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15. चूंकि परमेश्वर धर्मी हैं, तो ऐसा क्यों है कि दुष्ट लोग सुख-सुविधा से समृद्ध होते हैं, जबकि अच्छे लोगों को सताया और दबाया जाता है और वे तकलीफें झेलते हैं?

संदर्भ के लिए बाइबल के पद:

"एक धनवान मनुष्य था जो बैंजनी कपड़े और मलमल पहिनता और प्रतिदिन सुख-विलास और धूम-धाम के साथ रहता था। लाजर नाम का एक कंगाल घावों से भरा हुआ उसकी डेवढ़ी पर छोड़ दिया जाता था, और वह चाहता था कि धनवान की मेज पर की जूठन से अपना पेट भरे; यहाँ तक कि कुत्ते भी आकर उसके घावों को चाटते थे। ऐसा हुआ कि वह कंगाल मर गया, और स्वर्गदूतों ने उसे लेकर अब्राहम की गोद में पहुँचाया। वह धनवान भी मरा और गाड़ा गया, और अधोलोक में उसने पीड़ा में पड़े हुए अपनी आँखें उठाईं, और दूर से अब्राहम की गोद में लाजर को देखा। तब उसने पुकार कर कहा, 'हे पिता अब्राहम, मुझ पर दया करके लाजर को भेज दे, ताकि वह अपनी उँगली का सिरा पानी में भिगोकर मेरी जीभ को ठंडी करे, क्योंकि मैं इस ज्वाला में तड़प रहा हूँ।' परन्तु अब्राहम ने कहा, 'हे पुत्र, स्मरण कर कि तू अपने जीवन में अच्छी वस्तुएँ ले चुका है, और वैसे ही लाजर बुरी वस्तुएँ: परन्तु अब वह यहाँ शान्ति पा रहा है, और तू तड़प रहा है। इन सब बातों को छोड़ हमारे और तुम्हारे बीच एक भारी गड़हा ठहराया गया है कि जो यहाँ से उस पार तुम्हारे पास जाना चाहें, वे न जा सकें; और न कोई वहाँ से इस पार हमारे पास आ सके।' उसने कहा, 'तो हे पिता, मैं तुझ से विनती करता हूँ कि तू उसे मेरे पिता के घर भेज, क्योंकि मेरे पाँच भाई हैं; वह उनके सामने इन बातों की गवाही दे, ऐसा न हो कि वे भी इस पीड़ा की जगह में आएँ'" (लूका 16:19-28)।

परमेश्वर के वचन से जवाब:

जो लोग इस जीवन में अच्छा भाग्य प्राप्त करते हैं वे निश्चित रूप से अनंत काल तक पीड़ित होंगे, जबकि जो लोग इस जीवन में कष्ट उठाते हैं वे निश्चित रूप से अनंत काल तक धन्य होंगे—मैंने यह पूर्वनियत किया है और कोई भी इसे बदल नहीं सकता है। कोई भी मेरे हृदय को नहीं बदल सकता है...

"वचन देह में प्रकट होता है" से "सत्तानवेवाँ कथन" से

एक व्यक्ति को कैसे समझना चाहिए, एक व्यक्ति को परमेश्वर के धर्मी स्वभाव को कैसे बूझना चाहिए? कोई इस धार्मिकता को कैसे जान सकता है? धर्मीजन परमेश्वर की आशीष पाता है, और दुष्ट-जन परमेश्वर के श्रापों का भागीदार होता है। ऐसी है परमेश्वर की धार्मिकता, सही है? क्या यह ऐसा ही है? मैं आप सभी से पूछता हूँ, अगर एक धर्मी व्यक्ति ने परमेश्वर की आशीष को प्राप्त नहीं किया हो, ना परमेश्वर की आशीष प्राप्त कर सकता हो, और यदि परमेश्वर उसे आशीषित ना करे, और इसके विपरीत एक बुरा मनुष्य पारिवारिक सम्पत्ति में सम्पन्न होता है, उसके अनेक बच्चे होते हैं, और सब कुछ आराम से सफलतापूर्वक चलता हो, तो क्या यह परमेश्वर की धार्मिकता है? हाँ! हम इसे कैसे समझायें? ऐसी कहावत है कि परमेश्वर भले जन को प्रतिफल और बुरे जन को सज़ा देता है, और यह भी कि प्रत्येक जन अपने कार्यों के अनुसार अपना प्रतिफल पाता है। क्या यह कहावत सही है? अब एक चीज ऐसी भी है: एक व्यक्ति जो परमेश्वर की आराधना करता है वह मारा जाता है या उसे परमेश्वर द्वारा श्राप दिया जाता है, या परमेश्वर ने उसे कभी भी आशीषित नहीं किया है या उस पर कभी ध्यान नहीं दिया है, और उसकी आराधना की भी उपेक्षा होती है। फिर एक बुरा जन है जिसे परमेश्वर ने ना तो आशीषित किया है ना ही सज़ा दी है, परन्तु वह पारिवारिक सम्पत्ति में सम्पन्न है, उसके अनेक बच्चे हैं, और सब कुछ आराम से सफलतापूर्वक चलता है। कुछ लोग कहते हैं: "परमेश्वर धर्मी नहीं है। हम उसकी आराधना करते हैं, फिर भी हम उसकी आशीषों को नहीं पाते हैं। जबकि बुरा जन जिसने उसकी आराधना नहीं की परन्तु उसका विरोध किया, वह हम से हर प्रकार से बेहतर है, हम से अधिक ऊंचा है। परमेश्वर धर्मी नहीं है!" अब इन बातों में आप लोग क्या देखते हैं? इन दोनों उदाहरणों में से जो मैनें अभी दिए हैं, कौन सा उदाहरण परमेश्वर की धार्मिकता की व्याख्या करता है?" कुछ लोग कहते हैं: "यह दोनों ही उदाहरण परमेश्वर की धार्मिकता के हैं!" वे ऐसा यह क्यों कहते हैं? परमेश्वर के स्वभाव के विषय में लोगों के पास जो समझ है वह त्रुटिपूर्ण है। मनुष्य की सम्पूर्ण जानकारी उसकी सोच और दृष्टिकोण के भीतर है, और व्यवसाय के सिद्धान्त से, या अच्छे एवं बुरे या सही एवं गलत के दृष्टिकोण से, या तर्क के दृष्टिकोण से है। अगर आप ऐसे दृष्टिकोण को थामे हुए परमेश्वर को जानने निकले हैं, तो परमेश्वर के अनुरूप होने के लिए कोई मार्ग न होगा, और आप तब भी परमेश्वर का विरोध करेंगे और शिकायत करेंगे। एक भिखारी था जो मूर्ख प्रतीत होता था। उसे केवल परमेश्वर की आराधना करना आता था, परन्तु परमेश्वर बस उसकी उपेक्षा करता था; परमेश्वर ने उसे आशीषित नहीं किया था। शायद आप सोच रहे हैं कि, "भले ही परमेश्वर उसे आने वाले संसार में आशीषित नहीं करेगा, फिर भी परमेश्वर निश्चित रूप से उसे अनंतकाल में आशीष देगा और उसे दस हजार गुना प्रतिफल देगा। क्या यह परमेश्वर को धर्मी ना ठहराएगा? वह अमीर जन, उसने सौ गुना आशीषों का आनन्द लिया है; और उसके बाद हमेशा हमेशा के लिए मिट जाता है। क्या यह भी परमेश्वर की धार्मिकता नहीं है?" …मनुष्यों की धारणाओं के अनुसार, भले को प्रतिफल दिया जाता है और बुरे को सज़ा दी जाती है, बुरे जन को प्रतिफल नहीं मिलना चाहिए; और वे जो कोई बुरा काम नहीं करते हैं उन सभी को प्रतिफल मिलना चाहिए, और उन्हें आशीषित होना चाहिए, क्योंकि परमेश्वर धर्मी है। यह प्रतीत होता है कि लोगों को वह मिलना चाहिए जिसके वे योग्य हैं, और यह कि परमेश्वर को केवल तभी धर्मी कहा जाता है जब लोगों को वह सब मिलता है जिसके वे हकदार हैं। अगर किसी को अपना हिस्सा प्राप्त नहीं हो तो? तब क्या आपको कहना चाहिए कि परमेश्वर धर्मी नहीं है? …परमेश्वर का ज्ञान, जिस तरह से मनुष्य चीज़ों को देखते हैं उसके आधार पर परमेश्वर के विषय में यह या वह कहना नहीं है। जिस तरह से मनुष्य चीज़ों को देखते हैं उसमें कोई सत्य नहीं है। आपको देखना होगा कि परमेश्वर का सार-तत्व क्या है, परमेश्वर का स्वभाव क्या है। लोगों को बाहरी घटना के आधार पर परमेश्वर के सार-तत्व को नहीं देखना चाहिए कि उसने क्या किया है या उसने किसके साथ व्यवहार किया है। स्वयं मानव-जाति को शैतान द्वारा भ्रष्ट कर दिया गया है। वह अनिवार्य रूप से नहीं जानती कि उसका स्वभाव कैसा है, या भ्रष्ट मानव-जाति परमेश्वर के सम्मुख कैसी है, और उसके साथ किस प्रकार का व्यवहार किया जाना चाहिए। अय्यूब पर विचार कीजिए, एक धर्मी मनुष्य जिसे परमेश्वर द्वारा आशीषित किया गया था। यह परमेश्वर की धार्मिकता है। अय्यूब परीक्षणों से गुज़रता है, और शैतान यहोवा से शर्त लगाता है: अय्यूब आपकी आराधना क्यों करता है? ऐसा इसलिए है क्योंकि आप उसे ऐसा प्रतिफल देते हैं। यदि आप उससे सब कुछ ले लेते हैं, क्या तब भी वह आपकी आराधना करेगा? यहोवा परमेश्वर ने कहा, "जब तक तुम उसके प्राणों को हानि न पहुँचाओ, तुम जो मर्जी, चाहे उसके साथ कर सकते हो।" शैतान अय्यूब के पास आया और उसके पश्चात् अय्यूब ने परीक्षाओं का सामना किया। जो कुछ उसके पास था वह ले लिया गया, और उसके बच्चे मर गए। क्या परमेश्वर का धर्मी स्वभाव अय्यूब के परखे जाने में पाया जाता है? हाँ? कहाँ? आप इसे समझा नहीं सकते, सही है? भले ही आप एक धर्मी व्यक्ति हैं, तब भी परमेश्वर के पास आपको जांचने, और आपको परमेश्वर का गवाह होने की अनुमति देने का अधिकार है। परमेश्वर का स्वभाव धर्मी है। वह प्रत्येक से समान व्यवहार करता है, इसका यह अर्थ नहीं है कि धर्मी जन परीक्षाओं को सह सकता है और इसलिए उसे उन से होकर गुज़रने की आवश्यकता नहीं है, यह कि धर्मी जन की सुरक्षा करने की आवश्यकता है। ऐसा नहीं है। उसे आपको जांचने का अधिकार है। यह उसके धर्मी स्वभाव की अभिव्यक्ति है। अंततः, जब अय्यूब परीक्षाओं में से होकर गुजरा और यहोवा की गवाही दी, तब उसने उसे पहले से अधिक आशीषित किया, उसे दुगुनी और बेहतर आशीषें दीं। इसके अलावा, यहोवा उसके सम्मुख प्रकट हुआ, और वायु में होकर उससे बात की; मानो अय्यूब ने उसे आमने-सामने देखा हो। यह एक आशीष है जो उसे दी गई; यह परमेश्वर की धार्मिकता है। क्या हो अगर यह इसके विपरीत हो? यहोवा ने अय्यूब को इन परीक्षाओं को स्वीकार करते, शैतान की उपस्थिति में अपना गवाह बनते, और शैतान को शर्मिन्दा होते देखा था। परन्तु परमेश्वर मुड़ा और उसकी उपेक्षा करता हुआ चला गया। अय्यूब ने बाद में आशीष को प्राप्त नहीं किया था। क्या इसमें परमेश्वर की धार्मिकता है? इससे निरपेक्ष कि परीक्षाओं के बाद अय्यूब आशीषित हुआ था या नहीं, या यहोवा उसके सम्मुख प्रकट हुआ था या नहीं, इन सब में परमेश्वर की भली इच्छा समाविष्ट है। उसके सम्मुख प्रकट होना परमेश्वर की धार्मिकता है, और उसके सम्मुख प्रकट नहीं होना भी परमेश्वर की धार्मिकता है। सृष्टि का भाग होने के नाते, आप किस आधार पर परमेश्वर के आगे मांग रखते हैं? मनुष्य परमेश्वर से माँगने के काबिल नहीं है। परमेश्वर के आगे मांग रखना बहुत ही अनुचित बात है। परमेश्वर जो वह चाहता है करेगा, और परमेश्वर के पास अधिकार है कि वह इस तरह से न करे। उसे अधिकार है कि वह इन बातों को अपने अनुसार संभाले। उसका स्वयं का स्वभाव धर्मी है। धार्मिकता किसी भी प्रकार से निष्पक्ष या तर्क-संगत होना, एक को काटकर दो टुकड़े करना, किये गये कार्य की मात्रा के अनुसार आपको मुआवज़ा देना या आपने जितना काम किया हो उसके अनुसार आपको भुगतान करना बिल्कुल नहीं है। यह परमेश्वर की धार्मिकता नहीं है। आप विश्वास करते हैं कि प्रत्येक व्यक्ति अपने हिस्से का काम करता है, और किए गए कार्य के अनुसार ही बंटवारा होता है, और हर एक व्यक्ति जो करता है उसके अनुसार ही उसे अपना मानदेय मिलता है; इसे छोड़कर धार्मिकता और कुछ नहीं है। …परमेश्वर का सार-तत्व धार्मिकता है। हालांकि यह समझना आसान नहीं कि परमेश्वर क्या करता है, फिर भी जो कुछ वह करता है वह धार्मिकता है। लोग साधारणत: इसे समझ नहीं पाते, इसके विषय में कुछ गलत नहीं है। अपने देखा कि जब परमेश्वर ने पतरस को शैतान को सौंपा, पतरस ने किस प्रकार जवाब दिया "आप जो करते हैं इसका भेद मनुष्य नहीं जान सकता, परन्तु जो कुछ आप करते हैं उसमें आपकी भली इच्छा होती है। उन सब में धार्मिकता होती है। मैं आपकी बुद्धिमता के कार्यों के लिए स्तुति क्यों न करूँ?" …जो कुछ परमेश्वर करता है उसमें वह धर्मी है। हालांकि आप उसे खोज पाने में असमर्थ हैं, फिर भी आपको अपनी इच्छानुसार दोष नहीं लगाना चाहिए। अगर आपको यह तर्कहीन प्रतीत होता है, या आपकी इस विषय में कोई धारणा है, और तब आप कहते हैं कि परमेश्वर धर्मी नहीं, तो यह बहुत ही तर्कहीन है। बस अभी मैंने अन्तर करने हेतु आप लोगों के लिए कुछ नकारात्मक उदाहरण दिये हैं, पर आप लोग बोलने का साहस नहीं करते हैं। आप देखें कि पतरस ने कुछ चीज़ों को समझ से बाहर पाया था, फिर भी उसे निश्चय था कि परमेश्वर की बुद्धि इसमें उपस्थित थी; यह कि इन सब में परमेश्वर की भली इच्छा है।

"मसीह की बातचीतों के अभिलेख" से "परमेश्वर के धर्मी स्वभाव को कैसे समझें" से

पिछला:जिन लोगों ने अनेक वर्षों तक प्रभु यीशु में विश्वास किया है और उत्साह के साथ स्वयं को खपा कर अथक काम किया है, उन्होंने प्रभु के लिए बहुत दुख सहे हैं। क्या ऐसा हो सकता है कि सर्वशक्तिमान परमेश्वर के अंत के दिनों के कार्य को स्वीकार न करने के कारण उनका उद्धार न किया जाए और उन्हें स्वर्ग के राज्य में प्रवेश न मिले?

अगला:क्या सर्वशक्तिमान परमेश्वर में विश्वास करने से कोई व्यक्ति वाकई नष्ट होने से बच जाएगा और अनंत जीवन पायेगा?