"कार्य और प्रवेश" पर परमेश्वर के वचन के दस अंशों से एक संकलन

1. जब से लोगों ने परमेश्वर में विश्वास करने के सही मार्ग पर चलना शुरू किया, ऐसी कई चीजें हैं जिनके बारे में वे अस्पष्ट रहे हैं। वे परमेश्वर के कार्य के विषय में तथा उन्हें कितना कार्य करना चाहिए, इस विषय में पूर्ण रीति से भ्रम में हैं। एक ओर, यह उनके अनुभव की कमी के कारण और उनकी ग्रहण करने की क्षमता सीमित होने के कारण है; दूसरी ओर, यह इसलिए है कि परमेश्वर के कार्य ने लोगों को अभी तक इस अवस्था में नहीं पहुँचाया है। इसलिए, हर कोई अधिकांश आत्मिक विषयों के बारे में अस्पष्ट है। न केवल तुम लोग इस बारे में अस्पष्ट हो कि तुम्हें किस में प्रवेश करना चाहिए; बल्कि तुम लोग परमेश्वर के कार्य के बारे में भी अनजान हो। यह तुम्हारे भीतर केवल कमियों की बात नहीं है: यह उन सभी का बहुत बड़ा दोष है जो धार्मिक जगत से संबंध रखते हैं। इसका रहस्य यहाँ छिपा हुआ है कि क्यों लोग परमेश्वर को नहीं जानते, और इसलिए यह दोष उन सभी में आम कमी है जो परमेश्वर को खोजते हैं। किसी ने भी परमेश्वर को कभी नहीं जाना, न ही उसका सच्चा चेहरा कभी देखा है। यही कारण है कि परमेश्वर का कार्य इतना कठिन बन जाता है जैसे किसी पहाड़ को हटाना या समुद्र को खाली करना। परमेश्वर के कार्य के लिए कितने लोगों ने अपना जीवन बलिदान किया है; उसके कार्य के कारण कितने लोगों को निकाल दिया गया है; उसके कार्य के कारण कितने लोगों को दर्दनाक मृत्यु सहनी पड़ी; कितने लोग अपनी आँखों में परमेश्वर के लिए प्रेम के आंसू लेकर अन्यायपूर्वक मरे; कितनों को क्रूरता के साथ अमानवीय सताव सहना पड़ा...? क्या ये त्रासदियाँ लोगों में परमेश्वर का ज्ञान कम होने के कारण नहीं हुईं? कैसे कोई ब्यक्ति जो परमेश्वर को नहीं जानता उसके सम्मुख आने का साहस कर सकता है? कोई व्यक्ति जो परमेश्वर पर विश्वास करता है और फिर भी उसे सताता है, वह उसके सम्मुख आने का साहस कैसे कर सकता है? यह केवल धार्मिक जगत में रहने वालों की ही कमियाँ नहीं हैं, बल्कि तुम लोगों में और उन में साधारणतः पाई जाती हैं। लोग परमेश्वर को जाने बिना उस पर विश्वास करते हैं; यही कारण है कि वे अपने हृदयों में परमेश्वर को आदर नहीं देते, और अपने हृदयों में उससे नहीं डरते। ऐसे भी लोग हैं, जो खुल्लमखुल्ला और ढिठाई के साथ इस दिशा में अपनी ही कल्पना द्वारा कार्य करते हैं, और अपनी ही मांगों और अत्यधिक इच्छाओं के अनुसार परमेश्वर द्वारा आदेशित कार्य करते हैं। बहुत लोग परमेश्वर को बिना आदर दिए अपनी ही इच्छा के पीछे जाकर असभ्य लोगों की तरह व्यवहार करते हैं। क्या ये लोगों के स्वार्थी हृदयों का सटीक उदाहरण नहीं हैं? क्या यह लोगों में धोखे की बहुतायत को प्रकट नहीं करता? निःसंदेह लोग बहुत ही बुद्धिमान हो सकते हैं, परंतु कैसे उनके वरदान परमेश्वर के कार्य का स्थान ले सकते हैं? लोग परमेश्वर के बोझ की परवाह वास्तव मेंकर सकते हैं, परंतु वे बहुत ही स्वार्थपूर्ण व्यवहार नहीं कर सकते। क्या लोगों के कार्य वास्तव में दैवीय हैं? क्या कोई सकारात्मक रूप से आश्वस्त हो सकता है? परमेश्वर की गवाही देने के लिए और उसकी महिमा को प्राप्त करने के लिए परमेश्वर एक अपवाद को कर रहा है और लोगों को खड़ा कर रहा है; वे कैसे इसके योग्य हो सकते हैं? परमेश्वर का कार्य अभी बस शुरू हुआ है, उसके वचन अभी बोले जाने शुरू हुए हैं। इस समय, लोग अपने बारे में अच्छा महसूस करते हैं; क्या यह निरादर को आमंत्रित करना नहीं होगा? वे बहुत कम समझते हैं। यहाँ तक कि ऊंचे दर्ज़े के सिद्धांतवादी, उच्च श्रेणी के वक्ता भी परमेश्वर की बहुतायत का वर्णन नहीं कर सकते—तो तुम लोग कितना कर सकते हो? तुम लोगों ने अपना मूल्य स्वर्ग से अधिक नहीं समझा होता, बल्कि स्वयं को उन विवेकी लोगों से भी कम समझा होता जो परमेश्वर से प्रेम करने का प्रयास करते हैं। यही मार्ग है जिसके द्वारा तुम लोगों को प्रवेश करना है: स्वयं को दूसरों से छोटा समझना। स्वयं को इतना ऊंचा क्यों समझना है? स्वयं को इतना अधिक बड़ा क्यों समझना है? जीवन की लंबी यात्रा में, तुम लोगों ने केवल कुछ पहले कदम उठाए हैं। तुम लोग परमेश्वर का सिर्फ हाथ देखते हो, न कि पूरे परमेश्वर को। क्योंकि तुम लोगों में बहुत कम बदलाव हुए हैं, इसलिए यह तुम लोगों को योग्य बनाता है ताकि तुम लोग परमेश्वर का कार्य अधिक देख सको, यह खोज सको कि तुम लोगों को किस में प्रवेश करना है।

— "वचन देह में प्रकट होता है" में 'कार्य और प्रवेश (1)' से उद्धृत

2. जब परमेश्वर मनुष्य को पूर्ण करता है और उसके स्वभाव को रूपांतरित करता है, तब उसका कार्य कभी नहीं रुकता, क्योंकि मनुष्य में कई कमियाँ हैं और परमेश्वर द्वारा स्थापित मापदंडों पर वह खरा नहीं उतर पाता। और इसलिए यह कहा जा सकता है कि परमेश्वर की दृष्टि में तुम लोग हमेशा नवजात शिशु रहोगे जिसके लिए परमेश्वर को खुश करना बहुत ही कठिन होगा, क्योंकि तुम लोग परमेश्वर के हाथ में सिर्फ एक प्राणी ही हो। यदि कोई उदासीनता में पड़ जाता है, तो क्या वह परमेश्वर द्वारा घृणित नहीं होगा। यह कहना कि तुम लोग आज परमेश्वर को संतुष्ट कर सकते हो, तुम्हारे शरीर के सीमित दृष्टिकोण से है, अगर तुम्हें परमेश्वर के अनुरूप होना होता, तो तुम लोग इस क्षेत्र में हमेशा पराजय प्राप्त करते। मनुष्य के शरीर ने कभी विजय प्राप्त नहीं की है। केवल पवित्र आत्मा के कार्य के द्वारा मनुष्य के लिए यह संभव है कि उसके पास छुटकारे की विशेषताएँ हों। सच्चाई तो यह है, मनुष्य परमेश्वर की सारी सृष्टि के क्रम में सबसे छोटा है। यद्यपि वह सब वस्तुओं का स्वामी है, फिर भी उनमें केवल मनुष्य ही है जो शैतान की धोखेबाजी का शिकार है, एकमात्र प्राणी जो उसके दुराचरण के अनगिनत तरीकों का शिकार हो जाता है। मनुष्य की स्वयं पर कभी भी प्रभुता नहीं रही। अधिकांश लोग शैतान के घृणित स्थान में रहते हैं, और उपहास को सहते हैं; इस संसार के हर अन्याय, हर कष्ट को सहते हुए, जब तक वे आधे मर नहीं जाते तब तक वह उन्हें कष्ट देता रहता है। उनके साथ खेलने के बाद, शैतान उनके गंतव्य को ख़त्म कर देता है। और इसलिए लोग अपना पूरा जीवन उलझन में गुज़ार देते हैं, एक बार भी उन अच्छी चीजों का आनंद नहीं ले पाते जो परमेश्वर ने उनके लिए तैयार की हैं, इसकी अपेक्षा शैतान द्वारा नष्ट किए जाते और चिथड़ो में छोड़ दिए जाते हैं। आज वे इतने उदासीन और निरुत्साहित हो गए हैं कि उनमें परमेश्वर के कार्य पर ध्यान देने की रूचि ही नहीं है। यदि लोगों में परमेश्वर के कार्य पर ध्यान देने की रूचि नहीं है, तो उनका अनुभव हमेशा विभाजित और अधूरा रहेगा, और उनका प्रवेश हमेशा के लिए एक खाली स्थान रहेगा। परमेश्वर के जगत में आने के हजारों वर्षों के बाद से ऊँचे आदर्शों वाले कितने लोगों को परमेश्वर ने अपने कार्य के लिए कितने ही वर्षों तक इस्तेमाल किया है; परंतु जो उसका कार्य जानते है वे बहुत कम हैं, लगभग न के बराबर हैं। इसी कारण, अनगिनत लोग उसी समय परमेश्वर का विरोध करने लग जाते हैं जब वे उसके कार्य को कर रहे होते हैं क्योंकि, वे उसका कार्य करने की अपेक्षा वास्तव में परमेश्वर द्वारा दिए गए पद में मनुष्य का कार्य करते हैं। क्या इसे कार्य करना कहा जा सकता है? वे कैसे प्रवेश कर सकते हैं? मनुष्यजाति ने परमेश्वर के अनुग्रह को लेकर उसे दफन कर दिया है। इसी कारण, सदियों से जो उसका कार्य रहे हैं उनका प्रवेश कम होता है। वे परमेश्वर के कार्य को जानने के बारे में बात ही नहीं करते, क्योंकि वे परमेश्वर की बुद्धि के विषय में बहुत ही कम समझते हैं। यह कहा जा सकता है, यद्यपि ऐसे कई लोग हैं जो परमेश्वर की सेवा करते है, फिर भी वे इस बात को देखने में असमर्थ रहे हैं कि वह कितना महान है, और इसलिए सब ने स्वयं को परमेश्वर बना लिया है ताकिदूसरे उनकी आराधना करें।

— "वचन देह में प्रकट होता है" में 'कार्य और प्रवेश (1)' से उद्धृत

3. जब कार्य के बारे में बात की जाती है, तो मनुष्य का मानना है कि परमेश्वर के लिए इधर-उधर भागना, सभी जगहों पर प्रचार करना और परमेश्वर के लिए स्वयं को व्यय करना कार्य है। यद्यपि यह विश्वास सही है, किन्तु यह अत्यधिक एक-तरफा है; परमेश्वर इंसान से जो मांगता है वह परमेश्वर के लिए केवल इधर-उधर यात्रा करना ही नहीं है; यह आत्मा के भीतर सेवकाई और आपूर्ति अधिक है। बहुत से भाइयों और बहनों ने इतने वर्षों के अनुभव के बाद भी परमेश्वर के लिए कार्य करने के बारे में कभी नहीं सोचा है, क्योंकि मनुष्य द्वारा कल्पना किया गया कार्य, परमेश्वर के द्वारा मांग किए जाने वाले कार्यों के साथ असंगत है। इसलिए, आदमी को कार्य के मामले में किसी भी तरह की कोई दिलचस्पी नहीं है, और यही निश्चित रूप से कारण है कि क्यों मनुष्य का प्रवेश भी एक तरफा है। तुम सभी लोगों को परमेश्वर के लिए कार्य करके प्रवेश करना शुरू करना चाहिए, ताकि तुम लोग इसके सभी पहलुओं का बेहतर अनुभव कर सको। यही है वह जिसमें तुम लोगों को प्रवेश करना चाहिए। कार्य, परमेश्वर के लिए इधर-उधर भागने को संदर्भित नहीं करता है; यह इस बात को संदर्भित करता है मनुष्य का जीवन और मनुष्य जो जीवन बिताता है वे परमेश्वर के आनंद के लिए हैं या नहीं। कार्य, परमेश्वर के प्रति गवाही देने और मनुष्य के प्रति सेवकाई के लिए मनुष्य द्वारा परमेश्वर के प्रति अपनी विश्वसनीयता और परमेश्वर के बारे में उनके ज्ञान के उपयोग को संदर्भित करता है। यह मनुष्य का उत्तरदायित्व है और वह है जो सभी लोगों को महसूस करना चाहिए। दूसरे शब्दों में, तुम लोगों का प्रवेश तुम लोगों का कार्य है; तुम लोग परमेश्वर के लिए अपने कार्य के दौरान प्रवेश करने का प्रयास कर रहे हो। परमेश्वर के कार्य का अनुभव करने का मात्र यह अर्थ नहीं है कि तुम जानते हो कि उसके वचन को कैसे खाएँ और पीएँ; बल्कि इससे भी महत्वपूर्ण है कि तुम लोगों को परमेश्वर की गवाही देने, परमेश्वर की सेवा करने, और मनुष्य की सेवकाई और आपूर्ति करने में सक्षम अवश्य होना चाहिए। यह कार्य है, और तुम लोगों का प्रवेश भी है; इसे ही हर व्यक्ति को निष्पादित करना चाहिए। ऐसे कई लोग हैं जो केवल परमेश्वर के लिए इधर-उधर यात्रा करने, और सभी जगहों पर उपदेश देने पर ध्यान केंद्रित करते हैं, फिर भी अपने व्यक्तिगत अनुभव को अनदेखा करते हैं और आध्यात्मिक जीवन में अपने प्रवेश की उपेक्षा करते हैं। यही कारण है कि परमेश्वर की सेवा करने वाले लोग परमेश्वर का विरोध करने वाले बन जाते हैं। कई वर्षों से, जो लोग परमेश्वर की सेवा करते हैं और मनुष्य की सेवकाई करते हैं, उन्होंने कार्य करने और उपदेश देने को प्रवेश के रूप में माना है, और किसी ने भी अपने स्वयं के अनुभव को महत्वपूर्ण प्रविष्टि के रूप में नहीं लिया है। बल्कि, वे दूसरों को सिखाने के लिए पवित्र आत्मा के कार्य की प्रबुद्धता का लाभ उठाते हैं। उपदेश देते समय, उन पर बहुत जिम्मेदारी होती है और वे पवित्र आत्मा का कार्य प्राप्त करते हैं, और इसके माध्यम से वे पवित्र आत्मा की वाणी निकालते हैं। उस समय, जो लोग कार्य करते हैं, वे आत्मतुष्टि से पूर्ण और आत्म-संतुष्ट महसूस करते हैं, मानो कि पवित्र आत्मा का कार्य उनका स्वयं का आध्यात्मिक अनुभव है; उन्हें लगता है कि उस समय के दौरान उनके द्वारा बोले गए सभी वचन उनके स्वयं के हैं, और यह भी कि मानो उनका स्वयं का अनुभव उतना स्पष्ट नहीं है जितना उन्होंने वर्णन किया है। इसके अतिरिक्त, बोलने से पहले उन्हें आभास भी नहीं होता है कि क्या कहना है, किन्तु जब पवित्र आत्मा उन पर कार्य करता है, तो उनके पास वचनों का अनवरत और सतत प्रवाह होता है। इस तरह तुम्हारे एक बार उपदेश करने के बाद, तुम्हें लगता है कि तुम्हारी वास्तविक कद-काठी उतनी छोटी नहीं है जितनी तुम मानते थे। पवित्र आत्मा द्वारा तुम्हारे भीतर कई बार इसी तरह से कार्य करने के बाद, तुम तब यह निर्धारित करते हो कि तुम्हारे पास पहले से ही कद-काठी है और ग़लती से मानते हो कि पवित्र आत्मा का कार्य तुम्हारा स्वयं का प्रवेशऔर अस्तित्व है। जब तुम्हें लगातार यह अनुभव होता है, तो तुम अपने स्वयं के प्रवेश के बारे में सुस्त हो जाते हो। तब तुम बिना ध्यान दिए आलसी हो जाते हो, और अपने स्वयं के प्रवेश को कोई भी महत्व बिल्कुल नहीं देते हो। इसलिए, जब तुम दूसरों की सेवकाई कर रहे हो, तो तुम्हें अपनी कद-काठी और पवित्र आत्मा के कार्य के बीच स्पष्ट रूप से अंतर अवश्य करना चाहिए। इससे तुम्हारा प्रवेश बेहतर रूप से सुगम होगा और तुम्हारे अनुभव को बेहतर लाभ होगा। मनुष्य का पवित्र आत्मा के कार्य को अपने स्वयं के अनुभव के रूप में समझना मनुष्य के अधःपतन काआरंभ है। इसलिए, तुम लोग जो भी कर्तव्य करते हो, उसे तुम लोगों को अपने प्रवेश के एक मुख्य सबक के रूप में समझना चाहिए।

— "वचन देह में प्रकट होता है" में 'कार्य और प्रवेश (2)' से उद्धृत

4. एक व्यक्ति परमेश्वर की इच्छा को पूरा करने, परमेश्वर की पसंद के सभी लोगों को उसके सामने लाने, और पवित्र आत्मा के कार्य और परमेश्वर के मार्गदर्शन से मनुष्य को परिचित कराने के लिए कार्य करता है, जिससे परमेश्वर के कार्य के परिणामों को पूर्ण करता है। इस कारण से, यह अनिवार्य है कि तुम लोग कार्य करने के सार को समझो। परमेश्वर द्वारा उपयोग किए गए किसी व्यक्ति के रूप में, सभी पुरुष परमेश्वर के लिए कार्य करने के योग्य हैं, अर्थात्, सभी के पास पवित्र आत्मा द्वारा उपयोग किए जाने का अवसर है। हालाँकि, इसमें एक बात है जिसका तुम लोगों को अवश्य एहसास होना चाहिए: जब मनुष्य परमेश्वर द्वारा आदेशित कार्य करता है, तो मनुष्य को परमेश्वर द्वारा उपयोग किए जाने का अवसर दिया गया है, किन्तु मनुष्य के द्वारा जो कहा और जाना जाता है वह पूर्णतः मनुष्य की कद-काठी नहीं है। तुम लोगों को केवल अपने कार्य में ही अपनी कमियों के बारे में बेहतर ज्ञात हो सकता है, और पवित्र आत्मा से अधिक प्रबुद्धता प्राप्त कर सकते हो, जो तुम लोगों को अपने कार्य में बेहतर प्रवेश प्राप्त करने देगा। यदि मनुष्य परमेश्वर से मार्गदर्शन को मनुष्य का स्वयं का प्रवेश और मनुष्य के अंदर अंतर्निहित बातें समझता है, तो मनुष्य की कद-काठी के विकसित होने की कोई संभावना नहीं है। जब मनुष्य एक सामान्य स्थिति में होता है, तो पवित्र आत्मा उसे प्रबुद्ध करता है; ऐसे समयों पर, मनुष्य प्रायः उसे प्राप्त होने वाली प्रबुद्धता को वास्तव में अपनी स्वयं की कद-काठी के रूप मानने की ग़लती करता है, क्योंकि पवित्र आत्मा अत्यंत सामान्य तरीके से प्रबुद्ध करता है: मनुष्य के भीतर जो अंतर्निहित है उसका उपयोग करके। जब मनुष्य कार्य करता और बोलता है, या अपनी आध्यात्मिक भक्ति में मनुष्य की प्रार्थना के दौरान, एक सच्चाई उसे अचानक स्पष्ट हो जाएगी। वास्तव में, हालाँकि, मनुष्य जो देखता है वह केवल पवित्र आत्मा द्वारा प्रबुद्धता है (प्राकृतिक रूप से, यह मनुष्य से सहयोग से संबंधित है) और मनुष्य की सच्ची कद-काठी नहीं है। अनुभव की अवधि के बाद जिसमें मनुष्य कुछ कठिनाइयों और परीक्षणों का सामना करता है, ऐसी परिस्थितियों में मनुष्य की वास्तविक कद-काठी स्पष्ट होती है। केवल उस समय ही मनुष्य को पता चलता है कि मनुष्य की कद-काठी बहुत बड़ी नहीं है, और मनुष्य के स्वार्थ, व्यक्तिगत विचार और लालच सभी उभर जाते हैं। केवल इस तरह के अनुभव के कई चक्रों के बाद ही कई ऐसे लोग जो अपनी आत्माओं के भीतर जाग गए हैं, वे महसूस करते हैं कि अतीत में यह उनकी वास्तविकता नहीं थी, बल्कि पवित्र आत्मा से एक क्षणिक रोशनी थी, और मनुष्य को केवल रोशनी प्राप्त हुई थी। जब पवित्र आत्मा मनुष्य को सच्चाई समझने के लिए प्रबुद्ध करता है, तो ऐसा प्रायः, यह समझाए बिना कि चीज़ें कैसे घटित हुई हैं या वे कहाँ जा रही हैं, स्पष्ट और विशिष्ट तरीके से होता है। अर्थात्, वह इस प्रकाशन में मनुष्य की कठिनाइयों को शामिल नहीं करता है, और बल्कि सीधे ही सत्य को प्रकट करता है। जब मनुष्य प्रवेश में कठिनाइयों का सामना करता है, तो मनुष्य पवित्र आत्मा द्वारा प्रबुद्धता को शामिल करता है, और यह मनुष्य का वास्तविक अनुभव बन जाता है। ... इसलिए, जब तुम लोग पवित्र आत्मा का कार्य प्राप्त करते हो, तो, यह देखते हुए कि वास्तव में पवित्र आत्मा का कार्य क्या है और तुम लोगों का प्रवेश क्या है, और साथ ही अपने प्रवेश में पवित्र आत्मा के कार्य को शामिल करते हुए, तुम लोगों को उसके साथ-साथ अपने प्रवेश पर और अधिक ध्यान देना चाहिए, ताकि तुम लोग उसके द्वारा बेहतर ढंग से पूर्ण बनाए जा सको और पवित्र आत्मा के कार्य के सार को तुम लोगों में गढ़े जाने दे सको। पवित्र आत्मा के कार्य के अपने अनुभव के दौरान, तुम लोग पवित्र आत्मा और साथ ही स्वयं के बारे में जान जाते हो, और अत्यधिक दुःखों के अनगिनत उदाहरणों के बीच, तुम लोग परमेश्वर के साथ एक सामान्य संबंध विकसित करते हो, और तुम लोगों और परमेश्वर के बीच संबंध दिन पर दिन घनिष्ठ होता जाता है। शुद्धिकरण और काट-छाँट के असंख्य उदाहरणों के बाद, तुम लोगों में परमेश्वर के प्रति एक सच्चा प्यार विकसित होता है। यही कारण है कि तुम लोगों को यह एहसास अवश्य होना चाहिए कि कष्ट, दण्ड, और क्लेश हतोस्ताही नहीं हैं; केवल पवित्र आत्मा का कार्य प्राप्त करना किन्तु तुम लोगों का प्रवेश प्राप्त नहीं करना भयावह है। जब दिन आएगा कि परमेश्वर का कार्य पूरा हो जाएगा, तो तुम लोगों ने व्यर्थ के लिए परिश्रम किया होगा; यद्यपि तुम लोगों ने परमेश्वर के कार्य का अनुभव कर लिया होगा, किन्तु तुम लोग पवित्र आत्मा को नहीं जान पाए होगे या तुम लोगों की स्वयं की प्रविष्टि नहीं हुई होगी। पवित्र आत्मा द्वारा मनुष्य की प्रबुद्धता मनुष्य के जुनून को बनाए रखने के लिए नहीं है; यह मनुष्य के प्रवेश के लिए एक रास्ता खोलने के लिए है, और साथ ही मनुष्य को पवित्र आत्मा को जानने देने के लिए, और उस से परमेश्वर के लिए श्रद्धा और आराधना का हृदय विकसित करने के लिए है।

— "वचन देह में प्रकट होता है" में 'कार्य और प्रवेश (2)' से उद्धृत

5. परमेश्वर ने मनुष्यों को बहुत-कुछ सौंपा है और अनगिनत प्रकार से उनके प्रवेश के बारे में भी संबोधित किया है। परंतु चूँकि लोगों की क्षमता बहुत ख़राब है, इसलिए परमेश्वर के बहुत सारे वचन जड़ पकड़ने में असफल रहे हैं। इस ख़राब क्षमता के विभिन्न कारण हैं, जैसे कि मनुष्य के विचार और नैतिकता का भ्रष्ट होना, और उचित पालन-पोषण की कमी; सामंती अंधविश्वास, जिन्होंने मनुष्य के हृदय को बुरी तरह से जकड़ लिया है; दूषित और पतनशील जीवन-शैलियाँ, जिन्होंने मनुष्य के हृदय के गहनतम कोनों में कई बुराइयाँ स्थापित कर दी हैं; सांस्कृतिक ज्ञान की सतही समझ, लगभग अठानवे प्रतिशत लोगों में सांस्कृतिक ज्ञान की शिक्षा की कमी है और इतना ही नहीं, बहुत कम लोग उच्च स्तर की सांस्कृतिक शिक्षा प्राप्त करते हैं। इसलिए, मूल रूप से लोगों को पता नहीं है कि परमेश्वर या पवित्रात्मा का क्या अर्थ है, उनके पास परमेश्वर की सामंती अंधविश्वासों से प्राप्त केवल एक धुँधली और अस्पष्ट तसवीर है। वे घातक प्रभाव, जो हज़ारों वर्षो की "राष्ट्रवाद की बुलंद भावना" ने मनुष्य के हृदय में गहरे छोड़े हैं, और साथ ही सामंती सोच, जिसके द्वारा लोग बिना किसी स्वतंत्रता के, बिना महत्वाकांक्षा या आगे बढ़ने की इच्छा के, बिना प्रगति की अभिलाषा के, बल्कि निष्क्रिय और प्रतिगामी रहने और गुलाम मानसिकता से घिरे होने के कारण बँधे और जकड़े हुए हैं, इत्यादि—इन वस्तुगत कारकों ने मनुष्यजाति के वैचारिक दृष्टिकोण, आदर्शों, नैतिकता और स्वभाव पर अमिट रूप से गंदा और भद्दा प्रभाव छोड़ा है। ऐसा प्रतीत होता है, जैसे मनुष्य आतंक की अँधेरी दुनिया में जी रहे हैं, और उनमें से कोई भी इस दुनिया के पार नहीं जाना चाहता, और उनमें से कोई भी किसी आदर्श दुनिया में जाने के बारे में नहीं सोचता; बल्कि, वे अपने जीवन की सामान्य स्थिति से संतुष्ट हैं, बच्चे पैदा करने और पालने-पोसने, उद्यम करने, पसीना बहाने, अपना रोजमर्रा का काम करने; एक आरामदायक और खुशहाल परिवार के सपने देखने, और दांपत्य प्रेम, नाती-पोतों, अपने अंतिम समय में आनंद के सपने देखने में दिन बिताते हैं और शांति से जीवन जीते हैं...। सैकड़ों-हजारों साल से अब तक लोग इसी तरह से अपना समय व्यर्थ गँवा रहे हैं, कोई पूर्ण जीवन का सृजन नहीं करता, सभी इस अँधेरी दुनिया में केवल एक-दूसरे की हत्या करने के लिए तत्पर हैं, प्रतिष्ठा और संपत्ति की दौड़ में और एक-दूसरे के प्रति षड्यंत्र करने में संलग्न हैं। किसने कब परमेश्वर की इच्छा जानने की कोशिश की है? क्या किसी ने कभी परमेश्वर के कार्य पर ध्यान दिया है? एक लंबे अरसे से मानवता के सभी अंगों पर अंधकार के प्रभाव ने कब्ज़ा जमा लिया है और वही मानव-स्वभाव बन गए हैं, और इसलिए परमेश्वर के कार्य को करना काफी कठिन हो गया है, यहाँ तक कि जो परमेश्वर ने लोगों को आज सौंपा है, उस पर वे ध्यान भी देना नहीं चाहते।

— "वचन देह में प्रकट होता है" में 'कार्य और प्रवेश (3)' से उद्धृत

6. मनुष्य के प्रवेश करने के समय के दौरान जीवन सदा उबाऊ होता है, आध्यात्मिक जीवन के नीरस तत्त्वों से भरा, जैसे कि प्रार्थना करना, परमेश्वर के वचनों को खाना और पीना या सभाएँ आयोजित करना, इसलिए लोगों को हमेशा यह लगता है कि परमेश्वर पर विश्वास करने में कोई आनंद नहीं आता। ऐसी आध्यात्मिक क्रियाएँ हमेशा मनुष्यजाति के मूल स्वभाव के आधार पर की जाती हैं, जिसे शैतान द्वारा भ्रष्ट किया जा चुका है। यद्यपि कभी-कभी लोगों को पवित्र आत्मा का प्रबोधन प्राप्त हो सकता है, परंतु उनकी मूल सोच, स्वभाव, जीवन-शैली और आदतें अभी भी उनके भीतर जड़ पकड़े हुए हैं, और इसलिए उनका स्वभाव अपरिवर्तित रहता है। जिन अंधविश्वासी गतिविधियों में लोग संलग्न रहते हैं, परमेश्वर उनसे सबसे ज्यादा घृणा करता है, परंतु बहुत-से लोग अभी भी यह सोचकर उन्हें त्यागने में असमर्थ हैं कि अंधविश्वास की इन गतिविधियों की आज्ञा परमेश्वर द्वारा दी गई है, और आज भी उन्हें पूरी तरह से त्यागा जाना बाकी है। ऐसी चीज़ें, जैसे कि युवा लोगों द्वारा विवाह के भोज और दुल्हन के साज-सामान का प्रबंध; नकद उपहार, प्रीतिभोज, और ऐसे ही अन्य तरीके, जिनसे आनंद के अवसर मनाए जाते हैं; प्राचीन फार्मूले, जो पूर्वजों से मिले हैं; अंधविश्वास की वे सारी गतिविधियाँ, जो मृतकों तथा उनके अंतिम संस्कार के लिए की जाती हैं : ये परमेश्वर के लिए और भी ज्यादा घृणास्पद हैं। यहाँ तक कि आराधना का दिन (धार्मिक जगत द्वारा मनाए जाने वाले सब्त समेत) भी उसके लिए घृणास्पद है; और मनुष्यों के बीच के सामाजिक संबंध और सांसारिक अंत:क्रियाएँ, सब परमेश्वर द्वारा तुच्छ समझे जाते और अस्वीकार किए जाते हैं। यहाँ तक कि वसंतोत्सव और क्रिसमस भी, जिनके बारे में सब जानते हैं, परमेश्वर की आज्ञा से नहीं मनाए जाते, इन त्योहारों की छुट्टियों के लिए खिलौनों और सजावट, जैसे कि गीत, पटाखे, लालटेनें, पवित्र समागम, क्रिसमस के उपहार और क्रिसमस के उत्सव, और परम समागम की तो बात ही छोड़ो—क्या वे मनुष्यों के मन की मूर्तियाँ नहीं हैं? सब्त के दिन रोटी तोड़ना, शराब और बढ़िया लिनन और भी अधिक प्रभावी मूर्तियाँ हैं। चीन में लोकप्रिय सभी पारंपरिक पर्व-दिवस, जैसे ड्रैगन के सिर उठाने का दिन, ड्रैगन नौका महोत्सव, मध्य-शरद महोत्सव, लाबा महोत्सव और नव वर्ष उत्सव, और धार्मिक जगत के त्योहार जैसे ईस्टर, बपतिस्मा दिवस और क्रिसमस, ये सभी अनुचित त्योहार प्राचीन काल से बहुत लोगों द्वारा मनाए जा रहे हैं और आगे सौंपे जाते रहे हैं। यह मनुष्यजाति की समृद्ध कल्पना और प्रवीण धारणा ही है, जिसने उन्हें तब से लेकर आज तक आगे बढ़ाया है। ये निर्दोष प्रतीत होते हैं, परंतु वास्तव में ये शैतान द्वारा मनुष्यजाति के साथ खेली जाने वाली चालें हैं। जो स्थान शैतानों से जितना ज्यादा भरा होगा, और जितना वह पुराने ढंग का और पिछड़ा हुआ होगा, उतनी ही गहराई से वह सामंती रीति-रिवाजों से घिरा होगा। ये चीज़ें लोगों को कसकर बाँध देती हैं और उनके हिलने-डुलने की भी गुंजाइश नहीं छोड़तीं। धार्मिक जगत के कई त्योहार बड़ी मौलिकता प्रदर्शित करते हैं और परमेश्वर के कार्य के लिए एक सेतु का निर्माण करते प्रतीत होते हैं; किंतु वास्तव में वे शैतान के अदृश्य बंधन हैं, जिनसे वह लोगों को बाँध देता है और परमेश्वर को जानने से रोक देता है—वे सब शैतान की धूर्त चालें हैं। वास्तव में, जब परमेश्वर के कार्य का एक चरण समाप्त हो जाता है, तो वह उस समय के साधन और शैली नष्ट कर चुका होता है और उनका कोई निशान नहीं छोड़ता। परंतु "सच्चे विश्वासी" उन मूर्त भौतिक वस्तुओं की आराधना करना जारी रखते हैं; इस बीच वे परमेश्वर की सत्ता को अपने मस्तिष्क के पिछले हिस्से में खिसका देते हैं और उसके बारे में आगे कोई अध्ययन नहीं करते, और यह समझते हैं कि वे परमेश्वर के प्रति प्रेम से भरे हुए हैं, जबकि वास्तव में वे उसे बहुत पहले ही घर के बाहर धकेल चुके होते हैं और शैतान को आराधना के लिए मेज पर रख चुके होते हैं। यीशु, क्रूस, मरियम, यीशु का बपतिस्मा, अंतिम भोज के चित्र—लोग इन्हें स्वर्ग के प्रभु के रूप में आदर देते हैं, जबकि पूरे समय बार-बार "प्रभु,स्वर्गिक पिता" पुकारते हैं। क्या यह सब मज़ाक नहीं है? आज तक पूर्वजों द्वारा मनुष्यजाति को सौंपी गई ऐसी कई बातों और प्रथाओं से परमेश्वर को घृणा है; वे गंभीरता से परमेश्वर के लिए आगे के मार्ग में बाधा डालती हैं और, इतना ही नहीं, वे मनुष्यजाति के प्रवेश में भारी अड़चन पैदा करती हैं। यह बात तो रही एक तरफ कि शैतान ने मनुष्यजाति को किस सीमा तक भ्रष्ट किया है, लोगों के अंतर्मन विटनेस ली के नियम, लॉरेंस के अनुभवों, वॉचमैन नी के सर्वेक्षणों और पौलुस के कार्य जैसी चीज़ों से पूर्णतः भरे हुए हैं। परमेश्वर के पास मनुष्यों पर कार्य करने के लिए कोई मार्ग ही नहीं है, क्योंकि उनके भीतर व्यक्तिवाद, विधियाँ, नियम, विनियम, प्रणालियाँ और ऐसी ही अनेक चीज़ें बहुत ज्यादा भरी पड़ी हैं; लोगों के सामंती अंधविश्वास की प्रवृत्तियों के अतिरिक्त इन चीज़ों ने मनुष्यजाति को बंदी बनाकर उसे निगल लिया है। यह ऐसा है, मानो लोगों के विचार एक रोचक चलचित्र हों, जो बादलों की सवारी करने वाले विलक्षण प्राणियों के साथ पूरे रंग में एक परि-कथा का वर्णन कर रहा है, जो इतना कल्पनाशील है कि लोगों को विस्मित कर देता है और उन्हें चकित और अवाक छोड़ देता है। सच कहा जाए, तो आज परमेश्वर जो काम करने के लिए आया है, वह मुख्यतः मनुष्यों के अंधविश्वासी लक्षणों से निपटना और उन्हें दूर करना तथा उनके मानसिक दृष्टिकोण पूर्ण रूप से रूपांतरित करना है। परमेश्वर का कार्य उस विरासत के कारण आज तक पूरा नहीं हुआ है, जो मनुष्यजाति द्वारा पीढ़ी-दर-पीढ़ी आगे सौंपा गया है; यह वह कार्य है, जो किसी महान आध्यात्मिक व्यक्ति की धरोहर को आगे बढ़ाने, या परमेश्वर द्वारा किसी अन्य युग में किए गए किसी प्रतिनिधि प्रकृति के कार्य को विरासत में प्राप्त करने की आवश्यकता के बिना उसके द्वारा व्यक्तिगत रूप से आरंभ और पूर्ण किया गया है। मनुष्यों को इनमें से किसी चीज़ की चिंता करने की आवश्यकता नहीं है। आज परमेश्वर के बोलने और कार्य करने की भिन्न शैली है, फिर मनुष्यों को कष्ट उठाने की क्या आवश्यकता है? यदि मनुष्य अपने "पूर्वजों" की विरासत को जारी रखते हुए वर्तमान धारा के अंतर्गत आज के मार्ग पर चलते हैं, तो वे अपने गंतव्य तक नहीं पहुँच पाएँगे। परमेश्वर मानव-व्यवहार के इस विशेष ढंग से बहुत घृणा करता है, वैसे ही जैसे वह मानव-जगत के वर्षों, महीनों और दिनों से घृणा करता है।

— "वचन देह में प्रकट होता है" में 'कार्य और प्रवेश (3)' से उद्धृत

7. मनुष्य के स्वभाव को बदलने का सबसे अच्छा तरीका लोगों के अंतर्मन के उन हिस्सों को ठीक करना है, जिन्हें गहराई से विषैला कर दिया गया है, ताकि लोग अपनी सोच और नैतिकता को बदल सकें। सबसे पहले, लोगों को स्पष्ट रूप से यह देखने की ज़रूरत है कि परमेश्वर के लिए धार्मिक संस्कार, धार्मिक गतिविधियाँ, वर्ष और महीने, और त्योहार घृणास्पद हैं। उन्हें सामंती विचारधारा के इन बंधनों से मुक्त होना चाहिए और अंधविश्वास की गहरी जमी बैठी प्रवृत्ति के हर निशान को जड़ से उखाड़ देना चाहिए। ये सब मनुष्यजाति के प्रवेश में सम्मिलित हैं। तुम लोगों को यह समझना चाहिए कि क्यों परमेश्वर मनुष्यजाति को सांसारिक जगत से बाहर ले जाता है, और फिर क्यों वह मनुष्यजाति को नियमों और विनियमों से दूर ले जाता है। यही वह द्वार है, जिससे तुम लोग प्रवेश करोगे, और यद्यपि इन चीज़ों का तुम्हारे आध्यात्मिक अनुभव के साथ कोई संबंध नहीं है, फिर भी ये तुम लोगों का प्रवेश और परमेश्वर को जानने का मार्ग अवरुद्ध करने वाली सबसे बड़ी अड़चनें हैं। वे एक जाल बुनती हैं, जो लोगों को फँसा लेता हैं। कई लोग बाइबल को बहुत अधिक पढ़ते हैं, यहाँ तक कि अपनी स्मृति से बाइबिल के अनेक अंश सुना भी सकते हैं। आज अपने प्रवेश में लोग परमेश्वर के कार्य को मापने के लिए अनजाने में बाइबल का प्रयोग करते हैं, मानो परमेश्वर के कार्य में इस चरण का आधार बाइबल हो और उसका स्रोत भी बाइबल हो। जब परमेश्वर का कार्य बाइबल के अनुरूप होता है, तब लोग परमेश्वर के कार्य का दृढ़ता से समर्थन करते हैं और नई श्रद्धा के साथ उसका आदर करते हैं; जब परमेश्वर का कार्य बाइबल के अनुरूप नहीं होता, तब लोग इतने व्याकुल हो जाते हैं कि बाइबल में परमेश्वर के कार्य का आधार खोजते-खोजते उनके पसीने छूटने लगते हैं; यदि बाइबल में परमेश्वर के कार्य का कोई उल्लेख न मिले, तो लोग परमेश्वर को अनदेखा कर देंगे। यह कहा जा सकता है कि जहाँ तक परमेश्वर के आज के कार्य का संबंध है, ज्यादातर लोग उसे बहुत सतर्कतापूर्वक स्वीकार करते हैं, उसका चयनात्मक रूप से पालन करते हैं, और उसे जानने के बारे में उदासीन अनुभव करते हैं; जहाँ तक अतीत की बातों का प्रश्न है, वे उनके आधे भाग को पकड़े रहते हैं और बाकी आधे को त्याग देते हैं। क्या इसे प्रवेश कहा जा सकता है? दूसरों की पुस्तकें किसी खज़ाने की तरह थामकर और उन्हें स्वर्ग के द्वार की सुनहरी कुंजी समझकर लोग साफ़-साफ़ उस चीज़ में रुचि नहीं दर्शाते, जो परमेश्वर आज उनसे चाहता है। इतना ही नहीं, बहुत सारे "बुद्धिमान विशेषज्ञ" परमेश्वर के वचन अपने बाएँ हाथ में और दूसरों की "उत्कृष्ट कृतियाँ" अपने दाएँ हाथ में रखते हैं, मानो वे परमेश्वर के आज के वचनों का आधार इन उत्कृष्ट कृतियों में खोजना चाहते हों, ताकि पूर्ण रूप से यह सिद्ध कर सकें कि परमेश्वर के वचन सही हैं, यहाँ तक कि वे दूसरों के सामने परमेश्वर के वचनों की व्याख्या उत्कृष्ट कृतियों के साथ जोड़कर करते हैं, मानो बड़ा भारी काम कर रहे हों। सच कहा जाए, तो मनुष्यजाति में ऐसे बहुत सारे "वैज्ञानिक शोधकर्ता" हैं, जिन्होंने आज की वैज्ञानिक उपलब्धियों को कभी अधिक महत्व नहीं दिया, ऐसी वैज्ञानिक उपलब्धियों को, जिनकी कोई मिसाल नहीं है (अर्थात् परमेश्वर का कार्य, परमेश्वर के वचन, और जीवन में प्रवेश का मार्ग), इसलिए लोग पूरी तरह से "आत्मनिर्भर" हैं, अपनी वाक्पटुता के बल पर बड़े और व्यापक "उपदेश" देते हैं और "परमेश्वर के अच्छे नाम" पर अकड़ते हैं। इस बीच, उनका स्वयं का प्रवेश संकट में होता है और वे परमेश्वर की अपेक्षाओं से उतनी ही दूर दिखते हैं, जितनी दूर इस क्षण सृष्टि दिखती है। कितना सरल है परमेश्वर का कार्य करना? ऐसा प्रतीत होता है कि लोगों ने पहले ही स्वयं को आधा बीते हुए कल में छोड़ देने और आधा आज में लाने, आधा शैतान को सौंपने और आधा परमेश्वर को प्रस्तुत करने का मन बना लिया है, मानो यही अपने अंत:करण को शांत करने तथा कुछ सुख की भावना अनुभव करने का मार्ग हो। लोगों की भीतरी दुनिया इतनी कपट से भरी है कि वे न सिर्फ आने वाले कल को, बल्कि बीते हुए कल को भी खोने से डरते हैं, वे आज शैतान और परमेश्वर, जो लगता है कि है भी और नहीं भी, दोनों को अप्रसन्न करने से गहराई से डरते हैं। चूँकि लोग अपनी सोच और नैतिकता को सही तरीके से विकसित करने में विफल रहे हैं, इसलिए उनमें विवेक की विशेष कमी है, और वे यह बता ही नहीं सकते कि आज का कार्य परमेश्वर का कार्य है या नहीं है। शायद ऐसा इसलिए है, क्योंकि लोगों की सामंती और अंधविश्वासी सोच इतनी गहरी है कि उन्होंने बहुत पहले ही अंधविश्वास और सत्य, परमेश्वर और मूर्तियों में अंतर की परवाह न करते हुए उन्हें एक ही श्रेणी में रख दिया है और अपने दिमाग़ पर जोर देने के बावजूद वे उनमें स्पष्ट रूप से अंतर करने में असमर्थ प्रतीत होते हैं। इसलिए मनुष्य अपने मार्ग पर ठहर गए हैं और अब और आगे नहीं बढ़ते। यह सब समस्याएँ लोगों में सही वैचारिक शिक्षा की कमी के कारण उत्पन्न होती है, जो उनके प्रवेश में बहुत कठिनाइयाँ उत्पन्न करती है। परिणामस्वरूप, लोग सच्चे परमेश्वर के कार्य में कोई रुचि महसूस नहीं करते, बल्कि मनुष्य के (जैसे कि उनके, जिन्हें वे महापुरुष समझते हैं) कार्य से दृढ़ता से चिपके[1] रहते हैं, जैसे कि उन पर उसकी मुहर लग गई हो। क्या ये नवीनतम विषय नहीं हैं, जिनमें मनुष्यजाति को प्रवेश करना चाहिए?

— "वचन देह में प्रकट होता है" में 'कार्य और प्रवेश (3)' से उद्धृत

8. परमेश्वर चीन की मुख्य भूमि में देहधारण किया है, जिसे हांगकांग और ताइवान में हमवतन के लोग अंतर्देशीय कहते हैं। जब परमेश्वर ऊपर से पृथ्वी पर आया, तो स्वर्ग और पृथ्वी में कोई भी इसके बारे में नहीं जानता था, क्योंकि यही परमेश्वर का एक गुप्त अवस्था में लौटने का वास्तविक अर्थ है। वह लंबे समय तक देह में कार्य करता और रहता रहा है, फिर भी इसके बारे में कोई भी नहीं जानता है। आज के दिन तक भी, कोई इसे पहचानता नहीं है। शायद यह एक शाश्वत पहेली रहेगा। इस बार परमेश्वर का देह में आना कुछ ऐसा नहीं है जिसके बारे कोई भी जानने में सक्षम नहीं है। इस बात की परवाह किए बिना कि पवित्रात्मा का कार्य कितने बड़े-पैमाने का और कितना शक्तिशाली है, परमेश्वर हमेशा शांतचित्त बना रहता है, कभी भी स्वयं का भेद नहीं खोलता है। कोई कह सकता है कि यह ऐसा है मानो कि उसके कार्य का यह चरण स्वर्ग के क्षेत्र में हो रहा है। यद्यपि यह हर एक के लिए बिल्कुल स्पष्ट है, किन्तु कोई भी इसे पहचानता नहीं है। जब परमेश्वर अपने कार्य के इस चरण को समाप्त कर लेगा, तो हर कोई अपने लंबे सपने से जाग जाएगा और अपनी पिछली प्रवृत्ति को उलट देगा।[2] मुझे परमेश्वर का एक बार यह कहना याद है, "इस बार देह में आना शेर की माँद में गिरने जैसा है।" इसका अर्थ यह है कि क्योंकि परमेश्वर के कार्य के इस चक्र में परमेश्वर देह में आता है और इसके अलावा बड़े लाल अजगर के निवास स्थान में पैदा होता है, यहाँ तक कि इस बार धरती पर आ कर वह पहले से भी अधिकचरम ख़तरे का सामना करता है। जिनका वह सामना करता है वे हैं चाकू और बंदूकें और लाठियाँ; जिसका वह सामना करता है वह है प्रलोभन; जिसका वह सामना करता है वह हत्यारी दिखाई देने वाली भीड़। वह किसी भी समय मारे जाने का जोख़िम लेता है। परमेश्वर कोप के साथ आया। हालाँकि, वह पूर्णता का कार्य करने के लिए आया, जिसका अर्थ है कि कार्य का दूसरा भाग करने के लिए जो छुटकारे के कार्य के बाद जारी रहता है। अपने कार्य के इस चरण के वास्ते, परमेश्वर ने अत्यंत विचार और ध्यान समर्पित किया है और, स्वयं को विनम्रतापूर्वक छिपाते हुए और अपनी पहचान का कभी भी घमण्ड नहीं करते हुए, प्रलोभन के हमले से बचने के लिए हर कल्पनीय साधन का उपयोग कर रहा है। सलीब से आदमी को बचाने में, यीशु केवल छुटकारे का कार्य पूरा कर रहा था; वह पूर्णता का कार्य नहीं कर रहा था। इस प्रकार परमेश्वर का केवल आधा कार्य ही किया जा रहा था, परिष्करण और छुटकारे का कार्य उसकी संपूर्ण योजना का केवल आधा ही था। चूँकि नया युग शुरू होने ही वाला था और पुराना युग पीछे हटने ही वाला था, इसलिए परमपिता परमेश्वर ने अपने कार्य के दूसरे हिस्से पर विवेचन करना शुरू किया और इसके लिए तैयारी करनी शुरू कर दी। अतीत में, अंत के दिनों में इस देहधारण की भविष्यवाणी स्पष्ट रूप से नहीं की गई थी, और इस तरह उसने इस बार परमेश्वर के देह में आने के आस-पास बढ़ी हुई गोपनीयता की नींव रखी। उषाकाल में, किसी को भी बताए बिना, परमेश्वर पृथ्वी पर आया और देह में अपना जीवन शुरू किया। लोग इस क्षण से अनभिज्ञ थे। कदाचित वे सब घोर निद्रा में थे, कदाचित बहुत से लोग जो सतर्कतापूर्वक जागे हुए थे वे प्रतीक्षा कर रहे थे, और कदाचित कई लोग स्वर्ग के परमेश्वर से चुपचाप प्रार्थना कर रहे थे। फिर भी इन सभी कई लोगों के बीच, कोई नहीं जानता था कि परमेश्वर पहले से ही पृथ्वी पर आ चुका है। परमेश्वर ने अपने कार्य को अधिक सुचारू रूप से पूरा करने और बेहतर परिणामों को प्राप्त करने के लिए इस तरह से कार्य किया, और यह अधिक प्रलोभनों से बचने के लिए भी था। जब मनुष्य की वसंत की नींद टूटेगी, तब तक परमेश्वर का कार्य बहुत पहले ही समाप्त हो गया होगा और वह पृथ्वी पर भटकने और अस्थायी निवास के अपने जीवन को समाप्त करते हुए चला जाएगा। क्योंकि परमेश्वर का कार्य परमेश्वर से व्यक्तिगत रूप से कार्य करना और बोलना आवश्यक बनाता है, और क्योंकि मनुष्य के लिए हस्तक्षेप करने का कोई रास्ता नहीं है, इसलिए परमेश्वर ने स्वयं कार्य करने हेतु पृथ्वी पर आने के लिए अत्यधिक पीड़ा सही है। मनुष्य परमेश्वर के कार्य का स्थान लेने में समर्थ है। इसलिए परमेश्वर ने पृथ्वी पर अपना स्वयं का कार्य करने, अपनी समस्त सोच और देखरेख को दरिद्र लोगों के इस समूह को छुटकारा दिलाने पर रखने, खाद के ढेर से सने लोगों के इस समूह को छुटकारा दिलाने हेतु, उस स्थान पर आने के लिए जहाँ बड़ा लाल अजगर निवास करता है, अनुग्रह के युग के दौरान के ख़तरों की अपेक्षा कई हजार गुना अधिक ख़तरों का जोखिम लिया है। यद्यपि कोई भी परमेश्वर के अस्तित्व के बारे में नहीं जानता है, तब भी परमेश्वर परेशान नहीं है क्योंकि इससे परमेश्वर के कार्य को काफी लाभ मिलता है। हर कोई नृशंस रूप से बुरा है, इसलिए कोई भी परमेश्वर के अस्तित्व को कैसे बर्दाश्त कर सकता है? यही कारण है कि पृथ्वी पर परमेश्वर हमेशा चुप रहता है। इस बात की परवाह किए बिना कि मनुष्य कितना अधिक क्रूर है, परमेश्वर इसमें से किसी को भी गंभीरता से नहीं लेता है, बल्कि उस कार्य को करता रहता है जिसे करने की उसे आवश्यकता है ताकि उस बड़े कार्यभार को पूरा किया जाए जो स्वर्गिक परमपिता ने उसे दिया। तुम लोगों में से किसने परमेश्वर की मनोरमता को पहचाना है? कौन परमपिता परमेश्वर के लिए उसके पुत्र की तुलना में अधिक महत्व दर्शाता है? कौन परमपिता परमेश्वर की इच्छा को समझने में सक्षम है? स्वर्ग में परमपिता का आत्मा अक्सर परेशान होता है, और पृथ्वी पर उसका पुत्र, उसके हृदय को चिंता से टुकड़े-टुकड़े करते हुए, परमपिता की इच्छा से बारंबार प्रार्थना करता है। क्या कोई है जो परमपिता परमेश्वर के अपने बेटे के लिए प्यार को जानता हो? क्या कोई है जो जानता हो कि कैसे प्यारा पुत्र परमपिता परमेश्वर को कैसे याद करता है? स्वर्ग और पृथ्वी के बीच विदीर्ण हुए, दोनों दूर से एक दूसरे की ओर, पवित्रात्मा में साथ-साथ, लगातार निहार रहे हैं। हे मानवजाति! तुम लोग परमेश्वर के हृदय के बारे में कब विचारशील बनोगे? कब तुम लोग परमेश्वर के अभिप्राय को समझोगे? परमपिता और पुत्र हमेशा एक-दूसरे पर निर्भर रहे हैं। फिर क्यों उन्हें पृथक किया जाना चाहिए, एक ऊपर स्वर्ग में और एक नीचे पृथ्वी पर? परमपिता अपने पुत्र को उतना ही प्यार करता है जितना पुत्र अपने पिता को प्यार करता है। तो फिर उसे इतनी उत्कंठा के साथ और इतने लंबे समय तक इतनी व्यग्रता के साथ प्रतीक्षा क्यों करनी चाहिए? यद्यपि वे लंबे समय से पृथक नहीं हुए हैं, क्या किसी को पता है कि परमपिता पहले से ही इतने दिनों और रातों से उद्वेग से तड़प रहा है और लंबे समय से अपने प्रिय पुत्र की त्वरित वापसी की प्रतीक्षा कर रहा है? वह देखता है, वह मौन में बैठता है, वह प्रतीक्षा करता है। यह सब उनके प्रिय पुत्र की त्वरित वापसी के लिए है। वह कब पुनः पुत्र के साथ होगा जो पृथ्वी पर भटक रहा है? यद्यपि एक बार एक साथ हो जाएँ, तो वे अनंत काल के लिए एक साथ होंगे, किन्तु वह हजारों दिनों और रातों के विरह को कैसे सहन कर सकता है, एक ऊपर स्वर्ग में एक और एक नीचे पृथ्वी पर? पृथ्वी पर दसियों वर्ष स्वर्ग में हजारों वर्षों के जैसे हैं। कैसे परमपिता परमेश्वर चिंता नहीं कर सकता है? जब परमेश्वर पृथ्वी पर आता है, तो वह मानव दुनिया के बहुत से उतार-चढ़ावों का वैसे ही अनुभव करता है जैसे मनुष्य करता है। परमेश्वर स्वयं भोला-भाला है, तो क्यों परमेश्वर वही दर्द सहे जो आदमी सहता है? कोई आश्चर्य नहीं कि परमपिता परमेश्वर अपने पुत्र के लिए इतनी तीव्र इच्छा से तरसता है; कौन परमेश्वर के हृदय को समझ सकता है? परमेश्वर मनुष्य को बहुत अधिक देता है; कैसे मनुष्य परमेश्वर के हृदय को पर्याप्त रूप से चुका सकता है? फिर भी मनुष्य परमेश्वर को बहुत कम देता है; परमेश्वर इसलिए चिंता क्यों नहीं कर सकता है?

— "वचन देह में प्रकट होता है" में 'कार्य और प्रवेश (4)' से उद्धृत

9. पुरुषों के बीच में शायद ही कोई परमेश्वर के हृदय की तीव्र इच्छा को समझता है क्योंकि लोगों की क्षमता बहुत निम्न है और उनकी आत्मा काफी सुस्त है, और क्योंकि वे सभी न तो देखते हैं और न ही ध्यान देते हैं कि परमेश्वर क्या कर रहा है। इसलिए परमेश्वर मनुष्य के बारे में चिंता करता रहता है, मानो कि मनुष्य की पाशविक प्रकृति किसी भी क्षण बाहर आ सकती हो। यह आगे दर्शाता है कि परमेश्वर का पृथ्वी पर आना बड़े प्रलोभनों के साथ-साथ है। किन्तु लोगों के एक समूह को पूरा करने के वास्ते, महिमा से लदे हुए, परमेश्वर ने मनुष्य को अपने हर अभिप्राय के बारे, कुछ भी नहीं छिपाते हुए, बता दिया। उसने लोगों के इस समूह को पूरा करने के लिए दृढ़ता से संकल्प किया है। इसलिए, कठिनाई आए या प्रलोभन, वह नज़र फेर लेता है और इस सभी को अनदेखा करता है। वह केवल चुपचाप अपना स्वयं का कार्य करता है, और दृढ़ता से यह विश्वास करता है कि एक दिन जब परमेश्वर महिमा प्राप्त लेगा, तो आदमी परमेश्वर को जान लेगा, और यह विश्वास करता है कि जब मनुष्य परमेश्वर के द्वारा पूरा कर लिया जाएगा, तो वह परमेश्वर के हृदय को पूरी तरह से समझ जाएगा। अभी ऐसे लोग हो सकते हैं जो परमेश्वर को प्रलोभित कर सकते हैं या परमेश्वर को गलत समझ सकते हैं या परमेश्वर को दोष दे सकते हैं; परमेश्वर उसमें से किसी को भी गंभीरता से नहीं लेता है। जब परमेश्वर महिमा में अवरोहण करेगा, तो सभी लोग समझ जाएँगे कि परमेश्वर जो कुछ भी करता है वह मानव जाति के कल्याण के लिए है, और सभी लोग समझ जाएँगे कि परमेश्वर जो कुछ भी करता है वह इसलिए है ताकि मानव जाति बेहतर ढंग से जीवित रह सके। परमेश्वर का आगमन प्रलोभनों के साथ-साथ है, और परमेश्वर प्रताप और कोप के साथ भी आता है। जब तक परमेश्वर मनुष्यों को छोड़ कर जाएगा, तब तक उसने पहले ही महिमा प्राप्त कर ली होगी, और वह पूरी तरह से महिमा भरा हुआ और वापसी की खुशी के साथ चला जाएगा। इस बात की परवाह किए बिना कि लोग उसे कैसे अस्वीकार करते हैं, पृथ्वी पर कार्य करते हुए परमेश्वर चीजों को गंभीरता से नहीं लेता है। वह केवल अपना कार्य कर रहा है। परमेश्वर का विश्व का सृजन हजारों वर्षों पहले से चल रहा है, वह पृथ्वी पर एक असीमित मात्रा में कार्य करने के लिए आया है, और उसने मानव दुनिया के अस्वीकरण और अपयश का पूरी तरह से अनुभव किया है। कोई भी परमेश्वर के आगमन का स्वागत नहीं करता है; हर कोई मात्र एक भावशून्य नज़र से उसका सम्मान करता है। इन हजारों वर्षों की कठिनाइयों के दौरान, मनुष्य के व्यवहार ने बहुत पहले से ही परमेश्वर के हृदय को चूर-चूर कर दिया है। वह लोगों के विद्रोह पर अब और ध्यान नहीं देता है, बल्कि इसके बजाय मनुष्य को रूपांतरित करने और स्वच्छ बनाने के लिए एक अलग योजना बना रहा है। उपहास, अपयश, उत्पीड़न, दारूण दुःख, सलीब पर चढ़ने की पीड़ा, मनुष्य द्वारा अपवर्जन इत्यादि जिसे परमेश्वर ने देह में अनुभव किया है—परमेश्वर ने इन्हें पर्याप्त रूप से झेला है। परमेश्वर ने देह में मानव दुनिया के दुःखों को पूरी तरह से भुगता है। स्वर्ग के परमपिता परमेश्वर के आत्मा ने बहुत समय पहले ही ऐसे दृश्यों का असहनीय होना जान लिया था और अपने प्यारे पुत्र की वापसी के लिए इंतजार करते हुए, अपना सिर पीछे कर लिया था और अपनी आँखें बंद कर लीं थी। वह केवल इतना ही चाहता है कि सभी लोग सुनें और पालन करें, उसकी देह के सामने अत्यधिक शर्मिंदगी महसूस करने में समर्थ हों, और उसके ख़िलाफ विद्रोह नहीं करें। वह केवल इतनी ही इच्छा करता है कि सभी लोग विश्वास करें कि परमेश्वर मौज़ूद है। उसने बहुत समय पहले ही मनुष्य से अधिक माँगे करनी बंद कर दी क्योंकि परमेश्वर ने बहुत बड़ी कीमत चुकाई है, फिर भी परमेश्वर के कार्य को गंभीरता से नहीं लेते हुए मनुष्य चैन से सो रहा है।[3]

— "वचन देह में प्रकट होता है" में 'कार्य और प्रवेश (4)' से उद्धृत

10. आज तुम सब जानते हो कि परमेश्वर लोगों की अगुआई जीवन के सही मार्ग पर कर रहा है, कि वह दूसरे युग में प्रवेश करने का अगला कदम उठाने में मनुष्य की अगुआई कर रहा है, कि वह इस अंधकारमय पुराने युग से, शरीर से बाहर, अंधकारमय शक्तियों के उत्पीड़न और शैतान के प्रभाव से दूर जाने में मनुष्य की अगुआई कर रहा है, ताकि प्रत्येक व्यक्ति स्वतंत्रता के संसार में जी सके। एक सुंदर कल के लिए, और इसलिए कि लोग अपने कल के कदमों में और अधिक साहसी हो जाएँ, परमेश्वर का आत्मा मनुष्य के लिए हर चीज़ की योजना बनाता है, और इसलिए कि मनुष्य और अधिक आनंद प्राप्त करे, परमेश्वर देह में मनुष्य के आगे के मार्ग को तैयार करने के लिए सभी प्रयास करता है, और उस दिन के आगमन में जल्दी कर रहा है, जिसकी मनुष्य इच्छा करता है। क्या तुम लोग इस सुंदर पल को सँजो पाओगे; परमेश्वर के साथ आना कोई सरल उपलब्धि नहीं है। यद्यपि तुम लोगों ने उसे कभी नहीं जाना है, फिर भी तुम बहुत लंबे समय से उसके साथ रहे हो। काश, हर आदमी इन सुंदर किंतु अस्थायी दिनों को हमेशा के लिए याद रख सकता, और पृथ्वी पर उन्हें अपनी बहुमूल्य संपत्ति बना सकता।

— "वचन देह में प्रकट होता है" में 'कार्य और प्रवेश (5)' से उद्धृत

11. हजारों वर्षों से चीनी लोगों ने गुलामों का जीवन जीया है, और इसने उनके विचारों, धारणाओं, जीवन, भाषा, व्यवहार और कार्यों को इतना जकड़ दिया है कि उनके पास थोड़ी-सी भी स्वतंत्रता नहीं रही है। हजारों वर्षों के इतिहास ने महत्वपूर्ण लोगों को एक आत्मा के वश में कर दिया है और उन्हें आत्मा-विहीन शवों के समान जीर्ण-शीर्ण कर डाला है। कई लोग ऐसे हैं जो शैतान रूपी कसाई की छुरी के नीचे अपना जीवन जीते हैं, कई लोग ऐसे हैं जो जंगली जानवरों की माँद सरीखे घरों में रहते हैं, कई लोग ऐसे हैं जो बैलों और घोड़ों जैसा भोजन करते हैं और कई लोग ऐसे हैं जो बेसुध और अव्यवस्थित ढंग से "मृतकों के संसार" में पड़े रहते हैं। बाहरी तौर पर लोग आदिम मनुष्य से अलग नहीं है, उनका रहने का स्थान नरक के समान है, और जहाँ तक उनके साथियों का सवाल है, वे हर तरह के गंदे पिशाचों और बुरी आत्माओं से घिरे रहते हैं। बाहर से मनुष्य उच्चतर "जानवरों" के समान प्रतीत होते हैं; वास्तव में, वे गंदे पिशाचों के साथ रहते और निवास करते हैं। बिना किसी की चौकसी के लोग शैतान की घात के भीतर रहते हैं, उसके चंगुल में फँसने के बाद उनके निकलने का कोई मार्ग नहीं होता। यह कहने के बजाय कि वे अपने प्रियजनों के साथ आरामदायक घरों में रहते हैं, सुखद और संतोषप्रद जीवन जीते हैं, यह कहना चाहिए कि मनुष्य नरक में रहते हैं, पिशाचों के साथ व्यवहार करते हैं और शैतान के साथ जुड़े हैं।

— "वचन देह में प्रकट होता है" में 'कार्य और प्रवेश (5)' से उद्धृत

12. कार्य और प्रवेश अंतर्निहित रूप से व्यावहारिक हैं और परमेश्वर के कार्य और आदमी की प्रविष्टि को संदर्भित करते हैं। मनुष्य का परमेश्वर के वास्तविक चेहरे और परमेश्वर के कार्य की समझ का पूर्ण अभाव उसके प्रवेश में बड़ी कठिनाइयाँ लाया है। आज तक, बहुत से लोग अब भी उस कार्य को नहीं जानते जो परमेश्वर अंत के दिनों में निष्पादित करता है या नहीं जानते हैं कि परमेश्वर देह में आने के लिए चरम अपमान क्यों सहन करता है और सुख और दुःख में मनुष्य के साथ खड़ा होता है। मनुष्य परमेश्वर के कार्य के लक्ष्य के बारे में कुछ भी नहीं जानता है, न ही अंत के दिनों के लिए परमेश्वर की योजना के प्रयोजन को जानता है। विभिन्न कारणों से, लोग हमेशा उस प्रवेश के प्रति सदैव निरुत्साहित और अनिश्चित[4] रहते हैं जिसकी परमेश्वर माँग करता है, जो देह में परमेश्वर के कार्य के लिए बड़ी कठिनाइयाँ लाया है। सभी लोग बाधाएँ बन गए प्रतीत होते हैं, और आज तक, उनके पास कोई स्पष्ट समझ नहीं है। इसलिए मैं उस कार्य के बारे में बात करूँगा जो परमेश्वर मनुष्य पर करता है, और जो परमेश्वर का अत्यावश्यक अभिप्राय है, ताकि तुम सभी लोग परमेश्वर के वफ़ादार सेवक बन जाओ, जो अय्यूब की तरह, परमेश्वर को अस्वीकार करने के बजाय मर जाएँगे और हर अपमान को सहन करेंगे, और, जो पतरस की तरह, अपना समस्त अस्तित्व परमेश्वर को अर्पण करें देंगे और अंत के दिनों में परमेश्वर द्वारा प्राप्त किए गए अंतरंग बन जाएँगे। सभी भाई-बहन, परमेश्वर की स्वर्गिक इच्छा के प्रति अपने समस्त अस्तित्व को अर्पण करने के लिए अपनी सामर्थ्य के अंदर सब कुछ करें, परमेश्वर के घर में पवित्र सेवक बन जाएँ, और परमेश्वर द्वारा प्रदान किए गए अनंतता के वादे का आनंद लें, ताकि परमपिता परमेश्वर का हृदय शीघ्र ही शांतिपूर्ण आराम का आनंद ले सके। "परमपिता परमेश्वर की इच्छा को पूरा करो" उन सभी का आदर्श वाक्य होना चाहिए जो परमेश्वर से प्रेम करते हैं। इन वचनों को प्रवेश के लिए मनुष्य की मार्गदर्शिका और उसके कार्यों का निर्देशन करने वाले कम्पास के रूप में कार्य करना चाहिए। मनुष्य में यही संकल्प होना चाहिए। पृथ्वी पर परमेश्वर के कार्य को पूरी तरह से निष्पन्न करना और देह में परमेश्वर के कार्य में सहयोग करना—यही मनुष्य का कर्तव्य है। एक दिन, जब परमेश्वर का कार्य हो जाएगा, तो मनुष्य उसे स्वर्ग में परमपिता के पास शीघ्र वापसी पर विदाई देगा। क्या मनुष्य को यह दायित्व पूरा नहीं करना चाहिए?

— "वचन देह में प्रकट होता है" में 'कार्य और प्रवेश (6)' से उद्धृत

13. जब, अनुग्रह के युग में, परमेश्वर तीसरे स्वर्ग में लौटा, तो समस्त मानव जाति के छुटकारे का परमेश्वर का कार्य वास्तव में पहले से ही अपनी समापन की क्रिया में चला गया था। धरती पर जो कुछ भी शेष रह गया था वह था सलीब जिसे यीशु ने ढोया था, बारीक सन का कपड़ा जिसमें यीशु को लपेटा गया था, और काँटों का मुकुट और लाल रंग का लबादा जो यीशु ने पहना था (ये वे वस्तुएँ थीं जिन्हें यहूदियों ने उसका मज़ाक उड़ाने के लिए उपयोग किया था)। अर्थात्, यीशु के सलीब पर चढ़ने के कार्य के अत्यधिक उत्पन्न करने के बाद, चीज़ें फिर से शांत हो गयी। तब से, यीशु के शिष्यों ने, कलीसियाओं में चरवाही करते हुए और सींचते हुए, हर कहीं उसके कार्य को आगे बढ़ाना शुरू कर दिया। उनके कार्य की विषय-वस्तु यह थी: सभी लोगों से पश्चाताप करवाना, उनके पापों को स्वीकार करवाना और बपतिस्मा दिलवाना; सभी प्रेरितों ने यीशु के सलीब पर चढ़ने की अंदर की कहानी को और जो वास्तव में हुआ था उसे फैलाया, हर कोई अपने पापों को स्वीकार करने के लिए यीशु के सामने गिरने से रोक नहीं पाया, और इसके अलावा प्रेरित सभी जगह उन वचनों को जो यीशु ने बोले थे, फैला रहे थे। उस क्षण से अनुग्रह के युग में कलीसियाओं का निर्माण होना शुरू हुआ। उस युग में यीशु ने जिस बारे में बात की थी, वह भी मनुष्य के जीवन और स्वर्गिक परमपिता की इच्छा पर केंद्रित था। यह केवल युगों के भिन्न-भिन्न होने की वजह से है कि उनमें से कई उक्तियाँ और प्रथाएँ आज की उक्तियों और प्रथाओं से बहुत भिन्न हैं। किन्तु दोनों का सार एक ही है। दोनों देह में परमेश्वर के आत्मा के कार्य की अपेक्षा कुछ भी अधिक या कम नहीं हैं। इस प्रकार का कार्य और कथन आज के दिन तक जारी है, और यही कारण है कि आज की धार्मिक संस्थानों में अभी भी इसी प्रकार की चीज़ों को साझा किया जाता है और यह सर्वथा अपरिवर्तित है। जब यीशु का कार्य संपन्न हुआ और कलीसियाएँ पहले से ही यीशु मसीह के सही रास्ता पृथ्वी पर पकड़ बना चुकी थी, तब भी परमेश्वर ने अपने कार्य के एक अन्य चरण के लिए योजनाएँ शुरू कर दी थी, जो कि अंत के दिनों में उसका देह में आने का मामला था। मनुष्य के लिए, परमेश्वर के सलीब पर चढ़ने ने परमेश्वर के देहधारण के कार्य को संपन्न किया, समस्त मानव जाति को छुटकारा दिलाया, और परमेश्वर को अधोलोक की चाबी ज़ब्त करने की दिया। हर कोई सोचता है कि परमेश्वर का कार्य पूरी तरह से निष्पादित हो चुका है। वास्तविकता में, परमेश्वर के लिए, उसके कार्य का केवल एक छोटा सा हिस्सा ही निष्पादित हुआ है। उसने मानवजाति को केवल छुटकारा दिलाया है; उसने मानवजाति को जीता नहीं है, मनुष्य में शैतान की कुटिलता को बदलने की बात को तो छोड़ो। यही कारण है कि परमेश्वर कहता है, "यद्यपि मेरी देहधारी देह, मृत्यु की पीड़ा से गुज़री है किन्तु वह मेरे देहधारण का पूर्ण लक्ष्य नहीं था। यीशु मेरा प्यारा पुत्र है और उसे मेरे लिए सलीब पर चढ़ाया गया था, किन्तु उसने मेरे कार्य का पूरी तरह से समापन नहीं किया। उसने केवल इसका एक अंश पूरा किया।" इस प्रकार परमेश्वर ने देहधारण के कार्य को जारी रखने के लिए योजनाओं के दूसरे चक्र की शुरुआत की। परमेश्वर का अंतिम अभिप्राय शैतान के हाथों से बचाए गए हर एक को पूर्ण बनाना और प्राप्त करना है, यही वजह है कि परमेश्वर ने देह में आने के लिए फिर से विपत्तियों का जोख़िम लेने की तैयारी की।

— "वचन देह में प्रकट होता है" में 'कार्य और प्रवेश (6)' से उद्धृत

14. कई जगहों पर, परमेश्वर ने सीनियों के देश में जीतने वालों के एक समूह को प्राप्त करने की भविष्यवाणी की है। दुनिया के पूर्व में विजेताओं को प्राप्त किया जाता है, इसलिए परमेश्वर अपने दूसरे देहधारण में जहाँ कदम रखता है वह बिना किसी संदेह के, सीनियों का देश है, ठीक वहीं जहाँ बड़ा लाल अजगर कुण्डली मारे पड़ा है। वहाँ परमेश्वर बड़े लाल अजगर के वंशज को प्राप्त करेगा ताकि यह पूर्णतः पराजित और शर्मिंदा हो जाए। परमेश्वर इन गहन रूप से पीड़ित लोगों को जगाना चाहता है, उन्हें पूरी तरह से जगाना और उन्हें कोहरे से बाहर निकालना चाहता है और चाहता है कि वे उस बड़े लाल अजगर को ठुकरा दें। परमेश्वर उन्हें उनके सपने से जगाना, उन्हें बड़े लाल अजगर के सार से अवगत कराना, उनका संपूर्ण हृदय परमेश्वर को दिलवाना, अंधकार की ताक़तों के दमन से बाहर निकालना, दुनिया के पूर्व में खड़े होना, और परमेश्वर की जीत का सबूत बनाना चाहता है। केवल तभी परमेश्वर महिमा को प्राप्त करेगा। मात्र इसी कारण से, परमेश्वर उस कार्य को जो इस्राएल में समाप्त हुआ, उस देश में लाया जहाँ बड़ा लाल अजगर कुण्डली मारे पड़ा है और, प्रस्थान करने के करीब दो हजार वर्ष बाद, वह अनुग्रह के कार्य को जारी रखने के लिए पुनः देह में आ गया है। मनुष्य की खुली आँखों के लिए, परमेश्वर देह में नए कार्य का शुभारंभ कर रहा है। किन्तु परमेश्वर के लिए, केवल कुछ हजार वर्षों के अलगाव के साथ, और केवल कार्य स्थल और कार्य परियोजना में बदलाव के साथ, वह अनुग्रह के युग के कार्य को जारी रख रहा है। यद्यपि देह की छवि जो परमेश्वर ने आज के कार्य में ली है वह यीशु की अपेक्षा सर्वथा भिन्न व्यक्ति है, फिर भी वे एकही सार और मूल को साझा करते हैं, और ये एकही स्रोत से हैं। हो सकता है कि उनमें कई बाहरी अंतर हों, किन्तु उनके कार्य के आंतरिक सत्य पूरी तरह से समान हैं। लेकिन युगों में रात-दिन का अंतर है। परमेश्वर का कार्य अपरिवर्तित कैसे रह सकता है? या कार्य एक-दूसरे को कैसे बाधित कर सकते हैं?

— "वचन देह में प्रकट होता है" में 'कार्य और प्रवेश (6)' से उद्धृत

15. यीशु ने एक यहूदी का रूप-रंग धारण किया, यहूदियों की पोशाक के अनुरूप रहा, और यहूदी भोजन खाते हुए बड़ा हुआ। यह उसका सामान्य मानवीय पहलू है। किन्तु आज देहधारी शरीर एशिया के एक नागरिक का रूप धारण करता है और बड़े लाल अजगर के देश में बड़ा होता है। ये परमेश्वर के देहधारण के लक्ष्य के साथ टकराव नहीं करते हैं। बल्कि, परमेश्वर के देहधारण के वास्तविक महत्व को अधिक पूर्णता से पूरा करते हुए, वे एक दूसरे के अनुपूरक हैं। क्योंकि देहधारी को "मनुष्य का पुत्र" या "मसीह" के रूप में उल्लिखित किया जाता है, इसलिए आज के मसीह के बाह्य-स्वरूप के बारे में उसी संबंध में बात नहीं की जा सकती जैसे कि यीशु मसीह के बारे में। आख़िरकार, देह को "मनुष्य का पुत्र" कहा जाता है और यह देह की छवि में है। परमेश्वर के कार्य का हर चरण काफी गहरे अर्थ से युक्त है। पवित्र आत्मा द्वारा यीशु का गर्भ धारण करना इस कारण है क्योंकि उसे पापियों को छुटकारा दिलाना था। उसे बिना पाप वाला होना था। किन्तु केवल अंत में जब उसे पापी देह की समानता बनने के लिए बाध्य किया गया और उसने पापियों के पापों को धारण किया, तभी उसने उन्हें श्रापित सलीब से बचाया जिसे परमेश्वर ने लोगों को ताड़ित करने के लिए उपयोग किया था। (सलीब लोगों को श्राप देने और ताड़ित करने के लिए परमेश्वर का औजार है, श्राप देने और ताड़ित करने के उल्लेख विशेष रूप से पापियों को ताड़ना और दंड देने के बारे में है।) लक्ष्य था सभी पापियों से पश्चाताप करवाना और सलीब पर चढ़ने का उपयोग उनसे उनके पापों को स्वीकार करवाना। अर्थात्, समस्त मानव जाति को छुटकारा दिलाने के वास्ते, परमेश्वर ने स्वयं देहधारण किया जिसका गर्भधारण पवित्र आत्मा द्वारा किया गया था और जिसने समस्त मानव जाति के पापों को धारण कर लिया। इसके वर्णन करने का सामान्य तरीका, शैतान से उस समस्त निर्दोष मानवजाति को जिसे इसने कुचल दिया था परमेश्वर को वापस लौटाने की "विनती" करने के लिए, सभी पापियों के बदले एक पवित्र देह अर्पण करना है, यीशु के समकक्ष का शैतान के सामने रखी पाप बली होना है। इस तरह छुटकारे के कार्य के इस चरण को निष्पादित करने के लिए पवित्र आत्मा द्वारा गर्भ धारण की आवश्यकता थी। परमपिता परमेश्वर और शैतान के बीच लड़ाई के दौरान यह एक आवश्यक शर्त, एक "संधि" थी। यही कारण है कि यीशु को शैतान को दिया गया था, और केवल तभी कार्य के इस चरण का समापन हुआ। हालाँकि, आज परमेश्वर का छुटकारे का कार्य पहले से ही अभूतपूर्व शान का है, और शैतान के पास माँगों को करने का कोई कारण नहीं है, इसलिए परमेश्वर के देहधारण के लिए पवित्र आत्मा द्वारा गर्भधारण की आवश्यकता नहीं है, क्योंकि परमेश्वर अंतर्निहित रूप से पवित्र और निर्दोष है। इसलिए परमेश्वर का देहधारण अब की बार अनुग्रह के युग का यीशु नहीं है। किन्तु वह अभी भी परमपिता परमेश्वर की इच्छा के वास्ते है और परमपिता परमेश्वर की इच्छाओं को पूरा करने के वास्ते है। इसे एक अनुचित उक्ति कैसे माना जा सकता है? क्या परमेश्वर के देहधारण को एक नियम-समूह का पालन अवश्य करना चाहिए?

— "वचन देह में प्रकट होता है" में 'कार्य और प्रवेश (6)' से उद्धृत

16. मानव को आज तक का समय लग गया है यह समझ पाने में कि उसे केवल आध्यात्मिक जीवन की आपूर्ति और परमेश्वर को जानने के अनुभव का ही अभाव नहीं है, बल्कि—इससे भी अधिक महत्वपूर्ण है—उसके स्वभाव में परिवर्तन। मनुष्य की अपनी जाति के इतिहास और प्राचीन संस्कृति के बारे में पूरी अज्ञानता का यह परिणाम हुआ है कि वह परमेश्वर के कार्य के बारे में बिलकुल भी जानकारी नहीं रखता। सभी लोगों को उम्मीद है कि मनुष्य अपने दिल के भीतर गहराई में परमेश्वर से जुड़ा हो सकता है, लेकिन चूँकि मनुष्य की देह अत्यधिक भ्रष्ट है, और जड़ तथा कुंठित दोनों है, इसलिए यह उसे परमेश्वर का कुछ भी ज्ञान नहीं होने का कारण बना है। आज मनुष्यों के बीच आने का परमेश्वर का प्रयोजन और कुछ नहीं, बल्कि उनके विचारों और भावनाओं, औरसाथ ही उनके दिलों में लाखों वर्षों से मौजूद परमेश्वर की छवि को भी बदलना है। वह इस अवसर का इस्तेमाल मनुष्य को पूर्ण बनाने के लिए करेगा। अर्थात, वह मनुष्यों के ज्ञान के माध्यम से परमेश्वर को जानने के उनके तरीके और अपने प्रति उनका दृष्टिकोण बदल देगा, ताकि उन्हें परमेश्वर को जानने के लिए एक विजयी नई शुरुआत करने में सक्षम बना सके, और इस प्रकार मनुष्य की आत्मा का नवीकरण और रूपांतरण हासिल कर सके। निपटना और अनुशासन साधन हैं, जबकि विजय और नवीकरण लक्ष्य हैं। मनुष्य ने एक अस्पष्ट परमेश्वर के बारे में जो अंधविश्वासी विचार बना रखे हैं, उन्हें दूर करना हमेशा से परमेश्वर का इरादा रहा है, और हाल ही में यह उसके लिए एक तात्कालिक आवश्यकता का मुद्दा भी बन गया है। काश, सभी लोग इस स्थिति पर विस्तार से विचार करें। जिस तरीके से प्रत्येक व्यक्ति अनुभव करता है, उसे बदलो, ताकि परमेश्वर का यह अत्यावश्यक इरादा जल्दी फलित हो सके और पृथ्वी पर परमेश्वर के काम का अंतिम चरण पूरी तरह से संपन्न हो सके। परमेश्वर को वह वफ़ादारी दो, जिसे देना तुम लोगों का कर्तव्य है, और अंतिम बार परमेश्वर के दिल को सुकून दे दो। काश, भाइयों और बहनों में से कोई इस जिम्मेदारी से जी न चुराए या बेमन से काम न करे। परमेश्वर ने इस बार निमंत्रण के उत्तर में, और मनुष्य की स्थिति की स्पष्ट प्रतिक्रिया के तौर पर, देह धारण किया है। अर्थात, वह मनुष्य को वह चीज़ प्रदान करने आया है, जिसकी उसे ज़रूरत है। संक्षेप में, वह हर व्यक्ति को, चाहे उसका सामर्थ्य या लालन-पालन कैसा भी हो, परमेश्वर के वचन को देखने, और उसके माध्यम से परमेश्वर के अस्तित्व और उसकी अभिव्यक्ति को देखने तथा परमेश्वर द्वारा उसे पूर्ण बनाए जाने को स्वीकार करने में सक्षम बना देगा, और ऐसा करके वह मनुष्य के विचारों और धारणाओं को बदल देगा, जिससे कि परमेश्वर का मूल चेहरा मनुष्य के दिल की गहराई में दृढ़ता से बद्धमूल हो जाए। यह पृथ्वी पर परमेश्वर की एकमात्र इच्छा है। मनुष्य की जन्मजात प्रकृति चाहे कितनी ही महान हो, या मनुष्य का सार चाहे कितना भी तुच्छ हो, या अतीत में मनुष्य का व्यवहार चाहे वास्तव में कैसा भी रहा हो, परमेश्वर इन बातों पर कोई ध्यान नहीं देता। वह मनुष्य के लिए केवल यह उम्मीद करता है कि उसके अंतर्तम में परमेश्वर की जो छवि मौजूद है, वह पूरी तरह से नई हो जाए और वह मानवजाति के सार को जान सके, जिससे मनुष्य का वैचारिक दृष्टिकोण रूपांतरित हो सके और वह परमेश्वर के लिए गहराई से लालायित हो सके तथा उसके प्रति एक शाश्वत लगाव रख सके : यही एक माँग है, जो परमेश्वर मनुष्य से करता है।

— "वचन देह में प्रकट होता है" में 'कार्य और प्रवेश (7)' से उद्धृत

17. कई हजार वर्षों की प्राचीन संस्कृति और इतिहास के ज्ञान ने मनुष्य की सोच और धारणाओं तथा उसके मानसिक दृष्टिकोण को इतना कसकर बंद कर दिया है कि वे अभेद्य और जैविक दृष्टि से नष्ट न होने योग्य[5] बन गए हैं। लोग नरक के अठारहवें घेरे में रहते हैं, मानो उन्हें परमेश्वर द्वारा काल-कोठरियों में निर्वासित कर दिया गया हो, जहाँ उन्हें प्रकाश कभी दिखाई नहीं दे सकता। सामंती सोच ने लोगों का इस तरह उत्पीड़न किया है कि वे मुश्किल से साँस ले पाते हैं और उनका दम घुट रहा है। उनमें प्रतिरोध करने की थोड़ी-सी भी ताकत नहीं है; वे बस सहते हैं और चुपचाप सहते हैं...। कभी किसी ने धार्मिकता और न्याय के लिए संघर्ष करने या खड़े होने का साहस नहीं किया; लोग बस दिन-ब-दिन और साल-दर-साल सामंती नीति-शास्त्र के प्रहारों और दुर्व्यवहारों तले जानवर से भी बदतर जीवन जीते हैं। उन्होंने कभी मानव-जगत में खुशी पाने के लिए परमेश्वर की तलाश करने के बारे में नहीं सोचा। ऐसा लगता है, मानो लोगों को पीट-पीटकर इस हद तक तोड़ डाला गया है कि वे पतझड़ में गिरे पत्तों की तरह हो गए हैं, मुरझाए हुए, सूखे और पीले-भूरे रंग के। लोग लंबे समय से अपनी याददाश्त खो चुके हैं; वे असहाय-से उस नरक में रहते हैं, जिसका नाम है मानव-जगत, अंत के दिन आने का इंतज़ार करते हुए, ताकि वे इस नरक के साथ ही नष्ट हो जाएँ, मानो वह अंत का दिन, जिसके लिए वे लालायित रहते हैं, वह दिन हो, जब मनुष्य आरामदायक शांति का आनंद लेगा। सामंती नैतिकता ने मनुष्य का जीवन "अधोलोक" में पहुँचा दिया है, जिससे उसकी प्रतिरोध करने की शक्ति और भी कम हो गई है। सभी प्रकार के उत्पीड़न मनुष्य को निरंतर अधोलोक में धकेल रहे हैं, जिससे वह अधोलोक में और अधिक गहरा गिर गया है और परमेश्वर से अधिकाधिक दूर होता गया है, यहाँ तक कि आज परमेश्वर उसके लिए पूर्णत: अजनबी बन गया है, और जब वे मिलते हैं, तो वह उससे जल्दी से कतरा जाता है। मनुष्य उस पर ध्यान नहीं देता और उसे एक तरफ अकेला खड़ा छोड़ देता है, जैसे कि वह उसे जानता ही न हो या उसने उसे पहले कभी देखा ही न हो। फिर भी परमेश्वर अपना अदम्य रोष उस पर प्रकट न करते हुए मानव-जीवन की लंबी यात्रा के दौरान लगातार मनुष्य की प्रतीक्षा करता रहा है और इस दौरान बिना एक भी शब्द बोले, केवल मनुष्य के पश्चात्ताप करने और नए सिरे से शुरुआत करने की मौन प्रतीक्षा करता रहा है। मनुष्य के साथ मानव-जगत की पीड़ाएँ साझा करने के लिए परमेश्वर बहुत पहले मानव-जगत में आया था। मनुष्य के साथ गुज़ारे इन तमाम वर्षों में किसी ने भी उसके अस्तित्व की खोज नहीं की। परमेश्वर स्वयं द्वारा लाया गया कार्य पूरा करते हुए मानव-जगत की दुर्दशा का कष्ट चुपचाप सहन करता रहा है। ऐसे कष्टों से गुजरते हुए, जिनका अनुभव मनुष्य ने कभी नहीं किया, वह पिता परमेश्वर की इच्छा और मानव-जाति की ज़रूरतों की खातिर कष्ट सहना जारी रखता है। पिता परमेश्वर की इच्छा की खातिर, और मानव-जाति की ज़रूरतों की खातिर भी, मनुष्य की उपस्थिति में उसने चुपचाप उसका इंतज़ार किया है, और मनुष्य की उपस्थिति में उसने खुद को नम्र किया है। प्राचीन संस्कृति के ज्ञान ने मनुष्य को चुपके से परमेश्वर की उपस्थिति से चुरा लिया है और उसे शैतानों के राजा और उसकी संतानों को सौंप दिया है। चार पुस्तकों और पाँच क्लासिक्स[क] ने मनुष्य की सोच और धारणाओं को विद्रोह के एक अन्य युग में पहुँचा दिया है, जिससे वह उन पुस्तकों और क्लासिक्स के संकलनकर्ताओं की पहले से भी ज्यादा ठकुरसुहाती करने लगा है, और परिणामस्वरूप परमेश्वर के बारे में उसकी धारणाएँ और ज्यादा ख़राब हो गई हैं। शैतानों के राजा ने बिना मनुष्य के जाने ही उसके दृदय से निर्दयतापूर्वक परमेश्वर को बाहर निकाल दिया और फिर विजयी उल्लास के साथ खुद उस पर कब्ज़ा जमा लिया। तब से मनुष्य एक कुरूप और दुष्ट आत्मा तथा शैतानों के राजा के चेहरे के अधीन हो गया। उसके सीने में परमेश्वर के प्रति घृणा भर गई, और शैतानों के राजा की द्रोहपूर्ण दुर्भावना दिन-ब-दिन तब तक मनुष्य के भीतर फैलती गई, जब तक कि वह पूरी तरह से बरबाद नहीं हो गया। उसे अब जरा भी स्वतंत्रता नहीं थी और उसके पास शैतानों के राजा के चंगुल से छूटने का कोई उपाय नहीं था। उसके पास वहीं के वहीं बंदी बनने, आत्मसमर्पण करने और उसकी उपस्थिति में उसकी अधीनता में घुटने टेक देने के सिवा कोई चारा नहीं था। बहुत पहले जब मनुष्य का हृदय और आत्मा अभी शैशवावस्था में ही थे, शैतानों के राजा ने उनमें नास्तिकता के फोड़े का बीज बो दिया था, और उसे इस तरह की भ्रांतियाँ सिखा दीं, जैसे कि "विज्ञान और प्रौद्योगिकी को पढ़ो; चार आधुनिकीकरणों को समझो; और दुनिया में परमेश्वर जैसी कोई चीज़ नहीं है।" यही नहीं, वह हर अवसर पर चिल्लाता है, "आओ, हम एक सुंदर मातृभूमि का निर्माण करने के लिए अपने मेहनती श्रमिकों पर भरोसा करें," और बचपन से ही हर व्यक्ति को अपने देश की सेवा करने के लिए तैयार रहने के लिए कहता है। मनुष्य को अनजाने में इसके सामने लाया गया था, और इसने बेझिझक सारा श्रेय (अर्थात् समस्त मनुष्यों को अपने हाथों में रखने का परमेश्वर का श्रेय) हथिया लिया। कभी भी इसे शर्म का बोध महसूस नहीं हुआ, न ही कभी शर्मिंदगी की कोई भावना रखी। इतना ही नहीं, इसने निर्लज्जतापूर्वक परमेश्वर के लोगों को पकड़ लिया और उन्हें अपने घर में खींच लिया, जहाँ वह मेज पर एक चूहे की तरह उछलता रहा और मनुष्यों से परमेश्वर के रूप में अपनी आराधना करवाई। कैसा आततायी है! वह चीख-चीखकर ऐसी शर्मनाक और घिनौनी बातें कहता है : "दुनिया में परमेश्वर जैसी कोई चीज़ नहीं है। हवा प्राकृतिक नियमों के कारण होने वाले रूपांतरणों से आती है; बारिश तब होती है, जब पानी भाप बनकर ठंडे तापमानों से मिलता है और बूँदों के रूप में संघनित होकर पृथ्वी पर गिरता है; भूकंप भूगर्भीय परिवर्तनों के कारण पृथ्वी की सतह का हिलना है; सूखा सूरज की सतह पर नाभिक विक्षोभ के कारण हवा के शुष्क हो जाने से पड़ता है। ये प्राकृतिक घटनाएँ हैं। इस सबमें परमेश्वर का क्या काम है?" ऐसे लोग भी हैं, जो निम्नलिखित जैसे बयान भी देते हैं, ऐसे बयान, जिन्हें स्वर नहीं दिया जाना चाहिए : "मनुष्य प्राचीन काल में वानरों से विकसित हुआ था, और आज की दुनिया लगभग एक युग पहले शुरू हुए आदिम समाजों के अनुक्रमण से विकसित हुई है। किसी देश का उत्थान या पतन पूरी तरह से उसके लोगों के हाथों में है।" पृष्ठभूमि में, यह लोगों को उसे दीवार पर लटकाकर या मेज पर रखकर श्रद्धांजलि अर्पित करने और भेंट चढ़ाने के लिए बाध्य करता है। जिस समय वह चिल्लाता है कि "कोई परमेश्वर नहीं है," उसी समय वह खुद को परमेश्वर के रूप में स्थापित भी करता है और परमेश्वर के स्थान पर खड़ा होकर तथा शैतानों के राजा की भूमिका ग्रहण कर अविलंबित अशिष्टता के साथ परमेश्वर को धरती की सीमाओं से बाहर धकेल देता है। कितनी बेहूदा बात है! यह आदमी को उससे गहरी घृणा करने के लिए बाध्य कर देता है। ऐसा लगता है कि परमेश्वर और वह कट्टर दुश्मन हैं, और दोनों सह-अस्तित्व में नहीं रह सकते। वह व्यवस्था की पहुँच से बाहर आज़ाद घूमता है[6] और परमेश्वर को दूर भगाने की योजना बनाता है। ऐसा है यह शैतानों का राजा! इसके अस्तित्व को कैसे बरदाश्त किया जा सकता है? यह तब तक चैन से नहीं बैठेगा, जब तक परमेश्वर के काम में घालमेल नहीं कर देता और उसे पूरा खंडहर[7] नहीं बना देता, मानो वह कड़वे अंत तक परमेश्वर का विरोध करना चाहता हो, जब तक कि या तो मछली न मर जाए या जाल न टूट जाए। वह जानबूझकर खुद को परमेश्वर के ख़िलाफ़ खड़ा कर लेता है और नज़दीक धँसता जाता है। इसका घिनौना चेहरा बहुत पहले से पूरी तरह से बेनक़ाब हो गया है, जो अब आहत और क्षत-विक्षत[8] है और एक खेदजनक स्थिति में है, फिर भी वह परमेश्वर से नफ़रत करने से बाज़ नहीं आएगा, मानो परमेश्वर को एक कौर में निगलकर ही वह अपने दिल में बसी घृणा से मुक्ति पा सकेगा। परमेश्वर के इस शत्रु को हम कैसे बरदाश्त कर सकते हैं! केवल इसके उन्मूलन और पूर्ण विनाश से ही हमारे जीवन की इच्छा फलित होगी। इसे उच्छृंखल रूप से कैसे दौड़ते फिरने दिया जा सकता है? यह मनुष्य को इस सीमा तक भ्रष्ट कर चुका है कि मनुष्य स्वर्ग के सूर्य को नहीं जानता, और वह अचेत और भावनाशून्य हो गया है। मनुष्य ने सामान्य मानवीय विवेक खो दिया है। इसे नष्ट और भस्म करने के लिए क्यों नहीं हम अपनी पूरी हस्ती का बलिदान कर देते, ताकि भविष्य की सारी चिंताएँ दूर कर सकें और परमेश्वर के कार्य को जल्दी से अभूतपूर्व भव्यता तक पहुँचने दें? बदमाशों का यह गिरोह मनुष्यों की दुनिया में आ गया है और यहाँ उथल-पुथल मचा दी है। वे सभी मनुष्यों को एक खड़ी चट्टान के कगार पर ले आए हैं और गुप्त रूप से उन्हें वहाँ से धकेलकर टुकड़े-टुकड़े करने की योजना बना रहे हैं, ताकि फिर वे उनके शवों को निगल सकें। वे व्यर्थ ही परमेश्वर की योजना को खंडित करने और उसके साथ जुआ खेलकर पासे की एक ही चाल में सब-कुछ दाँव पर लगाने[9] की आशा करते हैं। यह किसी भी तरह से आसान नहीं है! अंतत: शैतानों के राजा के लिए सलीब तैयार कर दिया गया है, जो सबसे घृणित अपराधों का दोषी है। परमेश्वर का सलीब से संबंध नहीं है। वह पहले ही उसे शैतान के लिए बगल में उछाल चुका है। परमेश्वर अब से बहुत पहले ही विजयी होकर उभर चुका है और अब मानवजाति के पापों पर दुख महसूस नहीं करता, लेकिन वह समस्त मानवजाति के लिए उद्धार लाएगा।

— "वचन देह में प्रकट होता है" में 'कार्य और प्रवेश (7)' से उद्धृत

18. ऊपर से नीचे तक और शुरू से अंत तक शैतान परमेश्वर के कार्य को बाधित कर रहा है और उसके विरोध में काम कर रहा है। "प्राचीन सांस्कृतिक विरासत", मूल्यवान "प्राचीन संस्कृति के ज्ञान", "ताओवाद और कन्फ्यूशीवाद की शिक्षाओं" और "कन्फ्यूशियन क्लासिक्स और सामंती संस्कारों" की इस सारी चर्चा ने मनुष्य को नरक में पहुँचा दिया है। उन्नत आधुनिक विज्ञान और प्रौद्योगिकी के साथ-साथ अत्यधिक विकसित उद्योग, कृषि और व्यवसाय कहीं नज़र नहीं आते। इसके बजाय, यह सिर्फ़ प्राचीन काल के "वानरों" द्वारा प्रचारित सामंती संस्कारों पर जोर देता है, ताकि परमेश्वर के कार्य को जानबूझकर बाधित कर सके, उसका विरोध कर सके और उसे नष्ट कर सके। न केवल इसने आज तक मनुष्य को सताना जारी रखा है, बल्कि वह उसे पूरे का पूरा निगल[10] भी जाना चाहता है। सामंतवाद की नैतिक और आचार-विचार विषयक शिक्षाओं के प्रसारण और प्राचीन संस्कृति के ज्ञान की विरासत ने लंबे समय से मनुष्य को संक्रमित किया है और उन्हें छोटे-बड़े शैतानों में बदल दिया है। कुछ ही लोग हैं, जो ख़ुशी से परमेश्वर को स्वीकार करते हैं, और कुछ ही लोग हैं, जो उसके आगमन का उल्लासपूर्वक स्वागत करते हैं। समस्त मानवजाति का चेहरा हत्या के इरादे से भर गया है, और हर जगह हत्यारी साँस हवा में व्याप्त है। वे परमेश्वर को इस भूमि से निष्कासित करना चाहते हैं; हाथों में चाकू और तलवारें लिए वे परमेश्वर का "विनाश" करने के लिए खुद को युद्ध के विन्यास में व्यवस्थित करते हैं। शैतान की इस सारी भूमि पर, जहाँ मनुष्य को लगातार सिखाया जाता है कि कहीं कोई परमेश्वर नहीं है, मूर्तियाँ फैली हुई हैं, और ऊपर हवा जलते हुए कागज और धूप की वमनकारी गंध से तर है, इतनी घनी कि दम घुटता है। यह उस कीचड़ की बदबू की तरह है, जो जहरीले सर्प के कुलबुलाते समय ऊपर उठती है, जिससे व्यक्ति उलटी किए बिना नहीं रह सकता। इसके अलावा, वहाँ अस्पष्ट रूप से दुष्ट दानवों के मंत्रोच्चार की ध्वनि सुनी जा सकती है, जो दूर नरक से आती हुई प्रतीत होती है, जिसे सुनकर आदमी काँपे बिना नहीं रह सकता। इस देश में हर जगह इंद्रधनुष के सभी रंगों वाली मूर्तियाँ रखी हैं, जिन्होंने इस देश को कामुक आनंद की दुनिया में बदल दिया है, और शैतानों का राजा दुष्टतापूर्वक हँसता रहता है, मानो उसका नीचतापूर्ण षड्यंत्र सफल हो गया हो। इस बीच, मनुष्य पूरी तरह से बेखबर रहता है, और उसे यह भी पता नहीं कि शैतान ने उसे पहले ही इस हद तक भ्रष्ट कर दिया है कि वह बेसुध हो गया है और उसने हारकर अपना सिर लटका दिया है। वह चाहता है कि एक ही झपट्टे में परमेश्वर से संबंधित सब-कुछ साफ़ कर दे, और एक बार फिर उसे अपवित्र कर उसका हनन कर दे; वह उसके कार्य को टुकड़े-टुकड़े करने और उसे बाधित करने का इरादा रखता है। वह कैसे परमेश्वर को समान दर्जा दे सकता है? कैसे वह पृथ्वी पर मनुष्यों के बीच अपने काम में परमेश्वर का "हस्तक्षेप" बरदाश्त कर सकता है? कैसे वह परमेश्वर को उसके घिनौने चेहरे को उजागर करने दे सकता है? वह कैसे परमेश्वर को अपने काम को अव्यवस्थित करने की अनुमति दे सकता है? क्रोध के साथ भभकता यह शैतान कैसे परमेश्वर को पृथ्वी पर अपने शाही दरबार पर नियंत्रण करने दे सकता है? कैसे वह स्वेच्छा से परमेश्वर के श्रेष्ठतर सामर्थ्य के आगे झुक सकता है? इसके कुत्सित चेहरे की असलियत उजागर की जा चुकी है, इसलिए किसी को पता नहीं है कि वह हँसे या रोए, और यह बताना वास्तव में कठिन है। क्या यही इसका सार नहीं है? अपनी कुरूप आत्मा के बावजूद वह यह मानता है कि वह अविश्वसनीय रूप से सुंदर है। यह अपराध के साथियों का गिरोह![11] वे भोग में लिप्त होने के लिए मनुष्यों के देश में उतरते हैं और हंगामा करते हैं, और चीज़ों को इतना आलोड़ित करते हैं कि दुनिया एक चंचल और अस्थिर जगह बन जाती है और मनुष्य का दिल घबराहट और बेचैनी से भर जाता है, और उन्होंने मनुष्य के साथ इतना खिलवाड़ किया है कि उसका रूप उस क्षेत्र के एक अमानवीय जानवर जैसा अत्यंत कुरूप हो गया है, जिससे मूल पवित्र मनुष्य का उसका पिछला निशान खो गया है। इतना ही नहीं, वे धरती पर संप्रभु सत्ता ग्रहण करना चाहते हैं। वे परमेश्वर के कार्य को इतना बाधित करते हैं कि वह मुश्किल से बहुत धीरे आगे बढ़ पाता है, और वे मनुष्य को इतना कसकर बंद कर देते हैं, जैसे कि तांबे और इस्पात की दीवारें हों। इतने सारे गंभीर पाप करने और इतनी आपदाओं का कारण बनने के बाद भी क्या वे ताड़ना के अलावा किसी अन्य चीज़ की उम्मीद कर रहे हैं? राक्षस और बुरी आत्माएँ काफी समय से पृथ्वी पर अंधाधुंध विचरण कर रही हैं, और उन्होंने परमेश्वर की इच्छा और कष्टसाध्य प्रयास दोनों को इतना कसकर बंद कर दिया है कि वे अभेद्य बन गए हैं। सचमुच, यह एक घातक पाप है! परमेश्वर कैसे चिंतित महसूस न करता? परमेश्वर कैसे क्रोधित महसूस न करता? उन्होंने परमेश्वर के कार्य में गंभीर बाधा पहुँचाई है और उसका घोर विरोध किया है : कितने विद्रोही हैं वे! यहाँ तक कि वे छोटे-बड़े राक्षस शेर की खाल पहने गीदड़ों जैसा व्यवहार करते हैं और बुराई की धारा में बहते हैं, और जब चलते हैं, तब गड़बड़ी पैदा करते हैं। सच को जानने के बावजूद उसका विरोध करते हैं, ये विद्रोह के बेटे! यह ऐसा है, मानो अब जबकि नरक का राजा राजसी सिंहासन पर चढ़ गया है, तो वे दंभी और बेपरवाह हो गए हैं और अन्य सभी की अवमानना करने लगे हैं। उनमें से कितने सत्य की खोज करते हैं और धर्मिकता का पालन करते हैं? वे सभी जानवर हैं, जो सूअरों और कुत्तों से बेहतर नहीं हैं, वे गोबर के एक ढेर के बीच में बदबूदार मक्खियों के एक समूह के ऊपर दंभपूर्ण आत्म-बधाई में अपने सिर हिलाते हैं और हर तरह का उपद्रव भड़काते[12] हैं। उनका मानना है कि नरक का उनका राजा सबसे बड़ा राजा है, और इतना भी नहीं जानते कि वे खुद बदबूदार मक्खियों से ज्यादा कुछ नहीं हैं। और फिर भी, वे अपने माता-पिता रूपी सूअरों और कुत्तों की ताकत का लाभ उठाकर परमेश्वर के अस्तित्व को बदनाम करते हैं। तुच्छ मक्खियों जैसे वे मानते हैं कि उनके माता-पिता दाँतों वाली व्हेल[13] की तरह विशाल हैं। वे इतना भी नहीं जानते कि वे जब खुद बहुत छोटे हैं, तो उनके माता-पिता उनसे लाखों गुना बड़े गंदे सूअर और कुत्ते हैं। अपनी नीचता से अनजान वे अंधाधुंध दौड़ने के लिए उन सूअरों और कुत्तों द्वारा छोड़ी गई सड़न की बदबू पर भरोसा करते हैं और शर्मिंदगी से बेखबर वे व्यर्थ ही भविष्य की पीढ़ियों को पैदा करने के बारे में सोचते हैं! अपनी पीठ पर हरे पंख लगाए (जो उनके परमेश्वर पर विश्वास करने के दावे का सूचक है), वे खुद से भरे हैं और हर जगह अपनी सुंदरता और आकर्षण की डींग हाँकते हैं, जबकि वे चुपके से अपने शरीर की मलिनताओं को मनुष्य पर फेंक देते हैं। इतना ही नहीं, वे स्वयं से अत्यधिक प्रसन्न होते हैं, मानो वे अपनी मलिनताएँ छिपाने के लिए इंद्रधनुष के रंगों वाले एक जोड़ी पंखों का इस्तेमाल कर सकते हों, और इस तरह वे सच्चे परमेश्वर के अस्तित्व पर अपना कहर बरपाते हैं (यह धार्मिक दुनिया में परदे के पीछे चलने वाली हकीकत बताता है)। मनुष्य को कैसे पता चलेगा कि मक्खी के पंख कितने भी खूबसूरत और आकर्षक हों, खुद मक्खी एक बहुत छोटे प्राणी से बढ़कर कुछ नहीं है, जिसका पेट गंदगी से भरा हुआ और शरीर रोगाणुओं से ढका हुआ है? अपने माता-पिता रूपी सूअर और कुत्तों के बल पर वे देश भर में हैवानियत में निरंकुश होकर अंधाधुंध दौड़ते हैं (यह उस तरीके को संदर्भित करता है, जिससे परमेश्वर को सताने वाले धार्मिक अधिकारी सच्चे परमेश्वर और सत्य से विद्रोह करने के लिए राष्ट्र की सरकार से मिले मजबूत समर्थन पर भरोसा करते हैं)। ऐसा लगता है, मानो यहूदी फरीसियों के भूत परमेश्वर के साथ बड़े लाल अजगर के देश में, अपने पुराने घोंसले में लौट आए हों। उन्होंने हजारों साल पहले का अपना काम पकड़ते हुए उत्पीड़न का दूसरा दौर शुरू कर दिया है। पतितों के इस समूह का अंततः पृथ्वी पर नष्ट हो जाना निश्चित है! ऐसा प्रतीत होता है कि कई सहस्राब्दियों के बाद अशुद्ध आत्माएँ और भी चालाक और धूर्त हो गई हैं। वे गुप्त रूप से लगातार परमेश्वर के काम को क्षीण करने के तरीकों के बारे में सोच रही हैं। प्रचुर छल-कपट के साथ वे अपनी मातृभूमि में कई हजार साल पहले की त्रासदी की पुनरावृत्ति करना चाहती हैं और परमेश्वर को लगभग रोने के बिंदु तक ले आती हैं। वह उन्हें नष्ट करने के लिए तीसरे स्वर्ग में लौट जाने से खुद को मुश्किल से रोक पाता है। परमेश्वर से प्रेम करने के लिए मनुष्य को उसकी इच्छा, उसकी खुशी और उसके दुःख को जानना चाहिए, और यह समझना चाहिए कि वह किस चीज़ से घृणा करता है। ऐसा करने से मनुष्य के प्रवेश में और तेज़ी आएगी। मनुष्य का प्रवेश जितना तेज़ होगा, उतनी ही शीघ्र परमेश्वर की इच्छा पूर्ण होगी; और उतनी ही स्पष्टता से मनुष्य शैतानों के राजा का स्वभाव जान पाएगा और उतना ही वह परमेश्वर के नज़दीक आएगा, ताकि उसकी इच्छा फलित हो सके।

— "वचन देह में प्रकट होता है" में 'कार्य और प्रवेश (7)' से उद्धृत

19. मैंने कई बार कहा है कि परमेश्वर के अंतिम दिनों के कार्य का उद्देश्य है प्रत्येक व्यक्ति की आत्मा को बदलना, प्रत्येक व्यक्ति की रूह को बदलना, ताकि उनके दिल में, जिसने अत्यंत आघात को सहा है, सुधार लाया जा सके, जिससे उनकी उस आत्मा को बचाया जा सके जिसे गंभीर रूप से बुराई द्वारा हानि पहुंचाई गई है; इसका उद्देश्य लोगों की आत्माओं को जगाना है, उनके बर्फ़ जैसे जमे हुए दिलों को पिघलाना है, और उनका जीर्णोद्धार करना है। यही है परमेश्वर की महानतम इच्छा। मनुष्य का जीवन और उसके अनुभव कितने ऊँचे या गहरे हैं, उनकी बातें करना बंद करो; जब लोगों के दिलों को जागृत किया जाता है, जब उन्हें अपने सपनों से जगा दिया जाता है और बड़े लाल अजगर द्वारा पहुँचाई गई हानि के बारे में वह पूरी तरह अवगत हो जाते हैं, तो परमेश्वर की सेवा का काम पूरा हो जाएगा। जिस दिन परमेश्वर का कार्य पूरा हो जाता है, यही वह दिन होता है जब मनुष्य भी परमेश्वर में विश्वास की सही राह पर आधिकारिक तौर पर चलना शुरू करता है। इस समय, परमेश्वर की सेवा समाप्त हो जाएगी: परमेश्वर का देहधारी कार्य पूरी तरह पूर्ण हो चुका होगा, और मनुष्य आधिकारिक तौर पर उस कर्तव्य को पूरा करना शुरू कर देगा जो उसे करना चाहिए—वह अपनी सेवकाई का कार्य करेगा। ये परमेश्वर के कार्य के कदम हैं। इस प्रकार, इन बातों को जानने की नींव पर तुम लोगों को प्रवेश की अपनी राह की तलाश करनी चाहिए। यह सब कुछ तुम लोगों को समझना चाहिए। मनुष्य की प्रविष्टि में तब ही सुधार आएगा जब परिवर्तन उसके दिल की गहराई में होगा, क्योंकि परमेश्वर का कार्य मनुष्य का—वह मनुष्य जिसे छुड़ा लिया गया है, जो अभी भी अंधेरे की शक्तियों के बीच रहता है, और जिसने कभी भी स्वयं को जगाया नहीं है—राक्षसों के एकत्रित होने के इस स्थान से पूर्ण उद्धार है; यह हो सकता है कि मनुष्य सदियों के पापों से मुक्त हो जाए, और परमेश्वर का चहेता बन जाए, और बड़े लाल अजगर को पूरी तरह से मार डाले, परमेश्वर के राज्य को स्थापित करे, और परमेश्वर के दिल को जल्द आराम पहुँचाए, यह बिना किसी रोकटोक के उस घृणा को अपने सीने से निकाल देना है, उन फफुंद से ढके रोगाणुओं को हटा देना है, तुम लोगों के लिए इस जीवन को छोड़ पाना संभव करना है जो एक बैल या घोड़े के जीवन से कुछ अलग नहीं, एक दास बनकर रहना छोड़ देना है, बड़े लाल अजगर से स्वतंत्रता से कुचले जाने या उसकी आज्ञा मानने को त्याग देना है; अब तुम लोग इस असफल राष्ट्र का हिस्सा नहीं रहोगे, अब घृणित बड़े लाल अजगर से नहीं जुड़े रहोगे, अब तुम लोग उसके दास नहीं रहोगे। राक्षसों का घोंसला निश्चित रूप से परमेश्वर द्वारा टुकड़े-टुकड़े कर दिया जाएगा, और तुम लोग परमेश्वर के साथ खड़े रहोगे—तुम लोग परमेश्वर के होगे, और दासों के इस साम्राज्य के नहीं रहोगे। परमेश्वर इस अंधियारे समाज से लंबे समय से घृणा करता आया है। इस दुष्ट, घिनौने बूढ़े सर्प पर अपने पैरों को रखने के लिए वह अपने दांतों को पीसता है, ताकि वह फिर से कभी न उठ पाए, और फिर कभी मनुष्य का दुरुपयोग न कर पाए; वह उसके अतीत के कर्मों को क्षमा नहीं करेगा, वह मनुष्य को दिए गए धोखे को बर्दाश्त नहीं करेगा, वह प्रत्येक युग में उसके सभी पापों के लिए उसका हिसाब करेगा; परमेश्वर सभी बुराइयों के इस सरगना[14] को परेशानी से जरा सा भी बाहर नहीं निकलने देगा, वह पूरी तरह से इसे नष्ट कर देगा।

— "वचन देह में प्रकट होता है" में 'कार्य और प्रवेश (8)' से उद्धृत

20. हज़ारों सालों से यह गंदगी की भूमि रही है, यह असहनीय रूप से मैली है, दुःख से भरी हुई है, प्रेत यहाँ हर कोने में घूमते हैं, चालें चलते हुए और धोखा देते हुए, निराधार आरोप लगाते हुए,[15] क्रूर और भयावह बनते हुए, इस भूतिया शहर को कुचलते हुए और मृत शरीरों से भरते हुए; क्षय की बदबू ज़मीन को ढक चुकी है और हवा में शामिल हो गई है, और इसे बेहद संरक्षित[16] रखा जाता है। आसमान से परे की दुनिया को कौन देख सकता है? सभी मनुष्यों के शरीर को शैतान कसकर बांध देता है, उसकी दोनों आँखें निकाल देता है, और उसके होंठों को मज़बूती से बंद कर देता है। शैतानों के राजा ने हज़ारों वर्षों तक तबाही मचाई है, और आज भी वह तबाही मचा रहा है और इस भूतिया शहर पर करीब से नज़र रखे हुए है, मानो यह राक्षसों का एक अभेद्य महल हो; नज़र रखने वाले प्रहरी इस दौरान चमकती हुई आँखों से घूरते हैं, इस बात से अत्यंत भयभीत कि परमेश्वर उन्हें अचानक पकड़ लेगा और उन सभी को मिटा कर रख देगा, और उन्हें शांति और ख़ुशी के स्थान से वंचित कर देगा। ऐसे भूतिया शहर के लोग कैसे कभी परमेश्वर को देख सकते हैं? क्या उन्होंने कभी परमेश्वर की प्रियता और सुंदरता का आनंद लिया है? मानवीय दुनिया के मामलों की क्या कद्र है उन्हें? उनमें से कौन परमेश्वर की उत्सुक इच्छा को समझ सकता है? यह कोई आश्चर्य की बात नहीं कि देहधारी परमेश्वर पूरी तरह से छिपा हुआ है: इस तरह के अंधियारे समाज में, जहाँ राक्षस बेरहम और अमानवीय हैं, शैतानों का राजा, जो बिना पलक झपकाए लोगों को मार डालता है, ऐसे परमेश्वर के अस्तित्व को कैसे सहन कर सकता है जो प्यारा, दयालु और पवित्र भी है? वह परमेशवर के आगमन की वाहवाही और जयकार कैसे कर सकता है? ये दास! ये दयालुता का बदला घृणा से चुकाते हैं, उन्होंने लंबे समय से परमेश्वर की निंदा की है, वे परमेश्वर को अपशब्द बोलते हैं, वे चरमसीमा तक क्रूर हैं, उनमें परमेश्वर के प्रति थोड़ा-सा भी सम्मान नहीं है, वे लूटते हैं और डाका डालते हैं, वे सभी विवेक खो चुके हैं, वे समस्त विवेक के विरुद्ध जाते हैं, और वे निर्दोषों को अचेतावस्था की ओर मुग्ध करते हैं। प्राचीनों के पूर्वज? प्रिय नेता? वे सभी परमेश्वर का विरोध करते हैं! उनके हस्तक्षेप ने स्वर्ग के नीचे के सभी लोगों को अंधेरे और अराजकता की स्थिति में छोड़ दिया है! धार्मिक स्वतंत्रता? नागरिकों के वैध अधिकार और हित? ये सब पाप को छिपाने के तरीके हैं! किसने परमेश्वर के कार्य को स्वीकार कर लिया है? किसने परमेश्वर के कार्य के लिए अपना जीवन अर्पित किया है या रक्त बहाया है? पीढ़ी दर पीढ़ी, माता-पिता से लेकर बच्चों तक, दास मनुष्य ने परमेश्वर को अनुचित तरीके से गुलाम बना लिया है—ऐसा कैसे हो सकता है कि यह रोष उत्तेजित न करे? दिल में हज़ारों वर्ष की घृणा भरी हुई है, पापमयता की सहस्राब्दियाँ दिल पर अंकित हैं—यह कैसे घृणा को प्रेरित नहीं करेगा? परमेश्वर का बदला लो, अपने शत्रु को पूरी तरह समाप्त कर दो, उसे अब अनियंत्रित ढंग से फैलने की अनुमति न दो, और उसे अपनी इच्छानुसार परेशानी पैदा मत करने दो! यही समय है: मनुष्य अपनी सभी शक्तियों को लंबे समय से इकट्ठा करता आ रहा है, उसने इसके लिए अपने सभी प्रयासों को समर्पित किया है, हर कीमत चुकाई है, ताकि वह इस दानव के घृणित चेहरे को तोड़ सके और जो लोग अंधे हो गए हैं, जिन्होंने हर प्रकार की पीड़ा और कठिनाई सही है, उन्हें अनुमति दे कि वे अपने दर्द से उठें और इस दुष्ट प्राचीन शैतान को अपनी पीठ दिखाएं। परमेश्वर के कार्य के सामने ऐसी अभेद्य बाधा क्यों डालना? परमेश्वर के लोगों को धोखा देने के लिए विभिन्न चालों को क्यों आज़माना? वास्तविक स्वतंत्रता और वैध अधिकार और हित कहां हैं? निष्पक्षता कहां है? आराम कहाँ है? स्नेह कहाँ है? धोखेबाज़ योजनाओं का उपयोग करके परमेश्वर के लोगों को क्यों छलना? परमेश्वर के आगमन को दबाने के लिए बल का उपयोग क्यों? क्यों नहीं परमेश्वर को उस धरती पर स्वतंत्रता से घूमने दिया जाए जिसे उसने बनाया? क्यों परमेश्वर को तब तक परेशान किया जाए जब तक उसके पास आराम से सिर रखने के लिए जगह न रहे? मनुष्यों के बीच का स्नेह कहाँ है? लोगों के बीच स्वागत की भावना कहां है? परमेश्वर में इस तरह की हताश तड़प क्यों पैदा करना? परमेवर को क्यों बार-बार पुकारने पर मजबूर करना? परमेश्वर को अपने प्रिय पुत्र के लिए चिंता करने के लिए क्यों मजबूर करना? इस अंधकारमय समाज में, क्यों इसकेऔर उसके घटिया संरक्षक कुत्ते, परमेश्वर को स्वतंत्रता से इस दुनिया में आने और जाने से रोकते हैं जिसे उसने बनाया? मनुष्य क्यों नहीं समझता, वह मनुष्य जो दर्द और पीड़ा के बीच रहता है? तुम लोगों के लिए, परमेश्वर ने अत्यंत यातना सही है, और अपने प्यारे पुत्र, उसके अपने देह और रक्त को अत्यंत दर्द के साथ तुम लोगों को सौंपा है—तो फिर क्यों तुम लोग अभी भी अपनी आँखें फेर लेते हो? हर किसी के सामने, तुम लोग परमेश्वर के आगमन को अस्वीकार करते हो, और परमेश्वर की दोस्ती को मना करते हो। तुम लोग इतने अभद्र क्यों हो? क्या तुम लोग ऐसे अंधियारे समाज में अन्याय को सहन करने के लिए तैयार हो? शत्रुता की सहस्राब्दियों के साथ स्वयं को भरने के बजाय, तुम लोग क्यों शैतानों के राजा के "बकवास" के साथ स्वयं को छलते हो?

— "वचन देह में प्रकट होता है" में 'कार्य और प्रवेश (8)' से उद्धृत

21. परमेश्वर के कार्य के रास्ते में बाधाएं कितनी बड़ी हैं? क्या कभी किसी को पता चला है? गहरे बैठे अंधविश्वासी रंगों से घिरे लोगों में से कौन परमेश्वर के सच्चे चेहरे को जानने में सक्षम है? इस ऊपरी और बेतुके पिछड़े सांस्कृतिक ज्ञान के साथ वे कैसे पूरी तरह से परमेश्वर की बातों को समझ सकते हैं? यहाँ तक कि जब उनसे आमने-सामने बात की जाती है और मुँह से मुँह तक पोषित किया जाता है, तो भी वे कैसे समझ सकते हैं? कभी-कभी ऐसा लगता है कि परमेश्वर के वचन बहरे कानों पर पड़ते हैं: लोगों की थोड़ी-सी भी प्रतिक्रिया नहीं होती है, वे अपना सिर हिलाते हैं और कुछ नहीं समझते। यह चिंताजनक कैसे नहीं हो सकता? इस "दूरस्थ,[17] प्राचीन सांस्कृतिक इतिहास और सांस्कृतिक ज्ञान" ने लोगों के एक बेकार समूह को विकसित किया है। यह प्राचीन संस्कृति—बहुमूल्य विरासत—बकवास का ढेर है! यह बहुत पहले ही एक चिरस्थायी शर्मिंदगी बन गई, और उल्लेख करने लायक भी नहीं है! इसने लोगों को परमेश्वर का विरोध करने की चालें और तकनीकें सिखा दी हैं, और राष्ट्रीय शिक्षा के "क्रमित, सौम्य मार्गदर्शन"[18] ने लोगों को परमेश्वर के प्रति अधिक अवज्ञाकारी बना दिया है। परमेश्वर के कार्य का हर हिस्सा बहुत मुश्किल है, और पृथ्वी पर अपने कार्य का हर कदम परमेश्वर के लिए परेशानी का कारण है। पृथ्वी पर उसका कार्य कितना मुश्किल है! पृथ्वी पर परमेश्वर के कार्य के कदमों में बड़ी कठिनाई शामिल है: मनुष्य की कमज़ोरी, कमियों, बचपना, अज्ञानता और मनुष्य ही हर चीज़ के लिए, परमेश्वर सावधानीपूर्वक योजना बनाता है और ध्यानपूर्वक विचार करता है। मनुष्य एक कागज़ी बाघ की तरह है जिसे कोई पकड़ने या भड़काने की हिम्मत नहीं करता; हल्के-से स्पर्श से वह काट लेता है, या फिर नीचे गिर जाता है और अपना रास्ता खो देता है, और ऐसा लगता है कि एकाग्रता की थोड़ी-सी कमी पर वह पुनः वापस चला जाता है, या फिर परमेश्वर की उपेक्षा करता है, या फिर अपने शरीर की अशुद्ध चीज़ों का आनंद उठाने के लिए अपने माता-पिता के सुअरों की ओर भागता है। यह कितनी बड़ी बाधा है! व्यावहारिक रूप से अपने कार्य के प्रत्येक कदम पर, परमेश्वर को प्रलोभन के अधीन किया जाता है, और लगभग हर कदम पर परमेश्वर को बड़े खतरे का जोखिम होता है। उसके वचन निष्कपट और ईमानदार हैं, और बिना द्वेष के हैं, फिर भी कौन हैं जो उन्हें स्वीकार करने को तैयार हैं? कौन है जो पूरी तरह से स्वयं को अर्पित करने को कौन तैयार है? यह परमेश्वर के दिल को तोड़ देता है। वह मनुष्यों के लिए दिन-रात कष्ट सहता है, वह मनुष्यों के जीवन के लिए चिंता से घिरा रहता है, और वह मनुष्य की कमज़ोरी के साथ सहानुभूति रखता है। अपने बोले गए सभी वचनों के लिए उसने अपने कार्य के प्रत्येक चरण में कई मोड़ और मुश्किलों का सामना किया है; वह हमेशा एक चट्टान और सख्त जगह के बीच फंसा रहता है, और मनुष्य की कमज़ोरी, अवज्ञा, बचपने और भेद्यता के बारे में दिन-रात बार-बार सोचता है। यह किसे पता है? वह किस पर विश्वास कर सकता है? कौन समझ सकेगा? वह मनुष्यों के पापों और हिम्मत की कमी, और दुर्बलता से हमेशा घृणा करता है, और वह हमेशा मनुष्य की भेद्यता के बारे में चिंता करता है, और उस राह के बारे में विचार करता है जो भविष्य में मनुष्य के सामने आने वाला है; हमेशा, जब वह मनुष्य के वचनों और कर्मों को देखता है, तो वह दया, और क्रोध से भर जाता है, और हमेशा इन चीज़ों के देखने से उसके दिल में दर्द पैदा होता है। निर्दोष, आखिरकार, स्तब्ध हो चुके हैं; क्यों परमेश्वर को हमेशा उनके लिए चीज़ों को मुश्किल करना होता है? कमज़ोर मनुष्य में पूरी तरह से दृढ़ता की कमी है; क्यों परमेश्वर हमेशा उसके लिए ऐसा क्रोध रखता है जो कभी समाप्त नहीं होता? कमज़ोर और निर्बल मनुष्य में अब थोड़ी-सी भी जीवन-शक्ति नहीं बची है; क्यों परमेश्वर को हमेशा उसकी अवज्ञा के लिए उसे डाँटना होता है? स्वर्ग में परमेश्वर की धमकियों का सामना कौन कर सकता है? आखिरकार, मनुष्य नाज़ुक और हताशा की स्थिति में है, परमेश्वर ने अपना गुस्से अपने दिल में गहराई तक पहुँचा दिया है, ताकि मनुष्य धीरे-धीरे स्वयं पर विचार कर सके। फिर भी मनुष्य, जो गंभीर संकट में है, परमेश्वर की इच्छा की थोड़ी-सी भी सराहना नहीं करता; उसे शैतानों के बूढ़े राजा के पैरों तले कुचल दिया गया है, फिर भी वह पूरी तरह से अनजान है, वह हमेशा परमेश्वर के विरुद्ध स्वयं को रख देता है, या फिर उसकी परवाह नहीं करता। परमेश्वर ने कई वचन कहे हैं, फिर भी किसने उन्हें कभी गंभीरता से लिया है? मनुष्य परमेश्वर के वचनों को नहीं समझता, फिर भी वह बेफ़िक्र और बिना किसी तड़प के रहता है, और कभी भी उसने बूढ़े शैतान का सार असल में नहीं जाना है। लोग अधोलोक में, नरक में रह रहे हैं, लेकिन मानते हैं कि वे समुद्र तल के महल में रह रहे हैं; उन्हें बड़े लाल अजगर द्वारा सताया जाता है, फिर भी उन्हें लगता है कि उन्हें देश के द्वारा कृपा[19] प्राप्त हो रही है; शैतान उनका उपहास करता है, फिर भी उन्हें लगता है कि वे शरीर की उत्कृष्ट कलात्मकता का आनंद ले रहे हैं। कितने मैले, नीच व्यक्तियों का यह समूह है! मनुष्य दुर्भाग्य का सामना कर चुका है, लेकिन उसे पता नहीं है, और इस अंधियारे समाज में उसे एक के बाद एक दुर्घटनाओं का सामना करना[20] पड़ता है, फिर भी वह इससे जाग नहीं पाया है। कब वह अपनी आत्म-दया और दासता के स्वभाव से छुटकारा पाएगा? क्यों उसे परमेश्वर के दिल की कोई चिंता नहीं है? क्या वह चुपचाप इस दमन और कठिनाई को अपना लेता है? क्या वह उस दिन की इच्छा नहीं रखता जब वह अंधेरे को प्रकाश में बदल सके? क्या वह एक बार फिर धार्मिकता और सत्य के विरुद्ध हो रहे अन्याय को रोकना नहीं चाहता? जब लोग सत्य को त्याग देते हैं और तथ्यों को तोड़-मरोड़ देते हैं, तो क्या वह देखते रहने और कुछ न करने के लिए तैयार है? क्या वह इस दुर्व्यवहार को सहते रहने में खुश है? क्या वह दास बने रहना चाहता है? क्या वह इस असफल राज्य के गुलामों के साथ परमेश्वर के हाथ नष्ट होने को तैयार है? तुम्हारा संकल्प कहां है? तुम्हारी महत्वाकांक्षा कहां है? तुम्हारी गरिमा कहां है? तुम्हारा सम्मान कहां है? तुम्हारी स्वतंत्रता कहां है? क्या तुम शैतानों के राजा, बड़े लाल अजगर के लिए अपने पूरे जीवन को अर्पित करना[21] चाहते हो? क्या तुम ख़ुश हो कि वह तुम्हें यातना देते-देते मौत के घाट उतार दे? गहराई का चेहरा अराजक और अंधियारा है, सामान्य लोग ऐसे दुखों का सामना करते हुए, स्वर्ग की ओर देखकर रोते हैं और पृथ्वी को शिकायत करते हैं। मनुष्य कब अपने सिर को ऊँचा रख पाएगा? मनुष्य कमज़ोर और दुर्बल है, वह इस क्रूर और अत्याचारी शैतान से कैसे संघर्ष कर सकता है? वह क्यों नहीं जितनी जल्दी हो सके परमेश्वर को अपना जीवन सौंप देता है? वह क्यों अभी भी डगमगाता है, जब वह परमेश्वर का कार्य समाप्त कर सकता है? इस प्रकार बिना किसी उद्देश्य से दंड और दमन सहते हुए, उसका पूरा जीवन अंततः व्यर्थ हो जाएगा; वह आने के लिए इतनी जल्दी में क्यों है, और जाने की उसे इतनी जल्दी क्यों है? क्यों नहीं वह परमेश्वर को देने के लिए कुछ अनमोल रखता है? क्या वह घृणा की सहस्त्राब्दियों को भूल गया है?

— "वचन देह में प्रकट होता है" में 'कार्य और प्रवेश (8)' से उद्धृत

22. गहरी नस्लीय परंपराओं और मानसिक दृष्टिकोण ने लंबे समय से मनुष्य के शुद्ध और बाल-सुलभ उत्साह पर ग्रहण लगा रखा है, मनुष्य की आत्मा पर उन्होंने थोड़ी-सी भी मानवता के बिना हमला किया है, जैसे कि कोई भावना या आत्म-बोध ही न हो। इन राक्षसों के तरीक़े बेहद बेरहम हैं, और ऐसा लगता है कि "शिक्षा" और "पोषण" पारंपरिक तरीके बन गए हैं जिनके द्वारा दुष्टों का राजा मनुष्य की हत्या करता है; अपनी "गहन शिक्षा" का उपयोग कर यह पूरी तरह से अपनी बदसूरत आत्मा को छिपा लेता है, भेड़ के पहनावे में खुद को सँवार कर, ताकि मनुष्य को भरोसा हो जाए और उसके बाद यह उसका लाभ उठाता है जब वह सो रहा हो, पूरी तरह से उसे खा जाने के लिए। बेचारे मानव—वे यह कैसे जान पाते कि जिस भूमि पर उन्हें पाला-पोसा गया था वह शैतान का देश है, कि जिसने उन्हें पाला था, वह वास्तव में एक दुश्मन है जो उन्हें दुख देता है। फिर भी मनुष्य बिल्कुल जागता नहीं है; अपनी भूख और प्यास को बुझाकर, वह अपने "माता-पिता" द्वारा परवरिश की "दया" का ऋण चुकाने के लिए तैयार होता है। मनुष्य ऐसा ही है। वह आज भी नहीं जानता है कि जिस राजा ने उसे बड़ा किया, वह उसका दुश्मन है। धरती पर मृतकों की हड्डियाँ बिखरी पड़ी हैं, शैतान बिना रुके पागलों की तरह जश्न मनाता है, और "अधोलोक" में मनुष्यों के मांस को निगलता जाता है, मानव कंकालों के साथ कब्र को साझा करते हुए और मनुष्यों के क्षत-विक्षत देह के अंतिम अवशेषों का उपभोग करने का निरर्थक प्रयास करते हुए। फिर भी मनुष्य सदैव अनजान है, और शैतान को अपने दुश्मन के रूप में कभी नहीं मानता है, बल्कि पूरे दिल से उसकी सेवा करता है। इस तरह के भ्रष्ट लोग परमेश्वर को जानने में बिलकुल असमर्थ होते हैं। क्या परमेश्वर के लिए देह धारण कर उनके बीच में आना, और उद्धार के अपने सारे कार्य को पूरा करना आसान है? कैसे मनुष्य, जो पहले से ही अधोलोक में गिर चुका है, परमेश्वर की अपेक्षाओं को पूरा करने में सक्षम हो सकता था? मानव जाति के कार्य के लिए परमेश्वर ने बहुत सारी रातों को बिना नींद के गुजारना सहन किया है। बहुत ऊपर से सबसे नीची गहराई तक, जीवित नरक में जहाँ मनुष्य रहता है, वह मनुष्य के साथ अपने दिन गुजारने के लिए उतर आया है, कभी भी मनुष्य के बीच फटेहाली की शिकायत नहीं की है, उसकी अवज्ञा के लिए कभी भी मनुष्य को तिरस्कृत नहीं किया है, बल्कि वह व्यक्तिगत रूप से अपने कार्य को करते हुए सबसे बड़ा अपमान सहन करता है। परमेश्वर कैसे नरक से संबंधित हो सकता है? वह नरक में अपना जीवन कैसे बिता सकता है? लेकिन समस्त मानव जाति के लिए, पूरी मानवजाति को जल्द ही आराम मिल सके इसके लिए, उसने अपमान को सहन किया और पृथ्वी पर आने के अन्याय का सामना किया, और मनुष्य को बचाने की खातिर व्यक्तिगत रूप से "नरक" और "अधोलोक" में, बाघ की माँद में, प्रवेश किया। परमेश्वर का विरोध करने के लिए मनुष्य कैसे योग्य हो सकता है? परमेश्वर के बारे में शिकायत करने के लिए उसके पास क्या कारण है? कैसे वह परमेश्वर की ओर नज़र उठाकर देखने की हिम्मत कर सकता है? स्वर्ग का परमेश्वर बुराई की इस सबसे गंदी भूमि में आया है, और कभी भी उसने अपने कष्टों के बारे में शिकायत नहीं की है, या मनुष्य के बारे में गिला नहीं किया है, बल्कि वह चुपचाप मनुष्य द्वारा किये गए विनाश[22] और अत्याचार को स्वीकार करता है। कभी भी उसने मनुष्य की अनुचित मांगों का प्रतिकार नहीं किया, कभी भी उसने मनुष्य से अत्यधिक मांगें नहीं की, और कभी भी उसने मनुष्य से ग़ैरवाजिब तकाज़े नहीं किये; वह केवल बिना किसी शिकायत के मनुष्य द्वारा अपेक्षित सभी कार्य करता है: शिक्षा देना, ज्ञान प्रदान करना, डाँटना-फटकारना, शब्दों का परिशोधन करना, याद दिलाना, प्रोत्साहन देना, सांत्वना देना, न्याय करना, और प्रकट करना। उसका कौन-सा कदम मनुष्य के जीवन की खातिर नहीं है? यद्यपि उसने मनुष्यों की संभावनाओं और प्रारब्ध को हटा दिया है, परमेश्वर द्वारा उठाया गया कौन-सा कदम मनुष्य के भाग्य के लिए नहीं रहा हैं? उनमें से कौन-सा मनुष्य के अस्तित्व के लिए नहीं रहा है? उनमें से कौन-सा कदम रात की तरह काली अँधेरी ताकतों के इस उत्पीड़न से और अत्याचार से मनुष्य को मुक्त करने के लिए नहीं रहा है? उनमें से कौन-सा मनुष्य की खातिर नहीं है? परमेश्वर के हृदय को कौन समझ सकता है, जो एक प्रेमपूर्ण मां की तरह है? कौन परमेश्वर के उत्सुक हृदय को समझ सकता है? परमेश्वर के भावुक हृदय और उसकी उत्कट आशाओं का प्रतिफल ठंडे दिलों के साथ, कठोर, उदासीन आँखों के साथ, लोगों की दोहराई जाने वाली प्रतिक्रियाओं और अपमानों के साथ, तीक्ष्ण आलोचना के साथ, उपहास, और अनादर के साथ दिया गया है, इनके बदले में मनुष्य का व्यंग, उसकी कुचलन और अस्वीकृति, उसकी गलतफहमी, उसका विलाप, मनो-मालिन्य, परिहार, उसके धोखे, हमले और उसकी कड़वाहट के अलावा अन्य कुछ भी नहीं मिला है। स्नेही शब्दों को मिली हैं उग्र भौंहों और हजारों मचलती अँगुलियों की ठंडी अवज्ञा। परमेश्वर केवल सिर झुका कर, लोगों की सेवा करते हुए एक राज़ी बैल[23] की तरह सहन कर सकता है। बहुत बार सूर्य और चन्द्रमा, बहुत बार सितारों का उसने सामना किया है, बहुत बार वह भोर में निकल कर गोधूलि में लौटा है, छटपटाया है और करवटें बदलीं हैं, अपने पिता से विरह की तुलना में हजार गुना ज्यादा पीड़ा को सहते हुए, मनुष्य के हमलों और तोड़-फोड़, और मनुष्य से निपटने और उसकी छंटाई करने को बर्दाश्त करते हुए। परमेश्वर की विनम्रता और अदृष्टता का प्रतिफल मनुष्य के पूर्वाग्रह[24] से चुकाया गया है, मनुष्य के अनुचित विचारों और व्यवहार के साथ, से और परमेश्वर की गुमनामी, तितिक्षा और सहिष्णुता का ऋण मनुष्य की लालची निगाह से चुकाया गया है; मनुष्य परमेश्वर को बिना किसी मलाल के, घसीट कर मार डालने की कोशिश करता है और परमेश्वर को जमीन में कुचल देने का प्रयास करता है। परमेश्वर के प्रति अपने व्यवहार में मनुष्य का रवैया "अजीब चतुराई" का है, और परमेश्वर को, जिसे मनुष्य द्वारा डराया-धमकाया गया है और जो घृणित है, हजारों लोगों के पैरों के नीचे कुचलकर निर्जीव कर दिया जाता है, जबकि मनुष्य स्वयं ऊंचा खड़ा होता है, जैसे कि वह किले का राजा हो, जैसे कि वह परदे के पीछे से अपना दरबार चलाने के लिए, सम्पूर्ण सत्ता हथियाना[25] चाहता हो, परमेश्वर को रंगमंच के पीछे एक नेक और नियम-बद्ध निदेशक बनाने के लिए, जिसे पलट कर लड़ने या मुश्किलें पैदा करने की अनुमति नहीं है; परमेश्वर को अंतिम सम्राट की भूमिका अदा करनी होगी, उसे हर तरह की स्वतंत्रता से रहित एक कठपुतली[26] बनना होगा। मनुष्य के कर्म अकथनीय हैं, तो कैसे वह परमेश्वर से यह या वह मांगने के योग्य है? वह कैसे परमेश्वर को सुझाव देने के योग्य है? वह कैसे यह माँग करने के योग्य है कि परमेश्वर उसकी कमजोरियों के साथ सहानुभूति रखे? वह कैसे परमेश्वर की दया पाने के योग्य है? वह कैसे बार-बार परमेश्वर की उदारता प्राप्त करने के योग्य है? वह कैसे बार-बार परमेश्वर की क्षमा पाने के योग्य है? उसकी अंतरात्मा कहाँ है? उसने बहुत पहले परमेश्वर का दिल तोड़ दिया था, एक लंबे समय से उसने परमेश्वर का दिल टुकड़े-टुकड़े करके छोड़ दिया है। परमेश्वर उज्ज्वल आँखें और अदम्य उत्साह लिए मनुष्यों के बीच आया था, यह आशा करते हुए कि मनुष्य उसके प्रति दयालु होगा, भले ही उसकी गर्मजोशी थोड़ी-सी ही रही हो। फिर भी, परमेश्वर के दिल के लिए मनुष्य का आश्वासन धीमा है, जो कुछ उसने प्राप्त किया है वे केवल तेजी से बढ़ते[27] हमले और यातना हैं; मनुष्य का दिल बहुत लालची है, उसकी इच्छा बहुत बड़ी है, वह कभी भी संतृप्त नहीं होगा, वह हमेशा शरारती और उजड्ड होता है, वह कभी भी परमेश्वर को बोलने की कोई आज़ादी या अधिकार नहीं देता, और अपमान के सामने सिर झुकाने, और मनुष्य द्वारा उसके साथ की गई मनमानी को स्वीकार करने के अलावा परमेश्वर के लिए कोई भी विकल्प नहीं छोड़ता।

— "वचन देह में प्रकट होता है" में 'कार्य और प्रवेश (9)' से उद्धृत

23. सृष्टि से लेकर अब तक, परमेश्वर ने इतनी पीड़ा सहन की है, और इतने सारे हमलों का सामना किया है। पर आज भी, मनुष्य परमेश्वर से अपनी माँगे कम नहीं करता है, वह आज भी परमेश्वर की जाँच-पड़ताल करता है, आज भी उसमें उसके प्रति कोई सहिष्णुता नहीं है, और उसे सलाह देने, आलोचना करने और अनुशासित करने के अलावा मनुष्य और कुछ भी नहीं करता है, जैसे कि उसे गहरा भय हो कि परमेश्वर भटक जाएगा, कि पृथ्वी पर परमेश्वर पाशविक और अनुचित है, या दंगा कर रहा है, या वह कुछ भी काम का न रह जाएगा। मनुष्य का परमेश्वर के प्रति हमेशा इस तरह का रवैया रहा है। यह कैसे परमेश्वर को दुखी नहीं करता? देह धारण करने में, परमेश्वर ने जबरदस्त वेदना और अपमान को सहन किया है; मनुष्य की शिक्षाओं को स्वीकार करने के लिये परमेश्वर की और कितनी दुर्गति होगी? मनुष्य के बीच उसके आगमन ने उसकी सारी स्वतंत्रता छीन ली है, जैसे कि उसे अधोलोक में बंदी बना लिया गया हो, और उसने मनुष्य के विश्लेषण को थोड़े-से भी प्रतिरोध के बिना स्वीकार कर लिया है। क्या यह शर्मनाक नहीं है? एक सामान्य व्यक्ति के परिवार के बीच आने में, "यीशु" ने सबसे बड़ा अन्याय सहन किया है। इससे भी अधिक अपमानजनक यह है कि वह इस धूल भरी दुनिया में आ गया है और उसने खुद को बहुत ही नीचे तक झुका लिया है, और अधिकतम सामान्यता का देह ग्रहण किया है। एक मामूली व्यक्ति बनने में, क्या सर्वोच्च परमेश्वर को मुश्किल नहीं भुगतनी पड़ती है? और क्या यह सब मानव जाति के लिए नहीं है? क्या किसी भी समय ऐसा हुआ जब वह खुद के लिए सोच रहा था? यहूदियों द्वारा खारिज कर दिये जाने और मार दिए जाने, और लोगों द्वारा उसका उपहास और तिरस्कार किये जाने के बाद उसने न तो कभी स्वर्ग में शिकायत की, न ही धरती पर विरोध किया। आज, यह सहस्राब्दियों पुरानी त्रासदी इन यहूदी जैसे लोगों के बीच फिर से प्रकट हुई है। क्या वे उसी पाप को नहीं दुहरा रहे? परमेश्वर के वादों को पाने के लिए मनुष्य को क्या योग्य बनाता है? क्या वह परमेश्वर का विरोध कर बाद में उसका आशीर्वाद स्वीकार नहीं करता है? क्यों मनुष्य कभी न्याय का सामना नहीं करता, या सच्चाई की तलाश नहीं करता है? क्यों उसे परमेश्वर के कार्य में कोई रुचि नहीं है? उसकी धार्मिकता कहाँ है? उसकी निष्पक्षता कहाँ है? क्या वह परमेश्वर का प्रतिनिधित्व करने का दम रखता है? न्याय की उसकी समझ कहाँ है? मनुष्य को जो प्रिय है उसमें से कितना परमेश्वर को प्रिय है? मनुष्य खड़िया और पनीर का भेद नहीं बता सकता[28] है, वह हमेशा काले और सफ़ेद रंगों के बारे में भ्रमित[29] रहता है, वह न्याय और सच्चाई का दमन करता है, और अन्याय और अधर्म को हमेशा ऊपर ऊँचा उठाता है। वह प्रकाश को दूर भगाता है, और अंधेरों में कूदता-फाँदता है। जो लोग सच्चाई और न्याय की तलाश करते हैं, वे इसके बजाय प्रकाश को दूर भगाते हैं, जो परमेश्वर की तलाश करते हैं, वे उसे अपने पैरों के नीचे रौंदते हैं, और खुद को आकाश में ऊँचा फहराते हैं। मनुष्य एक डाकू[30] से भिन्न नहीं है। उसका विवेक कहाँ है? कौन सही-गलत का भेद कह सकता है? कौन न्याय कर सकता है? कौन सच्चाई के लिए दुःख सहना चाहता है? लोग शातिर और शैतान हैं! परमेश्वर को सूली पर चढ़ाने के बाद वे ताली बजाते और खुश होते हैं, उनकी असभ्य चीखें अंतहीन होती हैं। वे मुर्गियों और कुत्तों की तरह हैं, वे सह-षड्यंत्रकारी और धूर्त हैं, उन्होंने अपना राज्य स्थापित किया है, उनकी दखल ने कोई जगह नहीं छोड़ी है, वे अपनी आँखें बंद कर लेते हैं और पागलपन से गुर्राते फिरते हैं, सभी एक साथ घुसे हुए हैं, और गंद का माहौल फैला हुआ है, काफी हलचल और चटक है, और जो खुद को आँखें मूँद कर दूसरों से जोड़ते हैं, वे उभरते रहते हैं, सभी अपने पूर्वजों के "शानदार" नामों को पकड़े रहते हैं। इन कुत्तों और मुर्गियों ने बहुत पहले परमेश्वर को अपने मस्तिष्क के पीछे डाल दिया है, और परमेश्वर के दिल की स्थिति पर कभी भी ध्यान नहीं दिया। परमेश्वर का यह कहना कोई आश्चर्य नहीं है कि मनुष्य एक कुत्ते या मुर्गी की तरह है, एक भौंकने वाला कुत्ता जो सौ दूसरों के चीखने का कारण बनता है; इस तरह, बहुत शोरगुल के साथ मनुष्य परमेश्वर के कार्य को आज के दिन तक ले आया है, इस बात से बिलकुल अनभिज्ञ कि परमेश्वर का कार्य क्या है, कि क्या इसमें न्याय है, कि क्या परमेश्वर के पास कोई एक ऐसी जगह है जहाँ उसे कदम रखना है, कि कल का दिन कैसा है, या फिर वह अपनी नीचता और अपनी गंदगी के बारे में अनभिज्ञ है। मनुष्य ने चीज़ों के बारे में ख़ास कुछ कभी नहीं सोचा है, उसने कल के बारे में खुद कभी चिंता नहीं की है, और जो कुछ फायदेमंद और अनमोल है उसे अपनी बाँहों में इकट्ठा कर लिया है, और रद्दी तथा बचे-खुचे[31] के सिवाय परमेश्वर के लिए कुछ नहीं छोड़ा है। मानवजाति कितनी क्रूर है! मानव के पास परमेश्वर के लिए कोई भावना नहीं बची है, और परमेश्वर का सब कुछ गुप्त रूप से निगल जाने के बाद, उसके अस्तित्व की तरफ अब और ध्यान न देते हुए, उसने उसे अपने बहुत पीछे उछाल फेंका है। वह परमेश्वर का आनंद तो लेता है, परन्तु परमेश्वर का विरोध करता है, और उसे पैरों तले कुचलता है, जबकि उसके मुंह में वह परमेश्वर का धन्यवाद और उसकी प्रशंसा करता है; वह परमेश्वर से प्रार्थना करता है, और परमेश्वर पर निर्भर रहता है, साथ ही परमेश्वर को धोखा भी देता है; वह परमेश्वर के नाम का "गुणगान" करता है और परमेश्वर के मुख की ओर नज़रें उठाता है, फिर भी वह बेरहमी से और बेशर्मी से परमेश्वर के सिंहासन पर बैठ जाता है और परमेश्वर की "अधर्मिता" का न्याय करता है; उसके मुंह से तो ऐसे शब्द आते हैं कि वह ईश्वर का ऋणी है, और वह परमेश्वर के शब्दों को देखता है, परन्तु फिर भी अपने दिल में वह परमेश्वर पर प्रहार करता है; वह ईश्वर के प्रति "सहिष्णु" है, फिर भी वह परमेश्वर पर अत्याचार करता है और उसका मुंह कहता है कि यह परमेश्वर की खातिर है; अपने हाथों में वह परमेश्वर की चीजों को रखता है, और अपने मुंह में वह उस भोजन को चबाता है जो परमेश्वर ने उसे दिया है, फिर भी उसकी आँखें परमेश्वर पर एक ठंडी और भावनारहित नज़र रखती हैं, मानो कि वह उसे पूरी तरह से गप कर जाने की इच्छा रखता हो; वह सच्चाई को देखता है लेकिन कहता है कि यह शैतान की चाल है; वह न्याय पर निगाह डालता है, लेकिन इसे आत्म-त्याग बन जाने के लिए मजबूर करता है; वह मनुष्यों के कामों को देखता है, पर इस बात पर जोर देता है कि वे ही परमेश्वर हैं; वह मनुष्यों की प्राकृतिक प्रतिभाओं को देखता है लेकिन आग्रह करता है कि वे ही सत्य हैं; वह परमेश्वर के कार्यों पर नज़र डालता है लेकिन इस पर जोर देता है कि वे अहंकार और अभिमान, शेखी और दंभ हैं; जब मनुष्य परमेश्वर की ओर देखता है, तो वह उसे मानव के रूप में अंकित करने पर ज़ोर देता है, और उसे एक ऐसे सृष्ट जीव की जगह पर बिठाने की कोशिश करता है जो शैतान के साथ मिलीभगत में हो; वह पूरी तरह से जानता है कि वे परमेश्वर की उक्तियाँ हैं, फिर भी उन्हें किसी व्यक्ति के लेखन के अलावा और कुछ नहीं कहेगा; वह पूरी तरह से जानता है कि आत्मा देह में सिद्ध होती है, कि परमेश्वर देह बन जाता है, लेकिन केवल यही कहता है कि यह देह शैतान का वंशज है; वह पूरी तरह से जानता है कि परमेश्वर विनम्र और छिपा हुआ है, फिर भी कहता है कि शैतान लज्जित हुआ है, और परमेश्वर जीत गया है। ये कैसे निकम्मे लोग हैं! मनुष्य तो रक्षक कुत्तों के रूप में सेवा करने के योग्य भी नहीं है! वह काले और सफ़ेद के बीच तो भेद नहीं करता है, यहाँ तक कि वह जानबूझकर काले रंग को तोड़-मरोड़ कर सफेद बनाता है। क्या मनुष्य की ताकतें और मनुष्य के घेरे परमेश्वर की मुक्ति के दिन को बर्दाश्त कर सकेंगे? जानबूझकर परमेश्वर का विरोध करने के बाद मनुष्य बेपरवाह है, या वह उसे मार डालने की हद तक भी चला जाता है, परमेश्वर खुद को दिखा सके इसका मौका ही न छोड़ते हुए। कहाँ है धार्मिकता? प्रेम कहाँ है? वह परमेश्वर के पास बैठता है, और परमेश्वर को धकेलता है कि वह घुटनों पर गिर कर माफ़ी माँगे, उसकी सारी व्यवस्थाओं का पालन करे, उसकी सभी चालाकियों को स्वीकार करे, और वह परमेश्वर जो कुछ भी करे उसमें उसकी सलाह लेने को कहता है, वर्ना वह फिर भड़क जाता है[32] और आग बबूला हो उठता है। अंधेरे के इस तरह के प्रभाव के तहत जो काले को सफ़ेद में बदल देता है, परमेश्वर कैसे दु:ख से ग्रस्त न होता? वह कैसे चिंता नहीं करता? ऐसा क्यों कहा जाता है कि जब परमेश्वर ने अपना नवीनतम कार्य शुरू किया, तो यह स्वर्ग और पृथ्वी का सृजन करने के कार्य के समान था? एक नए युग की सुबह की तरह था? मनुष्य के कर्म इतने "समृद्ध" हैं, "जीवित जल के सदैव बहते हुए कूप-स्रोत" मनुष्य के दिल के क्षेत्र को निरंतर "फिर से भरते हैं", जबकि मनुष्य का "जीवित जल का कूप-स्रोत" परमेश्वर के साथ बेझिझक[33] प्रतिस्पर्धा करता है; ये दोनों परस्पर विरोधी हैं, और यह परमेश्वर की जगह पर लोगों को दंड से मुक्ति का प्रावधान देता है, जबकि मनुष्य इसमें शामिल खतरों के विषय में सोचे बिना इसके साथ सहयोग करता है। और इसका क्या प्रभाव है? वह उपेक्षापूर्वक ईश्वर को एक तरफ हटा देता है, और उसे बहुत दूर कर देता है, जहाँ लोग उसकी ओर ध्यान नहीं दें, इस बात से भयभीत कि परमेश्वर उनका ध्यान आकर्षित कर लेगा, और वह बेहद डरा हुआ है कि परमेश्वर के जीवित जल के कूप-स्रोत मनुष्य को लुभा लेंगे और मनुष्य को प्राप्त कर लेंगे। इस प्रकार, कई वर्षों की सांसारिक चिंताओं का सामना करने के बाद, वह परमेश्वर के खिलाफ कपट और षड्यंत्र करता है, और यहां तक कि परमेश्वर को अपनी फटकार का लक्ष्य भी बना देता है। ऐसा लगता है कि परमेश्वर उसकी आँखों में एक कुंदा-सा बन गया है, और वह परमेश्वर को पकड़ने और उसे अग्नि में निर्मल तथा शुद्ध करने के लिए बेताब है। परमेश्वर की असुविधा को देख कर, मनुष्य अपनी छाती पीटता और हँसता है, वह खुशी के मारे नाचता है, और कहता है कि परमेश्वर को भी शुद्धिकरण में डुबो दिया गया है, और कहता है कि वह परमेश्वर की मलीन अशुद्धताओं को भस्म कर देगा, जैसे कि केवल यही तर्कसंगत और विवेकपूर्ण हो, जैसे कि केवल ये ही स्वर्ग के निष्पक्ष और उचित तरीके हों। मनुष्य का यह हिंसक व्यवहार संकल्पित और बेसुध दोनों ही लगता है। मनुष्य अपने बदसूरत चेहरे और अपना घृणित, गंदा आत्मा दोनों को ही प्रकट करता है, साथ ही साथ एक भिखारी की दयनीय शकल को भी; दूर-दूर तक उपद्रव करने के बाद, वह एक दयनीय सूरत बना लेता है और स्वर्ग से क्षमा के लिए भीख माँगता है, और एक अत्यंत दयनीय पिल्ले की तरह दिखता है। मनुष्य हमेशा अप्रत्याशित तरीकों से काम करता है, वह हमेशा "दूसरों को डराने के लिए शेर की पीठ पर सवारी करता है",[ख] वह हमेशा एक भूमिका निभा रहा होता है, परमेश्वर के दिल के बारे में वह जरा भी विचार नहीं करता, न ही वह अपनी स्थिति से कोई तुलना करता है। वह तो चुपचाप केवल परमेश्वर का विरोध करता है, जैसे कि परमेश्वर ने उसके साथ कोई अन्याय कर रखा हो और उसे इस तरह से व्यवहार नहीं करना चाहिए था, और जैसे कि स्वर्ग की आँखें न हों और जानबूझकर वह चीजों को उसके लिए कठिन बनाता हो। इस प्रकार मनुष्य हमेशा चुपके-चुपके साज़िशें रचता है और वह परमेश्वर से अपनी मांगें थोड़ी-सी भी कम नहीं करता, हिंसक आँखों से देखता है, परमेश्वर के हर कदम को उग्रता से घूरता है, कभी यह नहीं सोचता कि वह परमेश्वर का दुश्मन है, और यह उम्मीद करता है कि वह दिन आएगा जब परमेश्वर कुहासे को काट देगा, और चीज़ों को स्पष्ट करेगा, और उसे "बाघ के मुंह" से बचाएगा और उसकी ओर से प्रतिशोध ले लेगा। आज भी, लोग यह नहीं सोचते हैं कि वे परमेश्वर का विरोध करने की भूमिका निभा रहे हैं, ऐसी भूमिका जो युगों से बहुतों ने निभाई है; वे कैसे जान सकते हैं कि जो कुछ भी वे करते हैं, उसमें वे लंबे समय से भटक गए हैं, कि वे जो कुछ भी समझते थे वह सब समुद्रों ने कब का निगल लिया है।

— "वचन देह में प्रकट होता है" में 'कार्य और प्रवेश (9)' से उद्धृत

24. मानवता का इतनी दूरी तक प्रगति कर लेना एक ऐसी स्थिति है जिसका कोई पूर्व उदाहरण नहीं। परमेश्वर का कार्य और मनुष्य का प्रवेश कंधे से कंधा मिलाकर आगे बढ़ते हैं, और इस प्रकार परमेश्वर का कार्य भी एक शानदार मौका है जो बेमिसाल है। मनुष्य का आज तक का प्रवेश एक ऐसा आश्चर्य है जिसकी किसी मानव ने पहले कभी कल्पना नहीं की थी। परमेश्वर का कार्य अपने शिखर पर पहुँच गया है—और, बाद में, मनुष्य का "प्रवेश"[34] भी अपनी पराकाष्ठा पर पहुँच गया है। परमेश्वर ने अपने आप को इतना नीचे उतारा है जितना कि वह संभवतः उतार सकता था, और कभी भी उसने मानव जाति या विश्व और समस्त चीजों के सामने विरोध नहीं किया। इस बीच, मनुष्य परमेश्वर के सिर पर खड़ा है, उसे चरम सीमा तक उत्पीड़न देते हुए; सब कुछ अपनी चोटी पर पहुँच गया है, और वह दिन आ गया है जब धार्मिकता प्रकट होती है। क्यों उदासी को धरती पर छा जाने देते रहें, और अंधेरे को सभी लोगों को ढँकने देते रहें? परमेश्वर हजारों वर्षों तक, यहाँ तक कि हजारों दशकों तक, देखता रहा है—और उसकी सहिष्णुता बहुत समय पहले अपनी पराकाष्ठा पर पहुँच गई है। वह मानव जाति की प्रत्येक हरकत को देख रहा है, वह यह देख रहा है कि इंसान की कुटिलता कितनी देर तक आतंक मचाएगी, और फिर भी मनुष्य, जो लंबे समय से सुन्न हो गया है, कुछ भी महसूस नहीं करता। और किसने कभी भी परमेश्वर के कार्यों को देखा है? किसने कभी अपनी नज़रों को उठाया है और दूर तक देखा है? किसने कभी ध्यान से सुना है? कौन कभी सर्वशक्तिमान के हाथों में रहा है? सभी लोग काल्पनिक भय से ग्रस्त[35] हैं। घास और पुआल के ढेर का क्या उपयोग है? केवल एक ही चीज है जो वे कर सकते हैं, वह है देहधारी परमेश्वर को मृत्यु पर्यन्त यातना देना। यद्यपि वे घास और पुआल के ढेर हैं, फिर भी एक काम है जो वे "सबसे अच्छा"[36] करते हैं: परमेश्वर को मृत्यु तक उत्पीड़न देना और फिर चिल्लाना कि "यह लोगों के दिल को खुश करता है"। झींगा-सैनिकों और केकड़ा-सेनाध्यक्षों का यह एक कैसा झुण्ड है! उल्लेखनीय रूप से, लोगों की एक सतत धारा के बीच, वे परमेश्वर पर अपना ध्यान केंद्रित करते हैं, एक अभेद्य नाकाबंदी के साथ उसे घेरते हुए। उनका जोश अधिकाधिक तीव्रता से दग्ध[37] होता जाता है, वे परमेश्वर को घेरे हुए हैं, ताकि वह एक इंच भी हिल न सके। उनके हाथों में सभी प्रकार के हथियार हैं, और वे परमेश्वर की तरफ क्रोध से भरी हुईं आँखों से देखते हैं जैसे कि दुश्मन की ओर देख रहे हों; वे "परमेश्वर के टुकड़े-टुकड़े" कर देने को बेताब हैं। कैसी पहेली है: मनुष्य और परमेश्वर इतने कट्टर दुश्मन क्यों बन जाते हैं? क्या यह हो सकता है कि अत्यंत प्यारे परमेश्वर और मनुष्य के बीच विद्रोह हो? क्या यह हो सकता है कि परमेश्वर के कार्यों का मनुष्य के लिए कोई लाभ न हो? क्या वे मनुष्य को नुकसान पहुँचाते हैं? मनुष्य परमेश्वर पर एक अविचल ताक जमाये हुए है, बेहद डरते हुए कि वह मनुष्यों की नाकाबंदी को तोड़ डालेगा, तीसरे स्वर्ग में वापस लौट जाएगा, और एक बार फिर वह मनुष्यों को कालकोठरी में डाल देगा। मनुष्य परमेश्वर से ख़बरदार है, वह बहुत घबराया हुआ है, और दूर से जमीन पर छटपटाता है, लोगों के बीच रहे परमेश्वर के प्रति "मशीन गन" तानते हुए। ऐसा लगता है कि, परमेश्वर की थोड़ी-सी भी हलचल होते ही, मनुष्य उसका सब कुछ—उसका पूरा शरीर और वह जो कुछ भी पहने हुए है—मिटा देगा, कुछ भी बाकी नहीं छोड़ेगा। परमेश्वर और मनुष्य के बीच का यह संबंध सुधार से परे है। परमेश्वर मनुष्य की समझ से परे है; मनुष्य, इस बीच, जानबूझकर अपनी आँखें बंद कर लेता है और सुस्ती में समय गंवाता है, मेरे अस्तित्व को देखने के लिए पूरी तरह से अनिच्छुक, और मेरे न्याय के प्रति निर्मम। अतः, जब मनुष्य यह उम्मीद नहीं करता है, मैं चुपचाप निकल पड़ता हूँ, और अब मैं तुलना नहीं करूँगा कि मनुष्य के लिए कौन ऊँचा या नीचा है। मानव सबसे निम्न स्तर का "जानवर" है एवं मैं अब उसकी ओर ध्यान देना नहीं चाहता। लंबे समय से मैं अपनी कृपा को पूरी तरह से उस स्थान पर वापस ले जा चुका हूँ जहाँ मैं शांतिपूर्वक रहता हूँ; चूँकि मनुष्य इतना अवज्ञाकारी है, उसके पास क्या वजह है कि वह मेरी अनमोल कृपा का और आनंद ले? मैं उन ताकतों पर मेरी कृपा को व्यर्थ करने के लिए तैयार नहीं हूँ जो मेरे प्रति विरोधी हैं। मैं कनान के उन किसानों को मेरे अनमोल फल प्रदान करूँगा जो उत्साही हैं, और नेकी से मेरी वापसी का स्वागत करते हैं। मैं केवल इतना चाहता हूँ कि स्वर्ग अनंत काल तक रहे, और इससे भी अधिक, मनुष्य कभी बूढ़ा न हो, स्वर्ग और मनुष्य सदैव चैन से रहें, और वे सदाबहार "देवदार और साइप्रस" हमेशा परमेश्वर के साथ रहें, और आदर्श युग में एक साथ प्रवेश करने को हमेशा के लिए स्वर्ग के साथ रहें।

— "वचन देह में प्रकट होता है" में 'कार्य और प्रवेश (10)' से उद्धृत

25. यद्यपि परमेश्वर का कार्य समृद्ध और प्रचुर है, मनुष्य में प्रवेश की कमी है। मनुष्य और परमेश्वर के बीच संयुक्त "उद्यम" का, लगभग समूचा ही परमेश्वर का कार्य है; जहाँ तक मनुष्य ने कितना प्रवेश किया है इसका प्रश्न है, उसके पास इसे दिखाने के लिए लगभग कुछ भी नहीं है। मनुष्य, जो इतना गरीब और अँधा है, आज के परमेश्वर के सामने अपनी ताकत को अपने हाथों में रहे "प्राचीन हथियारों" के बल पर मापता है। ये "आदिम वानर" मुश्किल से सीधे चल पाते हैं, और उनके "नग्न" शरीरों से उन्हें कोई शर्म नहीं आती है। परमेश्वर के कार्य का मूल्यांकन करने की उनकी पात्रता क्या है? इन चार हाथ-पैरों वाले वानरों में से कई की आँखें क्रोध से भर आती हैं, और अपने हाथों में पत्थर के प्राचीन हथियारों के साथ वे परमेश्वर का मुकाबला करते हैं, कपि-मानवों की एक ऐसी प्रतियोगिता शुरू करने की कोशिश करते हुए जिसकी मिसाल दुनिया ने पहले कभी नहीं देखी थी, कपि-मानवों और परमेश्वर के बीच आखिरी दिनों की एक ऐसी प्रतियोगिता आयोजित करने को जो मुल्क भर में प्रसिद्ध हो जाएगी। इसके अलावा, इन आधे-सीधे प्राचीन कपि-मानवों से कई आत्म-संतुष्टि के साथ छलक रहे हैं। उनके चेहरे को ढकते बाल परस्पर उलझे हुए हैं, वे जान-लेवा इरादे से भरे हुए हैं और अपने सामने के पैर उठाते हैं। वे अभी भी आधुनिक मानव के रूप में पूरी तरह से विकसित नहीं हुए हैं, इसलिए कभी तो वे सीधे खड़े होते हैं, और कभी वे रेंगते हैं, ओस की एकत्रित बूंदों के तरह पसीनों के मनके उनके माथे को ढकते हैं, उनकी तत्परता स्वयं प्रकट होती है। असली, प्राचीन, कपि-मानव, उनके साथी, को देखते हुए, चार अंगों पर खड़े हुए, उनके चार हाथ-पैर भारी और मंद, मुश्किल से उन पर होते प्रहार को रोकने में सक्षम और पलट कर लड़ने की शक्ति के बगैर, वे कठिनाई से खुद को संभाल पाते हैं। पलक झपकते ही—इससे पहले कि क्या हुआ यह देखने का समय हो—अखाड़े का "नायक" जमीन पर उल्टा लुढ़क जाता है, हाथ-पैरों को हवा में ऊपर उठाए हुए। वे अंग जो ग़लत मुद्रा में इतने वर्षों से जमीन में रखे हुए थे, अचानक उलट-पुलट गए हैं, और कपि-मानव को अब विरोध करने की कोई इच्छा नहीं है। तब से, प्राचीन कपि-मानव का पृथ्वी से सफाया हो गया है—यह वास्तव में "गंभीर" है। इस प्राचीन कपि-मानव का ऐसा आकस्मिक अंत हुआ। इसे मनुष्य की इस अद्भुत दुनिया से इतनी जल्दी कूच क्यों करना पड़ा? इसने अपने साथियों के साथ रणनीति के अगले चरण पर चर्चा क्यों नहीं की? परमेश्वर के खिलाफ अपनी ताकत को मापने के रहस्य को बताये बिना इसने दुनिया से विदाई ले ली, यह कैसी दयनीय बात है! इस तरह के बुजुर्ग कपि-मानव के लिए एक फुसफुसाहट के बिना ही मर जाना कितना विचारशून्य था, अपने वंशजों के लिए इस "प्राचीन संस्कृति और कला" को विरासत में छोड़े बिना ही। इसके पास कोई समय ही न रहा कि जो इसके निकटतम थे उन्हें अपने पास बुलाकर उन्हें अपने प्रेम के बारे में बता सके, शिला-लेख में इसने कोई संवाद न छोड़ा, स्वर्ग के सूर्य को इसने नहीं पहचाना, और अपनी अकथनीय कठिनाइयों के बारे में कुछ भी नहीं कहा। अपनी आखिरी सांस लेते समय, अपनी आँखें बंद होने के पहले, अपने चार अकड़े-से हाथ-पैर हमेशा के लिए वृक्ष की शाखाओं की तरह आकाश की ओर उठाकर रखते हुए, उसने अपने वंशजों को अपने मरणासन्न शरीर के पास नहीं बुलाया, उन्हें यह बताने के लिए कि "परमेश्वर को चुनौती देने के लिए अखाड़े में नहीं उतरना"। ऐसा प्रतीत होगा कि इसकी एक पीड़ाजनक मृत्यु हुई...। अचानक, अखाड़े के नीचे से एक गरजती हँसी उभरती है; एक आधा-सीधा कपि-मानव अपने आपे से बाहर है; हिरण या अन्य जंगली प्राणियों का शिकार करने में इस्तेमाल होने वाली एक "पत्थर की लाठी" पकड़े हुए जो आदिम कपि-मानव के मुकाबले अधिक उन्नत है, यह अखाड़े में कूद पड़ता है, क्रोध से आग-बबूला होते हुए, और अपने मन में एक सुनिश्चित योजना लेकर।[38] ऐसा लगता है जैसे उसने कुछ सराहनीय काम किया है। अपनी पत्थर की लाठी की "ताकत" के सहारे वह "तीन मिनट" के लिए सीधे खड़े हो पाता है। इस तीसरे "पैर" की "शक्ति" कितनी प्रबल है! इसने तीन मिनट तक उस बड़े, अनाड़ी, बेवकूफ आधे-सीधे कपि-मानव को खड़ा कर के रखा—कोई आश्चर्य नहीं कि यह आदरणीय[39] बुजुर्ग कपि-मानव इतना दबंग है। यकीनन, यह प्राचीन पत्थर का औजार "अपनी प्रतिष्ठा बनाये रखता है": चाकू की एक मूठ है, धार है, और नोक, एक मात्र दोष यह है कि धार पर चमक की कमी है—यह कितना शोकास्पद है। प्राचीन काल के "छोटे नायक" को फिर से देखो, अखाड़े में खड़े होकर नीचे रहे लोगों पर एक घृणापूर्ण दृष्टि डालता है, जैसे कि वे नपुंसक व हीन हों, और वह स्वयं वीर नायक हो। अपने दिल में, जो मंच के सामने हैं उनसे यह छिपे तौर पर घृणा करता है। "देश कठिनाई में है और हममें से प्रत्येक जिम्मेदार है, तुम लोग पीछे क्यों हट रहे हो? क्या यह हो सकता है कि तुम सब यह तो देखो कि देश को आपदाओं का सामना करना पड़ रहा है, लेकिन खूनी लड़ाई में तुम लोग शामिल नहीं होगे? देश तबाही की कगार पर है—तुम लोग सबसे पहले चिंतित होने वाले और सबसे अंत में सुख भोगने वाले क्यों नहीं हो? तुम सभी देश को नाकामयाब होते और इसकी जनता को बर्बाद होते कैसे देख सकते हो? क्या तुम लोग राष्ट्रीय पराधीनता की शर्म को सहन करने के लिए तैयार हो? निकम्मों का यह एक कैसा झुण्ड है?" जैसे ही यह इस तरह सोचता है, मंच के सामने विवाद उठ खड़े होते हैं और उसकी आँखें और भी अधिक कुपित हो जाती हैं, जैसे कि बस अभी ही उनसे ज्वालाएँ बरसने[40] वाली हों। यह लड़ाई से पहले ही परमेश्वर को विफल कर देने के लिए उतावला है, लोगों को खुश करने की खातिर परमेश्वर को मौत के घाट उतारने के लिए बेताब। इसे बहुत कम पता है कि, हालांकि इसका पत्थर का औजार एक योग्य ख्याति का हो सकता है, यह परमेश्वर से कभी भी वैर नहीं कर सकता। इससे पहले कि खुद के बचाव का समय रहे, इससे पहले कि उसे लेट जाने और अपने पैरों पर उठ खड़े होने का समय मिले, यह आगे और पीछे कम्पित होता है, दोनों आँखों से दृष्टि खोकर। यह अपने बुजुर्ग पूर्वज के पास नीचे लुढ़क पड़ता है और फिर नहीं उठता; कसकर बूढ़े कपि-मानव को थामकर, वह अब और नहीं चीखता है, और अपनी तुच्छता को स्वीकार करता है, विरोध की अब किसी इच्छा के बगैर। वे बेचारे दो गरीब कपि-मानव अखाड़े के सामने मर जाते हैं। यह कितना दुर्भाग्यपूर्ण है कि मानव जाति के पूर्वज, जो आज तक बचे हुए थे, उस दिन अज्ञान में मर गए जब धार्मिकता का सूर्य दिखाई दिया! कितना मूर्खतापूर्ण है यह कि उन्होंने इतने बड़े आशीर्वाद को यूँ ही हाथ से निकल जाने दिया—कि उनके आशीर्वाद के दिन, हजारों सालों से इंतजार करने वाले ये कपि-मानव दुष्टों के राजा के साथ "आनंद" भोगने के लिए इन आशीषों को अधोलोक में ले गए हैं! क्यों न इन आशीषों को वे जीवितों की दुनिया में अपने बेटों और बेटियों के साथ आनंद लेने के लिए रखें? वे सिर्फ मुसीबतें माँग रहे हैं! यह कैसी बर्बादी है कि थोड़ी-सी हैसियत, थोड़ी प्रतिष्ठा और दिखावे के लिए, उन्हें मारे जाने के दुर्भाग्य का सामना करना पड़ता है, नरक के द्वार सबसे पहले खोलने और वहीं के पुत्र बन जाने के लिए हाथ-पाँव मारते हुए। ऐसी कीमत चुकाना बहुत अनावश्यक है। यह कितना दयनीय है कि ऐसे बुजुर्ग पूर्वज, जो "राष्ट्रीय भावना से इतने परिपूर्ण" थे, "स्वयं पर इतने सख्त लेकिन दूसरों के प्रति बहुत सहिष्णु" हो सकते थे, खुद को नरक में बंद कर उन नपुंसक हीन जनों को बाहर कर देते हुए। ऐसे "जनता के प्रतिनिधि" कहाँ मिल सकते हैं? "अपनी संतानों के कल्याण" और "भविष्य की पीढ़ियों के शांतिपूर्ण जीवन" के लिए, वे परमेश्वर को भी हस्तक्षेप करने की अनुमति नहीं देते हैं, और इसलिए वे अपने जीवन की कोई परवाह नहीं करते हैं। बिना रूके, वे खुद को "राष्ट्रीय हित" के लिए समर्पित कर देते हैं, बिना किसी शब्द के अधोलोक में प्रवेश करते हुए। ऐसा राष्ट्रवाद कहाँ मिल सकता है? परमेश्वर के साथ लड़ाई करते हुए, उन्हें मौत का डर नहीं, न ही खून बहाने का, और कल के बारे में तो वे बहुत ही कम चिंता करते हैं। वे बस युद्ध के मैदान में चले जाते हैं। यह बहुत दयनीय बात है कि उनकी "भक्ति की भावना" के लिए वे जो कुछ भी प्राप्त करते हैं, वह है अनंत अफ़सोस और नरक की सदैव प्रदीप्त आग में जल जाना!

यह कितना जिज्ञासा जगाने वाला है! क्यों परमेश्वर का देहधारण लोगों द्वारा हमेशा अस्वीकृत और घृणित हुआ है? लोगों को परमेश्वर के देहधारण के बारे में कोई समझ क्यों नहीं है? कहीं ऐसा तो नहीं कि परमेश्वर गलत समय पर आ गया है? क्या यह हो सकता है कि परमेश्वर गलत जगह पर आ गया है? क्या यह संभव है कि ऐसा इसलिए होता है कि परमेश्वर ने अकेले ही काम किया है, मनुष्य के "हस्ताक्षर" के बिना? कहीं ऐसा तो नहीं कि परमेश्वर ने मनुष्य की अनुमति के बिना ही अपना मन बना लिया? तथ्य यह है कि परमेश्वर ने पूर्व सूचना दी थी। परमेश्वर ने देह धारण कर कोई भूल नहीं की—क्या उसके लिए मनुष्य की सहमति माँगनी ज़रूरी है? इसके अलावा, परमेश्वर ने मनुष्य को बहुत पहले याद दिलाया था, शायद लोग भूल गए हैं। मनुष्य दोष का पात्र नहीं हैं, क्योंकि वह लंबे समय से शैतान के द्वारा इतना भ्रष्ट हो गया है कि वह स्वर्ग के नीचे जो कुछ भी होता है उसे समझ नहीं पाता है, आध्यात्मिक जगत की घटनाओं के बारे में तो क्या कहें! यह बहुत शर्म की बात है कि मनुष्य के पूर्वज, उन कपि-मानवों की, अखाड़े में मृत्यु हो गई, लेकिन यह आश्चर्य की बात नहीं है: स्वर्ग और पृथ्वी आपस में कभी भी संगत नहीं थे, और कैसे ये कपि-मानव, जिनके दिमाग पत्थरों के बने हुए हैं, कल्पना भी कर सकते हैं कि परमेश्वर फिर से देह धारण करेगा? यह कितने अफ़सोस की बात है कि इस तरह का एक बूढा आदमी जो "अपने साठवें वर्ष" में है, परमेश्वर के प्रकट होने के दिन मर गया। क्या यह एक आश्चर्य नहीं है कि यह इस तरह के एक महान आशीष के आगमन पर आशीषित हुए बिना ही दुनिया को छोड़ कर चला गया?

— "वचन देह में प्रकट होता है" में 'कार्य और प्रवेश (10)' से उद्धृत

26. परमेश्वर के देह-धारण ने सभी धर्मों और खंडों को चकित कर दिया है, इसने धार्मिक चक्रों की मूल व्यवस्था को "उलट-पुलट कर दिया" है, और इसने उन सभी लोगों के दिलों को हिला दिया है जो परमेश्वर की उपस्थिति के लिए तरसते हैं। कौन है जो प्रेममय नहीं? कौन परमेश्वर को देखने का अभिलाषी नहीं है? परमेश्वर कई सालों से मनुष्यों के बीच व्यक्तिगत रूप से रहा है, फिर भी मनुष्य ने कभी इसका अनुभव नहीं किया है। आज, परमेश्वर खुद प्रकट हुआ है, और जनता के सामने अपनी पहचान प्रकट की है—यह कैसे मनुष्य के दिल को प्रसन्न नहीं कर सकता था? एक बार परमेश्वर ने मनुष्य के साथ सुख और दुःख साझा किए, और आज वह मानव जाति के साथ फिर से जुड़ गया है, और वह उसके साथ बिताये समय के किस्से साझा करता है। उसके यहूदिया से बाहर चले जाने के बाद, लोगों को उसका कोई भी पता नहीं लग पाया। वे एक बार फिर परमेश्वर के साथ मिलना चाहते हैं, यह न जानते हुए कि वे लोग आज फिर से उसके साथ मिल चुके हैं, और उसके साथ फिर से एक हो गए हैं। यह बात बीते कल के ख्यालों को कैसे नहीं जगाएगी? दो हजार साल पहले इस दिन, यहूदियों के वंशज शमोन बरयोना ने उद्धारकर्ता यीशु को देखा, उसके साथ एक ही मेज पर भोजन किया, और कई वर्षों से उसका अनुसरण करने के बाद उसके लिए एक गहरा लगाव महसूस किया: उसने तहेदिल से उससे प्रेम किया, उसने प्रभु यीशु से गहराई से प्यार किया। यहूदी लोगों को कुछ भी अंदाज़ नहीं था कि यह सुनहरे बालों वाला बच्चा, जो एक सर्द नांद में पैदा हुआ था, वह परमेश्वर के देहधारण की पहली छवि थी। उन सभी ने सोचते थे कि वह उनके जैसा ही था, किसी ने भी उसे अपने से अलग नहीं समझा था—लोग इस आम और साधारण यीशु को कैसे पहचान सकते थे? यहूदी लोगों ने उसे उस समय के एक यहूदी पुत्र के रूप में ही जाना। किसी ने भी उसे एक सुंदर परमेश्वर के रूप में नहीं देखा, और आँखें बंद कर उससे ये मांगें करते हुए कि वह उन्हें प्रचुर और भरपूर आशीषें, शांति और आनन्द दे, लोगों ने और कुछ भी नहीं किया। उन्हें पता था कि एक करोड़पति की तरह, उसके पास सब कुछ था जिसकी कोई कभी भी इच्छा कर सकता था। फिर भी लोग कभी भी उसके साथ ऐसे पेश नहीं आये कि वह उनको प्रिय था; उस समय के लोगों ने उससे प्रेम नहीं किया, और केवल उसके खिलाफ विरोध किया, और उससे अनुचित मांगें की, पर उसने कभी प्रतिकार नहीं किया, वह लगातार मनुष्य को आशीषें देते रहा, भले ही मनुष्य उसे जान नहीं पाए थे। मनुष्यों को चुपके से ऊष्मा, प्रेम और दया प्रदान करने, और उससे भी ज्यादा, मनुष्यों को व्यवहार के ऐसे नए तरीके देने के अलावा जिससे वे नियमों के बंधन से बाहर निकाल सकें, उसने और कुछ भी नहीं किया। मनुष्य ने उसे प्यार नहीं किया, केवल उससे ईर्ष्या की और उसकी असाधारण प्रतिभा को मान्यता दी। अंधी मानवजाति कैसे जान सकती थी कि जब प्रिय उद्धारक यीशु उनके बीच आया, तो उसे कितना बड़ा अपमान सहन करना पड़ा था? किसी ने भी उसके संकट को नहीं समझा, किसी ने भी पिता परमेश्वर के प्रति उसके प्रेम के बारे में नहीं जाना, और न ही किसी ने उसके अकेलेपन के बारे में जाना; भले ही मेरी उसकी जन्मदात्री थी, फिर भी वह दयालु प्रभु यीशु के दिल में रहे विचारों को कैसे जान सकती थी? मानव के पुत्र के द्वारा सही गई अकथनीय पीड़ा को किसने जाना? उससे अनुरोध करने के बाद, उस समय के लोगों ने रुखाई से उसे अपने दिमाग के पीछे डाल दिया, और उसे बाहर निकाल दिया। तो वह सड़कों पर घूमता रहा, दिन-ब-दिन, साल-दर-साल, कई सालों तक यूँ ही घूमता रहा, तैंतीस कठोर सालों तक जीवित रहकर, वे साल जो लंबे और संक्षिप्त दोनों ही थे। जब लोगों को उसकी जरूरत होती थी, तो वे उसे अपने घरों में मुस्कुराते हुए चेहरे के साथ आमंत्रित करते थे, उससे माँगने की कोशिश करते हुए—और जैसे ही उसने अपना योगदान उन्हें दिया, उन्होंने तुरंत उसे दरवाजे से बाहर कर दिया। जो कुछ उसने अपने मुंह से मुहैया कराया, लोगों ने उसे खाया, उन्होंने उसका रक्त पीया, उन्होंने उन आशीर्वादों का आनंद लिया जो उसने दिए, फिर भी उन्होंने उसका विरोध भी किया, क्योंकि उन्हें कभी पता नहीं था कि उनके जीवन उन्हें किसने दिये थे। आखिरकार, उन्होंने उसे क्रूस पर जड़ दिया, फिर भी उसने कोई आवाज़ नहीं की। आज भी, वह चुप रहता है। लोग उसके शरीर को खाते हैं, वे उसका रक्त पीते हैं, वे वह खाना खाते हैं जो वह उनके लिए बनाता है, और वे उस रास्ते पर चलते हैं जो उसने उनके लिए खोला है, फिर भी वे उसे अस्वीकार करने का इरादा रखते हैं; वास्तव में जिस परमेश्वर ने उन्हें जीवन दिया है उसके साथ वे शत्रु जैसा व्यवहार करते हैं, और इसके बदले उन दासों को जो उनके जैसे हैं, स्वर्ग के पिता की तरह मानते हैं। इसमें, क्या वे जानबूझकर विरोध नहीं कर रहे? क्रूस पर यीशु कैसे मरा? क्या तुम जानते हो? क्या यहूदा ने जो उसके सबसे निकट था और जिसने उसे खाया था, उसे पीया था और उसका आनंद लिया था, उसके साथ विश्वासघात नहीं किया? क्या यहूदा के विश्वासघात का कारण यह नहीं था, कि यीशु उसके लिए एक सामान्य तुच्छ शिक्षक से ज्यादा कुछ नहीं था? यदि लोगों ने वास्तव में देखा होता कि यीशु असाधारण था, और एक ऐसा जो स्वर्ग का था, तो उसे कैसे वे चौबीस घंटे तक क्रूस पर जीवित जड़ सकते थे, जब तक कि उसके शरीर में कोई सांस न बचे? कौन परमेश्वर को जान सकता है? लोग अतृप्य लालच के साथ परमेश्वर के आनंद को लेने के अलावा कुछ नहीं करते हैं, परन्तु उन्होंने उसे कभी भी नहीं समझा है। उन्हें एक इंच दिया गया था और उन्होंने एक मील ले लिया है, और वे अपनी आज्ञाओं के प्रति, अपने आदेशों के प्रति, "यीशु" को पूरी तरह से आज्ञाकारी बनाते हैं। किसने कभी मनुष्य के इस पुत्र की ओर दया की तरह कुछ भी दिखाया है, जिसके पास सिर धरने की भी जगह नहीं है? किसने कभी पिता परमेश्वर के आदेश को पूरा करने के लिए उसके साथ दल में शामिल होने का विचार किया है? किसने कभी उसके लिए थोड़ा-भी विचार किया है? कौन कभी उसकी कठिनाइयों के प्रति विचारशील हुआ है? थोड़े-से भी प्यार के बिना, मनुष्य उसे आगे पीछे मरोड़ता है; मनुष्य को पता नहीं है कि उसका प्रकाश और जीवन कहाँ से आया था, और दो हजार साल पहले के "यीशु" को, जिसने मनुष्य के बीच दर्द का अनुभव किया है, एक बार फिर क्रूस पर चढ़ाने की चुपके से एक योजना बनाने के अलावा वह और कुछ नहीं करता है। क्या "यीशु" वास्तव में ऐसी नफ़रत को जगाता है? क्या वह सब कुछ जो उसने किया, लम्बे समय से भुला दिया गया है? वह नफ़रत जो हजारों सालों से इकट्ठी हो रही थी, अंततः बाहर की ओर तेजी से फूट पड़ेगी। तुम लोग, यहूदियों की किस्म, कब "यीशु" ने तुम लोगों से शत्रुता की है, जो तुम सब उससे इतनी घृणा करो? उसने बहुत कुछ किया है, और बहुत कुछ कहा है—क्या यह तुम सभी के हित में नहीं है? उसने तुम सब को अपना जीवन दिया है बदले में कुछ भी माँगे बिना, उसने तुम्हें अपना सर्वस्व दे दिया है—क्या तुम लोग वास्तव में अभी भी उसे जिंदा खा जाना चाहते हो? उसने कुछ भी बचाकर रखे बिना अपना सब तुम लोगों को दे दिया है, बिना कभी सांसारिक महिमा का आनंद उठाए, बिना मनुष्यों के बीच रही गर्मजोशी, और मनुष्यों के बीच रहे प्रेम, या मनुष्यों के बीच मिलते वरदान का सुख उठाए। लोग उसके प्रति बहुत ही घटिया हैं, उसने धरती पर कभी दौलत का सुख नहीं लिया, वह अपने नेक, भावुक दिल की संपूर्णता मनुष्य को समर्पित करता है, उसने अपना समग्र मानव जाति को समर्पित किया है—और किसने कभी उसे सौहार्द दिया है? किसने कभी उसे आराम दिया है? मनुष्य ने उस पर सारा दबाव लाद रखा है, सारा दुर्भाग्य उसे सौंप दिया है, मनुष्य के सबसे दुर्भाग्यपूर्ण अनुभव उस पर थोप रखे हैं, वह सभी अन्यायों के लिए उसे ही दोषी ठहराता है, और उसने इसे चुपचाप स्वीकार कर लिया है। क्या उसने कभी किसी से विरोध किया है? क्या उसने कभी किसी से थोडा भी हर्जाना माँगा है? किसी ने कभी उसके प्रति कोई सहानुभूति दिखायी है? सामान्य लोगों के रूप में, तुम लोगों में से किसका एक रूमानी बचपन न था? किसका यौवन रंगीन नहीं रहा? प्रियजनों का सौहार्द किसे नहीं मिला है? कौन रिश्तेदारों और दोस्तों के प्यार से रहित है? दूसरों के सम्मान के बिना कौन है? एक स्नेही परिवार के बिना कौन है? विश्वासपात्रों के आराम के बिना कौन है? और क्या उसने कभी इनमें से किसी का भी सुख पाया है? किसने कभी उसे थोड़ी गर्मजोशी दी है? किसने कभी उसे लेशमात्र भी आराम दिया है? किसी ने कभी उसे थोड़ी-सी मानवीय नैतिकता दिखायी है? कौन कभी उसके प्रति सहिष्णु रहा है? मुश्किल समय के दौरान कौन उसके साथ रहा है? किसने कभी उसके साथ एक कठिन जीवन बिताया है? मनुष्य ने अपनी अपेक्षाओं को कभी भी कम नहीं किया; वह बिना किसी हिचकिचाहट के केवल उससे माँगें करता है, मानो कि मनुष्य की दुनिया में आकर, उसे उनका बैल या घोड़ा, उसका कैदी बनना पड़ेगा, और उसे अपना सर्वस्व मनुष्यों को दे देना होगा; नहीं तो मनुष्य कभी उसे माफ नहीं करेगा, कभी उसके साथ सुगम नहीं होगा, उसे कभी परमेश्वर नहीं कहेगा, और कभी भी उसे उच्च सम्मान में नहीं रखेगा। मनुष्य परमेश्वर के प्रति अपने व्यवहार में बहुत सख्त है, जैसे कि वह परमेश्वर को मृत्यु पर्यंत सताने पर उतारू हो, जिसके बाद ही वह परमेश्वर से अपनी अपेक्षाओं को कम करेगा; यदि नहीं, तो मनुष्य कभी भी परमेश्वर से अपनी अपेक्षाओं के मानकों को कम नहीं करेगा। कैसे इस तरह का मनुष्य परमेश्वर द्वारा घृणित नहीं होगा? क्या यह आज की त्रासदी नहीं है? कहीं इंसान का जमीर दिखाई नहीं देता। वह कहता रहता है कि वह परमेश्वर के प्रेम का ऋण चुकाएगा, परन्तु वह परमेश्वर का विश्लेषण करता है और मृत्यु तक उसे यातना देता है। क्या यह परमेश्वर में उसके विश्वास करने का "गुप्त नुस्खा" नहीं, जो उसे पूर्वजों से विरासत में प्राप्त हुआ है? ऐसी कोई जगह नहीं है जहाँ "यहूदी" लोग न हों, और आज भी वे वही करते हैं, वे अभी भी परमेश्वर के विरोध का ही काम करते हैं, और फिर भी विश्वास करते हैं कि वे परमेश्वर को उच्च स्थान पर रखते हैं। कैसे मनुष्य की अपनी आँखें परमेश्वर को जान सकती हैं? कैसे मनुष्य जो देह में जीता है, आत्मा से आए देहधारी परमेश्वर को परमेश्वर के रूप में मान सकता है? मनुष्य के बीच कौन उसे जान सकता है? मनुष्यों के बीच में सच्चाई कहाँ है? सच्ची धार्मिकता कहाँ है? कौन परमेश्वर के स्वभाव को जानने में सक्षम है? कौन स्वर्ग के परमेश्वर के साथ प्रतिस्पर्धा कर सकता है? इसमें कोई आश्चर्य नहीं कि, जब वह मनुष्य के बीच आता है, तो कोई भी परमेश्वर को नहीं जानता, और उसे अस्वीकार कर दिया गया है। मनुष्य कैसे परमेश्वर के अस्तित्व को सहन कर सकता है? कैसे वह प्रकाश को संसार के अंधेरे को बाहर निकालने की अनुमति दे सकता है? क्या यही सब मनुष्यों की सम्माननीय भक्ति नहीं है? क्या यही मनुष्य का ईमानदार प्रवेश नहीं है? और क्या परमेश्वर का कार्य मनुष्यों के प्रवेश के आसपास केंद्रित नहीं है? मेरी इच्छा है कि तुम लोग इंसान के प्रवेश के साथ परमेश्वर के कार्य को मिलाओ, और मनुष्य और परमेश्वर के बीच एक अच्छा संबंध स्थापित करो, और अपनी क्षमता की चरम सीमा तक उस कर्तव्य का पालन करो जो मनुष्य द्वारा किया जाना चाहिए। इस तरह, परमेश्वर का कार्य इसके पश्चात् उसके गुणगान के साथ समाप्त हो जाएगा!

— "वचन देह में प्रकट होता है" में 'कार्य और प्रवेश (10)' से उद्धृत

फुटनोट:

1. "दृढ़ता से चिपके" का प्रयोग उपहास के रूप में किया गया है। यह वाक्यांश दर्शाता है कि लोग जिद्दी और अड़ियल हैं, जो पुरानी बातों को पकड़े रहते हैं और उन्हें त्यागने के लिए तैयार नहीं होते।

2. "अपनी पिछली प्रवृत्ति को उलट देगा" इस बात का इशारा करता है कि एक बार लोग परमेश्वर को जान लेते हैं तो कैसे परमेश्वर के बारे में उनकी धारणाएँ और उनके विचार बदलते हैं।

3. "चैन से सो रहा है" संकेत करता है कि लोग परमेश्वर के कार्य के बारे में बेपरवाह हैं और उसे उतना महत्वपूर्ण नहीं समझते हैं।

4. "अनिश्चित" संकेत करता है कि लोगों को परमेश्वर के कार्य में स्पष्ट अंतर्दृष्टि नहीं है।

5. "जैविक दृष्टि से नष्ट न होने योग्य" का प्रयोग यहाँ व्यंग्य के रूप में किया गया है, जिसका अर्थ है कि लोग अपने ज्ञान, संस्कृति और आध्यात्मिक दृष्टिकोण में कठोर हैं।

6. "व्यवस्था की पहुँच से बाहर आज़ाद घूमता है" इंगित करता है कि शैतान उन्मत्त होकर आपे से बाहर हो जाता है।

7. "पूरा खंडहर" बताता है कि कैसे उस शैतान का हिंसक व्यवहार देखने में असहनीय है।

8. "आहत और क्षत-विक्षत" शैतानों के राजा के बदसूरत चेहरे के बारे में बताता है।

9. "पासे की एक ही चाल में सब-कुछ दाँव पर लगाने" का अर्थ है अंत में जीतने की उम्मीद में अपना सारा धन एक ही दाँव पर लगा देना। यह शैतान की भयावह और कुटिल योजनाओं के लिए एक रूपक है। इस अभिव्यक्ति का प्रयोग उपहास में किया जाता है।

10. "निगल" जाना शैतानों के राजा के शातिर व्यवहार के बारे में बताता है, जो लोगों को पूरी तरह से मोह लेता है।

11. "अपराध के साथियों का गिरोह" का वही अर्थ है, जो "गुंडों के गिरोह" का है।

12. "हर तरह का उपद्रव भड़काते" का मतलब है कि कैसे वे लोग, जो राक्षसी किस्म के होते हैं, दंगा फैलाते हैं और परमेश्वर के कार्य को बाधित करते हैं तथा उसका विरोध करते हैं।

13. "दाँतों वाली व्हेल" का इस्तेमाल उपहास के रूप में किया गया है। यह एक रूपक है, जो बताता है कि कैसे मक्खियाँ इतनी छोटी होती हैं कि सूअर और कुत्ते भी उन्हें व्हेल की तरह विशाल नज़र आते हैं।

14. "सभी बुराइयों के इस सरगना" का अर्थ बूढ़े शैतान से है। यह वाक्यांश चरम नापसंदगी व्यक्त करता है।

15. "निराधार आरोप लगाते हुए" का अर्थ है वे तरीके जिनके द्वारा शैतान लोगों को नुकसान पहुँचाता है।

16. "बेहद संरक्षित" उन विधियों को दर्शाता है जिनका उपयोग करके शैतान लोगों को यातना पहुँचाता है, वे बहुत ही दुष्ट होते हैं, और लोगों को इतना नियंत्रित करते हैं कि उन्हें हिलने की जगह नहीं मिलती।

17. "दूरस्थ" का उपयोग उपहास में किया गया है।

18. "क्रमित, सौम्य मार्गदर्शन" उपहास उड़ाने के ढंग से प्रयोग किया गया है।

19. "कृपा" शब्द का उपयोग उन लोगों का उपहास करने के लिए किया गया है जो मानो लकड़ी के बने हों और जिन्हें स्वयं के बारे में कोई जानकारी न हो।

20. "एक के बाद एक दुर्घटनाओं का सामना करना" इस ओर इशारा करता है कि लोग बड़े लाल अजगर के देश में पैदा हुए थे, और वे अपने सिर को ऊँचा रखने में असमर्थ हैं।

21. "पूरे जीवन को अर्पित करना" अपमानजनक अर्थ में कहा गया है।

22. मानव जाति की अवज्ञा का पर्दाफाश करने के लिए "विनाश" का प्रयोग किया गया है।

23. "मिली हैं उग्र भौंहों और हजारों मचलती अँगुलियों की ठंडी अवज्ञा, सिर झुका कर, एक राज़ी बैल की तरह लोगों की सेवा करते हुए" मूलतः एक वाक्य था, लेकिन चीजों को साफ करने के लिए इसे यहाँ दो में विभाजित किया गया है। पहला वाक्य मनुष्य के कार्यों को दर्शाता है, जबकि दूसरा, परमेश्वर द्वारा सहन की गई पीड़ा को इंगित करता है, और यह कि परमेश्वर विनम्र और छिपा हुआ है।

24. "पूर्वाग्रह" लोगों के अवज्ञाकारी व्यवहार को दर्शाता है।

25. "सम्पूर्ण सत्ता हथियाना" लोगों के अवज्ञाकारी व्यवहार को संदर्भित करता है। वे खुद को ऊंचा उठाकर रखते हैं, दूसरों को बेड़ियों से बांधते हैं, उनसे अपना अनुकरण करवाते हैं और उनके लिए पीड़ा उठाने को कहते हैं। वे वो ताकतें हैं जो कि परमेश्वर के प्रति शत्रुतापूर्ण हैं।

26. "कठपुतली" का इस्तेमाल उन लोगों का उपहास करने के लिए किया गया है जो परमेश्वर को नहीं जानते।

27. "तेजी से बढ़ते" का उपयोग लोगों के नीच व्यवहार को उजागर करने के लिए किया जाता है।

28. "खड़िया और पनीर का भेद नहीं बता सकता" उसे इंगित करता है जब लोग परमेश्वर की इच्छा को किसी शैतानी चीज़ में मरोड़ देते हैं, मोटे तौर पर यहाँ उस व्यवहार का जिक्र है जिसमें लोग परमेश्वर को अस्वीकार करते हैं।

29. "काले और सफ़ेद रंगों के बारे में भ्रमित" सत्य को माया के साथ, धार्मिकता को बुराई के साथ मिला देने की ओर इशारा करता है।

30. "डाकू" का उपयोग यह संकेत करने के लिए किया गया है कि लोग अबोध हैं और उनमें अंतर्दृष्टि की कमी है।

31. "रद्दी तथा बचे-खुचे" का प्रयोग उस व्यवहार को इंगित करने के लिए किया गया है जिसमें लोगों ने परमेश्वर पर अत्याचार किया।

32. "भड़क जाता है" मनुष्य के बदसूरत चेहरे को दर्शाता है जो क्रूर और हताश है।

33. "बेझिझक" का अर्थ है, जब लोग लापरवाह होते हैं, और परमेश्वर के प्रति थोड़ी-सी भी श्रद्धा नहीं रखते हैं।

34. "मनुष्य का 'प्रवेश'" यहाँ मनुष्य के अवज्ञाकारी व्यवहार को इंगित करता है। जीवन में लोगों के प्रवेश की बात करने के बजाय—जो सकारात्मक है—यह उनके नकारात्मक व्यवहार और कार्यों को दर्शाता है। यह मोटे तौर पर मनुष्य के सभी कर्मों का जिक्र है जो परमेश्वर के विरोध में हैं।

35. "काल्पनिक भय से ग्रस्त" का प्रयोग मनुष्यों के गुमराह जीवन का उपहास करने के लिए किया गया है। यह मानव जाति के जीवन की कुरूप स्थिति को संदर्भित करता है, जिसमें लोग राक्षसों के साथ रहते हैं।

36. "सबसे अच्छा" उपहास उड़ाने के अर्थ से कहा गया है।

37. "जोश अधिकाधिक तीव्रता से दग्ध" उपहास में कहा गया है, और यह मनुष्य की बदसूरत हालत को संदर्भित करता है।

38. "मन में एक सुनिश्चित योजना लेकर" का प्रयोग उपहास में किया गया है, और यह दर्शाता है कि कैसे लोग खुद को ही नहीं जानते और अपने वास्तविक कद से अनजान हैं। यह अपमान करने के अर्थ से है।

39. "आदरणीय" उपहास में कहा गया है।

40. "ज्वालाएँ बरसने" लोगों की उस बदसूरत स्थिति को इंगित करता है, जो क्रोध से जल-भुन जाते हैं जब वे परमेश्वर द्वारा पराजित हो जाते हैं। यह परमेश्वर के प्रति उनके विरोध की हद के बारे में बताता है।

क. चार पुस्तकें और पाँच क्लासिक्स चीन में कन्फ्यूशीवाद की प्रामाणिक किताबें हैं।

ख. स्रोत पाठ "hú jiǎ hǔ wēi" के आधार पर इसका अनुवाद किया जाता है, जो कि एक चीनी मुहावरा है। यह एक ऐसी कहानी को संदर्भित करता है, जिसमें किसी बाघ के साथ चलती हुई कोई लोमड़ी अन्य जानवरों को डराती है, इस प्रकार उस डर और प्रतिष्ठा को "उधार" लेती है जिस पर बाघ अधिकार रखता है। यह एक उपमा है, जिसका यहाँ अन्य लोगों को डराने या उत्पीड़ित करने के लिए किसी अन्य व्यक्ति की प्रतिष्ठा "उधार लेने" वाले लोगों को संदर्भित करने के लिए उपयोग किया जाता है।

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