8. क्या ज्ञान सचमुच आपके भाग्य को बदल सकता है?

मैं एक किसान परिवार में पैदा हुई थी। हम गरीब थे इसलिए लोग हमारी इज़्ज़त नहीं करते थे। बचपन में लोग मुझसे दूर रहते, मेरे साथ अच्छा बर्ताव नहीं करते थे। स्कूल में मेरे अध्यापक हमेशा यह बोलते थे "एक विद्वान होना समाज के शीर्ष पर होना है" और "ज्ञान आपके भाग्य को बदल सकता है।" तो, मैंने तय कर लिया कि मैं पूरी मेहनत से पढ़ाई करूँगी, कॉलेज में दाखिला लूँगी, और जो लोग हमारी इज़्ज़त नहीं करते थे, उनको बताऊँगी कि मेरी जैसी गाँव की सीधी-सादी लड़की क्या कर सकती है। मेरा मानना था कि ज्ञान सब कुछ है, और इससे अपने भाग्य को भी बदला जा सकता है। मैंने कभी नहीं सोचा था कि मेरी इस धारणा से मेरे परिवार को कितनी तकलीफ़ पहुंचेगी।

नब्बे के दशक में मैंने कॉलेज में दाखिले की परीक्षा दी। मैं सुबह जल्दी उठती थी और रात को देर में सोती थी। दिन-रात मैं बस इसके लिए पढ़ाई करती थी। कभी-कभी तो मैं खाना भी नहीं खाती थी। मेरा नाम हमेशा अव्वल लड़कियों में गिना जाता था और मेरे अध्यापक मेरी शिक्षा में काफ़ी रुचि लेते थे। जहाँ तक मेरी बात थी, मैं बहुत आश्वस्त थी। लेकिन, इतनी उम्मीद होते हुए भी मैं परीक्षा में फ़ेल हो गई। इससे मुझे बहुत निराशा हुई। मैं गाँव में अपनी जिंदगी बिताने के बारे में सोच भी नहीं सकती थी। लेकिन अपने माता-पिता के बुढ़ापे और पैसे की कमी को देखते हुए, मुझे सच का सामना करना ही था। मैंने दोबारा इम्तहान देने की बात भूलकर, काम करना शुरू कर दिया। कुछ समय बाद, मुझे एक डिज़ाइन कंपनी में नौकरी मिल गई। मुझे हर दिन ज़्यादा समय तक काम करना पड़ता था, लेकिन वेतन बहुत कम मिलता था। वहाँ पर जिन लोगों के पास बेहतर शिक्षा और डिप्लोमा थे, वो काम कम करते, लेकिन पैसे ज़्यादा कमाते थे। उनके लिए तरक्की के भी ज़्यादा मौके थे। लगता था जैसे ज़्यादा ज्ञान और डिप्लोमा होने से, लोगों का पद और इज़्ज़त बढ़ जाती थी। इसलिए, मैं ज्ञान की और ज़्यादा कद्र करने लगी। लेकिन, यह जानकर कि मैं कॉलेज नहीं जा सकती, मेरे अंदर गुस्से और लाचारी की भावना पनपने लगी।

साल 2001 में मैंने एक बेटी को जन्म दिया। मैंने यूनिवर्सिटी जाने के अपने सारे अधूरे ख़्वाब उसके कंधों पर रख दिए। बचपन में ही मैंने उससे कह दिया था कि अपना भविष्य उज्ज्वल बनाने के लिए, मेहनत से पढ़ाई करना और अच्छे कॉलेज जाना बेहद ज़रूरी है। हमारी आर्थिक स्थिति अच्छी नहीं थी, लेकिन उसकी पढ़ाई अच्छी तरह से हो सके, इसके लिए मैंने उसकी ट्यूटोरियल क्लास की फ़ीस दी, पढ़ाई की किताबें खरीदीं और इंटरनेट से अध्ययन सामग्री डाउनलोड की। मैंने बहुत ध्यान से उसकी पढ़ाई की योजना बनाई। मैंने उसे बताया कि उसे स्कूल से वापिस आकर क्या करना है, होम वर्क में कितना समय लगाना है, कितनी देर किताबें पढ़नी हैं ... मैंने उसकी कार्य-योजना अच्छी तरह से बनाई। पढ़ाई करते समय उसका ध्यान इधर-उधर नहीं भटके, इसके लिए मैंने उससे कहा कि जब तक एक घंटे पढ़ाई नहीं कर लेती, वह टॉयलेट भी नहीं जा सकती। उसकी पढ़ाई के दौरान, मैं उस पर हर समय नज़र रखती थी, कभी-कभी देर रात तक भी। पढ़ाई-लिखाई में मेरी इस सख्ती से उसके ग्रेड थोड़े बेहतर हुए। लेकिन कुछ समय बाद, अचानक उसके अध्यापक ने मुझे फ़ोन किया। उन्होंने कहा, "आजकल आपकी बेटी का ध्यान क्लास में नहीं लग रहा है। वह लंच के समय दूसरे बच्चों के साथ नहीं खेलती है और उसके ग्रेड भी नीचे जा रहे हैं, हमें नहीं पता कि ऐसा क्यों हो रहा है।" मुझे तो इस बात पर यकीन ही नहीं हुआ। अंदर ही अंदर मुझे अपनी बेटी पर बहुत गुस्सा आया। मैंने सोचा, "मैंने तुम्हारे लिए इतनी तकलीफ़ें उठाईं, तुम्हारी पढ़ाई को लेकर इतनी मेहनत की। ऐसे कैसे तुम मेरी उम्मीदों पर पानी फेर सकती हो? घर आओ तब देखती हूँ तुमको!" जब वह घर आई, तो बहुत देर तक मैं उसे डांटती रही। वह बहुत परेशान थी। उसने कहा कि मैंने उस पर बहुत ज़्यादा दबाव डाला था। वह रोने लगी और खुद को कमरे में बंद कर लिया। मेरे कहने पर भी कमरे से बाहर नहीं आयी। मैं बेबस हो गई। मैं सोफ़े पर गिरकर रोने लगी, मैंने सोचा: "मेरी सारी बातों और हिदायतों को उसने गलत कैसे समझा?" उसके बाद, उसकी शिक्षा को लेकर मैं बहुत परेशान हो गई। एक तरफ़ खाई थी तो दूसरी तरफ़ कुआँ। अगर मैं सख्ती करती तो मुझे डर था कि कहीं वह तनाव में आकर कुछ गलत कर न बैठे? और अगर नहीं करूँ तो, उसके ग्रेड नीचे गिर जाएँगे और उसे कॉलेज में दाखिला नहीं मिलेगा। उसका भविष्य उज्ज्वल कैसे बन सकेगा? ना मैं खाती ना सोती, हर दम यही सोचती रहती। एक दिन, मैंने सोचा कि किस तरह मेरी माँ मुझसे सर्वशक्तिमान परमेश्वर के अंत के दिनों के सुसमाचार के बारे में बात करती थी। वो अक्सर मुझसे कहतीं: "मुश्किलों का सामना करते समय, तुम परमेश्वर की प्रार्थना कर सकती हो, वो तुम्हें कोई रास्ता ज़रूर दिखाएगा।" तो, मैंने प्रार्थना की और परमेश्वर को अपनी समस्या के बारे में बताया। मैं सर्वशक्तिमान परमेश्वर के वचन पढ़ने लगी और कलीसिया की गतिविधियों से जुड़ गयी।

एक बार, रास्ते में एक बहन से मेरी मुलाक़ात हुई। बातें करते-करते मैंने अपनी बेटी की पढ़ाई से जुड़ी दिक्कतों के बारे में उससे ज़िक्र किया। उन्होंने कहा: अपने बच्चों को पढ़ाना, उन्हें संस्कार देना, उन्हें सही रास्ता दिखाना, यह सब चीज़ें हर माँ-बाप को करनी चाहिए। हम सब चाहते हैं कि हमारे बच्चे कॉलेज जाएँ और अव्वल रहें। यह मैं अच्छी तरह समझती हूँ। लेकिन ऐसा होगा या नहीं, यह हमारे हाथों में नहीं है। हमारा नसीब परमेश्वर के हाथों में है। हमारी शक्ल, हमारी नौकरी, हमारी शादी, हमारी शिक्षा, हमारी आर्थिक स्थिति और हमारी उम्र ... यह सब हमारे पैदा होने से भी पहले परमेश्वर तय कर देते हैं। इसे कोई भी बदल नहीं सकता। "हमारे बेटे और बेटियाँ भी ऐसे ही हैं। उनकी शक्ल-सूरत, उनके चरित्र, जीवन में उनके रास्ते और उनके नसीब, उनके माँ-बाप की हिदायतों से बदले नहीं जा सकते। कुछ माता-पिता बुद्धिजीवी, अक्लमंद और काबिल होते हैं। लेकिन उनके बच्चे मूर्ख और नाकारा होते हैं और वे जीवन में कुछ भी नहीं कर पाते। कुछ माता पिता असभ्य और साधारण होते हैं, लेकिन उनके बच्चे तेज़, प्रतिभाशाली और काबिल होते हैं। इससे हमें पता चलता है कि हम चाहे जो भी करें, अपनी नियति बदल नहीं सकते। जैसा कि कहा गया है: 'मनुष्य का भाग्य स्वर्ग में तय होता है।' हमें अपने बच्चों को शिक्षित करने की ज़िम्मेदारी पूरी करनी होती है। लेकिन हमें याद रखना चाहिए: 'तुम अपना काम अच्छी तरह से करो और बाकी सब परमेश्वर पर छोड़ दो।' इस तरह, तुम्हें इतनी पीड़ा नहीं होगी।" मैं जानती थी कि उनकी बात सच है। जाने से पहले उन्होंने सर्वशक्तिमान परमेश्वर के वचन के दो अंशों का ज़िक्र किया और मुझसे कहा कि मुझे वह पढ़ने चाहिए।

"जिस क्षण से तुम रोते हुए इस दुनिया में आए हो, तब से तुम अपना कर्तव्य करना शुरू करते हो। परमेश्वर की योजना और उसके विधान में अपनी भूमिका ग्रहण करके, तुम जीवन में अपनी यात्रा शुरू करते हो। तुम्हारी पृष्ठभूमि जो भी हो और तुम्हारी आगे की यात्रा जो भी हो, कोई भी उस योजना और व्यवस्था से बच कर भाग नहीं सकता है जो स्वर्ग ने बनायी हैं, और किसी का भी अपनी नियति पर नियंत्रण नहीं है, क्योंकि केवल वही जो सभी चीजों पर शासन करता है ऐसा कार्य करने में सक्षम है।" "लोग जानते हैं कि वे इस जीवन में निर्बल और आशाहीन हैं, कि उनके पास औरों से विशिष्ट होने का अन्य अवसर, और अन्य आशा नहीं होगी, और यह कि उनके पास अपने भाग्य को स्वीकार करने के सिवाय और कोई विकल्प नहीं है। और इसलिए वे अगली पीढ़ी पर अपनी समस्त आशाओं, अपनी अतृप्त इच्छाओं, और आदर्शों को डाल देते हैं, यह आशा करते हुए कि उनकी संतान उनके सपनों को हासिल करने में और उनकी इच्छाओं को साकार करने में उनकी सहायता कर सकती हैं; यह कि उनकी बेटियाँ और बेटे परिवार के नाम को गौरवान्वित करेंगे, और महत्वपूर्ण, समृद्ध, या प्रसिद्ध हो जाएँगे; संक्षेप में, वे अपने बच्चों के सौभाग्य को बहुत ऊँचा देखना चाहते हैं। लोगों की योजनाएँ और कल्पनाएँ उत्तम होती हैं; क्या वे नहीं जानते हैं कि उनके बच्चों की संख्या, उनके बच्चों का रंग-रूप, योग्यताएँ, इत्यादि, यह तय करना उनके हाथ में नहीं है, यह कि उनके बच्चों के भाग्य उनकी हथेलियों में नहीं है? मनुष्य अपने स्वयं के भाग्य के स्वामी नहीं हैं, फिर भी वे युवा पीढ़ी के भाग्य को बदलने की आशा करते हैं; वे अपने स्वयं के भाग्य से बच निकलने में निर्बल हैं, फिर भी वे अपने बेटे और बेटियों के भाग्य को नियन्त्रित करने की कोशिश करते हैं। क्या वे अपने आप को बहुत अधिक मूल्यांकित नहीं कर रहे हैं? क्या यह मनुष्य की मूर्खता और अज्ञानता नहीं है?" (वचन देह में प्रकट होता है)। परमेश्वर के वचनों से मेरे दिल को सुकून मिला। जब मैं छोटी थी, मैंने कॉलेज जाने के अपने सपने को पूरा करने के लिए कड़ी मेहनत करती थी, लेकिन अपनी सारी कोशिश के बावजूद, मैं असफल रही। जब मेरी बेटी पैदा हुई, तो यह एहसास फिर से जागने लगा। लगा जैसे एक और मौका मिल गया। अपने जीवन की सारी उम्मीदें मैंने अपनी बेटी के कंधों पर रख दी। मैं चाहती थी कि वह पढ़े, काबिल बने, और उसका भविष्य उज्ज्वल बने, और वह मेरे सारे सपने पूरे करे। लेकिन, मेरी सारी कोशिशों के बावजूद यह संभव नहीं हो पाया। मेरी बेटी हमेशा से समझदार और तमीज़दार थी। उसके ग्रेड भी ठीक-ठाक आते थे। यह तो जब मैंने उस पर दबाव डालना शुरू किया तो वह गलतियाँ करने लगी। उसके ग्रेड और उसने ज़िंदगी में जो रास्ते चुने, दोनों पर मेरा बस नहीं था। सब कुछ परमेश्वर के हाथों में था। मैं तो अपनी नियति पर ही नियंत्रण नहीं रख सकी, बेटी की नियति पर क्या नियंत्रण रखूँगी। मैं अभिमानी हो गयी थी और खुद को कुछ ज़्यादा काबिल समझने लगी थी। इस एहसास से ही मुझे राहत मिली।

उसके बाद, मैंने अपनी बेटी की कार्य-योजनाओं को पहले की तरह व्यवस्थित करना बंद कर दिया। उससे ज़्यादा उम्मीदें रखना भी छोड़ दिया। कुछ समय बाद, जब मैं स्कूल गयी, तो उसके अध्यापक ने कहा: "आपकी बेटी अक्लमंद है और उसमें बहुत क्षमता है। पढ़ाई में थोड़ी मदद से उसे किसी बेहतरीन हाई स्कूल में दाखिला ज़रूर मिल जाएगा। इस तरह, उसके लिए कॉलेज में जाना कठिन नहीं होगा।" उनकी इस बात से मेरा रवैया भी बदलने लगा। मेरी बेटी क्लास में सबसे आगे रहती है या नहीं, इसकी मुझे परवाह नहीं थी, लेकिन मैं हमेशा चाहती थी कि वह कॉलेज जाए। नहीं तो, उसे अपनी आगे की ज़िंदगी में बहुत मुश्किल होगी, और वह समाज में अपनी जगह कभी नहीं बना सकेगी। मैंने देखा कि मेरे पति उस पर पढ़ने के लिए दबाव डालने लगे थे। वह उसे सबसे आगे देखना चाहते थे। जब उसके ग्रेड अच्छे आते, तो वो उसे इनाम देते। अगर अच्छे नहीं आते, तो उसे सज़ा देते। मैं वैसे तो उनसे सहमत नहीं थी, लेकिन मैंने उनको रोका भी नहीं। मैंने यह भी सोचा कि अगर उनका तरीका काम कर गया और बेटी ने सच में बेहतर कर दिखाया, तो इससे हमारे पूर्वजों को सम्मान मिलेगा। लेकिन, धीरे-धीरे, मुझे पता चला कि इतने दबाव के कारण, हमारी बेटी समाज से दूर होने लगी थी। वह खुद को अपने कमरे में बंद कर लेती और हमसे बात भी नहीं करती। मुझसे वह हमेशा नाराज़ रहने लगी। एक बार, मेरे पति ने उसे 'आई चिंग' याद नहीं कर पाने के लिए डांटा। वह इतनी विचलित हो गई कि घर का दरवाज़ा बंद करके बाहर भाग गई। हमने उसे हर जगह ढूँढा, लेकिन वह नहीं मिली। हम यह सोचकर डर गए कि उसका क्या होगा। तरह-तरह की बातें हमारे दिमाग में चलने लगीं: "कहीं वो कार दुर्घटना का शिकार तो नहीं हो गई? कहीं उसने कोई बेवकूफ़ी तो नहीं कर दी।" आखिरकार जब वह देर रात घर आई, तब चैन मिला। उन्हीं दिनों, अखबार में मैंने एक ऐसी खबर पढ़ी जिससे मैं बहुत घबरा गई। पढ़ाई के तनाव के कारण एक जूनियर हाई स्कूल के छात्र ने ख़ुदकुशी कर ली थी। मैं इंटरनेट पर इससे जुड़ी जानकरी ढूँढने लगी, और मुझे जो मिला वह बहुत भयावह था। पढ़ाई के दबाव की वजह से कई छात्र-छात्राओं में मनोवैज्ञानिक समस्याएं विकसित हो जाती हैं। कुछ समाज से दूर हो जाते हैं या उनका ध्यान भटकने लगता है, और कुछ तो ख़ुदकुशी भी कर लेते हैं। मैं एकदम स्तब्ध हो गई और उस रात मैं सो भी नहीं सकी।

उसके अगले दिन, मैं बहुत चिंतित थी कि अपनी बेटी से क्या कहूँ, यह जानते हुए कि कुछ भी गलत बोलने से वह शायद फिर घर से भाग सकती थी या उससे भी बुरा कर सकती थी। इसके बाद मैं कई दिनों तक ज़बरदस्त तनाव में थी। एक बार फिर मुझे बच्ची की पढ़ाई से जुड़े अपने नज़रिये को परखने की ज़रूरत थी। मैंने हमेशा ज्ञान की पूजा की थी और सोचा था कि ज्ञान हासिल करने और कॉलेज जाने से बेहतर भविष्य की राह खुलती है। लेकिन यहाँ तो मेरी बेटी तनाव से बिखर रही थी। कुछ समझ नहीं आ रहा था क्या करूँ। पता नहीं कि हालात इतने बदल कैसे गए। मैंने सोचा कि जीवन में इतनी तकलीफ़ें क्यों हैं। एक दिन, धार्मिक कार्य के दौरान मैंने परमेश्वर के वचनों के दो वीडियो देखे। सर्वशक्तिमान परमेश्वर कहते हैं, "मानवजाति द्वारा सामाजिक विज्ञानों के आविष्कार के बाद से मनुष्य का मन विज्ञान और ज्ञान से भर गया है। तब से विज्ञान और ज्ञान मानवजाति के शासन के लिए उपकरण बन गए हैं, और अब मनुष्य के पास परमेश्वर की आराधना करने के लिए पर्याप्त गुंजाइश और अनुकूल परिस्थितियाँ नहीं रही हैं। मनुष्य के हृदय में परमेश्वर की स्थिति सबसे नीचे हो गई है। हृदय में परमेश्वर के बिना मनुष्य की आंतरिक दुनिया अंधकारमय, आशारहित और खोखली है। बाद में मनुष्य के हृदय और मन को भरने के लिए कई समाज-वैज्ञानिकों, इतिहासकारों और राजनीतिज्ञों ने सामने आकर सामाजिक विज्ञान के सिद्धांत, मानव-विकास के सिद्धांत और अन्य कई सिद्धांत व्यक्त किए, जो इस सच्चाई का खंडन करते हैं कि परमेश्वर ने मनुष्य की रचना की है, और इस तरह, यह विश्वास करने वाले बहुत कम रह गए हैं कि परमेश्वर ने सब-कुछ बनाया है, और विकास के सिद्धांत पर विश्वास करने वालों की संख्या और अधिक बढ़ गई है। अधिकाधिक लोग पुराने विधान के युग के दौरान परमेश्वर के कार्य के अभिलेखों और उसके वचनों को मिथक और किंवदंतियाँ समझते हैं। अपने हृदयों में लोग परमेश्वर की गरिमा और महानता के प्रति, और इस सिद्धांत के प्रति भी कि परमेश्वर का अस्तित्व है और वह सभी चीज़ों पर प्रभुत्व रखता है, उदासीन हो जाते हैं। मानवजाति का अस्तित्व और देशों एवं राष्ट्रों का भाग्य उनके लिए अब और महत्वपूर्ण नहीं रहे, और मनुष्य केवल खाने-पीने और भोग-विलासिता की खोज में चिंतित, एक खोखले संसार में रहता है।" "शैतान ज्ञान को एक चारे के रूप में उपयोग करता है। ध्यान से सुनें: ज्ञान बस एक प्रकार का चारा है। लोगों को लुभाया जाता है कि 'कठिन अध्ययन करें और दिन प्रति दिन खुद को बेहतर बनाएं, ' ज्ञान को हथियार के रूप में उपयोग करें और स्वयं को उससे हथियारबंद करें, और फिर विज्ञान के द्वार को खोलने के लिए ज्ञान का उपयोग करें; दूसरे शब्दों में, जितना अधिक ज्ञान तुम अर्जित करोगे, उतना ही अधिक तुम समझोगे। शैतान लोगों को यह सब कुछ बताता है; यह लोगों को ज्ञान सीखने के समय ही ऊँचे आदर्शों को बढ़ावा देने के लिए भी कहता है, वह उन्हें बताता है कि उन्‍हें महत्वाकांक्षाएँ एवं आकांक्षाएं पैदा करनी चाहिए। मनुष्‍य की जानकारी के बिना, शैतान इस प्रकार के अनेक सन्देश देता है, लोगों को अवचेतन रूप से यह महसूस करवाता है कि ये चीज़ें सही हैं, या लाभप्रद हैं। अनजाने में, लोग इस मार्ग पर कदम रखते हैं, अनजाने में ही अपने स्वयं के आदर्शों एवं महत्वाकांक्षाओं के द्वारा आगे बढ़ने को बाध्‍य किए जाते हैं। ... शैतान के द्वारा बहकाए जाने के द्वारा, वे अनजाने में ही उस रास्ते पर चल पड़ते हैं जिसे उसने उनके लिए तैयार किया था। जब वे इस रास्ते पर चलते हैं, तो उन्हें शैतान के जीवन जीने के नियमों को स्वीकार करने के लिए बाध्य किया जाता है। पूरी तरह अनजाने में, वे जीवन जीने के अपने स्वयं के नियम विकसित कर लेते हैं, जबकि ये शैतान के उन नियमों के अलावा और कुछ भी नहीं होते हैं जिन्हें जबरदस्ती उनके भीतर बैठा दिया गया है। सीखने की प्रक्रिया के दौरान, शैतान उन्हें अपने स्वयं के लक्ष्यों को बढ़ावा देने, अपने स्वयं के जीवन के लक्ष्यों को, जीवन जीने के सिद्धान्तों को, और जीवन की दिशा को निर्धारित करने के लिए उकसाने का कारण बनता है, इसी बीच कहानियों का उपयोग करके, जीवनियों का उपयोग करके, और सभी संभावित माध्यमों का उपयोग करके उनमें शैतान की चीज़ों को भरता है, ताकि वे थोड़ा-थोड़ा करके उसके चारे को निगल लें" (वचन देह में प्रकट होता है)। "शैतान राष्ट्रीय सरकारों और प्रसिद्ध एवं महान व्यक्तियों की शिक्षा और प्रभाव के माध्यम से लोगों को दूषित करता है। उनके झूठ और बकवास मनुष्य की प्रकृति और जीवन बन गए हैं। 'स्वर्ग उन लोगों को नष्ट कर देता है जो स्वयं के लिए नहीं हैं' एक प्रसिद्ध शैतानी कहावत है जिसे हर किसी में डाल दिया गया है और यह मनुष्य का जीवन बन गया है। जीने के लिए दर्शन के कुछ अन्य शब्द भी हैं जो इसी तरह के हैं। शैतान प्रत्येक देश की उत्तम पारंपरिक संस्कृति के माध्यम से लोगों को शिक्षित करता है और मानवजाति को विनाश की विशाल खाई में गिरने और उसके द्वारा निगल लिए जाने पर मजबूर कर देता है, और अंत में परमेश्वर लोगों को नष्ट कर देता है क्योंकि वे शैतान की सेवा करते हैं और परमेश्वर का विरोध करते हैं" (मसीह की बातचीत के अभिलेख)।

परमेश्वर के वचन इंसान की तकलीफ़ों की वजह की तरफ़ इशारा करते हैं। हम सरकारी शिक्षा, मशहूर हस्तियों और पारंपरिक संस्कृति से प्रभावित होकर शैतान के इन विषों को अपने अंदर समाहित कर लेते हैं, जैसे कि "ज्ञान आपके भाग्य को बदल सकता है," "किसी व्यक्ति की नियति उसी के हाथ में होती है," और "एक विद्वान होना समाज के शीर्ष पर होना है।" इनसे प्रभावित होकर ही हम ज्ञान हासिल करते हैं, और यह सोच पनपती है कि ज्ञान ही सब कुछ है, जिससे हम समाज में अपनी ख़ास जगह बना कर अच्छी ज़िंदगी जी सकते हैं। हम ज्ञान प्राप्त करने की कोशिश करते हैं, ज्ञान की पूजा करते हैं, परमेश्वर के अस्तित्व और संप्रभुता को नकारते हुए। हम परमेश्वर से दूर रहते हैं और उसका विरोध करते हैं, और परमेश्वर हमारे हृदय से गायब रहते हैं। हम उसकी सरपरस्ती, सुरक्षा और पोषण से वंचित रह जाते हैं। हम खोखले और पतित हो जाते हैं। कई लोगों के पास ज्ञान और प्रसिद्धि होती है और लोग उनकी इज़्ज़त भी करते हैं। लेकिन उनकी ज़िंदगी अकेली और दुख भरी होती है। बहुत सारे उच्च-श्रेणी के अधिकारी अक्लमंद होते हैं और उनके पास डिग्री भी होती हैं, लेकिन पैसे, ताकत और रुतबे को पाने के संघर्ष में, वे एक दूसरे को धोखा देते हैं, फँसाते हैं और जान तक ले लेते हैं। उनमें से कुछ खुद को मार डालते हैं या उनकी हत्या कर दी जाती है। किसी भी इंसान की नियति और उसके आखिरी परिणाम पर उसकी अक्लमंदी और रुतबे का कोई असर नहीं होता। "किसी व्यक्ति की नियति उसी के हाथ में होती है" और "ज्ञान आपके भाग्य को बदल सकता है" यह सब लोगों को धोखा देने और भ्रष्ट करने के लिए बनाए गए शैतान के झूठ हैं। परमेश्वर ने इंसान को बनाया है। इंसान को ज़रूरत है परमेश्वर के उद्धार और उसके पोषण की। एक बेहतर नतीजे के लिए इंसान को सिर्फ़ परमेश्वर की आराधना और उसकी संप्रभुता के सामने समर्पण करना चाहिए। लोग परमेश्वर को नकारते हैं और उसको भूल जाते हैं, यह सोचकर कि ज्ञान से उनका भाग्य बदल जाएगा। आखिर में, वे परमेश्वर का विरोध करते हैं और नष्ट हो जाते हैं। जैसा कि परमेश्वर ने कहा : "यदि तुम अपने ज्ञान और अपने उपक्रमों की योग्यता पर भरोसा रखते हो, तो तुम हमेशा असफल रहोगे, और हमेशा परमेश्वर के आशीषों से वंचित रहोगे" (वचन देह में प्रकट होता है)। मैं ऐसी ही थी! परमेश्वर में विश्वास करने से पहले, मैं शैतान के सिद्धांतों का पालन करती थी जैसे कि "ज्ञान आपके भाग्य को बदल सकता है" और "एक विद्वान होना समाज के शीर्ष पर होना है।" मैंने पूरी मेहनत से पढ़ाई की, कॉलेज जाने और सफल होने के लिए। जब मेरे सपने पूरे नहीं हुए, तो मुझे लगा कि मेरी ज़िंदगी में अब कुछ नहीं बचा है, जीवन के कोई मायने ही नहीं है। मेरी बेटी के पैदा होने के बाद, ये सारे शैतानी सिद्धांत उस पर थोप दिए, उसके ऊपर सारा दबाव डाल दिया। आखिर में, इस दमनकारी माहौल के कारण, वह जिद्दी, नाज़ुक, गैर-मिलनसार और गुस्सैल हो गयी। वह अपने मन की बात मुझे नहीं बताती थी और हमारा माँ–बेटी वाला रिश्ता बिगड़ने लगा। मैं जीने के लिए शैतान के सिद्धांतों का पालन कर रही थी। इससे न केवल मैं कमज़ोर हुई, बल्कि मेरी बेटी को भी कठिनाई हुई। उसकी ज़िंदगी तो जैसे बर्बाद ही हो गयी। यह सारा नुकसान शैतान ने किया था। मैं जानती थी कि अगर मैं ज्ञान और काबिलियत से अपनी बेटी के भाग्य को बदलने के लिए, शैतान के सिद्धांतों पर चलती रही, तो मैं उसे नाकामी का रास्ता दिखाऊँगी। यह तब मुझे समझ आया: मेरी बेटी का नसीब और उसका भविष्य कॉलेज जाने से नहीं तय होगा। परमेश्वर की आराधना, भविष्य को उज्ज्वल बनाने का एकमात्र तरीका है। बतौर माता–पिता, हमारा फर्ज़ है कि हम अपने बच्चों को परमेश्वर के वचनों के सत्य पर आधारित शिक्षा प्रदान करें और उन्हें जीवन में सही राह दिखाएं। यह उनके प्रति हमारी ज़िम्मेदारी है।

इसके बाद, मैंने अपनी बेटी पर पढ़ने और अव्वल आने के लिए ज़ोर डालना बंद कर दिया। मैंने सब कुछ समय पर छोड़ दिया। शाम को, मैं उसके साथ परमेश्वर के वचनों को पढ़ती और उसे सिखाती कि कैसे परमेश्वर ने स्वर्ग, पृथ्वी और सभी चीज़ों की रचना की, किस तरह शैतान लोगों को भ्रष्ट करता है, कैसे परमेश्वर हमारी रक्षा करते हैं, जैसी तमाम बातें। जब मेरी बेटी ने मुश्किलों का सामना किया, तब उसे परमेश्वर की प्रार्थना करना और भरोसा करना आ गया। धीरे-धीरे वह समझदार होने लगी और पहले से ज़्यादा खुश रहने लगी। उसके ग्रेड भी पहले से बेहतर होने लगे और हमारे रिश्ते भी बेहतर होने लगे। एक दिन, मैंने परमेश्वर के वचनों का यह अंश पढ़ा: "हम ज्ञान के सबसे सतही पहलू पर चर्चा से शुरुआत करेंगे। क्या भाषाओं का व्याकरण और शब्द लोगों को भ्रष्ट करने में समर्थ हैं? क्या शब्द लोगों को भ्रष्ट कर सकते हैं? (नहीं।) शब्द लोगों को भ्रष्ट नहीं करते; वे एक उपकरण हैं, जिसका लोग बोलने के लिए इस्तेमाल करते हैं, और वे वह उपकरण भी हैं, जिसका लोग परमेश्वर के साथ संवाद करने के लिए इस्तेमाल करते हैं, और इतना ही नहीं, वर्तमान समय में भाषा और शब्द ही हैं, जिनसे परमेश्वर लोगों के साथ संवाद करता है। वे उपकरण हैं, और वे एक आवश्यकता हैं। एक और एक दो होते हैं, और दो गुणा दो चार होते हैं; क्या यह ज्ञान नहीं है? पर क्या यह तुम्हें भ्रष्ट कर सकता है? यह सामान्य ज्ञान है—यह एक निश्चित प्रतिमान है—और इसलिए यह लोगों को भ्रष्ट नहीं कर सकता। तो किस तरह का ज्ञान लोगों को भ्रष्ट करता है? भ्रष्ट करने वाला ज्ञान वह ज्ञान होता है, जिसमें शैतान के दृष्टिकोणों और विचारों की मिलावट होती है। शैतान इन दृष्टिकोणों और विचारों को ज्ञान के माध्यम से मानवजाति में भरने का प्रयास करता है। उदाहरण के लिए, किसी लेख में, लिखित शब्दों में अपने आपमें कुछ ग़लत नहीं होता। समस्या लेखक के दृष्टिकोण और अभिप्राय में होती है, जब वह लेख लिखता है, और साथ ही उसके विचारों की अंतर्वस्तु में। ये आत्मा की चीज़ें हैं, और वे लोगों को भ्रष्ट करने में सक्षम हैं" (वचन देह में प्रकट होता है)। परमेश्वर के वचनों से मुझे ज्ञान पाने के बारे में थोड़ी जानकारी मिली। व्यावहारिक ज्ञान एक सकारात्मक चीज़ है जो सबके पास होना चाहिए क्योंकि इससे उनकी क्षमता बढ़ती है। हमें इसे ठीक से जानना चाहिए। लेखन और संगीत की जानकारी अच्छी चीज़ है। थोड़ा वैज्ञानिक ज्ञान भी ठीक है, जैसे मशीनरी, रसायन विज्ञान, भौतिक विज्ञान, औषधि और पाक-कला के बारे में जानना। ये सब ज़िंदगी जीने के लिए ज़रूरी चीज़ें हैं और इन्हें ठीक से सीखना चाहिए। लेकिन ज्ञान ही सत्य नहीं। यह किसी इंसान या उसकी ज़िंदगी को बदल नहीं सकते। इसकी अंध-भक्ति नहीं करनी चाहिए। लोग चाहे कितना भी जान लें, अगर वे सत्य के साथ नहीं जीते हैं, तो शैतान की भ्रष्टता से बच नहीं सकते। उनकी ज़िंदगी कष्टप्रद और खाली ही रहेगी, और जब बड़ी आपदाएँ आएँगी, तो उनका नाश हो जाएगा। मैं कभी सत्य को नहीं समझ पाती थी और यह भी नहीं पता था कि ज्ञान के प्रति हमारा नज़रिया कैसा हो। मुझे शैतान ने भड़का दिया था। मैं सोचती थी कि ज्ञान हासिल करके मेरा नसीब बदल जाएगा और मैं कामयाब हो जाऊँगी। मेरे सपने टूटने पर, मैंने अपनी सारी उम्मीदें अपनी बेटी के कंधों पर डाल दीं। मैंने अपना सारा समय, पैसा और ऊर्जा उसकी पढ़ाई में लगा दी, ताकि वह कॉलेज ज़रूर जा सके। लेकिन वह और ज़्यादा गैर-मिलनसार बन गई, यहाँ तक कि घर से ही भाग गई। शैतान ने मुझे बहुत गहरी चोट दी थी, यह सच है। लेकिन उसने मुझसे ज़्यादा मेरी बेटी का नुकसान किया था। हमारे पूरे परिवार को शैतान के इस झूठे कथन से नुकसान हुआ था कि, "ज्ञान आपके भाग्य को बदल सकता है।" सर्वशक्तिमान परमेश्वर के वचनों ने मुझे सिखाया कि कैसे शैतान, ज्ञान के इस्तेमाल से लोगों को धोखा देता है, भ्रष्ट करता है। ज्ञान सत्य नहीं है। यह न तो हमें बदल सकता है न ही बचा सकता है। सिर्फ़ परमेश्वर ही सत्य है, और सिर्फ़ परमेश्वर के वचन ही हमें बचा सकते हैं। अब मैं जान गई थी कि अपनी बच्ची को यह सिखाना है कि परमेश्वर में यकीन करो, उसके वचनों को पढ़ो और सत्य की खोज करो। यही जीवन का एकमात्र सही रास्ता है।

एक दिन, मेरी बेटी ने मुझे कुछ ऐसे छात्र-छात्राओं के बारे में बताया जो बहस करते थे, झगड़ते थे, सिगरेट और शराब पीते थे, और खुल कर एक दूसरे के साथ मौज-मस्ती करते थे। स्कूल उनके इस बर्ताव को नज़रअंदाज़ करता था और उनके माँ-बाप के हाथ बंधे हुए थे। जब मैंने अपनी बेटी से पूछा कि इन सब के बारे में वह क्या सोचती है, तो उसने कहा: "मैं परमेश्वर में यकीन करती हूँ। मैं यह सब नहीं करती क्योंकि परमेश्वर को यह सब पसंद नहीं।" यह सुनकर मुझे बहुत अच्छा लगा। अगर मैंने उसे परमेश्वर के बारे में नहीं बताया होता और सत्य को समझाने के लिए परमेश्वर के वचन नहीं पढ़े होते, तो शायद वह भी उन दूसरे बच्चों की तरह गलत राह पर चल रही होती। लेकिन सर्वशक्तिमान परमेश्वर के वचनों ने मुझे बदल दिया, मुझे ज्ञान के बंधनों से आज़ाद कर दिया और मेरी मदद की, ताकि मैं अपनी बेटी को सही राह दिखा सकूँ। दिल की गहराइयों से, मैं सर्वशक्तिमान परमेश्वर को मेरी सुरक्षा और उद्धार के लिए धन्यवाद देती हूँ!

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13. हृदय की मुक्ति

सर्वशक्तिमान परमेश्वर कहते हैं, "इस युग के दौरान परमेश्वर द्वारा किया गया कार्य मुख्य रूप से मनुष्य के जीवन के लिए वचनों का प्रावधान करना,...

वचन देह में प्रकट होता है न्याय परमेश्वर के घर से शुरू होता है अंत के दिनों के मसीह, सर्वशक्तिमान परमेश्वर के अत्यावश्यक वचन परमेश्वर के दैनिक वचन सर्वशक्तिमान परमेश्वर के वचनों का संकलन सत्य का अभ्यास करने के 170 सिद्धांत मेमने का अनुसरण करो और नए गीत गाओ जीवन में प्रवेश पर धर्मोपदेश और संगति अंत के दिनों के मसीह—उद्धारकर्ता का प्रकटन और कार्य राज्य का सुसमाचार फ़ैलाने के लिए दिशानिर्देश परमेश्वर की भेड़ें परमेश्वर की आवाज को सुनती हैं (नये विश्वासियों के लिए अनिवार्य चीजें) परमेश्वर की आवाज़ सुनो परमेश्वर के प्रकटन को देखो राज्य के सुसमाचार पर अत्यावश्यक प्रश्न और उत्तर (संकलन) मसीह के न्याय के आसन के समक्ष अनुभवों की गवाहियाँ विजेताओं की गवाहियाँ (खंड I) मैं वापस सर्वशक्तिमान परमेश्वर के पास कैसे गया

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