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परमेश्वर के सारे कार्य इंसानों के लिए हैं

I

तुम्हारी नियति या मंज़िल का इस्तेमाल कर,

तुम पर काबू पाने के लिए नहीं है परमेश्वर का विजय कार्य।

इस तरह काम करने की ज़रूरत नहीं वास्तव में।

विजय कार्य का मकसद है, इन्सान से एक सृष्टि होने का

कर्तव्य पूरा करवाना, सृष्टिकर्ता की आराधना करवाना,

और इसके बाद वो अद्भुत मंज़िल में प्रवेश कर सकेगा।

II

इन्सान की नियति परमेश्वर के हाथों में है।

कर लो चाहे कितनी भी दौड़-धूप, नहीं कर सकते तुम अपना संचालन।

अगर जानते तुम अपना भविष्य, अपनी नियति पर काबू पा लेते,

तो क्या फिर भी तुम परमेश्वर की रचना होते?

III

परमेश्वर जैसे भी काम करे, सब है इन्सान के लिए।

सारी सृष्टि, आकाश और ज़मीं, सभी इन्सान की सेवा करते हैं।

मौसम, सूरज, चंदा और सितारे,

जीव-जन्तु और पेड़-पौधे सारे

सब हैं इन्सान के जीवन के लिए, सब हैं इन्सान के लिए।

कैसे भी ताड़ना दे परमेश्वर इन्सान को, यह है उसके उद्धार के लिए।

गर परमेश्वर करे उसे वंचित देह की आशाओं से,

यह है शुद्धिकरण के लिए।

यह शुद्धिकरण है इन्सान के अस्तित्व के लिए।

परमेश्वर का सारा न्याय है इन्सान के लिए।

तो इन्सान कैसे स्वयं का संचालन कर सकता है

गर उसकी नियति सृष्टिकर्ता के हाथों में है?

तो इन्सान कैसे स्वयं का संचालन कर सकता है

गर उसकी नियति सृष्टिकर्ता के हाथों में है?

"वचन देह में प्रकट होता है" से

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