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"कार्य और प्रवेश" पर परमेश्वर के वचन के चार अंशों से संकलन

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"कार्य और प्रवेश" पर परमेश्वर के वचन के चार अंशों से संकलन

जब से लोगों ने जीवन के सही मार्ग पर चलना शुरू किया, ऐसी कई चीजें हैं जिनके बारे में वे अस्पष्ट रहेहैं। वे परमेश्वर के कार्य के विषय में तथा उन्हें कितना कार्य करना चाहिए,इस विषय में पूर्ण रीति से भ्रम में हैं। एक ओर, यह उनके अनुभव की कमी के कारण और उनकी ग्रहण करने की क्षमता सीमित होने के कारण है; दूसरी ओर, यह इसलिए है कि परमेश्वर के कार्य ने लोगों को अभी तक इस अवस्था में नहीं पहुँचाया है। इसलिए, हर कोई अधिकांश आत्मिक विषयों के बारे में अस्पष्ट है। न केवल तुम लोग इस बारे में अस्पष्ट हो कि तुम्हें किस में प्रवेश करना चाहिए; बल्कि तुम लोग परमेश्वर के कार्य के बारे में भी अनजान हो। यह तुम्हारे भीतर केवल कमियों की बात नहीं है: यह उन सभी का बहुत बड़ा दोष है जो धार्मिक जगत से संबंध रखते हैं। इसका रहस्य यहाँ छिपा हुआ है कि क्यों लोग परमेश्वर को नहीं जानते, और इसलिए यह दोष उन सभी में आम कमी है जो परमेश्वर को खोजते हैं। किसी ने भी परमेश्वर को कभी नहीं जाना, न ही उसका सच्चा चेहरा कभी देखा है। यही कारण है कि परमेश्वर का कार्य इतना कठिन बन जाता है जैसे किसी पहाड़ को हटाना या समुद्र को खाली करना। परमेश्वर के कार्य के लिए कितने लोगों ने अपना जीवन बलिदान किया है; उसके कार्य के कारण कितने लोगों को निकाल दिया गया है; उसके कार्य के कारण कितने लोगों को दर्दनाक मृत्यु सहनी पड़ी; कितने लोग अपनी आँखों में परमेश्वर के लिए प्रेम के आंसू लेकर अन्यायपूर्वक मरे; कितनों को क्रूरता के साथ अमानवीय सताव सहना पड़ा? क्या ये त्रासदियाँ लोगों में परमेश्वर का ज्ञान कम होने के कारण नहीं हुईं? कैसे कोई ब्यक्ति जो परमेश्वर को नहीं जानता उसके सम्मुख आने का साहस कर सकता है? कोई व्यक्ति जो परमेश्वर पर विश्वास करता है और फिर भी उसे सताता है, वह उसके सम्मुख आने का साहस कैसे कर सकता है? यह केवल धार्मिक जगत में रहने वालों की ही कमियाँ नहीं हैं, बल्कि तुम लोगोंमें और उन में साधारणतः पाई जाती हैं। लोग परमेश्वर को जाने बिना उस पर विश्वास करते हैं; यही कारण है कि वे अपने हृदयों में परमेश्वर को आदर नहीं देते, और अपने हृदयों में उससे नहीं डरते। ऐसे भी लोग हैं, जो बड़े दिखावे के साथ इस दिशा में अपनी ही कल्पना द्वारा कार्य करते हैं, और अपनी ही मांगों और व्यर्थ इच्छाओं के अनुसार परमेश्वर का कार्य करते हैं। बहुत लोग परमेश्वर को बिना आदर दिए अपनी ही इच्छा के पीछे जाकर असभ्य लोगों की तरह व्यवहार करते हैं। क्या ये लोगों के स्वार्थी हृदयों का सटीक उदाहरण नहीं हैं? क्या यह लोगोंमें धोखे की बहुतायत को प्रकट नहीं करता?

"वचन देह में प्रकट होता है" से "कार्य और प्रवेश (1)" से

निःसंदेह लोग बहुत ही बुद्धिमान हो सकते हैं, परंतु कैसे उनके वरदान परमेश्वर के कार्य का स्थान ले सकते हैं? लोग परमेश्वर के बोझ की परवाह वास्तव मेंकर सकते हैं, परंतुवे बहुत ही स्वार्थपूर्ण व्यवहार नहीं कर सकते। क्या लोगों के कार्य वास्तव में दैवीय हैं? क्या कोई सकारात्मक रूप से आश्वस्त हो सकता है? परमेश्वर कीगवाही देने के लिए और उसकी महिमा को प्राप्त करने के लिए परमेश्वर एक अपवाद को कर रहा है और लोगों को खड़ा कर रहा है; वे कैसे इसके योग्य हो सकते हैं? परमेश्वर का कार्य अभी बस शुरू हुआ है, उसके वचन अभी बोले जाने शुरू हुए हैं। इस समय, लोग अपने बारे में अच्छा महसूस करते हैं; क्या यह निरादर को आमंत्रित करना नहीं होगा? वे बहुत कम समझते हैं। यहाँ तक कि ऊंचे दर्ज़े के सिद्धांतवादी, उच्च श्रेणी के वक्ता भी परमेश्वर की बहुतायत का वर्णन नहीं कर सकते-तो तुम लोग कितना कर सकते हो? तुम लोगों ने अपना मूल्य स्वर्ग से अधिकनहीं समझा होता, बल्कि स्वयं को उन विवेकी लोगों से भी कम समझा होता जो परमेश्वर से प्रेम करने का प्रयास करते हैं। यही मार्ग है जिसके द्वारा तुम लोगों को प्रवेश करना है: स्वयं को दूसरों से छोटा समझना। स्वयं को इतना ऊंचा क्यों समझना है? स्वयं को इतना अधिक बड़ा क्यों समझना है? जीवन की लंबी यात्रा में, तुमलोगों ने केवल कुछ पहले कदम उठाए हैं। तुम लोग परमेश्वर का सिर्फ हाथ देखते हो, न कि पूरे परमेश्वर को। क्योंकि तुम लोगों में बहुत कम बदलाव हुए हैं, इसलिए यह तुम लोगों को योग्य बनाता है ताकि तुम लोग परमेश्वर का कार्य अधिक देख सको, यह खोज सको कितुम लोगों को किस में प्रवेश करना है।

"वचन देह में प्रकट होता है" से "कार्य और प्रवेश (1)" से

सच्चाई तो यह है, मनुष्य परमेश्वर की सारी सृष्टि के क्रम में सबसे छोटा है। यद्यपि वह सब वस्तुओं का स्वामी है, फिर भी उनमें केवल मनुष्य ही है जो शैतान की धोखेबाजी का शिकार है, एकमात्र प्राणी जो उसके दुराचरण के अनगिनत तरीकों का शिकार हो जाता है। मनुष्य की स्वयं पर कभी भी प्रभुता नहीं रही। अधिकांश लोग शैतान के घृणित स्थान में रहते हैं, और उपहास को सहते हैं; इस संसार के हर अन्याय, हर कष्ट को सहते हुए, जब तक वे आधे मर नहीं जाते तब तक वह उन्हें कष्ट देता रहता है। उनके साथ खेलने के बाद, शैतान उनके गंतव्य को ख़त्म कर देता है। और इसलिए लोग अपना पूरा जीवन उलझन में गुज़ार देते हैं, एक बार भी उन अच्छी चीजों का आनंद नहीं ले पाते जो परमेश्वर ने उनके लिए तैयार की हैं, इसकी अपेक्षा शैतान द्वारा नष्ट किए जाते और चिथड़ो में छोड़ दिए जाते हैं। आज वे इतने उदासीन और निरुत्साहित हो गए हैं कि उनमें परमेश्वर के कार्य पर ध्यान देने की रूचि ही नहीं है। यदि लोगों में परमेश्वर के कार्य पर ध्यान देने की रूचि नहीं है, तो उनका अनुभव हमेशा विभाजित और अधूरा रहेगा, और उनका प्रवेश हमेशा के लिए एक खाली स्थान रहेगा।

"वचन देह में प्रकट होता है" से "कार्य और प्रवेश (1)" से

परमेश्वर के जगत में आने के हजारों वर्षों के बाद से घमंडी व्यवहार वाले कितने लोगों को परमेश्वर ने अपने कार्य के लिए वर्षों तक इस्तेमाल किया है; परंतु जो उसका कार्य जानते है वे बहुत कम हैं, लगभग न के बराबर हैं। इसी कारण, बहुत से लोग उसी समय परमेश्वर का विरोध करने लग जाते हैं जब वे उसके कार्य को कर रहे होते हैं क्योंकि, वे उसका कार्य करने की अपेक्षा वास्तव में परमेश्वर द्वारा दिए गए पद में मनुष्य का कार्य करते हैं। क्या इसे कार्य करना कहा जा सकता है? वे कैसे प्रवेश कर सकते हैं? मनुष्यजाति ने परमेश्वर के अनुग्रह को लेकर उसे दफन कर दिया है। इसी कारण, सदियों से जो उसका कार्य रहे हैं उनका प्रवेश कम होता है। वे परमेश्वर के कार्य को जानने के बारे में बात ही नहीं करते, क्योंकि वे परमेश्वर की बुद्धि के विषय में बहुत ही कम समझते हैं। यह कहा जा सकता है, यद्यपिऐसे कई लोग हैं जो परमेश्वर की सेवा करते है, फिर भी वे इस बात को देखने में असमर्थ रहे हैं कि वह कितना महान है, और इसलिए सब ने स्वयं को परमेश्वर बना लिया है ताकिदूसरे उनकी आराधना करें।

"वचन देह में प्रकट होता है" से "कार्य और प्रवेश (1)" से

कई वर्षों तक परमेश्वर सृष्टि में छिपा रहाहै; धुंध के पीछे से कई वसंत और पतझड़ को देखता रहा है; कई दिनों और रातों तक तीसरे स्वर्ग से देखता रहा है; कई महीनों और वर्षों तक मनुष्यों के बीच में चला है। उसनेकई शीतकालों तक चुपचाप प्रतीक्षा करते हुए स्वयं को मनुष्योंसे ऊपर स्थापितकिया है। उसने कभी अपने आपको किसी के समक्ष प्रकट नहीं किया, न ही उसने कोई आवाज़ की, बिना कोई संकेत दिए चला गया और वैसे ही चुपचाप लौट आया। कौन उसका असली चेहरा जान सकता है? उसने एक बार भी मनुष्य से बात नहीं की, न ही कभी उन्हें दिखाई दिया। परमेश्वर का कार्य करना लोगों के लिए कितना आसान है? उन्हें यह एहसास ही नहीं होता कि उसे जानना सबबातों में सबसे कठिन है। आज परमेश्वर ने मनुष्य से बात की है, परंतु मनुष्य ने उसे कभी नहीं जाना है, क्योंकि जीवन में उसका प्रवेश बहुत ही सीमित और सतही है। यदि उसके दृष्टिकोण से देखा जाए, तो लोग परमेश्वर के सामने उपस्थित होने मेंपूर्णतः अयोग्य हैं। उनमें परमेश्वर की बहुत ही कम समझ है और वे उससे बहुत दूर भटके हुए हैं। यही नहीं, उनके हृदय जिनसे वे परमेश्वर पर विश्वास रखते हैं, वे बहुत जटिल हैं, और वे अपने हृदयों के भीतर परमेश्वर के स्वरुप को नहीं रखते। परिणामस्वरूप, परमेश्वर का जी तोड़ परिश्रम, और उसका कार्य, रेत में दबे सोने के टुकड़ों के समान, रोशनी की चमक नहीं फैला सकते हैं। परमेश्वर के समक्ष इन लोगों की योग्यता, उद्देश्य, और दृष्टिकोण बहुत ही घृणास्पद हैं। स्वीकार करने की क्षमता में निर्बल, असंवेदनशीलता की हद तक भावनारहित, भ्रष्टाचारी, और विकृत, अत्यंत चाटुकार, कमज़ोर और इच्छाशक्ति से रहितलोगों के समान उनकी अगुवाई मवेशियों या घोड़ों की तरह होनी चाहिए। आत्मा में अपने प्रवेश, या परमेश्वर के कार्य में अपने प्रवेश के संबंध में वे बिलकुल भी ध्यान नहीं देते, उनमे सत्य के लिए कष्ट सहने का थोड़ा सा भी संकल्प नहीं है। इसलिए इस प्रकार के व्यक्ति को परमेश्वर द्वारा संपूर्ण करना आसान नहीं होगा। इसलिए यह महत्वपूर्ण है कि तुम लोग अपना प्रवेश इस दृष्टिकोण से स्थापित करो—कि तुम लोग अपने कार्य और अपने प्रवेश के द्वारा परमेश्वर के कार्य को जानने के लिए उसके निकट पहुँचो।

"वचन देह में प्रकट होता है" से "कार्य और प्रवेश (1)" से

जब कार्य के बारे में बात की जाती है, तो मनुष्य का मानना है कि परमेश्वर के लिए इधर-उधर भागना, सभी जगहों पर प्रचार करना और परमेश्वर के लिए व्यय करना कार्य है। यद्यपि यह विश्वास सही है, किन्तु यह अत्यधिक एक-तरफा है; परमेश्वर आदमी से जो कहता है वह परमेश्वर के लिए केवल इधर-उधर यात्रा करना ही नहीं है; यह आत्मा के भीतर सेवकाई और आपूर्ति अधिक है। बहुत से भाइयों और बहनों ने इतने वर्षों के अनुभव के बाद भी परमेश्वर के लिए कार्य करने के बारे में कभी नहीं सोचा है, क्योंकि मनुष्य द्वारा कल्पना किया गया कार्य परमेश्वर के द्वारा कहे जाने वाले कार्यों के साथ असंगत है। इसलिए, आदमी को कार्य के मामले में किसी भी तरह की कोई दिलचस्पी नहीं है, और यही निश्चित रूप से कारण है कि क्यों मनुष्य का प्रवेश भी एक तरफा है। तुम सभी लोगों को परमेश्वर के लिए कार्य करके प्रवेश करना शुरू करना चाहिए, ताकि तुम लोग इसके सभी पहलुओं का बेहतर अनुभव कर सको। यही है वह जिसमें तुम लोगों को प्रवेश करना चाहिए। कार्य परमेश्वर के लिए इधर-उधर चलने को संदर्भित नहीं करता है; यह इस बात को संदर्भित करता है मनुष्य का जीवन और मनुष्य जो जीवन बिताता है वे परमेश्वर के आनंद के लिए हैं या नहीं। कार्य परमेश्वर के प्रति गवाही देने और मनुष्य के प्रति सेवकाई के लिए मनुष्य द्वारा परमेश्वर के प्रति अपनी विश्वसनीयता और परमेश्वर के बारे में उनके ज्ञान के उपयोग को संदर्भित करता है। यह मनुष्य का उत्तरदायित्व है और वह है जो सभी लोगों को महसूस करना चाहिए। दूसरे शब्दों में, तुम लोगों का प्रवेश तुम लोगों का कार्य है; तुम लोग परमेश्वर के लिए अपने कार्य के दौरान प्रवेश करने का प्रयास कर रहे हो। परमेश्वर का अनुभव करना न केवल उसके वचन को खाने और पीने में सक्षम होना है; बल्कि इससे भी महत्वपूर्ण है, कि तुम लोगों को परमेश्वर की गवाही देने, परमेश्वर की सेवा करने, और मनुष्य की सेवकाई और आपूर्ति करने में सक्षम अवश्य होना चाहिए। यह कार्य है, और तुम लोगों का प्रवेश भी है; इसे ही हर व्यक्ति को निष्पादित करना चाहिए।

"वचन देह में प्रकट होता है" से "कार्य और प्रवेश (2)" से

ऐसे कई लोग हैं जो केवल परमेश्वर के लिए इधर-उधर यात्रा करने, और सभी जगहों पर उपदेश देने पर ध्यान केंद्रित करते हैं, फिर भी अपने व्यक्तिगत अनुभव को अनदेखा करते हैं और आध्यात्मिक जीवन में अपने प्रवेश की उपेक्षा करते हैं। यही कारण है कि परमेश्वर की सेवा करने वाले लोग परमेश्वर का विरोध करने वाले बन जाते हैं। कई वर्षों से, जो लोग परमेश्वर की सेवा करते हैं और मनुष्य की सेवकाई करते हैं, उन्होंने कार्य करने और उपदेश देने को प्रवेश के रूप में माना है, और किसी ने भी अपने स्वयं के अनुभव को महत्वपूर्ण प्रविष्टि के रूप में नहीं लिया है। बल्कि, वे दूसरों को सिखाने के लिए पवित्र आत्मा के कार्य की प्रबुद्धता का लाभ उठाते हैं। उपदेश देते समय, उन पर बहुत जिम्मेदारी होती है और वे पवित्र आत्मा का कार्य प्राप्त करते हैं, और इसके माध्यम से वे पवित्र आत्मा की वाणी निकालते हैं। उस समय, जो लोग कार्य करते हैं, वे आत्मतुष्टि से पूर्ण और आत्म-संतुष्ट महसूस करते हैं, मानो कि पवित्र आत्मा का कार्य उनका स्वयं का आध्यात्मिक अनुभव है; उन्हें लगता है कि उस समय के दौरान उनके द्वारा बोले गए सभी वचन उनके स्वयं के हैं…. इस तरह तुम्हारे एक बार उपदेश करने के बाद, तुम्हें लगता है कि तुम्हारी वास्तविक कद-काठी उतनी छोटी नहीं है जितनी तुम मानते थे। पवित्र आत्मा द्वारा तुम्हारे भीतर कई बार इसी तरह से कार्य करने के बाद, तुम तब यह निर्धारित करते हो कि तुम्हारे पास पहले से ही कद-काठी है और ग़लती से मानते हो कि पवित्र आत्मा का कार्य तुम्हारा स्वयं का प्रवेशऔर अस्तित्व है। जब तुम्हें लगातार यह अनुभव होता है, तो तुम अपने स्वयं के प्रवेश के बारे में सुस्त हो जाते हो। तब तुम बिना ध्यान दिए आलसी हो जाते हो, और अपने स्वयं के प्रवेश को कोई भी महत्व बिल्कुल नहीं देते हो। इसलिए, जब तुम दूसरों की सेवकाई कर रहे हो, तो तुम्हें अपनी कद-काठी और पवित्र आत्मा के कार्य के बीच स्पष्ट रूप से अंतर अवश्य करना चाहिए। इससे तुम्हारा प्रवेश बेहतर रूप से सुगम होगा और तुम्हारे अनुभव को बेहतर लाभ होगा। मनुष्य का पवित्र आत्मा के कार्य को अपने स्वयं के अनुभव के रूप में समझना मनुष्य के अधःपतन काआरंभ है। इसलिए, तुम लोग जो भी कर्तव्य करते हो, उसे तुम लोगों को अपने प्रवेश के एक मुख्य सबक के रूप में समझना चाहिए।

"वचन देह में प्रकट होता है" से "कार्य और प्रवेश (2)" से

एक व्यक्ति परमेश्वर की इच्छा को पूरा करने, परमेश्वर की पसंद के सभी लोगों को उसके सामने लाने, और पवित्र आत्मा के कार्य और परमेश्वर के मार्गदर्शन से मनुष्य को परिचित कराने के लिए कार्य करता है, जिससे परमेश्वर के कार्य के परिणामों को पूर्ण करता है। इस कारण से, यह अनिवार्य है कि तुम लोग कार्य करने के सार को समझो। परमेश्वर द्वारा उपयोग किए गए किसी व्यक्ति के रूप में, सभी पुरुष परमेश्वर के लिए कार्य करने के योग्य हैं, अर्थात्, सभी के पास पवित्र आत्मा द्वारा उपयोग किए जाने का अवसर है। हालाँकि, इसमें एक बात है जिसका तुम लोगों को अवश्य एहसास होना चाहिए: जब मनुष्य परमेश्वर का कार्य करता है, तो मनुष्य के पास परमेश्वर द्वारा उपयोग किए जाने का अवसर होता है, किन्तु मनुष्य के द्वारा जो कहा और जाना जाता है वह पूर्णतः मनुष्य की कद-काठी नहीं है। तुम लोगों को केवल अपने कार्य में ही अपनी कमियों के बारे में बेहतर ज्ञात हो सकता है, और पवित्र आत्मा से अधिक प्रबुद्धता प्राप्त कर सकते हो, जो तुम लोगों को अपने कार्य में बेहतर प्रवेश प्राप्त करने देगा। यदि मनुष्य परमेश्वर से मार्गदर्शन को मनुष्य का स्वयं का प्रवेश और मनुष्य के अंदर अंतर्निहित बातें समझता है, तो मनुष्य की कद-काठी के विकसित होने की कोई संभावना नहीं है। जब मनुष्य एक सामान्य स्थिति में होता है, तो पवित्र आत्मा उसे प्रबुद्ध करता है; ऐसे समयों पर, मनुष्य प्रायः उसे प्राप्त होने वाली प्रबुद्धता को वास्तव में अपनी स्वयं की कद-काठी के रूप मानने की ग़लती करता है, क्योंकि पवित्र आत्मा अत्यंत सामान्य तरीके से प्रबुद्ध करता है: मनुष्य के भीतर जो अंतर्निहित है उसका उपयोग करके। जब मनुष्य कार्य करता और बोलता है, या अपनी आध्यात्मिक भक्ति में मनुष्य की प्रार्थना के दौरान, एक सच्चाई उसे अचानक स्पष्ट हो जाएगी। वास्तव में, हालाँकि, मनुष्य जो देखता है वह केवल पवित्र आत्मा द्वारा प्रबुद्धता है (प्राकृतिक रूप से, यह मनुष्य से सहयोग से संबंधित है) और मनुष्य की सच्ची कद-काठी नहीं है। अनुभव की अवधि के बाद जिसमें मनुष्य कई वास्तविक कठिनाइयों का सामना करता है, ऐसी परिस्थितियों में मनुष्य की वास्तविक कद-काठी स्पष्ट होती है। केवल उस समय ही मनुष्य को पता चलता है कि मनुष्य की कद-काठी बहुत बड़ी नहीं है, और मनुष्य के स्वार्थ, व्यक्तिगत विचार और लालच सभी उभर जाते हैं। केवल इस तरह के अनुभव के कई चक्रों के बाद ही कई ऐसे लोग जो अपनी आत्माओं के भीतर जाग गए हैं, वे महसूस करते हैं कि अतीत में यह उनकी वास्तविकता नहीं थी, बल्कि पवित्र आत्मा से एक क्षणिक रोशनी थी, और मनुष्य को केवल रोशनी प्राप्त हुई थी। जब पवित्र आत्मा मनुष्य को सच्चाई समझने के लिए प्रबुद्ध करता है, तो ऐसा प्रायः, संदर्भ के बिना, स्पष्ट और विशिष्ट तरीके से होता है। अर्थात्, वह इस प्रकाशन में मनुष्य की कठिनाइयों को शामिल नहीं करता है, और बल्कि सीधे ही सत्य को प्रकट करता है। जब मनुष्य प्रवेश में कठिनाइयों का सामना करता है, तो मनुष्य पवित्र आत्मा द्वारा प्रबुद्धता को शामिल करता है, और यह मनुष्य का वास्तविक अनुभव बन जाता है।...इसलिए, जब तुम लोग पवित्र आत्मा का कार्य प्राप्त करते हो, तो, यह देखते हुए कि वास्तव में पवित्र आत्मा का कार्य क्या है और तुम लोगों का प्रवेश क्या है, और साथ ही अपने प्रवेश में पवित्र आत्मा के कार्य को शामिल करते हुए, तुम लोगों को उसके साथ-साथ अपने प्रवेश पर और अधिक ध्यान देना चाहिए, ताकि तुम लोग उसके द्वारा बेहतर ढंग से पूर्ण बनाए जा सको और पवित्र आत्मा के कार्य के सार को तुम लोगों में गढ़े जाने दे सको। पवित्र आत्मा के कार्य के अपने अनुभव के दौरान, तुम लोग पवित्र आत्मा और साथ ही स्वयं के बारे में जान जाते हो, और अत्यधिक दुःखों के अनगिनत उदाहरणों के बीच, तुम लोग परमेश्वर के साथ एक सामान्य संबंध विकसित करते हो, और तुम लोगों और परमेश्वर के बीच संबंध दिन पर दिन घनिष्ठ होता जाता है। शुद्धिकरण और काट-छाँट के असंख्य उदाहरणों के बाद, तुम लोगों में परमेश्वर के प्रति एक सच्चा प्यार विकसित होता है। यही कारण है कि तुम लोगों को यह एहसास अवश्य होना चाहिए कि कष्ट, दण्ड, और क्लेश हतोस्ताही नहीं हैं; केवल पवित्र आत्मा का कार्य प्राप्त करना किन्तु तुम लोगों का प्रवेश प्राप्त नहीं करना भयावह है। जब दिन आएगा कि परमेश्वर का कार्य पूरा हो जाएगा, तो तुम लोगों ने व्यर्थ के लिए परिश्रम किया होगा; यद्यपि तुम लोगों ने परमेश्वर के कार्य का अनुभव कर लिया होगा, किन्तु तुम लोग पवित्र आत्मा को नहीं जान पाए होगे या तुम लोगों की स्वयं की प्रविष्टि नहीं हुई होगी। पवित्र आत्मा द्वारा मनुष्य की प्रबुद्धता मनुष्य के जुनून को बनाए रखने के लिए नहीं है; यह मनुष्य के प्रवेश के लिए एक रास्ता खोलने के लिए है, और साथ ही मनुष्य को पवित्र आत्मा को जानने देने के लिए, और उस से परमेश्वर के लिए श्रद्धा और आराधना का हृदय विकसित करने के लिए है।

"वचन देह में प्रकट होता है" से "कार्य और प्रवेश (2)" से

परमेश्वर ने मनुष्यों को बहुत कुछ सौंपा है और अनगिनत प्रकार से उनके प्रवेश को संबोधित किया है। परंतु क्योंकि लोगों की क्षमता बहुत कम है, इसलिए परमेश्वर के बहुत सारे वचन जड़ पकड़ने में असफल रहे हैं। क्षमता के कम होने के विभिन्न कारण हैं, जैसे कि मनुष्य के विचार और नैतिकता की भ्रष्टता, और उचित पालन-पोषण की कमी; सामंती अंधविश्वास जिन्होंने मनुष्य के हृदय को बुरी तरह से जकड़ लिया है; भ्रष्ट और पतनशील जीवन-शैलियाँ जिन्होंने मनुष्य के हृदय की गहराई में कई बुराइयों को स्थापित कर दिया है; सांस्कृतिक ज्ञान की सतही समझ, लगभग अठानवे प्रतिशत लोगों में सांस्कृतिक ज्ञान की शिक्षा की कमी और यही नहीं, बहुत कम लोगों का उच्च-स्तर की सांस्कृतिक शिक्षा को प्राप्त करना, इसलिए मूल रूप से लोगों को यह पता ही नहीं है कि परमेश्वर या पवित्र आत्मा का क्या अर्थ है, परंतु उनके पास सामंती अंधविश्वासों से प्राप्त परमेश्वर की केवल एक धुंधली और अस्पष्ट तस्वीर है; वे घातक प्रभाव जो हज़ारों वर्षो की "राष्ट्रवाद की अभिमानी आत्मा" द्वारा मनुष्य के हृदय की गहराई में छोड़े गए तथा सामंती विचारधारा जिसके द्वारा लोग बिना स्वतंत्रता के, महत्वकांक्षा रखने और आगे बढ़ने की इच्छा के बिना, प्रगति करने की अभिलाषा के बिना, बल्कि निष्क्रिय रहने और पीछे की ओर जाने और गुलाम मानसिकता से घिरे होने के कारण बंधे और जकड़े हुए हैं। ऐसी कई और बातों के साथ भी। इन वास्तविक कारणों ने मनुष्यजाति के वैचारिक दृष्टिकोण, आदर्शों, नैतिकता और स्वभाव पर अमिट मलिनता और भद्दा प्रभाव छोड़ा है। ऐसा प्रतीत होता है, जैसे मनुष्य अंधकार के आतंकी जगत में जी रहे हैं, उनमें से कोई भी इस जगत के पार जाने के लिए प्रयास नहीं कर रहा है, और उनमें से कोई भी आदर्श जगत की ओर आगे बढ़ने के लिए नहीं सोच रहा है; बल्कि, वे अपने जीवन में बहुतायत से संतुष्ट हैं, अपने दिनों को बच्चे जनने और उनके पालन-पोषण में, झगड़ने में, पसीना बहाने में, और अपने कामों में जाने में व्यय करते हैं; शांति से अपने जीवन को जीते हुए आरामदायक और आनंदमय परिवार, वैवाहिक स्नेह, अपने बच्चों के बारे में अपने अपने अंत के वर्षों में आनंद के सपने देखते हैं...। इसकी अपेक्षा कि अपने सिद्ध जीवन का निर्माण करें, दसियों, हज़ारों, लाखों वर्षों से अभी तक, लोग इसी तरह से समय को व्यर्थ कर रहे हैं, सभी प्रतिष्ठा और संपत्ति की दौड़ में, और एक दूसरे के प्रति षड्यंत्र करने में, इस अंधकारपूर्ण जगत में केवल एक दूसरे की हत्या काइरादा रखते हैं। क्या किसी ने कभी परमेश्वर की इच्छा को ढूंढा है? क्या कभी किसी ने परमेश्वर के कार्य पर ध्यान दिया है? एक लम्बे अर्से से मानवता के सभी अंगों पर अंधकार के प्रभाव ने कब्ज़ा जमा लिया है और वही मानवीय स्वभाव बन गए हैं, और इसलिए परमेश्वर के कार्य को करना कठिन हो गया है, और यहाँ तक कि जो परमेश्वर ने उन्हें आज सौंपा है उसपर लोग ध्यान भी देना नहीं चाहते हैं। वैसे भी, मैं विश्वास करता हूँ कि मेरे इन शब्दों को बोलने पर लोगों को आपत्ति नहीं होगी क्योंकि मैं हज़ारों वर्षों के इतिहास के बारे में बात कर रहा हूँ। इतिहास के बारे में बात करने का अर्थ तथ्यों के बारे में बात करना है, यही नहीं उन कलंकित कार्यों के बारे में भी जो सबके सामने प्रत्यक्ष हैं, इसलिए तथ्य के विरोध में बोलने का क्या अर्थ रह जाता है?

"वचन देह में प्रकट होता है" से "कार्य और प्रवेश (3)" से

परमेश्वर अंधविश्वास की उन गतिविधियों से सबसे ज्यादा घृणा करता है जिनमें लोग लिप्त रहते हैं, परंतु अभी भी बहुत से लोग यह सोचकर कि अंधविश्वास की ये गतिविधियाँ परमेश्वर द्वारा दी गई हैं, इन्हें त्यागने में असमर्थ हैं, और आज तक उन्होंने इन्हें पूरी तरह से नहीं त्यागा है। ऐसी वस्तुएं जैसे कि जवान लोगों द्वारा विवाह के भोज और दुल्हन के साज-सामान का प्रबंध; नकद उपहार, प्रीतिभोज, और इन्हीं के समान अन्य तरीके जिनमें आनन्द के अवसरों को मनाया जाता है; वे प्राचीन तरीके जो हमें पूर्वजों से मिले हैं; और अंधविश्वास की वे सारी गतिविधियाँ जो मृतकों तथा उनके अंतिम संस्कार के लिए की जाती हैं: ये परमेश्वर के लिए और भी घृणास्पद हैं। यहाँ तक कि रविवार भी (सब्त, जैसा कि यहूदियों द्वारा मनाया जाता है) उसके लिए घृणास्पद है; और मनुष्य के बीच सामाजिक सम्बन्ध और सांसारिक बातचीत परमेश्वर द्वारा तुच्छ समझे जाते और अस्वीकार किए जाते हैं। यहाँ तक की वसंत का त्यौहार और क्रिसमस, जिनके बारे में सब जानते हैं, परमेश्वर की आज्ञास्वरूप नहीं हैं, तो इन त्यौहारों की छुट्टियों के लिए खिलौने और सजावट (गीत, नव वर्ष का केक, पटाखे, रौशनी की मालाएँ, क्रिसमस के उपहार, क्रिसमस के उत्सव, और प्रभु भोज) की तो बात ही छोड़ो-क्या वे मनुष्यों के मनों की मूर्तियाँ नहीं हैं? सब्त के दिन रोटी का तोड़ना, दाखरस, और उत्तम वस्त्र और भी अधिक प्रभावी मूर्तियाँ हैं। चीन में लोकप्रिय सारे पारम्परिक त्यौहार, जैसे ड्रैगन हैड्स-रेजिंग दिवस, ड्रैगन बोट महोत्सव, मध्य-शरद ऋतु महोत्सव, लाबा महोत्सव, और नव वर्ष उत्सव, और धार्मिक जगत के त्यौहार जैसे ईस्टर, बपतिस्मा दिवस, और क्रिसमस, आज इन सभी अनुचित त्यौहारों को प्राचीन काल से बहुत से लोगों द्वारा मनाया गया और हमें प्रदान कर दिया गया, और जिस मनुष्यजाति की परमेश्वर ने सृष्टि की उसके साथ यह पूर्णतः असंगत है। यह मनुष्यजाति की समृद्ध कल्पना और प्रवीण धारणा ही है जिसने उन्हें तब से लेकर आज तक आगे बढ़ाया है। ऐसा प्रतीत होता है कि उनमें कोई दोष नहीं हैं, परंतु यह मनुष्यजाति के साथ शैतान द्वारा खेली गयी चालें हैं। जिस स्थान पर शैतानों की जितनी ज्यादा भीड़ होती है, उतना ही पुराने ढंग का और पिछड़ा हुआ वह स्थान होता है, उतनी ही गहराई से सामंती प्रथा दृढ़ होती है। यह वस्तुएं लोगों को इतनी कस कर बाँध देती हैं कि हिलने-डुलने के लिए कुछ भी स्थान नहीं रह जाता है। धार्मिक जगत के बहुत सारे त्यौहार मौलिकता का प्रदर्शन करते और परमेश्वर के कार्य के लिए एक सेतु का निर्माण करते प्रतीत होते हैं; किन्तु वास्तव में वे शैतान के अदृश्य बंधन हैं जिनसे शैतान लोगों को बाँध देता है ताकि वे परमेश्वर को न जान पाएं - वे सब शैतान की धूर्त रणनीतियाँ हैं। वास्तव में, जब परमेश्वर के कार्य का एक चरण समाप्त हो जाता है, तो वह पहले ही बिना कोई चिह्न छोड़े, उस समय के उपकरण और शैली को नष्ट कर चुका होता है। परंतु, "सच्चे विश्वासी" ठोस पदार्थ की वस्तुओं की आराधना करना जारी रखते हैं; इस दौरान वे आगे का अध्ययन न करते हुए, उन वस्तुओं को बिल्कुल भुला देते हैं जो परमेश्वर के पास हैं, प्रकटत: ऐसा लगता है कि उनके मन में परमेश्वर के प्रति अगाध प्रेम है जबकि वास्तव में वे उसे बहुत पहले ही घर के बाहर धकेल चुके हैं और शैतान को आराधना-स्थल पर स्थापित कर चुके हैं। यीशु, क्रूस, मरियम, यीशु का बपतिस्मा, अंतिम भोज के चित्रों को लोग पूरे समय बार-बार "पिता परमेश्वर" पुकारते हुए, उन्हें स्वर्ग के प्रभु के रूप में आदर देते हैं। क्या यह सब मज़ाक नहीं है? परमेश्वर को उन सभी समान कथनों और क्रियाओं से, जो पूर्वजों से मनुष्यजाति को आज तक सौंपी गई हैं, घृणा है; वे गंभीरतापूर्वक परमेश्वर के आगे के मार्ग में बाधा डालते हैं और, यही नहीं, वे मनुष्यजाति के प्रवेश में विघ्न डालते हैं। यह बात तो एकतरफ कि शैतान ने मनुष्यजाति को किस सीमा तक भ्रष्ट किया है, लोगों के अंतर्मन विटनेस ली के नियम, लॉरेंस के अनुभवों, वॉचमैन नी के सर्वेक्षणों, और पौलुस के कार्य जैसी वस्तुओं से पूर्णतः भरे हुए हैं। परमेश्वर के पास मनुष्यों पर कार्य करने के लिए कोई भी मार्ग नहीं है, क्योंकि उनके भीतर व्यक्तिवाद, कानून, नियम, विनियम, प्रणाली, और ऐसी ही अनेक चीज़ें भरी पड़ी हैं; लोगों के सामंती अंधविश्वास की प्रवृतियों के अतिरिक्त इन वस्तुओं ने मनुष्यजाति को बंदी बनाकर उसे निगल लिया है। यह बिल्कुल ऐसा है जैसे लोगों के विचार एक रूचिकर चलचित्र हैं और जो रंगों से भरपूर परियों की कहानी का वर्णन कर रहा है, जिसमें असाधारण प्राणी बादलों की सवारी कर रहें हैं, यह इतना कल्पनाशील है कि लोगों को स्तब्ध, मूक और विस्मित कर देता है।

"वचन देह में प्रकट होता है" से "कार्य और प्रवेश (3)" से

मनुष्य के स्वभाव में परिवर्तन करने के लिए सबसे अच्छा तरीका लोगों के अंतर्मन के उन भागों को बदलना है जिन्हें गहन रूप से विषैला कर दिया गया है, ताकि लोग अपनी विचारधारा और नैतिकता को बदल सकें। सबसे पहले तो लोगों को स्पष्ट रूप से देखने की जरूरत है कि परमेश्वर के लिए धार्मिक संस्कार, धार्मिक गतिविधियाँ, वर्ष और महीने, और त्यौहार घृणास्पद हैं। उन्हें सामंती विचारधारा के बंधनों से मुक्त होना चाहिए और अंधविश्वास की गहरी प्रवृति के हर प्रभाव को जड़ से उखाड़ देना चाहिए। यह सब मनुष्यजाति के प्रवेश में सम्मिलित हैं। तुम लोगों को यह अवश्य समझना चाहिए कि क्यों परमेश्वर मनुष्यजाति को सांसारिक जगत से बाहर ले जाता है, और फिर क्यों वह मनुष्यजाति को नियमों और विनियमों से दूर ले जाता है। यही वह द्वार है जिससे तुम सब प्रवेश करोगे, और यद्यपि यह तुम्हारे आत्मिक अनुभव के साथ कोई सम्बन्ध नहीं रखता, परंतु ये सबसे बड़ी बाधाएँ हैं जो तुम लोगों के प्रवेश में और परमेश्वर को जानने में बाधा उत्पन्न करतीं हैं। वे ऐसा जाल बुनती हैं जिसमें लोग फंस जाते हैं। बहुत सारे लोग बाइबल को बहुत अधिक पढ़ते हैं और यहाँ तक कि अपनी स्मृति से बाइबिल के अनेक भागों को सुना भी सकते हैं। आज अनेक लोग प्रवेश में, परमेश्वर के कार्य को मापने के लिए अनजाने में बाइबल का प्रयोग करते हैं, मानो परमेश्वर के कार्य में इस चरण का आधार बाइबिल है और इसका स्रोत भी बाइबल है। जब परमेश्वर का कार्य बाइबल के अनुरूप होता है, तब लोग परमेश्वर के कार्य का दृढ़ता से समर्थन करते हैं और नई श्रद्धा के साथ उसका आदर करते हैं; जब परमेश्वर का कार्य बाइबल के अनुरूप नहीं होता है, तब लोग इतने व्याकुल हो जाते हैं कि उसमें परमेश्वर के कार्य का आधार खोजते-खोजते उनके पसीने छूटने लगते हैं; यदि बाइबल में परमेश्वर के कार्य का उल्लेख नहीं हैं, तो लोग परमेश्वर को अनदेखा कर देंगे। यह कहा जा सकता है कि जहाँ तक आज परमेश्वर के कार्य का प्रश्न है, उसे सर्वाधिक लोग डरते-डरते सावधानी से ग्रहण करते हैं, बहुत चुन-चुनकर पालन करते हैं, और यह जानने के प्रति उदासीन अनुभव करते हैं; जहाँ तक अतीत की बातों का प्रश्न है, वे आधे भाग को पकड़े रहते हैं और बचे हुए आधे को त्याग देते हैं। क्या यह प्रवेश कहला सकता है? दूसरों की पुस्तकें ऐसे पकड़े रहते हैं जैसे कोई खज़ाना हो, और उसके साथ ऐसे व्यवहार करते हैं जैसे कि वह स्वर्ग के द्वार की सुनहरी कुंजी हो, आज लोग उसमें रुचि नहीं दर्शाते जो परमेश्वर उनसे चाहता है। इसके अतिरिक्त, बहुत सारे "बुद्धिमान विशेषज्ञ" अपने बाएँ हाथ में परमेश्वर के वचन को और अपने दाएँ हाथ में दूसरों की "उत्कृष्ट कृतियाँ" रखते हैं, जैसे कि वे इन उत्कृष्ट कृतियों में परमेश्वर के वचनों को पूर्ण रूप से सही सिद्ध करने के लिए परमेश्वर के वचनों का आधार खोजना चाहते हैं, और यहाँ तक कि वे दूसरों के सामने परमेश्वर के वचनों की व्याख्या उत्कृष्ट कृतियों के साथ एकीकृत करके करते हैं, जैसे कि वे बहुत बड़े काम में लगे हों। सच कहा जाए, तो मनुष्यजाति में ऐसे बहुत सारे "वैज्ञानिक शोधकर्ता" हैं जिन्होंने आज की वैज्ञानिक उपलब्धियों को कभी अधिक महत्व नहीं दिया, ऐसी वैज्ञानिक उपलब्धियां जिनकी कोई मिसाल नहीं हैं (अर्थात्- परमेश्वर का कार्य, परमेश्वर के वचन, और जीवन प्रवेश का मार्ग), इसलिए लोग "आत्मनिर्भर" हैं, अपनी वाकपटुता के बल पर बड़े और व्यापक "उपदेश" देते हैं और "परमेश्वर के अच्छे नाम" पर घमंड करते हैं। इस दौरान, उनके स्वयं का प्रवेश संकट में है और वे परमेश्वर की अपेक्षाओं से उतनी ही दूर दिख रहे हैं जितनी दूर इस क्षण सृष्टि दिख रही है। कितना सहज है परमेश्वर का कार्य करना?

"वचन देह में प्रकट होता है" से "कार्य और प्रवेश (3)" से

ऐसा प्रतीत होता है कि लोगों ने स्वयं को आधा बीते हुए कल पर छोड़ देने के लिए और आधा आज लाने के लिए, आधा शैतान को सौंपने के लिए और आधा परमेश्वर को प्रस्तुत करने के लिए पहले से मन बना लिया है, जैसे कि यही उनके विवेक को शांति देने तथा सुख की चेतना का अनुभव करने का मार्ग है। लोगों की भीतरी दुनिया इतनी कपट से भरी है कि वे न सिर्फ आने वाले कल को परंतु बीते हुए कल को भी खोने से डरते हैं, आज के परमेश्वर और शैतान को जो कि हैं भी और नहीं भी प्रतीत होते हैं, उन दोनों को ठेस पहुँचाने से डरते हैं। क्योंकि लोग स्वयं की विचारधारा और नैतिकता को विकसित करने में विफल रहे हैं, इसलिए वे विशेषकर विवेक के अभाव में रहते हैं, और वे यह नहीं बता सकते कि आज का कार्य परमेश्वर का है या नहीं है। संभवतः यह इसलिए है क्योंकि लोगों की सामंती और अंधविश्वास की विचारधारा इतनी गहरी है कि उन्होंने इन वस्तुओं में भेद की परवाह न करते हुए अंधविश्वास और सत्य, परमेश्वर और मूर्तियों को एक ही श्रेणी में स्थापित कर दिया है और चाहे वे अपनी बुद्धि पर कितना भी जोर दें,फिर भी स्पष्टता से भेद करने में असमर्थ प्रतीत होते हैं। इसलिए मनुष्य अपने मार्ग पर ठहर गए हैं और अब और आगे नहीं बढ़ते। यह सब समस्याएँ लोगों में सही वैचारिक शिक्षा की कमी के कारण उत्पन्न हुई हैं, जो उनके प्रवेश में बहुत कठिनाइयाँ उत्पन्न करती है। परिणामस्वरुप, लोग सच्चे परमेश्वर के कार्य में रुचि महसूस नहीं करते, परंतु मनुष्य के कार्य में दृढ़ता से जुड़े रहते हैं (जैसे कि जिनको वे देखते हैं वे महान पुरुष हों), जैसे कि उन पर किसी ब्रांड का नाम अंकित हो। क्या ये विषय नवीनतम नहीं हैं जिनमें मनुष्यजाति को प्रवेश करना चाहिए?

"वचन देह में प्रकट होता है" से "कार्य और प्रवेश (3)" से

यदि मनुष्य वास्तव में पवित्र आत्मा के कार्य के अनुसार प्रवेश कर सके, तो उसका जीवन वसंत की वर्षा के बाद बांस की कली की तरह शीघ्र अंकुरित हो जाएगा। अधिकांश लोगों की मौज़ूदा हैसियतों से अनुमान लगाते हुए, कोई भी जीवन को किसी प्रकार का महत्व नहीं दे रहा है। इसके बजाय, लोग कुछ अप्रासंगिक सतही मामलों को महत्व दे रहे हैं। या यह नहीं जानते हुए कि किस दिशा में जाना है और किसके लिए तो बिल्कुल भी नहीं जानते हुए, वे इधर-उधर भागते रहे हैं और ध्यान केन्द्रित किए बिना उद्देश्यहीन और अंधाधुंध तरीके से कार्य कर रहे हैं। वे केवल "विनम्रतापूर्वक स्वयं को छुपा रहे हैं"। सच्चाई यह है, कि तुम लोगों में से कुछ ही लोग अंत के दिनों के लिए परमेश्वर के अभिप्राय को जानते हैं। तुम लोगों में से शायद ही कोई परमेश्वर के पदचिह्न को जानता है, और उससे भी कम को यह पता है कि परमेश्वर का चरम निष्पादन क्या होगा। फिर भी, हर कोई, विशुद्ध इच्छाशक्ति द्वारा, इस तरह अनुशासन को स्वीकार कर रहा है और दूसरों से व्यवहार कर रहा है, मानो कि उस दिन के लिए तैयार हो[1] रहा हो और प्रतीक्षा कर रहा हो जब उन्होंने इसे अंततः पूरा कर लिया है और आराम कर सकते हैं। लोगों के बीच इन "चमत्कारों" पर मैं कोई टिप्पणी नहीं दूँगा, लेकिन इसमें एक बात है जो तुम सभी को अवश्य समझनी चाहिए। अभी ज्यादातर लोग असामान्यता की दिशा में प्रगति कर रहे हैं,[2] उनके प्रवेश के कदम पहले से ही एक अंधी गली की ओर बढ़ रहे हैं।[3] शायद कई लोग सोचते हैं कि यह गुप्त जगह है, जिसे आज़ादी की जगह मानते हुए, मनुष्य इसकी लालसा करता है। वास्तव में, यह नहीं है। या कोई कह सकता है कि लोग पहले से ही भटक चुके हैं।

"वचन देह में प्रकट होता है" से "कार्य और प्रवेश (4)" से

परमेश्वर चीन की मुख्य भूमि में देहधारण किया है, जिसे हांगकांग और ताइवान में हमवतन के लोग अंतर्देशीय कहते हैं। जब परमेश्वर ऊपर से पृथ्वी पर आया, तो स्वर्ग और पृथ्वी में कोई भी इसके बारे में नहीं जानता था, क्योंकि यही परमेश्वर का एक गुप्त अवस्था में लौटने का वास्तविक अर्थ है। वह लंबे समय तक देह में कार्य करता और रहता रहा है, फिर भी इसके बारे में कोई भी नहीं जानता है। आज के दिन तक भी, कोई इसे पहचानता नहीं है। शायद यह एक शाश्वत पहेली रहेगा। इस बार परमेश्वर का देह में आना कुछ ऐसा नहीं है जिसके बारे कोई भी जानने में सक्षम नहीं है। इस बात की परवाह किए बिना कि पवित्रात्मा का कार्य कितने बड़े-पैमाने का और कितना शक्तिशाली है, परमेश्वर हमेशा शांतचित्त बना रहता है, कभी भी स्वयं का भेद नहीं खोलता है। कोई कह सकता है कि यह ऐसा है मानो कि उसके कार्य का यह चरण स्वर्ग के क्षेत्र में हो रहा है। यद्यपि यह हर एक के लिए बिल्कुल स्पष्ट है, किन्तु कोई भी इसे पहचानता नहीं है। जब परमेश्वर अपने कार्य के इस चरण को समाप्त कर लेगा, तो हर कोई अपने लंबे सपने से जाग जाएगा और अपनी पिछली प्रवृत्ति को उलट देगा।[4] मुझे परमेश्वर का एक बार यह कहना याद है, "इस बार देह में आना शेर की माँद में गिरने जैसा है।" इसका अर्थ यह है कि क्योंकि परमेश्वर के कार्य का यह चक्र परमेश्वर का देह में आना है और बड़े लाल अजगर के निवास स्थान में पैदा होना है, इसलिए इस बार उसके पृथ्वी पर आने के साथ-साथ और भी अधिक चरम ख़तरे हैं। जिसका वह सामना करता है वे हैं चाकू और बंदूकें और लाठियाँ; जिसका वह सामना करता है वह है प्रलोभन; जिसका वह सामना करता है वह हत्यारी दिखाई देने वाली भीड़। वह किसी भी समय मारे जाने का जोख़िम लेता है। परमेश्वर कोप के साथ आया। हालाँकि, वह पूर्णता का कार्य करने के लिए आया, जिसका अर्थ है कि कार्य का दूसरा भाग करने के लिए जो छुटकारे के कार्य के बाद जारी रहता है। अपने कार्य के इस चरण के वास्ते, परमेश्वर ने अत्यंत विचार और ध्यान समर्पित किया है और, स्वयं को विनम्रतापूर्वक छिपाते हुए और अपनी पहचान का कभी भी घमण्ड नहीं करते हुए, प्रलोभन के हमले से बचने के लिए हर कल्पनीय साधन का उपयोग कर रहा है। सलीब से आदमी को बचाने में, यीशु केवल छुटकारे का कार्य पूरा कर रहा था; वह पूर्णता का कार्य नहीं कर रहा था। इस प्रकार परमेश्वर का केवल आधा कार्य ही किया जा रहा था, परिष्करण और छुटकारे का कार्य उसकी संपूर्ण योजना का केवल आधा ही था। चूँकि नया युग शुरू होने ही वाला था और पुराना युग पीछे हटने ही वाला था, इसलिए परमपिता परमेश्वर ने अपने कार्य के दूसरे हिस्से पर विवेचन करना शुरू किया और इसके लिए तैयारी करनी शुरू कर दी। अतीत में, कदाचित अंत के दिनों में इस देहधारण की भविष्यवाणी नहीं की गई हो, और इसलिए उसने इस बार परमेश्वर के देह में आने के आस-पास बढ़ी हुई गोपनीयता की नींव रखी। उषाकाल में, किसी को भी बताए बिना, परमेश्वर पृथ्वी पर आया और देह में अपना जीवन शुरू किया। लोग इस क्षण से अनभिज्ञ थे। कदाचित वे सब घोर निद्रा में थे, कदाचित बहुत से लोग जो सतर्कतापूर्वक जागे हुए थे वे प्रतीक्षा कर रहे थे, और कदाचित कई लोग स्वर्ग के परमेश्वर से चुपचाप प्रार्थना कर रहे थे। फिर भी इन सभी कई लोगों के बीच, कोई नहीं जानता था कि परमेश्वर पहले से ही पृथ्वी पर आ चुका है। परमेश्वर ने अपने कार्य को अधिक सुचारू रूप से पूरा करने और बेहतर परिणामों को प्राप्त करने के लिए इस तरह से कार्य किया, और यह अधिक प्रलोभनों से बचने के लिए भी था। जब मनुष्य की वसंत की नींद टूटेगी, तब तक परमेश्वर का कार्य बहुत पहले ही समाप्त हो गया होगा और वह पृथ्वी पर भटकने और अस्थायी निवास के अपने जीवन को समाप्त करते हुए चला जाएगा। क्योंकि परमेश्वर का कार्य परमेश्वर से व्यक्तिगत रूप से कार्य करना और बोलना आवश्यक बनाता है, और क्योंकि मनुष्य के लिए सहायता करने का कोई रास्ता नहीं है, इसलिए परमेश्वर ने स्वयं कार्य करने हेतु पृथ्वी पर आने के लिए अत्यधिक पीड़ा सही है। मनुष्य परमेश्वर के कार्य का स्थान लेने में समर्थ है। इसलिए परमेश्वर ने पृथ्वी पर अपना स्वयं का कार्य करने, अपनी समस्त सोच और देखरेख को दरिद्र लोगों के इस समूह को छुटकारा दिलाने पर रखने, खाद के ढेर से सने लोगों के इस समूह को छुटकारा दिलाने हेतु, उस स्थान पर आने के लिए जहाँ बड़ा लाल अजगर निवास करता है, अनुग्रह के युग के दौरान के ख़तरों की अपेक्षा कई हजार गुना अधिक ख़तरों का जोखिम लिया है। यद्यपि कोई भी परमेश्वर के अस्तित्व के बारे में नहीं जानता है, तब भी परमेश्वर परेशान नहीं है क्योंकि इससे परमेश्वर के कार्य को काफी लाभ मिलता है। हर कोई नृशंस रूप से बुरा है, इसलिए कोई भी परमेश्वर के अस्तित्व को कैसे बर्दाश्त कर सकता है? यही कारण है कि पृथ्वी पर परमेश्वर हमेशा चुप रहता है। इस बात की परवाह किए बिना कि मनुष्य कितना अधिक क्रूर है, परमेश्वर इसमें से किसी को भी गंभीरता से नहीं लेता है, बल्कि उस कार्य को करता रहता है जिसे करने की उसे आवश्यकता है ताकि उस बड़े कार्यभार को पूरा किया जाए जो स्वर्गिक परमपिता ने उसे दिया। तुम लोगों में से किसने परमेश्वर की मनोरमता को पहचाना है? कौन परमपिता परमेश्वर के लिए उसके पुत्र की तुलना में अधिक महत्व दर्शाता है? कौन परमपिता परमेश्वर की इच्छा को समझने में सक्षम है? स्वर्ग में परमपिता का आत्मा अक्सर परेशान होता है, और पृथ्वी पर उसका पुत्र, उसके हृदय को चिंता से टुकड़े-टुकड़े करते हुए, परमपिता की इच्छा से बारंबार प्रार्थना करता है। क्या कोई है जो परमपिता परमेश्वर के अपने बेटे के लिए प्यार को जानता हो? क्या कोई है जो जानता हो कि कैसे प्यारा पुत्र परमपिता परमेश्वर को कैसे याद करता है? स्वर्ग और पृथ्वी के बीच विदीर्ण हुए, दोनों दूर से एक दूसरे की ओर, पवित्रात्मा में साथ-साथ, लगातार निहार रहे हैं। हे मानवजाति! तुम लोग परमेश्वर के हृदय के बारे में कब विचारशील बनोगे? कब तुम लोग परमेश्वर के अभिप्राय को समझोगे? परमपिता और पुत्र हमेशा एक-दूसरे पर निर्भर रहे हैं। फिर क्यों उन्हें पृथक किया जाना चाहिए, एक ऊपर स्वर्ग में और एक नीचे पृथ्वी पर? परमपिता अपने पुत्र को उतना ही प्यार करता है जितना पुत्र अपने पिता को प्यार करता है। तो फिर उसे इतनी उत्कंठा के साथ और इतने लंबे समय तक इतनी व्यग्रता के साथ प्रतीक्षा क्यों करनी चाहिए? यद्यपि वे लंबे समय से पृथक नहीं हुए हैं, क्या किसी को पता है कि परमपिता पहले से ही इतने दिनों और रातों से उद्वेग से तड़प रहा है और लंबे समय से अपने प्रिय पुत्र की त्वरित वापसी की प्रतीक्षा कर रहा है? वह देखता है, वह मौन में बैठता है, वह प्रतीक्षा करता है। यह सब उनके प्रिय पुत्र की त्वरित वापसी के लिए है। वह कब पुनः पुत्र के साथ होगा जो पृथ्वी पर भटक रहा है? यद्यपि एक बार एक साथ हो जाएँ, तो वे अनंत काल के लिए एक साथ होंगे, किन्तु वह हजारों दिनों और रातों के विरह को कैसे सहन कर सकता है, एक ऊपर स्वर्ग में एक और एक नीचे पृथ्वी पर? पृथ्वी पर दसियों वर्ष स्वर्ग में हजारों वर्षों के जैसे हैं। कैसे परमपिता परमेश्वर चिंता नहीं कर सकता है? जब परमेश्वर पृथ्वी पर आता है, तो वह मानव दुनिया के बहुत से उतार-चढ़ावों का वैसे ही अनुभव करता है जैसे मनुष्य करता है। परमेश्वर स्वयं भोला-भाला है, तो क्यों परमेश्वर वही दर्द सहे जो आदमी सहता है? कोई आश्चर्य नहीं कि परमपिता परमेश्वर अपने पुत्र के लिए इतनी तीव्र इच्छा से तरसता है; कौन परमेश्वर के हृदय को समझ सकता है? परमेश्वर मनुष्य को बहुत अधिक देता है; कैसे मनुष्य परमेश्वर के हृदय को पर्याप्त रूप से चुका सकता है? फिर भी मनुष्य परमेश्वर को बहुत कम देता है; परमेश्वर इसलिए चिंता क्यों नहीं कर सकता है?

"वचन देह में प्रकट होता है" से "कार्य और प्रवेश (4)" से

पुरुषों के बीच में शायद ही कोई परमेश्वर के हृदय की तीव्र इच्छा को समझता है क्योंकि लोगों की क्षमता बहुत कम है और उनकी आध्यात्मिक संवेदनशीलता काफी सुस्त है, और क्योंकि वे सभी न तो देखते हैं और न ही ध्यान देते हैं कि परमेश्वर क्या कर रहा है। इसलिए परमेश्वर मनुष्य के बारे में चिंता करता रहता है, मानो कि मनुष्य की पाशविक प्रकृति किसी भी क्षण बाहर आ सकती हो। यह आगे दर्शाता है कि परमेश्वर का पृथ्वी पर आना बड़े प्रलोभनों के साथ-साथ है। किन्तु लोगों के एक समूह को पूरा करने के वास्ते, महिमा से लदे हुए, परमेश्वर ने मनुष्य को अपने हर अभिप्राय के बारे, कुछ भी नहीं छिपाते हुए, बता दिया। उसने लोगों के इस समूह को पूरा करने के लिए दृढ़ता से संकल्प किया है। इसलिए, कठिनाई आए या प्रलोभन, वह नज़र फेर लेता है और इस सभी को अनदेखा करता है। वह केवल चुपचाप अपना स्वयं का कार्य करता है, और दृढ़ता से यह विश्वास करता है कि एक दिन जब परमेश्वर महिमा प्राप्त लेगा, तो आदमी परमेश्वर को जान लेगा, और यह विश्वास करता है कि जब मनुष्य परमेश्वर के द्वारा पूरा कर लिया जाएगा, तो वह परमेश्वर के हृदय को पूरी तरह से समझ जाएगा। अभी ऐसे लोग हो सकते हैं जो परमेश्वर को प्रलोभित कर सकते हैं या परमेश्वर को गलत समझ सकते हैं या परमेश्वर को दोष दे सकते हैं; परमेश्वर उसमें से किसी को भी गंभीरता से नहीं लेता है। जब परमेश्वर महिमा में अवरोहण करेगा, तो सभी लोग समझ जाएँगे कि परमेश्वर जो कुछ भी करता है वह मानव जाति के कल्याण के लिए है, और सभी लोग समझ जाएँगे कि परमेश्वर जो कुछ भी करता है वह इसलिए है ताकि मानव जाति बेहतर ढंग से जीवित रह सके। परमेश्वर का आगमन प्रलोभनों के साथ-साथ है, और परमेश्वर प्रताप और कोप के साथ भी आता है। जब तक परमेश्वर मनुष्यों को छोड़ कर जाएगा, तब तक उसने पहले ही महिमा प्राप्त कर ली होगी, और वह पूरी तरह से महिमा भरा हुआ और वापसी की खुशी के साथ चला जाएगा। इस बात की परवाह किए बिना कि लोग उसे कैसे अस्वीकार करते हैं, पृथ्वी पर कार्य करते हुए परमेश्वर चीजों को गंभीरता से नहीं लेता है। वह केवल अपना कार्य कर रहा है।

"वचन देह में प्रकट होता है" से "कार्य और प्रवेश (4)" से

परमेश्वर का विश्व का सृजन हजारों वर्षों पहले से चल रहा है, वह पृथ्वी पर एक असीमित मात्रा में कार्य करने के लिए आया है, और उसने मानव दुनिया के अस्वीकरण और अपयश का पूरी तरह से अनुभव किया है। कोई भी परमेश्वर के आगमन का स्वागत नहीं करता है; हर कोई मात्र एक भावशून्य नज़र से उसका सम्मान करता है। इन हजारों वर्षों की कठिनाइयों के दौरान, मनुष्य के व्यवहार ने बहुत पहले से ही परमेश्वर के हृदय को चूर-चूर कर दिया है। वह लोगों के विद्रोह पर अब और ध्यान नहीं देता है, बल्कि इसके बजाय मनुष्य को रूपांतरित करने और स्वच्छ बनाने के लिए एक अलग योजना बना रहा है। उपहास, अपयश, उत्पीड़न, दारूण दुःख, सलीब पर चढ़ने की पीड़ा, मनुष्य द्वारा अपवर्जन इत्यादि जिसे परमेश्वर ने देह में अनुभव किया है-परमेश्वर ने इन्हें पर्याप्त रूप से झेला है। परमेश्वर ने देह में मानव दुनिया के दुःखों को पूरी तरह से भुगता है। स्वर्ग के परमपिता परमेश्वर के आत्मा ने बहुत समय पहले ही ऐसे दृश्यों का असहनीय होना जान लिया था और अपने प्यारे पुत्र की वापसी के लिए इंतजार करते हुए, अपना सिर पीछे कर लिया था और अपनी आँखें बंद कर लीं थी। वह केवल इतना ही चाहता है कि सभी लोग सुनें और पालन करें, उसकी देह के सामने अत्यधिक शर्मिंदगी महसूस करने में समर्थ हों, और उसके ख़िलाफ विद्रोह नहीं करें। वह केवल इतनी ही इच्छा करता है कि सभी लोग विश्वास करें कि परमेश्वर मौज़ूद है। उसने बहुत समय पहले ही मनुष्य से अधिक माँगे करनी बंद कर दी क्योंकि परमेश्वर ने बहुत बड़ी कीमत चुकाई है, फिर भी परमेश्वर के कार्य को गंभीरता से नहीं लेते हुए मनुष्य चैन से सो रहा है।[5]

"वचन देह में प्रकट होता है" से "कार्य और प्रवेश (4)" से

आज तुम सब जानते हो कि परमेश्वर लोगों की अगुवाई जीवन के सही मार्ग पर कर रहा है, कि वह दूसरे युग में प्रवेश करने का अगला कदम उठाने में मनुष्य की अगुवाई कर रहा है, कि वह इस अंधकारमय पुराने समय से, शरीर से बाहर, अंधकारमय शक्तियों और शैतान के प्रभाव के अत्याचार से ऊपर बढ़ने में मनुष्य की अगुवाई कर रहा है, ताकि प्रत्येक व्यक्ति स्वतंत्रता के संसार में जी सके। एक सुंदर कल के लिए, और इसलिए कि लोग अपने कल के कदमों में और अधिक साहसी हो जाएँ, परमेश्वर का आत्मा मनुष्य के लिए सब बातों की योजना बनाता है, और इसलिए कि मनुष्य और अधिक आनंद प्राप्त करे, परमेश्वर शरीर में मनुष्य के आगे के मार्ग को तैयार करने के लिये सभी प्रयास करता है, और उस दिन के आगमन को शीघ्रता से लाता है जिसकी मनुष्य इच्छा करता है। क्या तुम इस सुंदर पल का आनंद लोगे? परमेश्वर के साथ मिलकर आना कोई सरल उपलब्धि नहीं है। यद्यपि तुम लोगों ने कभी उसे नहीं जाना है, फिर भी बहुत लंबे समय से तुम उसके साथ रहे हो। यह तभी होगा यदि प्रत्येक जन इन सुंदर परंतु अस्थाई दिनों को हमेशा तक याद रख सके, और पृथ्वी पर उन्हें अपनी बहुमूल्य संपत्ति बना सके।

"वचन देह में प्रकट होता है" से "कार्य और प्रवेश (5)" से

हजारों वर्षों से चीनी लोगों ने भी गुलामों का जीवन जीया है, और इसी ने उनके विचारों, धारणाओं, जीवन, भाषा, व्यवहार, और कार्यों को इतना सीमित कर दिया है कि उनके पास थोड़ी-सी भी स्वतंत्रता नहीं है। हजारों वर्षों के इतिहास ने महत्वपूर्ण लोगों को किसी आत्मा-विहीन शव के समान एक आत्मा के वश में कर दिया है। बहुत से ऐसे लोग हैं जो वध करने वाली शैतान की छुरी के साये में अपना जीवन जीते हैं, बहुत से ऐसे हैं जो जंगली जानवरों की मांद सरीखे घरों में रहते हैं, ऐसे बहुत से लोग हैं जो बैलों और घोड़ों जैसा भोजन करते हैं, बहुत से ऐसे लोग हैं जो बेसुध और अव्यवस्थित ढंग से "छिपे हुए भयानक संसार" में पड़े रहते हैं। बाहरीतौर पर लोग आदिकालीन मनुष्य से अलग नहीं है, उनका रहने का स्थान नरक के समान है, और जहां तक उनके साथियों का सवाल है, वे हर तरह की गंदी दुष्टात्माओं और बुरी आत्माओं से घिरे रहते हैं। बाहर से मनुष्य उच्च-स्तर के "जानवरों" के समान प्रतीत होते हैं; वास्तव में, वे गंदी दुष्टात्माओं के साथ रहते और निवास करते हैं। लोग शैतान के आक्रमण का शिकार हो जाते हैं, उसके चंगुल से निकलने का कोई मार्ग नहीं होता और कोई उनकी ओर ध्यान भी नहीं दे पाता। यह कहने की अपेक्षा कि वे अपने प्रियजनों के साथ आरामदायक घरों में रहते हैं, प्रसन्न और संतुष्ट जीवन जीते हैं, यह कहना चाहिए कि मनुष्य नरक में रहते हैं, दुष्टात्माओं के साथ व्यवहार करते हैं, और शैतान के साथ मेलजोल करते हैं। वास्तव में, लोग अभी भी शैतान के द्वारा जकड़े हुए हैं, वे वहाँ रहते हैं जहाँ दुष्टात्माएँ एकत्रित होती हैं, और उन गंदी दुष्टात्माओं के द्वारा उनका गलत प्रयोग किया जाता है, जैसे कि उनके बिस्तर उनके शवों के सोने का स्थान हों, जैसे कि वे आरामदायक घोंसले हों।

"वचन देह में प्रकट होता है" से "कार्य और प्रवेश (5)" से

मनुष्य जानवरों के साथ-साथ रहता है, और वे बिना झगड़ों और मौखिक असहमतियों के बड़े तालमेल के साथ आगे बढ़ते रहते हैं। मनुष्य जानवरों की देखभाल और चिंता करने में नकचढ़ा है और जानवरों का अस्तित्व उनके अपने किसी लाभ के बिना मनुष्य के जीवन और फायदे के लिए और मनुष्य के प्रति संपूर्ण और पूरी आज्ञाकारिता रखने के लिए है। सभी रूपों में मनुष्य और पशु के बीच एक निकट[4]और सद्भावनापूर्ण[5] संबंध है-और ऐसा प्रतीत होता है कि गंदी दुष्टात्माएँ मनुष्य और पशु का एक आदर्श संयोजन हैं। इस प्रकार, मनुष्य और पृथ्वी की गंदी दुष्टात्माएँ और भी अधिक घनिष्ठ और अवियोज्य हैं: यद्यपि गंदी दुष्टात्माओं के बिना ही मनुष्य उनसे जुड़ा रहता है; उसी दौरान गंदी दुष्टात्माएँ मनुष्य से कुछ भी छिपा कर नहीं रखतीं, और सब कुछ जो उनके पास होता है, वह उनके प्रति "समर्पित" कर देती हैं। लोग रोजाना "नरक के राजा के महल" में उछलते-कूदते हैं, "नरक के राजा" (अपने पूर्वज) की संगति में मस्ती करते हैं और उसके द्वारा गलत रूप से इस्तेमाल किए जाते हैं, जिससे आज लोग मल में ढक गए हैं, और अधोलोक में बहुत समय बिताने के बाद उन्होंने "जीवित लोगों के संसार" में लौटने की इच्छा रखना भी बहुत समय से छोड़ दिया है। अतः, जैसे ही वे रोशनी को देखते हैं, और परमेश्वर की अपेक्षाओं, परमेश्वर के चरित्र, और उसके कार्यों को देखते हैं, तो वे अपने आपको परेशान और व्याकुल महसूस करते हैं, और अब भी अधोलोक की ओर लौटने और भूत-प्रेतों के साथ वास करने की लालसा करते हैं। बहुत समय पहले वे परमेश्वर को भूल गए थे, और इसलिए वे हमेशा कब्रिस्तान में ही भटकते रहे हैं।

"वचन देह में प्रकट होता है" से "कार्य और प्रवेश (5)" से

कार्य और प्रवेश अंतर्निहित रूप से व्यावहारिक हैं और परमेश्वर के कार्य और आदमी की प्रविष्टि को संदर्भित करते हैं। मनुष्य का परमेश्वर के वास्तविक चेहरे और परमेश्वर के कार्य की समझ का पूर्ण अभाव उसके प्रवेश में बड़ी कठिनाइयाँ लाया है। आज तक, बहुत से लोग अब भी उस कार्य को नहीं जानते जो परमेश्वर अंत के दिनों में निष्पादित करता है या नहीं जानते हैं कि परमेश्वर देह में आने के लिए चरम अपमान क्यों सहन करता है और सुख और दुःख में मनुष्य के साथ खड़ा होता है। मनुष्य परमेश्वर के कार्य के लक्ष्य के बारे में कुछ भी नहीं जानता है, न ही अंत के दिनों के लिए परमेश्वर की योजना के प्रयोजन को जानता है। विभिन्न कारणों से, लोग हमेशा उस प्रवेश के प्रति सदैव निरुत्साहित और अनिश्चित[1] रहते हैं जिसकी परमेश्वर माँग करता है, जो देह में परमेश्वर के कार्य के लिए बड़ी कठिनाइयाँ लाया है। सभी लोग बाधाएँ बन गए प्रतीत होते हैं, और आज तक, उनके पास कोई स्पष्ट समझ नहीं है। इसलिए मैं उस कार्य के बारे में बात करूँगा जो परमेश्वर मनुष्य पर करता है, और जो परमेश्वर का अत्यावश्यक अभिप्राय है, ताकि तुम सभी लोग परमेश्वर के वफ़ादार सेवक बन जाओ, जो अय्यूब की तरह, परमेश्वर को अस्वीकार करने के बजाय मर जाएँगे और हर अपमान को सहन करेंगे, और, जो पतरस की तरह, अपना समस्त अस्तित्व परमेश्वर को अर्पण करें देंगे और अंत के दिनों में परमेश्वर द्वारा प्राप्त किए गए अंतरंग बन जाएँगे। सभी भाई-बहन, परमेश्वर की स्वर्गिक इच्छा के प्रति अपने समस्त अस्तित्व को अर्पण करने के लिए अपनी सामर्थ्य के अंदर सब कुछ करें, परमेश्वर के घर में पवित्र सेवक बन जाएँ, और परमेश्वर द्वारा प्रदान किए गए अनंत वादों का आनंद लें, ताकि परमपिता परमेश्वर का हृदय शीघ्र ही शांतिपूर्ण आराम का आनंद ले सके। "परमपिता परमेश्वर की इच्छा को पूरा करो" उन सभी का आदर्श वाक्य होना चाहिए जो परमेश्वर से प्रेम करते हैं। इन वचनों को प्रवेश के लिए मनुष्य की मार्गदर्शिका और उसके कार्यों का निर्देशन करने वाले कम्पास के रूप में कार्य करना चाहिए। मनुष्य में यही संकल्प होना चाहिए। पृथ्वी पर परमेश्वर के कार्य को पूरी तरह से निष्पन्न करना और देह में परमेश्वर के कार्य में सहयोग करना—यही मनुष्य का कर्तव्य है। एक दिन, जब परमेश्वर का कार्य हो जाएगा, तो मनुष्य उसे स्वर्ग में परमपिता के पास शीघ्र वापसी पर विदाई देगा। क्या मनुष्य को यह दायित्व पूरा नहीं करना चाहिए?

"वचन देह में प्रकट होता है" से "कार्य और प्रवेश (6)" से

मनुष्य के लिए, परमेश्वर के सलीब पर चढ़ने ने परमेश्वर के देहधारण के कार्य को संपन्न किया, समस्त मानव जाति को छुटकारा दिलाया, और परमेश्वर को अधोलोक की चाबी ज़ब्त करने की अनुमति दी। हर कोई सोचता है कि परमेश्वर का कार्य पूरी तरह से निष्पादित हो चुका है। वास्तविकता में, परमेश्वर के लिए, उसके कार्य का केवल एक छोटा सा हिस्सा ही निष्पादित हुआ है। उसने मानव जाति को केवल छुटकारा दिलाया है; उसने मानवजाति को जीता नहीं है, मनुष्य में शैतान की कुटिलता को बदलने की बात को तो छोड़ो। यही कारण है कि परमेश्वर कहता है, "यद्यपि मेरी देहधारी देह मृत्यु की पीड़ा से गुज़री है, किन्तु वह मेरे देहधारण का पूर्ण लक्ष्य नहीं था। यीशु मेरा प्यारा पुत्र है और उसे मेरे लिए सलीब पर चढ़ाया गया था, किन्तु उसने मेरे कार्य का पूरी तरह से समापन नहीं किया। उसने केवल इसका एक अंश पूरा किया।" इस प्रकार परमेश्वर ने देहधारण के कार्य को जारी रखने के लिए योजनाओं के दूसरे चक्र की शुरुआत की। परमेश्वर का अंतिम अभिप्राय शैतान के हाथों से बचाए गए हर एक को पूर्ण बनाना और प्राप्त करना है, यही वजह है कि परमेश्वर ने देह में आने के लिए फिर से विपत्तियों का जोख़िम लेने की तैयारी की।

"वचन देह में प्रकट होता है" से "कार्य और प्रवेश (6)" से

कई जगहों पर, परमेश्वर ने सिनीम के देश में जीतने वालों के एक समूह को प्राप्त करने की भविष्यवाणी की है। दुनिया के पूर्व में जीतने वालों को प्राप्त किया जाता है, इसलिए परमेश्वर के दूसरे देहधारण के अवतरण का स्थान बिना किसी संदेह के, सिनीम का देश है, ठीक वहीं जहाँ बड़ा लाल अजगर कुण्डली मारे पड़ा है। वहाँ परमेश्वर बड़े लाल अजगर के वंशज को प्राप्त करेगा ताकि यह पूर्णतः पराजित और शर्मिंदा हो जाए। परमेश्वर इन गहन रूप से पीड़ित लोगों को जगाना चाहता है, उन्हें पूरी तरह से जगाना और उन्हें कोहरे से बाहर निकालना चाहता है और चाहता है कि वे उस बड़े लाल अजगर को ठुकरा दें। परमेश्वर उन्हें उनके सपने से जगाना, उन्हें बड़े लाल अजगर के सार से अवगत कराना, उनका संपूर्ण हृदय परमेश्वर को दिलवाना, अंधकार की ताक़तों के दमन से बाहर निकालना, दुनिया के पूर्व में खड़े होना, और परमेश्वर की जीत का सबूत बनाना चाहता है। केवल तभी परमेश्वर महिमा को प्राप्त करेगा। मात्र इसी कारण से, परमेश्वर उस कार्य को जो इस्राएल में समाप्त हुआ, उस देश में लाया जहाँ बड़ा लाल अजगर कुण्डली मारे पड़ा है और, प्रस्थान करने के करीब दो हजार वर्ष बाद, वह अनुग्रह के कार्य को जारी रखने के लिए पुनः देह में आ गया है। मनुष्य की खुली आँखों के लिए, परमेश्वर देह में नए कार्य का शुभारंभ कर रहा है। किन्तु परमेश्वर के लिए, केवल कुछ हजार वर्षों के अलगाव के साथ, और केवल कार्य स्थल और कार्य परियोजना में बदलाव के साथ, वह अनुग्रह के युग के कार्य को जारी रख रहा है। यद्यपि देह की छवि जो परमेश्वर ने आज के कार्य में ली है वह यीशु की अपेक्षा सर्वथा भिन्न व्यक्ति है, फिर भी वे एकही सार और मूल को साझा करते हैं, और ये एकही स्रोत से हैं। हो सकता है कि उनमें कई बाहरी अंतर हों, किन्तु उनके कार्य के आंतरिक सत्य पूरी तरह से समान हैं। लेकिन युगों में रात-दिन का अंतर है। परमेश्वर का कार्य अपरिवर्तित कैसे रह सकता है? या कार्य एक-दूसरे को कैसे बाधित कर सकते हैं?

"वचन देह में प्रकट होता है" से "कार्य और प्रवेश (6)" से

यीशु ने एक यहूदी का रूप-रंग धारण किया, यहूदियों की पोशाक के अनुरूप रहा, और यहूदी भोजन खाते हुए बड़ा हुआ। यह उसका सामान्य मानवीय पहलू है। किन्तु आज का देहधारी एशिया के लोगों का रूप धारण करता है और बड़े लाल अजगर के देश के भोजन पर बड़ा होता है। ये परमेश्वर के देहधारण के लक्ष्य के साथ टकराव नहीं करते हैं। बल्कि, परमेश्वर के देहधारण के वास्तविक महत्व को अधिक पूर्णता से पूरा करते हुए, वे एक दूसरे के अनुपूरक हैं। क्योंकि देहधारी को "मनुष्य का पुत्र" या "मसीह" के रूप में उल्लिखित किया जाता है, इसलिए आज के मसीहके बाह्य-स्वरूप की तुलना यीशु मसीह से नहीं की जा सकती। आख़िरकार, देह को "मनुष्य का पुत्र" कहा जाता है और यह देह की छवि में है। परमेश्वर के कार्य का हर चरण काफी गहरे अर्थ से युक्त है। पवित्र आत्मा द्वारा यीशु का गर्भ धारण करना इस कारण है क्योंकि उसे पापियों को छुटकारा दिलाना था। उसे बिना पाप वाला होना था। किन्तु केवल अंत में जब उसे पापी देह की समानता बनने के लिए बाध्य किया गया और उसने पापियों के पापों को धारण किया, तभी उसने उन्हें श्रापित सलीब से बचाया जिसे परमेश्वर ने लोगों को ताड़ित करने के लिए उपयोग किया था। (सलीब लोगों को श्राप देने और ताड़ित करने के लिए परमेश्वर का औजार है, श्राप देने और ताड़ित करने के उल्लेख विशेष रूप से पापियों को ताड़ना और दंड देने के बारे में है।) लक्ष्य था सभी पापियों से पश्चाताप करवाना और सलीब पर चढ़ने का उपयोग उनसे उनके पापों को स्वीकार करवाना। अर्थात्, समस्त मानव जाति को छुटकारा दिलाने के वास्ते, परमेश्वर ने स्वयं देहधारण किया जिसका गर्भधारण पवित्र आत्मा द्वारा किया गया था और जिसने समस्त मानव जाति के पापों को धारण कर लिया। इसके वर्णन करने का सामान्य तरीका, शैतान से उस समस्त निर्दोष मानवजाति को जिसे इसने कुचल दिया था परमेश्वर को वापस लौटाने की "विनती" करने के लिए, सभी पापियों के बदले एक पवित्र देह अर्पण करना है, यीशु के समकक्ष का शैतान के सामने रखी पाप बली होना है। इस तरह छुटकारे के कार्य के इस चरण को निष्पादित करने के लिए पवित्र आत्मा द्वारा गर्भ धारण की आवश्यकता थी। परमपिता परमेश्वर और शैतान के बीच लड़ाई के दौरान यह एक आवश्यक शर्त, एक "संधि" थी। यही कारण है कि यीशु को शैतान को दिया गया था, और केवल तभी कार्य के इस चरण का समापन हुआ। हालाँकि, आज परमेश्वर का छुटकारे का कार्य पहले से ही अभूतपूर्व शान का है, और शैतान के पास माँगों को करने का कोई कारण नहीं है, इसलिए परमेश्वर के देहधारण के लिए पवित्र आत्मा द्वारा गर्भधारण की आवश्यकता नहीं है, क्योंकि परमेश्वर अंतर्निहित रूप से पवित्र और निर्दोष है। इसलिए परमेश्वर का देहधारण अब की बार अनुग्रह के युग का यीशु नहीं है। किन्तु वह अभी भी परमपिता परमेश्वर की इच्छा के वास्ते है और परमपिता परमेश्वर की इच्छाओं को पूरा करने के वास्ते है। इसे एक अनुचित उक्ति कैसे माना जा सकता है? क्या परमेश्वर के देहधारण को एक नियम-समूह का पालन अवश्य करना चाहिए?

"वचन देह में प्रकट होता है" से "कार्य और प्रवेश (6)" से

बहुत से लोग, परमेश्वर के देहधारण की किसी भविष्यवाणी को पाना चाहते हुए, साक्ष्य के लिए बाइबल में देखते है। मनुष्य की खंडित सोच कैसे जान सकती है कि परमेश्वर ने बहुत पहले, बाइबिल में "कार्य करना" बंद कर दिया है और उस कार्य को करने के लिए इससे बाहर "छलाँग लगा दी" है जिसकी उसने लंबे समय से योजना बनाई थी किन्तु जिसके बारे में उसने कभी भी मनुष्य को नहीं बताया था? लोगों में समझ का अत्यंत अभाव है। परमेश्वर के स्वभाव का केवल एक अनुभव लेने के बाद ही, वे अकस्मात एक ऊँचे मंच पर जागते हैं, और परमेश्वर के कार्य का निरीक्षण करते हुए, एक उच्च-श्रेणी वाली "व्हीलचेयर" में बैठ जाते हैं, यहाँ तक चले जाते हैं कि आडंबरपूर्ण, असंगत बातें करते हुए परमेश्वर को सिखाना शुरू कर देते हैं। कई "वृद्ध व्यक्ति", पढ़ने का चश्मा लगाए हुए और अपनी दाढ़ी को सहलाते हुए, अपने पीले रंग का "पुराना पोथा" (बाइबल) खोलते हैं जिसे वे जिन्दगीभर पढ़ते आ रहे हैं। वचनों को बुदबुदाते हुए और आँखों में प्रतीत होती चमक के साथ, कभी वह प्रकाशितवाक्य की पुस्तक की ओर और कभी दानिय्येल की पुस्तक की ओर, तो कभी यशायाह की सार्वभौमिक रूप से ज्ञात पुस्तक की ओर मुड़ता है। छोटे-छोटे वचनों से घनीभूत पृष्ठ पर घूरते हुए, वह शांत-भाव से पढ़ता है, उसका मन निरंतर घूम रहा है। अचानक दाढ़ी को सहलाने वाला हाथ रुक जाता है और दाढ़ी को खींचना शुरू कर देता है। यदा कदा दाढ़ी को तोड़े जाने की आवाज किसी को सुनाई देती है। इस तरह का असामान्य व्यवहार देखने वाले को हक्का-बक्का कर देता है। "इतनी ताक़त लगाने की क्या ज़रूरत है? वह किस चीज के बारे में इतना पागल है हो रहा है?" वापस वृद्ध व्यक्ति की ओर, उसकी भौहें अब खड़ी हो गई हैं। जब वृद्ध व्यक्ति अपनी आँखों को फफूँदग्रस्त-दिखाई देने वाले पृष्ठों पर गड़ाए रखता है, तो सफेद भौंहें हंस के पंखों की तरह इस वृद्ध व्यक्ति की पलकों से ठीक दो सेंटीमीटर पर, मानो अकस्मात ही लेकिन फिर भी सटीक रूप से, गिरती हैं। वह क्रियाओं के उपर्युक्त अनुक्रम को कई बार दोहराता है, और फिर अचानक ही उछल पड़ता है और बड़बड़ाना शुरु कर देता है मानो किसी के साथ गपशप[4] कर रहा हो, यद्यपि उसकी आँखों की दृष्टि ने पोथी को नहीं छोड़ा है। अचानक वह वर्तमान पृष्ठ को ढक देता है और "दूसरी दुनिया" की ओर मुड़ जाता है। उसकी हरकतें इतनी जल्दबाज़ीभरी और भयभीत कर देने वाली हैं कि लोगों को लगभग अप्रत्याशित ढंग से चौंका देती हैं। वर्तमान में, जो चूहा अपने बिल से बाहर आ गया था और जिसने उसके मौन के दौरान अभी-अभी "बंधनमुक्त महसूस करना" शुरू किया था, वह उसकी अस्वाभाविक हरकतों से इतना शंकित हो गया कि, फौरन अपने बिल में वापस चला गया। अब वृद्ध व्यक्ति के गतिहीन बाएँ हाथ ने फिर से अपनी दाढ़ी को ऊपर-नीचे सहलाना शुरू कर दिया। वह पुस्तक को मेज पर छोड़कर, आसन से दूर जाता है। अधखुले दरवाजे और खुली हुई खिड़की से, हवा का झोंका लापरवाह ढंग से पुस्तक को बंद करते हुए, फिर खोलते हुए, फिर दोबारा बंद करते हुए और खोलते हुए अंदर आता है। इस दृश्य के बारे में एक अकथनीय निराशा है, और हवा से खड़खड़ाहट करते हुए पुस्तक के पन्नों की आवाज़ को छोड़कर, सब कुछ मौन हो गया प्रतीत होता है। अपनी पीठ के पीछे हाथों को बाँधे हुए, कमरे में चलता है, कभी रुकता है, फिर शुरू हो जाता है, यह दोहराता हुआ प्रतीत होते हुए समय-समय पर अपना सिर हिला रहा है, "हे! परमेश्वर! क्या तू वास्तव में ऐसा करेगा?" बीच-बीच मेंवह सहमति में सिर भी हिलाता है, "हे परमेश्वर! कौन तेरे कार्य की थाह पा सकता है? क्या तेरे पदचिह्नों को खोजना कठिन नहीं है? मुझे विश्वास है कि तू अनावश्यक काम नहीं करता है।" शर्मिंदगी और एक अत्यंत दुःखी अभिव्यक्ति दर्शाते हुए, वृद्ध व्यक्ति की भौंहें सिकुड़ती हैं, उसकी आँखें भिंच कर बंद हो जाती हैं, मानो कि वह धीरे-धीरे विवेचन करना चाहता हो। यह वास्तव में इस "भव्य वृद्ध व्यक्ति" को चुनौती दे रहा है। अपने जीवन के इस बाद के चरण में, उसके पास "दुर्भाग्यवश" यह मामला आ पड़ा है। इस के बारे में क्या किया जा सकता है? मैं भी उलझन में और कुछ पाने में सामर्थ्यहीन हूँ। किसने उसके पुराने पोथी को पीला कर दिया? किसने उसकी समस्त दाढ़ी और भौहें को उसके चेहरे पर अलग-अलग जगहों में सफेद बर्फ की तरह निर्दयी ढंग से विकसित कर दिया? जैसे उसकी दाढ़ी उसकी पृष्ठभूमि का प्रतिनिधित्व करती हो। फिर भी, कौन जानता था कि पुरानी पोथी में परमेश्वर की उपस्थिति की तलाश करते हुए, मनुष्य इस स्थिति तक मूर्खतापूर्ण हो सकता है? पुरानी पोथी में कागज के कितने पन्ने हो सकते हैं? क्या इसमें वास्तव में परमेश्वर के सभी कर्मों को अभिलिखित किया जा सकता है? इस बात की गारंटी देने का साहस कौन करता है? मनुष्य वास्तव में परमेश्वर के प्रकटन की तलाश करता है और वचनों का अत्यधिक पदभंजन करके[5] परमेश्वर की इच्छा को पूरा करने का प्रयास करता है। क्या इस तरह से जीवन प्रवेश करने का प्रयास करना उतना आसान है जितना यह प्रतीत होता है? क्या यह मूर्खतापूर्ण, ग़लत तर्क नहीं है? क्या तुम्हें यह हास्यास्पद नहीं लगता है?

"वचन देह में प्रकट होता है" से "कार्य और प्रवेश (6)" से

परमेश्वर आज मनुष्यों के विचारों और उनके आत्माओं को, और साथ ही उनके दिलों में हजारों सालों से रही परमेश्वर की छवि को, बदलने के उद्देश्य से उनके बीच आता है। इस अवसर के माध्यम से, वह मनुष्य को पूर्ण बनाएगा। अर्थात, वह मनुष्यों के ज्ञान के माध्यम से, वे जिस तरह से उसके बारे में जानकारी पाते हैं और उसके प्रति उनका जो दृष्टिकोण है, उन्हें बदल देगा, ताकि परमेश्वर के बारे में उनका ज्ञान एक नए सिरे से शुरू हो सके, और उनके दिल इसके माध्यम से नवीकृत और परिवर्तित हो सकें। निपटना और अनुशासन साधन हैं, जबकि विजय और नवीकरण लक्ष्य हैं। मनुष्य ने एक अस्पष्ट परमेश्वर के बारे में जिन अंधविश्वासी विचारों को पकड़ रखा है, उन्हें दूर करना हमेशा परमेश्वर का इरादा रहा है, और हाल ही में उसके लिए यह एक तात्कालिक आवश्यकता का मुद्दा बन गया है। मुझे आशा है कि सभी लोग इस पर आगे चिंतन करेंगे। प्रत्येक व्यक्ति कैसे अनुभव करता है इसे बदलो, ताकि परमेश्वर का यह अत्यावश्यक इरादा जल्द ही पूरा किया जा सके और पृथ्वी पर परमेश्वर के काम का अंतिम चरण एक फलदायी निष्कर्ष पर लाया जा सके। तुम सब की वफादारी को वैसे दिखाओ जैसे कि तुम लोगों को इसे दिखाना चाहिए, और एक अंतिम बार परमेश्वर के दिल को सकून दे दो। मुझे आशा है कि भाइयों और बहनों में से कोई भी इस जिम्मेदारी से जी नहीं चुराएगा या केवल दिखावे के लिए हाथ-पैर नहीं हिलाएगा।

"वचन देह में प्रकट होता है" से "कार्य और प्रवेश (7)" से

परमेश्वर ने इस बार निमंत्रण पर, और मनुष्य की स्थिति को देखते हुए, देह धारण किया है। अर्थात, वह मनुष्य को वह मुहैय्या करने आया है जिसकी उसे ज़रूरत है। वह हर व्यक्ति को, चाहे उसका सामर्थ्य या लालन-पालन कैसा भी हो, परमेश्वर के वचन को देखने के लिए, और उसके वचन से, परमेश्वर के अस्तित्व और उसकी अभिव्यक्ति को देखने के लिए और परमेश्वर द्वारा उन्हें परिपूर्ण बनाने को स्वीकार करने के लिए, सक्षम बनाता है। उसका वचन मनुष्य के विचारों और धारणाओं को बदल देगा जिससे कि परमेश्वर का सच्चा चेहरा मनुष्यों के दिल की गहराई में दृढ़ता से जड़ित हो सके। यह पृथ्वी पर परमेश्वर की एकमात्र इच्छा है। मनुष्य का स्वभाव चाहे कितना ही महान हो, मनुष्य का सार चाहे कितना भी ओछा हो, या मनुष्य ने अतीत में जैसा भी व्यवहार किया हो, परमेश्वर इन बातों पर कोई ध्यान नहीं देता। वह मनुष्यों के लिए केवल यह उम्मीद करता है कि वे अपने दिल में परमेश्वर की छवि का पूरी तरह से नवीकरण करें और मानव जाति के सार को जान सकें, जिससे मनुष्य के सैद्धांतिक दृष्टिकोण को बदला जा सके। वह आशा करता है कि मनुष्य परमेश्वर के लिए गहराई से ललक रख सके और उसके प्रति एक अनन्त अनुराग रख सके। परमेश्वर मनुष्य से बस इतना ही चाहता है।

"वचन देह में प्रकट होता है" से "कार्य और प्रवेश (7)" से

हजारों वर्षों की प्राचीन संस्कृति और इतिहास के ज्ञान ने मानव की सोच और अवधारणाओं तथा मानसिक दृष्टिकोण को अभेद्य और अध्वंस्य हो जाने की सीमा तक बंद कर दिया है। मनुष्य नरक के अट्ठारहवें स्तर में रहता है, मानो कि मनुष्यों को परमेश्वर द्वारा कालकोठरियों में निष्कासित कर दिया गया हो, जहाँ वे रोशनी को कभी न देख सकें। सामंतवादी सोच ने मनुष्यों का इस तरह दमन किया है कि वे मुश्किल से साँस ले पाते हैं और उनका दम घुट रहा है। उनमें विरोध करने की थोड़ी-सी भी ताकत नहीं है और वे बस चुपचाप सहते और सहते हैं ...। धर्म और न्याय के लिए लड़ने या खड़े होने का किसी ने भी साहस नहीं किया है; सालों-साल, दिन-ब-दिन सामंती मालिकों के उत्पीड़न और हमलों तले, वे बस एक जीवन जीते हैं जो एक जानवर के जीवन से बेहतर नहीं होता। मनुष्य ने कभी धरती पर खुशी पाने के लिए परमेश्वर की तलाश नहीं की है। ऐसा लगता है कि मनुष्य को पीट कर गिरा दिया गया है, शरद ऋतु में गिरने वाले सूखे और भूरे पत्तों की तरह। मनुष्यों ने बहुत पहले ही अपनी याददाश्त खो दी है और मानव जाति नामक नरक में वे असहाय रहते हैं, आखिरी दिन के इंतजार में ताकि वे नरक के साथ ही मर-मिट जाएँ, मानो कि वह आखिरी दिन जिस की वे चाह रखते हैं वो दिन हो जब वे आरामदायक शान्ति का आनंद लेंगे। सामंती नैतिकता ने मनुष्य का जीवन "अधोलोक" में पहुंचा दिया है, जिससे व्यक्ति की विरोध करने की क्षमता और भी कम हो गई है। विभिन्न प्रकार के उत्पीड़न के तले मनुष्य धीरे-धीरे अधोलोक में और गहरा गिर गया तथा परमेश्वर से और दूर हो गया। अब, परमेश्वर मनुष्य के लिए एक पूर्ण अजनबी रह गया है, और जब वे मिलते हैं तो मनुष्य अब भी कतरा कर उससे बच निकलने की जल्दी करते हैं। मनुष्य उसे स्वीकार नहीं करता है और उसे इस तरह अलग कर देता है जैसे कि उसे पहले कभी जाना या देखा ही न हो। …चीन संस्कृति के ज्ञान ने चुपचाप मनुष्य को परमेश्वर की उपस्थिति से चुरा लिया है और मनुष्य को दुष्टों के राजा और उसके पुत्रों को सौंप दिया है। चार पुस्तकों और पाँच क्लासिक्स ने मनुष्य की सोच और अवधारणाओं को विद्रोह के एक और युग में पहुँचा दिया है, जिससे मनुष्य उनकी और भी आराधना करता है जिन्होंने उन पुस्तकों और क्लासिक्स को लिखा था, परमेश्वर के बारे में उनकी धारणा को बढ़ाते हुए। दुष्टों के राजा ने निर्दयतापूर्वक मानव जाति के दिल से, उनकी जागरूकता के बिना, परमेश्वर को बाहर निकाल दिया, जबकि उसने मनुष्य के दिल को हर्षपूर्वक हथिया लिया। तब से मनुष्य, दुष्टों के राजा का चेहरा धारण करने वाले एक बदसूरत और दुष्ट आत्मा के अधीन हो गया था। परमेश्वर के प्रति एक घृणा उनके सीनों में भर गई, और दुष्टों के राजा की दुर्भावना दिन-ब-दिन आदमी के भीतर फैलती गई, जब तक कि मनुष्य पूरी तरह से बर्बाद नहीं हो गया। मनुष्य को अब स्वतंत्रता नहीं थी, और वह दुष्टों के राजा के चंगुल से मुक्त होने में असमर्थ था। इसलिए, मनुष्य केवल उसी जगह ठहर कर ज़ब्त हो सकता था, आत्मसमर्पण करते हुए और उसके अधीन होते हुए। इसने बहुत पहले मनुष्य के युवा दिल के भीतर नास्तिकता के फोड़े का बीज बोया था, उसे इस तरह की भ्रांतियाँ सिखाते हुए जैसे कि "विज्ञान और प्रौद्योगिकी के बारे में सीखो, चार आधुनिकीकरणों को समझो, दुनिया में कोई परमेश्वर नहीं है।" न केवल यह, इसने बार-बार घोषित किया, "आओ, हम अपने मेहनती श्रमिकों के माध्यम से एक खूबसूरत मातृभूमि का निर्माण करें", सभी को अपने देश की सेवा करने के लिए बचपन से तैयार होने के लिए कहते हुए। मनुष्य को अनजाने में इसके सामने लाया गया था, और इसने बेझिझक सारा श्रेय ले लिया (परमेश्वर द्वारा सभी मनुष्यों को अपने हाथों में रखने का उल्लेख करते हुए)। कभी एक बार भी इसने शर्म महसूस नहीं की, न ही शर्मिंदगी की कोई भावना रखी। इसके अलावा, इसने निर्लज्जतापूर्वक परमेश्वर के लोगों को लाकर अपने घर में बंदी बना लिया, जबकि यह मेज पर एक चूहे की तरह उछलता रहा और मनुष्यों से परमेश्वर के रूप में इसकी आराधना करवाई। एक ऐसा आततायी है यह! ऐसे चौंकाने वाले लांछनों को यह चीख-चीखकर कहता है, "दुनिया में कोई परमेश्वर नहीं है। हवा प्राकृतिक नियमों के कारण बहती है; बारिश वो नमी है जो द्रवीभूत होकर पृथ्वी पर बूंदों में गिर जाती है; भूविज्ञान सम्बन्धी परिवर्तनों के कारण पृथ्वी की सतह का हिलना ही भूकंप है; सूरज की सतह पर नाभिक खलल के कारण हवा का शुष्क हो जाना ही सूखा पड़ने की वजह है। ये प्राकृतिक घटनाएँ हैं। कौन-सा हिस्सा परमेश्वर का कार्य है?" यहाँ तक कि चिल्लाते[अ] हुए यह ऐसी बेशर्म बातें भी करता है: "मनुष्य प्राचीन वानरों से विकसित हुआ है, और लगभग एक अरब साल पहले के एक आदिम समाज से प्रगति करते हुए आज की दुनिया विकसित हुई है। किसी देश के बढ़ने या गिरने का फैसला उसके लोगों के हाथों द्वारा किया जाता है।" पीछे, मनुष्यों से इसे दीवारों पर उल्टा लटकाने के लिए कहा जाता है और इसे मेज पर संजोकर रख दिया जाता है और इसकी आराधना की जाती है। जब यह चीखता है कि "कोई परमेश्वर नहीं है," तो वह खुद को परमेश्वर के रूप में मानता है, परमेश्वर को धरती की सीमाओं से लगातार बाहर धकेलते हुए। यह परमेश्वर की जगह में खड़ा होता है और दुष्टों के राजा के रूप में कार्य करता है। यह तो निपट हास्यास्पद है! इसकी वज़ह से कोई व्यक्ति जहरीली नफरत से भर सकता है। ऐसा लगता है कि परमेश्वर इसका कट्टर दुश्मन है, और परमेश्वर इसके साथ असंगत है। यह परमेश्वर को दूर भगाने के षड्यंत्र बनाता है जबकि यह अदंडित और स्वतंत्र रहता है।[1] ऐसा है यह दुष्टों का राजा! हम इसके अस्तित्व को कैसे सह सकते हैं? जब तक यह परमेश्वर के काम को छेड़कर उसे फटेहाल, उलट-पुलट[2] नहीं कर लेता है, तब तक यह चैन से नहीं रहेगा, मानो कि यह अंत तक परमेश्वर का विरोध करना चाहता हो, जब तक कि या तो मछली मर जाए या जाल ही फट जाए। यह जानबूझकर परमेश्वर का विरोध करता है और लगातार करीब आता जाता है। इसके घिनौने चेहरे को बहुत पहले से पूरी तरह से बेनक़ाब किया गया है और अब वह आहत और पिटा हुआ है[3], एक भयानक दुर्दशा में, फिर भी यह परमेश्वर से नफरत करने में नरम नहीं पड़ता है, मानो कि वह यह चाहता हो कि अपने दिल में रही घृणा से मुक्ति पाने के लिए, वह परमेश्वर को पूरी तरह से एक ही कौर में पूरा निगल जाए। हम इसे कैसे बर्दाश्त कर सकते हैं, परमेश्वर के इस घृणित शत्रु को! केवल इसका उन्मूलन और पूर्ण विनाश हमारे जीवन की इच्छा को पूरा कर सकता है। इसे यूँ ही उच्छृंखल रूप से बढ़ते रहने की अनुमति कैसे दी जा सकती है? यह मनुष्य को इस सीमा तक भ्रष्ट कर चुका है कि मनुष्य स्वर्ग के सूर्य को नहीं जानता, और वह अचेत और कुंठित हो जाता है। मनुष्य ने सामान्य मानवीय विवेक को खो दिया है। इसे नष्ट और भस्म करने के लिए क्यों न हम अपनी पूरी हस्ती का बलिदान कर दें ताकि बचे हुए खतरे को हम दूर कर सकें और परमेश्वर का कार्य अभूतपूर्व भव्यता तक शीघ्रतर पहुँच सके? दुष्टों का यह गिरोह मनुष्यों के बीच आ गया है और इसने बहुत खलबली और अशांति फैलाई है। ये सभी मनुष्यों को एक खड़ी चट्टान के कगार पर ले आये हैं, उन्हें धकेल कर टुकड़ों में धराशायी करने के बाद, उनके शवों को खा जाने की गुप्त योजना बना कर। वे परमेश्वर की योजना को बाधित कर पाने की और परमेश्वर के साथ एक लम्बा जुआ[4] खेलकर प्रतिस्पर्धा करने की निरर्थक आशा करते हैं। यह किसी तरह से आसान नहीं है! क्रूस को आखिरकार दुष्टों के राजा के लिए ही तैयार किया गया है जो सबसे घृणित अपराधों का दोषी है। परमेश्वर का उस क्रूस से सरोकार नहीं है और वह पहले से ही शैतान के लिए उसे छोड़ चुका है। परमेश्वर काफी पहले ही विजयी हो चुका है और अब मानव जाति के पापों पर दुख महसूस नहीं करता है। वह सभी मानव जाति के लिए उद्धार लाएगा।

"वचन देह में प्रकट होता है" से "कार्य और प्रवेश (7)" से

ऊपर से नीचे तक और शुरुआत से अंत तक, यह परमेश्वर के कार्य को बाधित कर रहा है और उसके साथ विवाद में बर्ताव कर रहा है। प्राचीन सांस्कृतिक विरासत की सभी बातें, प्राचीन संस्कृति का मूल्यवान ज्ञान, ताओवाद और कन्फ्यूशीवाद की शिक्षाएँ, और कन्फ्यूशियस के क्लासिक्स और सामंती संस्कारों ने मनुष्य को नरक में पहुँचा दिया है। उन्नत आधुनिक विज्ञान और प्रौद्योगिकी, साथ ही विकसित उद्योग, कृषि और व्यवसाय कहीं भी नज़र नहीं आते हैं। इसके बजाय, परमेश्वर के कार्य को जानबूझकर बाधित, प्रतिरोधित और नष्ट करने के लिए यह प्राचीन "वानरों" द्वारा प्रचारित केवल सामंती रिवाजों पर जोर देता है। आज तक इसने मनुष्य को केवल पीड़ित ही नहीं किया है, बल्कि यह मनुष्य को पूरी तरह से खा जाना[5] चाहता है। सामंती नीति-संहिता की शिक्षा और प्राचीन संस्कृति के ज्ञान की विरासत ने लंबे समय से मनुष्य को संक्रमित किया गया है और मनुष्यों को बड़े और छोटे दुष्टों में बदल दिया है। कुछ ही ऐसे हैं जो आसानी से परमेश्वर को स्वीकार करते हैं और परमेश्वर के आगमन का उत्साहपूर्वक स्वागत करते हैं। मनुष्य का चेहरा हत्या से भर गया है, और सभी जगहों पर, मृत्यु हवा में है। वे इस भूमि से परमेश्वर को निष्कासित करने की कोशिश करते हैं; हाथों में चाकू और तलवारें के साथ, वे परमेश्वर का विनाश करने के लिए खुद को युद्ध के गठन में व्यवस्थित करते हैं। दुर्जनों की भूमि में जहाँ मनुष्य को लगातार सिखाया जाता है कि कहीं कोई परमेश्वर नहीं है, मूर्तियां फैली हुई हैं। इस जमीन के ऊपर जलते हुए कागज और धूप की एक घृणास्पद गंध फैली हुई है, इतनी घनी कि दम घुटता है। ऐसा लगता है मानो सर्प के मुड़ते और कुंडली मारते समय कीचड़ से ऊपर उठती हुई बदबू हो, और यह मनुष्य से बरबस कै कराने के लिए पर्याप्त है। इसके अलावा, दुष्ट राक्षसों द्वारा ग्रंथों से किये गए मंत्रोच्चार की हलकी आवाज़ को सुना जा सकता है। यह आवाज़ दूर नरक से आती हुई प्रतीत होती है, और मनुष्य अपनी रीढ़ की हड्डी से होकर नीचे जाती एक थरथराहट को महसूस किये बिना नहीं रह सकता है। इस देश भर में इंद्रधनुष के सभी रंगों वाली मूर्तियाँ बिखरी पड़ी हैं, जिसने इस देश को एक चमचमाती दुनिया में बदल दिया है, और दुष्टों का राजा अपने चेहरे पर एक मूर्खतापूर्ण हँसी लिए हुए है, मानो कि उसकी शैतानी योजना सफल हो गई हो। इस बीच, मनुष्य पूरी तरह से इसके बारे में बेखबर है, और न ही मनुष्य को यह पता है कि इस दुष्ट ने पहले से ही उसे इस हद तक भ्रष्ट कर दिया है कि वह मूढ़ और पराजित हो गया है। यह परमेश्वर का सब कुछ एक झटके में मिटा देना, फिर से उसका अपमान करना और उसे मार डालना चाहता है, और उसके कार्य को ढहाने और उलट-पुलट करने का प्रयास करता है। वह कैसे परमेश्वर को समान दर्जे का मान सकता है? कैसे वह पृथ्वी पर मनुष्यों के बीच अपने काम में परमेश्वर के "हस्तक्षेप" को बर्दाश्त कर सकता है? कैसे उसके घिनौने चेहरे को उजागर करने के लिए वह परमेश्वर को अनुमति दे सकता है? वह कैसे परमेश्वर को अपने काम को बाधित करने की अनुमति दे सकता है? क्रोध के साथ भभक रहा यह दुष्ट कैसे पृथ्वी पर अपनी शक्ति के दरबार में परमेश्वर को शासन करने की इजाजत दे सकता है? यह कैसे स्वेच्छा से हार स्वीकार कर सकता है? इसके कुत्सित चेहरे की असलियत को उजागर किया जा चुका है, इसलिए किसी को यह पता नहीं है कि वह हँसे या रोये, और इसकी तो बात करना ही वास्तव में मुश्किल है। क्या यही इसका सार नहीं है? एक बदसूरत आत्मा लिए वह अभी भी यही मानता है कि वह अविश्वसनीय रूप से सुंदर है। सह-अपराधियों का यह गिरोह! वे नश्वर भोग के सुख में लिप्त होने और विकार को फ़ैलाने के लिए मनुष्यों के बीच आते हैं। उनका उपद्रव दुनिया में अस्थिरता[6] का कारण बनता है और मनुष्य के दिल में आतंक ले आता है, और उन्होंने मनुष्य को विकृत कर दिया है ताकि मनुष्य असहनीय कुरूपता वाले जानवरों के समान दिखे, मूल पवित्र व्यक्ति की थोड़ी-सी भी पहचान रखे बिना। यहाँ तक कि वे धरती पर अत्याचारियों की तरह ताकत ग्रहण करना चाहते हैं। वे परमेश्वर के कार्य में बाधा डालते हैं ताकि यह मुश्किल से आगे बढ़ सके और मानव को जैसे तांबे और इस्पात की दीवारों के पीछे बंद कर दिया जा सके। इतने सारे पाप करने और इतनी परेशानी का कारण बनने के बाद वे ताड़ना की प्रतीक्षा करने के अलावा कैसे अन्य किसी भी बात की उम्मीद कर सकते हैं? राक्षसों और बुरी आत्माओं ने सिर पर खून सवार कर धरती पर आतंक फैला रखा है और परमेश्वर की इच्छा और श्रमसाध्य प्रयास को रोक दिया है, जिससे वे अभेद्य बन गए हैं। कैसा नश्वर पाप है! परमेश्वर कैसे चिंतित महसूस न करता? परमेश्वर कैसे क्रोधित महसूस नहीं करता? वे परमेश्वर के कार्य के लिए गंभीर बाधा और विरोध का कारण बनते हैं। अत्यधिक विद्रोही! यहाँ तक कि अधिक शक्तिशाली दुष्ट की ताकत पर छोटे-बड़े राक्षस भी अभिमानी हो जाते हैं और मुश्किलें पैदा करते हैं। वे स्पष्ट जानकारी के बावजूद जानबूझकर सच्चाई का विरोध करते हैं। विद्रोह के बेटे! ऐसा लगता है कि अब, जब नरक का राजा राजसी सिंहासन पर चढ़ गया है, तो वे दम्भी हो गए हैं और दूसरों के प्रति घृणा करते हैं। कितने सच्चाई की खोज करते हैं और धर्मिकता का पालन करते हैं? वे सभी सूअरों और कुत्तों की तरह जानवर हैं, गोबर के एक ढेर में अपने सिरों को हिलाते हैं और उपद्रव भड़काने [7] के लिए बदबूदार मक्खियों के गिरोह का नेतृत्व करते हैं। उनका मानना है कि नरक का उनका राजा राजाओं में सर्वश्रेष्ठ है, इस बात को समझे बिना कि वे सड़न पर भिनभिनाती मक्खियों से ज्यादा कुछ नहीं हैं। इतना ही नहीं, वे सूअरों और कुत्तों जैसे अपने माता-पिता पर निर्भर करते हुए परमेश्वर के अस्तित्व के विरुद्ध निंदनीय टिप्पणी करते हैं। अति तुच्छ मक्खियों को लगता है कि उनके माता-पिता एक दांतों वाली व्हेल[8] की तरह विशाल हैं। क्या उन्हें एहसास नहीं है कि वे बहुत नन्हीं हैं, फिर भी उनके माता-पिता उनकी तुलना में अरबों गुना बड़े गंदे सूअर और कुत्ते हैं? अपनी नीचता से अनजान होकर, वे उन सूअरों और कुत्तों की दुर्गन्ध के सहारे उच्छृंखल व्यवहार करती हैं और भविष्य की पीढ़ियों को पैदा करने का भ्रामक विचार रखती हैं। वह तो बिल्कुल बेशर्म है! अपनी पीठों पर हरी पंखों के साथ (यह परमेश्वर पर उनके विश्वास करने के दावे को संदर्भित करता है), वे घमंडी हो जाती हैं और हर जगह पर अपनी सुंदरता और आकर्षण का अभिमान करती हैं, मनुष्य पर अपनी अशुद्धताओं को चुपके से डालती हैं। और वे दम्भी भी हैं, मानो कि इंद्रधनुष के रंगों वाले पंखों का एक जोड़ा उनकी अपनी अशुद्धताओं को छिपा सकता है, और इस तरह वे सच्चे परमेश्वर के अस्तित्व को सताती हैं (यह धार्मिक दुनिया की अंदर की कहानी को संदर्भित करता है)। मनुष्य को बहुत कम पता है कि हालांकि मक्खी के पंख खूबसूरत और आकर्षक हैं, यह अंततः केवल एक छोटी मक्खी से बढ़कर कुछ नहीं है जो गंदगी से भरी हुई और रोगाणुओं से ढकी हुई है। अपने माता-पिता के सूअरों और कुत्तों की ताकत पर, वे देश भर में अत्यधिक उग्रता के साथ आतंक मचाती हैं (यह उन धार्मिक अधिकारियों को संदर्भित करता है, जो सच्चे परमेश्वर और सत्य को धोखा देते हुए, देश से मिले मजबूत समर्थन के आधार पर, परमेश्वर को सताते हैं)। ऐसा लगता है कि यहूदी फरीसियों के भूत परमेश्वर के साथ बड़े लाल अजगर के देश में, अपने पुराने घोंसले में, वापस आ गए हैं। उन्होंने अपने हजारों वर्षों के कार्य को जारी रखते हुए फिर से उनके उत्पीड़न का कार्य शुरू कर दिया है, भ्रष्ट हो चुके इस समूह का अंततः पृथ्वी पर नष्ट हो जाना निश्चित है! ऐसा प्रतीत होता है कि कई सहस्राब्दियों के बाद, अशुद्ध आत्माएँ और भी चालाक और धूर्त हो गई हैं। वे परमेश्वर के काम को चुपके से क्षीण करने के तरीकों के बारे में लगातार सोचती हैं। वे बहुत कुटिल और धूर्त हैं और अपने देश में कई हजार साल पहले की त्रासदी की पुनरावृत्ति करना चाहती हैं। यह बात परमेश्वर को जोर से चीखने की ओर लगभग उकसाती है, और उनको नष्ट करने के लिए वह तीसरे स्वर्ग में लौट जाने से खुद को मुश्किल से रोक पाता है। परमेश्वर से प्रेम करने के लिए, मनुष्य को उसकी इच्छा, उसकी खुशी और उसके दुःख को समझना चाहिए, साथ ही साथ यह भी कि वह किससे घृणा करता है । इससे मनुष्य का प्रवेश बेहतर अग्रसर होगा। मनुष्य का प्रवेश जितना तेज होगा, परमेश्वर का हृदय उतना ही अधिक संतुष्ट होगा; दुष्टों के राजा के बारे में मनुष्य को जितनी अधिक सूझ-बूझ होगी, परमेश्वर से वह उतना ज्यादा करीब होगा, ताकि उसकी इच्छा पूर्ण हो सके।

"वचन देह में प्रकट होता है" से "कार्य और प्रवेश (7)" से

मैंने कई बार कहा है कि परमेश्वर के अंतिम दिनों के कार्य का उद्देश्य है प्रत्येक व्यक्ति की आत्मा को बदलना, प्रत्येक व्यक्ति की रूह को बदलना, ताकि उनके दिल में, जिसने अत्यंत आघात को सहा है, सुधार लाया जा सके, जिससे उनकी उस आत्मा को बचाया जा सके जिसे गंभीर रूप से बुराई द्वारा हानि पहुंचाई गई है; इसका उद्देश्य लोगों की आत्माओं को जगाना है, उनके बर्फ़ जैसे जमे हुए दिलों को पिघलाना है, और उनका जीर्णोद्धार करना है। यही है परमेश्वर की महानतम इच्छा। मनुष्य का जीवन और उसके अनुभव कितने ऊँचे या गहरे हैं, उनकी बातें करना बंद करो; जब लोगों के दिलों को जागृत किया जाता है, जब उन्हें अपने सपनों से जगा दिया जाता है और बड़े लाल अजगर द्वारा पहुँचाई गई हानि के बारे में वह पूरी तरह अवगत हो जाते हैं, तो परमेश्वर की सेवा का काम पूरा हो जाएगा। जिस दिन परमेश्वर का कार्य पूरा हो जाता है, यही वह दिन होता है जब मनुष्य भी परमेश्वर में सही विश्वास की राह पर आधिकारिक तौर पर चलना शुरू करता है। इस समय, परमेश्वर की सेवा समाप्त हो जाएगी: परमेश्वर का देहधारी कार्य पूरी तरह पूर्ण हो चुका होगा, और मनुष्य आधिकारिक तौर पर उस कर्तव्य को पूरा करना शुरू कर देगा जो उसे करना चाहिए—वह अपनी सेवकाई का कार्य करेगा। ये परमेश्वर के कार्य के कदम हैं। इस प्रकार, इन बातों को जानने की नींव पर तुम लोगों को प्रवेश की अपनी राह की तलाश करनी चाहिए। यह सब कुछ तुम लोगों को समझना चाहिए।

"वचन देह में प्रकट होता है" से "कार्य और प्रवेश (8)" से

मनुष्य की प्रविष्टि में तब ही सुधार आएगा जब परिवर्तन उसके दिल की गहराई में होगा, क्योंकि परमेश्वर का कार्य मनुष्य का—वह मनुष्य जिसे छुड़ा लिया गया है, जो अभी भी अंधेरे की शक्तियों के बीच रहता है, और जिसने कभी भी स्वयं को जगाया नहीं है—राक्षसों के एकत्रित होने के इस स्थान से पूर्ण उद्धार है; यह हो सकता है कि मनुष्य सदियों के पापों से मुक्त हो जाए, और परमेश्वर का चहेता बन जाए, और बड़े लाल अजगर को पूरी तरह से मार डाले, परमेश्वर के राज्य को स्थापित करे, और परमेश्वर के दिल को जल्द आराम पहुँचाए, यह बिना किसी रोकटोक के उस घृणा को अपने सीने से निकाल देना है, उन फफुंद से ढके रोगाणुओं को हटा देना है, तुम लोगों के लिए इस जीवन को छोड़ पाना संभव करना है जो एक बैल या घोड़े के जीवन से कुछ अलग नहीं, एक दास बनकर रहना छोड़ देना है, बड़े लाल अजगर से स्वतंत्रता से कुचले जाने या उसकी आज्ञा मानने को त्याग देना है; अब तुम लोग इस असफल राष्ट्र का हिस्सा नहीं रहोगे, अब घृणित बड़े लाल अजगर से नहीं जुड़े रहोगे, अब तुम लोग उसके दास नहीं रहोगे। राक्षसों का घोंसला निश्चित रूप से परमेश्वर द्वारा टुकड़े-टुकड़े कर दिया जाएगा, और तुम लोग परमेश्वर के साथ खड़े रहोगे—तुम लोग परमेश्वर के होगे, और दासों के इस साम्राज्य के नहीं रहोगे। परमेश्वर इस अंधियारे समाज से लंबे समय से घृणा करता आया है। इस दुष्ट, घिनौने बूढ़े सर्प पर अपने पैरों को रखने के लिए वह अपने दांतों को पीसता है, ताकि वह फिर से कभी न उठ पाए, और फिर कभी मनुष्य का दुरुपयोग न कर पाए; वह उसके अतीत के कर्मों को क्षमा नहीं करेगा, वह मनुष्य को दिए गए धोखे को बर्दाश्त नहीं करेगा, वह प्रत्येक युग में उसके सभी पापों के लिए उसका हिसाब करेगा; सभी बुराईयों के इस सरगना के प्रति परमेश्वर थोड़ी भी उदारता नहीं दिखाएगा,[1] वह पूरी तरह से इसे नष्ट कर देगा।

"वचन देह में प्रकट होता है" से "कार्य और प्रवेश (8)" से

हज़ारों सालों से यह गंदगी की भूमि रही है, यह असहनीय रूप से मैली है, कष्ट से भरी हुई है, प्रेत यहाँ हर कोने में घूमते हैं, चाले चलते हुए और धोखा देते हुए, निराधार आरोप लगाते हुए,[2] क्रूर और भयावह बनते हुए, इस भूतिया शहर को कुचलते हुए और मृत शरीरों से भरते हुए; क्षय की बदबू ज़मीन को ढक चुकी है और हवा में शामिल हो गई है, और इसे भारी रूप से संरक्षित रखा जाता है।[3] आसमान से परे की दुनिया को कौन देख सकता है? सभी मनुष्यों के शरीर को शैतान कसकर बांध देता है, उसकी दोनों आँखें निकाल देता है, और उसके होंठों को मज़बूती से बंद कर देता है। शैतानों के राजा ने हज़ारों वर्षों तक तबाही मचाई है, और आज भी वह तबाही मचा रहा है और इस भूतिया शहर पर करीब से नज़र रखे हुए है, मानो यह राक्षसों का एक अभेद्य महल हो; नज़र रखने वाले प्रहरी इस दौरान चमकती हुई आँखों से घूरते हैं, इस बात से अत्यंत भयभीत कि परमेश्वर उन्हें अचानक पकड़ लेगा और उन सभी को मिटा कर रख देगा, और उन्हें शांति और ख़ुशी के स्थान से वंचित कर देगा। ऐसे भूतिया शहर के लोग कैसे कभी परमेश्वर को देख सकते हैं? क्या उन्होंने कभी परमेश्वर की प्रियता और सुंदरता का आनंद लिया है? मानवीय दुनिया के मामलों की क्या कद्र है उन्हें? उनमें से कौन परमेश्वर की उत्सुक इच्छा को समझ सकता है? यह कोई आश्चर्य की बात नहीं कि देहधारी परमेश्वर पूरी तरह से छिपा हुआ है: इस तरह के अंधियारे समाज में, जहां राक्षस बेरहम और अमानवीय हैं, शैतानों का राजा, जो पलक झपकते ही लोगों को मार डालता है, वो ऐसे परमेश्वर के अस्तित्व को कैसे सहन कर सकता है जो प्यारा, दयालु और पवित्र भी है? वह परमेशवर के आगमन की वाहवाही और जयकार कैसे कर सकता है? ये दास! ये दयालुता का बदला घृणा से चुकाते हैं, उन्होंने लंबे समय से परमेश्वर की निंदा की है, वे परमेश्वर को अपशब्द बोलते हैं, वे चरमसीमा तक क्रूर हैं, उनमें परमेश्वर के प्रति थोड़ा-सा भी सम्मान नहीं है, वे लूटते हैं और डाका डालते हैं, वे सभी विवेक खो चुके हैं, और उनमें दयालुता का कोई निशान नहीं बचा, और वे निर्दोषों को अचेतावस्था की ओर मुग्ध करते हैं। प्राचीनों के पूर्वज? प्रिय नेता? वे सभी परमेश्वर का विरोध करते हैं! उनके हस्तक्षेप ने स्वर्ग के नीचे के सभी लोगों को अंधेरे और अराजकता की स्थिति में छोड़ दिया है! धार्मिक स्वतंत्रता? नागरिकों के वैध अधिकार और हित? ये सब पाप को छिपाने के तरीके हैं! किसने परमेश्वर के कार्य को स्वीकार कर लिया है? किसने परमेश्वर के कार्य के लिए अपना जीवन अर्पित किया है या रक्त बहाया है? पीढ़ी दर पीढ़ी, माता-पिता से लेकर बच्चों तक, दास मनुष्य ने परमेश्वर को अनुचित तरीके से गुलाम बना लिया है—ऐसा कैसे हो सकता है कि यह रोष उत्तेजित नहीं करता है? दिल में हज़ारों वर्ष की घृणा भरी हुई है, पापीपन की सहस्राब्दियाँ दिल पर अंकित हैं—यह कैसे घृणा को प्रेरित नहीं करेगा? परमेश्वर का बदला लो, अपने शत्रु को पूरी तरह समाप्त कर दो, उसे अब अनियंत्रित ढंग से फैलने की अनुमति न दो, और उसे अपनी इच्छानुसार परेशानी पैदा मत करने दो! यही समय है: मनुष्य अपनी सभी शक्तियों को लंबे समय से इकट्ठा करता आ रहा है, उसने इसके लिए अपने सभी प्रयासों को समर्पित किया है, हर कीमत चुकाई है, ताकि वह इस दानव के घृणित चेहरे को तोड़ सके और जो लोग अंधे हो गए हैं, जिन्होंने हर प्रकार की पीड़ा और कठिनाई सही है, उन्हें अनुमति दे कि वे अपने दर्द से उठें और इस दुष्ट प्राचीन शैतान को अपनी पीठ दिखाएं। परमेश्वर के कार्य के सामने ऐसी अभेद्य बाधा क्यों डालना? परमेश्वर के लोगों को धोखा देने के लिए विभिन्न चालों को क्यों आज़माना? वास्तविक स्वतंत्रता और वैध अधिकार और हित कहां हैं? निष्पक्षता कहां है? आराम कहाँ है? स्नेह कहाँ है? धोखेबाज़ योजनाओं का उपयोग करके परमेश्वर के लोगों को क्यों छलना? परमेश्वर के आगमन को दबाने के लिए बल का उपयोग क्यों? क्यों नहीं परमेश्वर को उस धरती पर स्वतंत्रता से घूमने दिया जाए जिसे उसने बनाया? क्यों परमेश्वर को तब तक परेशान किया जाए जब तक उसके पास आराम से सिर रखने के लिए जगह न रहे? मनुष्यों के बीच का स्नेह कहाँ है? लोगों के बीच स्वागत की भावना कहां है? परमेश्वर में इस तरह की हताश तड़प क्यों पैदा करना? परमेवर को क्यों बार-बार पुकारने पर मजबूर करना? परमेश्वर को अपने प्रिय पुत्र के लिए चिंता करने के लिए क्यों मजबूर करना? यह अंधकारमय समाज और उसके शत्रुओं के संरक्षक कुत्ते क्यों परमेश्वर को स्वतंत्रता से इस दुनिया में आने और जाने से रोकते हैं जिसे उसने बनाया? मनुष्य क्यों नहीं समझता, वह मनुष्य जो दर्द और पीड़ा के बीच रहता है? तुम लोगों के लिए, परमेश्वर ने अत्यंत यातना सही है, और अपने प्यारे पुत्र, उसके अपने देह और रक्त को अत्यंत दर्द के साथ तुम लोगों को सौंपा है—तो फिर क्यों तुम लोग अभी भी अपनी आँखें फेर लेते हो? हर किसी के सामने, तुम लोग परमेश्वर के आगमन को अस्वीकार करते हो, और परमेश्वर की दोस्ती को मना करते हो। तुम लोग इतने अभद्र क्यों हो? क्या तुम लोग ऐसे अंधियारे समाज में अन्याय को सहन करने के लिए तैयार हो? शत्रुता की सहस्राब्दियों के साथ स्वयं को भरने के बजाय, तुम लोग क्यों शैतानों के राजा के "बकवास" के साथ स्वयं को छलते हो?

"वचन देह में प्रकट होता है" से "कार्य और प्रवेश (8)" से

पृथ्वी पर परमेश्वर के कार्यों के कदमों में बड़ी कठिनाई शामिल है: मनुष्य की कमज़ोरी, कमियाँ, बचपना, अज्ञानता और मनुष्य का सब कुछ—प्रत्येक पर परमेश्वर सावधानीपूर्वक योजनाबद्ध और ध्यानपूर्वक विचार करता है। मनुष्य एक कागज़ी बाघ की तरह है जिसे कोई पकड़ने या भड़काने की हिम्मत नहीं करता; हल्के-से स्पर्श से वह काट लेता है, या फिर नीचे गिर जाता है और अपना रास्ता खो देता है, और ऐसा लगता है कि एकाग्रता की थोड़ी-सी कमी पर वह पुनः वापस चला जाता है, या फिर परमेश्वर की उपेक्षा करता है, या फिर अपने शरीर की अशुद्ध चीज़ों का आनंद उठाने के लिए अपने सुअर पिता और कुत्ती मां के पास चला जाता है। यह कितनी बड़ी बाधा है! अपने कार्य के लगभग प्रत्येक व्यावहारिक कदम पर, परमेश्वर को आज़माया जाता है, और लगभग प्रत्येक कदम बड़े खतरे को पैदा करता है। उसके वचन निष्कपट और ईमानदार हैं, और बिना द्वेष के हैं, फिर भी कौन हैं जो उन्हें स्वीकार करने को तैयार हैं? कौन है जो पूरी तरह से स्वयं को अर्पित करने को कौन तैयार है? यह परमेश्वर के दिल को तोड़ देता है। वह मनुष्यों के लिए दिन-रात कष्ट सहता है, वह मनुष्यों के जीवन के लिए चिंता से घिरा रहता है, और वह मनुष्य की कमज़ोरी के साथ सहानुभूति रखता है। अपने बोले गए सभी वचनों के लिए उसने अपने कार्य के प्रत्येक चरण में कई मोड़ और मुश्किलों का सामना किया है; वह हमेशा एक चट्टान और सख्त जगह के बीच फंसा रहता है, और मनुष्य की कमज़ोरी, अवज्ञा, बचपने और भेद्यता के बारे में सोचता है...दिन-रात बार-बार। यह किसे पता है? वह किस पर विश्वास कर सकता है? कौन समझ सकेगा? वह मनुष्यों के पापों और हिम्मत की कमी, और दुर्बलता से हमेशा घृणा करता है, और वह हमेशा मनुष्य की भेद्यता के बारे में चिंता करता है, और उस राह के बारे में विचार करता है जो भविष्य में मनुष्य के सामने आने वाला है; हमेशा, जब वह मनुष्य के वचनों और कर्मों को देखता है, तो वह दया, और क्रोध से भर जाता है, और हमेशा इन चीज़ों के देखने से उसके दिल में दर्द पैदा होता है। निर्दोष, आखिरकार, कठोर हो चुके हैं; क्यों परमेश्वर को हमेशा उनके लिए चीज़ों को मुश्किल करना होता है? कमज़ोर मनुष्य में पूरी तरह से दृढ़ता की कमी है; क्यों परमेश्वर हमेशा उसके लिए ऐसा क्रोध रखता है जो कभी समाप्त नहीं होता? कमज़ोर और निर्बल मनुष्य में अब थोड़ी-सी भी जीवन-शक्ति नहीं बची है; क्यों परमेश्वर को हमेशा उसकी अवज्ञा के लिए उसे डाँटना होता है? स्वर्ग में परमेश्वर की धमकियों का सामना कौन कर सकता है? आखिरकार, मनुष्य नाज़ुक और हताशा की स्थिति में है, परमेश्वर ने अपना गुस्से अपने दिल में गहराई तक पहुँचा दिया है, ताकि मनुष्य धीरे-धीरे स्वयं पर विचार कर सके। फिर भी मनुष्य, जो गंभीर संकट में है, परमेश्वर की इच्छा की थोड़ी-सी भी सराहना नहीं करता; उसे शैतानों के बूढ़े राजा के पैरों तले कुचल दिया गया है, फिर भी वह पूरी तरह से अनजान है, वह हमेशा परमेश्वर के विरुद्ध स्वयं को रख देता है, या फिर उसकी परवाह नहीं करता। परमेश्वर ने कई वचन कहे हैं, फिर भी किसने उन्हें कभी गंभीरता से लिया है? मनुष्य परमेश्वर के वचनों को नहीं समझता, फिर भी वह बेफ़िक्र और बिना किसी तड़प के रहता है, और कभी भी उसने बूढ़े शैतान का सार असल में नहीं जाना है। लोग अधोलोक में, नरक में रह रहे हैं, लेकिन मानते हैं कि वे समुद्र तल के महल में रह रहे हैं; उन्हें बड़े लाल अजगर द्वारा सताया जाता है, फिर भी उन्हें लगता है कि उन्हें अजगर के राज्य द्वारा कृपा प्राप्त हो रही है[5]; शैतान उनका उपहास करता है, फिर भी उन्हें लगता है कि वे शरीर की उत्कृष्ट कलात्मकता का आनंद ले रहे हैं। कितने मैले, नीच व्यक्तियों का यह समूह है! मनुष्य दुर्भाग्य का सामना कर चुका है, लेकिन उसे पता नहीं है, और इस अंधियारे समाज में उसे एक के बाद एक दुर्घटनाओं का सामना करना पड़ता है,[6] फिर भी वह इससे जाग नहीं पाया है। कब वह अपनी आत्म-दया और दासता के स्वभाव से छुटकारा पाएगा? क्यों उसे परमेश्वर के दिल की कोई चिंता नहीं है? क्या वह चुपचाप इस दमन और कठिनाई को अपना लेता है? क्या वह उस दिन की इच्छा नहीं रखता जब वह अंधेरे को प्रकाश में बदल सके? क्या वह एक बार फिर धार्मिकता और सत्य के विरुद्ध हो रहे अन्याय को रोकना नहीं चाहता? जब लोग सत्य को त्याग देते हैं और तथ्यों को तोड़-मरोड़ देते हैं, तो क्या वह देखते रहने और कुछ न करने के लिए तैयार है? क्या वह इस दुर्व्यवहार को सहते रहने में खुश है? क्या वह दास बने रहना चाहता है? क्या वह इस असफल राज्य के परिसर के साथ परमेश्वर के हाथ नष्ट होने को तैयार है? तुम्हारा संकल्प कहां है? तुम्हारी महत्वाकांक्षा कहां है? तुम्हारी गरिमा कहां है? तुम्हारा सम्मान कहां है? तुम्हारी स्वतंत्रता कहां है? क्या तुम शैतानों के राजा, बड़े लाल अजगर के लिए अपना पूरे जीवन अर्पित करना चाहते हो? क्या तुम ख़ुश हो कि वह तुम्हें यातना देते-देते मौत के घाट उतार दे? गहराई का चेहरा अराजक और अंधियारा है, सामान्य लोग ऐसे दुखों का सामना करते हुए, स्वर्ग की ओर देखकर रोते हैं और पृथ्वी को शिकायत करते हैं। मनुष्य कब अपने सिर को ऊँचा रख पाएगा? मनुष्य कमज़ोर और दुर्बल है, वह इस क्रूर और अत्याचारी शैतान से कैसे संघर्ष कर सकता है? वह क्यों नहीं जितनी जल्दी हो सके परमेश्वर को अपना जीवन सौंप देता है? वह क्यों अभी भी डगमगाता है, जब वह परमेश्वर का कार्य समाप्त कर सकता है? इस प्रकार बिना किसी उद्देश्य से दंड और दमन सहते हुए, उसका पूरा जीवन अंततः व्यर्थ हो जाएगा; वह आने के लिए इतनी जल्दी में क्यों है, और जाने की उसे इतनी जल्दी क्यों है? क्यों नहीं वह परमेश्वर को देने के लिए कुछ अनमोल रखता है? क्या वह घृणा की सहस्त्राब्दियों को भूल गया है?

"वचन देह में प्रकट होता है" से "कार्य और प्रवेश (8)" से

इस समय, परमेश्वर इस तरह का कार्य करने के लिए देहधारी बना है, उस कार्य को पूरा करने के लिए जो उसने अभी पूर्ण नहीं किया है, इस युग को समाप्ति की तरफ़ ले जाने के लिए, इस युग का न्याय करने के लिए, दुख के समुन्दर की दुनिया से अत्यंत पापियों को बचाने के लिए और पूरी तरह उन्हें बदलने के लिए। यहूदियों ने परमेश्वर को क्रूस पर चढ़ा दिया, और इस प्रकार यहूदिया में परमेश्वर की यात्रा समाप्त कर दी। उसके कुछ ही समय के बाद, परमेश्वर व्यक्तिगत रूप से एक बार फिर मनुष्य के बीच आया, चुपचाप बड़े लाल अजगर के देश में। वास्तव में, यहूदी राज्य के धार्मिक समुदाय ने लंबे समय से अपनी दीवारों पर यीशु की छवि को लटका दिया था, और अपने मुंह से लोगों ने चिल्लाया "प्रभु यीशु मसीह"। उन्हें नहीं पता था कि यीशु ने बहुत समय पहले ही मनुष्य के बीच वापस आकर अपने अपूर्ण कार्य के दूसरे चरण को पूरा करने के अपने पिता के आदेश को स्वीकार कर लिया था। परिणामस्वरूप, जब लोगों ने उसे देखा तो वे आश्चर्यचकित रह गए: वह एक ऐसी दुनिया के बीच पैदा हुआ था जिसमें कई युग गुज़र चुके थे, और वह मनुष्य के सामने एक बहुत ही साधारण व्यक्ति का रूप धारण करके प्रकट हुआ। वास्तव में, जैसे-जैसे युग गुज़रे, उसके कपड़े और उसका पूरा स्वरूप बदल गया, मानो उसका पुनर्जन्म हुआ हो। लोग कैसे जान सकते थे कि यह वही प्रभु यीशु मसीह है जो क्रूस से नीचे आया और पुनर्जीवित हुआ था? उसे थोड़ी-सी भी चोट नहीं लगी थी, बिल्कुल वैसे ही जैसे यीशु यहोवा के समान नहीं दिखता था। आज का यीशु बहुत समय से गुज़रे हुए युगों के बोझ के बिना है। लोग उसे कैसे जान सकते थे? कपटी "थॉमस" को हमेशा संदेह था कि वह पुनर्जीवित यीशु है, इससे पहले कि वह अपने मस्तिष्क को समझा सके उसे हमेशा से पहले यीशु के हाथों पर कीलों के निशान देखने होते हैं; बिना उन्हें देखे, वह हमेशा संदेह से उसे देखता रहता है, और ठोस ज़मीन पर अपने पैरों को रखने और यीशु का अनुसरण करने में असमर्थ रहता है। बेचारा "थॉमस"—वह कैसे जान सकता था कि यीशु पिता परमेश्वर द्वारा अधिकृत कार्य करने के लिए आया है? यीशु को क्रूस पर चढ़ाए जाने के निशानों को धारण करने की ज़रूरत क्यों है? क्या क्रूस पर चढ़ाए जाने के निशान यीशु के निशान हैं? वह अपने पिता की इच्छा के लिए कार्य करने आया है; वह हज़ारों साल पहले के यहूदी के पहनावे और रूप में क्यों आएगा? जो रूप देहधारी परमेश्वर लेता है, क्या वह उसके कार्य में बाधा डाल सकता है? यह किसका सिद्धांत है? ऐसा क्यों है कि जब भी परमेश्वर कार्य करे, तो वह मनुष्य की कल्पना के अनुसार हो? परमेश्वर अपने कार्य में केवल एक ही चीज़ का प्रयास करता है, और वह है कि उसका प्रभाव हो। वह कानून का पालन नहीं करता है, और उसके कार्य के कोई नियम नहीं हैं—मनुष्य यह कैसे समझ सकता है? मनुष्य की धारणाएं परमेश्वर के कार्य को कैसे देख सकती हैं? तो बेहतर होगा कि तुम लोग ठीक से समझ जाओ: छोटी-छोटी बातों के बारे में हंगामा मत करो, और उन चीज़ों के बारे में शोर न मचाओ जो तुम लोगों के लिए नई हैं—ये तुम्हें अपना मज़ाक बनवाने से और लोगों को तुम लोगों पर हँसने से रोकेगा। तुमने परमेश्वर पर इतने वर्षों से विश्वास किया है और फिर भी तुम परमेश्वर को नहीं जानते; आखिरकार, तुम ताड़ना का सामना करते हो, तुम्हें, जो "श्रेणी में सबसे ऊपर" हो,[7] उसे ताड़ना से गुज़रने वालों के बीच पहुँचा दिया जाता है। अपनी छोटी-छोटी चालों को दिखाने के लिए चालाक साधनों का उपयोग नहीं करना; क्या तुम्हारी अल्पदृष्टि वास्तव में परमेश्वर का अनुभव कर सकती है, जो अनंत काल से अनंत काल तक देखता है? क्या तुम्हारा सतही अनुभव पूरी तरह से परमेश्वर की इच्छा को सामने रख सकता है? अहंकार न करो। अखिरकार, परमेश्वर इस दुनिया का नहीं है—तो कैसे उसका कार्य वह हो सकता है जिसकी आशा तुम करते हो?

"वचन देह में प्रकट होता है" से "कार्य और प्रवेश (8)" से

गहरी नस्लीय परंपराओं और मानसिक दृष्टिकोण ने लंबे समय से मनुष्य के शुद्ध और बाल-सुलभ उत्साह पर ग्रहण लगा रखा है, मनुष्य की आत्मा पर उन्होंने थोड़ी-सी भी मानवता के बिना हमला किया है, जैसे कि कोई भावना या आत्म-बोध ही न हो। इन राक्षसों के तरीक़े बेहद बेरहम हैं, और ऐसा लगता है कि "शिक्षा" और "पोषण" पारंपरिक तरीके बन गए हैं जिनके द्वारा दुष्टों का राजा मनुष्य की हत्या करता है; अपनी "गहन शिक्षा" का उपयोग कर यह पूरी तरह से अपनी बदसूरत आत्मा को छिपा लेता है, भेड़ के पहनावे में खुद को सँवार कर, ताकि मनुष्य को भरोसा हो जाए और उसके बाद यह उसका लाभ उठाता है जब वह सो रहा हो, पूरी तरह से उसे खा जाने के लिए। बेचारे मानव-वे यह कैसे जान पाते कि जिस भूमि पर उन्हें पाला-पोसा गया था वह शैतान का देश है, कि जिसने उन्हें पाला था, वह वास्तव में एक दुश्मन है जो उन्हें दुख देता है। फिर भी मनुष्य बिल्कुल जागता नहीं है; अपनी भूख और प्यास को बुझाकर, वह अपने "माता-पिता" द्वारा परवरिश की "दया" का ऋण चुकाने के लिए तैयार होता है। मनुष्य ऐसा ही है। वह आज भी नहीं जानता है कि जिस राजा ने उसे बड़ा किया, वह उसका दुश्मन है। धरती पर मृतकों की हड्डियाँ बिखरी पड़ी हैं, शैतान बिना रुके पागलों की तरह जश्न मनाता है, और "अधोलोक" में मनुष्यों के मांस को निगलता जाता है, मानव कंकालों के साथ कब्र को साझा करते हुए और मनुष्यों के क्षत-विक्षत देह के अंतिम अवशेषों का उपभोग करने का निरर्थक प्रयास करते हुए। फिर भी मनुष्य सदैव अनजान है, और शैतान को अपने दुश्मन के रूप में कभी नहीं मानता है, बल्कि पूरे दिल से उसकी सेवा करता है। इस तरह के भ्रष्ट लोग परमेश्वर को जानने में बिलकुल असमर्थ होते हैं। क्या परमेश्वर के लिए देह धारण कर उनके बीच में आना, और उद्धार के अपने सारे कार्य को पूरा करना आसान है? कैसे मनुष्य, जो पहले से ही अधोलोक में गिर चुका है, परमेश्वर की अपेक्षाओं को पूरा करने में सक्षम हो सकता था?

"वचन देह में प्रकट होता है" से "कार्य और प्रवेश (9)" से

मानव जाति के कार्य के लिए परमेश्वर ने बहुत सारी रातों को बिना नींद के गुजारना सहन किया है। बहुत ऊपर से सबसे नीची गहराई तक, जीवित नरक में जहाँ मनुष्य रहता है, वह मनुष्य के साथ अपने दिन गुजारने के लिए उतर आया है, कभी भी मनुष्य के बीच फटेहाली की शिकायत नहीं की है, उसकी अवज्ञा के लिए कभी भी मनुष्य को तिरस्कृत नहीं किया है, बल्कि वह व्यक्तिगत रूप से अपने कार्य को करते हुए सबसे बड़ा अपमान सहन करता है। परमेश्वर कैसे नरक से संबंधित हो सकता है? वह नरक में अपना जीवन कैसे बिता सकता है? लेकिन समस्त मानव जाति के लिए, पूरी मानवजाति को जल्द ही आराम मिल सके इसके लिए, उसने अपमान को सहन किया और पृथ्वी पर आने के अन्याय का सामना किया, और मनुष्य को बचाने की खातिर व्यक्तिगत रूप से "नरक" और "अधोलोक" में, बाघ की माँद में, प्रवेश किया। परमेश्वर का विरोध करने के लिए मनुष्य कैसे योग्य हो सकता है? परमेश्वर के बारे में एक बार और शिकायत करने के लिए उसके पास क्या कारण है? कैसे वह फिर से परमेश्वर की ओर नज़र उठाकर देखने की हिम्मत कर सकता है? स्वर्ग का परमेश्वर बुराई की इस सबसे गंदी भूमि में आया है, और कभी भी उसने अपने कष्टों के बारे में शिकायत नहीं की है, या मनुष्य के बारे में गिला नहीं किया है, बल्कि वह चुपचाप मनुष्य द्वारा किये गए विनाश [1] और अत्याचार को स्वीकार करता है। कभी भी उसने मनुष्य की अनुचित मांगों का प्रतिकार नहीं किया, कभी भी उसने मनुष्य से अत्यधिक मांगें नहीं की, और कभी भी उसने मनुष्य से ग़ैरवाजिब तकाज़े नहीं किये; वह केवल बिना किसी शिकायत के मनुष्य द्वारा अपेक्षित सभी कार्य करता है: शिक्षा देना, ज्ञान प्रदान करना, डाँटना-फटकारना, शब्दों का परिशोधन करना, याद दिलाना, प्रोत्साहन देना, सांत्वना देना, न्याय करना, और प्रकट करना। उसका कौन-सा कदम मनुष्य के जीवन की खातिर नहीं है? यद्यपि उसने मनुष्यों की संभावनाओं और प्रारब्ध को हटा दिया है, परमेश्वर द्वारा उठाया गया कौन-सा कदम मनुष्य के भाग्य के लिए नहीं रहा हैं? उनमें से कौन-सा मनुष्य के अस्तित्व के लिए नहीं रहा है? उनमें से कौन-सा कदम रातों की तरह काली अँधेरी ताकतों के उत्पीड़न और अत्याचार से मनुष्य को मुक्त करने के लिए नहीं रहा है? उनमें से कौन-सा मनुष्य की खातिर नहीं है? परमेश्वर के हृदय को कौन समझ सकता है, जो एक प्रेमपूर्ण मां की तरह है? कौन परमेश्वर के उत्सुक हृदय को समझ सकता है? परमेश्वर के भावुक हृदय और उसकी उत्कट आशाओं का प्रतिफल ठंडे दिलों के साथ, कठोर, उदासीन आँखों के साथ, लोगों की दोहराई जाने वाली प्रतिक्रियाओं और अपमानों के साथ, तीक्ष्ण आलोचना के साथ, उपहास, और अनादर के साथ दिया गया है, इनके बदले में मनुष्य का व्यंग, उसकी कुचलन और अस्वीकृति, उसकी गलतफहमी, उसका विलाप, मनो-मालिन्य, परिहार, उसके धोखे, हमले और उसकी कड़वाहट के अलावा अन्य कुछ भी नहीं मिला है। स्नेही शब्दों को मिली हैं उग्र भौंहें और हजारों मचलती अँगुलियों की ठंडी अवज्ञा। परमेश्वर केवल सिर झुका कर, लोगों की सेवा करते हुए एक अनुकूल बैल[2] की तरह सहन कर सकता है। कितने सूर्य और चन्द्रमा का उसने सामना किया है, कितनी बार सितारों का, कितनी बार वह भोर में निकल कर गोधूलि में लौटा है, छटपटाया है और करवटें बदलीं हैं, अपने पिता से विरह की तुलना में हजार गुना ज्यादा पीड़ा को सहते हुए, मनुष्य के हमलों और तोड़-फोड़, और मनुष्य से निपटने और उसकी छंटाई करने को बर्दाश्त करते हुए। परमेश्वर की विनम्रता और अदृष्टता का प्रतिफल मनुष्य के पूर्वाग्रह[3] से चुकाया गया है, मनुष्य के अनुचित विचारों और व्यवहार के साथ,से और परमेश्वर की गुमनामी, तितिक्षा और सहिष्णुता का ऋण मनुष्य की लालची निगाह से चुकाया गया है; मनुष्य परमेश्वर को बिना किसी मलाल के, घसीट कर मार डालने की कोशिश करता है और परमेश्वर को जमीन में कुचल देने का प्रयास करता है। परमेश्वर के प्रति अपने व्यवहार में मनुष्य का रवैया "अजीब चतुराई" का है, और परमेश्वर को, जिसे मनुष्य द्वारा डराया-धमकाया गया है और जो घृणित है, हजारों लोगों के पैरों के नीचे कुचलकर निर्जीव कर दिया जाता है, जबकि मनुष्य स्वयं ऊंचा खड़ा होता है, जैसे कि वह किले का राजा हो, जैसे कि वह परदे के पीछे से अपना दरबार चलाने के लिए, सम्पूर्ण सत्ता हथियाना[4] चाहता हो, परमेश्वर को रंगमंच के पीछे एक नेक और नियम-बद्ध निदेशक बनाने के लिए, जिसे पलट कर लड़ने या मुश्किलें पैदा करने की अनुमति नहीं है; परमेश्वर को अंतिम सम्राट की भूमिका अदा करनी होगी, उसे हर तरह की स्वतंत्रता से रहित एक कठपुतली[5] बनना होगा। मनुष्य के कर्म अकथनीय हैं, तो कैसे वह परमेश्वर से यह या वह मांगने के योग्य है? वह कैसे परमेश्वर को सुझाव देने के योग्य है? वह कैसे यह माँग करने के योग्य है कि परमेश्वर उसकी कमजोरियों के साथ सहानुभूति रखे? वह कैसे परमेश्वर की दया पाने के योग्य है? वह कैसे बार-बार परमेश्वर की उदारता प्राप्त करने के योग्य है? वह कैसे बार-बार परमेश्वर की क्षमा पाने के योग्य है? उसकी अंतरात्मा कहाँ है? उसने बहुत पहले परमेश्वर का दिल तोड़ दिया था, एक लंबे समय से उसने परमेश्वर का दिल टुकड़े-टुकड़े करके छोड़ दिया है। परमेश्वर उज्ज्वल आँखें और अदम्य उत्साह लिए मनुष्यों के बीच आया था, यह आशा करते हुए कि मनुष्य उसके प्रति दयालु होगा, भले ही उसकी गर्मजोशी थोड़ी-सी ही रही हो। फिर भी, परमेश्वर के दिल के लिए मनुष्य का आश्वासन धीमा है, जो कुछ उसने प्राप्त किया है वे केवल तेजी से बढ़ते[6] हमले और यातना हैं; मनुष्य का दिल बहुत लालची है, उसकी इच्छा बहुत बड़ी है, वह कभी भी संतृप्त नहीं होगा, वह हमेशा शरारती और उजड्ड होता है, वह कभी भी परमेश्वर को बोलने की कोई आज़ादी या अधिकार नहीं देता, और अपमान के सामने सिर झुकाने, और मनुष्य द्वारा उसके साथ की गई मनमानी को स्वीकार करने के अलावा परमेश्वर के लिए कोई भी विकल्प नहीं छोड़ता।

"वचन देह में प्रकट होता है" से "कार्य और प्रवेश (9)" से

सृष्टि से लेकर अब तक, परमेश्वर ने इतनी पीड़ा सहन की है, और इतने सारे हमलों का सामना किया है। पर आज भी, मनुष्य परमेश्वर से अपनी माँगे कम नहीं करता है, वह आज भी परमेश्वर की जाँच करता है, आज भी उसमें उसके प्रति कोई सहिष्णुता नहीं है, और उसे सलाह देने, आलोचना करने और अनुशासित करने के अलावा मनुष्य और कुछ भी नहीं करता है, जैसे कि उसे गहरा भय हो कि परमेश्वर भटक जाएगा, कि पृथ्वी पर परमेश्वर पाशविक और अनुचित है, या दंगा कर रहा है, या वह कुछ भी काम का न रह जाएगा। मनुष्य का परमेश्वर के प्रति हमेशा इस तरह का रवैया रहा है। यह कैसे परमेश्वर को दुखी नहीं करता? देह धारण करने में, परमेश्वर ने जबरदस्त वेदना और अपमान को सहन किया है; मनुष्य की शिक्षाओं को स्वीकार करने के लिये परमेश्वर की और कितनी दुर्गति होगी? मनुष्य के बीच उसके आगमन ने उसकी सारी स्वतंत्रता छीन ली है, जैसे कि उसे अधोलोक में बंदी बना लिया गया हो, और उसने मनुष्य के विश्लेषण को थोड़े-से भी प्रतिरोध के बिना स्वीकार कर लिया है। क्या यह शर्मनाक नहीं है? एक सामान्य व्यक्ति के परिवार के बीच आने में, यीशु ने सबसे बड़ा अन्याय सहन किया है। इससे भी अधिक अपमानजनक यह है कि वह इस धूल भरी दुनिया में आ गया है और उसने खुद को बहुत ही नीचे तक झुका लिया है, और अधिकतम सामान्यता का देह ग्रहण किया है। एक मामूली व्यक्ति बनने में, क्या सर्वोच्च परमेश्वर को मुश्किल नहीं भुगतनी पड़ती है? और क्या यह सब मानव जाति के लिए नहीं है? क्या किसी भी समय ऐसा हुआ जब वह खुद के लिए सोच रहा था? यहूदियों द्वारा खारिज कर दिये जाने और मार दिए जाने, और लोगों द्वारा उसका उपहास और तिरस्कार किये जाने के बाद उसने न तो कभी स्वर्ग में शिकायत की, न ही धरती पर विरोध किया। आज, यह सहस्राब्दियों पुरानी त्रासदी इन यहूदी जैसे लोगों के बीच फिर से प्रकट हुई है। क्या वे उसी पाप को नहीं दुहरा रहे? परमेश्वर के वादों को पाने के लिए मनुष्य को क्या योग्य बनाता है? क्या वह परमेश्वर का विरोध कर बाद में उसका आशीर्वाद स्वीकार नहीं करता है? क्यों मनुष्य कभी न्याय का सामना नहीं करता, या सच्चाई की तलाश नहीं करता है? क्यों उसे परमेश्वर के कार्य में कोई रुचि नहीं है? उसकी धार्मिकता कहाँ है? उसकी निष्पक्षता कहाँ है? क्या वह परमेश्वर का प्रतिनिधित्व करने का दम रखता है? न्याय की उसकी समझ कहाँ है? मनुष्य को जो प्रिय है उसमें से कितना परमेश्वर को प्रिय है? मनुष्य खड़िया और पनीर का भेद नहीं बता सकता[7] है, वह हमेशा काले और सफ़ेद रंगों के बारे में भ्रमित रहता है, वह न्याय और सच्चाई का दमन करता है, और अन्याय और अधर्म को हमेशा ऊपर ऊँचा उठाता है। वह प्रकाश को दूर भगाता है, और अंधेरों में कूदता-फाँदता है। जो लोग सच्चाई और न्याय की तलाश करते हैं, वे इसके बजाय प्रकाश को दूर भगाते हैं, जो परमेश्वर की तलाश करते हैं, वे उसे अपने पैरों के नीचे रौंदते हैं, और खुद को आकाश में ऊँचा फहराते हैं। मनुष्य एक डाकू[8] से भिन्न नहीं है। उसका विवेक कहाँ है? कौन सही-गलत का भेद कह सकता है? कौन न्याय कर सकता है? कौन सच्चाई के लिए दुःख सहना चाहता है? लोग शातिर और शैतान हैं! परमेश्वर को सूली पर चढ़ाने के बाद वे ताली बजाते और खुश होते हैं, उनकी असभ्य चीखें अंतहीन होती हैं। वे मुर्गियों और कुत्तों की तरह हैं, वे सह-षड्यंत्रकारी और धूर्त हैं, उन्होंने अपना राज्य स्थापित किया है, उनकी दखल ने कोई जगह नहीं छोड़ी है, वे अपनी आँखें बंद कर लेते हैं और पागलपन से गुर्राते फिरते हैं, सभी एक साथ घुसे हुए हैं, और एक दिखावे का माहौल फैला हुआ है, काफी हलचल और चटक है, और जो खुद को आँखें मूँद कर दूसरों से जोड़ते हैं, वे उभरते रहते हैं, सभी अपने पूर्वजों के "शानदार" नामों को पकड़े रहते हैं। इन कुत्तों और मुर्गियों ने बहुत पहले परमेश्वर को अपने मस्तिष्क के पीछे डाल दिया है, और परमेश्वर के दिल की स्थिति पर कभी भी ध्यान नहीं दिया। परमेश्वर का यह कहना कोई आश्चर्य नहीं है कि मनुष्य एक कुत्ते या मुर्गी की तरह है, एक भौंकने वाला कुत्ता जो सौ दूसरों के चीखने का कारण बनता है; इस तरह, बहुत शोरगुल के साथ मनुष्य परमेश्वर के कार्य को आज के दिन तक ले आया है, इस बात से बिलकुल अनभिज्ञ कि परमेश्वर का कार्य क्या है, कि क्या इसमें न्याय है, कि क्या परमेश्वर के पास कोई एक ऐसी जगह है जहाँ उसे कदम रखना है, कि कल का दिन कैसा है, या फिर वह अपनी नीचता और अपनी गंदगी के बारे में अनभिज्ञ है। मनुष्य ने चीज़ों के बारे में ख़ास कुछ कभी नहीं सोचा है, उसने कल के बारे में खुद कभी चिंता नहीं की है, और जो कुछ फायदेमंद और अनमोल है उसे अपनी बाँहों में इकट्ठा कर लिया है, और रद्दी तथा बचे-खुचे[9] के सिवाय परमेश्वर के लिए कुछ नहीं छोड़ा है। मानवजाति कितनी क्रूर है! मानव के पास परमेश्वर के लिए कोई भावना नहीं बची है, और परमेश्वर का सब कुछ गुप्त रूप से निगल जाने के बाद, उसके अस्तित्व की तरफ अब और ध्यान न देते हुए, उसने उसे अपने बहुत पीछे उछाल फेंका है। वह परमेश्वर का आनंद तो लेता है, परन्तु परमेश्वर का विरोध करता है, और उसे पैरों तले कुचलता है, जबकि उसके मुंह में वह परमेश्वर का धन्यवाद और उसकी प्रशंसा करता है; वह परमेश्वर से प्रार्थना करता है, और परमेश्वर पर निर्भर रहता है, साथ ही परमेश्वर को धोखा भी देता है; वह परमेश्वर के नाम का "गुणगान" करता है और परमेश्वर के मुख की ओर नज़रें उठाता है, फिर भी वह बेरहमी से और बेशर्मी से परमेश्वर के सिंहासन पर बैठ जाता है और परमेश्वर की "अधर्मिता" का न्याय करता है; उसके मुंह से तो ऐसे शब्द आते हैं कि वह ईश्वर का ऋणी है, और वह परमेश्वर के शब्दों को देखता है, परन्तु फिर भी अपने दिल में वह परमेश्वर पर प्रहार करता है; वह ईश्वर के प्रति "सहिष्णु" है, फिर भी वह परमेश्वर पर अत्याचार करता है और उसका मुंह कहता है कि यह परमेश्वर की खातिर है; अपने हाथों में वह परमेश्वर की चीजों को रखता है, और अपने मुंह में वह उस भोजन को चबाता है जो परमेश्वर ने उसे दिया है, फिर भी उसकी आँखें परमेश्वर पर एक ठंडी और भावनारहित नज़र रखती हैं, मानो कि वह उसे पूरी तरह से गप कर जाने की इच्छा रखता हो; वह सच्चाई को देखता है लेकिन कहता है कि यह शैतान की चाल है; वह न्याय पर निगाह डालता है, लेकिन इसे आत्म-त्याग बन जाने के लिए मजबूर करता है; वह मनुष्यों के कामों को देखता है, पर इस बात पर जोर देता है कि वे ही परमेश्वर हैं; वह मनुष्यों की प्राकृतिक प्रतिभाओं को देखता है लेकिन आग्रह करता है कि वे ही सत्य हैं; वह परमेश्वर के कार्यों पर नज़र डालता है लेकिन इस पर जोर देता है कि वे अहंकार और अभिमान, शेखी और दंभ हैं; जब मनुष्य परमेश्वर की ओर देखता है, तो वह उसे मानव के रूप में अंकित करने पर ज़ोर देता है, और उसे एक ऐसे सृष्ट जीव की जगह पर बिठाने की कोशिश करता है जो शैतान के साथ मिलीभगत में हो; वह पूरी तरह से जानता है कि वे परमेश्वर की उक्तियाँ हैं, फिर भी उन्हें किसी व्यक्ति के लेखन के अलावा और कुछ नहीं कहेगा; वह पूरी तरह से जानता है कि आत्मा देह में सिद्ध होती है, कि परमेश्वर देह बन जाता है, लेकिन केवल यही कहता है कि यह देह शैतान का वंशज[10] है; वह पूरी तरह से जानता है कि परमेश्वर विनम्र और छिपा हुआ है, फिर भी कहता है कि शैतान लज्जित हुआ है, और परमेश्वर जीत गया है। ये कैसे निकम्मे लोग हैं! मनुष्य तो रक्षक कुत्तों के रूप में सेवा करने के योग्य भी नहीं है! वह काले और सफ़ेद के बीच तो भेद नहीं करता है, यहाँ तक कि वह जानबूझकर काले रंग को तोड़-मरोड़ कर सफेद बनाता है। क्या मनुष्य की ताकतें और मनुष्य के घेरे परमेश्वर की मुक्ति के दिन को बर्दाश्त कर सकेंगे? जानबूझकर परमेश्वर का विरोध करने के बाद मनुष्य बेपरवाह है, या वह उसे मार डालने की हद तक भी चला जाता है, परमेश्वर खुद को दिखा सके इसका मौका ही न छोड़ते हुए। कहाँ है धार्मिकता? प्रेम कहाँ है? वह परमेश्वर के पास बैठता है, और परमेश्वर को धकेलता है कि वह घुटनों पर गिर कर माफ़ी माँगे, उसकी सारी व्यवस्थाओं का पालन करे, उसकी सभी चालाकियों को स्वीकार करे, और वह परमेश्वर जो कुछ भी करे उसमें उसकी सलाह लेने को कहता है, वर्ना वह फिर भड़क जाता है [11] और आग बबूला हो उठता है। अंधेरे के इस तरह के प्रभाव के तहत जो काले को सफ़ेद में बदल देता है, परमेश्वर कैसे दु:ख से ग्रस्त न होता? वह कैसे चिंता नहीं करता? ऐसा क्यों कहा जाता है कि जब परमेश्वर ने अपना नवीनतम कार्य शुरू किया, तो यह एक नए युग की सुबह की तरह था? मनुष्य के कर्म इतने "समृद्ध" हैं, "जीवित जल के सदैव बहते हुए कूप-स्रोत" मनुष्य के दिल के क्षेत्र को निरंतर "फिर से भरते हैं", जबकि मनुष्य का "जीवित जल का कूप-स्रोत" परमेश्वर के साथ बेझिझक[12] प्रतिस्पर्धा करता है; ये दोनों परस्पर विरोधी हैं, और यह बिना किसी रोक के परमेश्वर की जगह पर लोगों को प्रावधान देता है, जबकि मनुष्य इसमें शामिल खतरों के विषय में सोचे बिना इसके साथ सहयोग करता है। और इसका क्या प्रभाव है? वह उपेक्षापूर्वक ईश्वर को एक तरफ हटा देता है, और उसे बहुत दूर कर देता है, जहाँ लोग उसकी ओर ध्यान नहीं दें, इस बात से भयभीत कि परमेश्वर उनका ध्यान आकर्षित कर लेगा, और वह बेहद डरा हुआ है कि परमेश्वर के जीवित जल के कूप-स्रोत मनुष्य को लुभा लेंगे और मनुष्य को प्राप्त कर लेंगे। इस प्रकार, कई वर्षों की सांसारिक चिंताओं का सामना करने के बाद, वह परमेश्वर के खिलाफ कपट और षड्यंत्र करता है, और यहां तक कि परमेश्वर को अपनी फटकार का लक्ष्य भी बना देता है। ऐसा लगता है कि परमेश्वर उसकी आँखों में एक कुंदा-सा बन गया है, और वह परमेश्वर को पकड़ने और उसे अग्नि में निर्मल तथा शुद्ध करने के लिए बेताब है। परमेश्वर की असुविधा को देख कर, मनुष्य अपनी छाती पीटता और हँसता है, वह खुशी के मारे नाचता है, और कहता है कि परमेश्वर को भी शुद्धिकरण में डुबो दिया गया है, और कहता है कि वह परमेश्वर की मलीन अशुद्धताओं को भस्म कर देगा, जैसे कि केवल यही तर्कसंगत और विवेकपूर्ण हो, जैसे कि केवल ये ही स्वर्ग के निष्पक्ष और उचित तरीके हों। मनुष्य का यह हिंसक व्यवहार संकल्पित और बेसुध दोनों ही लगता है। मनुष्य अपने बदसूरत चेहरे और अपना घृणित, गंदा आत्मा दोनों को ही प्रकट करता है, साथ ही साथ एक भिखारी की दयनीय शकल को भी; दूर-दूर तक उपद्रव करने के बाद, वह एक दयनीय सूरत बना लेता है और स्वर्ग से क्षमा के लिए भीख माँगता है, और एक अत्यंत दयनीय पिल्ले की तरह दिखता है। मनुष्य हमेशा अप्रत्याशित तरीकों से काम करता है, वह हमेशा "दूसरों को डराने के लिए शेर की पीठ पर सवारी करता है" [क], जहाँ भी हो सके वह हँसी-मजाक में शामिल हो जाता है, परमेश्वर के दिल के बारे में वह जरा भी विचार नहीं करता, न ही वह अपनी स्थिति से कोई तुलना करता है। वह तो चुपचाप केवल परमेश्वर का विरोध करता है, जैसे कि परमेश्वर ने उसके साथ कोई अन्याय कर रखा हो और उसे इस तरह से व्यवहार नहीं करना चाहिए था, और जैसे कि स्वर्ग की आँखें न हों और जानबूझकर वह चीजों को उसके लिए कठिन बनाता हो। इस प्रकार मनुष्य हमेशा चुपके-चुपके साज़िशें रचता है और वह परमेश्वर से अपनी मांगें थोड़ी-सी भी कम नहीं करता, हिंसक आँखों से देखता है, परमेश्वर के हर कदम को उग्रता से घूरता है, कभी यह नहीं सोचता कि वह परमेश्वर का दुश्मन है, और यह उम्मीद करता है कि वह दिन आएगा जब परमेश्वर कुहासे को काट देगा, और चीज़ों को स्पष्ट करेगा, और उसे "बाघ के मुंह" से बचाएगा और उसकी ओर से प्रतिशोध ले लेगा। आज भी, लोग यह नहीं सोचते हैं कि वे परमेश्वर का विरोध करने की भूमिका निभा रहे हैं, ऐसी भूमिका जो युगों से बहुतों ने निभाई है; वे कैसे जान सकते हैं कि जो कुछ भी वे करते हैं, उसमें वे लंबे समय से भटक गए हैं, कि वे जो कुछ भी समझते थे वह सब समुद्रों ने कब का निगल लिया है।

किसने कब सच्चाई को स्वीकार किया है? किसने कब खुली बाँहों से परमेश्वर का स्वागत किया है? किसने कब परमेश्वर के अ‍वतरण के लिए खुशी से कामना की है? मनुष्य के व्यवहार का लंबे समय से क्षय हो गया है, और उसकी मलिनता ने लंबे समय से परमेश्वर के मंदिर को ऐसे छोड़ दिया है कि उसे पहचाना ही न जा सके। इस बीच मनुष्य, परमेश्वर को अपने से तुच्छ समझते हुए, अभी भी अपने काम को जारी रखता है। ऐसा लगता है जैसे कि परमेश्वर के खिलाफ उसका विरोध पत्थर की लकीर बन गया है, और अपरिवर्तनीय है, और नतीजतन, वह अपने शब्दों और कार्यों के और अधिक दुर्व्यवहार से पीड़ित होने की बजाय, शापित होगा। इस तरह के लोग, परमेश्वर को कैसे जान सकते हैं? वे कैसे परमेश्वर के साथ आराम पा सकते हैं? और कैसे वे परमेश्वर के सामने आने के योग्य हो सकते हैं?

"वचन देह में प्रकट होता है" से "कार्य और प्रवेश (9)" से

मैंने मनुष्य के साथ कई दिन-रात बिताए हैं, मैं दुनिया में मनुष्य के साथ रह चुका हूँ, और मैंने कभी भी मनुष्य से कोई और अपेक्षाएँ नहीं की हैं; मैं केवल मनुष्य का निरंतर आगे की ओर मार्गदर्शन करता हूँ, मैं मनुष्य का मार्गदर्शन करने के अलावा और कुछ भी नहीं करता हूँ, और मानव जाति की नियति की खातिर, मैं निरंतर प्रबंधन का कार्य करता हूँ। स्वर्ग के पिता की इच्छा को कभी किसने समझा है? किसने स्वर्ग और पृथ्वी के बीच यात्रा की है? मैं अब और मनुष्य के साथ उसके "बुढ़ापे" को और बिताना नहीं चाहता, क्योंकि मनुष्य बहुत पुराने ढंग का है, वह कुछ भी नहीं समझता है, एक ही चीज़ जो वह जानता है, अन्य सभी से अलग, वह है उस दावत को छक कर खाना जो मैंने सजा रखी है—किसी भी अन्य मामले पर ध्यान न देते हुए। मानव जाति बहुत कृपण है, मनुष्यों के बीच कोलाहल, उदासी और जोखिम बहुत अधिक है, और इस प्रकार मैं आखिरी दिनों के दौरान हासिल की गई जीत के बहुमूल्य फलों को साझा करना नहीं चाहता हूँ। मनुष्य को उन प्रचुर आशीर्वादों का आनंद उठाने दो जो उसने खुद ने निर्मित किये हैं, क्योंकि मनुष्य मेरा स्वागत नहीं करता है—मैं मनुष्य को मुस्कुराहट का स्वांग करने के लिए क्यों मजबूर करूँ? दुनिया का हर कोना गर्मजोशी से रहित है, पूरे विश्व के परिदृश्य में वसंत का कोई नामो-निशान नहीं है, क्योंकि जल में निवास करते एक जीव की तरह, उसमें थोड़ी-सी भी गर्माहट नहीं है, वह एक लाश की तरह है, और यहाँ तक कि वह रक्त भी जो उसकी नसों में दौड़ता है, एक जमी हुए बर्फ की तरह है जो दिल को ठिठुराता है। गर्माहट कहाँ है? बिना किसी कारण के मनुष्य ने परमेश्वर को सूली पर जड़ दिया, और बाद में उसने थोड़ी-सी भी आशंका महसूस नहीं की। किसी को भी कभी अफसोस नहीं हुआ है, और ये क्रूर आततायी अभी भी मनुष्य के पुत्र को एक बार फिर "जीवित पकड़ना"[4] चाहते हैं और एक गोली चलाने वाले दस्ते के सामने उसे ले आने की योजना बना रहे हैं, ताकि वे अपने दिल की नफरत को खत्म कर सकें। इस खतरनाक भूमि में और रहने का मुझे क्या लाभ है? यदि मैं रह जाता हूँ, तो केवल एक ही चीज जो मैं मनुष्य के लिए लाऊंगा, वह संघर्ष और हिंसा है, और संकट का कोई अंत न होगा, क्योंकि मैं कभी मनुष्य के लिए शांति नहीं, केवल युद्ध, लाया हूँ। मानव जाति के आखिरी दिन युद्ध से भर जाने चाहिए, और हिंसा और संघर्ष के बीच मनुष्य के गंतव्य को ध्वस्त हो जाना चाहिए। मैं युद्ध की "प्रसन्नता" में "हिस्सा" लेने के लिए तैयार नहीं हूँ, मैं मनुष्य के रक्तपात और बलिदान का साथ नहीं दूँगा, क्योंकि मनुष्य की अस्वीकृति मुझे "निराशा" की ओर ले गई है और मुझे मनुष्य के युद्धों को देखने का दिल नहीं है—मनुष्य को जी भर लड़ने दो, मैं आराम करना चाहता हूँ, मैं सोना चाहता हूँ, मानव जाति के अंतिम दिनों के दौरान राक्षसों को उनके साथी बनने दो! मेरी इच्छा को कौन जानता है? चूँकि मनुष्य ने मेरा स्वागत नहीं किया गया है, और उसने कभी मेरी प्रतीक्षा नहीं की है, मैं केवल उसे विदाई दे सकता हूँ, और मैं मानवता के गंतव्य को उसे सौंपता हूँ, अपने सारा धन मनुष्य के लिए छोड़ता हूँ, अपने जीवन को मनुष्यों के बीच बोता हूँ, अपने जीवन के बीज को मनुष्य के ह्रदय के खेत में बोता हूँ, उसके लिए अक्षय स्मृतियाँ छोड़ता हूँ, मानव जाति के लिए मेरा सारा प्रेम देता हूँ, और जो कुछ भी मुझमें मनुष्य को प्रिय है वह सब उसे देता हूँ, उस प्रेम के उपहार के रूप में जिसके साथ हम एक दूसरे को चाहते हैं। मेरी हसरत है कि हम हमेशा के लिए एक दूसरे से प्यार करते रहें, कि हमारा बीता हुआ कल हमारी एक अच्छी वस्तु हो जो हम एक दूसरे को दें, क्योंकि मैंने मानवता को पहले से ही अपनी पूर्णता दे दी है—मनुष्य को क्या शिकायतें हो सकती हैं? मैंने पूरी तरह से मेरे जीवन की पूर्णता को मनुष्यों के लिए छोड़ दिया है, और बिना एक शब्द के, मानव जाति के लिए प्रेम की सुंदर भूमि पर हल जोतने की कड़ी मेहनत की है; मैंने कभी मनुष्यों से न्यायसंगत मांगे भी नहीं की हैं, और सिर्फ मानव की व्यवस्था के प्रति समर्पण करने और मानवता के लिए एक अधिक सुंदर आने वाला कल बनाने के अलावा और कुछ भी नहीं किया है।

"वचन देह में प्रकट होता है" से "कार्य और प्रवेश (10)" से

परमेश्वर के देह-धारण ने सभी मतों और संप्रदायों को चकित कर दिया है, इसने उनकी मूल व्यवस्था को "उलट-पुलट कर दिया" है, और इसने उन सभी लोगों के दिलों को हिला दिया है जो परमेश्वर की उपस्थिति के लिए तरसते हैं। कौन है जो प्रेममय नहीं? कौन परमेश्वर को देखने का अभिलाषी नहीं है? परमेश्वर कई सालों से मनुष्यों के बीच व्यक्तिगत रूप से रहा है, फिर भी मनुष्य ने कभी इसका अनुभव नहीं किया है। आज, परमेश्वर खुद प्रकट हुआ है, और जनता के सामने अपनी पहचान प्रकट की है—यह कैसे मनुष्य के दिल को प्रसन्न नहीं कर सकता था? एक बार परमेश्वर ने मनुष्य के साथ सुख और दुःख साझा किए, और आज वह मानव जाति के साथ फिर से जुड़ गया है, और वह उसके साथ बिताये समय के किस्से साझा करता है। उसके यहूदिया से बाहर चले जाने के बाद, लोगों को उसका कोई भी पता नहीं लग पाया। वे एक बार फिर परमेश्वर के साथ मिलना चाहते हैं, यह न जानते हुए कि वे लोग आज फिर से उसके साथ मिल चुके हैं, और उसके साथ फिर से एक हो गए हैं। यह बात बीते कल के ख्यालों को कैसे नहीं जगाएगी? दो हजार साल पहले इस दिन, यहूदियों के वंशज सिमोन बार-योना ने उद्धारकर्ता यीशु को देखा, उसके साथ एक ही मेज पर भोजन किया, और कई वर्षों से उसका अनुसरण करने के बाद उसके लिए एक गहरा लगाव महसूस किया: उसने तहेदिल से उससे प्रेम किया, उसने प्रभु यीशु से गहराई से प्यार किया। यहूदी लोगों को कुछ भी अंदाज़ नहीं था कि यह सुनहरे बालों वाला बच्चा, जो एक सर्द नांद में पैदा हुआ था, वह परमेश्वर के देह्धारण की पहली छवि थी। उन सभी ने सोचते थे कि वह उनके जैसा ही था, किसी ने भी उसे अपने से अलग नहीं समझा था—लोग इस सामान्य और साधारण यीशु को कैसे पहचान सकते थे? यहूदी लोगों ने उसे उस समय के एक यहूदी पुत्र के रूप में ही जाना। किसी ने भी उसे एक सुंदर परमेश्वर के रूप में नहीं देखा, और आँखें बंद कर उससे ये मांगें करते हुए कि वह उन्हें प्रचुर और भरपूर आशीषें, शांति और आनन्द दे, लोगों ने और कुछ भी नहीं किया। उन्हें पता था कि एक करोड़पति की तरह, उसके पास सब कुछ था जिसकी कोई कभी भी इच्छा कर सकता था। फिर भी लोग कभी भी उसके साथ ऐसे पेश नहीं आये कि वह उनको प्रिय था; उस समय के लोगों ने उससे प्रेम नहीं किया, और केवल उसके खिलाफ विरोध किया, और उससे अनुचित मांगें की, पर उसने कभी प्रतिकार नहीं किया, वह लगातार मनुष्य को आशीषें देते रहा, भले ही मनुष्य उसे जान नहीं पाए थे। मनुष्यों को चुपके से ऊष्मा, प्रेम और दया प्रदान करने, और उससे भी ज्यादा, मनुष्यों को व्यवहार के ऐसे नए तरीके देने के अलावा जिससे वे नियमों के बंधन से बाहर निकाल सकें, उसने और कुछ भी नहीं किया। मनुष्य ने उसे प्यार नहीं किया, केवल उससे ईर्ष्या की और उसकी असाधारण प्रतिभा को मान्यता दी। अंधी मानवजाति कैसे जान सकती थी कि जब प्रिय उद्धारक यीशु उनके बीच आया, तो उसे कितना बड़ा अपमान सहन करना पड़ा था? किसी ने भी उसके संकट को नहीं समझा, किसी ने भी पिता परमेश्वर के प्रति उसके प्रेम के बारे में नहीं जाना, और न ही किसी ने उसके अकेलेपन के बारे में जाना; भले ही मेरी उसकी जन्मदात्री थी, फिर भी वह दयालु प्रभु यीशु के दिल में रहे विचारों को कैसे जान सकती थी? मानव के पुत्र के द्वारा सही गई अकथनीय पीड़ा को किसने जाना? उससे अनुरोध करने के बाद, उस समय के लोगों ने रुखाई से उसे अपने दिमाग के पीछे डाल दिया, और उसे बाहर निकाल दिया। तो वह सड़कों पर घूमता रहा, दिन-ब-दिन, साल-दर-साल, कई सालों तक यूँ ही घूमता रहा, तैंतीस कठोर सालों तक जीवित रहकर, वे साल जो लंबे और संक्षिप्त दोनों ही थे। जब लोगों को उसकी जरूरत होती थी, तो वे उसे अपने घरों में मुस्कुराते हुए चेहरे के साथ आमंत्रित करते थे, उससे माँगने की कोशिश करते हुए—और जैसे ही उसने अपना योगदान उन्हें दिया, उन्होंने तुरंत उसे दरवाजे से बाहर कर दिया। जो कुछ उसने अपने मुंह से मुहैया किया था, लोगों ने उसे खाया, उन्होंने उसका रक्त पीया, उन्होंने उन आशीर्वादों का आनंद लिया जो उसने दिए, फिर भी उन्होंने उसका विरोध भी किया, क्योंकि उन्हें कभी पता नहीं था कि उनके जीवन उन्हें किसने दिये थे। आखिरकार, उन्होंने उसे क्रूस पर जड़ दिया, फिर भी उसने कोई आवाज़ नहीं की। आज भी, वह चुप रहता है। लोग उसके शरीर को खाते हैं, वे वह खाना खाते हैं जो वह उनके लिए बनाता है, वे उस रास्ते पर चलते हैं जो उसने उनके लिए खोला है, और वे उसका खून पीते हैं, फिर भी वे उसे अस्वीकार करने का इरादा रखते हैं, वास्तव में जिस परमेश्वर ने उन्हें जीवन दिया है उसके साथ वे शत्रु जैसा व्यवहार करते हैं, और इसके बदले उन दासों को जो उनके जैसे हैं, स्वर्ग के पिता की तरह मानते हैं। इसमें, क्या वे जानबूझकर विरोध नहीं कर रहे? क्रूस पर यीशु को कैसे मरना पड़ा? क्या तुम जानते हो? क्या यहूदा ने जो उसके सबसे निकट था और जिसने उसे खाया था, उसे पीया था और उसका आनंद लिया था, उसके साथ विश्वासघात नहीं किया? क्या यहूदा के विश्वासघात का कारण यह नहीं था, कि यीशु उसके लिए एक सामान्य छोटे शिक्षक से ज्यादा कुछ नहीं था? यदि लोगों ने वास्तव में देखा होता कि यीशु असाधारण था, और एक ऐसा जो स्वर्ग का था, तो उसे कैसे वे चौबीस घंटे तक क्रूस पर जीवित जड़ सकते थे, जब तक कि उसके शरीर में कोई सांस न बचे? कौन परमेश्वर को जान सकता है? लोग अतृप्य लालच के साथ परमेश्वर के आनंद को लेने के अलावा कुछ नहीं करते हैं, परन्तु उन्होंने उसे कभी भी नहीं समझा है। उन्हें एक इंच दिया गया था और उन्होंने एक मील ले लिया है, और वे अपनी आज्ञाओं के प्रति, अपने आदेशों के प्रति, यीशु को पूरी तरह से आज्ञाकारी बनाते हैं। किसने कभी मनुष्य के इस पुत्र की ओर दया की तरह कुछ भी दिखाया है, जिसके पास सिर धरने की भी जगह नहीं है? किसने कभी परमेश्वर के पिता के आदेश को पूरा करने के लिए उसके साथ दल में शामिल होने का विचार किया है? किसने कभी उसके लिए एक विचार किया है? कौन कभी उसकी कठिनाइयों के प्रति विचारशील हुआ है? थोड़े-से भी प्यार के बिना, मनुष्य उसे आगे पीछे मरोड़ता है; मनुष्य को पता नहीं है कि उसका प्रकाश और जीवन कहाँ से आया था, और दो हजार साल पहले के यीशु को, जिसने मनुष्य के बीच दर्द का अनुभव किया है, एक बार फिर क्रूस पर चढ़ाने की चुपके से एक योजना बनाने के अलावा वह और कुछ नहीं करता है। क्या यीशु वास्तव में ऐसी नफ़रत को जगाता है? क्या वह सब कुछ जो उसने किया, लम्बे समय से भुला दिया गया है? वह नफ़रत जो हजारों सालों से इकट्ठी हो रही थी, अंततः बाहर की ओर तेजी से फूट पड़ेगी। तुम लोग, यहूदियों की किस्म! कब यीशु ने तुम लोगों से शत्रुता की है, जो तुम सब उससे इतनी घृणा करो? उसने बहुत कुछ किया है, और बहुत कुछ कहा है—क्या यह तुम सभी के हित में नहीं है? उसने तुम सब को अपना जीवन दिया है बदले में कुछ भी माँगे बिना, उसने तुम्हें अपना सर्वस्व दे दिया है—क्या तुम लोग वास्तव में अभी भी उसे जिंदा खा जाना चाहते हो? उसने कुछ भी बचाकर रखे बिना अपना सब तुम लोगों को दे दिया है, बिना कभी सांसारिक महिमा का आनंद उठाए, बिना मनुष्यों के बीच रही गर्मजोशी, और मनुष्यों के बीच रहे प्रेम, या मनुष्यों के बीच मिलते वरदान का सुख उठाए। लोग उसके प्रति बहुत ही घटिया हैं, उसने धरती पर कभी दौलत का सुख नहीं लिया, वह अपने नेक, भावुक दिल की संपूर्णता मनुष्य को समर्पित करता है, उसने अपना समग्र मानव जाति को समर्पित किया है—और किसने कभी उसे सौहार्द दिया है? किसने कभी उसे आराम दिया है? मनुष्य ने उस पर सारा दबाव लाद रखा है, सारा दुर्भाग्य उसे सौंप दिया है, मनुष्य के सबसे दुर्भाग्यपूर्ण अनुभव उस पर थोप रखे हैं, वह सभी अन्यायों के लिए उसे ही दोषी ठहराता है, और उसने इसे चुपचाप स्वीकार कर लिया है। क्या उसने कभी किसी से विरोध किया है? क्या उसने कभी किसी से थोडा भी हर्जाना माँगा है? किसी ने कभी उसके प्रति कोई सहानुभूति दिखायी है? सामान्य लोगों के रूप में, तुम लोगों में से किसका एक रूमानी बचपन न था? किसका यौवन रंगीन नहीं रहा? प्रियजनों का सौहार्द किसे नहीं मिला है? कौन रिश्तेदारों और दोस्तों के प्यार से रहित है? दूसरों के सम्मान के बिना कौन है? एक स्नेही परिवार के बिना कौन है? विश्वासपात्रों के आराम के बिना कौन है? और क्या उसने कभी इनमें से किसी का भी सुख पाया है? किसने कभी उसे थोड़ी गर्मजोशी दी है? किसने कभी उसे लेशमात्र भी आराम दिया है? किसी ने कभी उसे थोड़ी-सी मानवीय नैतिकता दिखायी है? कौन कभी उसके प्रति सहिष्णु रहा है? मुश्किल समय के दौरान कौन उसके साथ रहा है? किसने कभी उसके साथ एक कठिन जीवन बिताया है? मनुष्य ने अपनी अपेक्षाओं को कभी भी कम नहीं किया; वह बिना किसी हिचकिचाहट के केवल उससे माँगें करता है, मानो कि मनुष्य की दुनिया में आकर, उसे उनका बैल या घोड़ा, उसका कैदी बनना पड़ेगा, और उसे अपना सर्वस्व मनुष्यों को दे देना होगा; नहीं तो मनुष्य कभी उसे माफ नहीं करेगा, कभी उसके साथ सुगम नहीं होगा, उसे कभी परमेश्वर नहीं कहेगा, और कभी भी उसे उच्च सम्मान में नहीं रखेगा। मनुष्य परमेश्वर के प्रति अपने व्यवहार में बहुत सख्त है, जैसे कि वह परमेश्वर को मृत्यु पर्यंत सताने पर उतारू हो, जिसके बाद ही वह परमेश्वर से अपनी अपेक्षाओं को कम करेगा; यदि नहीं, तो मनुष्य कभी भी परमेश्वर से अपनी अपेक्षाओं के मानकों को कम नहीं करेगा। कैसे इस तरह का मनुष्य परमेश्वर द्वारा घृणित नहीं होगा? क्या यह आज की त्रासदी नहीं है? कहीं इंसान का जमीर दिखाई नहीं देता। वह कहता रहता है कि वह परमेश्वर के प्रेम का ऋण चुकाएगा, परन्तु वह परमेश्वर का विश्लेषण करता है और मृत्यु तक उसे यातना देता है। क्या यह परमेश्वर में उसके विश्वास करने का "गुप्त नुस्खा" नहीं, जो उसे पूर्वजों से विरासत में प्राप्त हुआ है? ऐसी कोई जगह नहीं है जहाँ "यहूदी" लोग न हों, और आज भी वे वही करते हैं, वे अभी भी परमेश्वर के विरोध का ही काम करते हैं, और फिर भी विश्वास करते हैं कि वे परमेश्वर को उच्च स्थान पर रखते हैं। कैसे मनुष्य की अपनी आँखें परमेश्वर को जान सकती हैं? कैसे मनुष्य में जो देह में जीता है, परम आत्मा से उतरे हुए देहधारी परमेश्वर को परमेश्वर के रूप में मान सकता है? मनुष्य के बीच कौन उसे जान सकता है? मनुष्यों के बीच में सच्चाई कहाँ है? सच्ची धार्मिकता कहाँ है? कौन परमेश्वर के स्वभाव को जानने में सक्षम है? कौन स्वर्ग के परमेश्वर के साथ प्रतिस्पर्धा कर सकता है? इसमें कोई आश्चर्य नहीं कि, जब वह मनुष्य के बीच आ गया है, तो कोई भी परमेश्वर को नहीं जानता है, और उसे अस्वीकार कर दिया गया है। मनुष्य कैसे परमेश्वर के अस्तित्व को सहन कर सकता है? कैसे वह प्रकाश को संसार के अंधेरे को बाहर निकालने की अनुमति दे सकता है? क्या यही सब मनुष्यों की सम्माननीय भक्ति नहीं है? क्या यही मनुष्य का ईमानदार प्रवेश नहीं है? और क्या परमेश्वर का कार्य मनुष्यों के प्रवेश के आसपास केंद्रित नहीं है? मेरी इच्छा है कि तुम लोग इंसान के प्रवेश के साथ परमेश्वर के कार्य को मिलाओ, और मनुष्य और परमेश्वर के बीच एक अच्छा संबंध स्थापित करो, और अपनी क्षमता की चरम सीमा तक उस कर्तव्य का पालन करो जो मनुष्य द्वारा किया जाना चाहिए। इस तरह, परमेश्वर का कार्य इसके पश्चात् उसके गुणगान के साथ समाप्त हो जाएगा!

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