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परमेश्वर के वचन के बारे में धर्मोपदेश और सहभागिता "बिना सत्य के परमेश्वर में विश्वास करना निष्कासन की ओर ले जाएगा"

133-A-3

जब परमेश्वर व्यवस्था के युग का कार्य कर रहा था, उसने मनुष्य का प्रयोग इस्तेमाल किया,परमेश्वर की व्यवस्थाओं और आज्ञाओं को लागू करने के लिए उसने मूसा का इस्तेमाल किया। उस समय, वहाँ अनेक इस्राएली थे, जिन्होंने मूसा का विरोध किया, और जिनकी मूसा के प्रति कुछ धारणाएँ थी। उन्होंने क्या कहा? "परमेश्वर तुम से बातें करता है, मूसा, परन्तु क्या वह हम से भी बातें नहीं करता? परमेश्वर तुम्हें प्रबुद्ध करता है, परन्तु क्या वह हमें भी प्रबुद्ध नहीं करता है? तो वह तुम ही क्यों हो, जो हमारा मार्गदर्शन करेगा?" क्या यही नहीं है जो उनका अर्थ था? यह अशान्ति पैदा करने के लिए भीड़ जमा करने का एक समय था, जिन्हें, अविश्वासियों के शब्दों में 'विद्रोह' कहा जाता है। और परिणाम क्या था? परिणाम यह था कि परमेश्वर ने मूसा को अधिकार दे दिया। एक बार मूसा बोला, पृथ्वी खुल गई और वे लोग सीधे अधोलोक में जा गिरे, और दौ सौ पचास मुखिया नष्ट कर दिए गए थे। कुछ लोग कहते हैं, "उन दौ सौ पचास मुखियाओं ने क्या दुष्टता कि थी? क्या वे सभी बुरे लोग थे? मैं नहीं बता सकता।" बाइबल में नहीं लिखा गया कि सामान्य समयों में उनका कैसा चरित्र था, या उन्होंने कौन से बुरे काम किए थे-यह मात्र इसी एक घटना के विषय में बताती है। मूसा के विषय में उनकी धारणाएँ थी, और विद्रोह करने के लिए वे एकजुट हो गए और इसी मुद्दे ने परमेश्वर के प्रशासन का अपमान कर दिया। तब उन्हें दण्ड मिला और वे जीते-जी अधोलोक में जा गिरे। क्योंकि उन दौ सौ पचास मुखियाओं की उस व्यक्ति के प्रति धारणाएँ थी, परमेश्वर ने जिसका इस्तेमाल किया था, और उन्होंने उसकी आज्ञा का उल्लंघन किया, उन्हें दण्ड प्राप्त हुआ। वह दण्ड उनके साधारण व्यवहार के आधार पर नहीं था, और न ही यह इस आधार पर था कि उनका चरित्र कैसा था। यदि तुम विद्रोह करते हो, यदि तुम परमेश्वर के अधिकार को अस्वीकार करते हो, या यदि कार्य के लिए परमेश्वर किसी का उपयोग करता है और तुम उसके विरुद्ध धारणाएँ रखते हो, तब यह परमेश्वर के कार्य का विरोध करना है! तुम परमेश्वर के कार्य में रुकावट और विघ्न डाल रहे हो। तुम परमेश्वर की इच्छा के पूर्ण होने में एक अड़चन और राह का एक रोड़ा हो। उस समय परमेश्वर तुम्हें दण्डित करेगा और तुम्हें जीवित ही अधोलोक में डाल देगा। कुछ लोग ऐसे हैं जो इस मुद्दे की गम्भीरता को नहीं देख सकते हैं, और अब भी परमेश्वर के घर में अशान्ति का कारण बनते हैं, मुझ में सर्वदा गलती खोजने का प्रयत्न कर रहे हैं, और मुझे हटाना और मेरा स्थान लेना चाहते हैं। क्या तुम सोचते हो कि यह एक मानव अधिकार है? कुछ लोग हैं जो मसीह के विषय में धारणाएँ रखते हैं, परन्तु वे एक शब्द भी बोलने का साहस नहीं करते, परन्तु पवित्र आत्मा द्वारा इस्तेमाल किए गए मनुष्य से वे ढिठाई से कह सकते हैं, "क्योंकि तुम एक व्यक्ति हो, मैं तुम्हारा विरोध कर सकता हूँ, और मैं पालन नहीं करता।" यह क्या स्वभाव है? यदि तुम किसी व्यक्ति के अधीन नहीं होते हो-तो यह इसे अभिव्यक्त करने का एक भ्रष्ट तरीका है। यदि तुम पवित्र आत्मा द्वारा इस्तेमाल किए गए व्यक्ति के अधीन नहीं होते हो, तो इसे प्रशासकीय आज्ञा का उल्लंघन कहा जाता है! यह एक ऐसा मामला है जो सीधे परमेश्वर के स्वभाव का उल्लंघन करता है! कोई इसके परिणामों की कल्पना करने तक का साहस नहीं कर सकता है। मुझे बताओ, क्या यही वास्तविकता नहीं है? ऐसे लोग हो सकते हैं, जो कहते हैं, "तुम यह भयावह बातें मात्र लोगों को भयभीत करने के लिए कह रहे हो, तुम हमें डराते हो, तुम डरपोक लोगों को डराते हो।" यदि तुम विश्वास नहीं करते, तब तुम विश्वास नहीं करते, और तुम इसे इस तरीके से करने का प्रयत्न करोगे; यदि तुम इसे इस तरह से करोगे, तो यह तुम्हारे लिए समस्या होगी। "जो कोई विरोध करता है मारा जाएगा!" यह परमेश्वर का वचन है!

कुछ लोग हैं जो कहते हैं, "यद्यपि विरोध करने के पश्चात भी वह नहीं मरा।" चिन्ता मत करो-मृत्यु की बात करने के दो तरीके हैं। विरोध के कुछ कार्य गंभीर होते हैं और उसी क्षण भौतिक शरीर की मृत्यु का कारण बनते हैं; कुछ उतने संगीन नहीं होते हैं, और शरीर नहीं मरेगा, परन्तु आत्मा मर जाएगा। पवित्र आत्मा का कार्य उसे छोड़कर चला जाएगा, और उसे एक टहनी के समान तोड़ देगा। जैसे ही टहनी को तोड़ा जाएगा, यद्यपि टहनी के पत्ते अभी भी हरे होंगे, परन्तु यह पहले ही मर चुकी है। इसे इसके स्रोत से अलग के दिया गया है, क्या ऐसा ही नहीं है? जब टहनी को तोड़ दिया गया है, तो यह एक बड़ी समस्या है। इसलिए, परमेश्वर के किसी भी वचन को सुनने से न चूकें! अविश्वासियों का एक सामान्य कथन होता है: "यदि तुम उन वचनों का पालन नहीं करते, जो एक अनुभवी व्यक्ति ने कहे थे, तो तुम्हें हानि उठानी पड़ेगी।" यह सत्य नहीं है, परन्तु हमारे जैसे लोगों के लिए, जो परमेश्वर पर विश्वास करते हैं, यदि हम परमेश्वर के वचन को नहीं सुनते, तो हम वर्तमान में दुर्भाग्य का सामना करते हैं। ये वचन निस्सन्देह वह सत्य हैं। हम ऐसा क्यों कहते हैं कि ये वचन वह सत्य है? हम क्यों कहते हैं कि परमेश्वर के समस्त वचन वह सत्य है? क्योंकि परमेश्वर के वचन के पास अधिकार है! परमेश्वर के वचन अवश्य ही पूरे किये जाने चाहिए! इसमें एक भी वाक्य ऐसा नहीं है, जो झूठ हो, न ही कुछ ऐसा है जो खोखला कथन हो। क्योंकि प्रत्येक बात जो परमेश्वर कहता है, वह अपना वचन पूरा करेगा। परमेश्वर के स्वभाव का एक पहलू यह है कि "वह अपने वचन जितना भला है, और उसका वचन अवश्य पूरा होगा, और जो पूरा हो गया, वह सर्वदा तक बना रहता है।" यही परमेश्वर का स्वभाव है। इसलिए परमेश्वर का वचन सत्य है, और परमेश्वर का समस्त वचन पूरा होगा, और जो इसका उल्लंघन करेंगे, वे सभी मारे जाएँगे और सभी को कीमत चुकानी पड़ेगी। कुछ लोग कहते हैं, "मैंने नहीं देखा परमेश्वर उस समय कैसे क्रोधित हुआ या परमेश्वर की ताड़ना कैसे आई।" यदि तुम ने इसे देखा, तो यह तो और बड़ी समस्या है, क्योंकि तब तुम्हारा भौतिक शरीर मारा जाएगा। परन्तु यदि तुम ने इसे नहीं देखा, तो भी तुम्हारी आत्मा में समस्या है, और हो सकता है तुम्हारे लिये शायद कोई संभावना न हो। क्या यह एक संगीन मामला नहीं है? यह अत्यधिक संगीन है! किसी ने मेरे साथ ऐसे शब्दों में बात की जिनसे प्रलोभन झलकता था, और जब मुझे उसकी बातों में प्रलोभन का का आभास हुआ, और यह कि वह एक नया विश्वासी है, जिसने मात्र आधा या एक वर्ष से ही विश्वास करना शुरु किया था, तो मैंने उस समय कुछ नहीं कहा। उसके पश्चात, परमेश्वर, जिसने यह सुन लिया था, आया और उसने ये वचन कहे: "यह व्यक्ति उद्धार प्राप्त नहीं कर सकता।" मात्र यह एक वाक्यांश। "ओह," मैंने कहा, "यह समाप्त हो गया, यह व्यक्ति गया काम से, और वह समस्या में है।" क्या तुम सोचते हो कि जब परमेश्वर ने इस प्रकार कहा, तो यह एक साधारण कथन था? यह किसी भाई या बहन के द्वारा नहीं कहा गया था, परन्तु परमेश्वर के मुख से बोला गया था। स्वभाव में यह मामला अत्यधिक संगीन है, और जो वचन परमेश्वर कहता है, वे अवश्य ही सफल होते हैं! परमेश्वर के घर में समस्त कार्य क्रमबद्ध तरीके से परमेश्वर के मार्गदर्शन के अधीन हैं और इसे बाहर से नहीं देखा जा सकता है। बाहर से तुम परमेश्वर को अनेक वचन बोलते हुए देखते हो, और वास्तविकता में, भविष्य में और भी होंगे, बाहरी रूप से तुम पवित्र आत्मा द्वारा प्रयोग किए गए व्यक्ति को जनसमूहों का मार्गदर्शन करते, और परमेश्वर के परिवार के कार्य प्रबन्धन करते देखते हो, और तुम कहते हो, "क्या यह सब उस व्यक्ति के द्वारा नहीं किया जा रहा है?" क्या तुम यह देखने के योग्य हो कि यह सबकुछ वास्तव में परमेश्वर के द्वारा किया जा रहा है? यदि तुम वास्तव में देखते हो कि सबकुछ परमेश्वर के द्वारा किया गया है, तब तुम आशिषित हो, और यह प्रदर्शित करता है कि तुम परमेश्वर के काम-काज को जानते हो, कि तुम परमेश्वर के कार्य को जानते हो। जो लोग आत्मा को नहीं समझते, कहते हैं, "क्या यह सब उस व्यक्ति के द्वारा नहीं किया जा रहा है? परमेश्वर का समस्त वचन पहले ही बोला जा चुका है, और अब परमेश्वर कभी-कभार ही प्रकट होता है। पवित्र आत्मा दे द्वारा प्रयोग किया गया व्यक्ति निरन्तर यह या वह कह रहा है, या यह या वह कर रहा है-क्या यह सब उस व्यक्ति के द्वारा नहीं किया जा रहा है?" इन शब्दों के विषय में तुम क्या सोचते हो? हम क्यों कहते हैं कि इस प्रकार का व्यक्ति आत्मा को नहीं समझता है? वह नहीं देख सकता है कि यह पवित्र आत्मा ही है जो कार्य कर रहा है, गुप्त रूप से कार्य कर रहा है, वह यह नहीं देख सकता कि यह सब पवित्र आत्मा द्वारा व्यवस्थित किया गया है, वह नहीं देख सकता कि यह परमेश्वर के वचन और सत्य का शासन करना है, वह नहीं देख सकता है कि पवित्र आत्मा के द्वारा प्रयोग किए गए व्यक्ति के द्वारा किया गया कार्य पवित्र आत्मा के द्वारा मार्गदर्शित और प्रेरित और पवित्र आत्मा के नियन्त्रण में है। वह इनमें से कुछ भी नहीं देख सकता है। क्या यह दृष्टिहीनता नहीं है? यह दृष्टिहीनता और परमेश्वर को जानने में असफलता है! यह बहुत ही कष्टप्रद है! कुछ लोग हैं जिन्होंने अनुभव किया है और वे कहते हैं, "कभी-कभी पवित्र आत्मा के द्वारा प्रयोग किया गया व्यक्ति जब क्रुद्ध हो गया, जब हम ने उसके शब्दों को सुना तो उसने हृदय को छेद दिया। ये शब्द पवित्र आत्मा के अधिकार से आए! यह कोई व्यक्ति नहीं था जो हम पर आगबबूला और क्रोधित हो रहा था-यह परमेश्वर था जो हम पर क्रोधित हो रहा था और यह समस्या थी। उस समय मैं बहुत भयभीत था।" ओह, उन्होंने परमेश्वर के कामकाज को देखा है, और यह सब पवित्र आत्मा के कार्यरत होने का एक हिस्सा है, यह परमेश्वर का आत्मा कार्यरत है। कुछ लोग ऐसे हैं जो देख नहीं सकते हैं, और यह आत्मा को समझना नहीं है। एकबार जब कोई आत्मा को नहीं समझता, तो क्या यह दृष्टिहीनता नहीं है? क्या यह नहीं है?

कई बार जब हम लोगों के परमेश्वर का विरोध करने की बात करते हैं, तो यह स्वर्ग में परमेश्वर का विरोध करने की ओर संकेत नहीं करता। स्वर्ग में परमेश्वर का विरोध करने का साहस कौन करेगा, क्या लोग स्वर्ग में परमेश्वर का विरोध कर सकते हैं? वे विरोध नहीं कर सकते हैं। जिसका लोग प्रायः विरोध करते हैं, वह देहधारी परमेश्वर, व्यावहारिक परमेश्वर है। यदि परमेश्वर देहधारी न होता, यदि वह मनुष्य का पुत्र न बनता, तो क्या लोग परमेश्वर की निन्दा करने का साहस करते? चाहे तुम महापुरोहितों और शास्त्रियों और फरीसियों को दस गुना साहस प्रदान कर दो, वे फिर भी साहस नहीं करेंगे। यदि तुम ने उनसे यहोवा परमेश्वर का विरोध करवाने का प्रयत्न किया, तो भी वे साहस नहीं करेंगे। बात सिर्फ इतनी है कि इंसान नहीं जानता कि परमेश्वर ने देहधारण किया था और वह मनुष्य का पुत्र बना था, और इसीलिए वह ढिठाई से विरोध करता है और अभी भी इसे परमेश्वर में अच्छा विश्वास मानता है। निश्चित रूप से परिणाम यह होता है कि वह परमेश्वर का एक शत्रु बन जाता है, और उसे परमेश्वर के द्वारा ताड़ना दी जाएगी। मुझे बताओ, यदि तुम सत्य की खोज नहीं करते, तो क्या परमेश्वर में विश्वास करना सही है? अब,लोग सब जानते हैं कि सत्य की खोज न करना अस्वीकार्य है। यदि तुम सत्य की खोज नहीं करते, तो तुम सब प्रकार की विकृत बातें कह सकते हो। तुम ने देखा वे लोग जो धर्म से आए वे कैसे सब प्रकार की विकृत बातें कह देते हैं, जिनका सत्य के साथ कोई लेना-देना नहीं है। सत्य की खोज न करना स्वीकार्य नहीं है! प्रभु यीशु ने सर्वदा क्यों कहा, "हे कपटी शास्त्रियो और फरीसियो, तुम पर हाय!" (देखें मत्ती 23:13-33)? उसने सर्वदा क्यों कहा, "देखो, फरीसियों और सदूकियों के खमीर से सावधान रहना।" (मत्ती 16:6)? लोगों के इस समूह ने परमेश्वर का विरोध किया, और प्रभु यीशु का यही अर्थ है। वह धर्म में समस्त अनुगामियों को सावधान करना चाहता था, और चाहता था कि वे फरीसियों, महापुरोहितों, और शास्त्रियों के विषय में पहचान रखें। प्रभु में विश्वास करने में सत्य की खोज करनी चाहिए और प्रभु के वचन को सुनना चाहिए, और की धोखाधड़ी, हेराफेरी, फन्दे में न फंसे, या लोगों के द्वारा नियन्त्रित न किया जाए, क्योंकि उस रीति से परमेश्वर का विरोध करना सरल है। क्या उसका अर्थ यही नहीं है? इस तरीके से बातचीत करके क्या मैं बहुत अधिक बोल रहा हूँ? फिर भी, मैं सोचता हूँ कि जो कुछ मैं कहता हूँ मुझे लोगों के साथ सम्पूर्णता से बात करनी चाहिए और उन्हें समझाना चाहिए। उद्देश्य यही है। यदि तुम बहुत ही शुद्ध रीति से बात करते हो, तो जब तुम बोलना समाप्त कर दोगे, तो लोग प्रत्युत्तर नहीं देंगे, और तुम अगला वाक्य बोलना जारी रखोगे; इससे पहले कि उस वाक्य पर कोई प्रतिक्रिया हो, तुम अन्य वाक्य कह देते हो। यदि लोग बहुत अधिक सुनते हैं, तो पचाना सरल नहीं होता और गला घुटने लगता है। तुम्हारे लिये यह देखना आवश्यक है कि लोग पचा सकें, और तभी हम आगे बोलना जारी रखेंगे। इस रीति से बोलना परिणाम ला सकता है।

कुछ लोग हैं जिन्होंने प्रभु यीशु के वचनों को पढ़ा है, और वे कहते हैं, "ओह, उसने ये कहा है।" "इसका क्या अर्थ है?" "मैं नहीं जानता।" "क्या प्रभु यीशु ने यह कहा था?" "हाँ।" "प्रभु का क्या अर्थ था,जब उसने यह कहा था?" "मैं नहीं जानता।" क्या यह भ्रम नहीं है? धर्म में कुछ लोग होते हैं, जिनकी इस प्रकार की गलत धारणा होती है: "प्रभु यीशु ने जो भी वचन कहे, तुम उसमें उनमें और कुछ नहीं जोड़ सकते! यदि तुम प्रभु यीशु के वचनों की व्याख्या करने का प्रयत्न करते हो या उनमें दिए गए ज्ञान की चर्चा करते हो, तो वह परमेश्वर के वचन में कुछ जोड़ने के समान ही है।" क्या ये शब्द सही हैं? वे सही नहीं हैं। उस रीति से बोलने के अनुसार, प्रभु यीशु द्वारा बोले गए वचन अन्य सम्प्रदायों और संस्थाओं की पुस्तकों के समान ही हैं। इसका तात्पर्य है कि वचन मात्र पठन के लिए है और इसकी व्याख्या नहीं करनी चाहिए। यदि तुम इसकी व्याख्या नहीं करते, तो लोग इसे कैसे समझेंगे? इन सब को सुनने के पश्चात, जो तुम जानते हो यदि तुम उसे दूसरों को नहीं बताते, तो लोग इसे कैसे समझेंगे? प्रभु का वचन लोगों को समझाने के लिए है और यह लोगों के खाली याद करने और कंठस्थ करने के लिए नहीं है। यह लोगों के लिए एक आवश्यकता है। लोग सत्य के साथ सुसज्जित होने चाहिए और परमेश्वर की मंशा समझनी चाहिए और प्रभु के वचन का पालन करना चाहिए। तब ये वचन लोगों से परिणाम प्राप्त कर सकते हैं। परमेश्वर के द्वारा बोले गए वचन लोगों के लिए खाली पठन करने के लिए नहीं हैं, यदि तुम उन्हें उसी तरह सुनाते रहो जैसे धर्मों में लोग सुनाते हैं, तो यदि तुम इन्हें सौ वर्षों तक भी सुनाते रहो, तो भी तुम्हें उनकी समझ प्राप्त नहीं होगी और तुम अभी भी उनका अभ्यास करने में योग्य नहीं बन पाओगे। तुम परमेश्वर के वचन का निर्वाह करने या परमेश्वर के वचन का पालन करने के योग्य नहीं होगे। क्या वह परमेश्वर में विश्वास है? क्या वह शास्त्रों को मात्र पठन करते रहना ही नहीं है? वह परमेश्वर में विश्वास करना नहीं है! सही-सही, कहें तो परमेश्वर में विश्वास का क्या अर्थ है? यह परमेश्वर के कार्य को अनुभव करना है। स्पष्ट रूप से कहें तो, परमेश्वर के कार्य का अनुभव करना क्या है? यह परमेश्वर द्वारा अभिव्यक्त समस्त वचनों का अभ्यास करना और अनुभव करना है। इसे परमेश्वर के कार्य को अनुभव करना कहा जाता है और परमेश्वर द्वारा अभिव्यक्त समस्त वचनों को अनुभव और अभ्यास करने के द्वारा एक व्यक्ति बाद में प्रगति करते-करते रीति से ज्ञान के गहरे स्तरों पर पहुँच जाएगा। अन्ततः, इंसान सत्य को समझ और परमेश्वर को जान जाएगा, और यह परमेश्वर के वचन को अनुभव करने का अंतिम परिणाम है। एक विशेष स्तर तक परमेश्वर के वचन का अनुभव कर के, जब हम सत्य की समझ और परमेश्वर का ज्ञान प्राप्त कर लेते हैं, तो हम वे लोग बन जाते हैं, जो परमेश्वर की इच्छा का पालन करते हैं, और जो जो परमेश्वर के मार्ग पर चलते हैं।

यदि तुम ने परमेश्वर के वचन का कभी भी बातचीत नहीं की या परमेश्वर के वचन को नहीं जाना, तो प्रभु यीशु कह सकता है, "मैंने तुम सब से कहा था, कपटी शास्त्रियों और फरीसियों पर मुसीबत आए! देखो, फरीसियों और सदूकियों के असर से सावधान रहना। क्या तुम सब ने यह किया?" यदि वह यह पूछता है, तुम प्रत्युत्तर दोगे, "हम ने नहीं किया, और हम नहीं जानते यह कैसे करना है। हम ने सोचा कि जब तुम ने यह कहा था, यह मात्र इसलिए था कि तुम चाहते थे हम मात्र इसे सुनाएं और इसे पढ़ें, और यह बस इतना ही था। हम ने इसका अभ्यास नहीं किया।" क्या इस प्रकार का व्यक्ति प्रभु की स्वीकृति प्राप्त कर सकता है? वह इसे प्राप्त नहीं कर सकता है। प्रभु का वचन लोगों के इसे पवित्र-शास्त्र के रूप में पारायण करने के लिए नहीं बना है, बल्कि इसे अनुभव करने और जानने के लिए सत्य के रूप में लेना है। जब तुम लोग अनुभव और ज्ञान को एक विशेष स्तर तक प्राप्त कर लेते हो, जब प्रभु पूछता है, क्या तुम फरीसियों को पहचान सकते हो, तो तुम कहोगे, "हमारे पास परख नहीं है, हम ने तुम्हारे वचनों को शास्त्रों के रूप में पारायण करने और कंठस्थ करने के लिए लिया है, हम उन्हें पहचान नहीं सकते हैं।" "ओह, तुम सब एक समूह हो, जो अपने विश्वास में भ्रमित है। अब फरीसियों के प्रति तुम्हारा का क्या दृष्टिकोण है?" "जो कुछ फरीसी कहेंगे हम वही करेंगे, जब तक वे बाइबल के बारे में बात करते हैं, हम पालन और अनुसरण करेंगे।" अन्ततः प्रभु यीशु तुम से कहेगा, "मैं तुम लोगों को नहीं जानता। मुझे छोड़ दो और चले जाओ! तुम्हारा सम्बन्ध फरीसियों से है, तुम लोग फरीसियों के वंशज हो, तुम सब फरीसियों के उपासक और अनुगामी हो। तुम सब का मेरे साथ कोई सम्बन्ध नहीं है, और तुम लोग मुझ पर विश्वास नहीं करते हो।" क्या इसका यह परिणाम नहीं होगा? प्रभु यीशु तुम से यह भी पूछेगा, "देखो, फरीसियों और सदूकियों के खमीर से सावधान रहना। क्या तुम सब यह समझते हो?" "हम समझते हैं, फरीसियों की शिक्षाएँ मुख्यतः खोखले शब्द, तर्क-वितर्क, और धर्म-शिक्षा के सिद्धान्त हैं, और इन सभी लोगों में सत्य और वास्तविकता की कमी है, और वे सब पाखण्डी हैं। हम अन्तर कर सकते हैं जो इन शब्दशः सिद्धान्तों और खोखले शब्दों का प्रचार करता है, वे सभी परमेश्वर का विरोध कर रहे हैं और उन्हें निकाल दिया जाएगा। हमारे यह अन्तर बताने के पश्चात, हम उन्हें त्याग देंगे और उनकी नहीं सुनेंगे, और हम उनसे दूर चले जाएँगे। हम स्वयं को उनसे अलग कर लेंगे और प्रभु का अनुगमन करेंगे।" जब परमेश्वर ये शब्द सुनेगा तो कहेगा, "समझदार लोग, मैं जो शब्द कहता हूँ उनपर उनका असर होगा। तुम लोग वास्तव में मेरे वचन को सुनते हो, और मैं तुम सब को स्वीकार करता हूँ।" यह परिणाम किस के समान है? क्या प्रभु यीशु ने यह अनुग्रह के युग में नहीं कहा था? "जो मुझ से, 'हे प्रभु! हे प्रभु!' कहता है, उनमें से हर एक स्वर्ग के राज्य में प्रवेश न करेगा, परन्तु वही जो मेरे स्वर्गीय पिता की इच्छा पर चलता है। उस दिन बहुत से लोग मुझ से कहेंगे, 'हे प्रभु, हे प्रभु, क्या हम ने तेरे नाम से भविष्यद्वाणी नहीं की, और तेरे नाम से दुष्‍टात्माओं को नहीं निकाला, और तेरे नाम से बहुत से आश्‍चर्यकर्म नहीं किए?' तब मैं उनसे खुलकर कह दूँगा, 'मैं ने तुम को कभी नहीं जाना। हे कुकर्म करनेवालो, मेरे पास से चले जाओ।'" (मत्ती 7:21-23)। इन लोगों ने प्रचार किया, दुष्टात्माओं को निकाला, प्रभु के नाम पर अनेक चमत्कार किए, निस्सन्देह वे प्रभु पर विश्वास करते हैं, और प्रभु के नाम पर ये सारी बातें कीं, तो प्रभु क्यों कहेगा कि उन्हें नहीं जानता, और यहाँ तक कहेगा कि वे कुकर्मी हैं? ऐसा क्यों है? जो कोई इस मामले को समझ सकता है, वह एक बुद्धिमान व्यक्ति है। उन्होंने अनेक बातें कीं, तो अभी भी प्रभु कैसे कह सकता है कि वह उन्हें नहीं जानता है? जब प्रभु ये वचन कहता और यह करता है, तो क्या यह ऐसा कुछ नहीं है, जिसकी लोग कल्पना भी नहीं कर सकते? क्या यह सम्भवतः अनेक धार्मिक लोगों को सन्देह में नहीं डालेगा, वे कहेंगे, "क्या तू अभी भी हमारा प्रभु है?" प्रभु यह कहने के द्वारा क्यों कहेगा कि वह उन्हें नहीं जानता, "हे कुकर्म करनेवालो, मेरे पास से चले जाओ।" ऐसा इसलिए है क्योंकि उन्होंने कभी भी प्रभु के वचन का अभ्यास या अनुभव नहीं किया, और उन्हें प्रभु का कुछ भी ज्ञान नहीं है। अतः प्रभु उन्हें स्वीकार नहीं करता, क्या ऐसा ही नहीं है? कुछ लोग हैं जो यह विचार करते हुए मनन करते हैं, "क्या ऐसा है? क्या ऐसा है?" वे मनन तो करते हैं पर इसे समझ नहीं सकते हैं। क्या वह मूर्खता नहीं है? सत्य के लिए प्रयास न करना और नहीं चलेगा! आज अन्तिम दिनों में जब धर्मिक लोग सर्वशक्तिमान परमेश्वर के कार्य का सामना करते हैं, वे इस पर कोई ध्यान नहीं देते, और कभी भी इसकी खोज या इसकी जाँच नहीं करते। यद्यपि ऐसे लोग हैं जो उन्हें इसके बारे में बताते और उन्हें इसकी गवाही देते हैं, फिर भी वे परमेश्वर के वचन का सावधानीपूर्वक अध्ययन नहीं करते, या यह देखने के लिए नहीं सुनते कि सर्वशक्तिमान परमेश्वर का वचन परमेश्वर का स्वर है। इसके विपरीत, वे यह कहकर बिना देखे परित्याग और निन्दा करते हैं, "हमारे पासबान, हमारे प्रवर कहते हैं कि 'ईस्टर्न लाइटनिंग' एक भ्रान्त शिक्षा, और एक मिथ्या मार्ग है। वे हमें छोड़कर चले जाने के लिए कहते हैं; यहाँ से निकल जाने के लिये कहते हैं; मैं तुम लोगों की नहीं सुनूँगा, और जो कुछ भी तुम लोग प्रचार कर रहे हो, मैं उसे नहीं सुनूँगा।" क्या इस प्रकार का व्यक्ति परमेश्वर की स्वीकृति प्राप्त करेगा? नहीं। क्यों? क्योंकि वे परमेश्वर वाणी को नहीं सुनते, और न ही वे इसे खोजते और इसकी जाँच करते। प्रभु यीशु ने क्या कहा था? "आधी रात को धूम मची देखो, दूल्हा आ रहा है! उससे भेंट करने के लिये चलो" (मत्ती 25:6)। अभी अन्धकार का समय है, जब बड़े लाल अजगर और शैतान ने ताकत प्राप्त की है और लोगों को परमेश्वर के आगमन के विषय में बात करने से मना किया गया है। क्या यह सबसे अन्धकारमय समय नहीं है? वह समय जब शैतान परमेश्वर का सबसे क्रोधावेश में विरोध करता है, वह समय अर्धरात्रि है और वहाँ लोग हैं जो धूम मचाते हैं, "दूल्हा आता है।" सर्वशक्तिमान परमेश्वर की कलीसिया के लोग गवाही देते हैं कि "सर्वशक्तिमान परमेश्वर आ गया है, प्रभु यीशु लौट आया है!" धर्मिक लोग इसे सुनते हैं फिर भी इस पर कोई ध्यान नहीं देते, देख सकते हैं परन्तु इसकी खोज या जाँच नहीं करते हैं। वे मात्र पासबानों और प्रवरों की सुनते हैं और विचार करते हैं, "हम कलीसिया में प्रभु यीशु पर विश्वास करते हैं, और प्रभु यीशु ही सच्चा परमेश्वर है, और प्रभु यीशु ने पहले हमारे पाप क्षमा कर दिए हैं। यदि हम सर्वशक्तिमान परमेश्वर पर विश्वास करते हैं, तो क्या यह प्रभु यीशु को धोखा देना नहीं है? यदि हम प्रभु यीशु को धोखा देते हैं, तो हमारे पाप हमारे पास लौट आएँगे, और हमें व्यर्थ में क्षमा किया जाएगा, अतः हमें 'प्रभु यीशु' के नाम को ही थामे रहना है, मात्र ये शब्द 'प्रभु यीशु।'" यहाँ क्या गलती की गई है? इसे व्यर्थ में मसीह के नाम को ग्रहण करना कहा जाता है, परन्तु वास्तव में यह मसीह के मूल का विरोध करना है। क्या ऐसा ही नहीं है?

133-A-4

आजकल, अनेक लोग हैं जो इस मामले को नहीं समझते हैं, वे इस प्रकार की बातें कहते हैं, "हम प्रभु यीशु पर विश्वास करते हैं। प्रभु यीशु ही सच्चा परमेश्वर है। क्या तुम इसे नकारने का साहस करते हो?" कोई भी प्रभु यीशु को नकारने का साहस नहीं करता, क्योंकि प्रभु यीशु देहधारी परमेश्वर है। परन्तु वह पहले ही स्वर्ग जा चुका है-कार्य का वह चरण पहले ही पूर्ण हो गया है। क्या यह सच नहीं है? अब, परमेश्वर पुनः देहधारी हुआ है, और नया कार्य कर रहा है। तुम यह स्वीकार क्यों नहीं करते हो? यदि तुम अन्त में परमेश्वर के न्याय के कार्य के इस चरण को स्वीकार नहीं करते, तो तुम शुद्ध नहीं बन सकते और स्वर्ग के राज्य में प्रवेश नहीं कर सकते; यदि तुम सर्वशक्तिमान परमेश्वर को नकारते हो, तब तुम प्रभु यीशु में विश्वास करने के अपने समस्त पिछले प्रयासों को व्यर्थ कर दोगे, और बीच राह में ही हार मान लोगे! ऐसा इसलिए क्योंकि प्रभु यीशु पुनः आया है और तुम उसे स्वीकार नहीं करते हो। पहली बार जब प्रभु यीशु देहधारित हो कर आया, तब उसे यीशु कहा गया था, और जब वह पुनः आया, तो उसका नाम परिवर्तित हो गया था। वह अन्तिम दिनों का कार्य करने के लिए पुनः आया, परन्तु तुम यह स्वीकार नहीं करते, तुम इसे कबूल नहीं करते, और प्रभु यीशु के आत्मा को पहचान नहीं पाते हो, क्या यह पिछले समस्त प्रयासों को त्याग देना और बीच राह में ही हार मान लेना नहीं है? यह बहुत कुछ ऐसा है जैसे तुम्हारे जन्म के पश्चात तुम्हारे पिता तुम्हें छोड़कर चले गए और बोले, "जब तुम बड़े हो जाओगे, मैं लौट आऊँगा।" तीस वर्ष पश्चात नए वस्त्र पहने हुए वह वापिस आते हैं, वैसी वेशभूषा में नहीं जैसी में वह पहले होते थे, और वह बात भी अलग तरह से कर रहे हैं। उनके लौट आने के पश्चात, जब तुम उनसे मिले तो तुम कहते हो, "मैं तुम्हें नहीं जानता।"

"पुत्र, मैं तुम्हारा पिता हूँ!" "आप मेरे पिता हैं? नहीं! जब मैं बच्चा था, तो मेरे पिता इस प्रकार के वस्त्र पहनते थे, और जो आप ने पहना हुआ है, वह भिन्न है। मैं आपको नहीं पहचानता! मुझ से दूर चले जाओ! आप मेरे पिता नहीं हैं, मैं अपने पहले वाले पिता को ही पहचानता हूँ।" यहाँ क्या गलती की जा रही है? वस्त्र बदलने के पश्चात वह बच्चा अपने पिता को नहीं पहचान रहा है, यह समस्या है। जब कार्य करने के लिये परमेश्वर पुनः आता है, तो वह दूसरी देह ले लेता है, जिसका आत्मा अभी भी प्रभु यीशु के आत्मा जैसा ही है, परन्तु जो लोग प्रभु यीशु पर विश्वास करते हैं, उसे नहीं जानते हैं। परन्तु जब यह देह आता है, तो वह बेहद शक्तिशाली है, और जो वह करता है, वह न्याय का कार्य है, युग के समापन का कार्य, लोगों के अन्त के निर्धारण का कार्य। वह क्या है, जिसे "युग का समापन" कहा जाता है? वे सभी जिन्हें स्वर्ग के राज्य में प्रवेश करना है, उन्हें स्वर्ग के राज्य की ओर ले जाया जा रहा है, और वे सभी जिन्हें हटाया जाना है विनष्ट किए जा रहे हैं। इसे समापन का युग कहा जाता है। तुम ने उस कार्य को स्वीकार किया जो प्रभु यीशु ने पापों का प्रायश्चित करने के लिए स्वयं को बलिदान करने में किया, और तुम्हें समस्त पापों से मुक्त कर दिया गया है, परन्तु यदि तुम प्रभु के अन्तिम दिनों के न्याय के कार्य को करने के लिए पुनः आने को स्वीकार नहीं करते, तब क्या उस पापबली का अभी भी तुम पर कोई प्रभाव होगा? इसका कोई प्रभाव नहीं होगा। हम किस आधार पर कह सकते हैं कि इसका कोई प्रभाव नहीं होगा? क्या बाइबल में इसके विषय में वचन नहीं हैं? यह क्या कहता है? "क्योंकि सच्‍चाई की पहिचान प्राप्‍त करने के बाद यदि हम जान बूझकर पाप करते रहें, तो पापों के लिये फिर कोई बलिदान बाकी नहीं।"(इब्रानियों 10:26)। ये वचन पवित्र आत्मा से आते हैं। जब तुम स्पष्ट रीति से जानते हो कि सर्वशक्तिमान परमेश्वर का अन्तिम दिनों का कार्य ही वह वास्तविक मार्ग है, और तुम मात्र इस नाम के कारण यह स्वीकार नहीं करते, तब अन्तिम दिनों के इस कार्य का तुम्हारा कोई हिस्सा नहीं है। यदि तुम राज्य के युग में परमेश्वर के अपने लोगों को विजेता होने के लिए पूर्ण बनाने के कार्य को स्वीकार नहीं करते, तो तुम स्वर्ग के राज्य में प्रवेश करने के योग्य नहीं हो, और तुम्हारी योग्यताएँ रद्द कर दी जाएँगी। अतः, यदि लोग अन्तिम दिनों के कार्य के इस चरण को स्वीकार करते हैं, तब वे राज्य में प्रवेश करने के योग्य होंगे, और वे परमेश्वर के कार्य के पिछले दो चरणों को स्वीकार करने के योग्य नहीं हैं। सीधे इस चरण को स्वीकार करके वे राज्य में प्रवेश करेंगे। यदि तुम ने परमेश्वर के कार्य के पिछले दो चरणों को स्वीकार किया है, परन्तु कार्य के मात्र अन्तिम चरण को स्वीकार नहीं करते, तो तुम्हारे लिए सब समाप्त हो गया और तुम परमेश्वर में विश्वास के अपने पिछले समस्त प्रयासों को व्यर्थ कर रहे हो, बीच राह में ही हार मान रहे हो! अतः हम देखते है कि अब धर्म में अधिकतर लोग इसे स्वीकार नहीं करते हैं, परमेश्वर ऐसे अविश्वासियों की ओर मुड़ता है, और अनेक अविश्वासी लोग हैं, जिन्होंने कभी परमेश्वर पर विश्वास नहीं किया, जो सर्वशक्तिमान परमेश्वर को स्वीकार करते हैं। इन लोगों के परमेश्वर के घराने में प्रवेश करने के पश्चात, वे सत्य से प्रेम करते हैं, और वे पवित्र आत्मा के कार्य को प्राप्त करते हैं। ये लोग धर्म के उन लोगों, जो सत्य के मार्ग को जानते हैं, परन्तु इसे स्वीकार नहीं करते, की आशिषें ले लेते हैं। वे लोग इसे इसलिए स्वीकार नहीं करते क्योंकि परमेश्वर का नाम प्रभु यीशु नहीं है-और परिणाम यह होता है कि उनके स्थान और ओहदे पर कब्ज़ा कर लिया जाता है। यह परमेश्वर का धार्मिक न्याय है। अनुग्रह के युग में, इस्राएलियों ने प्रभु यीशु को स्वीकार नहीं किया। ठीक है, इसलिए प्रभु यीशु ने अपना छुटकारा देने वाला सुसमाचार लिया और इसे गैरयहूदियों में और प्रत्येक राष्ट्र और प्रत्येक देश में फैला दिया; अन्तिम दिनों में प्रत्येक राष्ट्र और प्रत्येक देश के सर्वशक्तिमान परमेश्वर को स्वीकार नहीं करते हैं। ठीक है, इसलिए परमेश्वर सुसमाचार को अविश्वासियों के पास ले जाता है, और अविश्वासी इसे स्वीकार कर लेते हैं। यह वास्तव में कुछ ऐसा ही है, "जिन्हें यह प्राप्त होना है, उन्हें कार्य करने की आवश्यकता नहीं, और दुर्भाग्य से जिन्हें यह नहीं मिलना है, वे व्यर्थ में ही परिश्रम करते रहते हैं, या "कुछ लोगों को कुछ पाने के कड़ी मेहनत करनी पड़ती है, परन्तु कुछ को सबकुछ बिना हाथ हिलाए ही मिल जाता है।" क्या ऐसा ही नहीं है? "इसी रीति से जो पिछले हैं, वे पहले होंगे; और जो पहले हैं, वे पिछले होंगे: क्योंकि बुलाए हुए तो बहुत हैं, परन्तु चुने हुए थोड़े हैं।" (मत्ती 20:16)। ये वचन पूर्ण होंगे। अतः, जो कोई कार्य के इस चरण को अन्त में स्वीकार करता है, खुशकिस्मत होगा, और जो कोई इसे स्वीकार नहीं करता, वह अपने दुर्भाग्य को जान जाएगा। जब वह समय आता है, तब तुम्हारा समस्त पिनपिनाना अनुपयोगी हो जाएगा। कुछ लोग हैं जो कहते हैं, "हम विश्वास नहीं करते कि यदि हम सर्वशक्तिमान परमेश्वर को स्वीकार नहीं करते, तो परमेश्वर हमें विनष्ट करने के लिए आ सकता है। मैं इस पर विश्वास नहीं करता!" इन शब्दों को कहने का क्या अर्थ है? मुझे बताओ, क्या ये शब्द बुद्धिमत्ता से बोले गए हैं? यदि तुम विश्वास नहीं करते, तो क्या तुम परमेश्वर हो? क्या तुम वह सत्य हो? क्या तुम इन बातों का निर्णय करते हो? तुम परमेश्वर नहीं हो और यदि तुम विश्वास नहीं करते हो तो व्यर्थ है। परमेश्वर पर विश्वास करना परमेश्वर के वचन के आधार पर होना अनिवार्य है! देखो तो ये शब्द किसने कहे थे-यदि वे किसी व्यक्ति के द्वारा बोले गए थे, तो तुम उन पर अविश्वास कर सकते थे। यदि वे परमेश्वर के द्वारा बोले गए हैं तो जो भी वचन हों, तुम्हें उन पर विश्वास करना ही है। परमेश्वर के द्वारा बोला गया प्रत्येक वाक्य पूर्ण होगा! प्रभु यीशु ने कहा, "आकाश और पृथ्वी टल जाएँगे, परन्तु मेरी बातें कभी न टलेंगी।" (मत्ती 24:35)। मत कहो, "मैं विश्वास नहीं करता।" इस चुनौती को मत बोलो। यह परमेश्वर के द्वारा बोला गया है, और जो भी सर्वशक्तिमान को स्वीकार नहीं करते, नष्ट कर दिए जाएँगे। यह परमेश्वर का वचन है। यदि तुम उस पर विश्वास नहीं करते जो एक व्यक्ति के द्वारा बोला गया है, तो ठीक है, और यह तुम ही हो जो एक मनुष्य के शब्द पर विश्वास या स्वीकार नहीं कर रहे हो। यदि यह परमेश्वर है, जिसने यह कहा है, और तुम कहते हो, "मैं इस पर विश्वास नहीं करता, मैं इस पर विश्वास नहीं करता, चाहे यह परमेश्वर का वचन है, यदि यह वास्तव में सर्वशक्तिमान परमेश्वर के द्वारा बोला गया होता, मैं फिर भी इस पर विश्वास नहीं करता," तो यहाँ क्या गलती की जा रही है? क्या यह खुली आँखों से परमेश्वर के वचन को नकारना नहीं है? क्या यह खुली आँखों से परमेश्वर पर विश्वास न करना नहीं है? इसे परमेश्वर के वचनों में अविश्वास कहा जाता है। धर्म में, अनेक लोग हैं, जो परमेश्वर पर विश्वास करते हैं, परन्तु यह कहकर परमेश्वर के वचन पर विश्वास नहीं करते, "मैं प्रभु यीशु पर विश्वास करता हूँ, परन्तु मेरा विशेषतः प्रभु यीशु के वचनों में विश्वास नहीं है, और मैं नहीं जानता कि जो कुछ उसने कहा वह पूर्ण होगा।" वे वास्तव में प्रभु यीशु पर विश्वास करते हैं, तो यह विश्वास क्यों है? "ये शब्द 'वह प्रभु यीशु' यह नाम, एक बार जब तुम इस से प्रार्थना करते हो, तो यह वास्तव में अत्यधिक प्रभावशाली होता है। यह निश्चयतः ऐसा ही है, कि अनेक बातें हैं, जो पूर्ण हो चुकी हैं और अनेक प्रार्थनाएँ हैं, जिनका उत्तर दिया जा चुका है। अनेक बार लोग इस नाम से प्रार्थना करते हैं और परमेश्वर आशिषें देता और अनुग्रह प्रदान करता है। यह नाम अच्छा है, यह नाम सच्चा है, और यह नाम बहुत उपयोगी है!" वे मात्र परमेश्वर के नाम में विश्वास करते हैं, परन्तु जब बात आती है कि क्या यीशु के कहे गए शब्द फलदायी होंगे या बाद में एक तथ्य बनेंगे, तो वे बस इतना कहते हैं, "मैं नहीं जानता, यह अनिश्चित है, इसे देखा नहीं जा सकता है।" वे प्रभु यीशु के वचनों पर ध्यान नहीं देते और उन्हें गम्भीरता से नहीं लेते हैं। उन्होंने परमेश्वर के वचन को गम्भीरता से नहीं लिया है-क्या यह सबसे बड़ी मूर्खता नहीं है? परमेश्वर में विश्वास की लोगों की सबसे बड़ी मूर्खता यह है कि वे मात्र परमेश्वर के नाम में विश्वास करते हैं, परन्तु परमेश्वर के वचन पर नहीं। यह तो परमेश्वर के वचन को चुनौती देने और इस बात पर विश्वास न करने के बिन्दु तक पहुँच जाता है, कि यह पूरा होगा। तुम सब क्या सोचते हो कि ये लोग किस प्रकार के हैं? वे अविश्वासी हैं। क्या यह परमेश्वर के वचन में आधार रखता है? क्या परमेश्वर के वचन में इस प्रकार की बातें हैं? कुछ लोगों ने कहा कि इसमें हैं! देखो, कुछ लोग हैं, जो परमेश्वर के सम्पूर्ण वचन को पढ़ चुके हैं, और जिन्होंने इन वचनों को अपने हृदय पर उकेर लिया है, और परमेश्वर के वचन में इन लोगों को अविश्वासी कहा गया है। क्या यह जिस किसी भी निष्कर्ष पर आना और जिसकी जो इच्छा हो, वो दोष लगा देना है? इसका आधार परमेश्वर के वचन में है, और यह लोगों के विचारों के आधार पर बिना सोचे-समझे निष्कर्ष निकालना नहीं है। जैसे हम कहते हैं फरीसियों को हाय लगे-इसका क्या आधार है? यह प्रभु यीशु द्वारा कहे गए वचनों के आधार पर है कि फरीसियों ने वास्तव में विपत्ति का सामना किया। कुछ लोग हैं जो कहते हैं, "मैंने फरीसियों को विपत्ति भोगते हुए कैसे नहीं देखा?" तुम उस समय नहीं थे और तुम ने इसे आत्मिक क्षेत्र से नहीं देखा है। तुम ने नहीं देखा है कि अभी फरीसियों की आत्माएँ कहाँ हैं। तुम कहते हो, "जब तक मैं फरीसियों की आत्माओं को नरक में न देख लूँ, मैं परमेश्वर के वचनों पर विश्वास नहीं करूँगा।" यह समस्या है। यदि तुम ऐसा कुछ कहते हो, तो तुम अविश्वासी से भी बढ़कर हो। यदि इस पर विश्वास करने के लिए तुम्हें इसे देखना अनिवार्य है, और तुम तब तक विश्वास नहीं करोगे जब तक तुम इसे देख न लो, तो परमेश्वर पर विश्वास करने के लिए तुम अपनी आँखों पर निर्भर होते हो, और परमेश्वर में विश्वास करने के लिए तुम अपने हृदय पर निर्भर नहीं हो रहे हो। तुम परमेश्वर के वचन के आधार पर परमेश्वर पर विश्वास नहीं करते हो, इसलिए तुम विश्वासी नहीं हो।

अनेक लोग हैं जो कहते हैं, "कितने समय पहले प्रभु यीशु के द्वारा वचन बोले गए थे? दो हज़ार वर्ष पश्चात भी वे अभी पूर्ण नहीं हुए हैं, और यह मुझे विश्वास कैसे हो?" यह किस प्रकार की वार्ता है? इन दो हज़ार वर्षों में परमेश्वर का कितना वचन पूर्ण हो चुका है? अनेक बातें हैं जो पूर्ण नहीं हुई हैं, परन्तु उसका अर्थ है कि उनका समय अभी नहीं आया है। अनेक वचन जो पूर्ण हो चुके हैं वे इसलिए पूर्ण हो चुके हैं क्योंकि उनका समय आ गया था। ऐसा नहीं है कि सबकुछ एक दिन में ही पूर्ण हो जाएगा, या जब वह समय आएगा, सबकुछ उसी क्षण में पूर्ण हो जाएगा। चीज़ें भिन्न-भिन्न समय में निरन्तर पूर्ण हो रही हैं, वे धीरे-धीरे पूर्ण हो रही हैं। अन्त में सबकुछ पूर्ण होना है, क्या यह सही नहीं है? सामान्यतः, बाइबल में समस्त भविष्यवाणियां पूर्ण हो चुकी हैं। चार रक्त चन्द्रमा पूर्ण हो गए, दमिश्क का खण्डहर बनना पूर्ण हो गया, इस्राएल का लौटना पूर्ण हो गया। चिन्ता मत करो, हर-मगिदोन के युद्ध का समय करीब है, समय अभी नहीं आया है, परन्तु जब समय आएगा सबकुछ पूर्ण हो जाएगा। अनेक उत्पीड़ित आत्माएँ हैं, क्या परमेश्वर तुम्हें दिखा सकता है, वे कहाँ हैं? तुम्हें वह देखने देना विश्वास नहीं कहलाएगा, ठीक है? यदि तुम्हें अपनी आँखों पर ही भरोसा है, और तुम तभी स्वीकार करोगे, यदि तुम कुछ देखते हो, और नहीं देखते तो तुम स्वीकार नहीं करोगे-क्या ये लोग मूर्ख नहीं हैं? परमेश्वर की उपस्थिति में मनुष्य क्या है? वह महत्वहीन है, अत्यधिक महत्वहीन! तुम्हारी आँखें कितनी दूर देख सकती हैं? क्या वे पाँच मील तक देख सकती हैं? लोगों की आँखें तो गरुड़ों जितनी भी अच्छी नहीं हैं, अतः तुम क्या देख सकते हो? यदि कोई व्यक्ति पाँच मील दूर कुछ कर रहा हो, तो तुम देख नहीं सकते वह क्या कर रहा है, और यदि तुम साफ़-साफ़ देखना चाहते हो तो तुम्हें दूरबीन का प्रयोग करना होगा, सही है? अतः, लोग जो देख सकते हैं, वह भौतिक संसार का मात्र एक छोटा-सा हिस्सा है, और मूलभूत रूप से वे आत्मिक संसार के के द्रव्य नहीं देख सकते हैं। यदि वे उन्हें नहीं देख सकते हैं, तो परमेश्वर पर विश्वास क्यों करना? क्या तुम ने उसे देखने के पश्चात ही विश्वास किया? तुम ने अपनी आत्मा के आधार पर पुष्टि की कि वह सच्चा परमेश्वर है, और तब विश्वास किया, सही है? यदि उसे देखने के लिए तुम अपनी आँखों पर निर्भर हुए होते, तो कोई भी तरीका नहीं था जिससे तुम ने विश्वास किया होता। क्या तुम देख सकते हो प्रभु यीशु कैसा दिखाई देता है? यदि तुम देख भी सकते, तो आवश्यक नहीं है कि तुम विश्वास करते। इस्राएल के समस्त लोगों ने उसे देखा था, तो उन्होंने कैसे विश्वास नहीं किया? लोग अपनी आत्मा के आधार पर, प्रार्थना के द्वारा पुष्टि करके, पवित्र आत्मा के कार्य से, और बाइबल में अभिलिखित प्रभु यीशु के कार्यों पर भरोसा करके विश्वास करते हैं। यदि मात्र उसके कामकाज का ही अभिलेख होता और लोगों में आत्मा न होती, क्या वे इसकी पुष्टि कर सकते थे? वे इसकी पुष्टि कैसे करते? प्रत्येक प्रकार की पुस्तक में अनेक बातें अभिलिखित हैं, तो तुम किसी अन्य में विश्वास क्यों नहीं करते? अनेक लोग ऐसे भी हैं, जो एक मिथ्या ईश्वर पर विश्वास करते हैं। अतः आज हम परमेश्वर पर विश्वास करते हैं और अपनी आँखों पर निर्भर नहीं होते हैं, जो उसे नहीं देख सकती हैं, हम कहते हैं, "ओह, परमेश्वर का जितना वचन मुझे पूर्ण हो चुका दिखाई देता है, मैं मात्र उतने को ही परमेश्वर का वचन मानूंगा, जो मैंने परमेश्वर के वचन के रूप में पूर्ण होते नहीं देखा, मैं उन हिस्सों को अस्वीकार कर दूँगा और उन्हें परमेश्वर का वचन नहीं मानूँगा।" क्या यह दृष्टिकोण सही है? यह सही नहीं है। यह परमेश्वर में मात्र विश्वास की स्वीकृति है, और क्या विश्वास की इस प्रकार की स्वीकृति को सच्चा विश्वास माना जा सकता है? परमेश्वर उस प्रकार के विश्वास की प्रशंसा नहीं करता है। ऐसा कहने का कोई अर्थ नहीं है, "परमेश्वर है, वास्तव में परमेश्वर है।" परमेश्वर को नाममात्र ही स्वीकार करना-परमेश्वर इस प्रकार के विश्वास को स्वीकार नहीं करता है। जब लोग परमेश्वर पर विश्वास करते हैं, तो किस प्रकार का विश्वास परमेश्वर से प्रशंसा प्राप्त करता है? परमेश्वर की सर्वशक्तिमत्ता, धार्मिकता और इस बात पर विश्वास करना कि परमेश्वर का वचन ही सत्य है, और विश्वास करना कि परमेश्वर का वचन सब बातों को पूर्ण करता है, और यह कि परमेश्वर के वचन का प्रत्येक वाक्य पूर्ण होगा। यदि किसी का इस प्रकार का विश्वास है, तो यह विश्वास का सबसे मूलभूत और आधारभूत रूप है। लोग अनेक प्रश्न उठाते हैं, "ऐसी भविष्यवाणियां कैसे हैं, जो अभी तक पूर्ण नहीं हुई हैं? क्या तुम विश्वास दिला सकते हो कि वे सभी पूर्ण होंगी?" इस प्रकार के विश्वास के बिना, कोई कह सकता है, "मैं इसका विश्वास दिलाने का साहस नहीं करता," परन्तु यदि किसी का इस प्रकार का विश्वास है, तो वह कहता है, "निस्सन्देह, वे पूर्ण होंगी! बिल्कुल पूर्ण होंगी! परमेश्वर के वचन में प्रत्येक वाक्य पूर्ण होगा, बस प्रतीक्षा करो और देखते रहो।" यदि किसी व्यक्ति का इस प्रकार का विश्वास है, तो वह इस प्रकार से बोलने का साहस कर सकता है। जब उसकी मृत्यु का दिन आता है, तो तुम कहना, "बाइबल में अभी भी कुछ भविष्यवाणियां हैं जो पूर्ण नहीं हुई हैं, क्या तुम विश्वास करते हो कि परमेश्वर का सम्पूर्ण वचन पूर्ण होगा?" "निस्सन्देह, यह पूर्ण होगा।" मृत्यु के समय वह कहेगा, "यद्यपि मैं देख नहीं सकता, परमेश्वर का वचन अवश्य ही पूर्ण होगा।" क्या इस प्रकार के व्यक्ति के पास विश्वास है? यद्यपि जब वह मरता है और इसे अपनी आँखों से देख नहीं सकता, वह अभी भी स्वीकार करता है कि परमेश्वर का समस्त वचन पूर्ण होगा, निश्चयतः पूर्ण होगा, वह इसके विषय में रत्ती भर भी सन्देह नहीं रखता। यदि किसी व्यक्ति का विश्वास इस स्तर तक पहुँच जाता है, तब उसे मानदण्ड पर खरा माना जाता है।

देखो अनेक लोग हैं जो सर्वशक्तिमान को स्वीकार करते हैं, परन्तु वास्तविकता में वे यह कहकर स्वीकार नहीं करते कि सर्वशक्तिमान परमेश्वर का सम्पूर्ण वचन सत्य है, "इसका एक हिस्सा सत्य है, परन्तु इसका एक हिस्सा हो सकता है सत्य न हो।" या अनेक लोग ऐसे हैं जो कहते हैं, "यह मात्र एक मनुष्य का वचन है! तुम सब किस आधार पर विश्वास करते हो कि यह परमेश्वर का वचन है? तुम सब मूर्ख हो!" मान लो, यदि कोई व्यक्ति परमेश्वर में तो विश्वास करता है, परन्तु परमेश्वर के वचन पर विश्वास नहीं करता या सत्य को स्वीकार नहीं करता, तो क्या यह एक अविश्वासी होना नहीं है? लोगों ने गणना की है कि समस्त धार्मिक समुदाय में पादरियों में से 40 प्रतिशत पादरी ऐसे हैं जो स्वीकार नहीं करते कि प्रभु यीशु का गर्भधारण पवित्र आत्मा के द्वारा किया गया था। यहाँ क्या समस्या है? यह विश्वास न करना कि प्रभु यीशु द्वारा दर्शाए गए चमत्कार वास्तविक हैं, उन्होंने इन मामलों पर प्रश्न चिह्न लगाया है, और क्यों? "मैंने उन्हें नहीं देखा, और वे विज्ञान के ज्ञान के साथ मेल नहीं खाते। इसके कारण यह सम्भव नहीं है।" परन्तु वे फिर भी एक पादरी हैं, एक पादरी और वे प्रभु यीशु के वचन या प्रभु यीशु द्वारा किए गए चमत्कारों पर विश्वास तक नहीं करते हैं, यहाँ तक कि वे प्रभु यीशु के पवित्र आत्मा के द्वारा गर्भधारण के विषय में कहते है "यह कभी नहीं हुआ, यह विज्ञान के अनुसार नहीं है। मैं उस पर विश्वास करता हूँ जो विज्ञान से मेल खाता है, और जो कुछ विज्ञान के साथ मेल नहीं खाता है, मैं उस पर विश्वास नहीं करता हूँ।" "जब तुम विश्वास ही नहीं करते तो तुम पादरी क्यों हो?" "मात्र एक नौकरी प्राप्त करने के लिए-मैं किसी अन्य विद्यालय में नहीं जा सका, मुझे प्रवेश-परीक्षा देनी ही थी, और मैंने धर्म-शिक्षा की दे दी। अतः, अपनी आजीविका के लिए मुझे इस पर निर्भर होना ही है।" क्या ऐसे पादरी नहीं हैं? ऐसे अनेक नहीं हैं? ऐसे अनेक हैं। अतः, इस प्रकार का पादरी मात्र एक पाखण्डी ही नहीं है, वह मूलत: एक अविश्वासी है! एक धर्मविरोधी है! वह तो बस चुपके से घुस आया है ताकि वह अपनी आजीविका कमा सके। वह तो बस अपना भोजन पाने के लिए इस पद का प्रयोग करता है, और वह वास्तव में सेवा करने के लिए नहीं आया था। परमेश्वर की सच्ची सेवा परमेश्वर के वचन का संचारण करना, परमेश्वर के वचन की व्याख्या करना, और परमेश्वर के लिए गवाही देना, और लोगों को परमेश्वर का अधिक से अधिक ज्ञान प्राप्त करवाना है। यह परमेश्वर के वचन के अनुभव से उपजे ज्ञान का संचारण करना, और अन्त में लोगों को परमेश्वर की उपस्थिति में लाना, लोगों को परमेश्वर के वचन के सत्य की वास्तविकता में लाना, प्रत्येक को परमेश्वर को जानने के योग्य बनाना है, और मात्र इसे ही परमेश्वर की सेवा करना कहा जा सकता है! मात्र यही वह कार्य है जो एक पादरी को करना चाहिए! वह पवित्र आत्मा द्वारा गर्भधारण पर विश्वास नहीं करता, परन्तु यह कहते हुए विज्ञान में विश्वास करता है, "जो कुछ बाइबल में अभिलिखित है यदि वह वैज्ञानिक सिद्धान्तों के साथ सहमत होता है, तो यह सत्य है और जो कुछ विज्ञान के नियमों को तोड़ता है, वह मिथ्या है।" क्या इस प्रकार के लोग नहीं हैं? इस प्रकार के लोग हैं। क्या, अन्ततः, विज्ञान सत्य है? "विज्ञान वह सत्य नहीं है, विज्ञान के समस्त निष्कर्ष भ्रांतियाँ हैं, और वे सत्य नहीं हैं"-क्या तुम सब इस कथन में विश्वास करने के योग्य हो? जो विश्वास करते हैं, वे अपना हाथ उठाएं। कुछ लोग अपने हाथ बहुत ही अनिच्छापूर्वक उठाते हैं, और यदि आप इच्छुक नहीं हैं, तो उन्हें मत उठाइए। हो सकता है अन्य लोग यह कहकर मेरा खण्डन करें, "जो तुम कह रहे हो सही नहीं है। क्या तुम यह कहने का साहस करते हो कि सम्पूर्ण विज्ञान एक भ्रान्ति है? विज्ञान ने वायुयान, कार और रॉकेट बनाया। क्या तुम कह सकते हो कि यह एक भ्रान्ति है?" विज्ञान ने अनेक चीज़ें बनाई, परन्तु इन चीज़ों में कुछ भी भला नहीं है, क्योंकि वे परमेश्वर से नहीं आती हैं। अतः सबकुछ जो विज्ञान ने बनाया है वह लोगों को विनाश की ओर ले जाता है और अन्त में बर्बाद कर देता है। जब विज्ञान विकास के अपने शीर्षबिन्दु पर पहुँच जाएगा, तो वह मनुष्य के लिए अन्त समय होगा। क्या विज्ञान सत्य है? इसने जिन बन्दूकों का निर्माण किया, वे लोगों को मारने में सक्षम हैं, परन्तु वह सत्य नहीं है; जिन चीज़ों का यह निर्माण करता है, वे मानवता को ही तबाह कर सकती हैं, परन्तु यह सत्य नहीं है; सब चीज़ों में सब से आधुनिक चीज़, संचार के यन्त्र, जो इसने बनाए हैं, वे मानवता को गम्भीर पर्यावरिक विनाश की ओर ले गए हैं। क्या यह सत्य है? विज्ञान के द्वारा उत्पादित चीज़ें मनुष्य के द्वारा बनाई गईं हैं; वे परमेश्वर के द्वारा नहीं बनाई गईं हैं। मात्र परमेश्वर के द्वारा बनाई गई चीज़ें ही सत्य और वास्तविकता हैं! परमेश्वर के द्वारा बनाई गई असंख्य चीज़ें मानवता के लिए हानिकर नहीं हैं, क्या ऐसा ही नहीं है? जिस दिन परमेश्वर का राज्य आने वाला होगा, परमेश्वर लोगों को कुछ चीज़ें बनाने के निर्देश देगा, और वे चीज़ें जो मनुष्य बनाएगा, वे मानवता के लिए ज़रा भी हानिकर नहीं होंगी। संचार के वे उपकरण मनुष्य के लिए पूर्णतया लाभकारी होंगे। ठीक है? अब, जो चीज़ें शैतान बनाता है, वे अस्वीकार्य हैं। कार को देखो-जो धुआं यह छोड़ती है, वह अत्यधिक हानिकारक है! जो धुआं वायुयानों से निकलता है, वह बहुत हानिकारक है! रॉकेटों का धुआं बहुत हानिकारक है! यह मनुष्यों के प्राकृतिक वातावरण के लिए बहुत गम्भीर नुकसान ले कर आया है! विभिन्न प्रकार के परमाणु उर्जा संयंत्र मानवता के लिए बहुत अधिक खतरा ले कर आए हैं, और जब युद्ध हो जाता है या जब एक परमाणु उर्जा संयंत्र फट जाता है, तो सबकुछ समाप्त हो गया, मानवता का अन्त हो गया है। अतः, विज्ञान विकास के अपने शीर्ष बिन्दु पर पहुँचकर, मानवता के लिए क्या लाया? यह तबाही है, यह विनाश है। क्या यह सत्य नहीं है? यह परमेश्वर से नहीं आता है, और इसका कुछ भी सत्य नहीं है। सत्य परमेश्वर से आता है, समझे! मेरी बात से जो कोई भी सहमत है, अपना हाथ उठाए। इस बार प्रत्येक व्यक्ति ने, बिना हिचकिचाए जोश के साथ अपना हाथ उठाया। इस तरह बातचीत करना काफी उपयोगी रहा है। इस तरह बातचीत न करना मंज़ूर है? नहीं, यह मंज़ूर नहीं है, क्योंकि मैं वचन के बारे में जितना अधिक बताऊंगा, लोग आत्मिक रूप से उतने ही अधिक प्रकाशमान होंगे।

पिछला:परमेश्वर के वचन के बारे में धर्मोपदेश और सहभागिता "तुम्हें मसीह की अनुकूलता में होने के तरीके की खोज करनी चाहिए"

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