13. सत्य को समझने और सिद्धांत को समझने में क्या अंतर है?

परमेश्वर के प्रासंगिक वचन:

परमेश्वर के वचन में वास्तविक अर्थ की वास्तविक समझ आना कोई सरल बात नहीं है। इस तरह मत सोच: मैं परमेश्वर के वचनों के शाब्दिक अर्थ की व्याख्या कर सकता हूँ, और हर कोई इसे अच्छा कहता है और मुझे शाबाशी देता है, तो यह परमेश्वर के वचन को समझने के रूप में गिना जाता है। यह परमेश्वर के वचन को समझने के समान नहीं है। यदि तूने परमेश्वर के वचन के भीतर से कुछ प्रकाश प्राप्त किया है और तूने परमेश्वर के वचन के वास्तविक महत्व को महसूस किया है, यदि तू परमेश्वर के वचन के इरादे को और वे अंततः जो प्राप्त करेंगे, उसको व्यक्त कर सकता है, एक बार यह सब स्पष्ट हो जाने पर यह परमेश्वर के वचन को कुछ स्तर तक समझने के रूप में गिना जाता है। तो, परमेश्वर के वचन को समझना इतना आसान नहीं है। सिर्फ इसलिए कि तू परमेश्वर के वचन के पत्र की एक लच्छेदार व्याख्या दे सकता है, इसका यह अर्थ नहीं है कि तू इसे समझता है। भले ही तू परमेश्वर के वचन के पत्र की कितनी ही व्याख्या क्यों न कर सकता हो, यह अभी भी मनुष्य की कल्पना और उसके सोचने का तरीका है—यह बेकार है।

— "मसीह की बातचीत के अभिलेख" में 'मनुष्य का स्वभाव कैसे जानें' से उद्धृत

तुम सब सत्य का सार निकालने में भटक गए हो; जब तुम ये सभी सार निकाल लेते हो, तो इससे केवल नियम ही प्राप्त होते हैं। तुम्हारा "सत्य का सार प्रस्तुत करना" लोगों को जीवन प्राप्त करने या अपने स्वभाव में परिवर्तन प्राप्त करने देने के लिए नहीं है। इसके बजाय, इसके कारण लोग सत्य के भीतर से कुछ ज्ञान और सिद्धांतों में निपुणता प्राप्त करते हैं। वे ऐसे प्रतीत होते हैं मानो कि वे परमेश्वर के कार्य के पीछे के प्रयोजन को समझते हैं, जबकि वास्तव में उन्होंने केवल कुछ शब्दों और सिद्धांतों में निपुणता हासिल की है। वे सत्य के मर्म को नहीं समझते हैं, और यह धर्मशास्त्र का अध्ययन करने या बाइबल पढ़ने से भिन्न नहीं है। तुम हमेशा इन पुस्तकों या उन सामग्रियों को संकलित करते रहते हो, और इसलिए सिद्धांत के इस पहलू या ज्ञान के उस पहलू को धारण करने वाले बन जाते हो। तुम सिद्धांतों के प्रथम श्रेणी के वक्ता हो—लेकिन जब तुम बोल लेते हो तो क्या होता है? तब लोग अनुभव करने में असमर्थ होते हैं, उन्हें परमेश्वर के कार्य की कोई समझ नहीं होती है और स्वयं की भी समझ नहीं होती है। अंत में, उन्होंने जो कुछ प्राप्त किया होगा वे बस सूत्र और नियम ही होंगे। तुम उन चीजों के बारे में बात कर सकते हो लेकिन और कुछ नहीं। यदि परमेश्वर ने कुछ नया किया, तो क्या तुम लोगों को ज्ञात सभी सिद्धांत उस काम से मेल खाने वाले हो सकते हैं जो परमेश्वर करता है? तुम्हारी ये बातें केवल नियम हैं और तुम लोगों से केवल धर्मशास्त्र का अध्ययन करवा रहे हो: तुम उन्हें परमेश्वर के वचन या सत्य का अनुभव करने की अनुमति नहीं दे रहे हो। इसलिए वे पुस्तकें जिन्हें तुम संकलित करते हो, वे लोगों को केवल धर्मशास्त्र और ज्ञान में, नए सूत्रों, नियमों और प्रथाओं में ही ला सकती हैं। वे लोगों को परमेश्वर के सामने नहीं ला सकती हैं, या लोगों को सत्य को समझने या परमेश्वर की इच्छा को समझने में मदद नहीं कर सकती हैं। तुम सोच रहे हो कि प्रश्न पर प्रश्न पूछने से, जिनके तब तुम उत्तर देते हो, और जिनके लिए तुम एक रूपरेखा या सारांश लिखते हो, इस तरह के व्यवहार से तुम्हारे भाई-बहन आसानी से समझ जाएंगे। याद रखने में आसान होने के अलावा, एक नज़र में ये इन प्रश्नों के बारे में स्पष्ट हैं, और तुमको लगता है कि इस तरह से कार्य करना बहुत अच्छा है। लेकिन वे जो समझ रहे हैं वह वास्तविक मर्म नहीं है; यह वास्तविकता से भिन्न है और सिर्फ शब्द और सिद्धांत हैं। तो यह बेहतर होगा कि तुम इन चीजों को बिल्कुल भी नहीं करो। तुम लोगों को ज्ञान को समझने और ज्ञान में निपुणता प्राप्त करने की ओर ले जाने के लिए ये कार्य करते हो। तुम अन्य लोगों को सिद्धान्तों में, धर्म में लाते हो, और उनसे परमेश्वर का अनुसरण और धार्मिक सिद्धांतों के भीतर परमेश्वर में विश्वास करवाते हो। क्या तब तुम बस पौलुस के समान नहीं हो?

— "मसीह की बातचीत के अभिलेख" में'सत्य के बिना परमेश्वर को अपमानित करना आसान है' से उद्धृत

अगर तुम लोगों ने परमेश्वर के बहुत सारे वचन पढ़े हैं, लेकिन केवल पाठ के अर्थ को समझा है और तुममें अपने व्यवहारिक अनुभव से परमेश्वर के वचनों का प्रत्यक्ष ज्ञान का अभाव है, तो तुम परमेश्वर के वचनों को नहीं समझोगे। तुम्हारे विचार से, परमेश्वर के वचन जीवन नहीं हैं, बल्कि महज़ बेजान शब्द हैं। और अगर तुम केवल बेजान शब्दों का पालन करते रहोगे, तब न तो तुम परमेश्वर के वचनों के सार को ग्रहण कर पाओगे, न ही उसकी इच्छा को समझ पाओगे। जब तुम अपने वास्तविक अनुभव में उसके वचनों का अनुभव कर लोगे, तभी परमेश्वर के वचनों का आध्यात्मिक अर्थ तुम्हारे सामने स्वयं को प्रकट करेगा, और अनुभव से ही तुम बहुत-से सत्यों के आध्यात्मिक अर्थ को ग्रहण कर पाओगे और परमेश्वर के वचनों के रहस्यों को खोल पाओगे। अगर तुम इन्हें अमल में न लाओ, तो उसके वचन कितने भी स्पष्ट क्यों न हों, तुमने बस उन खोखले शब्दों और सिद्धांतों को ही ग्रहण किया है, जो तुम्हारे लिए धर्म संबंधी नियम बन चुके हैं। क्या यही फरीसियों ने नहीं किया था? अगर तुम लोग परमेश्वर के वचनों को अमल में लाओ और उनका अनुभव करो, तो ये तुम लोगों के लिए व्यवहारिक बन जाएंगे; अगर तुम इनका अभ्यास करने का प्रयास न करो, तो तुम्हारे लिए परमेश्वर के वचन तीसरे स्वर्ग की किंवदंती से ज़्यादा कुछ नहीं है। ...

... परमेश्वर के वचनों की सच्ची समझ तब पैदा होती है जब तुम सत्य का अभ्यास करते हो, और तुम्हें यह समझ लेना चाहिए कि "इसे हमेशा सत्य पर अमल करके ही समझा जा सकता है।" आज, परमेश्वर के वचनों को पढ़कर, तुम केवल यह कह सकते हो कि तुम परमेश्वर के वचनों को जानते हो, लेकिन यह नहीं कह सकते कि तुम इन्हें समझते हो। कुछ लोगों का कहना है कि सत्य पर अमल करने का एकमात्र तरीका यह है कि पहले इसे समझा जाए, लेकिन यह बात आंशिक रूप से ही सही है, निश्चय ही यह पूरे तौर पर सही तो नहीं है। सत्य का ज्ञान प्राप्त करने से पहले, तुमने उस सत्य का अनुभव नहीं किया है। किसी उपदेश में कोई बात सुनकर यह मान लेना कि तुम समझ गए हो, सच्ची समझ नहीं होती—इसे महज़ सत्य को शाब्दिक रूप में समझना कहते हैं, यह उसमें छिपे सच्चे अर्थ को समझने के समान नहीं है। सत्य का सतही ज्ञान होने का अर्थ यह नहीं है कि तुम वास्तव में इसे समझते हो या तुम्हें इसका ज्ञान है; सत्य का सच्चा अर्थ इसका अनुभव करके आता है। इसलिए, जब तुम सत्य का अनुभव कर लेते हो, तो तुम इसे समझ सकते हो, और तभी तुम इसके छिपे हुए हिस्सों को समझ सकते हो। संकेतार्थों को और सत्य के सार को समझने के लिए तुम्हारा अपने अनुभव को गहरा करना की एकमात्र तरीका है।

— "वचन देह में प्रकट होता है" में 'सत्य को समझने के बाद, तुम्हें उस पर अमल करना चाहिए' से उद्धृत

वह ज्ञान जिसकी तुम चर्चा कर रहे हो वह सत्य के अनुरूप है या नहीं यह मुख्य रूप से इस बात पर निर्भर करता है कि तुम्‍हारे पास व्यावहारिक अनुभव है या नहीं। जहाँ तुम्हारे अनुभवों में सच्चाई है, वहाँ तुम्हारा ज्ञान व्यावहारिक और मूल्यवान होगा। अपने अनुभव के माध्यम से, तुम विवेक और अंतर्दृष्टि भी प्राप्त कर सकते हो, अपने ज्ञान को और गहरा कर सकते हो, और अपना आचरण करने में अपनी बुद्धि और सामान्यबोध को बढ़ा सकते हो। ऐसे लोगों के द्वारा बोला गया ज्ञान जो सत्य को धारण नहीं करते हैं मात्र सिद्धान्त है, भले ही कितना ही ऊँचा क्यों न हो। जब देह के मामलों की बात आती है तो हो सकता है कि इस प्रकार का व्यक्ति बहुत बुद्धिमान हो परन्तु जब आध्यात्मिक मामलों की बात आती है तो वह विभेद नहीं कर सकता है। ऐसा इसलिए है क्योंकि ऐसे लोगों का आध्यात्मिक मामलों में बिलकुल भी अनुभव नहीं होता है। ये ऐसे लोग हैं जो आध्यात्मिक मामलों में प्रबुद्ध नहीं हैं और वे आत्मिक मामलों को नहीं समझते हैं। चाहे तुम ज्ञान के किसी भी पहलू के बारे में बात करो, अगर यह तुम्हारा अस्तित्व है, तो यह तुम्हारा व्यक्तिगत अनुभव है, और तुम्हारा वास्तविक ज्ञान है। जो लोग केवल सिद्धान्त की ही बात करते हैं, अर्थात्, जो लोग सत्य या वास्तविकता को धारण नहीं करते हैं, तो वे जिस बारे में बात करते हैं उसे भी उनका अस्तित्व कहा जा सकता है, क्योंकि उनका सिद्धान्त केवल गहरे चिंतन से आया है और यह गहराई से मनन करने वाले उनके मन का परिणाम है, परन्तु यह केवल सिद्धान्त ही है, यह कल्पना से अधिक कुछ नहीं है!

— "वचन देह में प्रकट होता है" में 'परमेश्वर का कार्य और मनुष्य का कार्य' से उद्धृत

संदर्भ के लिए धर्मोपदेश और संगति के उद्धरण:

जो कुछ भी तुम्हारे अपने अनुभव से नहीं है, चाहे तुमने इसे पुस्तकों से या अन्य लोगों के अनुभव से ही क्यों न सीखा हो, तुम्हारे लिए केवल एक सिद्धांत बन कर रह जाता है। जब तुम इसे अनुभव कर लोगे, और अपने अनुभव से किसी परिणाम पर पहुँच जाओगे, तभी तुम्हें सच्ची समझ प्राप्त होगी। जब तुम इसका संवाद करते हो, तो यह वास्तविकता होती है; केवल तभी यह सचमुच एक वास्तविकता बनती है। देखो कि अविश्वासी लोग कुछ सिद्धांतों की खोज कैसे करते हैं: वे केवल जो लिखा है, उसी में से शोध करते हैं, वे सिद्धांतों पर खोज करते हैं और उनका मूल्यांकन करते हैं और फिर अपने निष्कर्ष पर पहुँचते हैं। परमेश्वर के वचनों का एक अंश पढ़ने के बाद, कुछ लोग सिद्धांत के परिप्रेक्ष्य में अपनी शोध शुरू कर देते हैं, विशेषरूप से यदि वे धर्मशास्त्री, पादरी, या विद्वान हैं। वे सत्य को अनुभव से नहीं खोजते हैं, वे परमेश्वर की एक सही समझ की तलाश नहीं करते हैं। वे सभी विभिन्न सिद्धांतों की जाँच करते हैं और अंत में कुछ निष्कर्ष पर पहुँच जाते हैं। तुम्हें क्या लगता है, जिन निष्कर्षों पर वे पहुँचते हैं, वे वास्तविक होते हैं या सैद्धांतिक? वे सभी सिद्धांत हैं। इसका कारण यह है कि वे अपने स्वयं के अनुभव के आधार पर नहीं बल्कि विशेष शाब्दिक अनुसंधान के आधार पर इन निष्कर्षों पर पहुँचे थे। उन्होंने जो कुछ भी पढ़ा था, उसी के आधार पर उन्होंने खोज-बीन की, विचार-विमर्श किया और चीजों का मूल्यांकन किया था। शाब्दिक अनुसंधान से, बाइबल में अभिलिखित चीज़ों की शोध से निकले निष्कर्षों ने, एक तरह के सिद्धांत का निर्माण किया, जिसे धर्मशास्त्रीय सिद्धांत कहा जाता है। इसमें अनुभव से मिली कोई समझ नहीं है, और पवित्र आत्मा की कोई प्रबुद्धता नहीं है। पवित्र आत्मा की प्रबुद्धता से मिली गहरी समझ शब्दों की बाहरी परत के परे जाती है; यह किसी भी सतही भाषा के द्वारा व्यक्त नहीं की जा सकती है। जब तुम अनुभव में प्रवेश करने के बाद सत्य की तलाश करोगे, तो पवित्र आत्मा तुम्हें प्रबुद्ध करेगा। जिन चीज़ों को पवित्र आत्मा तुम्हारे लिए प्रबुद्ध और रोशन करता है वे ही चीजें सबसे वास्तविक हैं और ऐसी चीज़ें हैं जो तुम्हारे लिए सबसे सच्ची हैं, ये ऐसी चीज़ें हैं जिन्हें तुम बाइबल से प्राप्त नहीं कर सकते हो, चाहे तुम कितने भी परिश्रम के साथ इसका अध्ययन क्यों न करो। तो आज परमेश्वर हमें परमेश्वर के वचन का अनुभव करने देता है। यदि, परमेश्वर के वचन के हमारे अनुभव में, पवित्र आत्मा हमें प्रबुद्ध करता है, तो हम परमेश्वर के वचनों की वास्तविक समझ प्राप्त कर सकते हैं। चाहे तुम परमेश्वर के वचनों के शाब्दिक अर्थ का कैसे भी अध्ययन क्यों न करो, इस वास्तविक समझ को नहीं पाया जा सकता है; यह कुछ ऐसी चीज़ है जिस तक मानवीय सोच द्वारा नहीं पहुँचा जा सकता है। चाहे तुम कितनी भी कोशिश क्यों न करो, सत्य की कल्पना नहीं की जा सकती है। इसलिए, पवित्र आत्मा के मार्गदर्शन और रोशनी से प्राप्त सत्य को पुस्तकों की शोध से नहीं समझा जा सकता है; और यही परमेश्वर के बारे में असली समझ है।

— 'जीवन में प्रवेश पर धर्मोपदेश और संगति' से उद्धृत

सिद्धांत के वचनों और सत्य के बीच वास्तव में क्या अंतर है? सत्य परमेश्वर के वचन की सारभूत बातें हैं; यह परमेश्वर की इच्छा को दर्शाता है। सिद्धांतों के वचन सतही चीज़ों की श्रेणी से संबंधित होते हैं, वे मानवीय अवधारणाओं और कल्पनाओं को दर्शाते हैं। वे सत्य के अनुरूप नहीं होते हैं। सत्य की सारभूत बातें असाधारण रूप से व्यावहारिक होती हैं; वे बातें सिद्धांत पर आधारित और विशेष रूप से विश्वसनीय होती हैं। जब कोई व्यक्ति किसी सारभूत चीज़ को समझ लेता है, तो उसका हृदय उज्ज्वल हो जाता है और मुक्ति को पाता है—वह नियमों की बाध्यताओं के अधीन नहीं रह जाता है। दूसरी ओर, सिद्धांत के वचन रिक्त और अवास्तविक होते हैं। वे नियमों और परम्पराओं के अलावा कुछ भी नहीं होते हैं, और लोगों को लाचार होने और मुक्त महसूस न करने की ओर विशेष रूप से प्रवृत्त करते हैं। इसके अलावा, कोई व्यक्ति चाहे सिद्धांत के कितने ही वचनों को क्यों न जानता हो, वे उसके जीवन-स्वभाव में कोई परिवर्तन नहीं ला सकते हैं। लोगों को इनका थोड़ा सा ही बुनियादी लाभ होता है। इसलिए, सिद्धांत के वचनों की तुलना सत्य से की ही नहीं जा सकती है। सत्य किसी व्यक्ति का जीवन बन सकता है। जब एक बार कोई व्यक्ति इसे स्वीकार कर लेता है, तो यह स्वभाव में बदलाव लाएगा। बहुत से सिद्धांतों की समझ किसी व्यक्ति में केवल अहंकार, आत्म-महत्व, घमंड ला सकती है, उसमें समझ का अभाव ला सकती है। जब सत्य ही किसी व्यक्ति का जीवन हो जाता है केवल तभी उसका अभ्यास वास्तविक बनता है। चाहे कोई व्यक्ति सिद्धांत के कितने भी वचनों को क्यों न समझता हो, वह वास्तविकता को धारण नहीं करेगा। जब वह किसी समस्या का सामना करेगा तो वह नहीं जानेगा कि किसका अभ्यास किया जाए। वे सभी लोग, जो परमेश्वर द्वारा सिद्ध बनाए गए हैं ऐसे लोग हैं जिनके पास सत्य है, जबकि वे सभी लोग जो परमेश्वर द्वारा सिद्धता से नहीं गुज़रे हैं, वे सिद्धांत के वचनों के लोग हैं। जिन लोगों के पास सत्य है, वे परमेश्वर के उपयोग के लिए उपयुक्त हैं। उनके काम परिणाम लाते हैं, और वे अन्य लोगों को परमेश्वर की उपस्थिति में लाने में वास्तव में सक्षम होते हैं। जो लोग सिद्धांत के वचनों पर ध्यान देते हैं, वे अपने काम से सच्चे परिणाम प्राप्त नहीं करते हैं। वे लोगों को प्रामाणिक अनुभव और समझ का जीवनाधार प्रदान नहीं कर सकते हैं, और वे समस्याओं का समाधान करने के लिए सत्य का उपयोग तो बिल्कुल भी नहीं कर सकते हैं। इसलिए वे दूसरों को परमेश्वर की उपस्थिति में लाने में असमर्थ होते हैं। वह व्यक्ति जिसके पास सत्य है, वह सत्य की खोज करने वाले लोगों से संकोच नहीं करता है, और लोगों की उनके विश्वास में आने वाली सभी व्यावहारिक समस्याओं को हल करने में समर्थ होता है। जो लोग सिद्धांत के वचनों पर ज़ोर देते हैं, वे सत्य की खोज करने वाले लोगों से डरते हैं, क्योंकि उनके अपने भीतर वास्तविक चीज़ का अभाव होता है जो सिद्धांत वे बालते हैं वे वास्तविक समस्याओं को हल नहीं कर सकते हैं। इस प्रकार, वे लोगों से सवाल पूछने के लिए कहने की हिम्मत नहीं करते हैं, और निश्चित रूप से व्यावहारिक कठिनाइयों को हल करने में और भी कम सक्षम होते हैं। जिनके पास सत्य है, वे लोग वास्तविकता का सामना करने की हिम्मत रखते हैं; जो लोग सिद्धांत के वचनों पर ध्यान केन्द्रित करते हैं, वे वास्तविकता का सामना करने की हिम्मत नहीं करते हैं, बल्कि वे इससे बचते हैं। सत्य और सिद्धांतों के बीच प्रभेद करने के लिए ऐसे ही सिद्धांत हैं।

— ऊपर से संगति से उद्धृत

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