28. पवित्र आत्मा के कार्य और बुरी आत्माओं के काम के बीच क्या अंतर है?

परमेश्वर के प्रासंगिक वचन:

तुम्हें यह समझना चाहिए कि क्या है, जो परमेश्वर से आता है और क्या है, जो शैतान से आता है। जो परमेश्वर से आता है, वह तुम्हें पहले से अधिक स्पष्टता-युक्त दूरदृष्टि देता है और ईश्वर के पहले से अधिक निकट लाता है; तुम अपने भाइयों और बहनों के साथ सच्चा प्यार साझा करते हो, तुम परमेश्वर के दायित्व-भार के प्रति विचारशीलता दिखाने में सक्षम होते हो, और तुम्हारा दिल परमेश्वर-प्रेमी हो जाता है, जो कभी घटता नहीं है। चलने के लिए तुम्हारे सामने एक मार्ग होता है। जो शैतान से आता है, वह तुम्हारी दूरदृष्टि खोने का कारण बनता है, और जो कुछ तुम्हारे पास पहले होता है, वह सब चला जाता है; तुम परमेश्वर से विमुख हो जाते हो, भाइयों और बहनों के लिए तुम्हारे पास कोई प्यार नहीं होता, और तुम्हारा दिल घृणा से भर जाता है। तुम बेताब हो जाते हो, तुम अब कलीसियाई जीवन नहीं जीना नहीं चाहते, और तुम्हारा दिल अब परमेश्वर-प्रेमी नहीं रहता। यह शैतान का काम है, और दुष्ट आत्माओं द्वारा किए गए काम का परिणाम भी है।

— "वचन देह में प्रकट होता है" में 'आरंभ में मसीह के कथन' के 'अध्याय 22' से उद्धृत

परमेश्वर अपने कार्य को दोहराता नहीं है, वह ऐसा कार्य नहीं करता है जो वास्तविक न हो, वह मनुष्यों से अत्याधिक अपेक्षाएँ नहीं रखता है और वह ऐसा कार्य नहीं करता है जो मनुष्यों की समझ से परे हो। वह जो कुछ भी कार्य करता है मनुष्य की सामान्य समझ के दायरे के भीतर है, और सामान्य मानवता की समझ से परे नहीं है, और उसका कार्य मनुष्य की सामान्य अपेक्षाओं के अनुसार है। यदि यह पवित्र आत्मा का कार्य है, तो मनुष्य हमेशा से अधिक सामान्य बन जाता है, और उसकी मानवता हमेशा से अधिक सामान्य बन जाती है। मनुष्य को अपने शैतानी स्वभाव का, और मनुष्य के सार का बढ़ता हुआ ज्ञान होता है, और उसकी सत्य के लिए हमेशा से अधिक ललक होती है। अर्थात्, मनुष्य का जीवन अधिकाधिक बढ़ता जाता है और मनुष्य का भ्रष्ट स्वभाव अधिकाधिक बदलावों में सक्षम हो जाता है—जिस सब का अर्थ है परमेश्वर का मनुष्य का जीवन बनना। यदि एक मार्ग उन चीजों को प्रकट करने में असमर्थ है जो मनुष्य का सार हैं, मनुष्य के स्वभाव को बदलने में असमर्थ है, और, इसके अलावा, उसे परमेश्वर के सामने लाने में असमर्थ है या उसे परमेश्वर की सच्ची समझ प्रदान कराने में असमर्थ है, और यहाँ तक कि उसकी मानवता का हमेशा से अधिक निम्न होने और उसकी भावना का हमेशा से अधिक असामान्य होने का कारण बनता है, तो यह मार्ग अवश्य सच्चा मार्ग नहीं होना चाहिए और यह दुष्टात्मा का कार्य, या पुराना मार्ग हो सकता है। संक्षेप में, यह पवित्र आत्मा का वर्तमान का कार्य नहीं हो सकता है।

— "वचन देह में प्रकट होता है" में 'जो परमेश्वर को और उसके कार्य को जानते हैंकेवल वे ही परमेश्वर को सन्तुष्ट कर सकते हैं' से उद्धृत

पवित्र आत्मा का कार्य सक्रिय अगुवाई करना और सकारात्मक प्रकाशन है। यह लोगों को निष्क्रिय नहीं बनने देता है। यह उनको राहत पहुँचाता है, उन्हें विश्वास और दृढ़ निश्चय देता है और यह परमेश्वर के द्वारा सिद्ध किए जाने का अनुसरण करने के लिए उन्हें योग्य बनाता है। जब पवित्र आत्मा कार्य करता है, तो लोग सक्रिय रूप से प्रवेश कर सकते हैं; वे निष्क्रिय नहीं होते और उन्हें बाध्य भी नहीं किया जाता, बल्कि वे सक्रिय रहते हैं। जब पवित्र आत्मा कार्य करता है तो लोग प्रसन्न और इच्छापूर्ण होते हैं, और वे आज्ञा मानने के लिए तैयार होते हैं, और स्वयं को दीन करने में प्रसन्न होते हैं, और यद्यपि भीतर से पीड़ित और दुर्बल होते हैं, फिर भी उनमें सहयोग करने का दृढ़ निश्चय होता है, वे ख़ुशी-ख़ुशी दुःख सह लेते हैं, वे आज्ञा मान सकते हैं, और वे मानवीय इच्छा से निष्कलंक रहते हैं, मनुष्य की विचारधारा से निष्कलंक रहते हैं, और निश्चित रूप से मानवीय अभिलाषाओं और अभिप्रेरणाओं से निष्कलंक रहते हैं। जब लोग पवित्र आत्मा के कार्य का अनुभव करते हैं, तो वे भीतर से विशेष रूप से पवित्र हो जाते हैं। जो पवित्र आत्मा के कार्य को अपने अंदर रखते हैं वे परमेश्वर के प्रति प्रेम को और अपने भाइयों और बहनों के प्रति प्रेम को अपने जीवनों से दर्शाते हैं, और ऐसी बातों में आनंदित होते हैं जो परमेश्वर को आनंदित करती हैं, और उन बातों से घृणा करते हैं जिनसे परमेश्वर घृणा करता है। ऐसे लोग जो पवित्र आत्मा के कार्य के द्वारा स्पर्श किए जाते हैं, उनमें सामान्य मनुष्यत्व होता है, और वे निरंतर सत्य का अनुसरण करते हैं और उनके पास मानवता होती है। जब पवित्र आत्मा लोगों के भीतर कार्य करता है, तो उनकी परिस्थितियाँ और अधिक बेहतर हो जाती हैं और उनका मनुष्यत्व और अधिक सामान्य हो जाता है, और यद्यपि उनका कुछ सहयोग मूर्खतापूर्ण हो सकता है, परंतु फिर भी उनकी प्रेरणाएँ सही होती हैं, उनका प्रवेश सकारात्मक होता है, वे रूकावट बनने का प्रयास नहीं करते और उनमें कुछ भी दुर्भाव नहीं होता। पवित्र आत्मा का कार्य सामान्य और वास्तविक होता है, पवित्र आत्मा मनुष्य के भीतर मनुष्य के सामान्य जीवन के नियमों के अनुसार कार्य करता है, और वह सामान्य लोगों के वास्तविक अनुसरण के अनुसार लोगों को प्रकाशित करता है और उन्हें अगुवाई देता है। जब पवित्र आत्मा लोगों में कार्य करता है तो वह सामान्य लोगों की आवश्यकता के अनुसार अगुवाई करता और प्रकाशित करता है, वह उनकी आवश्यकताओं के अनुसार उनकी जरूरतों को पूरा करता है, और वह सकारात्मक रूप से उनकी कमियों और अभावों के आधार पर उनकी अगुवाई करता है और उनको प्रकाशित करता है; पवित्र आत्मा का कार्य वास्तविक जीवन में लोगों को प्रबुद्ध करने और उनका मार्गदर्शन करने का है; अगर वे अपने वास्तविक जीवन में परमेश्वर के वचनों का अनुभव करें तभी वे पवित्र आत्मा के कार्य को देख सकते हैं। यदि अपने दिन-प्रतिदिन के जीवन में लोग सकारात्मक अवस्था में हों और उनके पास एक सामान्य आत्मिक जीवन हो, तो उनमें पवित्र आत्मा के कार्य पाए जाते हैं। ऐसी अवस्था में, जब वे परमेश्वर के वचनों को खाते और पीते हैं तो उनमें विश्वास आता है, जब वे प्रार्थना करते हैं, तो वे प्रेरित होते हैं, जब उनके साथ कुछ घटित होता है तो वे निष्क्रिय नहीं होते, और उनके साथ कुछ घटित होते समय वे उन सबकों या सीखों को देख सकते हैं जो परमेश्वर चाहता है कि वे सीखें, और वे निष्क्रिय, या कमजोर नहीं होते, और यद्यपि उनके जीवन में वास्तविक कठिनाइयाँ होती हैं, फिर भी वे परमेश्वर के सभी प्रबंधनों की आज्ञा मानने के लिए तैयार रहते हैं।

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शैतान की ओर से कौन से कार्य आते हैं? उस कार्य में जो शैतान की ओर से आता है, ऐसे लोगों में दर्शन अस्पष्ट और धुंधले होते हैं, और वे सामान्य मनुष्यत्व के बिना होते हैं, उनमें उनके कार्यों के पीछे की प्रेरणाएँ गलत होती हैं, और यद्यपि वे परमेश्वर से प्रेम करना चाहते हैं, फिर भी उनके भीतर सदैव दोषारोपण रहते हैं, और ये दोषारोपण और विचार उनमें सदैव हस्तक्षेप करते रहते हैं, जिससे वे उनके जीवन की बढ़ोतरी को सीमित कर देते हैं और परमेश्वर के समक्ष सामान्य परिस्थितियों को रखने से उन्हें रोक देते हैं। कहने का अर्थ है कि जैसे ही लोगों में शैतान का कार्य आरंभ होता है, तो उनके हृदय परमेश्वर के समक्ष शांत नहीं हो सकते, उन्हें नहीं पता होता कि वे स्वयं के साथ क्या करें, सभा का दृश्य उन्हें वहाँ से भाग जाने को बाध्य करता है, और वे तब अपनी आँखें बंद नहीं रख पाते जब दूसरे प्रार्थना करते हैं। दुष्ट आत्माओं का कार्य मनुष्य और परमेश्वर के बीच के सामान्य संबंध को तोड़ देता है, और लोगों के पहले के दर्शनों या उनके जीवन प्रवेश के पिछले मार्ग को बिगाड़ देता है, अपने हृदयों में वे कभी परमेश्वर के करीब नहीं आ सकते, ऐसी बातें निरंतर होती रहती हैं जो उनमें बाधा उत्पन्न करती हैं और उन्हें बंधन में बाँध देती हैं, और उनके हृदय शांति प्राप्त नहीं कर पाते, जिससे उनमें परमेश्वर से प्रेम करने की कोई शक्ति नहीं बचती, और उनकी आत्माएँ पतन की ओर जाने लगती हैं। शैतान के कार्यों के प्रकटीकरण ऐसे हैं। शैतान का कार्य निम्न रूपों में प्रकट होता है अपने स्थान और गवाही में स्थिर खड़े नहीं रह सकना, तुम्हें ऐसा बना देना जो परमेश्वर के समक्ष दोषी हो, और जिसमें परमेश्वर के प्रति कोई विश्वासयोग्यता न हो। शैतान के हस्तक्षेप के समय तुम अपने भीतर परमेश्वर के प्रति प्रेम और वफ़ादारी को खो देते हो, तुम परमेश्वर के साथ एक सामान्य संबंध से वंचित कर दिए जाते हो, तुम सत्य या स्वयं के सुधार का अनुसरण नहीं करते, तुम पीछे हटने लगते हो, और निष्क्रिय बन जाते हो, तुम स्वयं को आसक्त कर लेते हो, तुम पाप के फैलाव को खुली छूट दे देते हो, और पाप से घृणा भी नहीं करते; इससे बढ़कर, शैतान का हस्तक्षेप तुम्हें स्वच्छंद बना देता है, यह तुम्हारे भीतर से परमेश्वर के स्पर्श को हटा देता है, और तुम्हें परमेश्वर के प्रति शिकायत करने और उसका विरोध करने को प्रेरित करता है, जिससे तुम परमेश्वर पर सवाल उठाते हो, और फिर तुम परमेश्वर को त्यागने तक को तैयार होने लगते हो। यह सब शैतान का कार्य है।

— "वचन देह में प्रकट होता है" में 'पवित्र आत्मा का कार्य और शैतान का कार्य' से उद्धृत

परमेश्वर सौम्य, प्यारे, कोमल और परवाह करने के तरीके से कार्य करता है, जो असाधारण रूप से नपा-तुला और उचित होता है। उसका तरीका तुम्हारे भीतर तीव्र भावनात्मक प्रतिक्रियाएँ उत्पन्न नहीं करता, जैसे कि : "परमेश्वर को मुझे यह करने देना चाहिए" या "परमेश्वर को मुझे वह करने देना चाहिए चाहिए।" परमेश्वर कभी तुम्हें उस किस्म की मानसिक या भावनात्मक तीव्रता नहीं देता, जो चीज़ों को असहनीय बना देती है। क्या ऐसा नहीं है? यहाँ तक कि जब तुम परमेश्वर के न्याय और ताड़ना के वचनों को स्वीकार करते हो, तब तुम कैसा महसूस करते हो? जब तुम परमेश्वर के अधिकार और सामर्थ्य को समझते हो, तब तुम कैसा महसूस करते हो? क्या तुम महसूस करते हो कि परमेश्वर दिव्य और अलंघनीय है? (हाँ।) क्या उस समय तुम अपने और परमेश्वर के बीच दूरी महसूस करते हो? क्या तुम्हें परमेश्वर से डर लगता है? नहीं—बल्कि तुम परमेश्वर के लिए भयपूर्ण श्रद्धा महसूस करते हो। क्या लोग ये चीज़ें परमेश्वर के कार्य के कारण महसूस नहीं करते? ...

... तो जहाँ तक मनुष्य पर शैतान के कार्य का संबंध है, तो मेरे पास दो वाक्यांश हैं, जो शैतान की दुर्भावना और दुष्ट प्रकृति की व्याख्या अच्छी तरह से कर सकते हैं, जिससे सच में तुम लोग शैतान की घृणा को जान सकते हो : मनुष्य के प्रति अपने नज़रिये में शैतान हमेशा हर मनुष्य पर इस सीमा तक बलपूर्वक कब्ज़ा करना और उस पर काबू करना चाहता है, जहाँ वह मनुष्य पर पूरा नियंत्रण हासिल कर ले और उसे कष्टप्रद तरीके से नुकसान पहुँचाए, ताकि वह अपना उद्देश्य और वहशी महत्वाकांक्षा पूरी कर सके। "बलपूर्वक कब्जा" करने का क्या अर्थ है? क्या यह तुम्हारी सहमति से होता है, या बिना तुम्हारी सहमति के? क्या यह तुम्हारी जानकारी से होता है, या बिना तुम्हारी जानकारी के? उत्तर है कि यह पूरी तरह से बिना तुम्हारी जानकारी के होता है! यह ऐसी स्थितियों में होता है, जब तुम अनजान रहते हो, संभवतः उसके तुमसे बिना कुछ कहे या तुम्हारे साथ बिना कुछ किए, बिना किसी प्रस्तावना के, बिना प्रसंग के—शैतान वहाँ होता है, तुम्हारे इर्द-गिर्द, तुम्हें घेरे हुए। वह तुम्हारा शोषण करने के लिए एक अवसर तलाशता है और फिर बलपूर्वक तुम पर कब्ज़ा कर लेता है, तुम पर काबू कर लेता है और तुम पर पूरा नियंत्रण प्राप्त करने और तुम्हें नुकसान पहुँचाने के अपने उद्देश्य को हासिल कर लेता है। मानव-जाति को परमेश्वर से छीनने की लड़ाई में शैतान का यह एक सबसे विशिष्ट इरादा और व्यवहार है।

— "वचन देह में प्रकट होता है" में 'स्वयं परमेश्वर, जो अद्वितीय है IV' से उद्धृत

कुछ लोग कहते हैं कि पवित्र आत्मा हर समय उनमें कार्य कर रहा है। यह असंभव है। यदि वे कहते कि पवित्र आत्मा हमेशा उनके साथ है, तो यह यथार्थ पर आधारित होता। यदि वे कहते कि उनकी सोच और उनका बोध हर समय सामान्य है, तो यह भी यथार्थ पर आधारित होता और यह दिखाता कि पवित्र आत्मा उनके साथ है। यदि वे कहते हैं कि पवित्र आत्मा हमेशा उनके भीतर कार्य कर रहा है, कि वेपरमेश्वर द्वारा प्रबुद्ध किए गए हैं और हर पल पवित्र आत्मा द्वारा स्पर्श किए जाते हैं, और हर समय नया ज्ञान प्राप्त करते हैं, तो यह सामान्य नहीं है। यह नितान्त अलौकिक है! बिना किसी संदेह के, ऐसे लोग बुरी आत्माएँ हैं! यहाँ तक कि जब परमेश्वर का आत्मा देह में आता है, तब ऐसे समय होते हैं जब उसे भी अवश्य भोजन करना चाहिए और आराम करना चाहिए—मनुष्य की तो बात ही छोड़ो। जो लोग बुरी आत्माओं द्वारा ग्रस्त हो गए हैं, वे देह की कमजोरी से रहित प्रतीत होते हैं। वे सब कुछ त्यागने और छोड़ने में सक्षम होते हैं, वे भावनाओं से मुक्त होते हैं, यातना को सहने में सक्षम होते हैं और जरा सी भी थकान महसूस नहीं करते हैं, मानो कि वे देहातीत हैं चुके हों। क्या यह नितान्त अलौकिक नहीं है? दुष्ट आत्मा का कार्य अलौकिक है, और ये चीजें मनुष्य के द्वारा अप्राप्य हैं। जो लोग विभेद नहीं कर सकते हैं वे जब ऐसे लोगों को देखते हैं, तो ईर्ष्या करते हैं, और कहते हैं कि परमेश्वर पर उनका विश्वास बहुत मजबूत है, और बहुत अच्छा है, और कहते हैं कि वे कभी कमजोर नहीं पड़ते हैं। वास्तव में, यह दुष्ट आत्मा के कार्य की अभिव्यक्ति है। इसका कारण यह है कि एक सामान्य अवस्था के लोगों में अनिवार्य रूप से मानवीय कमजोरियाँ होती हैं; यह उन लोगों की सामान्य अवस्था है जिनमें पवित्र आत्मा की उपस्थिति होती है।

— "वचन देह में प्रकट होता है" में 'अभ्यास (4)' से उद्धृत

संदर्भ के लिए धर्मोपदेश और संगति के उद्धरण:

दुष्ट आत्माओं के विभिन्न कार्यों और पवित्र आत्मा के कार्य के बीच के स्पष्ट अंतर निम्न पहलुओं में विषेश रूप से व्यक्त होते हैं। पवित्र आत्मा उन ईमानदार लोगों का चुनाव करता है जो सत्य को खोजते हैं, जिनके पास अंत:करण और विवेक है। वे ऐसे लोग हैं जिनमें वह कार्य करता है। दुष्ट आत्माएँ उन लोगों का चुनाव करती हैं जो कपटी और बेहूदे होते हैं, जिन्हें सत्य से कोई प्रेम नहीं होता है, और जो अंत:करण या विवेक रहित होते हैं। ये ऐसे लोग हैं जिनमें दुष्ट आत्माएँ कार्य करती हैं। जब हम पवित्र आत्मा के कार्य के लिए चुने जाने वालों की तुलना उनसे करते हैं जो दुष्ट आत्माओं के कार्य के लिए चुने जाते हैं तो हम देख सकते हैं कि परमेश्वर पवित्र, और धार्मिक है, जो परमेश्वर के द्वारा चुने जाते हैं वे सत्य को खोजते हैं, और अंत:करण और विवेक से संपन्न होते हैं, वे तुलनात्मक रूप से अधिक ईमानदार होते हैं, और न्यायोचित चीज़ों से प्रेम करते हैं। जो दुष्ट आत्माओं के द्वारा चुने जाते हैं वे कपटी होते हैं, वे स्वार्थी और नीच होते हैं, उन्हें सत्य से कोई प्रेम नहीं होता है, वे अंत:करण और विवेक रहित होते हैं, और वे सत्य को नहीं खोजते हैं और वे सच्चे मानव नहीं होते हैं। दुष्ट आत्माएँ सिर्फ नकारात्मक चीज़ों को चुनती हैं, जिससे हम देखते हैं कि दुष्ट आत्माएँ दुष्टता और अंधकार को पसंद करती हैं, और वे उनसे एक मीलों दूर भागती हैं जो सत्य को खोजते हैं, और जो अधार्मिकता से आसक्त होते हैं, और आसानी से मोहित किए जा सकते हैं उन पर शीघ्रता से काबू पा लेती हैं। जिनमें दुष्ट आत्माएँ कार्य करना चुनती हैं वे बचाये नहीं जा सकते हैं, और वे परमेश्वर के द्वारा निकाल दिए गए जाते हैं। दुष्ट आत्माएँ कब, और किस पृष्ठभूमि के विरोध में कार्य करती हैं? वे तब कार्य करती हैं जब लोग परमेश्वर से दूर भटक जाते हैं और परमेश्वर के प्रति विद्रोह कर देते हैं। दुष्ट आत्माओं का कार्य लोगों को मोहित कर लेता है। जब लोग पाप करते हैं, जब वे सबसे अधिक निर्बल होते हैं, विशेष रूप से जब उनके हृदय में बहुत पीड़ा होती है, जब वे व्याकुल और भ्रमित महसूस कर रहे होते हैं, तब दुष्ट आत्माएं उन्हें मोहित और भ्रष्ट करने, उनमें और परमेश्वर के बीच में कलह बोने के लिए इस अवसर का उपयोग करतीं हैं। जब लोग परमेश्वर को पुकारते हैं, जब उनके हृदय परमेश्वर की ओर मुड़ते हैं, जब उन्हें परमेश्वर की आवश्यकता होती है, जब वे परमेश्वर के सामने पश्चाताप करते हैं, या जब वे सत्य को खोजते हैं, तब पवित्र आत्मा उनमें कार्य करना शुरू करता है। पवित्र आत्मा के सारे कार्य मनुष्य को बचाने के लिए होते हैं, और वह मनुष्य को बचाने के लिए अवसर ढूँढ़ता है, जबकि दुष्ट आत्माएँ लोगों को भ्रष्ट करने और उनके साथ छल करने के अवसरों की खोज में रहती हैं। परमेश्वर प्रेम है, और दुष्ट आत्माएं लोगों से नफरत करतीं हैं। दुष्ट आत्माएँ नीच और दुष्ट होती हैं, वे घातक और भयावह होती हैं। दुष्ट आत्माएँ जो कुछ भी करती हैं वह मनुष्य को निगलने, भ्रष्ट करने के लिए होता है, और पवित्र आत्मा जो कुछ भी करता है वह मनुष्य के लिए प्रेम और उद्धार के लिए होता है। पवित्र आत्मा के कार्य के प्रभाव लोगों को शुद्ध करने, उन्हें उनकी भ्रष्टता से बचाने, उन्हें अपने-आप को जानने और शैतान को जानने की अनुमति देने, शैतान के विरुद्ध विद्रोह करने में समर्थ होने, सत्य की खोज करने, और अंततः मनुष्य की सदृशता में जीने में समर्थ बनाने के लिए होते हैं। दुष्ट आत्माएँ लोगों को भ्रष्ट करती हैं, दूषित करती हैं, और जकड़ती हैं, वे उन्हें हमेशा पाप में और गहरा डुबा देती हैं, और हमेशा उनके जीवन में बहुत दर्द लाती हैं, और इसलिए जब दुष्ट आत्माएँ लोगों में कार्य करती हैं, तो वे ख़त्म हो जाते हैं; अंततः, वे शैतान के द्वारा निगल लिए जाते हैं, जो कि दुष्ट आत्माओं के कार्य का परिणाम होता है। पवित्र आत्मा के कार्य का प्रभाव अंततः लोगों को बचाना, उन्हें एक वास्तविक जीवन जीने के योग्य बनाना, पूरी तरह से मुक्त और स्वतंत्र बनाना और परमेश्वर के आशीषों को प्राप्त करना है। दुष्ट आत्माएँ मनुष्य को अंधकार में ले जाती हैं, वे उसे रसातल में ले जाती हैं; पवित्र आत्मा मनुष्य को अंधकार से प्रकाश में, स्वतंत्रता में ले जाता है। पवित्र आत्मा का कार्य लोगों को प्रबुद्ध करता है और उनका मार्गदर्शन करता है, वह उन्हें अवसर देता है, और जब वे निर्बल होते और पाप करते हैं तब वह उनके लिए सांत्वना लाता है। वह लोगों को अपने-आप को जानने देता है, उन्हें सत्य को खोजने देता है, और वह लोगों को चीज़ों को करने के लिए विवश नहीं करता है, बल्कि उन्हें अपना खुद का मार्ग अपने आप चुनने देता है, और अंततः उन्हें प्रकाश में ले जाता है। दुष्ट आत्माएँ चीज़ों को करने के लिए लोगों को विवश करती हैं और उन पर आदेश चलाती हैं। वे जो कुछ भी कहती हैं वह झूठ होता है और लोगों को मोहित करता हैं, उन्हें धोखा देता है, और उन्हें जकड़ता है; दुष्ट आत्माएँ लोगों को स्वतंत्रता नहीं देती हैं, वे उन्हें चुनने की आजादी नहीं देती हैं, वे उन्हें विनाश के मार्ग पर विवश करती हैं, और अंततः उन्हें पाप में बहुत गहरा डुबो देती हैं, उन्हें मृत्यु तक ले जाती हैं।

— 'जीवन में प्रवेश पर धर्मोपदेश और संगति' से उद्धृत

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