सत्य को खोजने वाले सभी लोगों का हम से सम्पर्क करने का स्वागत करते हैं

मसीह की बातचीतों के अभिलेख

ठोस रंग

विषय-वस्तुएँ

फॉन्ट

फॉन्ट का आकार

लाइन स्पेस

पृष्ठ की चौड़ाई

0 खोज परिणाम

कोई परिणाम नहीं मिला

`

अध्याय 41. मनुष्य का स्वभाव कैसे जानें

मनुष्य का स्वभाव क्या है? तुम केवल मनुष्य के दूषण, अवज्ञा, कमियों, दोषों, धारणाओं और इरादों के बारे में जानते हो, लेकिन तुम मनुष्य के स्वभाव के भीतरी हिस्सों को नहीं जान सकते—तुम केवल बाहरी परत की जानकारी रखते हो, लेकिन तुम इसके उद्भव का पता नहीं लगा सकते। कुछ लोग इन सतही चीज़ों को मनुष्य के स्वभाव के रूप में भी मानते हैं, और कहते हैं, "मैं मनुष्य का स्वभाव समझता हूं; मैं अपने अहंकार को पहचानता हूं। क्या यह मनुष्य का स्वभाव नहीं है?" अहंकार मनुष्य के स्वभाव का अंश है, और इतना बिल्कुल सत्य है, लेकिन इसे केवल सैद्धांतिक रूप से स्वीकार करना पर्याप्त नहीं है। अपने स्वयं के स्वभाव को समझने में क्या शामिल है? इसे कैसे जाना जा सकता है? किन पहलुओं से इसे जाना सकता है? इसके अलावा, इन विभिन्न पहलुओं से प्रकट बातों को वास्तव में कैसे देखा जाना चाहिए? अपने हितों के माध्यम से अपने स्वभाव को देखना चाहिए। कैसे? उदाहरण के लिए, कुछ लोगों को नृत्य करना विशेष रूप से पसंद है। कुछ लोगों को विशेषकर गायक या फ़िल्मी सितारे पसंद हैं। कुछ लोग विशेष रूप से एक निश्चित व्यक्तित्व की आराधना करते हैं। इन हितों को देखा जाए, तो इन लोगों का क्या स्वभाव है? मैं एक और सरल उदाहरण देता हूं: कुछ लोग तहेदिल से किसी गायक को अपना आदर्श मानते हैं, और किस हद तक? इस हद तक कि वे गायक के हर कदम, हर मुस्कान, हर शब्द और हर कार्य में बहुत रुचि रखते हैं। उनका पूरा ध्यान गायक पर केंद्रित रहता है, और गायक जो पहनता है वे उसकी तस्वीरें खींचते हैं और उसकी नकल करते हैं। इस स्तर तक किसी को अपना आदर्श मानना एक व्यक्ति के स्वभाव के बारे में क्या दर्शाता है? यह दर्शाता है कि ऐसे व्यक्ति के दिल में केवल यही चीज़ें हैं, परमेश्वर नहीं। जो बातें उसका दिल सोचता है, प्यार करता है, और खोजता है, वह सब कुछ शैतान द्वारा प्रकट की जाती हैं; वे उसके दिल पर कब्ज़ा कर लेते हैं, और उनका दिल उन्हें अर्पित कर दिया जाता है। यहां क्या समस्या है? इसलिए, अगर किसी चीज़ को चरमसीमा तक प्रेम किया जाए, तो वह चीज़ किसी का जीवन बन सकती है और उसके दिल पर कब्ज़ा कर सकती है, पूरी तरह से यह साबित करते हुए है कि वह व्यक्ति एक मूर्ति पूजक है जो अपने दिल में परमेश्वर को नहीं चाहता, बल्कि शैतान से प्यार करता है। इसलिए, निष्कर्ष यह निकालता है कि उनका स्वभाव शैतान को प्रेम करने वाला और उसकी आराधना करने वाला है, जो सच्चाई से प्यार नहीं करता है, और परमेश्वर को नहीं चाहता है। क्या यह उसके स्वभाव को देखने का सही तरीका है? यह पूरी तरह सही है! मानव के स्वभाव का इस प्रकार विच्छेदन किया जा सकता है। उदाहरण के लिए, कुछ लोग विशेष रूप से पौलुस को आदर्श मानते हैं: उन्हें भाषण देना और बाहर काम करना पसंद होता है। उन्हें एक-दूसरे से मिलना और बात करना पसंद होता है; उन्हें अच्छा लगता है जब लोग उन्हें सुनते हैं, उनकी आराधना करते हैं और उन्हें घेरे रहते हैं। उन्हें पसंद होता है कि दूसरों के मन में उनकी एक हैसियत हो और जब दूसरे उनकी छवि को महत्व देते हैं, तो वे उसकी सराहना करते हैं। इस प्रकार के व्यवहार से हमें मनुष्य के स्वभाव के बारे में क्या पता चलता है? आओ हम उसके स्वभाव का विश्लेषण करें: इस तरह के व्यवहार वाले व्यक्ति का किस प्रकार का स्वभाव होता है? इसका मौखिक रूप से संक्षेप कैसे किया जा सकता है? साधारण लोग इसके पीछे का सत्य नहीं देख सकते हैं, बल्कि केवल व्यवहार देख सकते हैं। व्यवहार और व्यक्ति के स्वभाव के बीच क्या संबंध है? उसका स्वभाव क्या है? तुम इसे पहचान नहीं सकते हो, है न? यदि वह वास्तव में इस तरह से व्यवहार करता है, तो वह यह दिखाने के लिए पर्याप्त है कि वह अभिमानी और अहंकारी है। वह परमेश्वर की आराधना बिल्कुल नहीं करता; वह उच्च स्तर की प्रतिष्ठा की तलाश में रहता है, और वह दूसरों पर अधिकार रखना चाहता है, उन पर अपना कब्ज़ा रखना चाहता है, उनके दिमाग में एक हैसियत प्राप्त करना चाहता है। यह शैतान की विशेष छवि है। उसके स्वभाव के बारे में जो स्पष्ट रूप से दिखाई देता है, वह है उसका अहंकार और अभिमान, परेमश्वर की आराधना करने की उसकी अनिच्छा, और दूसरों द्वारा स्वयं की आराधना करवाने की इच्छा। क्या यह उसका स्वभाव नहीं है? आप इन व्यवहारों से उसके स्वभाव को स्पष्ट रूप से देख सकते हैं। उदाहरण के लिए, कुछ लोगों को दूसरों का लाभ उठाना विशेष रूप से पसंद है और वे हर चीज़ में अपना ही हित देखते हैं। जो भी वे करें उस से उन्हें लाभ मिलना चाहिए वरना वे उसे नहीं करेंगे। जब तक कि किसी चीज़ में उन्हें लाभ न मिलता हो, वे उस पर ध्यान नहीं देते हैं, और हर चीज़ के लिए उनका उद्देश्य गलत होता है। जो उनके लिए लाभदायक होता है, वे उसकी प्रशंसा करते हैं और जो उनकी चापलूसी करता है, वे उसकी तारीफ़ करते नहीं थकते। यहाँ तक कि अगर उनके पसंदीदा लोगों में कुछ समस्या होती है, तो भी वे कहते हैं कि उनके पसंदीदा व्यक्ति सही हैं और उनकी रक्षा करने में और उनका बचाव करने के लिए पूरा प्रयास करते हैं।

इस तरह के व्यक्ति का क्या स्वभाव है? क्या तुम उनके स्वभाव को स्पष्ट रूप से इन व्यवहारों में देख सकते हो? वे अपने कार्यों के माध्यम से अनुचित लाभ लेने का प्रयास करते हैं और हर समय और हर जगह लेनदेन के व्यवहार में संलग्न रहते हैं, इसलिए तुम यह निश्चित रूप से कह सकते हो कि उनके स्वभाव में लाभ के लिए तहेदिल से लालच है। वे हर चीज़ में स्वयं के बारे में सोचते हैं। अगर उन्हें कोई लाभ नहीं होगा, तो वे जल्दी नहीं उठेंगे। वे सबसे स्वार्थी, अतृप्त लोगों में से होते हैं, इसलिए उनका स्वभाव धन से प्रेम करने का होता है और सत्य से प्रेम करने का नहीं। क्या यह उनके स्वभाव का प्रतिनिधित्व नहीं करता है? कुछ लोग महिलाओं से मोहित रहते हैं, हमेशा हर चीज़ में महिलाओं के बारे में सोचते हैं, जहाँ वे जाती हैं उनका पीछा करते हैं। सुंदर महिलाएं ऐसे व्यक्ति की चाहत का उद्देश्य होती हैं और उसके दिल में उनका सम्मान बहुत अधिक होता है। वह सुंदर महिलाओं के लिए अपना जीवन देने के लिए तैयार रहता है। वह कुछ भी त्याग कर सकता है—केवल महिलाएं ही उसके दिल में रहती हैं। उसका स्वभाव क्या है? उसका स्वभाव है महिलाओं से प्रेम करना और उनकी पूजा करना, इसलिए वह बुरे, लालची स्वभाव वाल एक अय्याश व्यक्ति है। क्या यह उसका स्वभाव नहीं है? उसका व्यवहार एक लालची स्वभाव प्रकट करता है—वह केवल कभी-कभी गलत राह पर नहीं चलता या केवल कभी-कभी सामान्य लोगों से ज़्यादा बदतर व्यवहार नहीं करता—बल्कि उसका दिल पहले से ही इन चीज़ों से पूरी तरह से भरा रहता है, जो उसका स्वभाव, उसका सार बन गई हैं। इस प्रकार, ये चीज़ें उसके स्वभाव की अभिव्यक्तियां बन गई हैं।

किसी व्यक्ति के स्वभाव के आंतरिक अंश हर क्षण लगातार प्रकट होते हैं। कोई व्यक्ति चाहे कुछ भी करता हो, उससे उस व्यक्ति का स्वभाव प्रकट हो सकता है। लोगों के कुछ भी करने के अपने उद्देश्य होते हैं, चाहे वह आतिथ्य प्रदान करना हो, सुसमाचार का प्रचार करना हो, या किसी भी अन्य तरह का कार्य हो, वे बिना चेतना के अपने स्वभाव के कुछ हिस्सों को प्रकट कर सकते हैं, क्योंकि उनका स्वभाव उनका जीवन है, और जब तक वे जीवित रहते हैं, तब तक लोग अपने स्वभाव के अनुसार चलते हैं। किसी व्यक्ति का स्वभाव केवल कुछ अवसरों पर या संयोग से प्रकट नहीं होता है; बल्कि, यह पूरी तरह से व्यक्ति के सार का प्रतिनिधित्व कर सकता है, और जो भी व्यक्ति की हड्डियों और रक्त के भीतर बहता है, वह उसके स्वभाव और जीवन का प्रतिनिधित्व करता है। कुछ लोगों को सुंदर महिलाएं पसंद होती हैं। कुछ लोगों को पैसे से प्रेम होता है। कुछ विशेष रूप से हैसियत को पसंद करते हैं। कुछ विशेष रूप से प्रतिष्ठा और व्यक्तिगत छवि को मूल्यवान समझते हैं। कुछ विशेष रूप से मूर्तियों से प्रेम करते हैं या उसकी आराधना करते हैं। और कुछ लोग, विशेष रूप से अभिमानी और अहंकारी होते हैं, अपने दिल में किसी को स्थान नहीं देते और ऊँची हैसियत प्राप्त करने का प्रयास करते हैं, वे दूसरों से अलग दिखना चाहते हैं और उन पर अधिकार प्राप्त करना चाहते हैं। विभिन्न स्वभावों के विभिन्न प्रकार हैं, और वे लोगों के बीच भिन्न हो सकते हैं, लेकिन उनके सामान्य तत्व परमेश्वर का विरोध और विश्वासघात है। इस मामले में वे सभी समान हैं।

चलो, अब हम एक स्वार्थी व्यक्ति को देखें। स्वार्थ मनुष्य के स्वभाव का एक तत्व कहा जा सकता है; हर किसी में यह तत्व उपस्थित है। कुछ लोग बेहद स्वार्थी होते हैं, और इस तरह का चरम स्तर उनके स्वभाव का प्रतिनिधित्व करता है। हर कोई कुछ हद तक स्वार्थी है, लेकिन एक अंतर है। दूसरों के साथ मेलजोल करते हुए, कुछ लोग उनकी देखरेख और देखभाल कर सकते हैं, उनके बारे में चिंतित रह सकते हैं, और जो भी वे करते हैं उन सभी चीज़ों में उनकी फ़िक्र करते हैं। अन्य लोग इस तरह नहीं होते हैं; उस स्त्री पर विचार करें जो दूसरों की मेज़बानी करते समय विशेष रूप से स्वार्थी होती है: उसका अपना परिवार सबसे अच्छा भोजन खाता है, लेकिन जब भाई और बहन आते हैं तो उन्हें वह निम्न कोटि का भोजन परोसती है। जब अच्छी चीज़ें होती हैं तो वह उन्हें अपने बच्चों, पति या अपने परिवार के सामने रखती है। जब भाई और बहन आते हैं तो उन्हें ज़मीन पर सुलाती है, लेकिन जब उसके रिश्तेदार आते हैं तो वह उनके लिए हर चीज़ के साथ सबसे आरामदायक व्यवस्था करती है। इस तरह का व्यक्ति अन्य लोगों के बारे में बिल्कुल नहीं सोचता है। उसके लिए यही बहुत है कि जब वे लोग आते हैं तो उन्हें रहने की अनुमति दे, और इसलिए जब वे बीमार पड़ते हैं या कुछ अन्य कठिनाई आती है, तो वह इसके बारे में सोचती भी नहीं है, और ऐसा बर्ताव करती है कि जैसे उसने देखा ही नहीं हो। उसे दूसरों की बिल्कुल भी चिंता या फ़िक्र नहीं होती है। वह केवल अपनी और अपने रिश्तेदारों की परवाह करती है। उसका यह स्वार्थी स्वभाव यह निर्धारित करता है कि वह दूसरों की देखभाल करने के लिए तैयार नहीं है। उसे लगता है कि दूसरों की देखभाल करना उसके लिए एक नुकसान और परेशानी है। हो सकता है कि कुछ लोग यह तर्क रखेंगे, "एक स्वार्थी व्यक्ति को नहीं पता कि दूसरों की देखभाल कैसे करें? तो फिर वे अपने रिश्तेदारों के साथ इतना अच्छा व्यवहार क्यों करते हैं, और वे पूरी तरह उनकी ज़रूरतों का ख्याल क्यों रखते हैं? उन्हें कैसे मालूम कि उनके पास किस चीज़ की कमी है और किसी निश्चित समय पर क्या पहनना या क्या खाना उपयुक्त है? वे दूसरों के लिए ऐसे क्यों नहीं हो सकते?" दरअसल, वे यह सब समझते हैं, लेकिन वे स्वार्थी हैं, और यह उनके स्वभाव से निर्धारित होता है। ऐसी कुछ महिलाएं हैं जो अतीत में कुछ समय के लिए गलत राह पर चलने लगी थीं, लेकिन यह उन्हें सिद्धांतशून्य नहीं बना देता है। एक बुरा व्यक्ति वह है जो आदतन जहाँ भी जाता है वहाँ चीज़ों को बिगाड़ देता है, जिसे कोई शर्म नहीं है, और जिसका नैतिकता से कोई लेना-देना नहीं है—ऐसा व्यक्ति सिद्धांतशून्य है। वे हमेशा अपने स्वभाव को प्रकट करते रहते हैं, चाहे वे कुछ भी करें या किसी चीज़ पर भी काम करें। वे इस स्वभाव के होते हैं, और वे स्वयं पर संयम नहीं रख सकते हैं। ये चीज़ें उनके दिल में भरी होती हैं। यहां तक कि अगर वे कुछ समय ऐसी चीज़ें नहीं करते हैं, तो वह केवल इसलिए होता है क्योंकि वातावरण इसकी अनुमति नहीं देता है या उपयुक्त लोगों की कमी होती है। ऐसा होता है लोगों का स्वभाव; उन्हें नियंत्रित नहीं किया जा सकता। कुछ लोग विशेष रूप से कपड़ों और सुंदरता से प्यार करते हैं और बहुत निकम्मे होते हैं। इस तरह के व्यक्ति का स्वभाव घमंडी होता है। ऐसी स्त्री दिन में कई बार अपने कपड़े बदलती है। जब वह किसी को अच्छे कपड़े पहने हुए या अच्छी तरह से सजे-धजे देखती है, और अगर वह उन चीज़ों को अपने लिये प्राप्त नहीं कर पाती, तो उसकी नींद उड़ जाती है। उसके लिए उन चीज़ों को प्राप्त करना आवश्यक हो जाता है, भले ही उसे पैसे उधार लेने पड़ें या कोई भी संभव कीमत चुकानी पड़े, और यदि वह उन्हें प्राप्त नहीं कर पाती है तो परमेश्वर पर विश्वास नहीं करती, वह बैठकों में भाग लेने की इच्छा खो देती है, परमेश्वर के वचनों को पढ़ते समय वह उन्हें जज़्ब नहीं कर पाती, और पूरे दिन उसके मन में वही चीज़ें चलती रहती हैं। उसके दिमाग़ में वही चीज़ें चलती रहती हैं, और वह पूरे दिन उनके बारे में सोचती है। इस प्रकार का व्यक्ति बेहद सतही है, अधिकांश लोगों की तुलना में अधिक। यह उसके स्वभाव का एक तत्व है, एक ऐसी चीज़ जो उसकी हड्डियों में बसी हुई है। इस तरह के स्वभाव के मामले केवल कमज़ोरी के किसी एक पल में प्रकट नहीं होते हैं, बल्कि पूरे जीवन में निरंतर दिखाई देते हैं। जो कुछ भी व्यक्ति करता है उसमें उसकी सुगंध होती है, उसके स्वभाव के तत्व होते हैं। भले ही वे तत्व कभी-कभी स्पष्ट न हों, तो भी वे उसके भीतर मौजूद होते हैं। उदाहरण के लिए, जब एक धोखेबाज़ व्यक्ति कभी ईमानदारी से बोलता है, तो उसकी बोली में वास्तव में एक दूसरी बोली होती है और धोखेबाज़ी उसमें मिश्रित होती है। एक धोखेबाज़ व्यक्ति किसी पर भी अपनी चालें आज़माता है, जिसमें उसके अपने रिश्तेदार शामिल होते हैं—यहां तक कि उसके अपने बच्चे भी शामिल होते हैं। भले ही तुम उसके साथ कितने भी साफ़दिल से पेश आओ, वह तुम्हारे साथ चाल चलने की कोशिश करेगा। यह उसके स्वभाव का सही चेहरा है, और वह इस स्वभाव का ही बना हुआ है। इसे बदलना मुश्किल है और वह हर समय इसी तरह रहता है। ईमानदार लोग कभी-कभी धूर्त और धोखेबाज़ शब्द कह सकते हैं, लेकिन ऐसा व्यक्ति आम तौर पर ईमानदार रहता है और दूसरों के साथ अपने संबंधों में बिना उनका अनुचित लाभ उठाए ईमानदारी से काम करता है। जब वह अन्य लोगों के साथ बात करता है, तो वह उन्हें आज़माने के लिए जानबूझकर कुछ बातें नहीं बोलता है; वह तब भी काफ़ी ईमानदार रहता है और खुले दिल से दूसरों के साथ संवाद कर सकता है। हर कोई कहता है कि वह एक ईमानदार व्यक्ति है, लेकिन फिर भी ऐसा समय होता है जब वह थोड़ी-बहुत धोखेबाज़ी से बात करता है। यह केवल दूषित स्वभाव का प्रकटन है और यह उसके स्वभाव का प्रतिनिधित्व नहीं करता क्योंकि वह उस प्रकार का व्यक्ति नहीं है। जब किसी व्यक्ति के स्वभाव की बात आती है तो तुम्हें समझना चाहिए कि उस स्वभाव के क्या तत्व हैं और दूषित स्वभाव क्या होताहै; तुम्हें दोनों के बीच स्पष्ट रूप से अंतर करने में सक्षम होना चाहिए। अब, अपने स्वभाव का विश्लेषण करने का प्रयास करो। कुछ लोग कहेंगे, "कभी-कभी मैं कर्कशता से बोलता हूं" या "मैं अशिक्षित हूँ और शिष्ट व्यवहार नहीं करता" या "कभी-कभी अपने कर्तव्यों का पालन करते समय अशुद्धता रहती है" लेकिन वे इसके बारे में बात नहीं करते कि उनका स्वभाव कैसा है या उनकी मानवता अच्छी है या नहीं। इस तरह, वे अपने स्वभाव को नहीं जान सकते। तुम हमेशा छुपा नहीं सकते या शर्म से काम नहीं ले सकते हो। तुम्हें अपने भीतर गहराई में जाना होगा। यदि तुम गहराई में नहीं जा सकते तो तुम अपने स्वभाव को नहीं जान पाओगे, और यदि तुम अपने स्वभाव को नहीं जानते तो तुम परिवर्तन नहीं ला पाओगे। तुम्हें विशेष रूप से इस बारे में सख्त होना चाहिए कि तुम अपने आप को कैसे जानोगे; तुम अपने आप को धोखा नहीं दे सकते या बेपरवाह नहीं हो सकते या ख़ुद को बेवकूफ़ नहीं बना सकते।

अपने स्वभाव को समझना मूल रूप से यह समझना है कि तुम किस प्रकार के व्यक्ति हो। तुम जिस तरह के व्यक्ति हो उस प्रकार का तुम्हारा स्वभाव है। उदाहरण के लिए, यह कहना कि वह व्यक्ति उस प्रकार का है उसके स्वभाव का वर्णन करता है। उसके स्वभाव का प्रकार यह निर्धारित करता है कि वह किस प्रकार का व्यक्ति है। एक व्यक्ति का जीवन केवल उसका स्वभाव है। तुम कैसे देखते हो कि एक व्यक्ति का स्वभाव कैसा है? तुम्हें उसके संपर्क में अधिक आना चाहिए और अधिक देखना चाहिए कि वह कैसा व्यक्ति है। जो कुछ भी उसमें सबसे प्रमुख है और उसके सार और विशेषताओं का प्रतिनिधित्व करता है, उसे उसका स्वभाव और सार कहा जा सकता है। एक मनुष्य के सार का चरित्र उसके स्वभाव का चरित्र है। जब हम यह देखना चाहते हैं कि कोई व्यक्ति वास्तव में किस तरह का है, तो उसे इस तरह से देखना अधिक सटीक होता है। जो भी मनुष्य का सार है, वह उसका स्वभाव है। एक व्यक्ति किस प्रकार का है, वह उसके स्वभाव द्वारा निर्धारित किया जाता है। उदाहरण के लिए, यदि किसी व्यक्ति की सबसे प्रमुख विशेषता यह है कि वह विशेष रूप से पैसा पसंद करता है, तो उसके स्वभाव का सारांश करके दो शब्दों में धन-प्रेमी कहा जा सकता है। यदि किसी व्यक्ति की सबसे प्रमुख विशेषता महिलाओं से प्रेम करना है—वह हमेशा व्याभिचार में लिप्त रहता है—तो उसे बुराई से प्रेम है और उसका स्वभाव बुरा है। कुछ लोगों को सबसे अधिक खाना पसंद है। यदि तुम ऐसे व्यक्ति को थोड़ी मदिरा पिला दोगे और कुछ मांस खाने को दे दोगे या उसके लिए कुछ अच्छे भोजन की व्यवस्था कर दोगे, तो वह तुम्हारे पक्ष में काम करेगा; तो इस व्यक्ति का पेटू स्वभाव है, बिल्कुल सुअर की तरह। हर व्यक्ति का अपना घातक दोष है, जो उसके जीवन के हर पल में अपना प्रभाव रखता है और उस व्यक्ति के बारे में हर चीज़ में सम्मिलित होता है और जो कुछ वह करता है वह उसका उद्देश्य बन जाता है। वह चीज़ उस व्यक्ति के स्वभाव का प्रतिनिधित्व करती है और तुम कह सकते हो कि उसका स्वभाव उसकी सबसे बड़ी कमज़ोरी है। उसका घातक दोष उसका स्वभाव है। कुछ लोगों में अच्छी मानवता होती है और वे सतह पर किसी भी प्रमुख खामी को नहीं दिखाते हैं, लेकिन उनका उत्कृष्ट गुण नाज़ुकपन होता है। उनके जीवन के कोई लक्ष्य या आकांक्षाएं नहीं होती हैं और वे केवल अव्यवस्थित रूप से जीवन काटते हैं। यदि तुम उनको कुछ चोट पहुँचाने वाली बातें बोल देते हो, तो वे अलग हो जाते हैं, और वे एक या दूसरी बात के कारण किसी भी समय नकारात्मक हो जाते हैं, इस हद तक कि वे अब विश्वास नहीं करना चाहते। ऐसे लोगों का अनोखा गुण नाज़ुकपन होता है, और उनका स्वभाव एक असहाय कायर की तरह होता है। कुछ लोग बेहद भावुक स्वभाव के होते हैं। वे हर दिन जो कहते हैं और करते हैं और उनका आचरण भावनाओं की दुनिया में रहता है। वे किसी न किसी व्यक्ति के लिए स्नेह महसूस करते हैं और उन्हें हर दिन उस व्यक्ति का एहसान चुकाना होता है और उसके लिए अच्छी भावनाएं प्रकट करनी होती हैं; जो कुछ वे करते हैं वे भावनात्मक दायरे में होती हैं। ऐसे व्यक्ति की भावना कितनी भारी होती है! कुछ औरतें ऐसी होती हैं, जब उनका अविश्वासी पति मर जाता है तो भी वे तीन दिन तक रोती हैं। अन्य व्यक्ति उसे दफ़नाना चाहते हैं, लेकिन वह फिर भी कहती है, "नहीं, वह मेरा पति है।" वह एक मरे हुए व्यक्ति के लिए भी भावनाएं रखती है, उसकी भावनाएं बहुत तीव्र होती हैं। तुम कह सकते हो कि भावनाएं उसके घातक दोष हैं, उसकी सबसे बड़ी कमज़ोरी जो पूरी तरह से उसका विनाश कर सकती हैं और उसे बर्बाद कर सकती हैं। अत्यधिक तीव्र भावनाओं का मतलब है कि वह सत्य के बिना है और सिद्धांत के बिना कार्य करती है। वह केवल देह के लिए चिंता दर्शाती है और एक मूर्ख और उलझी हुई व्यक्ति है। भावनाओं को विशेष महत्व देना उसका स्वभाव है। इसलिए, यदि तुम अपने स्वभाव को बदलना चाहते हो, तो तुम्हें अपने स्वभाव को पहचानना होगा। "नदियों और पहाड़ों को बदला जा सकता है, लेकिन किसी व्यक्ति के स्वभाव को बदलना मुश्किल है।" यदि किसी का स्वभाव बहुत बुरा है और कभी नहीं बदलेगा, तो परमेश्वर उसे नहीं बचाएगा। ऐसा मत सोचो कि स्वभाव को बदला जा सकता है। स्वभाव का परिवर्तन क्या है? तुम्हें सत्य का प्रेमी होना चाहिए, जैसे-जैसे तुम परमेश्वर के कार्य का अनुभव करते हो, तुम्हें परमेश्वर के वचन के न्याय और उसकी ताड़ना को स्वीकार करना चाहिए, और अपने भीतर उपस्थित शैतानी विष से स्वयं के शुद्धिकरण के लिए सभी तरह की पीड़ाओं और परिशोधन का अनुभव करना चाहिए। इसे स्वभाव में परिवर्तन कहा जाता है। यदि किसी व्यक्ति का स्वभाव बहुत बुरा है, यदि वह एक बुरा व्यक्ति है, तो परमेश्वर उसे नहीं बचाएगा, और पवित्र आत्मा उसके भीतर काम करने में असमर्थ होगा। एक अलग तरीके से कहा जाए, तो यह एक चिकित्सक की तरह होगा जो रोगी का इलाज कर रहा है: यदि किसी व्यक्ति को निमोनिया होता है, तो उसका इलाज किया जा सकता है, लेकिन फेफड़ों के कैंसर से पीड़ित व्यक्ति को नहीं बचाया जा सकता। परमेश्वर के घर में जिस स्वभाव के परिवर्तन के बारे में बात की जाती है, उसका मतलब है कि एक व्यक्ति, क्योंकि वह सत्य को प्यार करता है और उसे स्वीकार कर सकता है, अंततः अपने अवज्ञाकारी और परमेश्वर-विरोधी स्वभाव को जान जाता है; वह समझता है कि मनुष्य का दूषण बहुत गहरा है और मनुष्य की व्यर्थता और धोखाधड़ी को समझता है। वह मनुष्य की कमी और दयनीयता को जानता है, और अंत में मनुष्य के स्वभाव और सार को समझ पाता है। यह सब जानते हुए, वह स्वयं को पूरी तरह अस्वीकार और त्याग कर सकता है, परमेश्वर के वचन के अनुसार जीवन व्यतीत कर सकता है, और प्रत्येक चीज़ में सत्य पर चल सकता है। ऐसा व्यक्ति परमेश्वर को जानता है और उसका स्वभाव बदल चुका है।

पूरी मानवजाति शैतान द्वारा दूषित है, और मनुष्य का स्वभाव परमेश्वर को धोखा देना है। परन्तु, मानवजाति के बीच, जो शैतान द्वारा दूषित है, कुछ ऐसे हैं जो परमेश्वर के कार्य के प्रति समर्पित हो सकते हैं और सत्य को स्वीकार कर सकते हैं; ऐसे लोग सत्य प्राप्त कर सकते हैं और अपने स्वभाव में परिवर्तन ला सकते हैं। ऐसे लोग भी हैं जो ईमानदारी से सत्य की तलाश तो नहीं करते हैं, फिर भी विश्वास के साथ अनुसरण करते हैं। उनसे जो कहा जाता है, वे वैसा करते हैं और उनमें सभ्य मानवता है। वे कुछ हद तक तैयार हैं, अर्पण करने के लिए, दुनियावी चीज़ों को छोड़ने के लिए और पीड़ा को सहने के लिए। ऐसा व्यक्ति मोक्ष प्राप्त करने में सक्षम होगा, लेकिन उसका स्वभाव नहीं बदला जाएगा। इसका कारण यह है कि वह दिल से सत्य के पीछे नहीं जाता, और वह केवल सिद्धांतों को समझने से संतुष्ट है। वह सिद्धांत को सुनता है, सोचता है कि यह अच्छा है और इसे अपने पास रखता है, और सिद्धांत को समझने के बाद वह कुछ हद तक अपना कर्तव्य पूरा करता है। उसके लिए जो तरीका उचित होता है वह उस तरीके से कार्य सकता है। परंतु, वह सत्य को लेकर दिल से जुड़ा नहीं है; उसका दिल धूमिल है, और वह सत्य का सार समझने में असमर्थ है। ऐसा व्यक्ति भी मुक्ति प्राप्त कर सकता है और बख़्शा जा सकता है, लेकिन उसके स्वभाव में परिवर्तन नहीं हो सकता है। स्वभाव के परिवर्तन को प्राप्त करने के लिए सत्य के लिए एक प्रेम और सत्य को स्वीकार करने की क्षमता की आवश्यकता होती है। सत्य को स्वीकार करना क्या होता है? इसका अर्थ है कि चाहे तुम्हारे पास जिस भी प्रकार का दूषित स्वभाव क्यों न हो या बड़े लाल अजगर के जिस भी विष ने तुम्हारे स्वभाव को ज़हरीला बना दिया हो, जब परमेश्वर का वचन उसे प्रकट करता है, तो तुम उसे स्वीकार करो और परमेश्वर के वचन के समक्ष पूर्ण विश्वास के साथ समर्पण करो। और, तुम अपने आप को परमेश्वर के वचन के अनुसार जानते हो। परमेश्वर का वचन स्वीकार करने का यही मतलब है। परमेश्वर चाहे कुछ भी कहे, चाहे वह दिल को जितनी भी चुभती हो, चाहे वह कोई भी शब्द प्रयोग करे, तुम उसे तब तक स्वीकार कर सकते हो जब तक कि वह सत्य हो, और तब तक उसे स्वीकार कर सकते हो, जब तक वह वास्तविकता के अनुरूप हो। तुम जितनी भी गहराई से इसे समझो, तुम परमेश्वर के वचन के सामने स्वयं को अर्पित कर सकते हो, और तुम भाइयों और बहनों द्वारा तुम तक पहुँचाए गए पवित्र आत्मा की प्रबुद्धता के प्रकाश को स्वीकार कर सकते हो और उसके समक्ष स्वयं को अर्पित कर सकते हो। जब इस तरह के व्यक्ति की सत्य की खोज एक निश्चित बिंदु पर पहुंच जाती है, तो वह सत्य प्राप्त कर सकता है और अपने स्वभाव के परिवर्तन को प्राप्त कर सकता है। एक व्यक्ति जो सत्य से प्यार नहीं करता है, उसमें अच्छी मानवता हो सकती है, लेकिन वह सत्य के बारे में लापरवाह है और इसे तहेदिल से नहीं खोजता है; वह कुछ अच्छे काम कर सकता है, परमेश्वर के लिए खर्च कर सकता है, और परमेश्वर के लिए कुछ चीज़ें छोड़ सकता है, फिर भी वह स्वभाव के परिवर्तन को प्राप्त नहीं कर सकता। तुलनात्मक रूप से देखा जाए तो पतरस की मानवता अन्य प्रेरितों या भाइयों और बहनों के समान थी, लेकिन वह सत्य की अपनी उत्साही खोज में अलग था, और उसने पूरी तरह से यीशु की बातों पर ध्यान दिया। यीशु ने पूछा, "योना के पुत्र शमौन, क्या तुम मुझे प्यार करते हो?" उसने सीधे उत्तर दिया, "मैं केवल पिता से प्यार करता हूँ, जो स्वर्ग में है, और पृथ्वी पर प्रभु से नहीं।" बाद में वह समझ गया: "यह सही नहीं है। पृथ्वी पर परमेश्वर ही स्वर्ग में परमेश्वर है। क्या स्वर्ग और पृथ्वी पर एक ही परमेश्वर नहीं है? मेरा केवल स्वर्ग में परमेश्वर से प्रेम करना अभी तक वास्तविक नहीं है। मुझे पृथ्वी पर परमेश्वर से प्रेम करना चाहिए, क्योंकि उससे ही मेरा प्यार वास्तविक है।" उसने परमेश्वर के वचन को ध्यान में रखते हुए वास्तव में समझा कि यीशु ने क्या कहा था। परमेश्वर से प्रेम करने के लिए, प्रेम को वास्तविक बनाने के लिए पृथ्वी पर देहधारी परमेश्वर से प्रेम करना होगा। एक अस्पष्ट और अदृश्य परमेश्वर से प्रेम करना यथार्थवादी या व्यावहारिक नहीं है। वास्तविक, दृश्यमान परमेश्वर को प्यार करना सत्य है। पतरस ने यीशु के वचनों के अंदर से सत्य प्राप्त किया और परमेश्वर की इच्छा को समझ लिया। स्पष्ट है कि पतरस का परमेश्वर पर विश्वास केवल सत्य की खोज पर केंद्रित था, और अंत में उसने व्यावहारिक परमेश्वर यानी पृथ्वी पर परमेश्वर का प्यार हासिल किया। पतरस सत्य की खोज में विशेष रूप से तत्पर था। हर बार जब यीशु ने उसे सलाह दी, तो उसने यीशु के वचनों को ध्यान से समझा। हो सकता है कि पवित्र आत्मा द्वारा उसे प्रबुद्ध करने के पहले महीनों, एक वर्ष या कई वर्ष के लिए उसने विचार किया और वह परमेश्वर के वचन का अर्थ समझ गया। इस तरह, उसने सत्य में प्रेवश किया, और सत्य में प्रवेश करने के बाद उसका जीवन स्वभाव बदल गया और नवीनीकृत हो गया। यदि कोई व्यक्ति सत्य का पीछा नहीं करता है, तो वह उसे कभी नहीं समझ पाएगा। तुम सत्य के वचन दस हज़ार बार कह सकते हो और वे फिर भी अक्षर और सिद्धांत हैं। कुछ लोग केवल यही कहेंगे, "मसीह सत्य, मार्ग और जीवन है।" तुम्हारा इसे दोहराना, दस हज़ार बार भी दोहराना बेकार है; तुम इसका अर्थ नहीं समझते हो। तुम ऐसा क्यों कहते हो कि मसीह सत्य और मार्ग और जीवन है? क्या अनुभव से इसके बारे में जो तुमने समझ प्राप्त की है उसे स्पष्ट कर सकते हो? क्या तुम सत्य और मार्ग और जीवन की वास्तविकता में प्रवेश कर चुके हो? परमेश्वर का वचन तुम लोगों के लिए अनुभव करने और जानने के लिए दिया गया है; वचनों को केवल बोलना बेकार है।

जब तुमने परमेश्वर के वचन को समझ लिया होगा और उसमें प्रवेश कर लिया होगा, तब तुम स्वंय को जान सकते हो। यदि तुम परमेश्वर के वचन को नहीं समझते हो, तो तुम स्वयं को नहीं जान सकते हो। तुम केवल तब ही अंतर पहचान सकते हो, जब तुम्हारे पास सत्य हो; सत्य के बिना तुम अंतर नहीं पहचान सकते हो। जब तुम्हारे पास सत्य होता है, केवल तब ही तुम किसी मुद्दे को गहराई से समझ सकते हो, सत्य के बिना तुम किसी मुद्दे को गहराई से नहीं समझ सकते हो। तुम स्वयं को केवल तब ही जान सकते हो, जब तुम्हारे पास सत्य हो; सत्य के बिना तुम स्वयं को नहीं जान सकते हो। तुम्हारा स्वभाव तब ही बदल सकता है, जब तुम्हारे पास सत्य हो; सत्य के बिना तुम्हारा स्वभाव बदल नहीं सकता है। तुम्हारे पास जब सत्य होगा केवल तब ही तुम परमेश्वर की इच्छा पूरी कर सकते हो; सत्य के बिना तुम परमेश्वर की इच्छा की सेवा नहीं कर सकते हो। तुम्हारे पास जब सत्य होगा केवल तब ही तुम परमेश्वर की आराधना कर सकते हो; सत्य के बिना तुम्हारी आराधना केवल धार्मिक अनुष्ठान का प्रदर्शन होगी। ये सब कुछ परमेश्वर के वचन से सत्य प्राप्त करने पर निर्भर करता है। कुछ लोग कहेंगे, "परमेश्वर के वचन से सत्य प्राप्त करने का वास्तव में क्या मतलब है?" तुम सिद्धांतों को बार-बार बोलकर सत्य प्राप्त नहीं कर सकते हो; उसका क्या उपयोग यदि तुम केवल शाब्दिक बातों को संप्रेषित कर रहे हो? तुम्हें परमेश्वर के वचन का अर्थ समझना चाहिए, इसका आधार और अभीष्ट प्रभाव समझना चाहिए। परमेश्वर के वचन में सत्य है, अर्थ है, प्रकाश है। उसके वचन के भीतर कई चीज़ें हैं; यह उसके वचनों को दोहराने जैसी साधारण बात नहीं है। मैं एक सरल उदाहरण देता हूँ। परमेश्वर कहते हैं, "तुम्हें ईमानदार होना चाहिए। धोखेबाज़ मत बनो।" वास्तव में इस पंक्ति का क्या मतलब है? कुछ कहते हैं, "क्या यह केवल तुम्हें एक ईमानदार इंसान बनने और धोखेबाज़ न बनने के लिए नहीं कह रहा है?" अगर कोई पूछता है, "इसका क्या मतलब है?" वह व्यक्ति जारी रहेगा, "इसका अर्थ है कि एक ईमानदार इंसान बनो और धोखेबाज़ मत बनो। केवल यही दो बातें हैं।" "कोई व्यक्ति एक ईमानदार इंसान कैसे बन सकता है? एक ईमानदार व्यक्ति कौन होता है? ईमानदार व्यक्ति की मुख्य अभिव्यक्तियाँ क्या हैं?" "एक ईमानदार व्यक्ति वह व्यक्ति होता है जो ईमानदारी से और शुद्ध रूप से बोलता है और झूठ नहीं बोलता है।" "धोखेबाज़ कौन होता है?" "एक धोखेबाज़ व्यक्ति वह होता है जो गोलमोल बात करता है। कोई व्यक्ति जो गोलमोल बात नहीं करता और जो निस्वार्थ सत्य बोलता है वह एक ईमानदार व्यक्ति होता है।" चाहे तुम कितना भी पूछ लो, तुम्हें केवल उससे इतना ही उत्तर प्राप्त होगा; मनुष्य की सोच बहुत सरल है। ईमानदार व्यक्ति के बारे में परमेश्वर का वचन क्या कहता है? एक ईमानदार व्यक्ति के बारे में पहली बात यह है कि वह दूसरों के बारे में संदेहास्पद नहीं रहता। परमेश्वर का इससे क्या मतलब है? परमेश्वर ऐसा क्यों कहता है? उस पर विचार करो और इसके माध्यम से सोचो; लोगों को सीधे नहीं पता चलता। दूसरा, एक ईमानदार व्यक्ति सत्य को स्वीकार कर सकता है। परमेश्वर का वचन कहता है कि एक ईमानदार व्यक्ति मुख्यतः इन दो शर्तों को पूरा करता है। परमेश्वर के वचन में तुम समझ सकते हो कि एक ईमानदार व्यक्ति का आंतरिक अर्थ क्या है, वास्तव में यह किस बारे में बात कर रहा है, एक ईमानदार व्यक्ति की सटीक परिभाषा क्या है, और परिभाषा को सही ढंग से निकाल सकते हो; परमेश्वर के वचन से तुम पता लगा सकते हो कि एक ईमानदार व्यक्ति कौन-से अन्य व्यवहार दर्शाता है, किस प्रकार का व्यक्ति धोखेबाज़ है, किस तरह का व्यक्ति ईमानदार है, और तुम एक ईमानदार व्यक्ति को इन व्यवहारों के परिप्रेक्ष्य से फिर से देखते हो।

तब तुम समझोगे कि ईमानदार लोग कैसे होते हैं और धोखेबाज़ लोग कैसे होते हैं, और कैसे धोखेबाज़ परमेश्वर के वचन, परमेश्वर और दूसरे लोगों के साथ पेश आते हैं। इस तरह से तुम परमेश्वर के वचनों की सच्ची समझ प्राप्त कर पाते हो और समझ पाते हो कि परमेश्वर के वचनों और एक ईमानदार और धोखेबाज़ व्यक्ति के बीच का अंतर कितना बड़ा है। जब परमेश्वर के वचन को भीतर से देखा जाता है, तो इस बारे में सत्य के और अधिक विवरण मिलते हैं कि "तुम्हें ईमानदार होना चाहिए। धोखेबाज़ मत बनो।" जब तुम सचमुच परमेश्वर के वचनों का अर्थ समझते हो, तो तुम जानते हो कि एक ईमानदार व्यक्ति क्या है और धोखेबाज़ व्यक्ति क्या है; और जब तुम इस पर चलते हो, तो तुम्हें निश्चित रूप से यह पता चलता है कि एक ईमानदार व्यक्ति के रूप में कैसे व्यवहार किया जाए, और तुम्हें एक ईमानदार व्यक्ति बनने का मार्ग मिल जाएगा, जो निश्चित रूप से परमेश्वर के मानकों को पूरा करता हो। क्या तुम्हारे पास इस स्तर का महारत है? यदि तुम वास्तव में इन वचनों को समझते हो और उन पर चलते हो, तो तुम परमेश्वर की स्वीकृति प्राप्त कर सकते हो। यदि तुम इन वचनों को समझ नहीं पाते हो, तो तुम एक ईमानदार व्यक्ति नहीं बन सकते, और तुम्हें परमेश्वर की स्वीकृति बिल्कुल भी हासिल नहीं होगी। परमेश्वर के वचन के वास्तविक अर्थ की वास्तविक समझ पाना कोई आसान बात नहीं है। यह मत सोचो कि तुम परमेश्वर के वचनों के शाब्दिक अर्थ की व्याख्या सकते हो, और हर कोई कह देगा कि तुम्हारी व्याख्या अच्छी है और तुम्हारी प्रशंसा करेगा, तो इसका मतलब है कि तुम परमेश्वर के वचन समझते हो। यह परमेश्वर के वचन को समझने के समान नहीं है। यदि तुमने परमेश्वर के वचन के भीतर से कुछ प्रकाश प्राप्त किया है और तुमने परमेश्वर के वचन का वास्तविक अर्थ जान लिया है, यदि तुम बता पाते हो कि परमेश्वर के वचन का क्या महत्व है और इसका अंतिम प्रभाव क्या होता है, केवल जब यह सब स्पष्ट हो जाता है, तब ही तुम परमेश्वर के वचनों की कुछ समझ प्राप्त कर पाते हो। तो, परमेश्वर के वचन समझना इतना आसान नहीं है। केवल इसलिए कि तुम परमेश्वर के वचन का एक सुंदर विवरण दे सकते हो, इसका मतलब यह नहीं है कि तुम इसे समझते हो। तुम परमेश्वर के वचन की व्याख्या जैसे भी करो, यह तब भी मनुष्य की कल्पना और सोच का तरीका है और बेकार है।

परमेश्वर के वचन कैसे समझे जाने चाहिए? परमेश्वर के वचन को समझने के लिए मुख्य बात है कि उसके वचन को वचन के भीतर से ही समझा जाए। जब भी परमेश्वर बोलता है, तो वह निश्चित रूप से केवल सामान्यताओं में बात नहीं करता है। प्रत्येक वाक्य के भीतर विस्तृत सामग्री होती है जो परमेश्वर के वचन में प्रकट होती है, और इसे एक अलग तरीके से व्यक्त किया जा सकता है। जिस तरीके से परमेश्वर सत्य को अभिव्यक्त करता है मनुष्य उसे समझ नहीं सकता। परमेश्वर का वचन बहुत गहरा है और मनुष्य के सोचने के तरीके के माध्यम से उसमें प्रवेश नहीं किया जा सकता है। जब तक वे प्रयास करते रहेंगे, लोग सत्य के हर पहलू का पूरा अर्थ समझ सकते हैं, और शेष विवरण पूरी तरह से तब भर दिया जाता है जब पवित्र आत्मा अनुभवों के माध्यम से ठोस स्थितियों की तुम्हारी समझ को प्रबुद्ध करता है। एक हिस्सा है परमेश्वर के वचन द्वारा उसके वचन को समझना, उसके वचन की विशिष्ट सामग्री को ढूंढना। एक दूसरा हिस्सा अनुभव के माध्यम से और पवित्र आत्मा से ज्ञान प्राप्त करके परमेश्वर के वचन के निहितार्थ को समझना है। मुख्य रूप से इन दोनों तरीकों से ही परमेश्वर के वचन की सच्ची समझ हासिल की जाती है। यदि तुम वचन की शब्दशः व्याख्या करते हो या अपनी सोच की कल्पना के माध्यम से व्याख्या करते हो, तो तुम्हारी समझ सही नहीं है, भले ही तुम अत्यंत वाक्पटुता के साथ क्यों न व्याख्या करो। यदि तुम इसे सही से नहीं करते हो, तो तुम संदर्भ से अलग अर्थ निकाल सकते हो और परमेश्वर के वचन को गलत समझ सकते हो, और यह इससे भी अधिक परेशानी की बात है। इसलिए, जैसे-जैसे तुम परमेश्वर के वचन को जानते हो, पवित्र आत्मा से प्रबुद्धता प्राप्त करने के माध्यम से मुख्य रूप से सत्य प्राप्त किया जाता है। उसके वचन की शब्दशः समझ प्राप्त करने का या व्याख्या करने का यह अर्थ नहीं है कि तुमने सत्य को प्राप्त कर लिया है। यदि तुम्हें केवल उसके वचनों की शब्दशः व्याख्या करनी हो, तो पवित्र आत्मा द्वारा प्रबुद्धता का क्या मतलब है? उस स्थिति में शिक्षा का एक निश्चित स्तर काम करेगा, और अशिक्षित काफ़ी दुविधा में होंगे। परमेश्वर के काम को मानव मस्तिष्क द्वारा समझा नहीं जा सकता है। परमेश्वर के वचन की सही समझ मुख्य रूप से पवित्र आत्मा से प्रबुद्धता पर निर्भर करती है; सत्य प्राप्त करने की प्रक्रिया ऐसी होती है।

जब मनुष्य के स्वभाव को पहचानने की बात आती है, तो सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि उस व्यक्ति के स्वभाव को उसके विश्व के दृष्टिकोण, जीवन के दृष्टिकोण, और मूल्यों के दृष्टिकोण से देखना चाहिए। जो लोग शैतान के हैं वे स्वयं के लिए जीते हैं। उनकी ज़िंदगी की मुख्य कहावतें मुख्यत: उन शब्दों से हैं जो शैतान से आते हैं, "हर कोई अपने लिए और शैतान प्राप्त करता है अंतिम अंश।" पृथ्वी के उन पिशाचों, महान लोगों और दार्शनिकों के शब्द उनका जीवन बन गए हैं। कन्फ़्यूशियस, जिसे चीनी लोगों द्वारा "ऋषि" के रूप में माना जाता है, के अधिकांश शब्द, विशेष रूप से मनुष्य का जीवन बन गए हैं। बौद्ध धर्म और ताओवाद की मशहूर कहावतें अक्सर प्रसिद्ध व्यक्तियों द्वारा कही जाती हैं; ये सभी शैतान के दर्शन और शैतान के स्वभाव की रूपरेखा हैं। वे शैतान के स्वभाव का सबसे अच्छा उदाहरण और स्पष्टीकरण भी हैं। ये विष, जिसे मानव जाति के दिल में प्रेवश कर दिया गया है, सब शैतान से आते हैं; उनमें से एक छोटा अंश भी परमेश्वर से नहीं आता है। ये झूठ और बकवास परमेश्वर के वचन के बिल्कुल विरुद्ध भी हैं। यह पूरी तरह से स्पष्ट है कि सभी सकारात्मक चीज़ों की वास्तविकता परमेश्वर से आती है, और वे सभी नकारात्मक चीज़ें जो मनुष्य में विष भरती हैं, वे शैतान से आती हैं। तो, तुम एक व्यक्ति का स्वभाव और वह किसके साथ है, इसका अनुमान उसके जीवन और मूल्यों के दृष्टिकोण से लगा सकते हो। शैतान लोगों को राष्ट्रीय सरकारों और प्रसिद्ध और महान व्यक्तियों की शिक्षा और प्रभाव के माध्यम से दूषित करता है। उनके झूठ और बकवास मनुष्य का जीवन और स्वभाव बन गए हैं। "हर कोई अपने लिए और शैतान प्राप्त करता है अंतिम अंश" एक प्रसिद्ध शैतानी कहावत है जिसे हर किसी में डाल दिया गया है और मानव जीवन बन गया है। जीवन दर्शन के कुछ अन्य शब्द भी हैं जो इस तरह के हैं। शैतान प्रत्येक देश की बारीक़ पारंपरिक संस्कृति के माध्यम से लोगों को शिक्षित करता है और मानवता को विनाश की विशाल खाई में गिरने और उससे घिरने पर मजबूर कर देता है, और अंत में परमेश्वर लोगों को नष्ट कर देता है क्योंकि वे शैतान की सेवा करते हैं और परमेश्वर का विरोध करते हैं। कल्पना करो कि समाज में कई वर्षों से सक्रिय व्यक्ति से कोई यह प्रश्न पूछे कि "तुम इतने लंबे समय से दुनिया में रहे हो और इतना कुछ हासिल किया है; ऐसी कौन-सी प्रसिद्ध कहावतें हैं जिनका तुम अनुसरण करते हो?" वे कहेंगे, "सबसे महत्वपूर्ण कहावतें यह हैं कि 'जो लोग अधिकारियों को उपहार देते हैं, उन्हें वे मार गिराते नहीं, और जो चापलूसी नहीं करते हैं वे कुछ भी हासिल नहीं करते हैं।'" क्या इस तरह की भाषा उसके स्वभाव का प्रतिनिधित्व नहीं करती है? उसका स्वभाव है कि पद पाने के लिए कोई भी साधन न छोड़ो; अधिकारी होना उसे जीवन देता है। अभी भी लोगों के जीवन में और दूसरों के साथ उनके आचरण और व्यवहार में कई शैतानी विष उपस्थित हैं—उनमें लगभग बिल्कुल सच्चाई नहीं है—उदाहरण के लिए, उनके जीवन दर्शन, सफलता के लिए उनकी कहावतें, या काम करने के उनके तरीके। हर व्यक्ति बड़े लाल अजगर के विष से भरा है, और ये सभी शैतान से आते हैं। इसलिए, जो लोगों की हड्डियों और रक्त में बहता है, वह सभी शैतान की चीज़ें हैं। हर व्यक्ति जो संसारिक सफलता प्राप्त करता है, उसका अपना मार्ग और सफलता का रहस्य होता है, तो क्या वह रहस्य उसके स्वभाव का प्रतिनिधित्व नहीं करता है? तुम देख सकते हो कि उस व्यक्ति का स्वभाव बहुत चालाक है; वे ऐसे उच्च अधिकारी हैं और दुनिया में वे कई बड़ी चीज़ें कर चुके हैं—वे बहुत चालाक हैं। उनका स्वभाव इतना कपटी और विषैला होता है—वे कुछ भी कर सकते हैं। शैतान ने मनुष्य को गहराई से दूषित कर दिया है। शैतान का विष हर व्यक्ति के रक्त में बहता है, और मनुष्य का स्वभाव स्पष्ट रूप से दूषित, बुरा और प्रतिक्रियावादी दिखाई देता है, शैतान के दर्शन में भरा हुआ और उसमें डूबा हुआ—यह स्वभाव पूरी तरह से परेमश्वर के विरुद्ध है। इस तरह से अगर विच्छेदित किया जाए तो मनुष्य के स्वभाव को सब जान सकते हैं।

जब कोई परमेश्वर को जानता है और उसके पास सत्य है, तब ही वह प्रकाश में जीवित रहता है; और जब कोई दुनिया और जीवन के बारे में अपना विचार बदलता है, तब ही वह मूल रूप से बदलता है। जब उसका एक जीवन लक्ष्य होता है और वह सत्य के अनुसार व्यवहार करता है; जब वह पूरी तरह से स्वयं को परमेश्वर के लिए अर्पित करता है और परमेश्वर के वचन के अनुसार जीवन व्यतीत करता है; जब वह आश्वस्त महसूस करता है और उसका आत्मा भीतर से चमक उठता है; जब उसका दिल अंधकार से मुक्त होता है; और जब वह पूरी तरह से स्वतंत्र और अनियंत्रित रूप से परमेश्वर की उपस्थिति में रहता है, केवल तब ही वह एक सच्चा मानव जीवन व्यतीत करता है और सत्य रखने वाला व्यक्ति बन जाता है। इसके अलावा, जो भी सत्य तुम्हारे पास हैं, वह परमेश्वर के वचन से हैं और स्वयं परमेश्वर से हैं। पूरे ब्रह्मांड और सभी चीज़ों का शासक—परमेश्वर सबसे ऊँचा है—तुम्हें वास्तविक मानव जीवन जी रहे एक वास्तविक मनुष्य के रूप में स्वीकार करता है। परमेश्वर की स्वीकृति से अधिक सार्थक क्या हो सकता है? ऐसा व्यक्ति जिसके पास सत्य है। शैतान के क्षेत्र में वर्तमान विश्व में, मानव इतिहास के हज़ारों वर्षों में, कौन है जिसने जीवन प्राप्त किया है? कोई भी नहीं। ऐसा क्यों है? वे सभी वे लोग हैं जिन्होंने परमेश्वर का विरोध किया है। जिन सब बातों के अनुसार उन्होंने अपना जीवन व्यतीत किया है और जीवित रहे हैं, वे सब शैतान से आती हैं, और शैतान द्वारा स्वीकार की गई हैं, और यह पूरी तरह परमेश्वर के वचन के विरुद्ध हैं। इसलिए, वे ऐसे लोग हैं जो परमेश्वर का विरोध करते हैं, जो उसके अभिशाप को सहते हैं, और उनके पास ऐसा कोई जीवन नहीं जिसके बारे में वे बात कर सकें। हालांकि, वे "स्थायी प्रतिष्ठा चाहते हैं," "अपने नाम को सौ पीढ़ियों तक याद करवाना चाहते हैं," "अनन्त महिमा का आनंद लेना चाहते हैं," और "एक अनन्त नाम प्राप्त करना चाहते हैं," यह सब बकवास है। वास्तव में, उन्हें परमेश्वर ने जल्दी ही अभिशापित कर दिया था, ताकि वे कभी भी पुनर्जन्म न ले सकें। मशहूर लोगों के शब्द, वो जो भी हों, मूल रूप से परमेश्वर के सामने नहीं टिकते हैं, और मरने के बाद नरक के अठारहवें स्तर पर सभी को दंडित किया जाता है। केवल परमेश्वर ही सत्य है। परमेश्वर स्वर्ग और पृथ्वी और उनकी हर चीज़ को नियंत्रित करता है और सभी पर उसका प्रभुत्व है। परमेश्वर पर विश्वास न करने, परमेश्वर के समक्ष स्वयं को अर्पित न करने का अर्थ है सत्य प्राप्त न कर पाना। यदि तुम परमेश्वर के वचन के अनुसार जीते हो, तो तुम अपने दिल की गहराई में स्पष्टता, स्थिरता और अतुलनीय मिठास महसूस करोगे; तुम वास्तव में जीवन प्राप्त कर लोगे। दुनिया में वैज्ञानिकों की वैज्ञानिक उपलब्धियां कितनी भी बड़ी हों, जब वे मौत के करीब आते हैं तो उन्हें अपना हाथ खाली महसूस होता है; उन्होंने कुछ नहीं प्राप्त किया होता है। यहां तक कि आइंस्टीन और न्यूटन ने, इतने ज्ञान के साथ, खाली महसूस किया, और यह केवल इसलिए क्योंकि उनके पास सत्य नहीं था। न्यूटन और गैलीलियो, विशेष रूप से, दोनों परमेश्वर में विश्वास करते थे और ईसाई थे; उन्हें कैथोलिकवाद ने सताया था, लेकिन उन्होंने सत्य की खोज नहीं की। वे केवल यही जानते थे कि परमेश्वर की आराधना करना अच्छा है। उन्होंने केवल विज्ञान का अध्ययन किया और उन्हें पता चला कि वास्तव में एक परमेश्वर है, और उन्होंने अंत तक परमेश्वर पर विश्वास किया, सौ प्रतिशत विश्वास के साथ कि परमेश्वर मौजूद है और एक सौ प्रतिशत विश्वास के साथ कि उसने स्वर्ग और पृथ्वी और सब कुछ बनाया है। उन्होंने केवल वैज्ञानिक ज्ञान की खोज की और परमेश्वर को जानने की नहीं। वे सत्य नहीं प्राप्त कर पाए, और वे सच्चा जीवन प्राप्त नहीं कर पाए। जिस मार्ग पर तुम लोग आज चल रहे हो, वह उनका रास्ता नहीं है। तुम परमेश्वर की खोज में हो, और इसकी खोज में हो कि स्वयं को परमेश्वर को कैसे अर्पित करना है, कैसे परमेश्वर की आराधना करनी है, कैसे एक सार्थक जीवन जीना है—वे जिसकी खोज कर रहे थे उससे बिल्कुल अलग। यद्यपि वे ऐसे लोग थे जो परमेश्वर पर विश्वास करते थे, वे सत्य प्राप्त नहीं कर पाए। अब, देहधारी परमेश्वर ने तुम लोगों को सत्य के हर पहलू के बारे में बताया है और तुम लोगों को सत्य और जीवन का मार्ग प्रदान किया है। यह तुम लोगों के लिए मूर्खतापूर्ण होगा यदि तुम सत्य की खोज न करो।

हो सकता है अभी तुम लोगों को महसूस होता हो कि तुम अभी भी पीछे हो, कि तुम लोगों के भीतर बहुत कम सत्य है, कि तुम लोग भीतर से समृद्ध नहीं हो। ऐसा इसलिए है क्योंकि तुम्हारा प्रवेश अति सतही रहा है, और तुम्हारा अनुभव अभी बहुत गहरा नहीं है। जब तुम सचमुच परमेश्वर के वचन समझते हो और परमेश्वर के वचन में प्रवेश करते हो तो तुम्हारे पास ऊर्जा होगी, एक ऐसी ऊर्जा जो तुम्हारे शरीर को भर देगी और पूरी तरह कभी भी खर्च नहीं की जा सकेगी। उस समय, तुम्हें अंदर से और अधिक उज्ज्वल महसूस होगा, और जितना आगे तुम चलोगे उतना तुम्हारा मार्ग और उज्जवल होगा। अधिकांश लोग अब परमेश्वर पर विश्वास करते हैं, लेकिन अभी तक सही रास्ते पर प्रवेश नहीं किया है। वे अभी भी बहुत खाली और कमज़ोर महसूस करते हैं, कभी-कभी यह भी महसूस करते हैं कि सभी जीवित पीड़ित हैं, खालीपन महसूस करते हैं—मरने के इच्छा भी करते हैं। दर्शन से पहले व्यक्ति ऐसा ही रहता है। इस तरह के व्यक्ति ने सत्य प्राप्त नहीं किया है और अभी तक परमेश्वर को नहीं जान पाया है, इसलिए उसे अभी भी भीतरी आनंद महसूस नहीं होता है। विशेष रूप से तुम सभी ने उत्पीड़न और घर लौटने में कठिनाई का सामना किया है, तुम लोग दुखी होते हो और तुम लोगों को मृत्यु के विचार आते हैं और जीने की इच्छा नहीं रहती; यह देह की कमज़ोरी है। कुछ लोग यह भी सोचते हैं: हम परमेश्वर पर विश्वास करते हैं, और हमें अपने भीतर आनंद महसूस करना चाहिए। अनुग्रह के युग में पवित्र आत्मा ने फिर भी लोगों को शांति और सुख दिया। अब बहुत कम शांति और सुख बचा है; अब अनुग्रह के युग के समान प्रसन्नता नहीं बची है। आज परमेश्वर में विश्वास करना बहुत परेशान करता है। तुम केवल यह जानते हो कि देह का सुख ही सब कुछ है। तुम नहीं जानते कि आज परमेश्वर क्या कर रहा है। परमेश्वर तुम लोगों की देह को पीड़ित होने देता है ताकि तुम लोगों के स्वभाव में परिवर्तन लाया जा सके। हालांकि, तुम लोगों की देह पीड़ित है, तुम्हारे पास परमेश्वर का वचन है, परमेश्वर का आशीष है। अगर तुम चाहो भी तो तुम मर नहीं सकते हो: क्या तुम इस बात को स्वीकार कर सकते हो कि तुम परमेश्वर को नहीं जान पाओगे और सत्य को नहीं प्राप्त कर पाओगे? अभी, मुख्य बात यह है कि तुमने अभी तक सत्य को प्राप्त नहीं किया है, और तुम्हारे पास जीवन नहीं है। अब तुम मुक्ति की तलाश की प्रक्रिया के बीच हो, इसलिए तुम्हें इस अवधि के दौरान कुछ भुगतना होगा। आज दुनिया भर में हर किसी की आज़माइश की जा रही है: परमेश्वर अभी भी पीड़ित है—क्या यह सही है कि तुम लोग पीड़ा न सहो? भयानक आपदाओं के माध्यम से परिशोधन के बिना वास्तविक विश्वास उत्पन्न नहीं हो सकता, और सत्य और जीवन प्राप्त नहीं किया जा सकता। आज़माइशों और परिशोधन के बिना कुछ हासिल नहीं किया जाएगा। पतरस को अंत में सात सालों (जब वह तिरपन वर्ष का हो गया था) के लिए आज़माया गया था। उन सात सालों में वह सैकड़ों परीक्षणों से गुज़रा था, और केवल उन्हीं तीन और तीन और एक साल बाद ही उसने जीवन और अपने स्वभाव में परिवर्तन प्राप्त किया। तो, जब तुम वास्तव में सत्य प्राप्त करते हो और परमेश्वर को जान पाते हो, तो तुम्हें लगता है कि जीवन को परमेश्वर के लिए व्यतीत किया जाना चाहिए। परमेश्वर के लिए जीवन व्यतीत न करना बहुत अफ़सोस की बात है: तुम कड़वे पछतावे और अत्यंत पश्चाताप के साथ अपना जीवन व्यतीत करोगे। तुम अभी मर नहीं सकते हो। तुम्हें अपनी मुट्ठी बंद करनी होगी और जीवित रहने का संकल्प लेना होगा; तुम्हें परमेश्वर के लिए जीवन व्यतीत करना होगा। जब लोगों के भीतर सत्य होता है तो उनमें कभी न मरने का संकल्प और इच्छा होती है; जब मृत्यु तुम्हें डराती है, तो तुम कहोगे, "हे परमेश्वर, मैं मरने के लिए तैयार नहीं हूँ; मैं अभी भी तुम्हें नहीं जान पाया। मैंने अभी भी तुम्हारे प्रेम का प्रतिदान नहीं दिया है। मैं तभी मरूं जब मैं तुम्हें अच्छी तरह से जान लूँ।" क्या तुम लोग इस स्तर पर पहुंचे हो? अभी तक नहीं, है न? कुछ लोग पारिवारिक कठिनाई सहते हैं। कुछ लोग वैवाहिक कठिनाई से पीड़ित होते हैं। कुछ लोगों के पास बसने के लिए घर या यहां तक कि रहने के लिए एक स्थान भी नहीं होता; वे जहां कहीं भी जाते हैं, वे केवल दूसरों के घरों में ही रह सकते हैं, और वे उन्हें अपना मानना चाहते हैं और थोड़ी स्वतंत्रता का आनंद लेना चाहते हैं, लेकिन यह असंभव है क्योंकि वे दूसरों के घरों में हैं, और इसलिए वे अपने दिल में दुखी होते हैं। इस समय तुम लोग जिस पीड़ा से गुज़र रहे हो, क्या यह वही परमेश्वर की पीड़ा नहीं है? तुम परमेश्वर के साथ पीड़ा सहते हो, और परमेश्वर उनकी पीड़ा में लोगों के साथ है, है न? आज तुम सब की मसीह के क्लेश, राज्य और धैर्य में एक भूमिका है, और अंत में तुम महिमा प्राप्त करोगे। इस प्रकार का दुख सार्थक है, है न? संकल्प नहीं होने से काम नहीं चलेगा। तुम्हें आज के दुखों के महत्व को समझना होगा और समझना होगा कि तुम्हें क्यों पीड़ा सहने की आवश्यकता है। इस में थोड़ा-सा सत्य ढूंढों और थोड़ा-सा परमेश्वर के इरादे को समझो, और उसके बाद तुम्हें पीड़ा सहन करने का संकल्प मिलेगा। यदि तुम परमेश्वर के इरादे को नहीं समझते हो और केवल अपने दुखों पर चिंतन करते हो, तो जितना अधिक तुम उसके बारे में सोचोगे उतना कठिन उसे सहना हो जाएगा—यह एक परेशानी बन जाएगी—और इससे मृत्यु की पीड़ा शुरू होगी। यदि तुम सत्य को समझते हो, तो तुम कहोगे, "मैंने पर्याप्त जीवन नहीं व्यतीत किया है। मैं क्यों मरूँगा? मैंने अभी तक सत्य प्राप्त नहीं किया है। मुझे परमेश्वर के लिए स्वयं को सही तरीके से अर्पित करना चाहिए। मुझे परमेश्वर की अच्छी गवाही देनी चाहिए। मुझे परमेश्वर के प्रेम का प्रतिदान देना चाहिए। इसके बाद, इससे कोई फ़र्क नहीं पड़ता कि मैं कैसे मरता हूँ। तब मैं एक संतोषजनक जीवन जीऊँगा। इससे कोई फ़र्क नहीं पड़ता कि कौन मर रहा है, मैं अभी नहीं मरूँगा; मुझे दृढ़ता से जीना जारी रखना होगा।" इसलिए, अब ये सब बातें स्पष्ट रूप से देखी जानी चाहिए, और इन बातों से सत्य को समझा जाना चाहिए। जब लोगों के पास सत्य होता है, तो उनके पास शक्ति होती है। जब उनके पास सत्य होता है, तो उनका शरीर अतुलनीय ऊर्जा से भर जाता है। जब उनके पास सत्य होता है, तो आत्मबल होता है। बिना सत्य के वे लुंज-पुंज होते हैं। सत्य के साथ, वे दृढ़ और साहसी बन जाते हैं, और वे अपने दुख को पीड़ा की तरह नहीं देखते, भले ही वह जितना भी सहें। तुम लोगों की इस पीड़ा से क्या मिलता है? देहधारी परमेश्वर अभी भी पीड़ित है। तुम लोग शैतान द्वारा दूषित हो एक ऐसे स्वभाव से जो परमेश्वर के विरुद्ध विद्रोह करता है। तुम सबने अनजाने में परमेश्वर के विरोध में परमेश्वर की अवज्ञा की है। तुम सबके साथ न्याय किया जाना चाहिए और तुम्हें ताड़ना दी जानी चाहिए। जब एक बीमार व्यक्ति का इलाज होता है, तब वह पीड़ा से डर नहीं सकता, तो क्या यह तुम लोगों के लिए सही है, जो चाहते हो कि तुम्हारा दूषित स्वभाव बदल जाए और तुम्हें जीवन प्राप्त हो, और तुम लोग थोड़ी-सी भी पीड़ा न सहो? तुम लोगों को अपनी पीड़ाएं सहनी चाहिए; उन्हें सहना होगा। ये पीड़ाएं बेगुनाहों पर नहीं गिरती हैं, और इससे भी अधिक वे तुम पर थोपी नहीं जाती हैं। तुम लोग आज जो पीड़ा सहते हो वह अक्सर यात्रा की कठिनाई और अपने काम से थोड़ी-सी थकान से अधिक कुछ नहीं है। कभी-कभी तुम अपने दूषण के बारे में जागरूक हो जाते हो और महसूस करते हो कि तुम कभी भी बदल नहीं सकते, और तुम्हारा दूषित स्वभाव तुम्हें कुछ हद तक पीड़ा देता है। कभी-कभी परमेश्वर के वचन का एक हिस्सा तुम्हें कभी नहीं समझ आता, या जब तुम परमेश्वर के वचन पढ़ते हो, तो तुम्हारे दिल में चुभ जाता है, और तुम्हें दुख महसूस होता है और परमेश्वर के वचन में कुछ परिशोधन से गुज़रते हो। या, तुम अपना काम सही तरीके से नहीं करते हो और हमेशा गलती करते हो, खुद को दोष देते हो, घृणा करते हुए कि तुम इसके बीच लड़ नहीं सकते और तुम इस काम को कर नहीं सकते। तुम इन सभी तरीकों से पीड़ित होते हो। कभी-कभी तुम दूसरों की प्रगति देखते हो और महसूस करते हो कि तुम्हारी प्रगति बहुत धीमी है, कि तुम परमेश्वर के वचनों को धीमी गति से प्राप्त करते हो, कि प्रकाश बहुत अनियमित है। तुम इन तरीकों से कुछ पीड़ा झेलते हो; पीड़ा के इन प्रकारों के अलावा और कौन-से अन्य दुख हैं? तुम लोगों को किसी भी भारी श्रम करने के लिए नहीं बनाया गया है, और तुम्हारे ऐसे वरिष्ठ अधिकारी या मालिक नहीं हैं जो तुम लोगों को पीटते हैं और अपशब्द कहते हैं, और कोई भी तुम लोगों को गुलाम नहीं बना रहा है। तुम इस प्रकार की पीड़ा से नहीं गुज़र रहे हो।

ये कठिनाइयां जिनसे तुम गुज़रते हो, वे वास्तविक कठिनाइयां नहीं हैं। उस बारे में एक मिनट के लिए सोचो—क्या ऐसा नहीं है? कभी-कभी तुम्हारा वातावरण तुम्हें डराता है, तुम्हारे दिमाग़ को चिंता की स्थिति में डाल देता है, तुम्हें आराम करने से रोकता है, और भय में जीते हुए तुम थोड़ी-बहुत पीड़ा झेलते हो। तुम लोगों को समझना होगा कि अपने परिवार को त्यागना और स्वयं को परमेश्वर पर अर्पित कर देने का क्या अर्थ है और तुम लोगों को ऐसा क्यों करना चाहिए। यदि यह सत्य की तलाश करने के लिए है, जीवन की खोज करने के लिए है, और अपने कर्तव्य को पूरा करने और परमेश्वर के प्रेम को चुकाने के लिए कुछ करने के लिए है, तो वह पूरी तरह से धर्मी है, सकारात्मक है, और यह स्वर्ग का कानून और पृथ्वी का सिद्धांत है। उस मामले में, तुम लोगों को पछतावा नहीं होगा, और तुम लोग स्थिति की परवाह किए बिना अपने परिवार को त्याग पाओगे। क्या यही बात नहीं है? यदि तुम लोग इस महत्व पर स्पष्ट हो तो तुम्हें पछतावा नहीं होगा, और तुम नकारात्मक नहीं बनोगे। लेकिन, अगर तुम लोग अपने आपको परमेश्वर पर अर्पित करने के लिए नहीं निकलते हो, तो यह अर्थहीन है, और तुम्हें जल्दी वापस चले जाना चाहिए। एक बार जब तुम मामले को स्पष्ट रूप से देखोगे तो समस्या का समाधान हो जाएगा और चिंता की कोई आवश्यकता नहीं होगी; सब कुछ परमेश्वर के हाथों में है।

अब तुम सभी को कठिनाइयों के कुछ परीक्षणों से गुज़रना होगा। तुम लोगों में से कुछ के पास सत्य है, कुछ के पास नहीं। कुछ लोग इसे इस तरह से प्राप्त करते हैं; दूसरे किसी दूसरे तरीके से इसे प्राप्त करते हैं। इससे कोई फ़र्क नहीं पड़ता कि तुम इसे कैसे प्राप्त करते हो, जब तक तुम्हारे भीतर सत्य है और तुम इसे सही तरीके से प्राप्त करते हो, तुम्हारी पीड़ा का अर्थ और मूल्य होगा, तुम्हारी इच्छा में दृढ़ संकल्प होगा, और तुम अंत तक पहुँच पाओगे। यदि तुम्हें सत्य नहीं मिलता है, बल्कि केवल मनुष्य की अवधारणाएं और कल्पना प्राप्त होती हैं, तो तुम्हारी पीड़ा का कोई महत्व नहीं है क्योंकि तुमने सत्य को प्राप्त नहीं किया है। तुम्हें हर चीज़ में परमेश्वर की इच्छा की खोज करनी चाहिए और हर चीज़ में सत्य की तलाश करनी चाहिए। तुम खाने और पहनने और निजी जीवन के मामले में कैसे सत्य ढूंढते हो? क्या इन चीज़ों में तलाश करने के लिए सत्य है? कुछ का कहना है, "तुम कुछ भी कहो, अच्छा खाना सही है; अच्छे वस्त्र पहनना सही है। ख़राब भोजन या ख़राब वस्त्र पहना एक नुकसान है।" क्या इस दृष्टिकोण में सच्चाई है? बिल्कुल नहीं है! क्या किसी के जीवन के लिए सही में अच्छा खाना और अच्छा पहनना महत्वपूर्ण है? बिलकुल नहीं। अगर एक दूसरे तरीके से कहा जाए, तो यदि कोई वास्तव में परमेश्वर को जान सकता है और सत्य को प्राप्त कर सकता है, तो वह जो कुछ भी करता है वह परमेश्वर की गवाही होती है, वह परमेश्वर को संतुष्ट करता है। भले ही वह बुरा खाता हो या बुरे वस्त्र पहनता हो, उसके जीवन का मूल्य होता है, और वह परमेश्वर की मंज़ूरी प्राप्त करता है—क्या ये सबसे ज़्यादा सार्थक बात नहीं है? यह बिल्कुल प्राथमिक महत्व नहीं है कि किस प्रकार के वस्त्र पहने जाएं। कुछ का कहना है, "जब एक साथी खोजने का समय हो तो अच्छी तरह तैयार होना सही होता है।" यह भी निश्चित नहीं है। कल्पना करो कि तुम एक ऐसे साथी से मिलते हो जो काफ़ी आकर्षक है, काफ़ी सुंदर है। तुम अच्छे-अच्छे कपड़े पहनते हो; वह तुम्हें पसंद करता है और तुमसे शादी कर लेता है। लेकिन अगर यह व्यक्ति शैतान है, तो वह तुम्हारे लिए दुख लेकर आएगा। अगर तुम शैतान से ऐसे समय पर मिलते हो, जब तुमने फटे हुए कपड़े और पुआल की टोपी पहनी हो, और वह तुम्हें इस कारण से पसंद नहीं करता है, तो क्या तुमने एक आपदा को नहीं रोक दिया है? अच्छे कपड़े पहनने के लिए तो तुम आशीषित नहीं होगे: गलत रास्ते पर जाने के लिए तुम फिर भी अभिशापित रहोगे। और, मैले-कुचैला कपड़े पहना हुआ एक व्यक्ति जिसके पास सत्य है, वह परमेश्वर का आशीष प्राप्त करेगा। इसलिए, खाने और पहनने के बारे में जानने के लिए सत्य की खोज तुम्हें करनी है। और अपने कर्तव्य का पालन करते हुए तुम्हें कैसे व्यवहार करना चाहिए, इसकी खोज करने में भी और अधिक सत्य है। तुम परमेश्वर के सौंपे गए कार्य को कैसे निभाते हो, यह एक बहुत गंभीर मामला है! यदि तुम उसे पूरा नहीं कर सकते जो परमेश्वर तुम्हें सौंपता है, तो तुम परमेश्वर की उपस्थिति में रहने के उपयुक्त नहीं हो और तुम्हें दंडित किया जाना चाहिए। यह स्वर्ग का कानून और धरती का सिद्धांत है जिसे पूरा करने के लिए परमेश्वर ने मनुष्य को सौंपा है; यह मनुष्य का उच्चतम उत्तरदायित्व है, जो उसके जीवन के समान महत्वपूर्ण है। यदि तुम परमेश्वर के सौंपे गए कार्य को गंभीरता से नहीं लेते, तो तुम सबसे अधिक गंभीर तरीके से परमेश्वर को धोखा दे रहे हो; यह यहूदा से भी अधिक गंभीर और अभिशापित है। तो, परमेश्वर ने मनुष्य को कार्य सौंपा: यह परेमश्वर की ओर से एक कृपा और विशेष अनुग्रह है, एक बहुत बड़ा गौरव। बाकी सब कुछ छोड़ा जा सकता है—भले ही किसी को अपने जीवन का त्याग करना पड़े, फिर भी उसे परमेश्वर के कार्य को पूरा करना चाहिए। यहाँ तलाश करने के लिए और अधिक सत्य है।

स्वभाव का परिवर्तन और सत्य की खोज का संबंध गहरा है। यदि तुम्हें यह सत्य समझ आ जाए कि लोग क्यों जीवित हैं और तुम्हें जीवन को कैसे देखना चाहिए, तो क्या जीवन के विषय में तुम्हारा दृष्टिकोण बदल नहीं जाएगा? इस बात में तलाश करने के लिए और भी अधिक सत्य है। परमेश्वर से प्रेम करने में क्या सत्य है? क्यों मनुष्य को परमेश्वर से प्रेम करना चाहिए? परमेश्वर से प्रेम करने का क्या महत्व है? यदि कोई व्यक्ति परमेश्वर से प्रेम करने के सत्य के बारे में स्पष्ट है और अपने दिल से परमेश्वर को प्यार कर सकता है—अगर उसका दिल थोड़ा-सा परमेश्वर से प्रेम कर सकता है—तो उसका जीवन सत्य जीवन है और वह सबसे अधिक आशीषित है। जो लोग हर चीज़ में सत्य की तलाश करते हैं, जीवन में सबसे तेज़ी से प्रगति करते हैं और स्वभाव के परिवर्तन को प्राप्त कर सकते हैं। जो लोग हर चीज़ में सत्य की तलाश करते हैं, वही परमेश्वर को प्रिय होते हैं। अगर कोई व्यक्ति धारणाओं और सिद्धांतों पर निर्भर रहता है या सभी चीज़ों में नियमों का पालन करता है, तो वह प्रगति नहीं करेगा, वह कभी भी सत्य प्राप्त नहीं करेगा, और कभी न कभी उसका सफ़ाया हो जाएगा—परमेश्वर इस तरह के व्यक्ति से सर्वाधिक घृणा करता है।

पिछला:अध्याय 40. तुम्हारे स्वभाव को बदलने के बारे में तुम्हें क्या पता होना चाहिए

अगला:अध्याय 42.जिन लोगों की परमेश्वर से हमेशा अपेक्षाएँ होती हैं, वे सबसे कम विवेकी होते हैं

शायद आपको पसंद आये