निभाना चाहिए। मैं अपने कर्तव्य से यों पेश नहीं आ सकती मानो वह सबसे अलग दिखने की मेरी अनियंत्रित ख्वाहिश को पूरा करने वाला मेरा खुद का उद्यम हो। मुझे परमेश्वर के घर के हितों और अपनी ज़िम्मेदारियों को आगे रखना होगा, एक सृजित प्राणी के रूप में परमेश्वर की व्यवस्थाओं के आगे समर्पण करना होगा। इसके बाद, मैंने सुसमाचार के कार्य के लिए पूरी मेहनत से सत्य के सिद्धांतों का पालन किया, और जब दिक्कतें पेश आयीं तो परमेश्वर से प्रार्थना की। जब मुझे कोई चीज़ समझ नहीं आयी तो मैं उनके बारे में खोजने और संगति करने भाई-बहनों के पास गयी। मैं जान पाऊँ इससे पहले ही मेरी हालत सुधर चुकी थी, और मैंने अपने कर्तव्य में परमेश्वर का मार्गदर्शन और आशीष देखा। मुझे परिणाम दिखाई देने लगे। इससे गुज़रने के बाद, मुझे लगा कि मैं सत्य का थोड़ा अभ्यास कर सकती हूँ, मैं अभिनेत्री बनने और सबसे अलग दिखने की इच्छा को छोड़ सकती हूँ। मुझे यह भी लगा कि मैं परमेश्वर की आज्ञा मानने लगी हूँ। लेकिन तब ऐसा कुछ घटा कि शोहरत और रुतबे की मेरी ख्वाहिश ने फिर से सिर उठाया।

एक दिन, अगुआ ने मुझसे कहा कि उसे एक संगीत वीडियो में किसी भूमिका के लिए मेरी ज़रूरत है। यह सुन कर मैं बहुत खुश हुई, मैंने सोचा, "अगर इस बार मुझे मुख्य भूमिका के लिए चुन लिया गया, तो फिल्म बन जाने पर जब ऑनलाइन दिखाई जाएगी तब बहुत-से भाई-बहन मुझे देखेंगे। गज़ब हो गया! दिखावे का कितना बढ़िया मौका है! ऐसा मौक़ा बार-बार नहीं मिलता। मुझे बहुत बढ़िया काम करना होगा।" इसके बारे में मैंने जितना ज़्यादा सोचा, मैं उतनी ही खुश हुई, और मैं बड़े आनंद के साथ शूटिंग के लिए निकल गयी। मगर, मुझे यह देख कर हैरत हुई कि मैं जिस शॉट में थी वह पूरी फिल्म में सिर्फ कुछ सेकंड का था, और मेरी भूमिका एक धार्मिक सहकर्मी की थी जो अंत के दिनों के सुसमाचार को साझा करने वाली एक बहन की शिकायत करती है। मैं बुरी तरह टूट गयी। ऐसी खूँखार भूमिका में, परदे पर सिर्फ कुछ सेकंड के लिए दिखना, मैंने सोचा कि जब भाई-बहन यह देखेंगे तो मेरे बारे में क्या सोचेंगे। फिल्म बनने के दौरान मैंने कुछ भाई-बहनों से शिकायत की, "वे हमसे ऐसी बेहूदा भूमिकाएं क्यों करवा रहे हैं? ..." मैंने बोलना ख़त्म भी नहीं किया था कि उनमें से एक ने कहा, "बहन, इस संगीत वीडियो के लिए हर प्रकार की भूमिकाओं की ज़रूरत है। एक मुख्य भूमिका है, और फिर सहायक भूमिकाएं भी ज़रूरी हैं। जो जिस भूमिका के लिए उपयुक्त होता है, उसी के लिए चुना जाता है, और हमें उसे स्वीकार करना होता है। इसके अलावा, हमारा अभिनेता बन कर परमेश्वर के घर के सुसमाचार-कार्य के लिए अपनी भूमिका निभाना हमारा उन्नयन है, फिर भले ही हम कोई भी भूमिका अदा करें!" उसकी यह बात सुन कर मेरा चेहरा तपने लगा। हम ठीक एक ही काम कर रहे थे, लेकिन उसका रवैया बिल्कुल सही था। मैं अपने कर्तव्य के प्रति समर्पित क्यों नहीं हो पा रही हूँ? लेकिन मेरे मन में अभी भी थोड़ा प्रतिरोध का भाव था, यह सोच कर कि, "तुम पहले कभी अभिनेता नहीं रहे हो, इसलिए कोई भी भूमिका निभा कर खुश हो, लेकिन मैं जुदा हूँ। मैं पहले एक मंडली में अभिनेत्री थी और मुझे हमेशा अच्छी भूमिकाएं मिलती थीं, परमेश्वर के घर में मैंने बड़ी भूमिकाएं निभायी हैं, लेकिन अब मुझे ऐसा खूँखार और घटिया किरदार निभाना करना पड़ा। कितनी बेइज़्ज़ती की बात है!" जब संगीत वीडियो अपलोड किया गया तो सभी सचमुच उत्साहित थे, लेकिन मैं उत्साह नहीं जुटा पा रही थी। खुद को उस घटिया भूमिका में देख मैं इतनी परेशान हो गयी कि बयान भी नहीं कर सकती। ऐसी भूमिका में देखने के बाद मेरे परिचित मेरे बारे में क्या सोचेंगे? मैं जानती थी कि मैं गलत मनोदशा में हूँ, इसलिए मैंने परमेश्वर से प्रार्थना की, "हे परमेश्वर! मैं बेचैन और दुखी हूँ, क्योंकि मुझे एक सहायक भूमिका निभानी पड़ी है, एक खलनायिका की, और मैं इसे स्वीकार नहीं कर पायी। खुद को जानने और तुम्हारे आयोजनों और व्यवस्थाओं के आगे समर्पण करने के लिए मेरा मार्गदर्शन करो।"

प्रार्थना करने के बाद मैंने परमेश्वर के ये वचन पढ़े: "भ्रष्ट शैतानी स्वभाव लोगों में बहुत गहराई तक जड़ जमाए हुए है; यह उनका जीवन बन जाता है। लोग ठीक-ठीक क्या खोजते और पाना चाहते हैं? भ्रष्ट शैतानी स्वभाव की संचालक शक्ति के प्रभाव में लोगों के आदर्श, आशाएँ, महत्वाकांक्षाएँ, जीवन-लक्ष्य और दिशाएँ क्या हैं? क्या वे सकारात्मक चीज़ों के विपरीत नहीं चलते? अव्वल तो लोग हमेशा प्रसिद्धि पाना चाहते हैं या मशहूर हस्तियाँ बनना चाहते हैं; वे बहुत प्रसिद्धि और प्रतिष्ठा पाना चाहते हैं, और अपने पूर्वजों का सम्मान बढ़ाना चाहते हैं। क्या ये सकारात्मक चीज़ें हैं? ये सकारात्मक चीज़ों के अनुरूप बिलकुल भी नहीं हैं; यही नहीं, ये मनुष्यजाति की नियति पर परमेश्वर का प्रभुत्व रखने वाली व्यवस्था के विरुद्ध हैं। मैं ऐसा क्यों कहता हूँ? परमेश्वर किस प्रकार का व्यक्ति चाहता है? क्या वह ऐसा व्यक्ति चाहता है, जो महान हो, मशहूर हो, अभिजात हो, या संसार को हिला देने वाला हो? (नहीं।) तो फिर परमेश्वर को किस प्रकार का व्यक्ति चाहिए? उसे ऐसा व्यक्ति चाहिए, जिसके पैर दृढ़ता से ज़मीन पर रखे हों, जो परमेश्वर का एक योग्य प्राणी बनना चाहता हो, जो एक प्राणी का कर्तव्य निभा सकता हो, और जो इंसान बना रह सकता हो। ... तो एक भ्रष्ट शैतानी स्वभाव लोगों के लिए क्या ले आता है? (परमेश्वर का विरोध)। जो लोग परमेश्वर का विरोध करते हैं, उन्हें क्या होती है? (पीड़ा)। पीड़ा? नहीं पीड़ा नहीं बल्कि उनका विनाश होता है! पीड़ा तो इसकी आधी भी नहीं है। जो तुम अपनी आँखों के सामने देखते हो वो पीड़ा, नकारात्मकता, और दुर्बलता है, और यह विरोध और कष्ट है—ये चीज़ें क्या परिणाम लेकर आएँगी? सर्वनाश! यह कोई तुच्छ बात नहीं और यह कोई खिलवाड़ नहीं है।" इस अंश को पढ़ने के बाद, मैंने आत्मचिंतन किया कि मैं क्यों हमेशा केवल मुख्य भूमिका ही निभाना चाहती हूँ। ऐसा इसलिए क्योंकि मुख्य भूमिका करने से मैं दूसरों से प्रशंसा और प्यार पा सकती हूँ, ठीक उन अविश्वासी सितारों की तरह जो जहां भी जाते हैं बहुत-से परिचारक उनके साथ होते हैं, और जिनके हर कदम का अनुसरण होता है, नकल की जाती है। मुझे लगा कि जीने का सिर्फ यही एक गौरवशाली, शानदार तरीका है, जबकि एक छोटी भूमिका, एक सहायक भूमिका करना अपमान की बात है। मैं न तो मशहूर हो सकती थी, न दिखावा कर सकती थी। यही वजह है कि मैं दुखी थी और परमेश्वर द्वारा व्यवस्थित माहौल के आगे समर्पण नहीं कर पा रही थी। आत्मचिंतन से मैंने महसूस किया कि मेरे इस लक्ष्य की वजह ख़ास तौर से यह थी कि मुझ पर ऐसे शैतानी ज़हर का असर हो गया था, "हर एक को अपने पूर्वजों का सम्मान करना चाहिए," "जैसे एक पेड़ अपनी छाल के लिए जीता है, उसी तरह एक मनुष्य अपने चेहरे के लिए जीता है," और "एक व्यक्‍ति जहाँ वह रहता है अपना नाम छोड़ता है, जैसे कि एक हंस जहाँ कहीं उड़ता है आवाज़ करता जाता है।" मैंने इन्हें सकारात्मक लक्ष्य माना, और मुझे लगा कि मुझे सबसे अलग दिखने और सराहे जाने की कोशिश करनी चाहिए, क्योंकि यही है महत्वाकांक्षा और आदर्शों को संजोना। ख़ास तौर से जब मैं मंच पर सितारों को तमाम लोगों से प्रशंसा पाते देखती, तो लगता कि कितना अद्भुत लगता होगा और मुझे वाकई ईर्ष्या होती। मैं ठीक उनके जैसे बनने के लिए तड़पती। यही वजह है कि मैं बचपन से ही एक अभिनेत्री, एक सितारा बनना चाहती थी, और मैंने मिडिल स्कूल पूरा करने से पहले ही एक थिएटर स्कूल में नाम लिखा लिया था। मैं जल्दी उठती और देर से सोती ताकि मैं अपने हुनर का अभ्यास कर यह कला सीख सकूँ। जब मैं मंच पर होती और दर्शक मेरे लिए ज़ोर-शोर से तालियाँ बजाते, तो मैं इसे संजो लेती, लगता जैसे इसके लिए तमाम तकलीफ़ें माफ़ हैं। विश्वासी बनने के बाद भी मैं शोहरत और रुतबे के पीछे भागे बिना नहीं रह सकी। जब मुझे एक अभिनेत्री का काम मिला, तो मैं मुख्य भूमिका पाने और अच्छी फिल्मों में अभिनय करने को तरसने लगी ताकि ज़्यादा लोग मुझे पहचान सकें और मेरे बारे में ऊंची राय बना सकें। पिछले संगीत वीडियो में, निर्देशक ने मुझे एक खूँखार खलनायिका का किरदार दिया था क्योंकि इसी की ज़रूरत थी। मुझे लगा इससे मेरी छवि बिगड़ जाएगी और लोग मेरे बारे में बुरा सोचेंगे, इसलिए मैं इसके आगे समर्पण नहीं कर पायी, और मैंने चोरी-चोरी अपनी शिकायत ज़ाहिर की। मैं बहुत अहंकारी थी, और शोहरत और रुतबे की मेरी ख्वाहिश बड़ी मज़बूत थी! परमेश्वर की अपेक्षा है कि हम योग्य सृजित प्राणी बनें, सत्य के अनुसरण में लगे रहें और उसके प्राणी बन अपना कर्तव्य ठीक ढंग से निभायें, ताकि हम अपने शैतानी स्वभावों को त्याग कर इंसानियत भरी ज़िंदगी जी सकें। लेकिन मैंने सत्य का अनुसरण नहीं किया। मैं हमेशा मुख्य अभिनेत्री, एक सितारा बनाना चाहती थी, ताकि दूसरे मुझे प्यार दे सकें। मैं अपने चारों तरफ लोगों की भीड़ देखना चाहती थी, एक बड़ी भूमिका निभाने के गौरव में दमकना चाहती थी। मेरा लक्ष्य परमेश्वर की अपेक्षा के बिल्कुल विपरीत था। यह स्वर्ग की इच्छा के विरुद्ध था। यह उन मशहूर हस्तियों की तरह था जिन्हें अपने पीछे भीड़ देखना और दूसरों द्वारा नक़ल किया जाना पसंद होता है, जो चाहते हैं कि लोग उन्हें परमेश्वर या परमेश्वरी के रूप में देखें, उनकी आराधना करें। वे जिस रास्ते पर चलते हैं वह बुरा है। परमेश्वर सृजनकर्ता है—इंसान को उसकी आराधना करनी चाहिए और उसे महान मानना चाहिए। यह एक ऐसा सिद्धांत है जिसे बदला नहीं जा सकता। लेकिन एक विश्वासी के रूप में भी, मैं परमेश्वर की आराधना नहीं करती थी या एक सृजित प्राणी के रूप में अपना कर्तव्य नहीं निभाती थी। मैं बस एक अविश्वासी जैसी ही थी, हमेशा मशहूर बनने की उम्मीद लगाये रहती थी ताकि लोग मुझसे प्यार करें और मेरे पीछे आयें। क्या मैं परमेश्वर के स्थान पर खड़े होने की, लोगों के दिल में उसकी जगह लेने की कोशिश नहीं कर रही थी? क्या मैं परमेश्वर की शत्रु नहीं थी? इससे परमेश्वर के स्वभाव का गंभीर अपमान होता है, मैं जानती थी कि अगर मैंने प्रायश्चित नहीं किया तो यकीनन परमेश्वर के धार्मिक दंड की भागीदार बनूंगी! इस मुकाम पर आखिरकार मुझे एहसास हुआ कि सबसे अलग दिखने और सितारा बनने का मेरा निरंतर प्रयास कितना घृणास्पद और भयानक था। मैंने यह भी देखा कि मेरी नाकामयाबियां, मुख्य भूमिकाएं न पाना, महत्वाकांक्षाओं और ख्वाहिशों को हासिल न कर पाना, यह सब परमेश्वर द्वारा मेरी बहुत बड़ी रक्षा थी। समझ आने के बाद यह बात मेरे दिल को छू गयी, और मैंने परमेश्वर से यह प्रार्थना की, "हे परमेश्वर, मैं अब तुम्हारा विरोध और तुम्हारे खिलाफ विद्रोह नहीं करना चाहती, मुझे अब सितारा बनने या दूसरों का प्यार पाने की कोई परवाह नहीं है। मैं सिर्फ आपके आयोजनों और व्यवस्थाओं के आगे समर्पित होना चाहती हूँ, सत्य के अपने अनुसरण में लगे रहना चाहती हूँ, और एक सृजित प्राणी के रूप में सही ढंग से अपना कर्तव्य निभाना चाहती हूँ।"

तब मैंने परमेश्वर के वचनों का यह अंश पढ़ा: "जीवधारियों में से एक होने के नाते, मनुष्य को अपनी स्थिति को बना कर रखना होगा और शुद्ध अंतःकरण से व्यवहार करना होगा। सृष्टिकर्ता के द्वारा तुम्हें जो कुछ सौंपा गया है, कर्तव्यनिष्ठा के साथ उसकी सुरक्षा करो। अनुचित ढंग से आचरण मत करो, या ऐसे काम न करो जो तुम्हारी क्षमता के दायरे से बाहर हों या जो परमेश्वर के लिए घृणित हों। महान या अद्भुत व्यक्ति बनने की चेष्टा मत करो, दूसरों से श्रेष्ठ होने की कोशिश मत करो, न ही परमेश्वर बनने की कोशिश करो। लोगों को ऐसा बनने की इच्छा नहीं करनी चाहिए। महान या अद्भुत व्यक्ति बनने की कोशिश करना बेतुका है। परमेश्वर बनने की कोशिश करना और भी अधिक लज्जाजनक है; यह घृणित है और नीचता भरा है। जो काम तारीफ़ के काबिल है और जिसे प्राणियों को सब चीज़ों से ऊपर मानना चाहिए, वह है एक सच्चा जीवधारी बनना; यही वह एकमात्र लक्ष्य है जिसे पूरा करने का निरंतर प्रयास सब लोगों को करना चाहिए" ("वचन देह में प्रकट होता है" में 'स्वयं परमेश्वर, जो अद्वितीय है I')। परमेश्वर के वचनों ने मुझे अभ्यास का रास्ता दिखाया। यह दिल लगा कर अपना कर्तव्य ठीक ढंग से करना था, और परमेश्वर मुझे जो भी आदेश दे, उसे स्वीकार कर समर्पण करना था, और लगन से उसे पूरा करना था। कलीसिया परमेश्वर की गवाही देने के लिए संगीत वीडियो बनाती है, और मैं नायिका बनूँ या खलनायिका, मुख्य भूमिका करूं या सहायक भूमिका, परमेश्वर के घर को यही चाहिए। भाई-बहन प्रत्येक अभिनेता के रंग-रूप, चाल-चलन के आधार पर उपयुक्त भूमिकाएं तय करते हैं। ये सब परमेश्वर की अनुमति से तय होता है, इसलिए मुझे समर्पण करना चाहिए और दी गयी भूमिका को बढ़िया ढंग से निभाना चाहिए। परमेश्वर परवाह नहीं करता कि मैं मुख्य भूमिका में हूँ या सहायक भूमिका में, या मेरा किरदार कितना पसंद किए जाने योग्य है। वह सिर्फ इसी बात की परवाह करता है कि मैं दिल से उसके आगे समर्पण करती हूँ या नहीं, मैं एक सृजित प्राणी का कर्तव्य निभा रही हूँ या नहीं। यह समझ लेने के बाद मुझे लगा जैसे मेरे दिल से एक भारी बोझ उतर गया है।

उसके बाद मैंने कुछ और फिल्मों में भी काम किया, और हर बार मैंने एक एक्स्ट्रा का ही काम किया। कभी-कभार मैं परेशान हो जाती क्योंकि शोहरत और रुतबे की मेरी ख्वाहिश पूरी नहीं हो पा रही थी, लेकिन मैंने दिल से परमेश्वर से प्रार्थना की और अपनी ग़लत मंशाओं को त्याग दिया, और मैंने पूरे समर्पित भाव से उस भूमिका को निभाया। मैंने सबसे अलग दिखने और सितारा बनने की अपनी एकनिष्ठ खोज को छोड़ दिया, और इसके बदले पूरा दिल लगा कर अपना कर्तव्य निभाया। यह सब परमेश्वर के वचनों के न्याय और ताड़ना से ही हासिल हो पाया, मुझे बचाने के लिए मैं परमेश्वर का धन्यवाद करती हूँ। परमेश्वर का धन्यवाद!

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लेखिका शाओचेंग, शान्‍सी परमेश्वर के वचन कहते हैं: "लोगों को उजागर करने के पीछे परमेश्वर का इरादा उनको हटाने के लिए नहीं, बल्कि उन्हें...

91. "अच्छा" बने रहने को अलविदा

लिन फ़ान, स्पेनमेरा बचपन अपनी सौतेली माँ की चीख़-चिल्लाहट और गालियाँ सुनने में ही बीता है। जब थोड़ी समझदार हुई, तो अपनी माँ और आस-पास के दूसरे...

93. लापरवाही का समाधान करके ही इंसान उपयुक्त ढंग से अपना कर्तव्य निभा सकता है

जिंगशियान, जापानआमतौर पर, सभा या अपनी आध्यात्मिक भक्ति के दौरान, मैं लोगों की लापरवाही को उजागर करने से संबंधित परमेश्वर के वचनों को अक्सर...

वचन देह में प्रकट होता है अंत के दिनों के मसीह के कथन (संकलन) अंत के दिनों के मसीह, सर्वशक्तिमान परमेश्वर के अत्यावश्यक वचन परमेश्वर के दैनिक वचन सर्वशक्तिमान परमेश्वर के वचनों का संकलन मेमने का अनुसरण करो और नए गीत गाओ जीवन में प्रवेश पर उपदेश और वार्तालाप अंत के दिनों के मसीह के लिए गवाहियाँ परमेश्वर की भेड़ें परमेश्वर की आवाज को सुनती हैं (नये विश्वासियों के लिए अनिवार्य चीजें) परमेश्वर की आवाज़ सुनो परमेश्वर के प्रकटन को देखो राज्य के सुसमाचार पर अत्यावश्यक प्रश्न और उत्तर (संकलन) मसीह के न्याय के आसन के समक्ष अनुभवों की गवाहियाँ विजेताओं की गवाहियाँ (खंड I) मैं वापस सर्वशक्तिमान परमेश्वर के पास कैसे गया

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