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7. पतन से पहले की एक घमंडी आत्मा

बैक्सू शेंयांग सिटी

काम की जरूरत की वजह से, मेरा स्थानांतरण एक अन्य कार्यक्षेत्र में कर दिया गया था। उस समय, मैं परमेश्वर की बहुत आभारी थी। मुझे लगा था कि मैं बहुत ज्यादा कमी महसूस करूंगी, हालांकि परमेश्वर के ईश्वरीय समर्थन से, मुझे एक बहुत अच्छे कार्य क्षेत्र में अपने कर्तव्यों को पूरा करने का मौका दिया गया था। मैं अपने दिल में परमेश्वर को एक प्रतिज्ञा दी: मैं परमेश्वर को बदला चुकाने के लिए अपनी पूरी कोशिश करूंगी।

हालांकि, जब मैं पहुंची, तो मुझे किए जा रहे काम में ढेर सारी कमियों का पता चला। परिणामस्वरूप, मैंने खुद ही कार्य की प्रत्येक वस्तु का निरीक्षण करना शुरू किया। जब मैं अपना निरीक्षण का काम कर रही थी, तब मैं खुद में सोच भी रही थी: “कोई भी काम इस तरह से कैसे किया जा सकता है? कोई भी काम ठीक तरह से नहीं संभाला गया था! मैंने सोचा था कि यहां किया गया काम उत्कृष्ट होगा। लेकिन मैंने कभी भी नहीं सोचा था कि यह मेरी पिछले नौकरी से भी खराब होगा। यह जबकि मैं यहां हूं, मुझे कार्य की व्यवस्था के अनुसार, चरण दर चरण, इसे उचित रूप से संभालना चाहिए। मैं सभी भाईयों और बहनों को जीवन में प्रवेश करने का नेतृत्व करूंगी।” इस वजह से, मैं समन्वयकों से मिली, काम की प्रत्येक वस्तु को व्यवस्थित करना शुरू किया, संचार करना, योजना बनाना, और व्यवस्थाएं करना। अपने संचारों के दौरान, मैंने अक्सर ही अपनी सच्ची भावना को उजागर किया, “यहां कार्य की गुणवत्ता बहुत निम्न है। मेरा पहले का कार्य आप लोगों के अभी के कार्य की तरह नहीं था। मेरे पुराने कार्यस्थल पर, हम हमेशा ही कार्य को अमुक तरीके से संभालते थे, हम हमेशा फलाना काम अच्छे से करते थे। हम परमेश्वर के आज्ञाकारी थे...।” इन सभाओं के बाद, कुछ समन्वयकों ने कहा: “बिल्कुल ठीक! हमने असली आदर्श का कोई काम नहीं किया है। इस बार, हमें फिर से शुरुआत करने और परमेश्वर की आवश्यकताओं के अनुसार अपना कार्य करने की जरूरत है।” अन्य लोग कहते: “तुम्हारे महान संचार और तुमने आज जो व्यवस्थाएं की हैं उसके लिए तुम्हारा धन्यवाद। अन्यथा, सुरक्षा उपायों के प्रति लापरवाही बरतना बहुत ज्यादा घातक साबित होता।” ये बातें सुनकर, मैं बहुत खुश थी। मुझे लगा कि मैं निश्चित रूप से अपने पूर्व अगुओं से ज्यादा मजबूत थी। भले ही मुझे खुद पर गर्व था, लेकिन मैं थोड़ा शर्मिंदगी महसूस करने से खुद को नहीं रोक पाई: क्या इस तरह से बात करना मेरे लिए वाकई उपयुक्त था? मैंने हमेशा ऐसा क्यों कहा कि मेरा पिछला कार्यस्थल बेहतर था? लेकिन दूसरी तरफ, मैंने सोचा: ऐसा कहने में क्या गलत है? मैं उन्हें बस यह सिखाने की कोशिश कर रही थी कि बेहतर काम कैसे किया जाएगा। इस तरह से, मैं खुद का परीक्षण करने पवित्र आत्मा के प्रोत्साहन का अनुसरण नहीं करती थी। बाइबल में, नीतिवचनों की पुस्तक कहती है, “विनाश से पहले गर्व, और ठोकर खाने से पहले घमण्ड आता है” (नीतिवचन 16:18)। जैसे—जैसे मैं ढेर सारी उम्मीदों के साथ अपने घर में डुबकी लगाती जा रही थी, अपने दिल में, मुझे यह महसूस होता था, कि मैं परमेश्वर के साथ संपर्क खोती जा रही हूं। न केवल मेरा कार्य लोगों की समझ में नहीं आयाथा, बल्कि हमारे सुसमाचार के कार्य की प्रभाविता भी उड़ाने भरने से गोते लगाने में आ गई थी। मैं बहुत ही दर्दनाक स्थिति में आ गई थी, लेकिन यह पता नहीं था कि मैंने क्या गलत किया था। तो, मैं उत्सुकता से मार्गदर्शन हासिल करने हेतु प्रार्थना करने के लिए परमेश्वर के समक्ष गई। इस समय, मेरे कानों में एक भजन के वचन बजना शुरू हो गए: “परमेश्वर की सेवा करने वाली अगुआ के तौर पर, व्यक्ति को सिद्धांतों पर खड़ा रहने की जरूरत होती है। भले ही आप साफ—साफ तौर पर सत्य का संचार नहीं कर सकते हों, लेकिनी आपका दिल सही स्थान पर होना चाहिए। चाहे कुछ भी हो जाए लेकिन तुम्हें परमेश्वर की प्रशंसा करनी चाहिए और जितने ज्यादा हो सके उतना परमेश्वर की गवाही देनी चाहिए। तुम जितना खुद को समझते हो उतना परमेश्वर को से कहो, केवल परमेश्वर की प्रशंसा करो और उसकी गवाही दो। अपनी प्रशंसा मत करो और न ही दूसरों को अपनी पूजा करने दो। तुम जो भी करो, पर अपनी प्रशंसा मत करो और न ही दूसरों को अपनी पूजा करने दो। यह पहला सिद्धांत है जो तुम्हें जरूर याद रखना चाहिए” (मेमने का अनुसरण करना और नए गीत गाना में “अगुओं के याद रखने के लिए तीन सिद्धांत”)। मेरे चेहरे पर आंसू बहने लगे। एक ही साथ मेरा दिल अफसोस, शर्मिंदगी और आभार से भर गया था। मैं उन सब बातों को याद किया जो मैंने समन्वयकों को कही थी और मुझे महसूस हुआ कि मैं वाकई परमेश्वर की दिव्य उन्नति के योग्य नहीं थी। मेरे कर्तव्यों को पूरा करने के लिए कलीसिया ने मेरे यहां आने की व्यवस्था की थी ताकि मैं परमेश्वर का उत्कर्ष कर सकूं और गवाही दे सकूं, परमेश्वर के पास भाइयों और बहनों को ला सकूं, और उसे समझने में उनकी मदद कर सकूं। फिर भी, मैंने बेशर्मी से दिखावा किया, खुद की प्रशंसा की, अपनी गवाही दी, और खुद का निर्माण किया। मैंने यह किया ताकि लोग मेरी प्रशंसा करें और मेरी पूजा करें। मैं अहंकारी थी। मैंने परमेश्वर को प्रेम करने और उसे संतुष्ट करने के नाम पर खुद की गवाही दी और खुद का निर्माण किया था। ऐसे कुत्सित व्यक्ति परमेश्वर की सेवा करने के योग्य कैसे हो सकता है? ऐसे किसी व्यक्ति का काम परमेश्वर से आशीर्वाद कैसे पा सकता है? मैं मनुष्यों के दिल के लिए परमेश्वर से प्रतिस्पर्धा कर रही थी। मैं एक मसीहा विरोधी से कम नहीं थी। मैं परमेश्वर के कार्य में हस्तक्षेप कर रही थी और उसके प्रतिद्वंद्वी की तरह कार्य कर रही थी। मेरा प्रबंधन शुद्ध रूप से परमेश्वर के विरुद्ध था, और परमेश्वर को इससे नफरत थी। मैं इस बारे में जितना ज्यादा सोचती थी, मुझे खुद से उतनी ही ज्यादा घृणा होती थी। मैं अफसोस के साथ परमेश्वर के समक्ष खुद को दंडवत कर दिया, और रोकर उससे कहने लगी, “हे परमेश्वर! तुम्हारी ताड़ना और न्याय के लिए तुम्हारा धन्यवाद, जिसने मुझे जगा दिया, मेरे मसीहाविरोधी सार और महादूत जैसी प्रकृति को पहचानने की अनुमति मुझे दी। तुमने मेरे प्रबंधन की दिशा को भी मेरे समक्ष उजागर किया, यह समझने में मेरी मदद की कि तुम्हारा उत्कर्ष मनाकर और तुम्हारी गवाही देकर ही मैं तुम्हें संतुष्ट कर सकती हूं, तुम्हारी इच्छा पूरी कर सकती हूं, और तुमने मुझे जो लक्ष्य दिया है उसे पूरा कर सकती हूं। तुम्हारी प्रशंसा करना और तुम्हारी गवाही देना ही आनंददायक है। यह रचयिता के लिए रचा गया मेरा कर्तव्य है। हे परमेश्वर! अब से, मैं बोलने या कार्य करने से पहले अपने दिल और उद्देश्य को परखने, जागृत होकर तुम्हारी प्रशंसा करने और तुम्हारी गवाही देने, तुम्हें जानने के लिए भाइयों और बहनों का नेतृत्व करने, और सत्य व मानववता रखने वाली व्यक्ति बनकर तुम्हारे दिल को सहज बनाने का संकल्प लेती हूं।”

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