39. स्वभाव के परिवर्तन और अच्छे व्यवहार के बीच क्या अंतर है?

परमेश्वर के प्रासंगिक वचन:

स्वभाव में परिवर्तन मुख्य रूप से लोगों की प्रकृति में परिवर्तन से सम्बंधित है। किसी व्यक्ति की प्रकृति कुछ ऐसी चीज़ नहीं है जिसे बाहर के व्यवहारों से देखा जा सके; उसका सीधा संबंध लोगों के अस्तित्व का मूल्य और महत्व से है। जिसका मतलब यह है कि इसमें जीवन के बारे में व्यक्ति का दृष्टिकोण और उसके मूल्य, उसकी आत्मा के भीतर गहराई में रही चीज़ें, और उनका सार शामिल है। वह व्यक्ति जो सत्य को स्वीकार नहीं कर पाता, उसके इन पहलुओं में कोई परिवर्तन नहीं होगा। केवल यदि लोगों ने परमेश्वर के कार्य का अनुभव किया है और पूरी तरह से सत्य में प्रवेश किया है, यदि उन्होंने अस्तित्व और जीवन पर अपने मूल्यों और दृष्टिकोणों को बदला है, यदि चीजों को वैसे ही देखा है जैसे परमेश्वर देखता है, और यदि वे पूरी तरह से अपने को परमेश्वर के सामने प्रस्तुत और समर्पित करने में सक्षम हो गए हैं, तभी कहा जा सकता है कि उनके स्वभाव बदल गए हैं। ऐसा लग सकता है कि तुम कुछ प्रयास कर रहे हो, तुम कठिनाइयों के सामने लचीले हो सकते हो, तुम ऊपर से मिली कार्य व्यवस्थाओं को पूरा करने में सक्षम हो सकते हो, या तुम्हें जहाँ भी जाने के लिए कहा जाए तुम वहाँ जा सकते हो, लेकिन ये तुम्हारे व्यवहार में केवल छोटे परिवर्तन हैं, और तुम्हारे स्वभाव में परिवर्तन बन जाने के लिए ये पर्याप्त नहीं हैं। तुम कई रास्तों पर जाने में सक्षम हो सकते हो, तुम कई कठिनाइयों का सामना कर सकते हो और घोर अपमान को सहन करने में सक्षम हो सकते हो; तुम महसूस कर सकते हो कि तुम परमेश्वर के बहुत करीब हो और पवित्र आत्मा तुम्हारे में काम कर रहा है, लेकिन जब परमेश्वर तुम से कुछ ऐसा करने के लिए अनुरोध करता है जो तुम्हारी धारणाओं के अनुरूप नहीं है, तो तुम अभी भी नहीं झुक सकते हो, तुम बहाने ढूँढते हो, तुम परमेश्वर के खिलाफ विद्रोह और विरोध करते हो, इस हद तक कि तुम परमेश्वर की आलोचना करते हो और उसके ख़िलाफ़ विरोध करते हो। यह एक गंभीर समस्या है! यह साबित करता है कि तुम्हारे में अभी भी परमेश्वर का विरोध करने की प्रकृति है और तुम ज़रा भी परिवर्तित नहीं हुए हो।

— "मसीह की बातचीत के अभिलेख" में 'अपने स्वभाव को बदलने के बारे मेंतुम्हें क्या पता होना चाहिए' से उद्धृत

स्वभाव में परिवर्तन के बारे में तुम लोग क्या जानते हो? स्वभाव में परिवर्तन और व्यवहार में परिवर्तन के सार भिन्न-भिन्न हैं, और अभ्यास में परिवर्तन भी अलग हैं—सार में वे सभी अलग-अलग हैं। अधिकांश लोग परमेश्वर पर अपने विश्वास में व्यवहार पर विशेष जोर देते हैं, जिसके परिणामस्वरूप उनके व्यवहार में कुछ परिवर्तन होते हैं। परमेश्वर पर विश्वास करने के बाद, वे दूसरों के साथ बहस करना बंद कर देते हैं, वे लोगों से लड़ना और उन्हें अपमानित करना बंद कर देते हैं, वे धूम्रपान करना और शराब पीना छोड़ देते हैं, वे किसी भी सार्वजनिक संपत्ति की चोरी नहीं करते—चाहे वह एक कील या लकड़ी का एक टुकड़ा ही क्यों न हो—और यहाँ तक कि जब उन्हें कुछ नुकसान होता है या उनके साथ कुछ गलत होता है, वे इसे अदालतों में नहीं ले जाते। निश्चय ही, कुछ बदलाव उनके व्यवहार में होते हैं। क्योंकि, परमेश्वर पर विश्वास करने के बाद, सच्चे मार्ग को स्वीकार करना उन्हें विशेष रूप से अच्छा लगता है, और चूँकि उन्होंने पवित्र आत्मा के कार्य के अनुग्रह का स्वाद भी चख लिया है, वे विशेष रूप से उत्साहित हैं, और यहाँ तक कि कुछ भी ऐसा नहीं होता है जिसका वे त्याग नहीं कर सकते या जिसे वे सहन नहीं कर सकते। फिर भी, तीन, पांच, दस या तीस साल तक विश्वास करने के बाद—चूँकि उनके जीवन-स्वभाव में कोई परिवर्तन नहीं हुआ है, अंत में वे पुराने तरीकों में लौट आते हैं, उनका अहंकार और दंभ बढ़ जाता है, वे सत्ता और मुनाफे के लिए लड़ना शुरू करते हैं, वे कलीसिया के धन का लालच करते हैं, वे ऐसा कुछ भी करते हैं जो उनके अपने हित के लिए होता है, वे पदवी और सुख चाहते हैं, और वे परमेश्वर के घर के परजीवी बन जाते हैं। विशेष रूप से, अधिकांश अगुवा बिगड़ जाते हैं। और ये तथ्य क्या साबित करते हैं? जो परिवर्तन व्यवहार से अधिक किसी बात में नहीं होते, वे देर तक नहीं टिकते हैं। अगर लोगों के जीवन-स्वभाव में कोई बदलाव नहीं होता है, तो देर-सबेर उनका दुष्ट पक्ष स्वयं को दिखाएगा। क्योंकि उनके व्यवहार में परिवर्तन का स्रोत उत्साह है, जो पवित्र आत्मा द्वारा उस समय किये गए कुछ कार्य के साथ मिलकर, उनके लिए उत्साही बनना या कुछ समय के लिए अच्छा बनना बहुत आसान होता है। जैसा कि अविश्वासी लोग कहते हैं, "एक अच्छा कर्म करना आसान है, मुश्किल तो यह है कि जीवन भर अच्छे कर्म किए जाएँ।" लोग आजीवन अच्छे कर्म करने में असमर्थ हैं। उनका व्यवहार जीवन द्वारा निर्देशित होता है; जैसा भी उनका जीवन है, उनका व्यवहार भी वैसा ही होता है, और केवल वही जो स्वाभाविक रूप से प्रकट होता है जीवन का और व्यक्ति के स्वभाव का प्रतिनिधित्व करता है। जो चीजें नकली हैं, वे टिक नहीं सकतीं। जब परमेश्वर मनुष्य को बचाने के लिए कार्य करता है, यह मनुष्य को अच्छे व्यवहार का गुण देने के लिए नहीं होता—परमेश्वर का कार्य लोगों के स्वभाव को बदलने के लिए, उन्हें नए लोगों में पुनर्जीवित करने के लिए होता है। इस प्रकार, परमेश्वर का न्याय, ताड़ना, परीक्षण, और मनुष्य का परिशोधन, ये सभी उसके स्वभाव को बदलने के लिए हैं, ताकि वह परमेश्वर के प्रति पूर्ण आज्ञाकारिता और निष्ठा पा सके, और परमेश्वर की सामान्य उपासना कर सके। यही परमेश्वर के कार्य का उद्देश्य है। अच्छी तरह से व्यवहार करना परमेश्वर के प्रति आज्ञा-पालन करने के समान नहीं है, और यह मसीह के अनुरूप होने के बराबर तो और भी नहीं है। व्यवहार में परिवर्तन सिद्धांत पर आधारित होते हैं, और उत्साह से पैदा होते हैं—वे परमेश्वर के सच्चे ज्ञान पर या सत्य पर आधारित नहीं होते हैं, वे पवित्र आत्मा के मार्गदर्शन में आश्रित तो और भी कम होते हैं। यद्यपि ऐसे मौके होते हैं जब लोग जो भी करते हैं उसमें से कुछ पवित्र आत्मा द्वारा निर्देशित होता है, यह जीवन की अभिव्यक्ति नहीं है, और यह बात परमेश्वर को जानने के समान तो और भी नहीं है; चाहे किसी व्यक्ति का व्यवहार कितना भी अच्छा हो, वह इसे साबित नहीं करता कि वे परमेश्वर के प्रति आज्ञा-पालन करते हैं, या वे सत्य का अभ्यास करते हैं। व्यावहारिक परिवर्तन क्षणिक भ्रम हैं, वे उत्साह की अभिव्यक्ति हैं, और वे जीवन की अभिव्यक्ति नहीं हैं। ...

लोग अच्छी तरह से व्यवहार कर सकते हैं, लेकिन इसका मतलब यह नहीं है कि उनके पास सत्य है। लोगों का उत्साह उनसे केवल सिद्धांतों का अनुसरण और नियम का पालन करवा सकता है; जो लोग सत्य से रहित हैं उनके पास मूलभूत समस्याओं का समाधान करने का कोई रास्ता नहीं होता, और सिद्धांत सत्य के स्थान पर खड़ा नहीं हो सकता। जिन लोगों ने अपने स्वभाव परिवर्तन का अनुभव किया है, वे इससे अलग हैं। जिन लोगों ने अपने स्वभाव में बदलाव का अनुभव किया है उन्होने सत्य समझ लिया है, वे सभी मुद्दों पर विवेकी होते हैं, वे जानते हैं कि कैसे परमेश्वर की इच्छा के अनुसार कार्य करना है, कैसे सत्य के सिद्धांतों के अनुसार कार्य करना है, कैसे परमेश्वर को संतुष्ट करने के लिए कार्य करना है, और वे उस भ्रष्टता की प्रकृति को समझते हैं जो वे प्रकट करते हैं। जब उनके अपने विचार और धारणाओं को प्रकट किया जाता है, तो वे विवेकी बन सकते हैं और देह की इच्छाओं को छोड़ सकते हैं। स्वभाव में परिवर्तन को इस प्रकार व्यक्त किया जाता है। स्वभाव में परिवर्तन के बारे में मुख्य बात यह है कि उन्होंने स्पष्ट रूप से सत्य समझ लिया है, और जब चीज़ों को पूरा किया जाता है, तो वे सत्य का आपेक्षिक सटीकता के साथ अभ्यास करते हैं और उनकी भ्रष्टता अक्सर प्रकट नहीं होती है।

— "मसीह की बातचीत के अभिलेख" में 'बाहरी परिवर्तन औरस्वभाव में परिवर्तन के बीच अंतर' से उद्धृत

जिन लोगों के पास सच्चाई नहीं है, उनके स्वभाव में बिल्कुल कोई भी परिवर्तन नहीं हुआ है। स्वभाव में परिवर्तन का अर्थ परिपक्व और कुशल मानवता से युक्त होना नहीं है। यह मुख्य रूप से उसे संदर्भित करता है जिसमें लोगों की प्रकृति के भीतर के कुछ शैतानी विष परमेश्वर का ज्ञान पाने और सत्य समझने के परिणामस्वरूप बदल जाते हैं। कहने का अर्थ यह है कि उन शैतानी विषों को शुद्ध कर दिया जाता है, और परमेश्वर द्वारा व्यक्त किया गया सत्य लोगों के भीतर जड़ जमा लेता है, उसका जीवन बन जाता है, और उसके अस्तित्व की नींव बन जाता है। तभी वे नए लोग बन जाते हैं, और इस तरह उनका स्वभाव बदल जाता है। स्वभाव में परिवर्तन का मतलब यह नहीं है कि उनके बाहरी स्वभाव पहले की तुलना में विनम्र हैं, कि वे अभिमानी हुआ करते थे लेकिन अब तर्कसंगत ढंग से बोलते हैं, या कि वे पहले किसी की भी नहीं सुनते थे, लेकिन अब वे दूसरों की बात सुन सकते हैं; ऐसे बाहरी परिवर्तन स्वभाव के रूपान्तरण नहीं कहे जा सकते। बेशक स्वभाव के परिवर्तन में ये अवस्थाएँ शामिल हैं, लेकिन सर्वाधिक महत्व की बात यह है कि उनका आंतरिक जीवन बदल गया है। परमेश्वर द्वारा व्यक्त किया गया सत्य ही उनका जीवन बन जाता है, उनके भीतर के कुछ शैतानी विष हटा दिए जाते हैं, उनके दृष्टिकोण पूरी तरह से बदल गये हैं, और इनमें से कुछ भी सांसारिक चीज़ों के जैसा नहीं है। वह स्पष्ट रूप से बड़े लाल अजगर की योजनाओं और विषों को देखता है; उसने जीवन का सच्चा सार समझ लिया है। इससे उसके जीवन के मूल्य बदल गए हैं—यह सबसे मौलिक परिवर्तन है और यही स्वभाव में परिवर्तन का सार है।

इससे पहले लोग किस आधार पर रहते थे? सभी लोग स्वयं के लिए जीते हैं। मैं तो बस अपने लिए सोचूँगा, बाकियों को शैतान ले जाए—यह मानव प्रकृति का निचोड़ है। लोग अपनी ख़ातिर परमेश्वर पर विश्वास करते हैं; वे चीजों को त्यागते हैं, परमेश्वर के लिए स्वयं को खपाते हैं और परमेश्वर के प्रति वफादार रहते हैं—लेकिन फिर भी वे ये सब स्वयं के लिए करते हैं। संक्षेप में, यह सब स्वयं के लिए आशीर्वाद प्राप्त करने के उद्देश्य से किया जाता है। दुनिया में, सब कुछ निजी लाभ के लिए होता है। परमेश्वर पर विश्वास करना आशीर्वाद प्राप्त करने के लिए है, और आशीर्वाद प्राप्त करने के लिए ही कोई व्यक्ति सब कुछ छोड़ देता है, और आशीर्वाद प्राप्त करने के लिए कोई व्यक्ति बहुत दुःख का भी सामना कर सकता है। यह सब मनुष्य की भ्रष्ट प्रकृति का प्रयोगसिद्ध प्रमाण है। हालांकि, जिन लोगों के स्वभाव में परिवर्तन हुआ है वे भिन्न होते हैं। उन्हें कैसे सार्थक रूप से जीना चाहिए, मानव कहलाने के योग्य होने के लिए उन्हें कैसे एक व्यक्ति के कर्तव्यों को पूरा करना चाहिए, उन्हें कैसे परमेश्वर की आराधना करनी चाहिए, और कैसे उन्हें परमेश्वर की आज्ञा माननी चाहिए और उसे संतुष्ट करना चाहिए—उनका मानना है कि यह एक व्यक्ति होने का आधार है और स्वर्ग और पृथ्वी के अपरिवर्तनीय सिद्धांतों के अनुरूप उनका दायित्व है। अन्यथा, वे मानव कहलाने के योग्य नहीं होंगे; उनके जीवन खाली और निरर्थक होंगे। वे यह महसूस करते हैं कि लोगों को परमेश्वर को संतुष्ट करने के लिए, अपना कर्तव्य अच्छी तरह से पूरा करने के लिए जीवन जीना चाहिए, उन्हें एक सार्थक जीवन जीना चाहिए ताकि मृत्यु हो जाने पर भी, वे संतुष्ट रहें और उनमें ज़रा सा भी पछतावा न रहे—उन्हें निरर्थक जीवन नहीं जीना चाहिए। इन दो प्रकार की परिस्थितियों की तुलना करने से, हम देखते हैं कि बाद वाला वह व्यक्ति है जिसका स्वभाव बदल गया है, और चूँकि उसका जीवन-स्वभाव बदल चुका है, जीवन पर उसका दृष्टिकोण निश्चित रूप से बदल गया है। इन अलग मूल्यों के साथ, वह फिर कभी खुद के लिए नहीं जीएगा, और परमेश्वर पर उसका विश्वास फिर कभी अपने लिए आशीर्वाद पाने के उद्देश्य के लिए नहीं होगा। वह इसे कहने में सक्षम होगा, "परमेश्वर को जानने के बाद, मेरे लिए मृत्यु क्या है? परमेश्वर को जानने से मुझे एक सार्थक जीवन जीने में मदद मिली है। मैं व्यर्थ में नहीं जिया हूँ और मैं पछतावे के साथ नहीं मरूँगा—मुझे कोई शिकायत नहीं है।" क्या यह जीवन पर एक परिवर्तित दृष्टिकोण नहीं है? इसलिए, किसी के जीवन स्वभाव में परिवर्तन का मुख्य कारण उसके भीतर सत्य का होना है, और परमेश्वर का ज्ञान होना है; इससे जीवन पर व्यक्ति का दृष्टिकोण बदल जाता है, और मूल्य पहले से भिन्न हो जाते हैं। यह परिवर्तन व्यक्ति के भीतर से, और उसके जीवन से शुरू होता है; यह निश्चित रूप से सिर्फ एक बाहरी परिवर्तन नहीं है। कुछ नए विश्वासियों ने, परमेश्वर पर विश्वास करने के बाद, लौकिक चीज़ों को पीछे छोड़ दिया है; जब वे अविश्वासियों से मिलते हैं तो वे कुछ नहीं बोलते हैं, और वे शायद ही कभी अपने अविश्वासी रिश्तेदारों और मित्रों से मिलते हैं। अविश्वासियों का कहना होता है, "यह व्यक्ति सचमुच बदल चुका है।" इसलिए वे सोचते हैं, "मेरा स्वभाव सचमुच बदल गया है—अविश्वासी कहते हैं कि मैं बदल गया हूँ।" सच कहें तो, क्या उनके स्वभाव में वास्तव में बदलाव आया है? नहीं आया है। ये केवल बाह्य परिवर्तन हैं। उनके जीवन में कोई परिवर्तन नहीं हुआ है, और उनकी शैतानी प्रकृति उनके भीतर जड़ें जमाये हुए है, पूरी तरह अछूती रही है। कभी-कभी, लोग पवित्र आत्मा के कार्य की वजह से उत्साह में आ जाते हैं; कुछ बाहरी परिवर्तन होते हैं, और वे कुछ अच्छे कर्म करते हैं। लेकिन यह स्वभाव में परिवर्तन के बराबर नहीं है। तुम बिना सत्य के हो, चीज़ों के प्रति तुम्हारा दृष्टिकोण नहीं बदला है, यहाँ तक कि यह अविश्वासी लोगों से भी अलग नहीं है, और जीवन के बारे में तुम्हारे मूल्य और दृष्टिकोण नहीं बदले हैं। तुम्हारे पास एक ऐसा हृदय भी नहीं है जो परमेश्वर का सम्मान करे, जो कि न्यूनतम आवश्यकता है जो तुम्हारे पास होनी चाहिए। तुम्हारे स्वभाव में बदलाव से बढ़कर कुछ भी नहीं है।

— "मसीह की बातचीत के अभिलेख" में 'बाहरी परिवर्तन औरस्वभाव में परिवर्तन के बीच अंतर' से उद्धृत

संदर्भ के लिए धर्मोपदेश और संगति के उद्धरण:

धार्मिक दुनिया में, बहुत से भक्त कहते हैं, "हम प्रभु यीशु में अपने विश्वास के कारण बदल गए हैं। हम प्रभु के लिए खुद को खपाने में, काम करने में, कारावास सहन करने में सक्षम हैं, और उसके नाम को अस्वीकार नहीं करते हैं। हम कई गुणकारी चीजें करने, भले कार्य के लिए धन देने, दान करने और गरीबों की सहायता करने में सक्षम हैं। ये बड़े बदलाव हैं! इसलिए हम स्वर्ग के राज्य में ले जाये जाने के योग्य हैं।" तुम इन शब्दों के बारे में क्या सोचते हो? (वे गलत हैं।) इन शब्दों के बारे में क्या तुममें कोई विवेक है? शुद्ध किये जाने का क्या मतलब है? क्या तुम्हें लगता है कि यदि तुम्हारा व्यवहार बदल गया है और तुम अच्छे कर्म करते हो, तो तुम्हें शुद्ध कर दिया गया है? कोई कहता है, "मैंने सब कुछ दरकिनार कर दिया है। परमेश्वर के लिए खुद को खपाने के लिए, मैंने अपनी नौकरी, अपना परिवार और देह की इच्छाओं को भी दरकिनार कर दिया। क्या यह शुद्ध किये जाने के बराबर है?" यदि तुमने यह सब किया भी है, तो यह ठोस प्रमाण नहीं है कि तुम्हें शुद्ध कर दिया गया है। तो, मुख्य बात क्या है? तुम किस पहलू में ऐसी शुद्धता प्राप्त कर सकते हो जिसे असल शुद्धता माना जा सकता है? परमेश्वर का विरोध करने वाले शैतानी स्वभाव की शुद्धता ही सच्ची शुद्धता है। उस शैतानी स्वभाव की अभिव्यक्तियाँ क्या हैं जो परमेश्वर का विरोध करती हैं? सबसे स्पष्ट अभिव्यक्तियाँ हैं, एक व्यक्ति का अहंकार, दम्भ, आत्मतुष्टता और आत्म-गौरव, साथ ही साथ उसका टेढ़ापन, विश्वासघात, झूठ बोलना, धोखाधड़ी और पाखंड। जब ये शैतानी स्वभाव किसी का हिस्सा नहीं रह जाते हैं, तो उसे वास्तव में शुद्ध कर दिया गया है। कहा जाता है कि मनुष्य के शैतानी स्वभाव की 12 महत्वपूर्ण अभिव्यक्तियाँ हैं, जैसे कि, स्वयं को सबसे सम्मानजनक मानना; खुद से अनुकूल लोगों को बढ़ने देना और अपना विरोध करने वालों का नाश होने देना; केवल परमेश्वर को ही अपने आप से बेहतर मानना, किसी और के सामने न झुकना, किसी और के प्रति आदर न रखना; एक बार सत्ता पाने के बाद अपना एक स्वतंत्र राज्य बनाना; सत्ता का उपयोग करने वाला एकमात्र इन्सान बनने और सभी चीजों का स्वामी बनने की चाह रखना, और अपने आप सब कुछ तय करने की चाह रखना। ये सभी अभिव्यक्तियाँ शैतानी स्वभाव हैं। कोई व्यक्ति अपने जीवन स्वभाव में बदलाव का अनुभव कर पाए, इससे पहले इन शैतानी स्वभावों को शुद्ध किया जाना ज़रूरी है। किसी के जीवन स्वभाव में बदलाव एक पुनर्जन्म है, क्योंकि उसका सार बदल गया है। इससे पहले, जब उसे सत्ता दी गई, तो वह अपना स्वतंत्र राज्य बनाने में सक्षम था। अब, जब उसे सत्ता दी जाती है, तो वह परमेश्वर की सेवा करता है, परमेश्वर की गवाही देता है और परमेश्वर के चुने हुए लोगों के लिए सेवक बन जाता है। क्या यह वास्तविक परिवर्तन नहीं है? इससे पहले, सभी स्थितियों में वह खुद का दिखावा करता था और चाहता था कि अन्य लोग उसके बारे में श्रेष्ठ सोचें और उसकी आराधना करें। अब, वह हर जगह परमेश्वर की गवाही देता है, और खुद का दिखावा नहीं करता। चाहे लोग उससे कैसे भी व्यवहार करें, उसे वह ठीक लगता है। उसे कोई फर्क नहीं पड़ता कि लोग उसके बारे में कैसी टिप्पणी करते हैं, उसे वह ठीक लगता है। उसे इसकी कोई परवाह नहीं होती है। वह केवल परमेश्वर को उत्कृष्टता देना चाहता है, परमेश्वर के लिए गवाही देना चाहता है, दूसरों को परमेश्वर की समझ प्राप्त करने में मदद करना चाहता है, और परमेश्वर की उपस्थिति में दूसरों की पालन करने में मदद करना चाहता है। क्या यह जीवन स्वभाव में बदलाव नहीं है? "मैं भाई-बहनों के साथ प्रेम से व्यवहार करूँगा। मैं सभी परिस्थितियों में दूसरों के प्रति करुणामय रहूँगा। मैं अपने बारे में नहीं सोचूंगा और दूसरों को लाभ प्रदान करूँगा। मैं दूसरों को उनकी जिंदगी में आगे बढ़ने में मदद करूँगा और अपनी ज़िम्मेदारियों को पूरा करूंगा। मैं दूसरों की सत्य समझने में और सत्य प्राप्त करने में मदद करूँगा।" दूसरों को स्वयं के समान प्यार करने का यही मतलब है! जब शैतान की बात आती है, तो तुम इसे समझ सकते हो, सिद्धांत बना सकते हो, इसके साथ एक सीमांकन रेखा खींच सकते हो और शैतान की बुराइयों को पूरी तरह से प्रकट कर सकते हो ताकि परमेश्वर के चुने हुए लोगों को इसके नुकसान से बचाया जा सके। यह परमेश्वर के चुने हुए लोगों की रक्षा करना है, और यह दूसरों को और भी अधिक स्वयं के समान प्यार करना है। इसके अतिरिक्त, तुम्हें उससे प्यार करना चाहिए जिससे परमेश्वर प्यार करता है और उससे नफरत करनी चाहिए जिससे परमेश्वर घृणा करता है। परमेश्वर मसीह विरोधियों, दुष्ट आत्माओं और दुष्ट लोगों से नफरत करता है। इसका मतलब है कि हमें भी मसीह विरोधियों, दुष्ट आत्माओं और दुष्ट लोगों से नफरत करनी है। हमें परमेश्वर की तरफ खड़ा होना चाहिए। हम उनके साथ समझौता नहीं कर सकते हैं। परमेश्वर किससे प्यार करता है? परमेश्वर उनसे प्यार करता है जिन्हें वह बचाना और आशीष देना चाहता है। इन लोगों के लिए, हमें जिम्मेदार होना चाहिए, उनके साथ प्यार से व्यवहार करना चाहिए, उन्हें सहायता, नेतृत्व और समर्थन प्रदान करना चाहिए। क्या यह किसी के जीवन स्वभाव में बदलाव नहीं है? इसके अतिरिक्त, जब तुमने कुछ अपराध या गलतियाँ की हैं, या कोई काम करने में सिद्धांतों की उपेक्षा की है, तो तुम भाई-बहनों की आलोचना, उलाहना, व्यवहार और कांट-छांट स्वीकार कर सकते हो; तुम इन सभी चीजों से उचित व्यवहार कर सकते हो और उन्हें परमेश्वर से प्राप्त कर सकते हो, घृणा त्याग सकते हो, और अपने भ्रष्टाचार को दूर करने के लिए सत्य की तलाश कर सकते हो। क्या यह तुम्हारे जीवन स्वभाव में बदलाव नहीं है? हाँ, ऐसा है। ...

क्या एक व्यक्ति के व्यवहार में बदलाव, जिसकी धार्मिक जगत में चर्चा है, जीवन स्वभाव में बदलाव का प्रतिनिधित्व कर सकता है? सभी कहते हैं कि नहीं कर सकता। ऐसा क्यों है? मुख्य कारण यह है कि वह अभी भी परमेश्वर का विरोध करता है। यह बिल्कुल फरीसियों जैसा है जो बाहर से बड़े भक्त थे। वे अक्सर प्रार्थना करते थे, पवित्रशास्त्र को समझाते थे और व्यवस्था के नियमों का बहुत अच्छे से पालन करते थे। ऐसा कहा जा सकता है कि बाहरी रूप से, वे निंदा से परे थे। लोग कोई भी दोष निकालने में असमर्थ थे। हालाँकि, वे अभी भी मसीह का विरोध करने और निंदा करने में सक्षम क्यों थे? यह क्या इशारा करता है? चाहे लोग कितने भी अच्छे प्रतीत हों, अगर उनके पास सत्य नहीं है और इस प्रकार वे परमेश्वर को नहीं जानते हैं तो वे अभी भी परमेश्वर का प्रतिरोध करेंगे। बाहरी रूप से, वे बहुत अच्छे थे, लेकिन यह जीवन स्वभाव में बदलाव के रूप में क्यों नहीं गिना जाता है? ऐसा इसलिए है क्योंकि उनका भ्रष्ट स्वभाव ज़रा भी नहीं बदला था और वे अभी भी घमंडी, दम्भी और विशेष रूप से आत्म-तुष्ट थे। वे अपने ज्ञान और सिद्धांतों में विश्वास करते थे और मानते थे कि उनकी शास्त्रों की समझ सर्वोत्तम है। उनका मानना था कि वे सबकुछ समझ गए थे और वे अन्य लोगों की तुलना में बेहतर थे। यही कारण है कि जब प्रभु यीशु प्रचार कर रहा था और अपना कार्य कर रहा था, तब उन्होंने उसका विरोध किया और निंदा की। यही कारण है कि जब धार्मिक जगत ने सुनता है कि अंत के दिनों के मसीह ने सारा सत्य व्यक्त किया है, तो वे उसकी निंदा करते हैं, भले ही उन्हें पता है कि यह सच है।

— 'जीवन में प्रवेश पर धर्मोपदेश और संगति' से उद्धृत

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