1. पवित्र आत्मा के कार्य और बुरी आत्माओं के कार्य में क्या अंतर है

परमेश्वर के प्रासंगिक वचन :

आत्मा के विवरण को कैसे समझा जा सकता है? पवित्र आत्मा मनुष्य में कैसे कार्य करता है? शैतान मनुष्य में कैसे कार्य करता है? दुष्ट आत्माएं मनुष्य में कैसे कार्य करती हैं? इसके प्रकटीकरण क्या हैं? जब तुम्हारे साथ कुछ घटित होता है, क्या यह पवित्र आत्मा की ओर से आता है और तुम्हें उसे मानना चाहिए या ठुकरा देना चाहिए? लोगों के वास्तविक अभ्यास में मनुष्य की इच्छा से बहुत कुछ उत्पन्न होता है फिर भी लोगों को हमेशा लगता है कि यह आत्मा की ओर से आता है। कुछ चीज़ें दुष्ट आत्माओं की ओर से आती हैं, परंतु फिर भी लोग सोचते हैं कि यह पवित्र आत्मा से आई हैं और कभी-कभी पवित्र आत्मा भीतर से लोगों का मार्गदर्शन करता है, फिर भी लोग डर जाते हैं कि ऐसा मार्गदर्शन शैतान की ओर से आता है और इसलिए आज्ञा मानने का साहस नहीं करते, जबकि वास्तविकता में वह मार्गदर्शन पवित्र आत्मा का प्रबोधन होता है। इस प्रकार, इनमें भेद किये बिना, व्यावहारिक अनुभव में इसका अनुभव करने का कोई तरीक़ा नहीं है; भेद किए बिना जीवन प्राप्त करने का कोई तरीक़ा नहीं है। पवित्र आत्मा कैसे कार्य करता है? दुष्ट आत्माएं कैसे कार्य करती हैं? मनुष्य की इच्छा से क्या आता है? और पवित्र आत्मा के मार्गदर्शन और उसके प्रबोधन से क्या पैदा होता है? यदि तुम मनुष्य के भीतर पवित्र आत्मा के कार्य के स्वरूपों को समझ लेते हो, तब तुम अपने दिन-प्रतिदिन के जीवन और अपने व्यावहारिक अनुभवों में अपना ज्ञान बढ़ा पाओगे और अंतर कर पाओगे; तुम परमेश्वर को जान पाओगे, तुम शैतान को समझ और पहचान पाने में समर्थ होगे; तुम अपनी आज्ञाकारिता या अनुसरण को लेकर उलझन में नहीं रहोगे, और तुम ऐसे व्यक्ति बनोगे जिसके विचार स्पष्ट हैं और जो पवित्र आत्मा के कार्य का पालन करता है।

पवित्र आत्मा का कार्य सक्रिय मार्गदर्शन और सकारात्मक प्रबोधन है। यह लोगों को निष्क्रिय नहीं बनने देता। यह उनको सांत्वना देता है, उन्हें विश्वास और संकल्प देता है और परमेश्वर द्वारा पूर्ण बनाए जाने का अनुसरण करने योग्य बनाता है। जब पवित्र आत्मा कार्य करता है, तो लोग सक्रिय रूप से प्रवेश कर पाते हैं; वो निष्क्रिय या बाध्य नहीं होते, बल्कि अपनी पहल पर काम करते हैं। जब पवित्र आत्मा कार्य करता है, तो लोग प्रसन्न और सहर्ष प्रस्तुत होते हैं, आज्ञा मानने को तैयार होते हैं और स्वयं को विनम्र रखने में प्रसन्न होते हैं। यद्यपि वे भीतर से दुखी और दुर्बल होते हैं, उनमें सहयोग करने का संकल्प होता है; वे ख़ुशी-ख़ुशी दुःख सह लेते हैं, वे आज्ञा मानने में सक्षम होते हैं और मानवीय इच्छा से कलंकित नहीं होते हैं, मनुष्य की सोच से कलंकित नहीं होते हैं और निश्चित रूप से वे मनुष्य की आकांक्षाओं और प्रेरणाओं से कलंकित नहीं होते हैं। जब लोग पवित्र आत्मा के कार्य का अनुभव करते हैं, तो भीतर से वे विशेष रूप से पवित्र हो जाते हैं। जो पवित्र आत्मा के कार्य के अधीन हैं, वे परमेश्वर के प्रेम और अपने भाइयों और बहनों के प्रेम को जीते हैं; वे ऐसी चीज़ों से आनंदित होते हैं, जो परमेश्वर को आनंदित करती हैं और उन चीज़ों से घृणा करते हैं, जिनसे परमेश्वर घृणा करता है। ऐसे लोग जो पवित्र आत्मा के कार्य द्वारा स्पर्श किए जाते हैं, उनमें सामान्य मानवता होती है और वे निरंतर सत्य का अनुसरण करते हैं और मानवता के अधीन होते हैं। जब पवित्र आत्मा लोगों के भीतर कार्य करता है, उनकी स्थिति और भी बेहतर हो जाती है और उनकी मानवता और अधिक सामान्य हो जाती है और यद्यपि उनका कुछ सहयोग मूर्खतापूर्ण हो सकता है, परंतु फिर भी उनकी प्रेरणाएं सही होती हैं, उनका प्रवेश सकारात्मक होता है, वे रुकावट बनने का प्रयास नहीं करते और उनमें दुर्भाव नहीं होता। पवित्र आत्मा का कार्य सामान्य और वास्तविक होता है, पवित्र आत्मा मनुष्य के भीतर मनुष्य के सामान्य जीवन के नियमों के अनुसार कार्य करता है और वह सामान्य लोगों के वास्तविक अनुसरण के अनुसार लोगों में प्रबोधन और मार्गदर्शन को कार्यान्वित करता है। जब पवित्र आत्मा लोगों में कार्य करता है, तो वह सामान्य लोगों की आवश्यकता के अनुसार उनका मार्गदर्शन करता और उन्हें प्रबुद्ध करता है। वह उनकी आवश्यकताओं के अनुसार उनकी ज़रूरतें पूरी करता है और वह सकारात्मक रूप से उनकी कमियों और अभावों के आधार पर उनका मार्गदर्शन करता है और उन्हें प्रबुद्ध करता है। पवित्र आत्मा का कार्य वास्तविक जीवन में लोगों को प्रबुद्ध करने और उनका मार्गदर्शन करने का है; अगर वे अपने वास्तविक जीवन में परमेश्वर के वचनों का अनुभव करते हैं, तभी वे पवित्र आत्मा का कार्य देख सकते हैं। यदि अपने दिन-प्रतिदिन के जीवन में लोग सकारात्मक अवस्था में हों और उनका जीवन सामान्य आध्यात्मिक हो, तो वे पवित्र आत्मा के कार्य के अधीन होते हैं। ऐसी स्थिति में, जब वे परमेश्वर के वचनों को खाते और पीते हैं, तो उनमें विश्वास आता है; जब वे प्रार्थना करते हैं, तो वे प्रेरित होते हैं, जब उनके साथ कुछ घटितहोता है, तो वे निष्क्रिय नहीं होते; और घटित होती हुई चीज़ों से सबक़ लेने में समर्थ होते हैं, जो परमेश्वर चाहता है कि वो सीखें। वे निष्क्रिय या कमज़ोर नहीं होते और यद्यपि उनके जीवन में वास्तविक कठिनाइयाँ होती हैं, वे परमेश्वर के सभी प्रबंधनों की आज्ञा मानने के लिए तैयार रहते हैं।

— "वचन देह में प्रकट होता है" में 'पवित्र आत्मा का कार्य और शैतान का कार्य' से उद्धृत

जब पवित्र आत्मा लोगों को प्रबुद्ध करने के लिए कार्य करता है, तो वह आम तौर पर उन्हें परमेश्वर के कार्य का, और उनकी सच्ची प्रविष्टि और सच्ची अवस्था का ज्ञान देता है। वह उन्हें परमेश्वर के अत्यावश्यक इरादों और उसकी मनुष्य से वर्तमान अपेक्षाओं के बारे में समझने देता है, ताकि उनके पास परमेश्वर को संतुष्ट करने के लिए सब कुछ बलि कर देने का संकल्प हो, ताकि वे परमेश्वर से अवश्य प्रेम करें भले ही वे उत्पीड़न और प्रतिकूल परिस्थितियों को भुगतें, ताकि वे परमेश्वर की गवाही दें भले ही इसका अर्थ अपना खून बहाना और अपना जीवन अर्पित करना हो; उन्हें कोई अफ़सोस नहीं होगा। यदि तेरा इस तरह का संकल्प है तो इसका अर्थ है कि तुझमें पवित्र आत्मा की हरकतें है, और पवित्र आत्मा का कार्य है—लेकिन जान ले कि तू हर गुजरते पल में इस तरह की हरकतों से संपन्न नहीं है। कभी-कभी बैठकों में जब तू प्रार्थना करता है और परमेश्वर के वचनों को खाता और पीता है, तो तू बेहद द्रवित और प्रेरित महसूस कर सकता है। जब अन्य लोग परमेश्वर के वचनों के अपने अनुभव और समझ पर कुछ संगति साझा करते हैं तो यह बहुत नया और ताजा महसूस होता है, और तेरा हृदय पूरी तरह से स्पष्ट और उज्ज्वल हो जाता है। यह सब पवित्र आत्मा का कार्य है। यदि तू कोई अगुवा है और पवित्र आत्मा तुझे असाधारण प्रबुद्धता और रोशनी देता है, तो जब तू काम करने के लिए कलीसिया में जाता है, वह उन समस्याओं को देखने देता है जो कलीसिया के भीतर मौज़ूद हैं, और जानने देता है कि उनका समाधान करने के लिए सत्य पर संगति को कैसे साझा करें, तुझे अविश्वसनीय रूप से नेक, जिम्मेदार और अपने कार्य में गंभीर बनाता है, तो यह सब पवित्र आत्मा का कार्य है।

— "वचन देह में प्रकट होता है" में 'अभ्यास (1)' से उद्धृत

पवित्र आत्मा के कार्य से क्या प्रभाव प्राप्त होते हैं? तुम मूर्ख हो सकते हो और तुम विवेकहीन हो सकते हो, परंतु पवित्र आत्मा को बस तुम्हारे भीतर कार्य करना है और तुम्हारे भीतर विश्वास उत्पन्न हो जाएगा और तुम हमेशा महसूस करोगे कि तुम परमेश्वर से जितना भी प्रेम करो कम ही होगा। चाहे सामने कितनी ही मुश्किलें हों, तुम सहयोग के लिए तैयार होगे। तुम्हारे साथ घटनाएँ होंगी और यह स्पष्ट नहीं होगा कि वे परमेश्वर की ओर से हैं या शैतान की ओर से, परंतु तुम प्रतीक्षा कर पाओगे और न तो निष्क्रिय होगे और न ही बेपरवाह। यह पवित्र आत्मा का सामान्य कार्य है। जब पवित्र आत्मा तुम्हारे अंदर कार्य करता है, तब भी तुम वास्तविक कठिनाइयों का सामना करते हो : कभी-कभी तुम्हारे आँसू निकल आएंगे और कभी-कभी ऐसी बातें होंगी, जिन पर तुम काबू नहीं पा सकते, परंतु यह सब पवित्र आत्मा के साधारण कार्य का एक चरण है। हालाँकि तुमने उन कठिनाइयों पर काबू नहीं पाया और उस समय तुम कमज़ोर थे और शिकायतों से भरे थे, फिर भी बाद में तुम पूरे विश्वास के साथ परमेश्वर से प्रेम कर पाये। तुम्हारी निष्क्रियता तुम्हें सामान्य अनुभव प्राप्त करने से नहीं रोक सकती और इसकी परवाह किए बिना कि लोग क्या कहते हैं और कैसे हमला करते हैं, तुम परमेश्वर से प्रेम कर पाते हो। प्रार्थना के दौरान तुम हमेशा महसूस करते हो कि अतीत में तुम परमेश्वर के बहुत ऋणी थे और जब भी तुम इस तरह की चीज़ों का फिर सामना करते हो, तुम परमेश्वर को संतुष्ट करने और देह-सुख का त्याग करने का संकल्प लेते हो। यह सामर्थ्य दिखाता है कि तुम्हारे भीतर पवित्र आत्मा का कार्य है। यह पवित्र आत्मा के कार्य की सामान्य अवस्था है।

— "वचन देह में प्रकट होता है" में 'पवित्र आत्मा का कार्य और शैतान का कार्य' से उद्धृत

जब लोगों की परिस्थितियां सामान्य होती हैं, तो उनके आध्यात्मिक जीवन और दैहिक जीवन भी सामान्य होते हैं, उनका विवेक सामान्य और व्यवस्थित होता है। जब वो इस दशा में होते हैं, जो वे अपने भीतर अनुभव करते या जान पाते हैं, उसके विषय में कहा जा सकता है कि वह पवित्र आत्मा के स्पर्श से आया है (जब वे परमेश्वर के वचनों को खाते और पीते हैं, तो अंतर्दृष्टि रखना या कुछ सरल ज्ञान रखना, या कुछ चीज़ों में विश्वासयोग्य बने रहना, या कुछ चीज़ों में परमेश्वर से प्रेम करने की सामर्थ्य रखना—यह सब पवित्र आत्मा से आता है)। मनुष्य में पवित्र आत्मा का कार्य विशेष रूप से सामान्य है; मनुष्य इसको महसूस करने के असमर्थ है और यह स्वयं मनुष्य द्वारा ही आता प्रतीत होता है—परंतु वास्तव में यह पवित्र आत्मा का कार्य होता है। दिन-प्रतिदिन के जीवन में पवित्र आत्मा प्रत्येक में बड़े और छोटे रूप में कार्य करता है और यह इस कार्य की सीमा है, जो बदलती रहती है। कुछ लोगों की काबिलियत अच्छी होती है और वे बातों को जल्दी समझ लेते हैं और उनमें पवित्र आत्मा का प्रबोधन विशेष रूप से अधिक होता है। इस बीच, कुछ लोगों की काबिलियतकम होती है और उन्हें बातों को समझने में अधिक समय लगता है, परंतु पवित्र आत्मा उन्हें भीतर से स्पर्श करता है और वे भी परमेश्वर के प्रति निष्ठा को प्राप्त कर पाते हैं—पवित्र आत्मा उन सबमें कार्य करता है, जो परमेश्वर का अनुसरण करते हैं। जब दिन-प्रतिदिन के जीवन में लोग परमेश्वर का विरोध नहीं करते या परमेश्वर के ख़िलाफ़ विद्रोह नहीं करते, ऐसे कार्य नहीं करते, जो परमेश्वर के प्रबंधन में बाधा डालें और परमेश्वर के कार्य में हस्तक्षेप नहीं करते, तो उनमें से प्रत्येक में परमेश्वर का आत्मा अधिक या कम सीमा तक काम करता है; वह उन्हें स्पर्श करता है, प्रबुद्ध करता है, उन्हें विश्वास प्रदान करता है, सामर्थ्य देता है और सक्रिय रूप से प्रवेश करने के लिए बढ़ाता है, आलसी नहीं बनने देता या देह के आनंद लेने का लालच नहीं करने देता, सत्य के अभ्यास को तैयार करता है और परमेश्वर के वचनों की चाहत रखने वाला बनाता है। यह सब ऐसा कार्य है, जो पवित्र आत्मा की ओर से आता है।

— "वचन देह में प्रकट होता है" में 'पवित्र आत्मा का कार्य और शैतान का कार्य' से उद्धृत

पवित्र आत्मा के समस्त कार्य सामान्य और वास्तविक हैं। जब तुम परमेश्वर के वचनों को पढ़ते हो और प्रार्थना करते हो, तो भीतर से तुम प्रकाशमान और दृढ़ होते हो, बाहरी संसार तुम्हारा ध्यान भंग नहीं कर सकता; अंदर से तुम परमेश्वर से प्रेम करने के इच्छुक होते हो, सकारात्मक चीज़ों से जुड़ने के इच्छुक होते हो, और तुम इस बुरे संसार से घृणा करते हो। यह परमेश्वर के भीतर रहना है। यह परम आनंद का अनुभव लेना नहीं है, जैसा कि लोग कहते हैं—ऐसी बात व्यावहारिक नहीं है। आज, हर चीज़ वास्तविकता से आरंभ होनी चाहिए। परमेश्वर जो कुछ भी करता है, वह सब वास्तविक है, और अपने अनुभवों में तुम्हें परमेश्वर को वास्तव में जानने, और परमेश्वर के कार्य के पदचिह्नों और उस उपाय को खोजने पर ध्यान देना चाहिए, जिसके द्वारा पवित्र आत्मा लोगों को स्पर्श और प्रबुद्ध करता है। यदि तुम परमेश्वर के वचनों को खाते-पीते हो, और प्रार्थना करते हो, और अधिक वास्तविक तरीक़े से सहयोग करते हो, बीते हुए समय में जो कुछ अच्छा था उसे आत्मसात करते हो, और जो कुछ खराब था उसे पतरस की तरह अस्वीकार करते हुए, यदि तुम अपने कानों से सुनते हो और अपनी आँखों से देखते हो, और अपने मन में अकसर प्रार्थना और चिंतन करते हो, और परमेश्वर के कार्य में सहयोग करने के लिए वह सब-कुछ करते हो जो तुम कर सकते हो, तो परमेश्वर निश्चित रूप से तुम्हारा मार्गदर्शन करेगा।

— "वचन देह में प्रकट होता है" में 'वास्तविकता को कैसे जानें' से उद्धृत

कभी-कभी परमेश्वर तुम्हें एक निश्चित प्रकार की अनुभूति देता है, एक एहसास जिसके कारण तुम अपना आंतरिक आनंद खो देते हो और परमेश्वर की उपस्थिति को खो देते हो, कुछ इस तरह कि तुम अंधकार में डूब जाते हो। यह एक प्रकार का शुद्धिकरण है। जब कभी भी तुम कुछ करते हो तो गड़बड़ हो जाती है या तुम्हारे सामने कोई अवरोध आ जाता है। यह परमेश्वर का अनुशासन है। कभी, अगर तुम कुछ ऐसा करो जो अनाज्ञाकारी और परमेश्वर के प्रति विद्रोही हो, तो हो सकता है कि दूसरों को इसके बारे में पता न चले, लेकिन परमेश्वर जानता है। वह तुम्हें बचकर जाने नहीं देगा, और वह तुम्हें अनुशासित करेगा। पवित्र आत्मा का काम बहुत ही विस्तृत है। वह लोगों के हर वचन और कार्य को, उनकी हर क्रिया और हरकत को, और उनकी हर सोच और विचार को ध्यानपूर्वक देखता है, ताकि लोग इन चीज़ों के बारे में आंतरिक जागरूकता पा सकें। तुम एक बार कुछ करते हो और वह गड़बड़ हो जाता है, तुम फिर से कुछ करते हो और यह तब भी गड़बड़ हो जाता है, और धीरे-धीरे तुम पवित्र आत्मा के काम को समझ जाओगे। कई बार अनुशासित किए जाने के द्वारा, तुम्हें पता चल जाएगा कि परमेश्वर की इच्छा के अनुरूप होने के लिए क्या किया जाए और उसकी इच्छा के अनुरूप क्या नहीं है। अंत में, तुम्हारे भीतर से पवित्र आत्मा के मार्गदर्शन का सटीक उत्तर प्राप्त हो जाएगा। कभी-कभी तुम विद्रोही हो जाओगे और तुम्हें भीतर से परमेश्वर द्वारा डाँटा जाएगा। यह सब परमेश्वर के अनुशासन से आता है। यदि तुम परमेश्वर के वचन को सँजो कर नहीं रखते हो, यदि तुम उनके काम को महत्वहीन समझते हो, तो वह तुम पर कोई ध्यान नहीं देगा। तुम परमेश्वर के वचनों को जितनी अधिक गंभीरता से लेते हो, उतना ही अधिक वह तुम्हें रोशन करेगा। अभी, कलीसिया में कुछ लोग हैं जिनका विश्वास अव्यवस्थित और भ्रमित है, और वे बहुत सी अनुचित चीजें करते हैं और अनुशासन के बिना कार्य करते हैं, और इसलिए पवित्र आत्मा का काम उनमें स्पष्ट रूप से नहीं देखा जा सकता है।

— "वचन देह में प्रकट होता है" में 'जिन्हें पूर्ण बनाया जाना है उन्हें शुद्धिकरण से अवश्य गुज़रना चाहिए' से उद्धृत

पवित्र आत्मा के पास प्रत्येक व्यक्ति में चलने के लिए एक मार्ग है, और वह प्रत्येक व्यक्ति को पूर्ण होने का अवसर प्रदान करता है। तुम्हारी नकारात्मकता के माध्यम से तुम्हें तुम्हारी भ्रष्टता ज्ञात करवाई जाती है, और फिर नकारात्मकता को फेंककर तुम्हें अभ्यास करने का मार्ग मिल जाएगा; इन्हीं सब तरीकों से तुम पूर्ण किए जाते हो। इसके अतिरिक्त, निरंतर मार्गदर्शन और अपने भीतर कुछ सकारात्मक चीज़ों की रोशनी के द्वारा तुम अपना कार्य अग्रसक्रियता से पूरा करोगे, तुम्हारी अंतर्दृष्टि विकसित होगी और तुम विवेक प्राप्त करोगे। जब तुम्हारी स्थितियाँ अच्छी होती हैं, तुम परमेश्वर के वचन पढ़ने के विशेष रूप से इच्छुक होते हो, और परमेश्वर से प्रार्थना करने के भी विशेष रूप से इच्छुक होते हो, और जो उपदेश तुम सुनते हो, उसे अपनी अवस्था के साथ जोड़ सकते हो। ऐसे समय परमेश्वर तुम्हें भीतर से प्रबुद्ध और रोशन करता है, और तुम्हें सकारात्मक पहलू वाली कुछ चीज़ों का एहसास कराता है। इसी तरह से तुम सकारात्मक पहलू में पूर्ण किए जाते हो। नकारात्मक स्थितियों में तुम दुर्बल और निष्क्रिय होते हो; तुम्हें महसूस होता है कि तुम्हारे दिल में परमेश्वर नहीं है, फिर भी परमेश्वर तुम्हें रोशन करता है और अभ्यास करने के लिए मार्ग खोजने में तुम्हारी सहायता करता है। इससे बाहर आना नकारात्मक पहलू में पूर्णता प्राप्त करना है।

— "वचन देह में प्रकट होता है" में 'केवल उन्हें ही पूर्ण बनाया जा सकता है जो अभ्यास पर ध्यान देते हैं' से उद्धृत

शैतान की ओर से कौन-सा कार्य आता है? शैतान से आने वाले काम में, लोगों के भीतर के दृश्य अस्पष्ट होते हैं; लोगों में सामान्य मानवता नहीं होती है, उनके कार्यों के पीछे की प्रेरणाएं गलत होती हैं, और यद्यपि वे परमेश्वर से प्रेम करना चाहते हैं, फिर भी उनके भीतर सदैव आरोप-प्रत्यारोप चलते रहते हैं और ये दोषारोपण और विचार उनमें निरंतर व्यवधान का कारण बनते हैं, उनके जीवन के विकास को सीमित कर देते हैं और सामान्य स्थिति में परमेश्वर के समक्ष आने से रोक देते हैं। कहने का अर्थ है कि जैसे ही लोगों में शैतान का कार्य आरंभ होता है, तो उनके हृदय परमेश्वर के समक्ष शांत नहीं रह सकते। ऐसे लोगों को पता नहीं होता कि वे स्वयं के साथ क्या करें—जब वे लोगों को इकट्ठा होते देखते हैं, वे भाग जाना चाहते हैं और जब दूसरे प्रार्थना करते हैं तो वे अपनी आँखें बंद नहीं रख पाते। दुष्ट आत्माओं का कार्य मनुष्य और परमेश्वर के बीच का सामान्य संबंध बर्बाद कर देता है और लोगों के पिछले दर्शनों या उनके जीवन प्रवेश के पिछले मार्ग को उलट देता है; अपने हृदयों में वे कभी परमेश्वर के क़रीब नहीं आ सकते, ऐसी बातें हमेशा होती रहती हैं, जो उनमें बाधा पैदा करती हैं और उन्हें बंधन में बांध देती हैं। उनके हृदय शांति प्राप्त नहीं कर पाते और उनमें परमेश्वर से प्रेम करने की शक्ति नहीं बचती, और उनकी आत्माएं पतन की ओर जाने लगती हैं। शैतान के कार्य के प्रकटीकरण ऐसे हैं। शैतान के कार्य के प्रकटीकरण हैं : अपने स्थान पर डटे रह पाने और गवाही दे पाने में असमर्थ होना, यह तुम्हें ऐसा व्यक्ति बना देता है जो परमेश्वर के समक्ष दोषी है और जो परमेश्वर के प्रति निष्ठा नहीं रखता। जब शैतान हस्तक्षेप करता है, तुम अपने भीतर परमेश्वर के प्रति प्रेम और वफ़ादारी खो देते हो, तुम्हारा परमेश्वर के साथ सामान्य संबंध खत्म हो जाता है, तुम सत्य या स्वयं के सुधार का अनुसरण नहीं करते, तुम पीछे हटने लगते हो और निष्क्रिय बन जाते हो, तुम स्वयं को आसक्त कर लेते हो, तुम पाप के फैलाव को खुली छूट दे देते हो और पाप से घृणा नहीं करते; इससे बढ़कर, शैतान का हस्तक्षेप तुम्हें स्वच्छंद बना देता है, इसकी वजह से तुम्हारे भीतर से परमेश्वर का स्पर्श हट जाता है और तुम्हें परमेश्वर के बारे में शिकायत करने और उसका विरोध करने को प्रेरित करता है, जिससे तुम परमेश्वर पर सवाल उठाते हो; तुम्हारे द्वारा परमेश्वर को त्याग देने का खतरा भी होता है। यह सब शैतान की ओर से आता है।

— "वचन देह में प्रकट होता है" में 'पवित्र आत्मा का कार्य और शैतान का कार्य' से उद्धृत

जब लोगों की अवस्था सामान्य नहीं होती, तो वे पवित्र आत्मा द्वारा त्याग दिए जाते हैं, इसकी अधिक आशंका होती है कि वे अपने मन में शिकायत करें, उनकी प्रेरणाएं ग़लत होती हैं, वे आलसी होते हैं, वे देह में आसक्त रहते हैं और उनके हृदय सत्य के ख़िलाफ़ विद्रोह करते हैं। यह सब कुछ शैतान की ओर से आता है। जब लोगों की परिस्थितियां सामान्य नहीं होतीं, जब वे भीतर से अंधकारमय होते हैं और अपना सामान्य विवेक खो देते हैं, पवित्र आत्मा द्वारा त्याग दिए गए होते हैं और अपने भीतर परमेश्वर को महसूस करने के योग्य नहीं होते, यही वह समय होता है जब शैतान उनके भीतर कार्य करता है। यदि लोगों के भीतर सदैव सामर्थ्य रहे और सदैव परमेश्वर से प्रेम करें, तो सामान्यतः जब उनके साथ चीज़ें घटित होती हैं, तो वे चीज़ें पवित्र आत्मा की ओर से आती हैं और वे जिससे मिलते हैं, वह मुलाकात परमेश्वर के प्रबंधनों का नतीजा होता है। कहने का अर्थ है कि जब तुम्हारी परिस्थितियाँ सामान्य होती हैं, जब तुम पवित्र आत्मा के महान कार्य में होते हो, तो शैतान के लिए तुम्हें डगमगाना असंभव हो जाता है। इस बुनियाद पर यह कहा जा सकता है कि सब कुछ पवित्र आत्मा की ओर से आता है और यद्यपि तुम्हारे मन में ग़लत विचार हो सकते हैं, तुम उनको त्यागने में सक्षम होते हो और उनका अनुसरण नहीं करते। यह सब पवित्र आत्मा के कार्य से आता है। किन परिस्थितियों में शैतान हस्तक्षेप करता है? जब तुम्हारी परिस्थितियां सामान्य न हों, जब तुम्हें परमेश्वर का स्पर्श न मिला हो और तुम परमेश्वर के कार्य से रहित हो, जब तुम भीतर से सूखे और बंजर हो, जब परमेश्वर से प्रार्थना करते हुए तुम्हें कुछ समझ न आए और जब तुम परमेश्वर के वचनों को खाओ और पियो पर प्रबुद्ध या रौशन न हो तो ऐसे समय पर शैतान के लिए तुम्हारे भीतर कार्य करना आसान हो जाता है। दूसरे शब्दों में, जब तुम पवित्र आत्मा द्वारा त्याग दिए गए हो और तुम परमेश्वर को महसूस नहीं कर पाते, तो तुम्हारे साथ बहुत सी चीज़ें घटित होती हैं, जो शैतान के लालच से आती हैं। जब पवित्र आत्मा कार्य करता है, शैतान भी उसी दौरान कार्य कर रहा होता है। पवित्र आत्मा मनुष्य के अंतर्मन को स्पर्श करता है, जबकि उसी समय शैतान मनुष्य में हस्तक्षेप करता है। हालाँकि ऐसी स्थिति में पवित्र आत्मा का कार्य अग्रणी स्थान ले लेता है, और जिन लोगों की स्थितियां सामान्य होती हैं, वे विजय प्राप्त करते हैं; यह शैतान के कार्य के ऊपर पवित्र आत्मा के कार्य की विजय है। जबकि पवित्र आत्मा कार्य करता है, तब भी लोगों में एक भ्रष्ट स्वभाव मौजूद रहता है; हालाँकि पवित्र आत्मा के कार्य के दौरान, लोगों के लिए अपने विद्रोह, प्रेरणाओं और मिलावटों की खोज करना और पहचानना आसान हो जाता है। केवल तभी लोगों को पछतावा महसूस होता है और वे प्रायश्चित करने को तैयार होते हैं। इस तरह, उनके विद्रोही और भ्रष्ट स्वभाव धीरे-धीरे परमेश्वर के कार्य के भीतर त्याग दिए जाते हैं। पवित्र आत्मा का कार्य विशेष रूप से सामान्य होता है; जब वह लोगों में कार्य करता है, तब भी उन्हें कठिनाइयां होती हैं, वे तब भी रोते हैं, तब भी दुःख उठाते हैं, तब भी वे कमज़ोर होते हैं और तब भी बहुत-सी ऐसी बातें होती हैं जो उनके लिए अस्पष्ट हों, फिर भी ऐसी स्थिति में वे स्वयं को पीछे हटने से रोक सकते हैं और परमेश्वर से प्रेम कर सकते हैं और यद्यपि वे रोते हैं और व्याकुल रहते हैं, फिर भी उनमें परमेश्वर की प्रशंसा करने का सामर्थ्य होता है; पवित्र आत्मा का कार्य विशेष रूप से सामान्य होता है और उसमें थोड़ा-सा भी अलौकिक नहीं होता। अधिकांश लोग सोचते हैं कि जैसे ही पवित्र आत्मा कार्य करना आरंभ करता है, वैसे ही लोगों की दशा बदल जाती है और जो चीज़ें उनके लिए ज़रूरी होती हैं, वे हटा ली जाती हैं। ऐसे विश्वास भ्रामक होते हैं। जब पवित्र आत्मा मनुष्य के भीतर कार्य करता है, तो मनुष्य की निष्क्रिय बातें उसमें बनी रहती हैं और उसका आध्यात्मिक कद वही रहता है, लेकिन वह पवित्र आत्मा की रोशनी और प्रबोधन प्राप्त कर लेता है और इसलिए उसकी दशा और अधिक सक्रिय हो जाती है, उसके भीतर की स्थितियां सामान्य हो जाती हैं और वह शीघ्रता से बदल जाता है।

— "वचन देह में प्रकट होता है" में 'पवित्र आत्मा का कार्य और शैतान का कार्य' से उद्धृत

पवित्र आत्मा का कार्य सकारात्मक उन्नति है, जबकि शैतान का कार्य है पीछे हटना, नकारात्मकता, विद्रोह, परमेश्वर के के प्रति प्रतिरोध, परमेश्वर में विश्वास की कमी, भजनों को गाने तक की अनिच्छा और अपना कर्तव्य निभाने में बहुत कमज़ोर होना। वह सब कुछ जो पवित्र आत्मा के प्रबोधन से उपजता है, वह काफ़ी स्वाभाविक होता है; यह तुम पर थोपा नहीं जाता। यदि तुम इसका अनुसरण करते हो, तो तुम्हें शांति मिलेगी; और यदि तुम ऐसा नहीं करते, फिर बाद में तुम्हें फटकारा जाएगा। पवित्र आत्मा के प्रबोधन के बाद तुम जो भी करते हो, उसमें कोई हस्तक्षेप या रोक नहीं होगी; तुम स्वतंत्र होगे, तुम्हारे कार्यों में अभ्यास का एक मार्ग होगा और तुम किन्हीं अंकुशों के अधीन नहीं होगे बल्कि परमेश्वर की इच्छा के अनुसार कार्य करने के योग्य होगे। शैतान का कार्य तुमसे बहुत-सी बातों में व्यवधान पैदा कराता है; यह तुम्हें प्रार्थना करने से विमुख करता है, परमेश्वर के वचनों को खाने और पीने में बहुत आलसी बनाता है, कलीसिया का जीवन जीने से विमुख करता है, और यह आध्यात्मिक जीवन से दूर कर देता है। पवित्र आत्मा का कार्य तुम्हारे दैनिक जीवन में हस्तक्षेप नहीं करता और तुम्हारे सामान्य आध्यात्मिक जीवन में हस्तक्षेप नहीं करता। तुम बहुत-सी चीज़ों को उसी क्षण पहचानने में असमर्थ रहते हो, जब वे घटित होती हैं; फिर भी कुछ दिन बाद, तुम्हारा हृदय अधिक उज्ज्वल तथा मन अधिक स्पष्ट हो जाता है। तुम्हें आत्मा की चीज़ों के बारे में कुछ समझ आने लगती है और धीरे-धीरे तुम पहचान सकते हो कि कोई विचार परमेश्वर से आया है या शैतान की ओर से। कुछ बातें तुमसे परमेश्वर का विरोध करवाती हैं और परमेश्वर के ख़िलाफ़ विद्रोह करवाती हैं, या परमेश्वर के वचनों को कार्य में लाने से तुम्हें रोकती हैं; ये सभी बातें शैतान की ओर से आती हैं। कुछ बातें स्पष्ट नहीं होतीं और उस समय तुम नहीं बता सकते कि वे क्या हैं; बाद में, तुम उनके प्रकटीकरणों को देख पाते हो, तत्पश्चात विवेक का इस्तेमाल कर पाते हो। अगर तुम स्पष्ट रूप से बता सकते हो कि कौन-सी बातें शैतान की ओर से आती हैं और कौन-सी पवित्र आत्मा द्वारा निर्देशित होती हैं, तो तुम अपने अनुभवों में आसानी से नहीं भटकोगे।

— "वचन देह में प्रकट होता है" में 'पवित्र आत्मा का कार्य और शैतान का कार्य' से उद्धृत

परमेश्वर के कार्य का अनुभव करने में, पवित्र आत्मा का कार्य कभी-कभार होता है, जबकि पवित्र आत्मा की उपस्थिति लगभग सतत रहती है। जब तक लोगों का विवेक और सोच सामान्य रहते हैं, और जब तक उनकी अवस्थाएँ सामान्य होती हैं, तब पवित्र आत्मा निश्चित रूप से उनके साथ होता है। जब लोगों का विवेक और सोच सामान्य नहीं होते, तो उनकी मानवता सामान्य नहीं होती। यदि इस पल पवित्र आत्मा का कार्य तुममें है, तो पवित्र आत्मा भी निश्चित रूप से तुम्हारे साथ होगा। किंतु यदि पवित्र आत्मा तुम्हारे साथ है, तो इसका यह अर्थ नहीं कि पवित्र आत्मा तुम्हारे भीतर निश्चित रूप से कार्य कर रहा है, क्योंकि पवित्र आत्मा विशेष समयों पर कार्य करता है। पवित्र आत्मा की उपस्थिति का होना केवल लोगों के सामान्य अस्तित्व को बनाए रख सकता है, किंतु पवित्र आत्मा केवल निश्चित समयों पर ही कार्य करता है। उदाहरण के लिए, यदि तुम कोई अगुआ या कार्यकर्ता हो, तो जब तुम कलीसिया को सिंचन और आपूर्ति प्रदान करते हो, तब पवित्र आत्मा तुम्हें कुछ वचनों से प्रबुद्ध करेगा, जो दूसरों के लिए शिक्षाप्रद होंगे और जो तुम्हारे भाइयों-बहनों की कुछ व्यावहारिक समस्याओं का समाधान कर सकते है—ऐसे समय पर पवित्र आत्मा कार्य कर रहा है। कभी-कभी जब तुम परमेश्वर के वचनों को खा-पी रहे होते हो, तो पवित्र आत्मा तुम्हें कुछ वचनों से प्रबुद्ध कर देता है, जो तुम्हारे अनुभवों के लिए विशेष रूप से प्रासंगिक होते हैं, जो तुम्हें अपनी खुद की अवस्थाओं का अधिक ज्ञान प्राप्त करने देते हैं; यह भी पवित्र आत्मा का कार्य है। कभी-कभी, जैसे मैं बोलता हूँ, तुम लोग सुनते हो, और मेरे वचनों से अपनी अवस्थाओं को मापने में सक्षम होते हो, और कभी-कभी तुम द्रवित या प्रेरित हो जाते हो; यह सब पवित्र आत्मा का कार्य है। कुछ लोग कहते हैं कि पवित्र आत्मा हर समय उनमें कार्य कर रहा है। यह असंभव है। यदि वे कहते कि पवित्र आत्मा हमेशा उनके साथ है, तो यह यथार्थपरक होता। यदि वे कहते कि उनकी सोच और उनका बोध हर समय सामान्य रहता है, तो यह भी यथार्थपरक होता और दिखाता कि पवित्र आत्मा उनके साथ है। यदि वे कहते हैं कि पवित्र आत्मा हमेशा उनके भीतर कार्य कर रहा है, कि वे हर पल परमेश्वर द्वारा प्रबुद्ध और पवित्र आत्मा द्वारा द्रवित किए जाते हैं, और हर समय नया ज्ञान प्राप्त करते हैं, तो यह किसी भी तरह से सामान्य नहीं है। यह पूर्णत: अलौकिक है! बिना किसी संदेह के, ऐसे लोग बुरी आत्माएँ हैं! यहाँ तक कि जब परमेश्वर का आत्मा देह में आता है, तब भी ऐसे समय होते हैं जब उसे भोजन करना चाहिए और आराम करना चाहिए—मनुष्यों की तो बात ही छोड़ दो। जो लोग बुरी आत्माओं से ग्रस्त हो गए हैं, वे देह की कमजोरी से रहित प्रतीत होते हैं। वे सब-कुछ त्यागने और छोड़ने में सक्षम होते हैं, वे भावनाओं से रहित होते हैं, यातना सहने में सक्षम होते हैं और जरा-सी भी थकान महसूस नहीं करते, मानो वे देहातीत हो चुके हों। क्या यह नितांत अलौकिक नहीं है? दुष्ट आत्माओं का कार्य अलौकिक है और कोई मनुष्य ऐसी चीजें प्राप्त नहीं कर सकता। जिन लोगों में विवेक की कमी होती है, वे जब ऐसे लोगों को देखते हैं, तो ईर्ष्या करते हैं : वे कहते हैं कि परमेश्वर पर उनका विश्वास बहुत मजबूत है, उनकी आस्था बहुत बड़ी है, और वे कमज़ोरी का मामूली-सा भी चिह्न प्रदर्शित नहीं करते! वास्तव में, ये सब दुष्ट आत्मा के कार्य की अभिव्यक्तियाँ है। क्योंकि सामान्य लोगों में अनिवार्य रूप से मानवीय कमजोरियाँ होती हैं; यह उन लोगों की सामान्य अवस्था है, जिनमें पवित्र आत्मा की उपस्थिति होती है।

— "वचन देह में प्रकट होता है" में 'अभ्यास (4)' से उद्धृत

जब लोगों में परमेश्वर के बारे में कुछ समझ होती है, तो वे स्वेच्छा से उसके लिए कष्ट सह सकते हैं और उसके लिए अपना जीवन समर्पित कर सकते हैं। हालाँकि, उनके अंदर की कमजोरियाँ अभी भी शैतान के नियंत्रण में होती हैं, और अभी भी उनके लिए पीड़ा का कारण बन सकती हैं। दुष्ट आत्माएँ अभी भी लोगों में कार्य कर सकती हैं, हस्तक्षेप कर सकती हैं और उलझन की मनःस्थिति पैदा कर सकती हैं, उन्हें पागल कर सकती हैं, असहज महसूस करा सकती हैं और हर तरीके से परेशान कर सकती हैं। अभी भी मन या प्राण की कुछ ऐसी चीज़ें लोगों के भीतर होती हैं जो शैतान के द्वारा नियंत्रित की जा सकती हैं और वह चालाकी से इनसे काम निकाल सकता है। यही कारण है कि तुम बीमार पड़ जाते हो, परेशान हो जाते हो और आत्महत्या कर सकते हो, और कभी-कभी तुम यह भी महसूस कर सकते हो कि दुनिया वीरान है, या कि जीवन का कोई अर्थ नहीं है। दूसरे शब्दों में, ये मानवीय पीड़ाएं अभी भी शैतान के आदेश के अधीन है; यह मनुष्य की घातक कमज़ोरियों में से एक है। शैतान अभी भी उन चीज़ों का उपयोग करने में सक्षम है जिन्हें इसने भ्रष्ट किया और रौंदा है; ये वे हथियार हैं जिन्हें शैतान मानवता के विरुद्ध उपयोग कर सकता है। ... दुष्‍टात्‍माएँ अपना कार्य करने के लिए कोई भी मौका नहीं छोड़ती हैं; वे तुम्‍हारे भीतर से बोल सकती हैं या तुम्‍हारे कानों में खुसर-फुसर कर सकती हैं, तुम्‍हारे विचारों और मन को बेतरतीब बना सकती हैं। वे पवित्र आत्‍मा के स्पर्श को भी दबा सकती हैं ताकि तुम उसे महसूस न कर सको। उसके बाद, तुम्‍हारी सोच को भ्रमित तथा तुम्‍हारे दिमाग को अस्‍तव्‍यस्‍त करने के द्वारा वे तुममें दखल देने लगती हैं, जिस कारण तुम अशांत और परेशान हो जाते हो। दुष्‍टात्‍माओं का लोगों पर कार्य इस प्रकार का होता है। अगर लोग इसे समझ नहीं पाये, तो वे खुद को बड़े खतरे में पायेंगे।

— "अंत के दिनों के मसीह की बातचीत के अभिलेख" में 'परमेश्वर द्वारा जगत की पीड़ा का अनुभव करने का अर्थ' से उद्धृत

परमेश्वर सौम्य, कोमल, प्यारे और परवाह करने के तरीके से कार्य करता है, जो असाधारण रूप से नपा-तुला और उचित होता है। उसका तरीका तुम्हारे भीतर तीव्र भावनात्मक प्रतिक्रियाएँ उत्पन्न नहीं करता, जैसे कि : "परमेश्वर को मुझे यह करने देना चाहिए" या "परमेश्वर को मुझे वह करने देना चाहिए।" परमेश्वर कभी तुम्हें उस किस्म की मानसिक या भावनात्मक तीव्रता नहीं देता, जो चीज़ों को असहनीय बना देती है। क्या ऐसा नहीं है? यहाँ तक कि जब तुम परमेश्वर के न्याय और ताड़ना के वचनों को स्वीकार करते हो, तब तुम कैसा महसूस करते हो? जब तुम परमेश्वर के अधिकार और सामर्थ्य को समझते हो, तब तुम कैसा महसूस करते हो? क्या तुम महसूस करते हो कि परमेश्वर दिव्य और अनुल्लंघनीय है? (हाँ।) क्या उस समय तुम अपने और परमेश्वर के बीच दूरी महसूस करते हो? क्या तुम्हें परमेश्वर से डर लगता है? नहीं—बल्कि तुम परमेश्वर के लिए भयपूर्ण श्रद्धा महसूस करते हो। क्या लोग ये चीज़ें परमेश्वर के कार्य के कारण महसूस नहीं करते? यदि शैतान मनुष्य पर काम करता, तो क्या तब भी उनमें ये भावनाएँ होतीं? (नहीं।) परमेश्वर अपने वचनों, अपने सत्य और अपने जीवन का प्रयोग मनुष्य को निरंतर पोषण प्रदान करने और उसे सहारा देने के लिए करता है। जब मनुष्य कमज़ोर होता है, जब मनुष्य मायूसी महसूस करता है, तब निश्चित रूप से परमेश्वर यह कहते हुए कठोरता से बात नहीं करता कि, "मायूस मत हो! इसमें मायूस होने की क्या बात है? तुम कमज़ोर क्यों हो? इसमें कमज़ोर होने का क्या कारण है? तुम हमेशा कितने कमज़ोर हो, और तुम हमेशा कितने नकारात्मक रहते हो! तुम्हारे जिंदा रहने का क्या फायदा है? मर जाओ और किस्सा खत्म करो!" क्या परमेश्वर इस तरह से कार्य करता है? (नहीं।) क्या परमेश्वर के पास इस तरह से कार्य करने का अधिकार है? (हाँ।) फिर भी परमेश्वर इस तरह से कार्य नहीं करता। परमेश्वर के इस तरह से कार्य नहीं करने की वजह है उसका सार, परमेश्वर की पवित्रता का सार। मनुष्य के लिए उसके प्रेम को, उसके द्वारा मनुष्य को सँजोकर रखने और उसका पोषण करने को, स्पष्ट रूप से एक-दो वाक्यों में अभिव्यक्त नहीं किया जा सकता। यह कोई ऐसी चीज़ नहीं है, जो मनुष्य की डींगों में घटित होती हो, बल्कि परमेश्वर इसे वास्तविक रूप से अमल में लाता है; यह परमेश्वर के सार का प्रकटीकरण है। क्या ये सभी तरीके, जिनके द्वारा परमेश्वर कार्य करता है, मनुष्य को परमेश्वर की पवित्रता दिखा सकते हैं? इन सभी तरीकों से, जिनके द्वारा परमेश्वर कार्य करता है, जिनमें परमेश्वर के अच्छे इरादे शामिल हैं, जिनमें वे प्रभाव शामिल हैं जिन्हें परमेश्वर मनुष्य पर लागू करना चाहता है, जिनमें वे विभिन्न तरीके शामिल हैं जिन्हें परमेश्वर मनुष्य पर कार्य करने के लिए अपनाता है, जिनमें उस प्रकार का कार्य शामिल है जिसे वह करता है, वह मनुष्य को क्या समझाना चाहता है—क्या तुमने परमेश्वर के अच्छे इरादों में कोई बुराई या धोखा देखा है? (नहीं।) तो जो कुछ परमेश्वर करता है, जो कुछ परमेश्वर कहता है, जो कुछ वह अपने हृदय में सोचता है, उसमें और साथ ही परमेश्वर के समस्त सार में, जिसे वह प्रकट करता है—क्या हम परमेश्वर को पवित्र कह सकते हैं? (हाँ।) क्या किसी मनुष्य ने संसार में, या अपने अंदर कभी ऐसी पवित्रता देखी है? परमेश्वर को छोड़कर, क्या तुमने इसे कभी किसी मनुष्य या शैतान में देखा है? (नहीं।) ...

कौन-सा प्रतिनिधि लक्षण मनुष्य पर शैतान के कार्य को चिह्नित करता है? तुम लोगों को अपने खुद के अनुभवों के माध्यम से इसे जानने में समर्थ होना चाहिए—यह शैतान का सबसे प्रतिनिधि लक्षण है, वह चीज़ जिसे वह सबसे ज्यादा करता है, वह चीज़ जिसे वह हर एक व्यक्ति के साथ करने की कोशिश करता है। शायद तुम लोग इस लक्षण को नहीं देख पाते, इसलिए तुम यह महसूस नहीं करते कि शैतान कितना भयावह और घृणित है। क्या कोई जानता है कि वह लक्षण क्या है? (वह जो कुछ भी करता है, मनुष्य को नुकसान पहुँचाने के लिए करता है।) वह मनुष्य को कैसे नुकसान पहुँचाता है? क्या तुम लोग मुझे और अधिक विशेष रूप से और विस्तार से बता सकते हो? (वह मनुष्य को बहकाता, फुसलाता और ललचाता है।) यह सही है; ये विभिन्न तरीके हैं, जिनमें वह लक्षण प्रकट होता है। शैतान मनुष्य को भ्रमित भी करता है, उस पर हमला भी करता है और आरोप भी लगाता है—ये सब अभिव्यक्तियाँ हैं। और कुछ? (वह झूठ बोलता है।) धोखा देना और झूठ बोलना शैतान को सबसे ज्यादा स्वाभाविक रूप से आते हैं। वह ऐसा इतनी बार करता है कि झूठ उसके मुँह से इस तरह निकलता है कि इसके लिए उसे सोचने की भी जरूरत नहीं पड़ती। और कुछ? (वह कलह के बीज बोता है।) यह उतना महत्वपूर्ण नहीं है। अब मैं तुम लोगों को एक ऐसी बात बताऊँगा, जो तुम्हारे रोंगटे खड़े कर देगी, लेकिन मैं ऐसा तुम लोगों को डराने के लिए नहीं कर रहा। परमेश्वर मनुष्य पर कार्य करता है और उसे अपने दृष्टिकोण और हृदय दोनों में पोषित करता है। इसके विपरीत, क्या शैतान मनुष्य को पोषित करता है? नहीं, वह मनुष्य को पोषित नहीं करता। उलटे वह मनुष्य को हानि पहुँचाने के बारे में सोचने में बहुत समय बिताता है। क्या ऐसा नहीं है? जब वह मनुष्य को हानि पहुँचाने के बारे में सोच रहा होता है, तो क्या उसकी मन:स्थिति अत्यावश्यकता की होती है? (हाँ।) तो जहाँ तक मनुष्य पर शैतान के कार्य का संबंध है, मेरे पास दो वाक्यांश हैं, जो शैतान की दुर्भावना और दुष्ट प्रकृति की व्याख्या अच्छी तरह से कर सकते हैं, जिससे सच में तुम लोग शैतान की घृणा को जान सकते हो : मनुष्य के प्रति अपने नज़रिये में शैतान हमेशा हर मनुष्य पर इस सीमा तक बलपूर्वक कब्ज़ा करना और उस पर काबू करना चाहता है, जहाँ वह मनुष्य पर पूरा नियंत्रण हासिल कर ले और उसे कष्टप्रद तरीके से नुकसान पहुँचाए, ताकि वह अपना उद्देश्य और वहशी महत्वाकांक्षा पूरी कर सके। "बलपूर्वक कब्जा" करने का क्या अर्थ है? क्या यह तुम्हारी सहमति से होता है, या बिना तुम्हारी सहमति के? क्या यह तुम्हारी जानकारी से होता है, या बिना तुम्हारी जानकारी के? उत्तर है कि यह पूरी तरह से बिना तुम्हारी जानकारी के होता है! यह ऐसी स्थितियों में होता है, जब तुम अनजान रहते हो, संभवतः उसके तुमसे बिना कुछ कहे या तुम्हारे साथ बिना कुछ किए, बिना किसी प्रस्तावना के, बिना प्रसंग के—शैतान वहाँ होता है, तुम्हारे इर्द-गिर्द, तुम्हें घेरे हुए। वह तुम्हारा शोषण करने के लिए एक अवसर तलाशता है और फिर बलपूर्वक तुम पर कब्ज़ा कर लेता है, तुम पर काबू कर लेता है और तुम पर पूरा नियंत्रण प्राप्त करने और तुम्हें नुकसान पहुँचाने के अपने उद्देश्य को हासिल कर लेता है। मानव-जाति को परमेश्वर से छीनने की लड़ाई में शैतान का यह एक सबसे विशिष्ट इरादा और व्यवहार है।

— "वचन देह में प्रकट होता है" में 'स्वयं परमेश्वर, जो अद्वितीय है IV' से उद्धृत

आज कुछ दुष्ट आत्माएँ हैं, जो मनुष्य को अलौकिक चीजों के माध्यम से धोखा देती हैं; जो उनके द्वारा नक़ल किए जाने के अलावा और कुछ नहीं है, जो ऐसे कार्य के द्वारा मनुष्य को धोखा देने के लिए की जाती है, जो वर्तमान में पवित्र आत्मा द्वारा नहीं किया जाता। कई लोग चमत्कार करते हैं, बीमारों को चंगा करते हैं और दुष्टात्माओं को निकालते हैं; वे बुरी आत्माओं के कार्य के अलावा और कुछ नहीं हैं, क्योंकि पवित्र आत्मा वर्तमान में ऐसा कार्य नहीं करता, और जिन्होंने उस समय के बाद से पवित्र आत्मा के कार्य की नकल की है, वे निस्संदेह बुरी आत्माएँ हैं। उस समय इस्राएल में किया गया समस्त कार्य अलौकिक प्रकृति का था, लेकिन पवित्र आत्मा अब इस तरीके से कार्य नहीं करता, और अब ऐसा हर कार्य शैतान द्वारा की गई नकल और उसका भेस है और उसके द्वारा की जाने वाली गड़बड़ी है। लेकिन तुम यह नहीं कह सकते कि जो कुछ भी अलौकिक है, वह बुरी आत्माओं से आता है—यह परमेश्वर के कार्य के युग पर निर्भर करता है।

— "वचन देह में प्रकट होता है" में 'देहधारण का रहस्य (1)' से उद्धृत

परमेश्वर अपने कार्य को दोहराता नहीं है, वह ऐसा कार्य नहीं करता जो वास्तविक न हो, वह मनुष्य से अत्यधिक अपेक्षाएँ नहीं रखता, और वह ऐसा कार्य नहीं करता जो मनुष्यों की समझ से परे हो। वह जो भी कार्य करता है, वह सब मनुष्य की सामान्य समझ के दायरे के भीतर होता है, और सामान्य मानवता की समझ से परे नहीं होता, और उसका कार्य मनुष्य की सामान्य अपेक्षाओं के अनुसार किया जाता है। यदि यह पवित्र आत्मा का कार्य होता है, तो लोग हमेशा से अधिक सामान्य बन जाते हैं, और उनकी मानवता हमेशा से अधिक सामान्य बन जाती है। लोग अपने शैतानी स्वभाव का, और मनुष्य के सार का बढ़ता हुआ ज्ञान प्राप्त करते हैं, और वे सत्य के लिए हमेशा से अधिक ललक भी प्राप्त करते हैं। अर्थात्, मनुष्य का जीवन अधिकाधिक बढ़ता जाता है और मनुष्य का भ्रष्ट स्वभाव बदलाव में अधिकाधिक सक्षम हो जाता है—जिस सबका अर्थ है परमेश्वर का मनुष्य का जीवन बनना। यदि कोई मार्ग उन चीजों को प्रकट करने में असमर्थ है जो मनुष्य का सार हैं, मनुष्य के स्वभाव को बदलने में असमर्थ है, और, इसके अलावा, लोगों को परमेश्वर के सामने लाने में असमर्थ है या उन्हें परमेश्वर की सच्ची समझ प्रदान करने में असमर्थ है, और यहाँ तक कि उसकी मानवता के हमेशा से अधिक निम्न होने और उसकी भावना के हमेशा से अधिक असामान्य होने का कारण बनता है, तो यह मार्ग सच्चा मार्ग नहीं होना चाहिए, और यह दुष्टात्मा का कार्य या पुराना मार्ग हो सकता है। संक्षेप में, यह पवित्र आत्मा का वर्तमान कार्य नहीं हो सकता।

— "वचन देह में प्रकट होता है" में 'जो परमेश्वर को और उसके कार्य को जानते हैं, केवल वे ही परमेश्वर को संतुष्ट कर सकते हैं' से उद्धृत

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अब बड़ी-बड़ी विपत्तियाँ आ रही हैं और वह दिन निकट है जब परमेश्वर भलाई का प्रतिफल देगें और बुराई को दण्ड देंगे। हमें एक सुंदर गंतव्य कैसे मिल सकता है?

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