20. डायरेक्टर बनने का मेरा सपना

सर्वशक्तिमान परमेश्वर कहते हैं, "अपने जीवन में, यदि मनुष्य शुद्ध होना चाहता है और अपने स्वभाव में परिवर्तन हासिल करना चाहता है, यदि वह एक सार्थक जीवन बिताना चाहता है, और एक जीवधारी के रूप में अपने कर्तव्य को निभाना चाहता है, तो उसे परमेश्वर की ताड़ना और न्याय को स्वीकार करना चाहिए, और उसे परमेश्वर के अनुशासन और परमेश्वर के प्रहार को अपने आप से दूर नहीं होने देना चाहिए, इस प्रकार वह अपने आपको शैतान के छल प्रपंच और प्रभाव से मुक्त कर सकता है और परमेश्वर के प्रकाश में जीवन बिता सकता है। यह जानो कि परमेश्वर की ताड़ना और न्याय ज्योति है, और वह मनुष्य के उद्धार की ज्योति है, और मनुष्य के लिए उससे बेहतर कोई आशीष, अनुग्रह या सुरक्षा नहीं है" ("वचन देह में प्रकट होता है" में 'पतरस के अनुभव: ताड़ना और न्याय का उसका ज्ञान')। मुझे कभी भी इस अंश का वास्तविक ज्ञान नहीं हुआ था। मुझे लगा था आस्था का मतलब परमेश्वर के वचनों को अक्सर पढ़ना, अपने कर्तव्यों को कर्मठता से पूरा करना, और परमेश्वर के कहे अनुसार अभ्यास करना होता है, और यही परमेश्वर की स्वीकृति पाने के लिए काफ़ी है। मैं सोचती थी, हमें परमेश्वर के वचनों के न्याय और ताड़ना को अनुभव करने की ज़रूरत क्यों है? और, जब परमेश्वर लोगों का न्याय करता है, तो क्या वह उन्हें दंड नहीं दे रहा होता है? ऐसा क्यों कहा जाता है कि ताड़ना और न्याय उद्धार और सुरक्षा हैं? परमेश्वर के वचनों के न्याय और ताड़ना को स्वयं अनुभव करने के बाद ही मुझे आख़िरकार इस अंश का कुछ निजी ज्ञान प्राप्त हुआ।

मेरा काम गायक-मंडली में गीत गाना था। मेरे पास हमारे अभिनय की प्रस्तुति को लेकर कुछ सुझाव थे, इसलिए हमारे सुपरवाइज़र चाहते थे कि मैं डायरेक्टरों के समूह के साथ मिलकर योजना बनाऊं। जब मैंने यह ख़बर सुनी, तो मैं वाकई उत्साहित और आभारी थी कि परमेश्वर ने मुझे ऊंचा उठाया है। जब मैं पहली बार डायरेक्टरों के समूह में शामिल हुई, तो मुझे वाकई कुछ कमी का एहसास हुआ, इसलिए मैंने ईमानदारी के साथ परमेश्वर से प्रार्थना की और उस पर विश्वास किया, मैं जो कुछ भी कहती और करती थी, उसमें मैं काफ़ी सतर्क रहती थी। मगर कुछ समय बाद, जब मेरे कुछ सुझावों को मेरे भाई-बहनों ने स्वीकार कर लिया, तब मुझे लगा कि मैं ठीक कर रही हूँ, शायद यह मेरी प्रतिभा के चमकने का समय था। मैं धीरे-धीरे ज़्यादा बातचीत करने लगी और आत्मविश्वास दिखाने लगी। ख़ासकर दूसरों के साथ काम पर चर्चा करते समय, मैं वाकई अपनी योग्यता का दिखावा करना चाहती थी, कई बार तो मैं अपने साथी के बोलने से पहले ही अपनी बात रखने के लिए आतुर हो जाती थी। मेरी साथी मेरे कारण थोड़ी लाचार-सी महसूस कर रही थी। मुझे इस बारे में पता था, मगर उसकी मदद करने और प्यार से उसे संभालने के बजाय, मैंने पूछताछ वाले और अपमानजनक लहज़े के साथ उसे ख़ुद पर ध्यान देने के लिए कह दिया। मेरी बात सुनकर, उसकी हालत सुधरने के बजाय, वह और भी ज़्यादा निराश हो गयी, और उसने यहाँ तक कह दिया कि वह अब ये काम नहीं करना चाहती। उसकी इस हालत के बारे में सुनने के बाद, मैंने सोचा, "यही ठीक होगा, ताकि मैं तुम्हारी जगह ले सकूं।" मगर उसके बाद, परमेश्वर के वचनों को खाने और पीने से उसकी हालत धीरे-धीरे बेहतर हो गयी। मैंने परमेश्वर का धन्यवाद किया, मगर दिल से, मैं इतनी भी ख़ुश नहीं थी। मुझे लगा कि एक अच्छा मौक़ा मेरे हाथ से निकल गया था। मैं वाकई हताश थी, यह सोचती रहती कि क्यों सुपरवाइज़र ने मेरे हुनर को नहीं पहचाना, और क्यों उसने मेरी योग्यताएं नहीं देखी। खुद को साबित करने के लिए, मैं और भी ज़्यादा सख्त और मेहनती बन गयी, और अपने कौशल को बेहतर करने में जुट गयी। बाद में, मेरे कुछ सुझावों को टीम के ज़्यादातर लोगों ने समर्थन दिया और तब मुझे एहसास हुआ कि एक डायरेक्टर बनने के लिए जो कुछ भी चाहिए वह सब मेरे पास है।

इसके कुछ ही समय बाद, सुपरवाइज़र ने मुझे फ़िल्म बनाने वाली टीम में शामिल होने के लिए बुलाया। जब मैंने यह सुना, तो मैंने सोचा, "यही तो डायरेक्टर का काम होता है! ऐसा लगता है वे लोग मुझे डायरेक्टर बनने की ट्रेनिंग दे रहे हैं!" मैं जितना उस बारे में सोचती, मुझे उतनी ही खुशी मिलती। एक बार फ़िल्म के लोकेशन पर, मैंने किसी के भी यह बताने का इंतज़ार नहीं किया कि कोई मुझे क्या करना है। मैंने मेगाफोन उठाया और एक डायरेक्टर की तरह, सबको बताने लगी कि उन्हें क्या-क्या करना है। वहाँ मौजूद भाई-बहनों ने मेरे काम के बारे में मेरी सोच में कुछ गलतियाँ निकालीं, मगर मैं उन पर ज़रा भी ध्यान नहीं देना चाहती थी। मैं यह भी सोचने लगी, "तुम्हें लगता है तुम मुझसे बेहतर हो? क्या तुम्हारे पास कभी भी कोई अच्छा सुझाव था?" मुझे सिर्फ़ अपने "अनूठे दृष्टिकोण" को व्यक्त करने की परवाह थी। यह सोचकर कि इसके बाद मैं डायरेक्टर बन जाऊँगी, मैं बस उस गाने की शूटिंग खत्म करना चाहती थी।

शूटिंग के बाद सुपरवाइज़र ने मुझे बाहर बुलाया, मैंने सोचा, "वह ज़रूर मुझे प्रमोशन देना चाहती होगी।" मैं हैरान रह गई, कि वह मेरे कामों में कुछ गलतियां निकालने के लिए आयी थी। उसने कहा कि मैं घमंडी, ढीठ और तानाशाह बन गयी थी, मैंने अपने भाई-बहनों की सलाह बिल्कुल भी नहीं मानी, और सभी ने मेरे आगे खुद को काफ़ी मजबूर महसूस किया। उसकी बात सुनकर मुझे लगा जैसे किसी ने मेरे सिर पर ठंडे पानी की बाल्टी उड़ेल दी हो। ऐसा महसूस हुआ जैसे मेरा सारा उत्साह पूरी तरह से खत्म हो गया हो। मैंने सोचा, "मैं, और घमंडी? बेशक, मैं बस अपने कामों को काफ़ी गंभीरता से लेती हूँ।" मैं बहुत निराश और बेचैन हो गयी थी। सुपरवाइज़र ने देखा कि मैंने खुद को समझने की बिलकुल भी कोशिश नहीं की, इसलिए उसने मुझे गायक-मंडली में वापस जाने के लिए कह दिया। उस खबर के मिलने से मैं बहुत चिढ़ गयी थी। मैंने सोचा, बस कुछ ही दिनों पहले, मंच पर मेरी उपस्थिति काफ़ी दमदार थी, मगर अब मुझे बेरुख़ी से गायक-मंडली में वापस भेज दिया गया था। लोग क्या सोचेंगे? मुझे सुपरवाइज़र से भी शिकायतें थीं। मैंने सोचा, "मैं डायरेक्टरों के समूह के साथ क्यों नहीं रह सकती? क्या मैंने इसकी कीमत नहीं चुकाई? मैंने बहुत मेहनत की है, भले ही वह बिल्कुल ठीक ना हो।" मैं जितना इस बारे में सोचती, मुझे उतना ही महसूस होता कि मेरे साथ अन्याय हुआ है। गायक-मंडली में भी अभ्यास करने का कोई उत्साह नहीं रहा। मेरी साँसें अटक रही थीं, मैं बेसुरी हो गई थी। मुझे लगा, मैं डायरेक्टरों के समूह में तो शामिल नहीं हो पायी, लेकिन मैं गायक-मंडली की सबसे बुरी सदस्य ज़रूर बन गयी थी। मुझे लगा कि मैं कभी इतनी बुरी तरह से नहीं हारी थी। दूसरों ने मेरी हालत देखी, तो उन्होंने मेरी मदद करने और मुझे सहारा देने की कोशिश की। लेकिन मुझे और भी शर्मिंदगी महसूस हुई। इच्छा हुई कि धरती फटे और मैं उसमें समा जाऊँ। उस दौरान, मैं बहुत लाचार महसूस करने लगी, मुझे समझ में नहीं आया कि मैं किन सत्यों का अभ्यास करूँ। मैं सिर्फ परमेश्वर के सामने जाकर उससे प्रार्थना कर सकती थी, "परमेश्वर, मुझे यह सब अनुभव करना नहीं आता, और मैं तुम्हारी इच्छा भी नहीं समझ पा रही हूँ। मेरी स्थिति बहुत दयनीय है। मैं तुमसे विनती करती हूँ, मेरा मार्गदर्शन करो, ताकि मैं इसमें तुम्हारी इच्छा को समझूँ।"

प्रार्थना के बाद, मैंने परमेश्वर के वचनों का एक अंश पढ़ा। "यद्यपि आज तुम लोग इस चरण तक पहुँच गए हो, तब भी तुम लोगों ने हैसियत को जाने नहीं दिया है, बल्कि इसकी खोज के लिए लगातार संघर्ष करते हो, और इस पर रोज ध्यान देते हो, एक गहरे डर के साथ कि एक दिन तुम लोगों की हैसियत खो जाएगी और तुम लोगों का नाम बर्बाद हो जाएगा। लोगों ने सहुलियत की अपनी अभिलाषा की कभी भी उपेक्षा नहीं की है। ... अब तुम लोग अनुयायी हो, और तुम लोगों को कार्य के इस स्तर की कुछ समझ प्राप्त हो गयी है। हालाँकि, तुम लोगों ने अभी तक हैसियत के लिए अपनी अभिलाषा की उपेक्षा नहीं की है। जब तुम लोगों की हैसियत ऊँची होती है तो तुम लोग अच्छी तरह से खोज करते हो, किन्तु जब तुम्हारी हैसियत निम्न होती है तो तुम लोग अब और खोज नहीं करते हो। हैसियत के आशीष हमेशा तुम्हारे मन में होते हैं। ऐसा क्यों है कि अधिकांश लोग अपने आप को नकारात्मकता से नहीं हटा सकते हैं? क्या उत्तर हमेशा निराशाजनक संभावनाओं के कारण नहीं है?" ("वचन देह में प्रकट होता है" में 'तुम एक विषमता होने के अनिच्छुक क्यों हो?')। मुझे एहसास हुआ कि परमेश्वर के वचन मेरी हालत का बिल्कुल सटीक वर्णन करते हैं। गायक-मंडली में दोबारा शामिल होने के बाद, क्या मेरी नकारात्मकता, शिकायतें और गलतफहमियां सिर्फ़ रुतबा हासिल न होने की मेरी चिढ़ के कारण नहीं थीं? मैंने यह भी सोचा कि जब मैं डायरेक्टरों के समूह में थी, तब सक्रिय रूप से खुद को व्यक्त करने, रातों को जागने, पीड़ा सहन करने और कीमत चुकाने की मेरी क्षमता का कारण यह नहीं था कि मैं परमेश्वर की इच्छा पर विचार करना चाहती थी और परमेश्वर को संतुष्ट करने के लिए अपने कर्तव्य को बखूबी निभाना चाहती थी, बल्कि मेरा एकमात्र उद्देश्य डायरेक्टर का पद हासिल करना था। मेरी भागीदार बहन मेरे साथ असहज महसूस कर रही थी और बुरी हालत में थी, तब मैंने सिर्फ़ उसकी मदद ना करने और प्यार से उसे सहारा ना देने की ही कोशिश नहीं की, बल्कि उसे बाहर निकालने के लिए इंतज़ार भी नहीं किया, ताकि मैं उसकी जगह ले सकूँ। शूटिंग के दौरान, इतने महत्वपूर्ण समय पर, मैं बहुत दंभी और तानाशाह बन गयी थी, भाई-बहनों की सलाह सुनने से इनकार कर रही थी, इसलिए हमें बहुत सारे शॉट फिर से लेने पड़े, इससे परमेश्वर के घर के कार्य की प्रगति में काफ़ी देरी हुई। गायक-मंडली में वापस लौटकर, क्योंकि मुझे वह दर्जा नहीं मिला जो मैं चाहती थी, मैं नकारात्मक बन गयी, मुझे शिकायतें, और ग़लतफ़हमियां थीं, यहां तक कि मैं अपने काम को छोड़ने के बारे में भी सोचने लगी थी, मैं अपने काम ठीक से नहीं कर पा रही थी। मैं जितना उस बारे में सोचती, मुझे उतना ही एहसास होता कि मैं कितनी गलत थी। परमेश्वर के घर ने मुझे डायरेक्टरों के समूह में डालकर मुझे अभ्यास करने का एक मौक़ा दिया था, मगर इसे ख़ुशक़िस्मती समझने के बजाय, मैंने अपने नाम और रुतबे पर ध्यान दिया। मैं रात-रातभर जागी, परेशानियां झेलीं, कीमत भी चुकाई, लेकिन सिर्फ़ रुतबा हासिल करने के लिए, यहाँ तक कि अपने कामों को दिखावा बना दिया। ऐसी हरकतों से परमेश्वर सिर्फ़ मुझसे घृणा और नफ़रत ही कर सकता था। मैंने इस तथ्य पर भी विचार किया कि मेरे पास कोई व्यावसायिक कौशल नहीं था, मगर मुझे सिर्फ़ कोशिश करने की इच्छा से ही पवित्र आत्मा की प्रबुद्धता और उसका मार्गदर्शन मिल गया था। लेकिन बजाय यह सोचूँ कि परमेश्वर को धन्यवाद कैसे दूँ, मैं कुछ तुच्छ उपलब्धियां हासिल करने में उलझ गयी, मैंने इन चीजों का अपनी पूंजी के तौर पर इस्तेमाल किया और बेशर्मी से परमेश्वर की महिमा को चुरा लिया। मैं जितना सोचती, मुझे अपने अंदर विवेक और तर्क की उतनी ही कमी महसूस होती। मैं सोचती, भला मेरी मानसिकता किसी भी मायने में नास्तिकों से अलग कैसे है? इसका एहसास होने पर, मैं परमेश्वर के सामने अपने घुटनों पर गिर गयी और पश्चाताप करने लगी, "परमेश्वर, मैं अपने कर्तव्य को ठीक से पूरा करने में अक्षम रही। मुझे सिर्फ़ नाम और रुतबे की तलाश थी, मैंने परमेश्वर के घर के काम में गंभीर रुकावट डाली, और अपने भाई-बहनों को काफ़ी नुकसान भी पहुँचाया। परमेश्वर! मैं गलत थी, और मैं इसे जारी नहीं रखना चाहती। मैं अपने पाँव मज़बूती से ज़मीन पर रखकर अपने कर्तव्यों को पूरा करना चाहती हूँ।"

बाद में, परमेश्वर द्वारा ऊंचा उठाये जाने के कारण, जल्दी ही कलीसिया के काम की जरूरत के मुताबिक, मैं डायरेक्टरों के समूह में लौट आयी और उन्हीं भाई-बहनों के साथ काम करने लगी। इस बार डायरेक्टरों के समूह में, मैंने लगातार खुद को याद दिलाया कि मुझे अपनी जगह पर बने रहना है, मैं अपनी पद-प्रतिष्ठा को दोबारा आगे बढ़ाने के बारे में नहीं सोच सकती। मगर, क्योंकि मैं अपनी प्रकृति को शायद ही समझ पाई थी, और क्योंकि मैंने अब तक पद-प्रतिष्ठा को आगे बढ़ाने के सार और परिणामों के बारे में नहीं सोचा था, जल्दी ही, जब मेरे कुछ सुझावों को फिर से सभी ने स्वीकार कर लिया और सबकी मंज़ूरी मिल गयी, तो रुतबा हासिल करने की वह इच्छा फिर से मेरे भीतर उभरने लगी, इस हद तक कि मैंने सोचा, "मैं शानदार ढंग से वापसी करना चाहती हूँ और कुछ बड़ा करना चाहती हूँ, मैं सबको यह दिखाना चाहती हूँ कि मैं कितनी सक्षम हूँ।"

एक रिहर्सल के दौरान, जब सभी लोग मेरे निर्देशों के अनुसार लाइन में खड़े थे, उस पल मुझे फिर से किसी डायरेक्टर की तरह महसूस हुआ, जो हर चीज़ का संचालन कर रहा था, और रुतबा पाने की मेरी इच्छा तब तक बढ़ने लगी, जब तक मुझमें परमेश्वर से प्रार्थना करने या उस पर विश्वास करने की कोई इच्छा न हुई, मैं दूसरों को निर्देश देने की खुशी में पूरी तरह से खो गयी। जल्दी ही, मेरे कामों में समस्याएं आने लगीं। मेरी योजनाओं में हमेशा अड़चनें पैदा होने लगीं, और अचानक, मुझे समझ में नहीं आया कि इन समस्याओं को कैसे हल किया जाए। मुझे लगा जैसे कि मेरे आगे के सारे रास्ते बंद हो गए हैं, मैं पवित्र आत्मा की प्रबुद्धता या उसके मार्गदर्शन को महसूस भी नहीं कर पा रही थी। खासकर जब मेरे भाई-बहनों ने मेरे कर्तव्यों के निर्वहन में कुछ गलतियां निकालीं, मैं वाकई भावुक हो गयी थी, यह सोचने लगी कि कहीं उन्हें ऐसा महसूस न हो कि मैं इस काम के लिए योग्य नहीं हूँ। जब सुपरवाइज़र जांच के लिए मेरे पास आयी, तो मुझे लगा जैसे मैं पसोपेश में फँस गयी हूँ। मैंने सोचा, क्या मुझे हटाया जा रहा है? क्या इसका मतलब ये है कि मैं ये काम अब नहीं कर पाऊँगी? जब भाई-बहनों के पास मेरे सुझावों से बेहतर सुझाव थे, तो मुझे और भी ज़्यादा बेचैनी महसूस होने लगी। क्या मेरी जगह किसी और को प्रमोशन दिया जाएगा? मेरा हर दिन निरंतर बेचैनी की स्थिति में बीतने लगा था, और वह बेहद थका देने वाला था। मेरा दिल काम में बिलकुल भी नहीं लग रहा था। मेरे कामों में परेशानियाँ बनी रहीं, मगर मैं खुद को पूरी तरह से निराश महसूस कर रही थी, और मैं अपने भाई-बहनों को इस बारे में बताने की हिम्मत भी नहीं जुटा पा रही थी, क्योंकि मुझे डर था कि अगर उन्हें मेरी सच्चाई का पता चल गया, तो वो मुझे इस काम के काबिल नहीं समझेंगे। इसलिए, मैंने अपने तक ही रखा, इस पर परदा डाल दिया, और बहाने करने लगी, और इसलिए मैं अपनी भूमिका भी नहीं निभा पा रही थी। मैं रुतबा पाने की मानसिकता में रहती थी, मुझे चिंता रहती थी कि मैं क्या खो सकती हूँ, और मेरी हालत ख़राब होती गयी अंत में, इसका असर सीधे परमेश्वर के घर के कार्यों पर पड़ने लगा, काम में काफ़ी देरी होने लगी, और अंत में, मेरा तबादला कर दिया गया। जिस दिन मेरा तबादला हुआ था, मुझे लगा कि मैं एक बार फिर दूसरों को निर्देश देने की भूमिका से खुद निर्देशों का पालन करने की भूमिका में जा रही हूँ। रातों-रात, मैं फिर से रुतबे वाली जगह से नीचे गिरा दी गयी थी। तब, मुझे कुछ भी समझ नहीं आ रहा था। मैं सोचने लगी कि मैं ख़ुद को हमेशा इसी स्थिति में क्यों पाती हूँ। मैं एक डायरेक्टर बनना चाहती थी। क्या ये वाकई इतना मुश्किल था? क्या मुझे एक मौक़ा देना वाकई नामुमकिन था? इस पर सोचते हुए, मैं और ज़्यादा निराश और परेशान हो गयी। सभी भाई-बहन परमेश्वर के लिए प्रशंसा के भजन गाते थे। लेकिन मुझे, अपना रुतबा गंवाने, अपमान सहन करने, और अपने कामों में बदलाव की स्थिति का सामना करना पड़ा, और ख़ासकर जो चीज़ आपको नहीं मिल सकती उसके लिए तरसने की पीड़ा भी सहनी पड़ी, अभ्यास के वो कुछ दिन मुझे वर्षों की पीड़ा की तरह महसूस हुए। मुझे ऐसे भी विचार आने लगे कि मैं परमेश्वर के साथ विश्वासघात कर रही हूँ, मैं अब अपने कर्तव्यों का पालन नहीं करना चाहती थी। मैं खुद को बहुत दयनीय स्थिति में फंसी महसूस करने लगी, जिससे उबरने की क्षमता मुझमें नहीं थी।

फिर एक शाम, जब मैं सीढ़ियों से नीचे उतर रही थी, तो मेरा टखना मुड़ गया। उस समय मेरे सभी भाई-बहन उत्साह के साथ अभ्यास में भाग ले रहे थे, जबकि मैं बस बिस्तर पर पड़ी थी, हिल-डुल भी नहीं पा रही थी। मैं अपना कोई भी काम नहीं कर पा रही थी। मैं दरअसल बेकार थी। मैं सिर्फ़ यही सोच रही थी कि जब मैंने पहली बार इस काम को शुरू किया था, तब मेरे भीतर से क्या प्रकट हुआ था, मैं वापसी करना चाहती थी और वाकई में कुछ बड़ा करना चाहती थी, मगर अब, मैं बहुत ही शर्मनाक स्थिति में पहुँच गयी थी ... जब भी मैं उस बारे में सोचती तो मेरे दिल में दर्द महसूस होता था, और मैं बस खुद से यही सवाल कर सकती थी, मेरी ज़िंदगी इतनी दयनीय क्यों है? मैं खुद को नाम और रुतबा पाने की चाह से रोक क्यों नहीं पायी?

फिर परमेश्वर के वचनों का एक अंश मेरे मन में आया। "शैतान मनुष्य के विचारों को नियन्त्रित करने के लिए प्रसिद्धि एवं लाभ का तब तक उपयोग करता है जब तक लोग केवल और केवल प्रसिद्धि एवं लाभ के बारे में सोचने नहीं लगते। वे प्रसिद्धि एवं लाभ के लिए संघर्ष करते हैं, प्रसिद्धि एवं लाभ के लिए कठिनाइयों को सहते हैं, प्रसिद्धि एवं लाभ के लिए अपमान सहते हैं, प्रसिद्धि एवं लाभ के लिए जो कुछ उनके पास है उसका बलिदान करते हैं, और प्रसिद्धि एवं लाभ के वास्ते वे किसी भी प्रकार की धारणा बना लेंगे या निर्णय ले लेंगे। इस तरह से, शैतान लोगों को अदृश्य बेड़ियों से बाँध देता है और उनके पास इन्हें उतार फेंकने की न तो सामर्थ्‍य होती है न ही साहस होता है। वे अनजाने में इन बेड़ियों को ढोते हैं और बड़ी कठिनाई से पाँव घसीटते हुए आगे बढ़ते हैं। इस प्रसिद्धि एवं लाभ के वास्ते, मनुष्यजाति परमेश्वर को दूर कर देती है और उसके साथ विश्वासघात करती है, तथा निरंतर और दुष्ट बनती जाती है। इसलिए, इस प्रकार से एक के बाद दूसरी पीढ़ी शैतान के प्रसिद्धि एवं लाभ के बीच नष्ट हो जाती है" ("वचन देह में प्रकट होता है" में 'स्वयं परमेश्वर, जो अद्वितीय है VI')। जब मैंने परमेश्वर के वचन के इस अंश को पढ़ा, तो मैं समझ गयी कि शैतान लोगों को बहकाने और उन पर काबू पाने के लिए नाम और पैसे का इस्तेमाल करता है, और लोग जितना ज़्यादा नाम और पैसे के पीछे भागते हैं, वे उतने ही दुखी और भ्रष्ट बन जाते हैं। अतीत में, मैंने कभी ऐसा नहीं सोचा था कि उसमें कुछ गलत है, और ये शैतानी सिद्धांत जैसे कि "हर एक को अपने पूर्वजों का सम्मान करना चाहिए," "आदमी ऊपर की ओर के लिए संघर्ष करता है; पानी नीचे की ओर बहता है," और "एक व्यक्‍ति जहाँ वह रहता है अपना नाम छोड़ता है, जैसे कि एक हंस जहाँ कहीं उड़ता है आवाज़ करता जाता है" ऐसी चीजें थीं, जिन्हें मैं जीवन जीने के सिद्धांत मानती थी। मैंने सोचा कि यही वो चीज़ है जिसकी लोगों को तलाश करनी चाहिए, और सिर्फ़ यही चीज़ें प्रेरणादायी हैं, इसलिए स्कूल में और परमेश्वर के घर में अपने कर्तव्यों में, मैं इन्हीं शैतानी सिद्धांतों के अनुसार जीवन जीती रही, ऊंची प्रतिष्ठा, रुतबे के पीछे भागती रही, और दूसरों का ध्यान खींचने के लिए काम करती रही। मैं दूसरों से बेहतर दिखने की कोशिश करती थी। मैं किसी आम इंसान की तरह नहीं बनना चाहती थी, इसलिए जब मुझे डायरेक्टरों के समूह में फिर से काम करने का मौका मिला, तो मुझमें डायरेक्टर का दर्जा पाने का जुनून सवार हो गया था, क्योंकि मैंने सोचा कि दूसरों का ध्यान खींचने का यही एकमात्र तरीका है और ऐसे ही मैं अपने आस-पास के लोगों को आदेश दे सकती हूँ। इसलिए, जब मैं फिर से मॉनिटर के सामने खड़ी होकर, आस-पास के लोगों को आदेश दे रही थी तो मुझे बहुत मज़ा रहा था। मुझे लगा कि नाम और पैसे के लिए किसी भी पीड़ा को झेलना या इसके लिए कोई भी कीमत चुकाना मुनासिब है, लेकिन नाम या पैसे के बिना, मैं दुखी थी, ऐसा लगता था जैसे इनके बिना जीवन बेकार है। मुझे सचमुच ऐसा लगता था कि मैं नाम पाने के विचार के किसी अदृश्य बंधनों में बंध गयी हूँ, और मैं उन्हें खोल देना चाहती थी, मगर ऐसा कर नहीं पा रही थी। मैं शायद उस हालत में अपने भाई-बहनों के साथ तालमेल बिठाकर काम नहीं कर सकती थी। मैं सिर्फ़ परमेश्वर के घर के काम में अड़चन और बाधा डाल सकती थी। इतना ही नहीं, मैंने देखा कि नाम और पैसे के पीछे भागना वास्तव में सही मार्ग नहीं है। परमेश्वर इस स्थिति में रहने वालों से घृणा करता है, और लोग भी इससे चिढ़ जाते हैं। अपने दो बार के उत्थान और पतन पर सोचने पर, मुझे पता चला कि वास्तव में मेरे लिए यह परमेश्वर का महान उद्धार था। रुतबा हासिल करने की मेरी इच्छा बहुत प्रबल थी, मुझे इन परीक्षणों और शुद्धिकारणों का अनुभव करने की ज़रूरत थी, ताकि मैं खुद परमेश्वर के समक्ष जाकर आत्ममंथन करूं, खुद को जानने की कोशिश करूं, और उनके सामने पश्चाताप करूं। तभी मैं सत्य की तलाश कर सकती थी और इन भ्रष्ट शैतानी स्वभावों से बच सकती थी। यह मेरे लिये परमेश्वर का उद्धार था। मैंने व्यक्तिगत रूप से अनुभव किया कि कैसे परमेश्वर की ताड़ना, उसका न्याय, काट-छांट, व्यवहार, परीक्षण और शुद्धिकरण वाकई लोगों के लिए उसके सबसे महान उद्धार और संरक्षण हैं! हालांकि ये प्रक्रियाएं कुछ हद तक पीड़ादायक थीं, लेकिन वे मेरे जीवन स्वभाव को बदलने के लिए बहुत फ़ायदेमंद भी थीं। जब मुझे इसका एहसास हुआ, तो मैं प्रार्थना और पश्चाताप करने के लिए खुद दंडवत हो गयी: "परमेश्वर! मैं गलत थी, मैं वाकई गलत थी। मुझे शैतान के प्रभाव में होने और नाम, पैसा, और रुतबा पाने के पीछे भागने की दयनीयता और पीड़ा के बारे में पता चल गया था। तुमने मेरे साथ न्याय किया, मुझे अनुशासित किया, इस तरह मेरी आखें खोलीं। यह सब तुम्हारा महान उद्धार और मेरे लिए प्यार था। परमेश्वर, अब मैं नाम, पैसा, और रुतबा नहीं पाना चाहती। अब मैं बिल्कुल भी नहीं लड़ूँगी। भविष्य में चाहे मुझे कोई भी आज्ञा या काम मिले, मैं खुद को उसे समर्पित कर दूँगी।" "मैं सिर्फ़ एक सृजित प्राणी के रूप में अपने कामों को करना चाहती हूँ।"

जल्दी ही, कलीसिया ने मुझे सूचित किया कि अगर मेरे टखने के उपचार पर कोई बुरा असर न पड़े, तो मैं अभ्यासों में दोबारा शामिल हो सकती हूँ। यह खबर सुनना बहुत ही उत्साहजनक था, और मुझे इस काम को करने का मौक़ा मिल गया था। भले ही यह सिर्फ एक छोटा सा हिस्सा था, मेरे लिए, यह बहुत कीमती था, और बड़ी मुश्किल से आया था। विशेष रूप से, यह उस दृश्य में शामिल हो गया था जिस पर मैंने काम किया था: विश्वासियों का एक समूह दुखी जीवन जीता है, बड़े लाल अजगर द्वारा सताया जाता है, हर तरह के शैतानी विषों से घिरा रहता है, उन्हें इस हद तक सताया जाता है कि वे ठीक से साँस भी नहीं ले पाते हैं। वे रोते हैं, संघर्ष करते हैं, मगर इससे कोई मदद नहीं मिलती, और जब परमेश्वर का प्रकाश उस अंधेरी भूमि पर गिरता है, तभी जाकर हर कोई अंधकार की शक्तियों के बंधन से मुक्त हो सकता है, क्योंकि तब वे परमेश्वर की वाणी सुनते हैं और उन्हें परमेश्वर का उद्धार मिलता है। उस दृश्य पर काम करना वाकई मेरे लिए दिल को छू लेने वाला था, क्योंकि मुझे लगा कि मैं भी उसी अवस्था में थी। मैं इतने लंबे समय तक एक अंधेरी जगह में बंधन में रही थी, मैंने नाम, पैसा, और रुतबा पाने के बंधनों में बहुत पीड़ा झेली थी, इसलिए हर बार जब भी प्रकाश की किरण नीचे आती, तो मेरे दिल को बेहद छू जाती थी, मैं परमेश्वर की बहुत आभारी थी जो उसने नाम, पैसा, और रुतबे के बंधनों से बचने में मेरा मार्गदर्शन किया।

एक दिन सुपरवाइज़र मुझसे मिलने आयी और मुझे एक बहन के लिए स्टेज ब्लॉकिंग करने को कहा। पहले तो मैंने सोचा, "यह ठीक है कि मैं मंच पर नहीं जा सकती, लेकिन अब मुझे किसी और के लिए स्टेज ब्लॉक करना होगा।" लेकिन फिर मुझे एहसास हुआ कि रुतबा पाने की मेरी इच्छा फिर से अपना सिर उठाने लगी है। इसलिए, मैंने परमेश्वर से प्रार्थना की, और तब मुझे एक भजन के बोल याद आये। "हे परमेश्वर, चाहे मेरी हैसियत हो या नहीं, अब मैं स्वयं को समझती हूँ। यदि मेरी हैसियत ऊँची है तो यह तेरे उत्कर्ष के कारण है, और यदि यह निम्न है तो यह तेरे आदेश के कारण है। सब कुछ तेरे हाथों में है। मेरे पास न तो कोई विकल्प हैं ना ही कोई शिकायतें हैं। तूने निश्चित किया कि मैं इस देश में और इन लोगों के बीच पैदा हूँगी, और मुझे केवल तेरे प्रभुत्व के अधीन पूरी तरह से आज्ञाकारी होना चाहिए क्योंकि सब कुछ उसी के भीतर है जो तूने निश्चित किया है" ("मेमने का अनुसरण करो और नए गीत गाओ" में 'मैं हूँ बस एक अदना सृजित प्राणी')। उसके बाद जितने भी अभ्यास हुए, मैंने खुद को पूरी तरह से उसमें लगा दिया, और इस बहन कोलिए मैंने बहुत से सुझाव दिए। मैंने सोचा, शायद मैं इतना ज़्यादा प्रभाव नहीं डाल रही हूँ, मगर उस तरह से अपना कर्तव्य निभाने में मैंने काफ़ी सुरक्षित महसूस किया। सुपरवाइज़र ने बाद में मेरे लिए एक और बहन के लिए स्टेज ब्लॉकिंग करने की व्यवस्था की। मुझे न सिर्फ़ पोजीशन को ठीक करना था, बल्कि मुझे उसके लिए मोशन भी तैयार करने थे। जब मुझे यह काम मिला, तो ऐसा लगा कि यह मेरे लिए परमेश्वर की परीक्षा है। अब कोई नाम, कोई पैसा, और कोई रुतबे की चाह नहीं थी। परमेश्वर यह देखना चाहता था कि मैं खुद को अपने काम के प्रति समर्पित कर पाती हूँ या नहीं। इसलिए, मैंने ईमानदारी से परमेश्वर से प्रार्थना की, और उनके मार्गदर्शन में, सब कुछ बहुत आसानी से और बहुत जल्दी हो गया। जब मैंने अपनी बहन को अपना काम सौंपा, तो मुझे एहसास हुआ कि मैंने अपने कामों में खुद को इतना सुरक्षित कभी महसूस नहीं किया था। मैंने अपने लिए कोई मोलभाव नहीं किया था, और इसमें मेरे अपने इरादों की मिलावट भी नहीं थी। यह सब परमेश्वर के वचन की मेरी समझ पर आधारित था, और क्योंकि मैं सत्य का अभ्यास करना चाहती थी, इसलिए मैंने यह कर्तव्य निभाया। मुझे लगा कि इस तरह अपने कर्तव्यों का निर्वहन करना बहुत ही अच्छा है।

कुछ समय बाद, कुछ भाई-बहनों ने मुझे बताया, "अब तुम अपने कामों में काफ़ी सरल हो गयी हो। अब तुम पहले की तरह चिड़चिड़ी और घमंडी नहीं हो।" यह सुनकर, मैं गहराई से जानती थी कि ये परिणाम मुझमें परमेश्वर की ताड़ना और उसके न्याय के कारण आये हैं। नाम, पैसा, और रुतबे की चाह की बेड़ियों से बचने में परमेश्वर ने ही कदम-कदम पर मेरा मार्गदर्शन किया है। इसके कुछ ही समय बाद, सुपरवाइज़र ने मुझे सूचित किया कि मुझे एक डायरेक्टर का काम दिया जा रहा है। जब मैंने यह खबर सुनी, तो मैं बता नहीं सकती कि मैं कितनी खुश थी। मुझे लगा कि मुझे उतना गर्व और खुशी महसूस नहीं हो रही जितनी कि मुझे एक साल पहले हुई थी, जब मुझे वह काम सौंपा गया था, और मैं समझ गयी कि यह एक आदेश है, एक जिम्मेदारी है जो परमेश्वर ने मुझे दी है, और मैं परमेश्वर के अच्छे इरादों को अब बेहतर ढंग से समझ पा रही थी। मुझे एहसास हुआ कि उन सभी हालात से गुजरना मेरे जीवन को कठिन बनाने के लिए या मुझे नष्ट करने के लिए नहीं था। वह सब मेरे भ्रष्ट स्वभाव और मेरे दूषित मंसूबों को शुद्ध करने के लिए था। परमेश्वर के वचन जो उजागर करते हैं और तथ्यों से जो पता चलता है उनसे, मैंने वास्तव में यह देखा कि शैतान ने मुझे कितनी गहराई से भ्रष्ट किया था, परमेश्वर के वचनों के न्याय, ताड़ना, व्यवहार और अनुशासन के बिना, मैं कभी भी इन शैतानी स्वभावों से बचकर नहीं निकल पाती या ख़ासकर शैतान की काली शक्तियों और बंधन से खुद को मुक्त नहीं कर पाती। तभी मुझे सचमुच यह अनुभव हुआ कि परमेश्वर की ताड़ना, उसका न्याय, परीक्षण और शुद्धिकरण वास्तव में मेरे लिए परमेश्वर के महानतम सुरक्षा और उद्धार हैं।

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