49. अंतहीन वेदना

सर्वशक्तिमान परमेश्वर कहते हैं, "शैतान द्वारा भ्रष्ट की गई सभी आत्माएँ, शैतान के अधिकार क्षेत्र के नियंत्रण में हैं। केवल वे लोग जो मसीह में विश्वास करते हैं, शैतान के शिविर से बचा कर, अलग कर दिए गए हैं, और आज के राज्य में लाए गए हैं। अब ये लोग शैतान के प्रभाव में और नहीं रहते हैं। फिर भी, मनुष्य की प्रकृति अभी भी मनुष्य के शरीर में जड़ जमाए हुए है। कहने का अर्थ है कि भले ही तुम लोगों की आत्माएँ बचा ली गई हैं, किंतु तुम लोगों की प्रकृति अभी भी पहले जैसी ही दिखायी देती है और इस बात की संभावना अभी भी सौ प्रतिशत रहती है कि तुम लोग मेरे साथ विश्वासघात करोगे। यही कारण है कि मेरा कार्य इतने लंबे समय तक चलता है, क्योंकि तुम्हारी प्रकृति दु:साध्य है। अब तुम अपने कर्तव्यों को पूरा करते हुए उतनी अधिक पीड़ा उठा रहे हो जितना तुम उठा सकते हो, लेकिन यह एक अखण्डनीय तथ्य है : तुम लोगों में से प्रत्येक मुझे धोखा देने और शैतान के अधिकार क्षेत्र, उसके शिविर में लौटने, और अपने पुराने जीवन में वापस जाने में सक्षम है। उस समय, तुम लोगों के पास लेशमात्र मानवता या इंसान की समानता, जैसी कि अभी तुम्हारे पास है, होना संभव नहीं होगा। गंभीर मामलों में, तुम लोगों को नष्ट कर दिया जाएगा और इसके अलावा तुम लोगों को, फिर कभी भी अवतरण नहीं करने, बल्कि गंभीर रूप से दंडित करने के लिए अनंतकाल तक के लिए अभिशप्त कर दिया जाएगा। यह तुम लोगों के सामने रखी गई समस्या है" ("वचन देह में प्रकट होता है" में 'एक बहुत गंभीर समस्या : विश्वासघात (2)')। मैं सोचा करता था कि मुझे परमेश्वर में विश्वास करते हुए दस साल से ज़्यादा हो गये, परमेश्वर का अनुसरण करने के लिए मैं सब-कुछ छोड़ सकता हूँ, अपने कर्तव्य के लिए कष्ट सह सकता हूँ, सीसीपी के दमन के आगे झुका नहीं हूँ, इससे मुझे लगा कि मैं परमेश्वर के प्रति समर्पित हूँ और उसे कभी धोखा नहीं दे सकता। कुछ ऐसा जिसकी मैं कभी कल्पना भी नहीं कर सकता था, वो यह था कि सीसीपी पुलिस द्वारा गिरफ़्तारी और क्रूर यातना दिये जाने के चलते, मैं अपनी प्रतिष्ठा गँवा दूंगा और शैतान के आगे झुक जाऊंगा। परमेश्वर को धोखा देने की मेरी प्रकृति पूरी तरह उजागर हो गयी। उस भयावह हार के बारे में सोचकर भयंकर वेदना होती है, यह ज़िंदगी भर का पछतावा होगा।

सन् 2008 की बात है, जब सीसीपी ने बड़े पैमाने पर ईसाइयों के राष्ट्रव्यापी दमन और गिरफ़्तारी का एक नया दौर शुरू किया था। मुझे अगस्त का वो दिन याद है, मुझे सूचित किया गया था कि कई जगहों पर कलीसिया के बहुत-से अगुआओं और भाई-बहनों को गिरफ़्तार कर लिया गया है। मैं इसके परिणामों से निपटने और कलीसिया की आस्तियों को दूसरी जगह ले जाने की कोशिश में कुछ भाई-बहनों से संपर्क करने के लिए भागा। कलीसिया के तमाम मामलों को ठीक करने में दो हफ़्तों से भी ज्यादा का वक्त लग गया। उस वक्त मैं अपने-आपसे वाकई खुश था, यह सोचकर कि जब सीसीपी पागलपन से लोगों को गिरफ़्तार कर रही है, तब मैं हिम्मत से उसका सामना कर कलीसिया के कार्य को कायम रख रहा था, मैं परमेश्वर के प्रति सर्वाधिक समर्पित था, उसकी इच्छा के प्रति विचारशील था। जब मैंने सुना कि गिरफ़्तार किये गये लोगों में से कुछ यहूदा थे, जो परमेश्वर को धोखा दे रहे थे, भाई-बहनों के साथ गद्दारी कर रहे थे, तो मैं उनके प्रति घृणा से भर गया और मैंने मन-ही-मन संकल्प किया : "अगर किसी दिन मुझे भी गिरफ़्तार कर लिया गया, तो मैं एक यहूदा बनने से पहले ही अपनी जान दे दूंगा!" मुझे लगा कि मैं वाकई बड़ा आस्थावान हूँ। मुझे हैरत हुई कि 2009 का नया साल शुरू होते ही, सीसीपी ने सर्वशक्तिमान परमेश्वर की कलीसिया को निशाना बना कर एक और राष्ट्रव्यापी गिरफ़्तारी अभियान "थंडर-3" शुरू कर दिया। एक दिन जब मैं कुछ भाई-बहनों के साथ एक सभा में था, 30 से ज़्यादा पुलिस अधिकारी अचानक अंदर घुस आये। वे हमें नगर के पुलिस थाने ले गये और पूछताछ के लिए सबको अलग-अलग कर दिया। उन्होंने दो बातें बताने को कहा : अगुआओं और सहकर्मियों के नाम और पते, और कलीसिया के पास कितना पैसा है, किसके घर में छिपाकर रखा गया है। उन लोगों ने धमकी भरे लहज़े में कहा, "अगर नहीं बताओगे, तो ख़त्म कर दिये जाओगे!" उस वक्त मैं ज़्यादा डरा नहीं। मुझे लगा कि बचपन से ही मैंने बहुत मुश्किलें झेली हैं, वे मुझे यातना भी देंगे, तो मैं बरदाश्त कर लूंगा। कुछ भी हो, मैंने अपना कर्तव्य निभाया है, मैं परमेश्वर के प्रति निष्ठावान हूँ, तो वह अवश्य मेरी रक्षा करेगा। जब उन लोगों ने देखा कि मैं बता नहीं रहा हूँ, तो पुलिस मेज़बानों के घरों में मेरे आने-जाने की निगरानी की फुटेज और तस्वीरें ले आयी और पिछले कुछ महीनों में जहां भी मैं गया था उन जगहों की सूची दिखा कर मुझे कबूल करने को कहा। ऐसे निर्णायक प्रमाण देखकर मुझे चिंता हुई। मुझे लगा कि मेरे नकारने पर भी ये मुझ पर यकीन नहीं करेंगे, इसलिए मैंने परमेश्वर से प्रार्थना और विनती की कि मुझे एक यहूदा बनने से रोक ले। जब उन्होंने देखा कि मैं अब भी नहीं बता रहा हूँ, तो एक अफसर ने आगबबूला होकर यह कहा, "लगता है तुम हमें सख्ती से पेश आने के लिए मजबूर कर रहे हो!" और जिस लोहे की कुर्सी से मुझे बांधा गया था उसे धक्का देकर गिरा दिया जिससे मैं अपनी पीठ के बल गिर पड़ा। फिर सरसों के तेल और हॉर्सरैडिश नामक कंद-मूल के द्रव वाली सिरिंज लेकर वे इसे मेरी नाक में चढ़ाने लगे और आँखों पर मलने लगे। इससे बहुत चुभन हुई। मेरे लिए सांस लेना मुश्किल हो रहा था। मेरी आँखें इतनी जल रही थीं कि खोल नहीं पा रहा था, पेट में आग लगी हुई थी। फिर उन्होंने मेरे कमर तक के कपड़े उतार दिये, मेरे दोनों हाथ पीछे करके बाँध दिये और उनको झटका देकर ऊपर खींच दिया। जब वे थक गये, तो मेरे हाथों को उठाये रखने के लिए उन्होंने एक ड्रॉअर पर रख दिया। मैं बस दर्द सहता रहा, कुछ नहीं बोला। जब उनकी ये चाल नहीं चली, तो उन्होंने एक और शातिर तरीका अपनाया। उन्होंने फिर से लोहे की कुर्सी के साथ मेरी हथकड़ी लगा दी, दो-चार बिजली के तार ले आये, तार के एक सिरे को मेरे पैरों के दोनों अंगूठों के साथ बाँध दिया और दूसरे सिरे को एक टेसर के साथ जोड़ दिया, फिर वे मुझ पर ठंडा पानी छिड़कने लगे और बिजली के झटके पर झटके देते रहे। बिजली के झटके खा-खा कर मेरा शरीर ऐंठने लगा और मेरे दिल में मरोड़ पड़ने लगे। मुझे वाकई लगा कि बस मैं मरने ही वाला हूँ। वे रात दो बजे तक मुझे यंत्रणा देते रहे।

अगले दिन, पुलिस मुझे एक गुप्त पूछताछ स्थल पर ले गयी। अंदर घुसते ही मुझे हर जगह खून के धब्बे नज़र आये। बहुत डरावना था। मैं यह सोच कर बहुत डर गया कि कहीं वे यहाँ मुझे पीट-पीट कर मार तो नहीं डालेंगे। उसी पल, एक अफसर ने बिना कुछ बोले, मेरे हाथ खींचे और मुझे एक लोहे की कुर्सी से लिपटा दिया, फिर उसने मुझे और कुर्सी दोनों को धक्का देकर एक साथ फर्श पर गिरा दिया। मेरी कलाइयों में जहां हथकड़ियाँ लगी थीं वहां पहले से ही गहरे घाव थे जिनसे खून रिस रहा था और मेरे हाथ गुब्बारों की तरह सूज गये थे। जिस पल मुझे धक्का देकर फर्श पर गिराया गया वह बेहद दर्दनाक था, मैं परमेश्वर से लगातार प्रार्थना करने के सिवाय कुछ नहीं कर सकता था। तब पुलिस ने कलीसिया को बदनाम करनेवाले झूठों का पुलिंदा पेश कर दिया। इतना झूठ सुनकर मुझे मतली होने लगी, बहुत गुस्सा आ गया। मुझे अभी भी कुछ बताता न देख कर उनमें से एक ने हताशा में एक टेसर उठाया और मेरे पूरे शरीर, चेहरे, और यहाँ तक कि मुंह में भी लगाने लगा। उससे एक चमकदार नीली रोशनी निकल रही थी, मैं अपनी आँखें खोलने की हिम्मत नहीं कर पा रहा था, सिर्फ टेसर की चटचटाहट सुन पा रहा था और अपनी जलती हुई मांसपेशियों की बू सूंघ पा रहा था। तब उनमें से एक अफसर का सिर फिर गया। उसने प्लास्टिक की एक थैली लेकर मेरे सिर पर लगा दी, उसने उसे तभी निकाला जब मेरा दम घुटनेवाला था। एक दूसरा अफसर मेरे शरीर के निचले हिस्से पर लात मारने लगा, एक और अफसर ने करीब 4 सेंटीमीटर मोटी लाठी उठायी और गुस्से से लगातार चीखते हुए मुझे मारने लगा, "यहाँ हमारे पास 100 से ज़्यादा यंत्रणा औजार हैं और हम तुम्हारे ऊपर एक के बाद एक सबका इस्तेमाल करेंगे। यहाँ जो मर जाता है उसे गड्ढे में फेंक दिया जाता है, कोई दिक्कत नहीं! तुम कुछ नहीं बताओगे, तो तुम्हें आठ से दस साल तक की जेल होगी, और अगर पिटाई से तुम लूले-लंगड़े हो गये तो भी तुम्हें जेल में रहना होगा। बाहर निकलने के बाद भी तुम्हारी बाकी की ज़िंदगी जीने लायक नहीं रह जाएगी!" यह सुनकर मुझे बड़ी चिंता हुई, मैंने सोचा, "अगर पीट-पीट कर मुझे लूला-लंगड़ा बना दिया गया, तो मैं ज़िंदगी कैसे गुज़ारूंगा? पुलिस ने कहा कि सारी जानकारी उन्हें मेरे कंप्यूटर से मिल गयी है, अब अगर मैंने नहीं बताया तो जब वे दूसरे लोगों को गिरफ़्तार करेंगे, तो वे बोलेंगे कि मैंने उनके साथ गद्दारी की है। कलीसिया के सभी लोग मुझसे नफ़रत करेंगे और मैं अपना मुंह नहीं दिखा पाऊंगा।" जब पुलिस ने एक विराम दिया तब मैंने महसूस किया कि मेरा पूरा चेहरा बुरी तरह सूज गया है, मेरी आँखें सूज कर करीब-करीब बंद हो गयी हैं और मुझे बहुत कम दिख रहा है। मेरी कलाइयों से खून रिस रहा है और मेरे पूरे शरीर में जलने के ज़ख्म हैं। मुझे लग रहा था कि मेरे दिल में मरोड़ आ रहे हैं और मुझे सांस लेने में दिक्कत हो रही है। लगा जैसे मैं मरने ही वाला हूँ। फिर मैंने एक अफसर को यह कहते हुए सुना कि कंप्यूटर विशेषज्ञ आया था और मेरे कम्यूटर की पूरी जानकारी उनके हाथ लग गयी है। मैं अचानक भयभीत हो गया। मैंने सोचा, "किस्सा ख़त्म। उसमें अगुआओं और सहकर्मियों के बारे में जानकारी है, साथ ही कलीसिया के सदस्यों की सूची और कलीसिया के बही-खाते भी हैं।" मैं बुरी तरह घबरा गया और समझ नहीं पाया कि अब क्या करूं। उस शाम, अफसरों ने कमरे में एक तिपाई रखी, मेरी पीठ के पीछे मेरे दोनों हाथ मजबूती से बाँध दिये और मुझे तिपाई पर लटका दिया। मैं ज़मीन से दो फुट ऊपर लटका हुआ था और वे मुझे आगे-पीछे झुलाने लगे। वे जब भी झुलाते, मेरे हाथों में भयंकर दर्द होता, मेरे चेहरे से खूब पसीना बह रहा था। तब मैंने उस पुलिस वाले की बात पर गौर किया कि पीट-पीट कर मुझे मार डालने में कोई दिक्कत नहीं होगी और विकलांग हो जाने पर भी मुझे जेल की सज़ा होगी। मुझे लगने लगा कि यह सब झेल नहीं पाऊँगा और सोचा, "मैं यहाँ मर गया तो क्या होगा? मैं सिर्फ 30 बरस का हूँ। अगर पीट-पीट कर मुझे आर डाला गया तो कितनी क्षति होगी! अगर मैं लूला-लंगड़ा हो गया और काम नहीं कर पाया, तो ज़िंदगी कैसे गुज़रेगी? वैसे भी उन्होंने मेरे कंप्यूटर की पूरी जानकारी हासिल कर ली है, तो फिर मैं कबूल करूं या न करूं, क्या फर्क पड़ता है। अगर मैं उन्हें थोड़ा-बहुत बता दूं तो शायद वे मेरी ज़िंदगी बख्श दें।" लेकिन फिर मैंने सोचा, "नहीं, मैं ऐसा नहीं कर सकता। ऐसा करके मैं एक यहूदा नहीं बन जाऊंगा?" यह आतंरिक संघर्ष चलता ही रहा। हालांकि मैंने परमेश्वर से प्रार्थना की थी और कहा था कि मैं एक यहूदा बनने के बजाय मर जाऊंगा, मगर वक्त बीतने के साथ मेरा दर्द बदतर होता गया, और उस रात 2 या 3 बजे तक मैं पुलिस की यंत्रणा को और बरदाश्त नहीं कर पाया और पूरी तरह टूट गया। मैं उन्हें कलीसिया के बारे में जानकारी देने को राज़ी हो गया। आखिरकार तब उन्होंने मुझे नीचे उतारा। उतारे जाने के बाद, मैं बस फर्श पर पड़ा रहा, हिलने-डुलने के भी काबिल नहीं था, मेरे हाथों में जान ही नहीं थी। अफसरों ने मेरे दो मेज़बानों के घर की मंज़िलों और अपार्टमेंट नंबरों की पुष्टि करने को कहा, मैंने हामी भर दी। उस पल मैंने अपने भाई-बहनों के साथ धोखा किया, मेरा दिमाग़ पूरा खोखला हो गया था। मैं बुरी तरह घबरा गया था, मुझे लगा कि कुछ भयंकर घटनेवाला है। फिर परमेश्वर के ये वचन मेरे मन में कौंधे, "जो कोई भी मेरा दिल तोड़ता है, उसे दूसरी बार मुझसे क्षमा प्राप्त नहीं होगी।" मुझे स्पष्ट रूप से मालूम था कि मैंने परमेश्वर को धोखा दिया है और उसके स्वभाव को अपमानित किया है, वह मुझे फिर से क्षमा नहीं करेगा। मैं वाकई बहुत दुखी हुआ और मैंने खुद से भीतर से घृणा की। मैंने सोचा, "मैंने उनके साथ गद्दारी क्यों की? अगर मैं मजबूरी की यातना को सह लेता, थोड़ी देर और कष्ट उठाता, तो शायद इससे पार निकल जाता।" मैं दोष और पछतावे से भर उठा। इसके बाद, पुलिस की लाख कोशिश के बावजूद मैंने कुछ भी और बोलने से मना कर दिया। फिर, जब कभी मैं परमेश्वर और अपने भाई-बहनों को धोखा देने, एक यहूदा बनने, और ऐसा अक्षम्य काम करने के बारे में सोचता, मुझे घोर संताप होता। मुझे लगता जैसे आस्था का मेरा मार्ग बंद हो गया है, मानो मुझे मृत्युदंड दे दिया गया हो, और मैं जेल में किसी भी पल मर सकता हूँ।

तब कुछ अप्रत्याशित घट गया। मेरी गिरफ़्तारी के चौथे दिन सुबह के करीब 5 बजे थे, मुझ पर निगरानी रख रहे अफसर गहरी नींद में थे, तब मैं चुपचाप जिस रस्से से बंधा हुआ था उसको खोल कर खिड़की से बाहर कूद गया। बड़ी मुश्किल झेल कर मैं एक भाई के घर पहुँच गया और बिना वक्त गंवाये कलीसिया के अगुआ को एक चिट्ठी लिखी, यह बताने के लिए कि मैंने किस तरह उन दो मेज़बानों के साथ गद्दारी की और बताया कि उन्हें तुरंत सावधानियां बरतने की ज़रूरत है। अगुआ ने तब मेरे रहने के लिए एक सुरक्षित स्थान का इंतज़ाम किया। मुझे तब बहुत कोफ़्त हुई जब कलीसिया के एक और सदस्य ने मुझे अपने यहाँ ठहराने का खतरा मोल लेना चाहा। मैंने परमेश्वर को धोखा दिया था और भाई-बहनों के साथ गद्दारी की थी। मैं एक यहूदा बन गया था। मैं किसी का भी मेहमान बनने के लायक बिल्कुल भी नहीं था, मैं दूसरे भाई-बहनों को अपना मुंह नहीं दिखा सकता था। फिर मैंने परमेश्वर के ये वचन पढ़े : "मैं उन लोगों पर और अधिक दया नहीं करूँगा जिन्होंने गहरी पीड़ा के दिनों में मुझ पर रत्ती भर भी निष्ठा नहीं दिखाई है, क्योंकि मेरी दया का विस्तार केवल इतनी ही दूर तक है। साथ ही साथ, मुझे ऐसा कोई इंसान पसंद नहीं है जिसने कभी मेरे साथ विश्वासघात किया हो, ऐसे लोगों के साथ संबद्ध होना तो मुझे बिल्कुल भी पसंद नहीं है जो अपने मित्रों के हितों को बेच देते हैं। यही मेरा स्वभाव है, इस बात की परवाह किए बिना कि व्यक्ति कौन हो सकता है। मुझे तुम लोगों को अवश्य बता देना चाहिए कि: जो कोई भी मेरा दिल तोड़ता है, उसे दूसरी बार मुझसे क्षमा प्राप्त नहीं होगी, और जो कोई भी मेरे प्रति निष्ठावान रहा है वह सदैव मेरे हृदय में बना रहेगा" ("वचन देह में प्रकट होता है" में 'अपनी मंज़िल के लिए पर्याप्त संख्या में अच्छे कर्मों की तैयारी करो')। इन वचनों ने मेरी अंतरात्मा को झकझोर दिया। इसका एक-एक शब्द एक ज़बरदस्त धक्का था। मुश्किलों के दौरान परमेश्वर के प्रति निष्ठा न रखनेवाला वह इंसान मैं था। परमेश्वर को धोखा देनेवाला और भाई-बहनों के हितों के साथ गद्दारी करनेवाला वो इंसान मैं था। परमेश्वर का दिल तोड़नेवाला वो इंसान मैं था। मैं कायर था, मैंने परमेश्वर को धोखा दिया था और भाई-बहनों के साथ गद्दारी की थी, परमेश्वर के स्वभाव को गंभीरता से अपमानित किया था। मुझे फिर कभी परमेश्वर की क्षमा नहीं मिलेगी, बल्कि परमेश्वर द्वारा मेरा दंडित होना निश्चित है। मैं इस बारे में जितना सोचता उतना ही बेचैन हो जाता, और अब मैं अपने आंसुओं को रोक ही नहीं पा रहा था।

कुछ दिनों के बाद, मैंने सुना कि मैंने जिन मेज़बानों के साथ गद्दारी की थी उनमें से एक बड़ी बहन को गिरफ़्तार कर लिया गया है और उसके घर को तलाशा गया है। उसने मुझे मेहमान बनाकर मेरी देखभाल करने का जोखिम मोल लिया था, लेकिन मैंने उसके साथ गद्दारी की। मुझे अच्छी तरह मालूम था कि सीसीपी ईसाइयों के साथ किस प्रकार क्रूरता से पेश आती है, और मैं खुद उस यातना से गुज़र चुका था, लेकिन अपनी ज़िंदगी बचाने के लिए मैंने उसे दानवों के हाथ में सौंप दिया। कितना दुष्ट काम किया है! मैंने अपने चेहरे पर ज़ोर से कुछ थप्पड़ लगाये और परमेश्वर के सामने प्रार्थना करने के लिए दंडवत हो गया : "हे परमेश्वर, मैंने तुम्हें धोखा दिया और भाई-बहनों के साथ गद्दारी की। मैं तो इंसान भी नहीं हूँ, मुझे ज़िंदा रहने का कोई हक़ नहीं है। मुझे शापित और दंडित होना चाहिए। मेरी मृत्यु भी तुम्हारी धार्मिकता होगी।" मुझे ज़रा भी सुकून नहीं मिल पा रहा था और मैं निरंतर संतप्त था। रात में बुरे सपनों के कारण बार-बार मेरी नींद उड़ जाती, मैं सोचता रहता, "मैं परमेश्वर को धोखा देकर एक यहूदा कैसे बन सकता था? इतने वर्षों की अपनी आस्था में मैंने परमेश्वर के लिए अपने परिवार और करियर को छोड़ दिया, मेरा कर्तव्य जितना भी खतरनाक रहा हो, मैं कभी छोड़कर नहीं भागा। तो फिर एक ही रात में मैं परमेश्वर को धोखा देकर एक यहूदा कैसे बन गया? मैंने ऐसा क्यों किया?" अपनी गिरफ़्तारी के तुरंत बाद मैं गवाही देना चाहता था, लेकिन जब मुझे क्रूरता से यातना दी गयी और मेरा जीवन खतरे में पड़ गया, तो मैं डर के मारे सिमट गया, जब मैंने पुलिसवालों को यह कहते हुए सुना कि वे सर्वशक्तिमान परमेश्वर के विश्वासियों को जब चाहें ख़त्म कर सकते हैं, और मेरे विकलांग हो जाने पर भी मुझे जेल की सज़ा दी जाएगी, तो मैं चिंतित हो गया कि एक लूले-लंगड़े व्यक्ति के रूप में मैं गुज़र-बसर कैसे कर पाऊंगा। मैं सिर्फ 30 वर्ष का था और मेरा मारा जाना कितना व्यर्थ होता! जब मैंने उनके मुँह से सुना कि उन्होंने मेरे कंप्यूटर का पासवर्ड मालूम कर लिया है, और उस पर उपलब्ध कलीसिया की पूरी जानकारी अब उनके हाथ में है, तो मैंने भीतर से हार मान ली और मुझे लगा कि अब मैं कबूल करूं या नहीं, कोई फर्क नहीं पड़ेगा, उनको थोड़ी-सी जानकारी देकर मैं अपनी ज़िंदगी बचा सकता हूँ। मैं अपनी प्रतिष्ठा गँवा कर एक यहूदा बन गया। मैंने देखा कि परमेश्वर को धोखा देने का मेरा मुख्य कारण यह था कि मैं बस अपनी ज़िंदगी बचाना चाहता था, मैं अपनी खुद की ज़िंदगी को बहुमूल्य समझता था। मैं सोचा करता था कि मैं कष्ट झेल सकता हूँ और मैं परमेश्वर के प्रति समर्पित हूँ, दूसरे लोगों की तरह कम-से-कम मैं तो कभी भी परमेश्वर को धोखा नहीं दूंगा। लेकिन जैसे ही मुझे गिरफ़्तार कर यातना दी गयी, मैंने अपना सही रंग दिखा दिया। तब मैंने देखा कि मुझमें सत्य की वास्तविकता का अभाव है और मैं परमेश्वर में सच्ची आस्था नहीं रखता। परीक्षाओं और तकलीफ़ों का सामना होने पर, ज़िंदगी खतरे में आने पर, मैं किसी भी पल परमेश्वर का विरोध कर उसे धोखा दे सकता हूँ। मैंने ये वचन पढ़े : "सर्वशक्तिमान की नज़रों में सम्पूर्ण मनुष्यजाति में से किसकी देखभाल नहीं की जाती है? कौन सर्वशक्तिमान द्वारा पूर्वनियति के बीच नहीं रहता है? क्या मनुष्य का जीवन और मरण उसकी अपनी पसंद से होता है? क्या मनुष्य अपने भाग्य को खुद नियंत्रित करता है? बहुत से लोग मृत्यु की कामना करते हैं, फिर भी वह उनसे काफी दूर रहती है; बहुत से लोग ऐसे होना चाहते हैं जो जीवन में मज़बूत हैं और मृत्यु से डरते हैं, फिर भी उनकी जानकारी के बिना, उन्हें मृत्यु की खाई में डुबाते हुए, उनकी मृत्यु का दिन निकट आ जाता है" ("वचन देह में प्रकट होता है" में 'संपूर्ण ब्रह्मांड के लिए परमेश्वर के वचन' के 'अध्याय 11')। "जब लोग अपने जीवन का त्याग करने के लिए तैयार होते हैं, तो सब कुछ तुच्छ हो जाता है, और कोई भी उनका लाभ नहीं उठा सकता। जीवन से अधिक महत्वपूर्ण क्या हो सकता है? इस प्रकार, शैतान लोगों में अधिक कार्य करने में असमर्थ हो जाता है, वह मनुष्य के साथ कुछ भी नहीं कर सकता। हालांकि, 'देह' की परिभाषा में यह कहा जाता है कि देह शैतान द्वारा दूषित है, अगर लोग वास्तव में स्वयं को अर्पित कर देते हैं, और शैतान से प्रेरित नहीं रहते हैं, तो कोई भी उनसे लाभ नहीं प्राप्त कर सकता...।" ("वचन देह में प्रकट होता है" में 'संपूर्ण ब्रह्मांड के लिए परमेश्वर के वचनों के रहस्य की व्याख्या' के 'अध्याय 36')। परमेश्वर के वचनों ने मुझे इस बात का एहसास कराया कि जीवन और मृत्यु सहित हमारी सभी चीज़ें उसी के हाथ में हैं। मेरी मृत्यु कब होगी, मेरी पिटाई होगी या मैं पंगु बन जाऊंगा, मेरा जीवन चाहे जैसा भी हो, सब-कुछ परमेश्वर द्वारा पूर्व-नियोजित होता है। सब-कुछ परमेश्वर की इच्छा से चलता है, मैं जियूं या मरूं, मुझे परमेश्वर की व्यवस्थाओं के प्रति समर्पित होना चाहिए। भले ही मैं शैतान द्वारा उत्पीड़ित होकर मृत्यु को प्राप्त हो जाऊं, अगर मैं परमेश्वर की गवाही दे सकूं, तो यह एक उपयुक्त और सार्थक मृत्यु होगी। मैंने प्रभु यीशु के इन वचनों को याद किया, "क्योंकि जो कोई अपना प्राण बचाना चाहेगा वह उसे खोएगा, परन्तु जो कोई मेरे लिये अपना प्राण खोएगा वही उसे बचाएगा" (लूका 9:24)। मैंने प्रभु यीशु के प्रेरितों और अनुयायियों के बारे में सोचा, और यह भी कि उनमें से कई परमेश्वर के सुसमाचार को फैलाने और उसकी इच्छा को पूरा करने के लिए शहीद हो गये थे। परमेश्वर ने उनकी मृत्यु पर श्रद्धांजलि दी थी। हालांकि वे दैहिक रूप से मृत्यु को प्राप्त हुए थे, उनकी आत्माओं की मृत्यु नहीं हुई थी। लेकिन मेरा परमेश्वर को धोखा देना, दूसरों के साथ गद्दारी करना और एक यहूदा बनना अंतहीन शर्म की बात थी। मैं ज़िंदा लाश की तरह था, आत्मा-रहित चलने वाली लाश जैसा। मैंने सोचा, जब मुझे विश्वास था कि पुलिस के पास कलीसिया की जानकारी पहले से है, तो मैंने यह कैसे सोच लिया कि मेरे कबूल कर लेने से कोई फर्क नहीं पड़ेगा। लेकिन मैं पूरी तरह से ग़लत था। जब बड़ा लाल अजगर मुझे यातना दे रहा था, तब परमेश्वर यह देख रहा था कि मेरा रवैया क्या है और क्या मैं शैतान के सामने उसकी गवाही देता हूँ। उन लोगों के पास वह जानकारी रही हो या नहीं, मुझे नहीं बताना चाहिए था। मेरा पुलिस को बता देना शैतान के सामने सिर झुकाना था, और यह शर्म की निशानी थी। मुझे घृणा हुई कि मैंने सत्य का अनुसरण नहीं किया और मैंने परमेश्वर में सच्ची आस्था नहीं रखी। मैंने अपने जीवन के लालच, प्रतिष्ठा और सच्चाई के अभाव से घृणा की। इससे भी ज़्यादा, मैंने उस दानव, बड़े लाल अजगर से घृणा की। वह परमेश्वर और सत्य से अत्यधिक घृणा करता है, उसके चुने हुए लोगों को पागलपन से गिरफ़्तार कर उत्पीड़ित करता है। वह परमेश्वर को नकारने और उसे धोखा देने के लिए लोगों को मजबूर करता है, और उद्धार के उनके अवसरों को नष्ट कर देता है। मैंने संकल्प किया कि बड़े लाल अजगर के साथ अपने संबंधों को पूरी तरह तोड़ दूंगा और अपना जीवन परमेश्वर के अनुसरण को समर्पित कर दूंगा।

एक बार मैंने विजेताओं के अनुभवों पर गवाही के कुछ लेख पढ़े, मैंने देखा कि जब उन्हें बड़े लाल अजगर ने यातना दी थी, तो उन सबने शैतान पर विजय पाने और गवाही देने के लिए परमेश्वर के वचनों पर भरोसा किया था। मैंने और भी ज़्यादा शर्मिंदगी महसूस की। वे भी मेरी ही तरह उत्पीड़ित विश्वासी थे, तो फिर वे सब किस तरह से दर्द सह कर गवाही दे पाये? मैं क्यों इतना ज़्यादा स्वार्थी, घिनौना और जीवन का लालची हूँ कि मैं एक विश्वासघाती यहूदा बन गया? मेरी गद्दारी ने किस तरह शैतान को मेरा मखौल उड़ाने का मौक़ा दिया, यह सोच कर मेरे दिल में मानो नश्तर चल गया। यह बहुत दुखदाई था और मैं खुद को माफ़ नहीं कर पा रहा था। मैं वाकई निराश महसूस कर रहा था। उसी वक्त मैंने परमेश्वर के ये वचन पढ़े : "ज़्यादातर लोगों ने अपराध किये हैं, उदाहरण के लिए, कुछ लोगों ने हमेशा परमेश्वर का विरोध किया, कुछ ने परमेश्वर के ख़िलाफ़ विद्रोह किया, कुछ ने परमेश्वर के ख़िलाफ़ शिकायत भरे शब्द बोले या दूसरे लोगों ने कलीसिया के ख़िलाफ़ काम किया या परमेश्वर के घर को नुकसान पहुँचाने वाली हरकतें कीं। इन लोगों के साथ कैसा व्यवहार किया जाना चाहिए? उनके परिणाम, उनकी प्रकृति और उनके निरंतर व्यवहार के अनुसार निर्धारित किए जाएंगे। ... परमेश्वर प्रत्येक व्यक्ति के साथ उस वक्त के हालात और संदर्भ, वास्तविक परिस्थिति, लोगों के कर्मों, उनके व्यवहार और अभिव्यक्तियों के अनुसार निपटता है। परमेश्वर कभी किसी के साथ गलत नहीं करेगा। यही परमेश्वर की धार्मिकता है" ("मसीह की बातचीत के अभिलेख" में 'मनुष्य के साथ परमेश्वर के व्यवहार का आधार')। फिर मैंने एक धर्मोपदेश से यह अंश पढ़ा : "कुछ लोग ऐसे होते हैं जो, कमज़ोरी के कारण, गिरफ़्तारी के कुछ ही समय बाद गद्दारी कर बैठते हैं। वैसे वे शैतान के लिए सेवा नहीं करते, और दिल से वे अभी भी परमेश्वर में विश्वास करते हैं और परमेश्वर से प्रार्थना करते हैं। उनकी थोड़ी गद्दारी का कारण यह होता है कि अपने आध्यात्मिक कद में वे बहुत अपरिपक्व होते हैं और उनकी देह बहुत कमज़ोर होती है। वैसे, वे पूरी तरह से गद्दारी नहीं करते, न ही शैतान के लिए सेवा करते हैं; मगर यह उनके गवाही देने के बराबर ही है। जो लोग गिरफ़्तारी के बाद कलीसिया और भाई-बहनों के साथ पूरी तरह से गद्दारी करते हैं, और जो अपने भाई-बहनों की निगरानी और गिरफ़्तारी में बड़े लाल अजगर के साथ सहयोग करते हैं, जो ऐसे बयानों पर भी दस्तख़त करते हैं जिनमें वे परमेश्वर में फिर कभी विश्वास न करने की शपथ लेते हैं—ऐसे लोगों को पूरी तरह से हटा दिया जाएगा और उनका परमेश्वर द्वारा शापित होना तय है। ... पहले ऐसे भाई-बहन भी हुए हैं जिन्होंने जेल में रहते हुए, कमज़ोरी के कारण, थोड़ी-सी गद्दारी की। फिर अंतरात्मा के कचोटने से उन्हें पछतावा हुआ, और वे रो-रो कर खुद से नफ़रत करने लगे। उन्होंने परमेश्वर के सामने शपथ ली कि वे उससे दंडित होंगे, और उससे विनती की कि वह एक बार फिर उन्हें प्रतिकूल परिस्थितियां झेलने दे, ताकि वे परमेश्वर को संतुष्ट करने के लिए सुंदर गवाही देने का अवसर पा सकें। ठीक इसी तरह से उन्होंने बार-बार परमेश्वर से प्रार्थना की, जब तक वे आखिरकार सत्य का अनुसरण करने लायक नहीं बन गये और हमेशा की तरह अपना कर्तव्य नहीं निभाने लगे, और उन्हें पवित्र आत्मा का कार्य भी प्राप्त नहीं हो गया। ऐसे लोगों ने सच्चाई से प्रायश्चित किया और वे ईमानदार हैं। परमेश्वर उन पर दया करेगा" (जीवन में प्रवेश पर धर्मोपदेश और संगति)। इन वचनों ने मुझे सचमुच में भावुक बना दिया और मैं लगातार रोता रहा। परमेश्वर इंसान के अपराधों के हालात और उसकी मात्रा के आधार पर और क्या वह सचमुच प्रायश्चित करता है, यह देख कर उसके बारे में निर्धारण करता है। सिर्फ एक अपराध के आधार पर वह उसका परिणाम निर्धारित नहीं करता। मैंने देखा कि परमेश्वर का स्वभाव कितना धार्मिक है, और उसकी धार्मिकता में लोगों के लिए न्याय और कृपा, दोनों शामिल होते हैं। मैंने परमेश्वर को धोखा देने और भाई-बहनों के साथ गद्दारी करने जितना गंभीर अपराध किया था, लेकिन परमेश्वर ने मुझे हटा नहीं दिया। उसने मुझे प्रायश्चित करने का एक मौका दिया। उसने मुझे प्रबुद्ध किया, रास्ता दिखाया और मुझे उसकी इच्छा को समझने की अनुमति दी। मैं सचमुच में यह समझ पाया कि परमेश्वर हर किसी के लिए महान उद्धार लेकर आता है, और परमेश्वर कितना अधिक कृपालु है। मेरा पछतावा और दोष-भाव बढ़ गया और मैं परमेश्वर का अत्यधिक ऋणी महसूस करने लगा। मैंने अपने दिल में संकल्प किया : "अगर मैं फिर से सीसीपी द्वारा गिरफ़्तार कर लिया गया, तो मैं अपना जीवन न्योछावर करने को तैयार हूँ। पुलिस, मृत्यु होने तक भी मुझे यातना दे, तो भी मैं गवाही दूंगा और शैतान को शर्मसार करूंगा!"

कुछ महीने बाद, कलीसिया ने मेरे लिए एक नया काम तय किया। इस बात ने मेरे दिल को गहराई तक छू लिया। मेरी धोखेबाज़ी परमेश्वर के दिल को तोड़नेवाली थी, लेकिन अपनी प्रचुर सहनशीलता और कृपा से उसने मुझे प्रायश्चित करने का मौक़ा दिया। मैं जानता था कि मुझे इस अवसर को संजोना है, उसके प्रेम का मूल्य चुकाने के लिए मुझे अपना कर्तव्य पूरे दिल से निभाना है।

पलक झपकते ही दिसंबर 2012 आ गया, सीसीपी ने सर्वशक्तिमान परमेश्वर की कलीसिया की गिरफ़्तारी और उसके दमन का एक और बड़े पैमाने का अभियान शुरू किया। वे बहुत-से भाई-बहनों को गिरफ़्तार करने के लिए उनके फोन की निगरानी कर रहे थे और लोगों का पीछा कर रहे थे। 18 दिसंबर को, मेरे साथ काम करनेवाली दो बहनों को उनके फोन की टैपिंग करने के बाद गिरफ़्तार कर लिया गया, उसके तुरंत बाद दो अगुआओं को भी गिरफ़्तार कर लिया गया। जब मैंने इस बारे में सुना, तो मुझे बहुत घबराहट होने लगी। मुझे पता था कि बहुत मुमकिन है मैं भी पहले से सीसीपी की निगरानी में हूँ और किसी भी पल मुझे गिरफ़्तार किया जा सकता है। यह जानने का कोई तरीका नहीं था कि दोबारा गिरफ़्तार होने पर क्या मैं ज़िंदा बच पाऊंगा। इस ख़याल से मेरे मन में बहुत डर बैठ गया, लेकिन मैं यह भी जानता था कि सब-कुछ परमेश्वर की अनुमति से ही होता है। मैंने परमेश्वर से यह कहते हुए प्रार्थना की कि मैं अब अपने निजी शारीरिक खतरे के बारे में नहीं सोचना चाहता, मगर मैं इस मुश्किल से निपटते हुए भरसक अपना कर्तव्य करना चाहता हूँ। भले ही मुझे गिरफ़्तार कर लिया जाए, मैं अपनी जान दांव पर लगाकर, शैतान को शर्मसार करने के लिए गवाही दूंगा, इस प्रार्थना के बाद मुझे शांति और सुकून मिला, फिर मैं कलीसिया के काम की व्यवस्था में जुट गया। परमेश्वर की कृपा से, करीब एक महीने बाद, कलीसिया का काम फिर से सामान्य हो गया। इस अनुभव के ज़रिये मैंने देखा कि जब लोग अपने हितों के लिए न जीकर, अपना कर्तव्य निभा पाते हैं, तो वे अंदर शांति और सुकून महसूस करते हैं, उनकी अंतरात्मा को भी शांति मिलती है।

जब कभी मैं परमेश्वर को धोखा देनेवाला एक शर्मनाक यहूदा बनने के बारे में सोचता हूँ, मैं बहुत बुरा महसूस करता हूँ। वैसे, इस प्रकार विफल होकर उजागर किये जाने के कारण ही मुझे परमेश्वर के धार्मिक स्वभाव की थोड़ी समझ आयी और मुझमें परमेश्वर का थोड़ा भय आया है। मैंने देखा कि परमेश्वर कितना बुद्धिमान है। मैंने देखा कि परमेश्वर ने मेरे दोषों को उजागर करने के लिए बड़े लाल अजगर द्वारा गिरफ़्तारी और उत्पीड़न का इस्तेमाल किया, तभी मैं खुद को जान पाया, खुद से नफ़रत कर पाया, और सचमुच में सत्य का अनुसरण करना शुरू कर पाया। मैंने यह भी समझा कि इंसान को बचाने के लिए परमेश्वर का कार्य वास्तव में कितना व्यावहारिक है! परमेश्वर का धन्यवाद!

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