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15. क्यों कलिसियाएँ भ्रष्ट होकर धर्म बन जाने में सक्षम हैं?

परमेश्वर के प्रासंगिक वचन:

ऐसा क्यों कहा जाता है कि धार्मिक कलीसियाओं के उन लोगों के रीति व्यवहार प्रचलन से बाहर हो गए हैं? ऐसा इसलिए है क्योंकि जिसे वे अभ्यास में लाते हैं वह आज के कार्य से अलग हो गया है। अनुग्रह के युग में, जिसे वे अभ्यास में लाते थे वह सही था, किन्तु चूँकि युग गुज़र चुका है और परमेश्वर का कार्य बदल चुका है, तो उनका रीति व्यवहार धीरे धीरे प्रचलन से बाहर हो गया है। इसे नए कार्य एवं नए प्रकाश के द्वारा पीछे छोड़ दिया गया है। इसके मूल बुनियाद के आधार पर, पवित्र आत्मा का कार्य कई कदम गहराई में बढ़ चुका है। फिर भी वे लोग परमेश्वर के कार्य की मूल अवस्था से अभी भी चिपके हुए हैं, और पुराने रीति व्यवहारों एवं पुराने प्रकाश पर अभी भी अटके हुए हैं। तीन या पाँच वर्षों में परमेश्वर का कार्य बड़े रूप में बदल सकता है, अतः क्या 2000 वर्षों के समयक्रम में और अधिक महान रूपान्तरण भी नहीं हुए होंगे? … क्योंकि वे लोग जिन्होंने एक समय यहोवा की व्यवस्था को थामा था, और वे लोग जिन्होंने क्रूस के दुःख को सहा था, यदि वे अन्तिम दिनों के कार्य के चरण को स्वीकार नहीं कर सकते हैं, तो जो कुछ भी उन्होंने किया था वह सब बेकार एवं व्यर्थ होगा। पवित्र आत्मा के कार्य की अत्यंत स्पष्ट अभिव्यक्ति इस स्थान एवं इस समय को सम्मिलित करने में है, और अतीत से चिपके रहना नहीं है। ऐसे लोग जो आज के कार्य के साथ साथ बने नहीं रहते हैं, और जो आज के रीति व्यवहार से अलग हो गए हैं, ये ऐसे लोग हैं जो विरोध करते हैं और पवित्र आत्मा के कार्य को स्वीकार नहीं करते हैं। ऐसे लोग परमेश्वर के वर्तमान कार्य की अवहेलना करते हैं। यद्यपि वे अतीत के प्रकाश को पकड़े रहते हैं, फिर भी इसका अर्थ यह नहीं है कि इसका इंकार करना संभव है कि वे पवित्र आत्मा के कार्य नहीं जानते हैं। … ऐसे लोग जो पवित्र आत्मा की मुख्य धारा के बाहर हैं वे सदैव सोचते हैं कि वे सही हैं, किन्तु वास्तव में, उसके भीतर परमेश्वर का कार्य बहुत पहले ही रूक गया था, और पवित्र आत्मा का कार्य उनमें अनुपस्थित है। परमेश्वर का कार्य बहुत पहले ही लोगों के एक अन्य समूह को हस्तान्तरित हो चुका था, ऐसा समूह जिस पर उसने अपने नए कार्य को पूरा करने का इरादा किया है। क्योंकि ऐसे लोग जो किसी धर्म में हैं वे परमेश्वर के नए कार्य को स्वीकार करने में असमर्थ हैं, और वे केवल भूतकाल के पुराने कार्य को ही थामे रहते हैं, इस प्रकार परमेश्वर ने इन लोगों को छोड़ दिया है, और उन लोगों पर अपना कार्य करता है जो उसके नए कार्य को स्वीकार करते हैं। ये ऐसे लोग हैं जो उसके नए कार्य में उसका सहयोग करते हैं, और केवल इसी रीति से ही उसके प्रबंधन को पूरा किया जा सकता है।

"वचन देह में प्रकट होता है" से "परमेश्वर का कार्य एवं मनुष्य का रीति व्यवहार" से

यह उन लोगों के लिए नहीं है जो नए कार्य को स्वीकार नहीं करते हैं: वे पवित्र आत्मा की मुख्य धारा से बाहर हैं, और पवित्र आत्मा का अनुशासन एवं फटकार उन पर लागू नहीं होता है। पूरे दिन, ऐसे लोग शरीर में जीवन बिताते रहते हैं, वे अपने मनों के भीतर ही जीवन बिताते हैं, और कुल मिलाकर जो कुछ वे करते हैं वह उस सिद्धान्त के अनुसार होता है जो उनके स्वयं के मस्तिष्क के विश्लेषण एवं अनुसंधान के द्वारा उत्पन्न हुआ है। यह पवित्र आत्मा के नए कार्य की अपेक्षाएं नहीं हैं, और यह परमेश्वर के साथ सहयोग तो बिलकुल भी नहीं है। ऐसे लोग जो परमेश्वर के नए कार्य को स्वीकार नहीं करते हैं वे परमेश्वर की उपस्थिति से वंचित रहते हैं, और, इसके अतिरिक्त, वे परमेश्वर की आशीषों एवं सुरक्षा से रहित होते हैं। उनके अधिकांश वचन एवं कार्य पवित्र आत्मा की पुरानी अपेक्षाओं को थामे रहते हैं; वे सिद्धान्त हैं, सत्य नहीं। ऐसे सिद्धान्त एवं रीति विधियां यह साबित करने के लिए पर्याप्त हैं कि वह एकमात्र चीज़ जो उन्हें एक साथ लेकर आती है वह धर्म है; वे चुने हुए लोग, या परमेश्वर के कार्य के उद्देश्य नहीं हैं। उनके बीच के सभी लोगों की सभा को मात्र धर्म का महासम्मलेन कहा जा सकता है, और उन्हें कलीसिया नहीं कहा जा सकता है। ये एक अपरिवर्तनीय तथ्य है। उनके पास पवित्र आत्मा का नया कार्य नहीं है; जो कुछ वे करते हैं वह धर्म का सूचक प्रतीत होता है, जैसा जीवन वे जीते हैं वह धर्म से भरा हुआ प्रतीत होता है; उनमें पवित्र आत्मा की उपस्थिति एवं कार्य नहीं होते हैं, और वे पवित्र आत्मा के अनुशासन या प्रबुद्धता को प्राप्त करने के लायक तो बिलकुल भी नहीं हैं। ऐसे समस्त लोग निर्जीव लाशों एवं कीड़ों के समान हैं जो आध्यात्मिकता से रहित हैं। उनके पास मनुष्य के विद्रोहीपन एवं विरोध का कोई ज्ञान नहीं है, उनके पास मनुष्य के समस्त बुरे कार्यों का कोई ज्ञान नहीं है, और वे परमेश्वर के समस्त कार्य एवं परमेश्वर की वर्तमान इच्छा के विषय में बिलकुल भी नहीं जानते हैं। वे सभी अज्ञानी और नीच लोग हैं, वे कूडा करकट हैं जो विश्वासी कहलाने के योग्य नहीं हैं।

"वचन देह में प्रकट होता है" से "परमेश्वर का कार्य एवं मनुष्य का रीति व्यवहार" से

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अंतिम दिनों में परमेश्वर ने चीन में देह-धारण किया है; बाइबल की भविष्यवाणियों में और परमेश्वर के वचनों में इसके लिए क्या आधार मिलता है? परमेश्वर में सच्चा विश्वास वास्तव में क्या है? किसी को परमेश्वर में कैसे विश्वास करना चाहिए कि वह परमेश्वर से प्रशंसा प्राप्त कर सके? प्रश्न 41: हमने चीनी कम्युनिस्ट सरकार और धार्मिक दुनिया के कई भाषण ऑनलाइन देखे हैं जो सर्वशक्तिमान परमेश्वर की कलीसिया की बदनामी और झूठी निंदा करते हैं, उन पर आक्षेप और कलंक लगाते हैं (जैसे कि झाओयुआन, शेडोंग प्रांत की "5.28" वाली घटना)। हम यह भी जानते हैं कि सीसीपी लोगों से झूठ और गलत बातें कहने में, और तथ्यों को तोड़-मरोड़ कर लोगों को धोखा देने में माहिर है, साथ ही साथ उन देशों का जिनके यह विरोध में है, अपमान करने, उन पर हमला करने और उन का न्याय करने में भी माहिर है, इसलिए सीसीपी के कहे गए किसी भी शब्द पर बिल्कुल विश्वास नहीं किया जाना चाहिए। लेकिन धार्मिक पादरियों और प्राचीन लोगों के द्वारा कही गई कई बातें सीसीपी के शब्दों से मेल खाती हैं, इसलिए हमें सीपीपी और धार्मिक दुनिया से आने वाले निन्दापूर्ण, अपमानजनक शब्दों को कैसे परखना चाहिए? प्रश्न 33: उस समय, जब प्रभु यीशु अपने कार्य को करने के लिए आया था, यहूदी फरीसियों ने उसका अंधाधुंध विरोध किया, उसकी निंदा की और उसे क्रूस पर कीलों से जड़ दिया। जब अंतिम दिनों का सर्वशक्तिमान परमेश्वर अपना कार्य करने के लिए आता है, तो धार्मिक पादरी और प्राचीन लोग उसकी भी अवहेलना और निंदा करते हैं, परमेश्वर को फिर एक बार क्रूस पर चढ़ाते हैं। यहूदी फरीसी, धार्मिक पादरी और प्राचीन लोग इस तरह सच्चाई से नफरत क्यों करते हैं और क्यों इस तरह मसीह के विरुद्ध खुद को खड़ा कर देते हैं? वास्तव में उनका निहित सार क्या है?