24. एक अच्छे नौकर और एक बुरे नौकर के बीच क्या अंतर है?

परमेश्वर के प्रासंगिक वचन:

एक योग्य कार्यकर्ता का कार्य लोगों को सही मार्ग पर ला सकता है और उन्हें सत्य की गहराई में जाने दे सकता है। जो कार्य वह करता है वह लोगों को परमेश्वर के सम्मुख ला सकता है। इसके अतिरिक्त, जो कार्य वह करता है वह, लोगों को मुक्ति और स्वतंत्रता प्रदान करते हुए, भिन्न-भिन्न व्यक्तियों पर भिन्न-भिन्न होता है और यह नियमों से बँधा हुआ नहीं होता है। इसके अतिरिक्त, वे धीरे-धीरे जीवन में आगे बढ़ सकते हैं, और वे उत्तरोत्तर सत्य में अधिक गहरे जा सकते हैं। एक अयोग्य कार्यकर्ता का कार्य कम पड़ता है; उसका कार्य मूर्खतापूर्ण होता है। वह लोगों को केवल नियमों में ला सकता है; वह लोगों से जो माँग करता है वह भिन्न-भिन्न व्यक्तियों पर भिन्न-भिन्न नहीं होती है; वह लोगों की वास्तविक आवश्यकताओं के अनुसार कार्य नहीं करता है। इस प्रकार के कार्य में, बहुत से नियम और बहुत से सिद्धान्त होते हैं, और यह लोगों को वास्तविकता में या जीवन में बढ़ोत्तरी के सामान्य अभ्यास में नहीं ला सकता है। यह लोगों को केवल कुछ बेकार नियमों को निभाने में सक्षम बना सकता है। इस प्रकार का मार्गदर्शन लोगों को केवल भटका सकता है। वह तुम्हारी अगुवाई करता है ताकि तुम उसके समान बन जाओ; वह तुम्हें उसी में ला सकता है जो उसके पास है और जो वह है।

— "वचन देह में प्रकट होता है" में 'परमेश्वर का कार्य और मनुष्य का कार्य' से उद्धृत

जो परमेश्वर की सेवा करते हैं, वे परमेश्वर के अंतरंग होने चाहिए, वे परमेश्वर को प्रिय होने चाहिए, और उन्हें परमेश्वर के प्रति परम निष्ठा रखने में सक्षम होना चाहिए। चाहे तुम निजी कार्य करो या सार्वजनिक, तुम परमेश्वर के सामने परमेश्वर का आनंद प्राप्त करने में समर्थ हो, तुम परमेश्वर के सामने अडिग रहने में समर्थ हो, और चाहे अन्य लोग तुम्हारे साथ कैसा भी व्यवहार क्यों न करें, तुम हमेशा उसी मार्ग पर चलते हो जिस पर तुम्हें चलना चाहिए, और तुम परमेश्वर की ज़िम्मेदारी का पूरा ध्यान रखते हो। केवल इसी तरह के लोग परमेश्वर के अंतरंग होते हैं। परमेश्वर के अंतरंग सीधे उसकी सेवा करने में इसलिए समर्थ हैं, क्योंकि उन्हें परमेश्वर का महान आदेश और परमेश्वर की ज़िम्मेदारी दी गई है, वे परमेश्वर के हृदय को अपना हृदय बनाने और परमेश्वर की ज़िम्मेदारी को अपनी जिम्मेदारी की तरह लेने में समर्थ हैं, और वे अपने भविष्य की संभावना पर कोई विचार नहीं करते : यहाँ तक कि जब उनके पास कोई संभावना नहीं होती, और उन्हें कुछ भी मिलने वाला नहीं होता, तब भी वे हमेशा एक प्रेमपूर्ण हृदय से परमेश्वर में विश्वास करते हैं। और इसलिए, इस प्रकार का व्यक्ति परमेश्वर का अंतरंग होता है। परमेश्वर के अंतरंग उसके विश्वासपात्र भी हैं; केवल परमेश्वर के विश्वासपात्र ही उसकी बेचैनी और उसके विचार साझा कर सकते हैं, और यद्यपि उनकी देह पीड़ायुक्त और कमज़ोर होती, फिर भी वे परमेश्वर को संतुष्ट करने के लिए दर्द सहन कर सकते हैं और उसे छोड़ सकते हैं, जिससे वे प्रेम करते हैं। परमेश्वर ऐसे लोगों को और अधिक ज़िम्मेदारी देता है, और जो कुछ परमेश्वर करना चाहता है, वह ऐसे लोगों की गवाही से प्रकट होता है। इस प्रकार, ये लोग परमेश्वर को प्रिय हैं, ये परमेश्वर के सेवक हैं जो उसके हृदय के अनुरूप हैं, और केवल ऐसे लोग ही परमेश्वर के साथ मिलकर शासन कर सकते हैं।

— "वचन देह में प्रकट होता है" में 'परमेश्वर की इच्छा के अनुरूप सेवा कैसे करें' से उद्धृत

तुम में से हर व्यक्ति, परमेश्वर की सेवा करने वाले के तौर पर सिर्फ़ अपने हितों के बारे में सोचने के बजाय, अपने हर काम में कलीसिया के हितों की रक्षा करने में सक्षम होना चाहिये। हमेशा एक दूसरे को कमतर दिखाने की कोशिश करते हुए, अकेले काम करना अस्वीकार्य है। इस तरह का व्यवहार करने वाले लोग परमेश्वर की सेवा करने के योग्य नहीं हैं! ऐसे लोगों का स्वभाव बहुत बुरा होता है; उनमें ज़रा सी भी मानवता नहीं बची है। वे सौ फीसदी शैतान हैं! वे जंगली जानवर हैं! अब भी, इस तरह की चीज़ें तुम लोगों के बीच होती हैं; तुम लोग तो सहभागिता के दौरान एक दूसरे पर हमला करने की हद तक चले जाते हो, जान-बूझकर कपट करना चाहते हो और किसी छोटी सी बात पर बहस करते हुए भी गुस्से से तमतमा उठते हो, तुम में से कोई भी पीछे हटने के लिये तैयार नहीं होता। हर व्यक्ति अपने अंदरूनी विचारों को एक दूसरे से छिपा रहा होता है, दूसरे पक्ष को गलत इरादे से देखता है और हमेशा सतर्क रहता है। क्या इस तरह का स्वभाव परमेश्वर की सेवा करने के लिये उपयुक्त है? क्या तुम्हारा इस तरह का कार्य तुम्हारे भाई-बहनों को कुछ भी दे सकता है? तुम न केवल लोगों को जीवन के सही मार्ग पर ले जाने में असमर्थ हो, बल्कि वास्तव में तुम अपने भ्रष्ट स्वभावों को अपने भाई-बहनों में डालते हो। क्या तुम दूसरों को नुकसान नहीं पहुंचा रहे हो? तुम्हारा ज़मीर बहुत बुरा है और यह पूरी तरह से सड़ चुका है! तुम वास्तविकता में प्रवेश नहीं करते हो, तुम सत्य का अभ्यास भी नहीं करते हो। इसके अतिरिक्त, तुम बेशर्मी से दूसरों के सामने अपनी शैतानी प्रकृति को उजाकर करते हो। तुम्हें कोई शर्म है ही नहीं! इन भाई-बहनों की जिम्मेदारी तुम्हें सौंपी गई है, फिर भी तुम उन्हें नरक की ओर ले जा रहे हो। क्या तुम ऐसे व्यक्ति नहीं हो जिसका ज़मीर सड़ चुका है? तुम्हें बिलकुल भी शर्म नहीं है!

— "वचन देह में प्रकट होता है" में 'इस्राएलियों की तरह सेवा करो' से उद्धृत

मेरी पीठ पीछे बहुत-से लोग हैसियत के आशीष की अभिलाषा करते हैं, वे ठूँस-ठूँसकर खाना खाते हैं, सोना पसंद करते हैं तथा देह की इच्छाओं पर पूरा ध्यान देते हैं, हमेशा भयभीत रहते हैं कि देह से बाहर कोई मार्ग नहीं है। वे कलीसिया में अपना उपयुक्त कार्य नहीं करते, पर मुफ़्त में कलीसिया से खाते हैं, या फिर मेरे वचनों से अपने भाई-बहनों की भर्त्सना करते हैं, और अधिकार के पदों से दूसरों के ऊपर आधिपत्य जताते हैं। ये लोग निरंतर कहते रहते हैं कि वे परमेश्वर की इच्छा पूरी कर रहे हैं और हमेशा कहते हैं कि वे परमेश्वर के अंतरंग हैं—क्या यह बेतुका नहीं है? यदि तुम्हारे इरादे सही हैं, पर तुम परमेश्वर की इच्छा के अनुसार सेवा करने में असमर्थ हो, तो तुम मूर्ख हो; किंतु यदि तुम्हारे इरादे सही नहीं हैं, और फिर भी तुम कहते हो कि तुम परमेश्वर की सेवा करते हो, तो तुम एक ऐसे व्यक्ति हो, जो परमेश्वर का विरोध करता है, और तुम्हें परमेश्वर द्वारा दंडित किया जाना चाहिए! ऐसे लोगों से मुझे कोई सहानुभूति नहीं है! परमेश्वर के घर में वे मुफ़्तखोरी करते हैं, हमेशा देह के आराम का लोभ करते हैं, और परमेश्वर की इच्छाओं का कोई विचार नहीं करते; वे हमेशा उसकी खोज करते हैं जो उनके लिए अच्छा है, और परमेश्वर की इच्छा पर कोई ध्यान नहीं देते। वे जो कुछ भी करते हैं, उसमें परमेश्वर के आत्मा की जाँच-पड़ताल स्वीकार नहीं करते। वे अपने भाई-बहनों के साथ हमेशा छल करते हैं और उन्हें धोखा देते रहते हैं, और दो-मुँहे होकर वे, अंगूर के बाग़ में घुसी लोमड़ी के समान, हमेशा अंगूर चुराते हैं और अंगूर के बाग़ को रौंदते हैं। क्या ऐसे लोग परमेश्वर के अंतरंग हो सकते हैं? क्या तुम परमेश्वर के आशीष प्राप्त करने लायक़ हो? तुम अपने जीवन एवं कलीसिया के लिए कोई उत्तरदायित्व नहीं लेते, क्या तुम परमेश्वर का आदेश लेने के लायक़ हो? तुम जैसे व्यक्ति पर कौन भरोसा करने की हिम्मत करेगा? जब तुम इस प्रकार से सेवा करते हो, तो क्या परमेश्वर तुम्हें कोई बड़ा काम सौंपने की जुर्रत कर सकता है? क्या इससे कार्य में विलंब नहीं होगा?

— "वचन देह में प्रकट होता है" में 'परमेश्वर की इच्छा के अनुरूप सेवा कैसे करें' से उद्धृत

परमेश्वर की सेवा करना कोई सरल कार्य नहीं है। जिनका भ्रष्ट स्वभाव अपरिवर्तित रहता है वे परमेश्वर की सेवा कभी नहीं कर सकते हैं। यदि परमेश्वर के वचनों के द्वारा तुम्हारे स्वभाव का न्याय और उसे ताड़ित नहीं किया गया है, तो तुम्हारा स्वभाव अभी भी शैतान का प्रतिनिधित्व करता है। यह इस बात को प्रमाणित करने के लिए पर्याप्त है कि परमेश्वर की तुम्हारी सेवा, तुम्हारी स्वयं की भलाई के अभिप्राय से है। यह सेवा तुम्हारे शैतानी स्वभाव पर आधारित है। तुम परमेश्वर की सेवा अपने प्राकृतिक स्वभाव से और अपनी व्यक्तिगत प्राथमिकताओं के अनुसार करते हो; इसके अलावा, तुम सोचते रहते हो कि जो कुछ भी तुम करना चाहते हो, उसे परमेश्वर पसंद करता है, और जो कुछ भी तुम नहीं करना चाहते हो उससे परमेश्वर घृणा करता है, और अपने कार्य में तुम पूर्णतः अपनी प्राथमिकताओं द्वारा मार्गदर्शित होते हो। क्या इसे परमेश्वर की सेवा करना कह सकते हैं? अंततः तुम्हारे जीवन स्वभाव में रत्ती भर भी सुधार नहीं आएगा; तुम और भी अधिक ज़िद्दी बन जाओगे क्योंकि तुम परमेश्वर की सेवा कर रहे हो, और इससे तुम्हारा भ्रष्ट स्वभाव गहराई तक समा जाएगा। इस तरह, तुम मन में परमेश्वर की सेवा के बारे में ऐसे सिद्धान्त विकसित कर लोगे जो मुख्यतः तुम्हारे स्वयं के चरित्र पर आधारित होते हैं, और तुम्हारे सेवा करने से तुम्हारे स्वयं के स्वभाव के अनुसार अनुभव प्राप्त होता है। यह मानवीय अनुभव का सबक है। यह दुनिया में जीने का मनुष्य के जीवन का दर्शन है। इस तरह के लोग फरीसियों और धार्मिक अधिकारियों से संबंधित होते हैं। यदि वे कभी भी जागते और पश्चताप नहीं करते हैं, तो अतंतः वे झूठे मसीह बन जाएँगे जो अंत के दिनों में दिखाई देंगे, और मनुष्यों को धोखा देने वाले होंगे। झूठे मसीह और धोखेबाज़, जिनके बारे में कहा गया था, इसी प्रकार के लोगों में से ही उठ खड़े होंगे। जो परमेश्वर की सेवा करते हैं यदि वे अपने स्वयं के स्वभाव का अनुसरण करते हैं और अपनी इच्छा के अनुसार कार्य करते हैं, तब वे किसी भी समय बहिष्कृत कर दिए जाने के ख़तरे में हैं। जो दूसरों के दिलों को जीतने, उन्हें व्याख्यान देने, नियंत्रित करने और ऊंचाई पर खड़े होने के लिए परमेश्वर की सेवा के कई वर्षों के अपने अनुभव का प्रयोग करते हैं—और जो कभी पछतावा नहीं करते हैं, कभी भी अपने पापों को स्वीकार नहीं करते हैं, पद के लाभों को कभी नहीं त्यागते हैं—वे लोग परमेश्वर के सामने मिटा दिए जाएँगे। ये अपनी वरिष्ठता का घमंड दिखाते हुए और अपनी योग्यताओं पर इतराते हुए, पौलुस की ही तरह के लोग हैं। परमेश्वर इस तरह के लोगों को पूर्णता पर नहीं लाएगा। इस प्रकार की सेवा परमेश्वर के कार्य में विघ्न डालती है। लोग पुरानी बातों को पकड़े रहना पसंद करते हैं। वे अतीत की अवधारणाओं और अतीत की चीजों से चिपके रहते हैं। यह उनकी सेवा में एक बड़ी बाधा है। यदि तुम उन्हें छोड़ नहीं सकते हो, तो ये चीज़ें तुम्हारे पूरे जीवन का दम घोंट देंगी। परमेश्वर तुम्हारी प्रशंसा नहीं करेगा, थोड़ी सी भी नहीं, भले ही तुम दौड़-भाग करके अपनी टाँगों को तोड़ लो या मेहनत करके अपनी कमर तोड़ लो, भले ही तुम परमेश्वर की "सेवा" में मिट जाओ। इसके बिल्कुल विपरीत वह कहेगा कि तुम एक कुकर्मी हो।

— "वचन देह में प्रकट होता है" में 'धार्मिक सेवाओं को अवश्य शुद्ध करना चाहिए' से उद्धृत

ऐसे लोग जो परमेश्वर के कार्य के उद्देश्य को नहीं समझते हैं वे लोग हैं जो परमेश्वर के विरुद्ध खड़े होते हैं, और इससे भी अधिक वे लोग हैं जो परमेश्वर के कार्य के उद्देश्य से अवगत हैं फिर भी परमेश्वर को संतुष्ट करने का प्रयास नहीं करते हैं। वे जो बड़ी-बड़ी कलीसियाओं में बाइबल पढ़ते हैं, वे हर दिन बाइबल पढ़ते हैं, फिर भी उनमें से एक भी परमेश्वर के कार्य के उद्देश्य को नहीं समझता है। एक भी इंसान परमेश्वर को नहीं जान पाता है; और यही नहीं, उनमें से एक भी परमेश्वर के हृदय के अनुरूप नहीं है। वे सबके सब व्यर्थ, अधम लोग हैं, जिनमें से प्रत्येक परमेश्वर को सिखाने के लिए ऊँचे पर खड़ा हैं। यद्यपि वे परमेश्वर के नाम पर धमकी देते हैं, किंतु वे जानबूझ कर उसका विरोध करते हैं। यद्यपि वे स्वयं को परमेश्वर का विश्वासी दर्शाते हैं, किंतु ये वे लोग हैं जो मनुष्यों का मांस खाते और रक्त पीते हैं। ऐसे सभी मनुष्य शैतान हैं जो मनुष्यों की आत्माओं को निगल जाते हैं, मुख्य राक्षस हैं जो जानबूझकर उन्हें विचलित करते हैं जो सही मार्ग पर कदम बढ़ाना चाहते हैं या सही मार्ग पर चलने का प्रयास करते हैं, और वे बाधाएँ हैं जो परमेश्वर को खोजने वालों के मार्ग में रुकावट उत्पन्न करती हैं। यद्यपि वे "मज़बूत देह" वाले हैं, किंतु उसके अनुयायियों को कैसे पता चलेगा कि वे ईसा-विरोधी हैं जो लोगों को परमेश्वर के विरोध में ले जाते हैं? वे कैसे जानेंगे कि ये जीवित शैतान हैं जो निगलने के लिए विशेष रूप से आत्माओं को खोज रहे हैं?

— "वचन देह में प्रकट होता है" में 'वे सभी लोग जो परमेश्वर को नहीं जानते हैंवे वो लोग हैं जो परमेश्वर का विरोध करते हैं' से उद्धृत

संदर्भ के लिए धर्मोपदेश और संगति के उद्धरण:

कलीसिया के सभी स्तरों के अगुवाओं और कर्मियों को तीन श्रेणियों में रखा जा सकता है। वफ़ादार सेवकों, विश्वासघाती सेवकों और दुष्ट सेवकों के रूप में उनका वर्णन करना अधिक उपयुक्त है। पहले प्रकार के लोग परमेश्वर के कार्य का सचमुच अनुपालन कर सकते हैं, वे अपने कर्तव्यों को पूरा करते समय परमेश्वर के कार्य की रक्षा करने में अपना भरसक प्रयास लगा सकते हैं, वे स्वयं को परमेश्वर के लिए व्यय करने हेतु सब कुछ पीछे छोड़ सकते हैं और परमेश्वर का उत्कर्ष कर सकते हैं और उसकी गवाही दे सकते हैं। लोगों का केवल यह समूह ही सही मायने में सत्य की खोज में है, सिद्ध होने की कोशिश करता है और परमेश्वर के वफ़ादार सेवकों के रूप में वर्गीकृत किया जाता है। दूसरे प्रकार के लोगों के पास सत्य की वास्तविकता का पूर्णतः अभाव होता है, वे अपने कर्तव्यों को पूरा करते समय परमेश्वर के कार्य की रक्षा करने में असमर्थ होते हैं, मामलों को कार्य की व्यवस्था के अनुसार नहीं सँभालते हैं, मनमानी करते हैं और बिना सोचे-समझे व्यवहार करते हैं, अपनी देह की पसंद के अनुसार बर्ताव करते हैं, लोगों के साथ उनकी भावनाओं के आधार पर व्यवहार करते हैं, सत्य के सिद्धांतों का पालन नहीं करते, उन्हें सत्य का अभ्यास करने में कठिनाई होती है, वे अक्सर परमेश्वर से लेन-देन करते हैं। वे मसीह-विरोधी के मार्ग पर हैं और विश्वासघाती कर्मियों के रूप में वर्गीकृत किए जाते हैं। तीसरे प्रकार के लोग अभिमानी और दम्भी होते हैं, हैसियत के पीछे पड़े रहते हैं, महत्वाकांक्षी होते हैं। और हमेशा परमेश्वर के चुने हुए लोगों को नियंत्रित करना, दूसरों पर रोब जमाना चाहते हैं, और उन लोगों का दमन करते हैं और उन लोगों के साथ भेदभाव करते हैं जो उनके साथ असहमत होते हैं। वे परमेश्वर के चुने हुए लोगों को बाधित करते हैं, मजबूर करते हैं, और फँसाते हैं, वे परमेश्वर के चुने हुए लोगों को नियंत्रित करने और अपना स्वयं का स्वतंत्र राज्य स्थापित करने के लिए अपनी सामर्थ्य का उपयोग करने का प्रयास करते हैं। वे दुष्ट लोगों के रूप में वर्गीकृत किये जाते हैं जो झूठे अगुवाओं और मसीह-विरोधियों की किस्म के, अर्थात्, दुष्ट सेवक हैं। ...

... पवित्र आत्मा उन लोगों में कार्य करता है जिनकी मानवता अच्छी होती है और जो सत्य से भी प्रेम करते हैं। जिनमें अच्छी मानवता नहीं होती है और जो सत्य से प्यार नहीं करते, उनमें पवित्र आत्मा के कार्य का अभाव होता है। विश्वासघाती, दुष्ट और कपटी मानवता वाला कोई व्यक्ति एक बुरा व्यक्ति होता है जिसे निश्चित रूप से एक दुष्ट सेवक के रूप में वर्गीकृत किया जाता है। दुष्ट सेवक परमेश्वर के दुश्मन हैं और उसके शाप और दण्ड की वस्तुएँ होती हैं। इन तीन प्रकार के अगुवाओं और कर्मचारियों को वफ़ादार सेवकों (उन विश्वासपात्रों की तरह जिनका अविश्वासी लोग ज़िक्र करते हैं), विश्वासघाती कर्मचारियों (उन विश्वासघाती अदालत के अधिकारियों की तरह जिनके बारे में अविश्वासी लोग बताते हैं), और दुष्ट कर्मचारियों (उन विश्वासघाती हेय लोगों की तरह जो देश के साथ विश्वासघात करते हैं और दुश्मनों की ओर चले जाते हैं जिनका अविश्वासी लोग ज़िक्र करते हैं) के रूप में वर्णन करना बहुत उचित, बहुत उपयुक्त है। वे लोग जिन्हें वफ़ादार सेवकों के रूप में वर्गीकृत किया जाता है, अधिक ईमानदार होते हैं और उनमें विवेक और समझ होती है और अपने कर्तव्य को पूरा करने के दौरान वे परमेश्वर के कार्य को कायम रखते हैं। ये परमेश्वर के प्रति आज्ञाकारी और वफ़ादार होते हैं। ऐसे सभी अगुवा और कर्मचारी परमेश्वर द्वारा उद्धार और सिद्धता की वस्तुएँ हैं। जिन लोगों को विश्वासघाती कर्मचारियों के रूप में वर्गीकृत किया जाता है, वे सत्य से प्यार नहीं करते हैं, सत्य का अनुसरण करने के लिए तैयार नहीं होते हैं और परमेश्वर के प्रति सच्ची आज्ञाकारिता नहीं दिखाते हैं। अपने कर्तव्य को करने में, वे मनमानी करते हैं। वे अपनी भावनाओं के आधार पर लोगों से पेश आते हैं और न्यायपूर्ण और तर्कसंगत नहीं होते हैं। परमेश्वर की उनकी सेवा में वे परमेश्वर का विरोध करते हैं, देह का अनुसरण करते हैं, और उसूलों के बिना चीज़ों को करते हैं, यहाँ तक कि परमेश्वर के साथ भी सौदा करने का प्रयास कर रहे होते हैं। कभी-कभी वे सत्य और परमेश्वर को धोखा दे सकते हैं, और परमेश्वर के परिवार के हित के खिलाफ भी काम करते हैं, परमेश्वर के कार्य को थोड़ा-सा भी संरक्षित नहीं करते हैं। इस तरह के लोगों को विश्वासघाती सेवकों के रूप में वर्गीकृत किया जाता है, ठीक उन विश्वासघाती अदालत के अधिकारियों की तरह जिनके बारे में अविश्वासी लोग बताते हैं। ...बेशक, सभी विश्वासघाती कर्मचारियों को झूठे अगुवाओं और कर्मचारियों के रूप में वर्गीकृत किया जाता है। हालाँकि, कुछ झूठे अगुवा और कर्मचारी अच्छी मानवता के होते हैं और पश्चाताप करने और बदलने में पूरी तरह सक्षम होते हैं। उनके साथ प्रेम से व्यवहार किया जाना चाहिए और उन्हें अभ्यास करने का एक और मौका दिया जाना चाहिए। किन्तु जो दुष्ट सेवक हैं वे सभी झूठे अगुवा और मसीह-विरोधी हैं जो एक राक्षसी प्रकृति रखते हैं। बेशक, सभी दुष्ट कर्मचारियों को दुष्ट लोगों के रूप में ही वर्गीकृत किया जाता है। उनमें शैतान की प्रकृति और सार होता है, यही कारण है कि ये दुष्ट लोग सभी प्रकार की बुराइयाँ करने में समर्थ होते हैं और ये परमेश्वर के चुने हुए लोगों का क्रूरता से दमन करते और उन्हें सता सकते हैं। वे परमेश्वर के कार्य को अस्तव्यस्त और बाधित करने और हर बात में परमेश्वर का विरोध करने के लिए वह सब करते हैं जो वे कर सकते हैं, मानो कि वे पूरी तरह से भावनाविहीन हों। उनके हृदय कठोर और जिद्दी होते हैं। क्या यह परमेश्वर का दुश्मन होना नहीं है? दुष्ट कर्मचारी बचाए जाने योग्य नहीं होते हैं। इसलिए, परमेश्वर के परिवार को राक्षसी प्रकृति के जो भी झूठे अगुवा और मसीह-विरोधी हैं उन्हें अवश्य निष्कासित कर देना चाहिए। सुलह के लिए कोई जगह नहीं है।

— 'कार्य व्यवस्था' से उद्धृत

यदि सेवा करने वाले लोगों में वास्तव में क्षमता होगी, तो उनके अधीनस्थ लोग उनके साथ ताल-मेल बनाकर आगे बढ़ेंगे—वहाँ तनाव और सामंजस्य दोनों का एक माहौल होगा और यह जीवन-शक्ति से भरपूर होगा, और प्रत्येक गुज़रते दिन के साथ, कलीसियाई जीवन फलेगा-फूलेगा। कोई नकारात्मकता नहीं होगी या कोई पीछे गिरना नहीं होगा। धार्मिकता उमड़ेगी और कलीसिया के सभी सदस्य एक मन वाले होंगे; अपने प्रयासों में वे एकजुट होंगे। वे सभी परमेश्वर की गवाही देने और उसे बहुत आदर की दृष्टि से देखने में समर्थ होंगे। यह सबसे अच्छा परिणाम है। अगर कलीसिया अभी भी बेजान है, और अधिकांश लोग नकारात्मक हैं, तो यह इस बात का प्रमाण है कि तुम्हारे मार्गदर्शन में कोई मार्ग नहीं था। कलीसियाई जीवन एक गाड़ी की तरह है और अगुवा गाड़ी के घोड़े की तरह है। यदि घोड़ा उद्देश्य को पूरा करता है, तो गाड़ी को आगे खींचा जा सकता है; यह तब चलता है जब इसे चलना चाहिए और तब सरपट दौड़ता है जब इसे सरपट दौड़ना चाहिए। इसे कुछ भी रोक नहीं सकता है। जब कोई परमेश्वर की सेवा करने में वास्तव में योग्य होता है, तो वह जहाँ भी जाता है वहाँ सभी कठिनाइयों का समाधान हो सकता है, और चाहे समस्याएँ जो भी हों, वह उनसे उनकी कैसी भी समस्या पर विचार-विमर्श कर सकता है और उन्हें राह दिखा सकता है। यह लोगों को आनंद से भर देता है मानो कि उनके कंधों का बोझ हट गया हो। किसी जगह की परिस्थिति चाहे कितनी भी मुश्किल क्यों न हो, अगर वह कुछ दिनों के लिए वहाँ रहेगा और कुछ बैठकों के लिए लोगों को इकट्ठा करेगा, तो लोगों के दिल आशान्वित हो जाएँगे। एक बार जब वे सत्य के समझ लेंगे, तो वे ऊर्जा से भर जाएँगे, और उनकी नकारात्मकता का पूरी तरह से समाधान हो जाएगा। फिर देह का कलह शांत हो जाएगा और कलीसियाई जीवन सही राह पर आ जाएगा। जो व्यक्ति वास्तव में परमेश्वर की सेवा करता है वह दूसरों की कमियों की सही प्रकृति का पता लगा सकता है, और जानता है कि विभिन्न लोगों को किस प्रकार के जीवनाधार की आवश्यकता है, कहाँ से शुरू करना है और कैसे समस्याओं का पूरी तरह से समाधान करना है। इससे फर्क नहीं पड़ता कि कोई नया विश्वासी है या पुराना, बूढ़ा है या युवा, अगुवा है या अनुगामी, वह उनके लिए पूरी तरह से जीवनाधार प्रदान कर सकता है। उनकी सभी समस्याओं का समाधान कर सकता है और वह सभी लोगों के साथ संवाद कर सकता है। उन लोगों के लिए, जो वास्तव में परमेश्वर की सेवा करते हैं, सत्य पर संगति के कोई नियम नहीं हैं; और वे रटकर ऐसा नहीं करते हैं, बल्कि वे हर तरफ़ से और हर कोण से बात करेंगे। वे विभिन्न भाषाओं में बात करेंगे और सभी प्रकार के तथ्यों को जोड़ेंगे, और हर वर्ग के लोग उनकी बातों को समझेंगे और उनसे लाभ पाएँगे। जो लोग वास्तव में परमेश्वर की सेवा करते हैं, हर कोई उनके आस-पास होना पसंद करता है; अपना दिल खोलने और उनके साथ संगति करने के लिए तैयार रहता है, वे उनका सम्मान करते हैं तथा उनके साथ दोस्ती करने और घनिष्ठ होना चाहते हैं। अगर हर कोई तुमसे डरता है और छिपता है, तो तुम मुसीबत में हो। किसी काली बिल्ली का तुम्हारा रास्ता काटना एक अशुभ संकेत है। जिनके दिल परमेश्वर की इच्छा के अनुरूप होते हैं, वे हमेशा कलीसिया में होते हैं, अपने कार्य के लक्ष्य के बीच घूमते रहते हैं, लोगों के साथ उठते-बैठते और भोजन करते हैं, रात भर लोगों से मशविरा करते हैं। जब उन लोगों को काम सौंपा जाता है, तो वे बार-बार लोगों को प्रोत्साहित करते हैं; वे काम को अच्छी तरह से नहीं सँभाल पाने से डरते और सावधान रहते हैं, और कभी भी किसी की उपेक्षा नहीं करते हैं। वे जानते हैं कि कार्यस्थल छोड़ना कर्तव्य में चूक है—जो उन लोगों को छोड़ देते हैं जिसने लिए वे कार्य कर रहे हैं वे सिर्फ मुफ़्तखोर हैं। क्या एक ज़मीनी-स्तर के अगुवाओं और आपके साथ समन्वय करने वाले कार्यकर्ताओं के संपर्क में आए बिना, सभी व्यावहारिक कठिनाइयों को हल करना संभव है? क्या बुनियादी स्तर पर कलीसियाई जीवन के गहन अनुभव के बिना ऐसा किया जा सकता है? क्या हृदय से संवाद के बिना कुछ भी प्राप्त किया जा सकता है? इसके पहले कि तुम्हारा गला बैठ जाए, क्या तुम अपने कार्य से दूर जा सकते हो? यदि तुम्हारे हृदय में तीव्र इच्छा होती है, तो क्या तब भी तुम अपनी जिम्मेदारी को वहन करते हो? यदि तुम्हारा वज़न कम नहीं हुआ है, तो क्या तुम वास्तव में कड़ी मेहनत कर रहे हो? क्या जो लोग भोजन और कपड़ों पर ध्यान केन्द्रित करने में लगे रहते हैं, वे अपने कार्य से पैदा होने वाले परिणाम की वास्तव में परवाह करते हैं? क्या वे सचमुच अच्छा काम कर सकते हैं यदि वे केवल उन कुछ लोगों के ही संपर्क में आएँ जो उनके मन के मुताबिक होते हैं, जबकि वे उन लोगों से बचें जो उनके अनुरूप नहीं हैं? क्या वे एक आसान, आरामदायक और मनोरंजक जीवन की तलाश करने वाले परजीवी नहीं हैं?

जो लोग वास्तव में परमेश्वर की सेवा कर पाते हैं वे जानते हैं कि उनमें क्या कमियाँ हैं, वे किसी भी समय अपने आप को सज्जित कर सकते हैं और अपनी स्वयं की कमियों को दूर कर सकते हैं जबकि साथ ही दूसरों के लिए जीवनाधार प्रदान करने हेतु सत्य का संवाद भी कर सकते हैं। इससे भी अधिक, वे स्वयं सत्य में प्रवेश करने और स्वयं को अधिक गहराई से जानने पर ध्यान देते हैं। वे स्वयं को अभिमानी, आत्म-तुष्ट होने और स्वयं का दिखावा करने से दूर रख सकते हैं; वे अपने आप को खोलने के लिए भी तैयार रहते हैं और अन्य लोगों को उनकी कमज़ोरियों और कमियों को देखने देते हैं। इसलिए उनकी संगति ईमानदार और प्रामाणिक होती है, जिसमें कोई झूठा बहाना नहीं होता है। लोगों का उन पर विश्वास होगा और वे उनका सम्मान करने और साथ ही उस सत्य का पालन करने में समर्थ होते हैं जिसकी वे संगति करते हैं। जो लोग वास्तव में परमेश्वर की सेवा करते हैं, वे पवित्र आत्मा के कार्य को समझते हैं और वे जानते हैं कि उनके अपने अनुभव से क्या आता है और पवित्र आत्मा की प्रबुद्धता से क्या आता है। उनके पास परमेश्वर की श्रद्धा करने वाला हृदय होता है और वे न तो अहंकारी होते हैं और न ही दम्भी। वे दूसरों को इसलिए नीचा नहीं समझते कि उनके पास पवित्र आत्मा का कार्य है, बल्कि वे दूसरों के प्रति अधिक विचारशील होते हैं, दूसरों की देखभाल करते हैं और दूसरों की सहायता करते हैं। वे बल्कि कष्ट उठा लेंगे ताकि दूसरों को प्रसन्नता मिल सके। वे उन कठिनाइयों को समझते हैं जिनसे लोग पीड़ित होते हैं और वे यह भी गहराई से समझते हैं कि सत्य से रहित किसी व्यक्ति के लिए अंधेरे में गिर जाना कितना दर्दनाक होता है। उससे भी अधिक, वे पवित्र आत्मा द्वारा प्रबुद्ध किए जाने के आनंद को समझते हैं और वे ऐसी प्रबुद्धता, और साथ ही यह जो आनंद लाती है उसे दूसरों के साथ बाँटने के लिए तैयार रहते हैं। वे पवित्र आत्मा के कार्य के होने को निजी आनंद के लिए पूंजी के रूप में नहीं लेते हैं। वे पवित्र आत्मा के कार्य का आनंद लेते हैं और परमेश्वर की इच्छा के प्रति विचारशील होते हैं। वे अन्य लोगों की कठिनाइयों और दर्द को सुलझाने के लिए और परमेश्वर को संतुष्ट करने के लिए पवित्र आत्मा के कार्य से प्राप्त आनंद को दूसरों के साथ बाँटने के लिए तैयार रहते हैं। वे पवित्र आत्मा के कार्य में अग्रसक्रिय हो कर सहयोग कर सकते हैं, परमेश्वर की इच्छा के प्रति हर विचारशीलता दर्शा सकते हैं और परमेश्वर को संतुष्ट करने के लिए अपने स्वयं के सुख को त्याग सकते हैं। वे हैसियत के आशीषों से इनकार करते हैं, विशेष व्यवहार की आशा नहीं करते हैं; श्रद्धापूर्वक और सादर परमेश्वर की सेवा करते हैं और वफ़ादारी से अपना कर्तव्य करते हैं। केवल इस तरह से परमेश्वर की सेवा करने वाले लोग ही परमेश्वर की इच्छा के अनुसार कार्य करते हैं।

परमेश्वर की इच्छा के अनुरूप सेवा करने के लिए, सबसे पहले किसी को भी जीवन स्वभाव में परिवर्तनों से गुज़रना होगा। परिवर्तन के उपरान्त, कोई व्यक्ति औपचारिक सेवा शुरू कर सकता है। कुछ वर्षों के अनुभव की आवश्यकता है, और सत्य के बिना, कोई अच्छा परिणाम प्राप्त नहीं किया जा सकता है। किन्तु यदि लोग वास्तव में सेवा का सही अर्थ समझते हैं, तो उन्हें ज्ञात हो जाएगा कि अपना कर्तव्य भली-भाँति कैसे पूरा करना है। क्योंकि वे गहराई से समझते हैं कि अपने कर्तव्य को करने का अर्थ है दूसरों को सत्य, मार्ग और जीवन की आपूर्ति करना है, जिसे किसी ने परमेश्वर के कार्य से प्राप्त किया है, और अपने अनुभव, परमेश्वर के ज्ञान और पवित्र आत्मा द्वारा प्रकट किए गए प्रकाश को कलीसिया आपूर्ति करना है ताकि दूसरे लोग इसे साझा कर सकें, और ताकि वे सभी अपने जीवन स्वभावों में परिवर्तन प्राप्त कर सकें, परमेश्वर को जान सकें, परमेश्वर का आज्ञा-पालन कर सकें, परमेश्वर के प्रति वफ़ादार रह सकें और परमेश्वर द्वारा प्राप्त किये जा सकें। यह स्वयं को सत्य की जानकारी से सज्जित करना और दूसरों को यह दिखाने के लिए कि वे कितने चतुर हैं पत्रों और सिद्धांतों की बातें सिखाना नहीं है। अपने कर्तव्य को करने का मतलब है, परमेश्वर के प्रेम के साथ दूसरों की देखभाल करना, उनकी मदद करना, उनके प्रति विचारशील होना, उनकी परवाह करना, अपने से अधिक दूसरों का ख्याल करना, हर वक्त दूसरों के बारे में सोचना, कलीसिया को मन में रख कर सब कुछ करना, अधिक पीड़ा उठाने की चाह रखना ताकि अधिकतम लोग जीवन प्राप्त कर सकें और बचाए जा सकें, हर तरह की क़ीमत चुकाना ताकि लोग सत्य को समझ सकें और परमेश्वर की इच्छा को पूरी करने के लिए वे स्वयं को परमेश्वर के लिए व्यय कर सकें। यह अपनी हैसियत के आधार पर स्वयं का अहंकार करना नहीं है, न ही भाई-बहनों को चाहे कितना ही भुगतना पड़े, देह के भोग-विलास में लिप्त रहना है, या भाई-बहनों के लाभ की चिंता को छोड़ कर, खाने, पीने और मौज करने की अपनी इच्छा को संतुष्ट करना है। कुछ लोग तो यहाँ तक कि अपनी स्वयं की पसंद और भावनाओं के अनुसार भी काम करते हैं। यदि कोई व्यक्ति उनसे अच्छी तरह से पेश आता है और उनको पसंद आ जाता है, तो वे उसके साथ संगति करेंगे, अन्यथा, वे मना कर देंगे। सबसे नीच व्यक्ति वह है जो अपना कार्य करता है और बदले में कोई चीज़ माँगता है। अपने कर्तव्य को करने का अर्थ है परमेश्वर की इच्छा को अपनी इच्छा के रूप में ग्रहण करना है—उसके साथ अत्यंत महत्वपूर्ण रूप से व्यवहार करना है जिसे परमेश्वर अत्यंत महत्वपूर्ण मानता है, उस पर विचार करना जिस पर परमेश्वर विचार करता है, परमेश्वर की चिंताओं के बारे में चिंता करना, और परमेश्वर के परिवार के हितों को हर समय सर्वोपरि रखना। इसका अर्थ है, अपने प्रयासों में इतनी कड़ी मेहनत करना कि स्वयं के भोजन और नींद को भूल जाना और श्रमसाध्य प्रयास करना और परमेश्वर द्वारा सौंपे गए काम को एक उस्ताद की सी ज़िम्मेदारी के साथ करना। इसका अर्थ, थोड़े कार्य के लिए पुरस्कृत किए जाने की अपेक्षा करना, या थोड़ी सी पीड़ा के बाद ही आनंद की उम्मीद करना, या कुछ परिणाम प्राप्त करने पर अभिमानी या दंभी बन जाना, या हैसियत का आनंद उठाकर एक आततायी के रूप में कार्य करना नहीं है। जो लोग अपने कर्तव्यों का पालन करने में वफ़ादार हैं, वे परमेश्वर की व्यवस्थाओं के प्रति समर्पित होते हैं, वे निष्ठावान और कर्तव्यपरायण होते हैं, बिना किसी शिकायत के और निःस्वार्थ परमेश्वर के एक सेवक के रूप में कार्य करते हैं, वे केवल परमेश्वर के प्रेम का मूल्य चुकाने के लिए तैयार रहते हैं और अपने जीवन से परमेश्वर को चुकता करते हैं। वे खुद को सम्मान रहित धूल के एक कण से अधिक नहीं मानते हैं और खुद को परमेश्वर की कृपा का आनंद लेने के योग्य तो और भी कम मानते हैं, वे पूरी तरह से परमेश्वर के आयोजनों के प्रति समर्पण करते हैं और कोई शिकायत नहीं करते हैं। वे ओछे और बेशर्म ढोंगी नहीं होते हैं, जो केवल अपने जीवन का सुख भोगते हैं, आशीषों को प्राप्त करने के इरादे को आश्रय देते हैं, और दूसरों से ऊपर होने और दूसरों से श्रेष्ठ होने का आनंद लेने को लालायित रहते हैं। अपने कर्तव्यों का पालन करने का अर्थ है परमेश्वर की इच्छा और परमेश्वर के दायित्व के बारे में विचारशील होना, भाई-बहनों को अपने माता-पिता के रूप में मानना, हर किसी का सेवक बनने की चाह रखना, भाइयों और बहनों की ज़िदगी को धारण करना, जिम्मेदारी लेने की हिम्मत रखना, किसी का ऋण नहीं रखना, जो कुछ खुद को हासिल हुआ है उसे दूसरों को हासिल करने देना, अपने विवेक के साथ परमेश्वर की सेवा करना, और हर किसी के पर्यवेक्षण को स्वीकार करने के लिए साहस रखना। कुछ लोग कानों को अच्छी सुनाई देने वाली बाते कहते हैं लेकिन फिर कोई वास्तविक कार्य नहीं करते है; वे अपने भाइयों और बहनों के आतिथ्य का आनंद लेते हैं किन्तु फिर भी उनका दमन करते हैं, और वे अपने लिए उनसे यह या वह करने के लिए कहते हैं, उनका ध्यान रखने के लिए अपना भरसक करने के लिए कहते हैं। और वे हर मोड़ पर अपने भाईयों और बहनों को भाषण देते हैं और उनसे निपटते हैं, या जब वे खुद बीमार हों तो लोगों से उनके पास आने और उनकी प्रतीक्षा करने और ज़रूरत पड़ने पर लोगों को साथ देने के लिए कहते हैं। ऐसा व्यक्ति जो लोगों को अपना सेवक बना देता है, वह किसी भी तरह से परमेश्वर की सेवा नहीं करता है; बल्कि वह स्वयं को ऊपर उठाता है, अपनी ही गवाही देता है, खुद को ऊँचा स्थित करता है, लोगों से खुद को परमेश्वर के रूप में मनवाता है, और उसे अपनी प्रतिष्ठा के कम होने का और लोगों का उस पर भरोसा नहीं होने का बहुत डर रहता है। वह अपने प्रयासों में ज़ोरो पर रहता है लोगों द्वारा अपना अनुपालन और अपनी आराधना करवाने के लिए सभी कष्ट उठाता है, और वह दिन भर लोगों को भाषण देते हुए परमेश्वर के स्थान पर बैठता है। वह हर किसी को अपने से छोटा समझता है और अपने प्रभाव के क्षेत्र का विस्तार करने के लिए अपनी सामर्थ्य के अनुसार सब कुछ करता है, और अपने कामों को इस तरह संचालित करता है कि लोग उसे केंद्र-बिंदु में रखें, उसके वचनों पर ध्यान दें, उसकी व्यवस्थाओं का पालन करें और उसकी पूजा करने के लिए परमेश्वर को भी एक तरफ़ रख दें। कई सालों तक उसके कार्य करने के बाद भी, उसका अनुगमन करने वाले लोगों को परमेश्वर का कोई ज्ञान नहीं होता है। इसके विपरीत, वे सभी उससे डरते हैं और उसकी आज्ञा का पालन करते हैं। वह एक परमेश्वर बन जाता है। ऐसा करके, क्या यह लोगों को अपने सामने नहीं ला रहा है? इस प्रकार का व्यक्ति एक डाकू है, परिवार के अन्दर का एक चोर और एक मसीह-विरोधी है।

— ऊपर से संगति से उद्धृत

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