2. झूठा अगुआ या झूठा चरवाहा कौन होता है और वे कैसे पहचाने जा सकते हैं

परमेश्वर के प्रासंगिक वचन :

योग्य कर्मी का कार्य लोगों को सही मार्ग पर लाकर उन्हें सत्य में बेहतर प्रवेश प्रदान कर सकता है। उसका कार्य लोगों को परमेश्वर के सम्मुख ला सकता है। इसके अतिरिक्त, जो कार्य वह करता है, वह भिन्न-भिन्न व्यक्तियों के लिए भिन्न-भिन्न हो सकता है, और वह नियमों से बँधा हुआ नहीं होता, उन्हें मुक्ति और स्वतंत्रता तथा जीवन में क्रमश: आगे बढ़ने और सत्य में अधिक गहन प्रवेश करने की क्षमता प्रदान करता है। अयोग्य कर्मी का कार्य कम पड़ जाता है। उसका कार्य मूर्खतापूर्ण होता है। वह लोगों को केवल नियमों के अधीन ला सकता है; और लोगों से उसकी अपेक्षाएँ हर व्यक्ति के लिए भिन्न-भिन्न नहीं होतीं; वह लोगों की वास्तविक आवश्यकताओं के अनुसार कार्य नहीं करता। इस प्रकार के कार्य में बहुत अधिक नियम और सिद्धांत होते हैं, और वह लोगों को वास्तविकता में नहीं ला सकता, न ही वह उन्हें जीवन में विकास के सामान्य अभ्यास में ला सकता है। वह लोगों को केवल कुछ बेकार नियमों का पालन करने में ही सक्षम बना सकता है। ऐसा मार्गदर्शन लोगों को केवल भटका सकता है। वह तुम्हें अपने जैसा बनाने में तुम्हारी अगुआई करता है; वह तुम्हें अपने स्वरूप में ला सकता है। इस बात को समझने के लिए कि अगुआ योग्य हैं या नहीं, अनुयायियों को अगुवाओं के उस मार्ग को जिस पर वे लोगों को ले जा रहे हैं और उनके कार्य के परिणामों को देखना चाहिए, और यह भी देखना चाहिए कि अनुयायी सत्य के अनुसार सिद्धांत पाते हैं या नहीं और अपने रूपांतरण के लिए उपयुक्त अभ्यास के तरीके प्राप्त करते हैं या नहीं। तुम्हें विभिन्न प्रकार के लोगों के विभिन्न कार्यों के बीच भेद करना चाहिए; तुम्हें मूर्ख अनुयायी नहीं होना चाहिए। यह लोगों के प्रवेश के मामले पर प्रभाव डालता है। यदि तुम यह भेद करने में असमर्थ हो कि किस व्यक्ति की अगुआई में एक मार्ग है और किसकी अगुआई में नहीं है, तो तुम आसानी से धोखा खा जाओगे। इस सबका तुम्हारे अपने जीवन के साथ सीधा संबंध है।

— "वचन देह में प्रकट होता है" में 'परमेश्वर का कार्य और मनुष्य का कार्य' से उद्धृत

जो कार्य मनुष्य के मन में होता है उसे वह बहुत आसानी से प्राप्त कर सकता है। उदाहरण के लिए, धार्मिक संसार के पादरी और अगुवे अपना कार्य करने के लिए अपनी प्रतिभाओं और पदों पर भरोसा रखते हैं। जो लोग लम्बे समय तक उनका अनुसरण करते हैं वे उनकी प्रतिभाओं से संक्रमित होकर उनके अस्तित्व के कुछ हिस्से से प्रभावित हो जाते हैं। वे लोगों की प्रतिभा, योग्यता और ज्ञान को निशाना बनाते हैं, वे अलौकिक चीज़ों और अनेक गहन और अवास्तविक सिद्धांतों पर ध्यान देते हैं (निस्संदेह, ये गहन सिद्धांत अप्राप्य हैं)। वे लोगों के स्वभाव में बदलाव पर ध्यान न देकर, लोगों को उपदेश देने और कार्य करने का प्रशिक्षण देने, लोगों के ज्ञान और उनके भरपूर धार्मिक सिद्धांतों को सुधारने पर ध्यान देते हैं। वे इस बात पर ध्यान नहीं देते कि लोगों के स्वभाव में कितना परिवर्तन हुआ है, न ही इस बात पर ध्यान देते हैं कि लोग कितना सत्य समझते हैं। उन्हें लोगों के सार से कोई लेना-देना नहीं होता, वे लोगों की सामान्य और असामान्य दशा को जानने की कोशिश तो बिल्कुल नहीं करते। वे लोगों की धारणाओं का विरोध नहीं करते, न ही वे अपनी धारणाओं को प्रकट करते हैं, वे लोगों की कमियों या भ्रष्टता के लिए उनकी काट-छाँट तो बिल्कुल भी नहीं करते। उनका अनुसरण करने वाले अधिकांश लोग अपनी प्रतिभा से सेवा करते हैं, और जो कुछ वे प्रदर्शित करते हैं, वह धार्मिक धारणाएँ और धर्म-संबंधी सिद्धांत होते हैं, जिनका वास्तविकता से कोई नाता नहीं होता और वे लोगों को जीवन प्रदान करने में पूरी तरह से असमर्थ होते हैं। वास्तव में, उनके कार्य का सार प्रतिभाओं का पोषण करना, प्रतिभाहीन व्यक्ति का पोषण करके उसे एक योग्य सेमेनरी स्नातक बनाना है जो बाद में कार्य और अगुवाई करता है।

— "वचन देह में प्रकट होता है" में 'परमेश्वर का कार्य और मनुष्य का कार्य' से उद्धृत

कलीसिया के अगुआ और कार्यकर्ता होने के नाते, अगर तुम लोग परमेश्वर के चुने लोगों का नेतृत्व वास्तविकता में करना चाहते हो और परमेश्वर के गवाहों के रूप में सेवा करना चाहते हैं, तो सबसे ज़रूरी है कि लोगों को बचाने में परमेश्वर के उद्देश्य और उसके कार्य के उद्देश्य की समझ तुम में होनी चाहिए। तुम्हें परमेश्वर की इच्छा और लोगों से उनकी विभिन्न अपेक्षाओं को समझना चाहिए। तुम्हें अपने प्रयासों में व्यावहारिक होना चाहिए; केवल उतना ही अभ्यास करना चाहिए जितना तुम समझते हो और केवल उस पर ही बात करनी चाहिए जो तुम जानते हो। डींगें न मारें, बढ़ा चढ़ा कर नहीं बोलें, और गैर-जिम्मेदाराना टिप्पणियाँ न करें। अगर तुम बढ़ा चढ़ा कर बोलोगे, तो लोग तुमसे घृणा करेंगे और तुम बाद में अपमानित महसूस करोगे; यह बहुत अधिक अनुचित होगा। जब तुम दूसरों को सत्य प्रदान करते हो, तो उनके सत्य प्राप्त कर लेने के लिए यह जरूरी नहीं कि तुम उनसे निपटो या उन्हें फटकारो। अगर खुद तुम्हारे पास सत्य नहीं है, और तुम बस दूसरों से निपटते और फटकारते हो, तो वे तुमसे डरेंगे। लेकिन इसका अर्थ यह नहीं कि वे सत्य को समझ जाते हैं। कुछ प्रशासनिक कार्यों में, दूसरों से निपटना और उन्हें काँटना-छाँटना और उन्हें एक हद तक अनुशासित करना तुम्हारे लिए सही है। लेकिन अगर तुम सत्य प्रदान नहीं कर सकते हो और केवल यह जानते हो कि रोबदार कैसे बनें और दूसरों का तिरस्कार कैसे करें, तो तुम्हारा भ्रष्टाचार और भद्दापन प्रकट हो जाएगा। समय बीतने के साथ, जैसे-जैसे लोग तुमसे जीवन या व्यावहारिक चीजों का पोषण प्राप्त करने में असमर्थ हो जाएंगे, वे तुमसे नफ़रत करने लगेंगे, तुमसे घृणा महसूस करने लगेंगे। जिन लोगों में विवेक की कमी होती है वे तुम से नकारात्मक चीजें सीखेंगे; वे दूसरों से निपटना, उन्हें काँटना-छाँटना, गुस्सा होना और अपना आपा खोना सीखेंगे। क्या यह दूसरों को पौलुस के मार्ग, विनाश की तरफ जाने वाले मार्ग पर ले जाने के समान नहीं है? क्या यह शैतान वाला काम नहीं है? तुम्हारा कार्य सत्य के प्रसार और दूसरों को जीवन प्रदान करने पर ध्यान केंद्रित करना चाहिए। अगर तुम आँख बंद करके दूसरों से निपटते हो और उन्हें उपदेश देते हो, तो वे कभी भी सत्य को कैसे समझ पाएंगे? जैसे-जैसे समय बीतेगा, लोग देखेंगे कि तुम वास्तव में क्या हो, और वे तुम्हारा साथ छोड़ देंगे। तुम इस तरह से दूसरों को परमेश्वर के समक्ष लाने की आशा कैसे कर सकते हो? यह कार्य करना कैसे हुआ? अगर तुम इसी तरह से कार्य करते हो तो तुम सभी लोगों को खो दोगे। तुम आखिर किस काम को पूरा करने की आशा करते हो? कुछ अगुवे समस्याओं के समाधान के लिए सत्य का संचार करने में बिलकुल असमर्थ होते हैं। इसके बजाय, वे बस आँख मूंदकर दूसरों को निपटारा करते हैं और अपनी शक्ति का दिखावा करते है जिससे दूसरे उनसे डरने लगें और उनका कहा मानें—ऐसे लोग झूठे अगुवाओं और मसीह-विरोधियों के होते हैं। जिन लोगों के स्वभाव नहीं बदले हैं, वे कलीसिया का काम करने में असमर्थ हैं, और परमेश्वर की सेवा नहीं कर सकते हैं।

— "अंत के दिनों के मसीह की बातचीत के अभिलेख" में 'केवल वे ही अगुआई कर सकते हैं जिनके पास सत्य की वास्तविकता है' से उद्धृत

मेरी पीठ पीछे बहुत-से लोग हैसियत के आशीष की अभिलाषा करते हैं, वे ठूँस-ठूँसकर खाना खाते हैं, सोना पसंद करते हैं तथा देह की इच्छाओं पर पूरा ध्यान देते हैं, हमेशा भयभीत रहते हैं कि देह से बाहर कोई मार्ग नहीं है। वे कलीसिया में अपना उपयुक्त कार्य नहीं करते, पर मुफ़्त में कलीसिया से खाते हैं, या फिर मेरे वचनों से अपने भाई-बहनों की भर्त्सना करते हैं, और अधिकार के पदों से दूसरों के ऊपर आधिपत्य जताते हैं। ये लोग निरंतर कहते रहते हैं कि वे परमेश्वर की इच्छा पूरी कर रहे हैं और हमेशा कहते हैं कि वे परमेश्वर के अंतरंग हैं—क्या यह बेतुका नहीं है? यदि तुम्हारे इरादे सही हैं, पर तुम परमेश्वर की इच्छा के अनुसार सेवा करने में असमर्थ हो, तो तुम मूर्ख हो; किंतु यदि तुम्हारे इरादे सही नहीं हैं, और फिर भी तुम कहते हो कि तुम परमेश्वर की सेवा करते हो, तो तुम एक ऐसे व्यक्ति हो, जो परमेश्वर का विरोध करता है, और तुम्हें परमेश्वर द्वारा दंडित किया जाना चाहिए! ऐसे लोगों से मुझे कोई सहानुभूति नहीं है! परमेश्वर के घर में वे मुफ़्तखोरी करते हैं, हमेशा देह के आराम का लोभ करते हैं, और परमेश्वर की इच्छाओं का कोई विचार नहीं करते; वे हमेशा उसकी खोज करते हैं जो उनके लिए अच्छा है, और परमेश्वर की इच्छा पर कोई ध्यान नहीं देते। वे जो कुछ भी करते हैं, उसमें परमेश्वर के आत्मा की जाँच-पड़ताल स्वीकार नहीं करते। वे अपने भाई-बहनों के साथ हमेशा छल करते हैं और उन्हें धोखा देते रहते हैं, और दो-मुँहे होकर वे, अंगूर के बाग़ में घुसी लोमड़ी के समान, हमेशा अंगूर चुराते हैं और अंगूर के बाग़ को रौंदते हैं। क्या ऐसे लोग परमेश्वर के अंतरंग हो सकते हैं? क्या तुम परमेश्वर के आशीष प्राप्त करने लायक़ हो? तुम अपने जीवन एवं कलीसिया के लिए कोई उत्तरदायित्व नहीं लेते, क्या तुम परमेश्वर का आदेश लेने के लायक़ हो? तुम जैसे व्यक्ति पर कौन भरोसा करने की हिम्मत करेगा? जब तुम इस प्रकार से सेवा करते हो, तो क्या परमेश्वर तुम्हें कोई बड़ा काम सौंपने की जुर्रत कर सकता है? क्या इससे कार्य में विलंब नहीं होगा?

— "वचन देह में प्रकट होता है" में 'परमेश्वर की इच्छा के अनुरूप सेवा कैसे करें' से उद्धृत

यदि अगुआ के रूप में कार्य करने वाले व्यक्तियों में परमेश्वर के वचनों को समझने की योग्यता और सत्य को समझने की क्षमता हो, तो न केवल वे स्वयं परमेश्वर के वचनों को समझ सकते हैं और उसके वचनों की वास्तविकता में प्रवेश कर सकते हैं, बल्कि वे उन लोगों को भी परमेश्वर के वचनों को समझने और उसके वचनों की वास्तविकता में प्रवेश करने के संबंध में सलाह देने, उनका मार्गदर्शन करने और उनकी सहायता करने में सक्षम होते हैं, जिनकी वे अगुआई करते हैं। किंतु नकली अगुआओं में इस तरह की क्षमता की कमी होती है। वे परमेश्वर के वचनों को नहीं समझते, और वे नहीं जानते कि परमेश्वर के वचन किन स्थितियों का उल्लेख कर रहे हैं, किन स्थितियों को वे उन स्थितियों के रूप में उजागर करते हैं, जिनमें लोग अपने भ्रष्ट स्वभाव प्रकट करते हैं, या जिनमें परमेश्वर के प्रति विरोध पैदा होता है और परमेश्वर के विरुद्ध शिकायतें होती हैं, या मनुष्य की प्रेरणाएँ, इत्यादि। वे परमेश्वर के वचनों से चीजों को मापने में असमर्थ होते हैं, और उसके वचनों के सतही स्तर पर केवल कुछ शब्द, नियम और सूत्रवाक्य समझते हैं। दूसरों के साथ सहभागिता करते हुए, वे परमेश्वर के वचनों का एक अंश याद कर लेते हैं और फिर उनका सतही अर्थ समझाते हैं। नकली अगुआओं की समझ, ज्ञान और परमेश्वर के वचनों की स्वीकृति केवल इसी तक सीमित होती है। उनमें परमेश्वर के वचनों को समझने की क्षमता का अभाव होता है। वे केवल शब्द-योजना और अर्थ की वही गहराई समझते हैं, जो इन वचनों के शाब्दिक स्तर पर सार्वभौमिक रूप से स्पष्ट है—और परिणामस्वरूप यह सोचते हैं कि उन्होंने उसके वचनों को समझ-बूझ लिया है। इसलिए वे परमेश्वर के वचनों के शाब्दिक अर्थ का उपयोग दूसरों को धिक्कारने और दैनिक जीवन में उनकी "मदद" करने के लिए भी करते हैं, और यह मानते हैं कि वे अपना काम कर रहे हैं, वे लोगों का परमेश्वर के वचनों को खाने और पीने और परमेश्वर के वचनों की वास्तविकता में प्रवेश करने में मार्गदर्शन कर रहे हैं। नकली अगुआ अक्सर दूसरों के साथ परमेश्वर के वचनों के संबंध में सहभागिता करते हैं और विभिन्न तरीकों से उन्हें परमेश्वर के वचन प्रदान करते हैं, और उनसे कहते हैं कि जब कोई समस्या आए तो परमेश्वर के वचनों के इस अंश को खाएँ और पिएँ, और जब कोई दूसरी समस्या आए तो परमेश्वर के वचनों के उस अंश को खाएँ और पिएँ। जब लोगों में परमेश्वर के बारे में गलतफहमी पैदा होती है, तो वे कहते हैं, "देखो, परमेश्वर के वचन इस बारे में पूरी तरह से स्पष्ट और बोधगम्य हैं। तुम अभी भी परमेश्वर को गलत कैसे समझ सकते हो? क्या परमेश्वर के वचन यह नहीं कहते कि हम इस-इस का पालन करें, और क्या वे यह नहीं कहते कि हम उस-उस का पालन करें?" इस तरह वे लोगों को परमेश्वर के वचनों को समझना और उनमें प्रवेश करना सिखाते हैं। उनके मार्गदर्शन में बहुत-से लोग परमेश्वर के वचनों का पाठ करने और कोई समस्या आने पर परमेश्वर के कुछ वचनों को याद करने में सक्षम हो जाते हैं। लेकिन वे चाहे कितना भी पढ़ लें और पाठ कर लें, वे इस बात से अनजान ही रहते हैं कि परमेश्वर के वचन किसका जिक्र कर रहे हैं। जब वे वास्तव में विपत्ति से घिरते हैं, या उन्हें कुछ संदेह होते हैं, तो परमेश्वर के वे वचन, जिन्हें वे जानते हैं और याद करते हैं, उनकी कठिनाइयाँ हल नहीं कर पाते। यह एक समस्या का चित्रण करता है : परमेश्वर के जिन वचनों को वे समझते हैं, वे मात्र सिद्धांत हैं, एक निश्चित प्रकार के नियमों के अलावा कुछ नहीं; वे वास्तविकता नहीं हैं, और वे सत्य नहीं हैं। इस प्रकार, नकली अगुआओं द्वारा परमेश्वर के वचनों को खाने और पीने और परमेश्वर के वचनों की वास्तविकता में प्रवेश करने के संबंध में किया जाने वाला लोगों का मार्गदर्शन उन्हें उसके वचनों का शाब्दिक अर्थ सिखाने तक सीमित होता है; वह उन्हें उसके वचनों से प्रबुद्धता प्राप्त कराने में असमर्थ होता है और वे यह नहीं जान पाते कि उनके भीतर कौन-से भ्रष्ट स्वभाव हैं। हर बार लोगों के साथ कुछ भी घटित होने पर उनमें प्रकट होने वाला स्वभाव और सार, परमेश्वर के वचनों का उपयोग करके उन्हें कैसे हल किया जा सकता है, और हर बार लोगों के साथ ऐसी चीजें घटित होने पर उनकी क्या अवस्थाएँ होती हैं, और ऐसी अवस्थाओं को कैसे दूर किया जा सकता है, और परमेश्वर के वचनों का इस बारे में क्या कहना है, उसके वचन क्या अपेक्षा करते हैं, सिद्धांत क्या हैं, और उनमें सत्य क्या है—वे इनमें से कुछ नहीं समझते। वे लोगों को बस यह उपदेश देते हैं : "परमेश्वर के वचनों को और अधिक खाओ और पिओ। परमेश्वर के वचनों में सत्य है, और अगर तुम उसके वचनों को अधिक सुनोगे, तो धीरे-धीरे तुम सत्य को समझ जाओगे। परमेश्वर के वचनों के प्रमुख भाग वे हैं, जिन्हें तुम नहीं समझते, इसलिए तुम्हें ज्यादा प्रार्थना करनी चाहिए, ज्यादा खोज करनी चाहिए, ज्यादा सुनना चाहिए और ज्यादा चिंतन करना चाहिए।" नकली अगुआ लगातार इस तरह के उपदेश देते रहते हैं। हर बार जब भी कोई निश्चित प्रकार की समस्या उत्पन्न होती है, वे यही बात कहते हैं, और बाद में, लोग फिर भी समस्या के सार को नहीं पहचान पाते और फिर भी यह नहीं जान पाते कि परमेश्वर के वचनों का अभ्यास कैसे करें; वे केवल उसके वचनों के शाब्दिक नियमों और अर्थ का पालन करते हैं, लेकिन जब परमेश्वर के वचनों का अभ्यास करने के सत्य-सिद्धांतों और सत्य द्वारा अपेक्षित वास्तविकता की बात आती है, तो वे समझ नहीं पाते।

— "अंत के दिनों के मसीह की बातचीत के अभिलेख" में 'नकली अगुआओं की पहचान करना (1)' से उद्धृत

नकली अगुआ कभी भी विभिन्न प्रकार के लोगों में विभिन्न स्थितियों में प्रदर्शित विभिन्न अवस्थाओं और अभिव्यक्तियों के सार को नहीं समझ सकते, और न ही वे कभी इससे उत्पन्न होने वाली समस्याएँ को दूर कर सकते हैं। चूँकि वे सत्य नहीं समझते, इसलिए वे लोगों को गलत पहचानते हैं और ठगी करते हैं, क्षणिक रूप से कमजोर और कभी-कभार नकारात्मक हो जाने वालों को विश्वासघाती, अपना कर्तव्य ईमानदारी से न निभाने वाले और अविश्वासी समझ लेते हैं; और इस बीच, जो अविश्वासी सतही प्रतिभा के होते हैं, थोड़ा आसान काम करने में सक्षम होते हैं, और थोड़ा प्रयास कर पाते हैं, उन्हें वे बहुत समर्थन देते हैं और उन्हें कलीसिया में रखने की कोशिश करते हैं। क्या यह ठगी नहीं है? और ऐसा कैसे होता है कि नकली अगुआ ठग बन जाते हैं? उनमें परमेश्वर के वचनों को समझने की शक्ति का अभाव होता है और वे सत्य नहीं समझते, इसलिए जब उन पर तरह-तरह की मुसीबतें आ पड़ती है, तो वे उस मामूली, बेहद उथले सत्य को लागू करते हैं जिसे वे समझते हैं, और चूँकि वे उसे लागू करने का प्रयास करते रहते हैं, इसलिए वे अंतत: व्यवधान और अशांति उत्पन्न करके रह जाते हैं। कई बार वे न केवल जीवन में प्रवेश करने में लोगों की कठिनाइयों का समाधान नहीं कर पाते, बल्कि लोगों को कमजोरी से निकालकर मजबूत बनाने में भी असफल रहते हैं, बल्कि उनके कारण कुछ ऐसे लोग, जो सच्ची आस्था और खुद को परमेश्वर के लिए खपाने का दृढ़ निश्चय रखते हैं, कमजोर और परमेश्वर को गलत समझने वाले बन जाते हैं, जबकि वे अविश्वासी, जिनकी परमेश्वर के घर में अपना कर्तव्य निभाने की कोई इच्छा नहीं होती, परमेश्वर के घर को गलत समझकर उसे उनका लाभ उठाने वाला समझ लेते हैं, और सोचते हैं कि उन्हें सेवा करने के लिए मजबूर किया जा रहा है, मानो परमेश्वर के घर में कोई प्रतिभाशाली न हो और किसी उपयुक्त व्यक्ति को खोजना असंभव हो। यह नकली अगुआओं के काम का दुष्प्रभाव है। यह सब कैसे होता है? यह इसलिए होता है, क्योंकि वे सत्य को नहीं समझ सकते और केवल उबाऊ शब्दों और वाक्यांशों को याद रखने में सक्षम होते हैं। उनके पास कोई सच्चा अनुभव, ज्ञान या सत्य की समझ नहीं होती, और आखिरकार, जब उनके सामने कोई समस्या आती है, तो वे केवल कुछ शब्दों की तोता-रटंत कर पाते हैं : "परमेश्वर से प्यार करो, ईमानदार रहो, जब तुम्हारे साथ कुछ हो जाए तो आज्ञा मानो और समर्पण कर दो, अपना कर्तव्य अच्छी तरह निभाओ; तुममें निष्ठा होनी चाहिए, तुम्हें देह-सुख का त्याग करना चाहिए, तुम्हें अपने आप को परमेश्वर के लिए खपाना चाहिए!" वे अपने जीवन को समृद्ध करने के लिए ऐसे खोखले सूत्र-वाक्यों का इस्तेमाल करते हैं—उन्हें दूसरों को प्रभावित करने की उम्मीद भी होती है। लेकिन इसका प्रभाव क्या होता है? कुछ भी नहीं बदलता। इस प्रकार, जब जीवन में प्रवेश करने में लोगों की कठिनाइयाँ दूर करने की बात आती है, तो नकली अगुआ सफल नहीं हो पाते। वे लोगों के सामने आने वाली असंख्य समस्याएँ हल नहीं कर पाते।

— "अंत के दिनों के मसीह की बातचीत के अभिलेख" में 'नकली अगुआओं की पहचान करना (1)' से उद्धृत

नकली अगुआ लोगों को भ्रमित और गुमराह करने के लिए अकसर सतह पर सही लगने वाली बातें कहते हैं, जिससे उन लोगों के जीवन-प्रवेश पर नकारात्मक प्रभाव पड़ता है। इसके कुछ ऐसे परिणाम भी होते हैं, जो कभी नहीं होने चाहिए। नकली अगुआओं की तथाकथित आध्यात्मिक उक्तियों और अभिव्यक्तियों को पाखंड और भ्रम कहा जा सकता है। सतही तौर पर ऐसा नहीं लगता कि उनमें कुछ गलत है, लेकिन असल में वे लोगों के जीवन-प्रवेश और उस मार्ग में, जिस पर वे चलते हैं, बाधाएँ, व्यवधान और भ्रम पैदा करने का काम करते हैं। यहाँ तक कि उनके कारण कुछ लोगों में परमेश्वर के प्रति गलतफहमियाँ भी पैदा हो जाती हैं और परमेश्वर के वचनों के प्रति संदेह और प्रतिरोध उनके मन में घर कर लेते हैं। ये वे प्रभाव हैं, जो नकली अगुआओं के वचन लोगों पर डालते हैं। नकली अगुआ दूसरों का मार्गदर्शन करने के लिए ऐसे पाखंडों और भ्रमों का उपयोग करते हैं, ताकि जिस समय वे लोग परमेश्वर का अनुसरण कर रहे होते हैं, उस समय ये लगातार उसके बारे में धारणाओं, प्रतिवादों और संदेहों को जन्म दे रहे होते हैं। इसलिए नकली अगुआओं के भ्रम और प्रभाव के तहत एक नया धर्म अस्तित्व में आ जाता है। इस तरह का नया धर्म 2,000 साल पहले के ईसाई धर्म की तरह है, जो परमेश्वर के मार्ग का पालन किए बिना, केवल मानवीय शब्दों और शिक्षाओं का समर्थन करता है, जैसे कि पौलुस या किसी अन्य शिष्य की शिक्षाएँ। नकली अगुआओं का हर काम गुमराह करने वाला होता है, और वे सत्य का अनुसरण करने के सामान्य और उचित मार्ग पर चलने वालों के रास्ते में बाधक बन जाते हैं। वे लोगों को सत्य का अनुसरण करने के सही रास्ते से ज़बरदस्ती हटा देते हैं और छद्म आध्यात्मिक रास्ते पर ले जाते हैं; वे उन्हें धार्मिक प्रणाली से विश्वास करने के रास्ते पर ले आते हैं। जब नकली अगुआ लोगों को भ्रमित करते, उनकी अगुआई और मार्गदर्शन करते हैं, तो वे लगातार ऐसे सिद्धांत, उक्तियाँ, कार्य या दृष्टिकोण प्रस्तुत करते हैं, जिनका सत्य से कोई लेना-देना नहीं होता, हालाँकि वे पूरी तरह से सही दिखाई देते हैं। ये चीज़ें सत्य के पूरी तरह से विपरीत और उससे पूरी तरह से असंबंधित होती हैं। लेकिन नकली अगुआओं के मार्गदर्शन में हर कोई इन चीज़ों को सत्य मानता है और वे सभी गलत ढंग से यह विश्वास करते हैं कि वे वास्तव में सत्य हैं। वे सोचते हैं कि अगर कोई व्यक्ति अच्छा बोलता है और उसके दिल में विश्वास है और वह अपने मुँह से आस्था को स्वीकार करता है, तो उस व्यक्ति ने सत्य प्राप्त कर लिया है। इन विचारों और मतों के भुलावे में आकर लोग न केवल सत्य-वास्तविकता में प्रवेश करने, या परमेश्वर के वचनों में प्रवेश करने या उन्हें अभ्यास में लाने, या उसके वचनों के भीतर रहने में असमर्थ हो जाते हैं, बल्कि परमेश्वर के वचनों से लगातार दूर भी हो जाते हैं। वे सब-कुछ परमेश्वर के वचनों के अनुसार करते प्रतीत होते हैं, लेकिन परमेश्वर के ये तथाकथित वचन परमेश्वर की अपेक्षाओं और उसकी इच्छा से कोई संबंध नहीं रखते। सत्य-सिद्धांतों से उनका कोई लेना-देना नहीं होता। फिर उनका किस चीज से लेना-देना होता है? नकली अगुआओं की शिक्षाओं, नकली अगुआओं के इरादों, और उन नकली अगुआओं की अपनी व्यक्तिगत इच्छाओं और समझ से। उनकी अगुआई का तरीका अधिक लोगों को धार्मिक कर्मकांडों और कठोर नियमों में, केवल सैद्धांतिक शब्दों में, ज्ञान और दर्शन की ओर ले जाता है। यद्यपि, मसीह-विरोधियों के विपरीत, नकली अगुआ दूसरों को अपने या शैतान के सामने नहीं लाते, किंतु फिर भी, लोगों का दिल इन पाखंडों और भ्रमों द्वारा नियंत्रित हो जाता है। जब इन पाखंडों और भ्रमों से ग्रस्त लोग, गलत ढंग से यह मान लेते हैं कि उन्होंने पहले ही जीवन प्राप्त कर लिया है, तो वे कट्टरपंथी हो जाते हैं, वे सत्य, परमेश्वर के वचनों और उसकी माँगों के परम शत्रु हो जाते हैं।

— "अंत के दिनों के मसीह की बातचीत के अभिलेख" में 'नकली अगुआओं की पहचान करना (2)' से उद्धृत

नकली अगुआ कभी भी सत्य-सिद्धांतों के बारे में सहभागिता नहीं करते, न ही वे कभी सत्य-सिद्धांतों की खोज करते हैं; वे समझते नहीं लेकिन समझने का ढोंग करते हैं, वे बूझते नहीं लेकिन बूझने का ढोंग करते हैं। वे स्पष्ट रूप से अगुआई का कार्य करने में असमर्थ हैं, वे आध्यात्मिक मामलों को नहीं समझते, वे सत्य को केवल सतही रूप से समझते हैं, और वे उन ऊँचाइयों को हासिल करने में असमर्थ हैं, जिन पर सत्य-सिद्धांतों को समझा जा सकता है—लेकिन फिर भी वे समझने का ढोंग करते हैं, बूझने का ढोंग करते हैं। अकसर जब वे काम करते हैं, तो या तो आँख मूँदकर अगुआई करते हैं या केवल नियमों का पालन करते हैं; वे बाहर से व्यस्त दिखते हैं, लेकिन उनके काम का कोई उल्लेखनीय प्रभाव नहीं पड़ता। चूँकि ये नकली अगुआ सत्य-सिद्धांतों को नहीं समझते, और अकसर केवल नियमों का पालन करते हैं और धारणाओं और कल्पना पर भरोसा करते हैं, इसलिए इससे उन विभिन्न कार्य-परियोजनाओं में, जिनके लिए वे जिम्मेदार होते हैं, असंतोषजनक प्रगति होती है और कोई महत्वपूर्ण परिणाम हासिल नहीं होता; उनकी अगुआई में अधिकतर लोग परमेश्वर की इच्छा या उन सत्य-सिद्धांतों को नहीं समझते, जिनका उस कार्य में पालन किया जाना अपेक्षित है। एकमात्र चीज, जिसे उनकी अगुआई में लोग समझते हैं, यह है, "हमें परमेश्वर की इच्छा के प्रति सचेत रहना चाहिए," "हमें अपने कर्तव्य के पालन में निष्ठावान होना चाहिए," "हमें पता होना चाहिए कि जब हमारे साथ कुछ होता है तो प्रार्थना कैसे करें," "जब हमारे साथ कुछ होता है तो हमें सत्य-सिद्धांतों की तलाश करनी चाहिए।" लोग अकसर इन मंत्रों और सिद्धांतों का उच्चारण करते हैं, फिर भी उन्हें सत्य-सिद्धांतों की थोड़ी-सी भी समझ नहीं होती। कई लोग किसी घटना से सामना होने पर प्रार्थना करते हैं, और अपना कर्तव्य निभाने में निष्ठावान होने की कोशिश करते हैं—लेकिन वास्तव में निष्ठावान होने के लिए उन्हें क्या करना चाहिए? वास्तव में परमेश्वर की इच्छा समझने के लिए उन्हें कैसे प्रार्थना करनी चाहिए? जब उनके सामने कोई समस्या आती है, तो उन्हें सत्य-सिद्धांतों की समझ हासिल करने के लिए कैसे खोज करनी चाहिए? ऐसे सवालों से सामना होने पर उनके पास कोई जवाब नहीं होता। वे अगुआ से पूछते हैं, और अगुआ कहता है, "जब तुम्हारे साथ कुछ हो जाए, तो परमेश्वर के वचनों को पढ़ने में अधिक समय लगाओ, अधिक प्रार्थना करो, अधिक सहभागिता करो, और शोध के लिए इंटरनेट का उपयोग करो।" वे कहते हैं, "तो इसमें सिद्धांत क्या है?" "इसे ऑनलाइन देखो, तुम्हें पता चल जाएगा। परमेश्वर के वचन पेशेवर काम के मामलों के बारे में कुछ नहीं कहते, और मैं उन्हें समझता भी नहीं। यदि तुम लोग समझना चाहते हो, तो इसे ऑनलाइन देखो—मुझसे मत पूछो। मैं सत्य को समझने में तुम लोगों की अगुआई करता हूँ, पेशेवर काम के मामलों में नहीं।" ऐसे गोलमोल शब्द होते हैं, जिनका नकली अगुआओं द्वारा इस्तेमाल किया जाता है। और इसका परिणाम क्या होता है? हालाँकि अधिकतर लोगों में अपना कर्तव्य निभाने का गहरा जज्बा होता है, लेकिन वे यह नहीं जानते कि सिद्धांत के भीतर कैसे कार्य करना है, और वे यह नहीं जानते कि सिद्धांत के भीतर अपना कर्तव्य ठीक से कैसे निभाया जाए। इस प्रकार, नकली अगुआओं द्वारा हाथ में ली गई विभिन्न कार्य-परियोजनाओं के परिणामों को देखते हुए यह कहा जा सकता है कि अधिकतर लोग अपने काम के संचालन में अपनी खुद की विशेषज्ञता, शैक्षणिक ज्ञान और पहले से सीखे गए कौशलों पर भरोसा करते हैं; ये लोग नहीं जानते कि परमेश्वर की विशिष्ट अपेक्षाएँ क्या हैं, परमेश्वर की गवाही देने के लिए उन्हें क्या करना चाहिए, परमेश्वर की गवाही देने के काम की क्षमता प्राप्त करने के लिए उन्हें क्या करना चाहिए, अधिक लोगों का ध्यान कैसे आकर्षित करें, अधिक रुचि कैसे पैदा करें, पेशेवर काम की प्रत्येक मद को अधिक असाधारण, अधिक अनुकरणीय, अधिक कुशल बनाने के लिए उन्हें क्या करना चाहिए, ताकि वह प्रशंसा प्राप्त करे और परमेश्वर को शर्मिंदा न करे। ऐसा क्यों है? इसका उतर सीधे नकली अगुआओं के काम से संबंध रखता है; इसका सीधा कारण यह है कि नकली अगुआ खुद नहीं जानते कि सत्य-सिद्धांत क्या हैं, वे नहीं जानते कि वे कौन-से सिद्धांत हैं जिन्हें लोगों को समझना चाहिए और जिनका उन्हें पालन करना चाहिए। वे स्वयं ऐसी चीजों से अनभिज्ञ हैं, न ही उन्होंने कभी परमेश्वर के वचनों में खोज करने या उन्हें सीधे ऊपरवाले से ग्रहण करने में लोगों की अगुआई की है। इससे अकसर ऐसी स्थितियाँ पैदा हो जाती हैं कि कार्य की विभिन्न मदों को फिर से करने की आवश्यकता पड़ जाती है। इससे न केवल वित्तीय और भौतिक संसाधन बरबाद होते हैं, बल्कि मानव-ऊर्जा और समय की एक बड़ी मात्रा भी बेकार हो जाती है। इस तरह की स्थिति और इस तरह के काम से उत्पन्न प्रभाव सीधे नकली अगुआओं के काम से संबंध रखते हैं; इनका नकली अगुआओं के काम करने के तरीके और उनकी अगुआई से सीधा संबंध है। यद्यपि यह दावा नहीं किया जा सकता कि नकली अगुआ उलटे-सीधे काम करते हैं, फिर भी यह कहना उचित है कि कई मामलों में वे जो कार्य करते हैं, वह परमेश्वर द्वारा अपेक्षित सिद्धांतों और मानकों के विपरीत होता है। एक और मामला यह भी है कि चूँकि वे सत्य-सिद्धांतों को नहीं समझते और दूसरों के साथ सत्य-सिद्धांतों के बारे में स्पष्ट रूप से सहभागिता करने में असमर्थ होते हैं, बल्कि वे लोगों को अपनी इच्छानुसार काम करने की खुली छूट देते हुए हस्तक्षेप न करने का दृष्टिकोण अपनाते हैं, इसलिए अनचाहे ही बहुत-से लोग पेशेवर काम से संबंधित कर्तव्य का पालन करते समय उस काम को स्थापित मानकों के अनुसार पूरा करने में सक्षम नहीं हो पाते। इससे बहुत-से लोग जो चाहे वह करने, जो वे अच्छी तरह से कर सकते हैं वही करने, और यह सोचने के लिए प्रेरित होते हैं कि वे चीजों को उसी तरह कर सकते हैं, जिस तरह वे ठीक समझते हैं। इस तरह, काम में ऐसी स्थिति और अवस्था उत्पन्न हो जाती है, लेकिन नकली अगुआ इस बारे में कुछ नहीं कर पाते। एक ओर तो वे शक्तिहीन होते हैं, और दूसरी ओर वे अपनी अज्ञानता, नपुंसकता, आध्यात्मिक समझ की कमी और झूठी आध्यात्मिकता के कारण लोगों को यह सोचने के लिए गुमराह कर देते हैं कि इस तरह से कार्य करना सही है, कि उन्हें केवल जज्बे की जरूरत है, कि परमेश्वर के घर में कोई भी अपने गुणों का अपनी इच्छानुसार किसी भी तरह से उपयोग कर सकता है, जब तक कि उसका उद्देश्य परमेश्वर की गवाही देना और अपना कर्तव्य निभाना हो। यह है नकली अगुआओं का रवैया और नजरिया उन सत्य-सिद्धांतों के बारे में, जिन्हें विभिन्न कर्तव्यों के लिए समझा जाना चाहिए, और यह तरीका है उनके काम करने का।

— "अंत के दिनों के मसीह की बातचीत के अभिलेख" में 'नकली अगुआओं की पहचान करना (3)' से उद्धृत

नकली अगुआ कभी भी खुद को समूह-पर्यवेक्षकों की वास्तविक स्थिति के बारे में सूचित नहीं रखते, या उन पर नजर नहीं रखते, न ही वे जीवन-प्रवेश से संबंधित स्थिति का कोई हिसाब-किताब रखने या उसे समझने की कोशिश करते हैं, इसके साथ ही, वे महत्वपूर्ण कार्य के लिए जिम्मेदार समूह-पर्यवेक्षकों और कार्मिकों के अपने कार्य और कर्तव्य के प्रति और परमेश्वर और उसमें विश्वास को लेकर उनके विभिन्न दृष्टिकोणों से खुद को अवगत रखने, उन पर नजर रखने या उन्हें समझने का प्रयास करते हैं; नकली अगुआ उनके रूपांतरणों, उनकी प्रगति या उनके काम के दौरान उभरने वाले विभिन्न मुद्दों के बारे में भी खुद को सूचित नहीं रखते, विशेष रूप से उन विभिन्न परिस्थितियों के बारे में, जो कार्य की हर समयावधि और चरण में उत्पन्न होती हैं, उनके कार्य को प्रभावित करती हैं और उसे नुक्सान पहुँचाती हैं। यदि वे ऐसी चीजों को समझने में असमर्थ रहते हैं, तो वे उन्हें तुरंत हल नहीं कर सकते—और यदि वे उन्हें तुरंत हल नहीं कर सकते, तो वे पर्यवेक्षकों द्वारा काम पर छोड़े गए नकारात्मक प्रभाव को तुरंत दूर करने में और उनके द्वारा की गई क्षति की तुरंत पूर्ति करने में भी असमर्थ रहेंगे। इस प्रकार, इस संबंध में, नकली अगुआओं ने अपनी जिम्मेदारी पूरी नहीं की है। अपनी जिमेदारियाँ पूरी न करना कर्तव्य से चूकना है; वे दूसरों का पर्यवेक्षण करने, उनके बारे में अधिक जानने, उनकी स्थिति पूरी तरह से समझने और उनकी निगरानी करने की अपनी भूमिका नहीं निभा रहे हैं। परमेश्वर के पास मनुष्य के हृदय में झाँकने की शक्ति है; मनुष्य के पास यह शक्ति नहीं है। इसलिए, मनुष्य को कड़ी मेहनत करनी चाहिए, उसे आलसी नहीं होना चाहिए, और उसे तत्परता से काम पूरा करना चाहिए। जाहिर है, इस कार्य को करते समय अपनी जिम्मेदारी पूरी करने में नकली अगुआ की विफलता कर्तव्य में एक गंभीर चूक है, ऐसी चूक, जिसके कारण कुछ पर्यवेक्षकों ने विभिन्न समस्याओं का प्रदर्शन किया है और अक्षम होने के बावजूद वे अपने पदों पर बने हुए हैं, जिससे अंततः काम में बार-बार देरी हो रही है, साथ ही हर तरह के मुद्दे बने हुए हैं और अनसुलझे रहे हैं। ये वे समस्याएँ हैं, जो नकली अगुआओं द्वारा पर्यवेक्षकों के बारे में जानकारी न रखने और उन पर नजर न रखने के परिणामस्वरूप उत्पन्न होती हैं। इन मुद्दों का संबंध इस बात से है कि क्या पर्यवेक्षक लापरवाही कर रहे हैं, और वे व्यावहारिक कार्य कर रहे हैं या नहीं। इन मुद्दों के संबंध में, चूँकि नकली अगुआ निरीक्षण नहीं करते और अकसर और अक्सर खुद को इस बात से अवगत नहीं रखते कि उनके अधीन क्या हो रहा है, और स्थिति की ताजा जानकारी नहीं रखते, इसलिए उन्हें इस बात की कोई भनक ही नहीं होती कि पर्यवेक्षक कितनी अच्छी तरह से काम कर रहे हैं, वे क्या प्रगति कर रहे हैं, और क्या वे व्यावहारिक कार्य कर रहे हैं या ऊपरवाले को जैसे-तैसे सँभालने के लिए सिर्फ मंत्रों का जाप कर रहे हैं और कुछ सतही उपक्रमों का उपयोग कर रहे हैं। किसी पर्यवेक्षक के काम के बारे में पूछे जाने पर और यह कि वह विशेष रूप से किस काम में संलग्न हैं, वे जवाब देते हैं, "मुझे नहीं पता—वैसे, जब मैं उनसे काम के बारे में बात करता हूँ, तो उन्होंने कभी कुछ और नहीं बताया।" यह है नकली अगुआओं के ज्ञान की सीमा; वे यह मान लेने की भूल करते हैं कि यदि पर्यवेक्षक ने अपनी जिम्मेदारियों से जी नहीं चुराया है और वह लगातार उपलब्ध है, तो यह इस तथ्य का व्यावहारिक प्रदर्शन है कि उसके साथ कोई समस्या नहीं है। इस तरह काम करते हैं नकली अगुआ; क्या यह उनके नकली होने का संकेत है? वे अपनी जिम्मेदारी निभाने में असफल हो रहे हैं या नहीं? यह कर्तव्य में भारी चूक है।

— "अंत के दिनों के मसीह की बातचीत के अभिलेख" में 'नकली अगुआओं की पहचान करना (3)' से उद्धृत

नकली अगुआओं के काम की मुख्य विशेषता यह है कि अपने नारे लगाने के बाद, अपने आदेश जारी करने के बाद वे बस मामले से पल्ला झाड़ लेते हैं। वे परियोजना के आगे के विकास के बारे में कोई सवाल नहीं पूछते; वे यह नहीं पूछते कि कोई समस्या, असामान्यता या कठिनाई तो उत्पन्न नहीं हुई। वे उसे सौंपते ही समाप्त मान लेते हैं। वास्तव में, परियोजना की प्रगति पर नजर रखना ऐसी चीज है, जिसे अगुआ कर सकते हैं। अगर तुम इन मामलों में एकदम नौसिखिया भी हो—अगर तुम्हें इसके बारे में कोई भी जानकारी न हो—तो भी तुम यह काम कर सकते हो; स्थिति की जाँच करने और सुझाव देने के लिए किसी ऐसे व्यक्ति को खोजो, जो जानकार हो, जो विचाराधीन कार्य को समझता हो। उनके सुझावों से तुम उपयुक्त सिद्धांतों की पहचान कर सकते हो, और इस तरह तुम काम पर नजर रखने में सक्षम हो सकते हो। चाहे तुम्हें विचाराधीन कार्य के प्रकार के बारे में कोई जानकारी या उसकी कोई समझ हो या नहीं, खुद को उसकी प्रगति से अवगत रखने के लिए तुम्हें कम से कम उसकी देखरेख अवश्य करनी चाहिए, उस पर नजर रखनी चाहिए, उसके बारे में पूछताछ करनी चाहिए और प्रश्न पूछने चाहिए। तुम्हें ऐसे मामलों पर पकड़ बनाए रखनी चाहिए; यह तुम्हारी जिम्मेदारी है, यह एक ऐसी भूमिका है, जो तुम्हें निभानी चाहिए। काम पर नजर न रखना—उससे पल्ला झाड़ लेना—नकली अगुआओं के कार्य हैं। कार्य की विशिष्ट मदों पर नजर रखने के लिए विशिष्ट कार्रवाई न करना—कार्य की इन विशिष्ट मदों की विशिष्ट प्रगति की कोई समझ या उन पर कोई पकड़ न होना—भी नकली अगुआ की अभिव्यक्ति है।

चूँकि नकली अगुआ कार्य की प्रगति की स्थिति को नहीं समझते, इसलिए इसमें अकसर बार-बार देरी होती रहती है। किसी खास काम में, चूँकि लोगों के पास सिद्धांतों की कोई समझ नहीं होती, और इसके अलावा, इसकी देखरेख के लिए कोई उपयुक्त व्यक्ति नहीं होता, इसलिए उस काम को अंजाम देने वाले लोग नकारात्मकता, निष्क्रियता और प्रतीक्षा की स्थिति में रहते हैं, जो कार्य की प्रगति को गंभीर रूप से प्रभावित करती है। यदि अगुआ ने शुरू में ही अपनी जिम्मेदारियाँ पूरी कर दी होतीं—यदि उसने कार्यभार सँभाल लिया होता, काम आगे बढ़ाया होता, काम में तेजी दिखाई होती, और मार्गदर्शन देने के लिए किसी ऐसे व्यक्ति को ढूँढ़ा होता जो संबंधित किस्म के काम को समझता है, तो बार-बार की देरी से नुकसान होने के बजाय काम और अधिक तेजी से प्रगति करता। तो अगुआओं के लिए काम की वास्तविक स्थिति को समझना और उस पर पकड़ रखना अति महत्वपूर्ण है। निस्संदेह अगुआओं के लिए यह समझना और जानना अत्यधिक आवश्यक है कि कार्य कैसे प्रगति कर रहा है—क्योंकि प्रगति कार्य की दक्षता और उस कार्य से अपेक्षित परिणामों से संबंध रखती है। अगर किसी अगुआ में इस बात की समझ की भी कमी है कि काम कैसे आगे बढ़ रहा है, तो यह कहा जा सकता है कि ज्यादातर समय काम धीरे-धीरे और सुस्त रफ्तार से विकसित होगा। अपने कर्तव्य का पालन करने में संलग्न अधिकतर लोग किसी ऐसे व्यक्ति की उपस्थिति के बिना धीरे-धीरे और सुस्ती से काम करेंगे, जिसमें दायित्व का बोध और उस तरह के कार्य की कुछ योग्यता हो, कोई ऐसा व्यक्ति जो उन्हें प्रेरित-प्रोत्साहित कर सके, पर्यवेक्षण और मार्गदर्शन उपलब्ध करा सके। यह ऐसे मामले में भी होता है, जब कोई आलोचना, अनुशासन, काट-छाँट या निपटान न हो। यह अत्यंत महत्त्वपूर्ण है कि अगुआ और कार्यकर्ता अपने कार्य की प्रगति की ताजा जानकारी और समझ रखें, क्योंकि अगुआओं के मार्गदर्शन, प्रेरणा और पूछने-जानने की कार्रवाई के बिना लोग आलसी हो जाते हैं, कार्य की प्रगति की नवीनतम जानकारी रखने वाले अगुआओं के बिना लोगों के धीमे पड़ने, सुस्त होने, असावधान हो जाने की संभावना होती है—अगर काम के प्रति उनका यही दृष्टिकोण रहता है, तो प्रगति और प्रभावशीलता गंभीर रूप से प्रभावित होगी। इन परिस्थितियों को देखते हुए, अगुआओं और कार्यकर्ताओं को चुस्ती से काम की हर मद पर नजर रखनी चाहिए और कर्मचारियों और काम से संबंधित स्थिति के बारे में अवगत रहना चाहिए। नकली अगुआ निस्संदेह इस काम में लापरवाह और उदासीन होते हैं; वे जिम्मेदारी लेने में असमर्थ होते हैं। और इसलिए, काम की वर्तमान स्थिति के संबंध में हो या उसकी प्रगति के संबंध में, नकली अगुआ हमेशा "सरपट भागते घोड़े की पीठ पर बैठे हुए रास्ते के फूलों की प्रशंसा करते हैं"; वे लापरवाह और उदासीन होते हैं, और साथ ही जैसे-तैसे काम निपटाने वाले भी; वे आडंबरपूर्ण और खोखले शब्द बोलते हैं, धर्म सिद्धांत का उपदेश देते हैं, और सिर्फ दिखावे के लिए काम करते हैं। आम तौर पर, नकली अगुआओं का काम करने का यही तरीका होता है। अगर मसीह-विरोधियों से उनकी तुलना करें तो, हालाँकि वे खुले तौर पर कुछ भी बुरा नहीं करते और जानबूझकर नुकसानदेह नहीं होते, लेकिन क्या काम के प्रति उनका रवैया दुष्टता को भी पीछे नहीं छोड़ देता? यद्यपि उनका कार्य अपनी प्रकृति में बुरा नहीं कहा जा सकता, फिर भी यह कहना उचित है कि प्रभावशीलता के दृष्टिकोण से उसकी प्रकृति लापरवाह और कामचलाऊ है, दायित्व का कोई बोध न होने की है; उनमें अपने काम के प्रति कोई निष्ठा नहीं होती।

— "अंत के दिनों के मसीह की बातचीत के अभिलेख" में 'नकली अगुआओं की पहचान करना (4)' से उद्धृत

अपने कार्य की वर्तमान स्थिति और प्रगति के बारे में जानकारी प्राप्त करने के लिए नकली अगुआ कभी काम की जगह पर नहीं जाते और जमीन पर वास्तविक स्थिति पर नजर नहीं रखते या विशिष्ट विवरणों को ठीक से समझने का प्रयास नहीं करते, जिससे वे समस्याओं को तुरंत पहचान और हल कर सकें और काम में उत्पन्न हो सकने वाली चूकों और असामान्यताओं को सुधार सकें। काम की वास्तविक विषय-वस्तु के संबंध में एकमात्र चीज जो वे करते हैं, वह है नारे लगाना और काम करने का दिखावा करना। सभी परियोजनाओं में, कार्य के बारे में उनकी सहभागिता कार्यस्थल में कहीं नहीं देखी जाती। वे कभी भी विशिष्ट समस्याएँ हल करने की या कार्य में विशिष्ट समस्याओं या असामान्यताओं की पहचान करने की क्षमता दिखाने की कोशिश करते नहीं देखे जाते, कार्य में आ सकने वाली समस्याओं, असामान्यताओं और चूकों को शीघ्रता से दूर करते, सुधारते या ठीक करते हुए देखे जाना तो दूर की बात है। ऐसी ही विभिन्न प्रकार की समस्याएँ नकली अगुआओं के काम में दिखाई देती रहती हैं। हालाँकि नकली अगुआ जानबूझकर कोई हस्तक्षेप या रुकावट पैदा नहीं करते, हालाँकि वे अपना खुद का राज्य खड़ा करने की कोशिश नहीं करते, हालाँकि वे खुलेआम तानाशाहों की तरह कार्य नहीं करते या मसीह-विरोधियों से जुड़े कुछ विशिष्ट कार्य या व्यवहार प्रदर्शित नहीं करते, और हालाँकि उन्हें मसीह-विरोधियों के रूप में वर्गीकृत नहीं किया जा सकता, फिर भी नकली अगुआओं की मानवता और उनके विभिन्न क्रिया-कलाप उनके कार्य की प्रगति, दक्षता और प्रभावशीलता को प्रभावित करते हुए बहुत बड़ी समस्या और बाधा पैदा करते हैं। कभी न खत्म होने वाली समस्याएँ, ऐसी समस्याएँ जो कभी हल नहीं होतीं, नकली अगुआओं के काम की एक स्थायी विशेषता है। चाहे वे किसी भी प्रकार के काम में संलग्न हों, नकली अगुआओं की भूमिका दिखावा करने, नारे लगाने और सिद्धांत का उपदेश देने के अलावा कुछ नहीं होती; वे चीन के गाँवों में सार्वजनिक घोषणा करने वाले लाउडस्पीकरों की तरह हैं, जो जनता के लिए इन घोषणाओं का प्रसारण करते हैं, इससे ज्यादा कुछ नहीं। यह एकमात्र ऐसा काम है, जो वे कर सकते हैं। ये नकली अगुआ इस बात से पूरी तरह से अनभिज्ञ होते हैं कि उनके अधीनस्थ क्या कर रहे हैं, उसे वे कितनी अच्छी तरह से कर रहे हैं और विशिष्ट विवरण से संबंधित ऐसे कई अन्य प्रश्न। उनमें इन चीजों का पता लगाने, इनमें भाग लेने, जमीनी स्तर के लोगों के साथ खुद को गहराई से जोड़ने, या जमीन पर वास्तव में जो कुछ हो रहा है उसकी गहरी पड़ताल करने की कोई इच्छा नहीं होती, जिससे कार्य के प्रत्येक अंश की विशिष्ट प्रगति और उससे जुड़ी विशिष्ट गतिविधियों की और अधिक जानकारी प्राप्त की जा सके और उसे समझा जा सके। और इसलिए, हालाँकि नकली अगुआओं की श्रेणी के लोग अपना राज्य स्थापित करने का प्रयास नहीं करते या अगुआ के रूप में अपने समय के दौरान जानबूझकर हस्तक्षेप नहीं करते और रुकावट नहीं डालते, फिर भी एक वस्तुनिष्ठ परिप्रेक्ष्य से, वे काम और उसकी प्रगति में देरी का कारण बनते हैं; वे उस भूमिका को निभाने में असमर्थ होते हैं जो एक अगुआ को निभानी चाहिए, वे निष्ठा रखने या जिम्मेदारी उठाने में सक्षम नहीं होते, और न ही वे उस कार्य में मार्गदर्शन और प्रेरणा प्रदान करने में सक्षम होते हैं, जिसके लिए वे जिम्मेदार माने जाते हैं, ताकि वह कार्य हर चरण में सुचारु रूप से आगे बढ़े। तो क्या यह कहना उचित है कि नकली अगुआओं की श्रेणी में आने वाले लोगों में कोई निष्ठा या दायित्व-बोध नहीं होता? चाहे वे जानबूझकर अपने काम से जी चुराते हों या वास्तव में उसे करने में असमर्थ हों, अंतत: वे परमेश्वर के घर के काम को नकारात्मक रूप से प्रभावित करते हैं; वे उसमें देरी का कारण बनते हैं और उसे सही पटरीपर आने से रोकते हैं, वे काम के दौरान होने वाली समस्याओं के समाधान को रोकते हैं और काम के सुचारु विकास में बाधा बन जाते हैं। काम में शामिल लोग इसीलिए सत्य-सिद्धांतों को नहीं समझ पाते; यह भी एक समस्या है, जो उस काम की अवधि के दौरान हल नहीं हो पाती, जिसके लिए नकली अगुआ जिम्मेदार होता है।

— "अंत के दिनों के मसीह की बातचीत के अभिलेख" में 'नकली अगुआओं की पहचान करना (4)' से उद्धृत

काम की विभिन्न मदों को अंजाम देते हुए, वास्तव में कई समस्याएँ, असामान्यताएँ और चूकें होती हैं, जिन्हें नकली अगुआओं को हल करना चाहिए, सुधारना चाहिए और ठीक करना चाहिए—लेकिन चूँकि उनमें कोई दायित्व-बोध नहीं होता, चूँकि वे केवल एक सरकारी अधिकारी की भूमिका निभा सकते हैं और वास्तविक कार्य नहीं करते, जिसके परिणामस्वरूप वे एक विनाशकारी समस्या का कारण बन जाते हैं, ऐसी समस्या कि कुछ समूह अपनी एकता तक खो बैठते हैं, और समूह के सदस्य एक-दूसरे को नीचा दिखाने लगते हैं, एक-दूसरे के प्रति शंकालु और चौकन्ने हो जाते हैं, यहाँ तक कि वे परमेश्वर के घर के प्रति भी चौकन्ने हो जाते हैं। जब नकली अगुआओं के सामने यह स्थिति आती है, तो वे कोई विशिष्ट कदम नहीं उठाते। उनका कार्य पक्षाघात की स्थिति में पड़ा रहता है, और इससे नकली अगुआओं को थोड़ी-सी भी पीड़ा नहीं होती कि उनका कार्य अर्ध-विघटन की स्थिति में पहुँच गया है; वे कोई वास्तविक कार्य करने के लिए खुद को तैयार नहीं कर पाते, और इसके बजाय ऊपरवाले द्वारा नीचे आदेश भेजे जाने की प्रतीक्षा करते हैं, जिसमें उन्हें यह बताया गया हो कि उन्हें क्या करना है और क्या नहीं करना, मानो उनका काम केवल ऊपरवाले के लिए किया जाता हो—और यदि ऊपरवाला कोई विशिष्ट अपेक्षाएँ संप्रेषित नहीं करता, कोई विशिष्ट आदेश या निर्देश नहीं देता, तो वे कुछ नहीं करते, तब भी नहीं, जब वे ऐसा कुछ देखते हैं जिसे करना आवश्यक होता है। या अगर ऊपरवाला केवल सिद्धांत प्रदान करता है, तो उन्हें कुछ न करने का एक और भी बेहतर बहाना मिल जाता है। नकली अगुआ क्या होते हैं? संक्षेप में, वे कोई विशिष्ट कार्य नहीं करते, वे विशिष्ट कार्य में भाग नहीं लेते, वे विशिष्ट समस्याओं की पहचान करने या उन्हें हल करने में असमर्थ होते हैं, वे विशिष्ट कार्य के लिए सही मार्गदर्शन, सहायता और पोषण देने में असमर्थ होते हैं, जिससे कार्य की दिशा और सिद्धांतों के लिए मानक स्थापित किए जा सकें, और वे विशिष्ट कार्य के कार्यान्वयन के लिए सक्रियता से विशिष्ट माँगें करने और विशिष्ट योजनाएँ प्रस्तावित करने में तो बिलकुल भी सक्षम नहीं होते; वे बससभाओं में भाग लेते हैं, नारे लगाते हैं और निरुद्देश्य इधर-उधर भटकते हैं; वे परमेश्वर के घर द्वारा आदेशित वे कार्य और वे जिम्मेदारियाँ पूरी नहीं करते, जिन्हें पूरा करने की उनसे अपेक्षा की जाती है। एक झूठा अगुआ ऐसा ही होता है।

— "अंत के दिनों के मसीह की बातचीत के अभिलेख" में 'नकली अगुआओं की पहचान करना (4)' से उद्धृत

जिस कार्य के लिए नकली अगुआ जिम्मेदार होते हैं, उसके दायरे में, कुछ लोग जो वास्तव में सत्य का अनुसरण करते हैं और उन्नत तथा विकसित किए जाने के लिए उपयुक्त होते हैं, अकसर दबा दिए जाते हैं। इनमें से कुछ लोग सुसमाचार फैलाते हैं, और कुछ खाना बनाने के लिए रखे जाते हैं। वास्तव में, वे काम करने में सक्षम होते हैं, भले ही वे इसका प्रदर्शन न करें—फिर भी नकली अगुआ इससे आँखें मूँदे रहता है, और उन लोगों के साथ न तो जुड़ता है और न ही उनके बारे में पूछताछ करता है। इस बीच, थोड़ी विशेष प्रतिभा वाले लोगों, चापलूसों को, जो सबके सामने आना पसंद करते हैं, चिकनी-चुपड़ी बात करने वाले होते हैं, और जो पद और हैसियत पाने की इच्छा रखते हैं, पदोन्नत करके नीचे से ऊपर लाया जाता है, यहाँ तक कि जिन्होंने ग्राम प्रमुखों और सचिवों के रूप में समाज की सेवा की थी, और जो कॉर्पोरेट एक्जीक्यूटिव थे, और जिन्होंने बिजनेस मैनेजमेंट का अध्ययन किया था, उन सभी को महत्वपूर्ण पद दे दिए जाते हैं। चाहे ये लोग सच्चे विश्वासी हों या नहीं, या वे सत्य का अनुसरण करते हों या नहीं—जहाँ कहीं भी नकली अगुआ काम के लिए जिम्मेदार होते हैं, इन्हें पदोन्नत किया जाता है और प्रमुख पद दिए जाते हैं। क्या यह वैसा ही नहीं है, जैसा समाज में होता है? नकली अगुआओं के कार्यकाल में वे मेहनती कार्यकर्ता, जो वास्तव में कष्ट सह सकते हैं, जिनमें धार्मिकता की भावना होती है, जो सकारात्मक चीजों से प्रेम करते हैं, और जिन्हें वास्तव में पदोन्नत और विकसित किया जाना चाहिए, पर नहीं किया जाता—उनके पास प्रशिक्षित किए जाने का शायद ही कोई मौका होता है, जबकि खराब क्षमता और दुष्ट मानवता वाले लोग, जो कार्य करने के लिए उत्सुक होते हैं, दिखावा करना पसंद करते हैं और जिनमें कोई वास्तविक प्रतिभा नहीं होती, परमेश्वर के घर में महत्वपूर्ण कार्यों और निरीक्षक के पदों पर कब्जा कर लेते हैं। इससे परमेश्वर के घर के अधिकांश कार्यों में देरी होती है और वह परमेश्वर के घर की अपेक्षानुसार सुचारु रूप से और उस दक्षता के साथ प्रगति करने में असमर्थ रहता है और सिद्धांतों के अनुसार नहीं किया जाता, और इससे परमेश्वर के घर की अपेक्षाओं के कार्यान्वयन में विफलता मिलती है। यह नकली अगुआओं द्वारा लोगों के अनुचित नियोजन का परिणाम और प्रभाव है।

नकली अगुआ खराब क्षमता वाले, आँख और दिल के अंधे होते हैं, और वे सत्य-सिद्धांतों को नहीं समझते, जो अपने आप में एक बहुत गंभीर समस्या है। लेकिन उनकी एक और भी अधिक गंभीर समस्या होती है, जो यह है कि जब वे सिद्धांत के कुछ अक्षर और शब्द समझ लेते हैं और उनमें महारत हासिल कर लेते हैं और कुछ नारे लगा सकते हैं, तो उन्हें लगता है कि वे सत्य-वास्तविकता को समझते हैं। वे जो भी कार्य करते हैं और जिसे भी नियोजित करने के लिए चुनते हैं, उसमें वे खोज और विचार-विमर्श तथा दूसरों के साथ सहभागिता नहीं करते, कार्य-व्यवस्थाओं और परमेश्वर के घर के सिद्धांतों को विस्तार से जाँचने की तो बात ही छोड़ो। वे पूरी तरह से आश्वस्त होते हैं, और यह मानते हैं कि वे जो सोचते हैं, वही किया जाना चाहिए और वे जो कुछ मानते हैं, वही सही है, कि वह सब सिद्धांतों के अनुरूप है। वे गलत ढंग से यह भी मानते हैं कि कई वर्षों तक कार्य करने के बाद उनके पास परमेश्वर के घर में एक अगुआ के रूप में सेवा करने का पर्याप्त अनुभव है, कि वे जानते हैं कि परमेश्वर के घर का कार्य कैसे संचालित और विकसित होता है, और यह सब उनके हृदय में है। वे परमेश्वर के घर के काम को मापते हैं और उसे अपने अनुभव, अपनी धारणाओं और कल्पनाओं के अनुसार करते हैं, जिससे उनके कार्यकाल के दौरान परमेश्वर के घर का काम गड़बड़, अराजक और अव्यवस्थित हो जाता है। अगर, किसी समूह के भीतर कुछ सक्षम लोग हैं, ऐसे लोग जो कष्ट सह सकते हैं, कीमत चुका सकते हैं और अपने कर्तव्य निष्ठा के साथ निभा सकते हैं, तो वे जो काम करते हैं वह अच्छी तरह से किया जाता रहेगा, लेकिन इसका नकली अगुआ से कोई लेना-देना नहीं है। और जहाँ ऐसे लोग नहीं होते, वहाँ किए जा रहे कार्य में नकली अगुआ जरा भी काम का नहीं हो सकता। एक तो इसलिए, कि नकली अगुआ काम के लिए सही लोगों को नहीं चुनेगा, जो यह सुनिश्चित करें कि काम आगे बढ़े, प्रगति करे और सुधरे; और दूसरा इसलिए, कि जहाँ काम में एक कड़ी कमजोर है, वहाँ वे सकारात्मक और सक्रिय रूप से भाग नहीं लेते, न ही उसे ब्योरेवार सिखाते हैं। उदाहरण के लिए, मान लो, काम के किसी बैच में, उस काम को करने वाले कई लोग नए विश्वासी हैं जिनका आधार पुख्ता नहीं है, जो सत्य को अच्छी तरह से नहीं समझते, कार्य से बहुत परिचित नहीं हैं, और कार्य के सिद्धांतों को पूरी तरह से नहीं समझ पाए हैं। अंधा होने के कारण नकली अगुआ इन समस्याओं को नहीं देख सकता। उनका मानना है कि अगर कोई काम कर रहा है, तो यह मायने नहीं रखता कि वह अच्छी तरह से किया जा रहा है या खराब ढंग से। वे नहीं जानते कि काम में सभी कमजोर कड़ियों की जाँच की जानी चाहिए, उन्हें अकसर देखा जाना चाहिए, अकसर सहायता की जानी चाहिए, यहाँ तक कि उनके व्यक्तिगत निरीक्षण और भागीदारी, कार्य के संबंध में उनके व्यक्तिगत परामर्श और उनकी निरंतर सहायता की भी आवश्यकता हो सकती है, जब तक कि वे लोग सत्य को समझ न लें और सही रास्ते पर न चल पड़ें। केवल उपयुक्त निरीक्षकों के होने से ही उनकी चिंता समाप्त हो सकती है। लेकिन नकली अगुआ इस तरह से काम नहीं करते। वे यह नहीं समझते कि यह उनका काम है, इसलिए अपने काम के दायरे में वे सारे काम और सभी लोगों को एकसमान मानते हैं। वे उन जगहों पर ज्यादा नहीं जाते, जहाँ काम में कमजोर कड़ियाँ होती हैं या जहाँ कोई उपयुक्त व्यक्ति प्रभारी नहीं होता, न ही वे किए जाने वाले विशिष्ट कार्यों में सलाह देते हैं और न उनमें व्यक्तिगत रूप से भाग ही लेते हैं; और जहाँ कोई उपयुक्त और कार्य करने में सक्षम व्यक्ति निरीक्षण कर रहा होता है, वहाँ वे जाकर काम की जाँच नहीं करते या उसमें मार्गदर्शन प्रदान नहीं करते, न ही वे काम के विवरण में व्यक्तिगत रूप से भाग लेते हैं, और वे वहाँ निरीक्षक की खूबियों का अनुकरण करने की कोशिश तो निश्चित रूप से नहीं करते। संक्षेप में, नकली अगुआ कार्य की बारीकियाँ पूरी नहीं करते। उनका मानना है कि चाहे कोई भी काम हो, अगर कर्मचारी जगह पर हैं और निरीक्षक चुन लिया गया है, तो सब-कुछ बढ़िया है। उनका मानना है कि उनके लिए वहाँ करने को और कुछ नहीं है और इससे उनका कुछ लेना-देना नहीं रह गया है, उन्हें बस इतना करना है कि समय-समय पर एक सभा आयोजित कर ली जाए और कोई समस्या उत्पन्न होने पर फोन कर लिया जाए। इस तरह से काम करके भी नकली अगुआ सोचते हैं कि वे अच्छा काम कर रहे हैं और यह सोचकर खुद से काफी खुश रहते हैं, "किसी भी कार्यक्रम में कोई समस्या नहीं है। कर्मचारी बड़े करीने से व्यवस्थित किए गए हैं, और निरीक्षक अपनी जगह पर हैं। मैं इस काम में इतना अच्छा, इतना प्रतिभाशाली कैसे हूँ?" क्या यह बेशर्मी नहीं है? वे आँख और दिल के इतने अंधे होते हैं कि उन्हें करने को कोई काम नहीं दिखता और उन्हें कोई समस्या नहीं मिल पाती। कुछ जगहों पर काम रुक गया है, फिर भी वे यह सोचकर संतुष्ट हैं कि उस जगह के सभी भाई-बहन युवा और नया खून हैं, कि वे अपने कर्तव्यों का निर्वाह जोश-खरोश के साथ करेंगे और वे निश्चित रूप से काम अच्छी तरह से करने में सक्षम होंगे, जबकि वास्तव में वे युवा लोग कुछ भी नहीं समझते और कुछ नहीं कर सकते। ऐसे लोग भी हैं, जो किसी कार्य के बारे में थोड़ा-बहुत जानते हैं, लेकिन वे जो कुछ भी करते हैं, वह वैसा नहीं होता जैसा उसे होना चाहिए। वे जो कुछ भी करते हैं, उसमें से कुछ भी सैद्धांतिक नहीं होता, और उसमें सुधार और सतत पुनरीक्षण की आवश्यकता होती है। काम में ऐसी व्यापक खामियाँ होती हैं; और ऐसी बहुत-सी बातें होती हैं जिन्हें ये कर्मचारी नहीं समझते; और ऐसे बहुत-से सिद्धांत हैं जिनके बारे में उनके साथ सहभागिता करने की आवश्यकता है, बहुत सारे मामले हैं जिनमें उन्हें मार्गदर्शन की आवश्यकता है, बहुत सारी समस्याएँ हैं जिन्हें हल करने की आवश्यकता है ... और नकली अगुआ कुछ नहीं देख सकता, न ही उसे कोई समस्या मिलती है, फिर भी वह खुद को बिलकुल ठीक समझता है। तो फिर, पूरे दिन उनके विचार कहाँ लगे रहते हैं? वे सोच रहे होते हैं कि कैसे, एक पदाधिकारी के नाते, वे हैसियत का आनंद ले सकते हैं। नकली अगुआ हृदयहीन होता है।

— "अंत के दिनों के मसीह की बातचीत के अभिलेख" में 'नकली अगुआओं की पहचान करना (5)' से उद्धृत

जब अगुआ और कार्यकर्ता काम का संचालन कर रहे हों, तो उन्हें उस काम के दौरान आने वाली समस्याओं को तुरंत पहचानना और हल करना चाहिए, उन्हें काम के दौरान आने वाली समस्याओं पर सहभागिता, चर्चा और बहस करनी चाहिए। जब उन समस्याओं के बारे में बार-बार सहभागिता, चर्चा और बहस करने का कोई परिणाम न निकले, या जब कोई स्पष्ट रूप से यह न बता सके कि क्या करना उचित है, बल्कि चीजों को और अस्पष्ट कर दे, तो ऐसे समय में अगुआओं और कार्यकर्ताओं को अपनी जिम्मेदारी निभानी चाहिए और फौरन समस्या को हल करने के लिए समाधान और दृष्टिकोण सुझाना चाहिए, और तुरंत देखना, जानना और आकलन करना चाहिए कि चीजें किस तरह से आगे बढ़ रही हैं। किसी ऐसे मुद्दे की पहचान करने के बाद, जिस पर कोई सार्थक बहस नहीं हो सकती और जिसके बारे में किसी निष्कर्ष पर नहीं पहुँचा जा सकता, उन्हें उसके बारे में ऊपरवाले को सूचित करने और उससे परामर्श करने में देर नहीं करनी चाहिए; उन्हें प्रतीक्षा नहीं करनी चाहिए, न ही मुद्दे को सुलझाने का कोई सिद्धांतहीन प्रयास करना चाहिए, उसे टालना या अनदेखा तो बिलकुल नहीं करना चाहिए। क्या तुम लोगों के मौजूदा अगुआ और कार्यकर्ता इसी तरह काम करते हैं? सभी तरह के अंतर्विरोधों और छोटी-मोटी समस्याओं की पहचान करते हुए उन्हें तुरंत आगे का कार्य करना चाहिए, निगरानी करनी चाहिए और मिलकर कार्य को आगे बढ़ाना चाहिए। जब उन्हें बड़ी समस्याओं का पता लगे, तो अगुआओं और कार्यकर्ताओं को समस्या के स्थान पर होना चाहिए, पूरे मामले की सटीक समझ और विस्तृत पकड़ होनी चाहिए, कि समस्या कैसे उत्पन्न हुई, इसमें किस-किस तरह के लोग शामिल थे, और समस्या के बारे में विभिन्न प्रकार के लोगों के क्या विचार हैं; उन्हें उन समस्याओं के बारे में सहभागिता और चर्चा, यहाँ तक कि बहस में भी भाग लेना चाहिए—उन्हें भाग अवश्य लेना चाहिए; भाग लेना बहुत महत्वपूर्ण है। भाग लेने से तुम्हें काम में उत्पन्न होने वाली समस्याओं का आकलन और समाधान करने में मदद मिलती है। अगर तुम केवल सुनते हो और चर्चा में भाग नहीं लेते, अगर तुम हमेशा किनारे से देखते रहते हो, अगर तुम हमेशा केवल बाहरी अवलोकनकारी बने रहते हो, और सोचते हो कि काम के दौरान आने वाली किसी भी समस्या का तुमसे कोई लेना-देना नहीं, और उनके प्रति तुम्हारा कोई विचार या दृष्टिकोण नहीं है, तो तुम स्पष्ट रूप से एक नकली अगुआ हो।

— "अंत के दिनों के मसीह की बातचीत के अभिलेख" में 'नकली अगुआओं की पहचान करना (7)' से उद्धृत

छद्म-आध्यात्मिक प्रकार के नकली अगुआओं का मानना है कि काम करने का अर्थ है शब्दों और सिद्धांतों का उपदेश देना, मंत्रों को दोहराना, बेमन से काम करना, परमेश्वर के वचनों से वाक्यांशों का उपदेश देना; वे नहीं जानते कि वास्तव में कैसे काम करना है, या अगुआओं और कार्यकर्ताओं के कर्तव्य वास्तव में क्या हैं, न ही यह कि परमेश्वर का घर किसी व्यक्ति को अगुआ या कार्यकर्ता के रूप में क्यों चुनता है, यह कौन-सी समस्या हल करने के लिए है। इस प्रकार, चाहे तुम कैसे भी इस बारे में सहभागिता करो कि उन्हें अपने काम में कैसे जुटना चाहिए, कैसे उसे पूरी तरह अपने नियंत्रण में रखना चाहिए, कैसे उसके भीतर की समस्याओं की पहचान करनी चाहिए, इत्यादि, वे उसमें से कुछ भी आत्मसात नहीं करते, न ही वे अपनी सुनी हुई किसी भी चीज को समझते हैं। परमेश्वर का घर अगुआओं और कार्यकर्ताओं से जो कहता है, वे उस पर अमल करने में असमर्थ रहते हैं, और वे उसे कभी हासिल नहीं करेंगे। वे काम से संबंधित सभी प्रकार की समस्याओं—कर्मचारियों से जुड़े मुद्दे, सिद्धांत के प्रश्न, प्रौद्योगिकी से जुड़े या पेशागत मुद्दे—की पहचान करने में विफल रहते हैं। और इसलिए, ऐसे छद्म-आध्यात्मिक लोगों की अगुआई में कर्मचारियों से जुड़े मुद्दों और अन्य कार्य-समस्याओं की धारा निरंतर बहती रहती है; प्रौद्योगिकी से जुड़े या पेशागत मुद्दे भी आते रहते हैं, जमा होते रहते हैं, और जितना अधिक वे जमा होते हैं, उतनी ही अधिक समस्याएँ उत्पन्न होती हैं। इन नकली अगुआओं की जिम्मेदारियों के दायरे में कर्मचारियों और काम से जुड़े मामले और भी अधिक अराजक हो जाते हैं, और कार्य-निष्पादन और दक्षता में अधिकाधिक गिरावट आती है। जहाँ तक लोगों का प्रबंधन करने की बात है, तो जो कुछ हद तक कुशल और सहज वक्ता होते हैं, उन्हें कार्यभार सँभालने दिया जाता है—वे अपना रास्ता तलाश लेते हैं और काम व लोगों को नियंत्रित करने में सक्षम होते हैं। दुष्टों पर अंकुश नहीं लगाया जाता, उन्हें रोका या परिष्कृत नहीं किया जाता, और ईमानदारी से अपने कर्तव्य का पालन करने वाले कुछ लोग इतने परेशान हो जाते हैं कि वे नकारात्मक और कमजोर हो जाते हैं, वे अपना कर्तव्य निभाने या परमेश्वर के वचनों को खाने और पीने के इच्छुक नहीं रहते। वे अपने कर्तव्य में विश्वास खो देते हैं, परमेश्वर में विश्वास खो देते हैं, और सत्य के अनुसरण में विश्वास खो देते हैं। जिन लोगों के पास कुछ कौशल होते हैं, जो तकनीकी रूप से प्रवीण होते हैं, उनका उपयोग ठीक से नहीं किया जाता। कौन अच्छा व्यक्ति है और कौन बुरा, किसमें क्षमता है और किसमें नहीं, किसे विकसित किया जाना चाहिए और किसे नहीं, इनके बीच की रेखाएँ धुँधली पड़ जाती हैं—पूरी अराजकता व्याप्त रहती है। किंतु छद्म-आध्यात्मिक नकली अगुआ इसके प्रति पूरी तरह से आँखें मूँदे रहते हैं; वे इसे नहीं देख पाते। जब कर्मचारियों से जुड़े मुद्दों की बात आती है, तो किसे परिष्कृत करना है, किसे निष्कासित करना है, किस पर लगाम लगानी है और किसे पदोन्नत करना है, इसके संबंध में जिन सिद्धांतों का पालन किया जाना चाहिए, उसके बारे में परमेश्वर का घर चाहे कुछ भी सहभागिता करे और जोर दे, छद्म आध्यात्मिक अगुआ जो कुछ भी सुनते हैं, उसे समझते-बूझते नहीं। वे निर्विवाद रूप से अपने छद्म-आध्यात्मिक दृष्टिकोणों से चिपके रहते हैं। ये नकली अगुआ सोचते हैं कि उनकी व्याख्याओं और संरक्षण के कारण प्रत्येक व्यक्ति के पास निभाने के लिए एक भूमिका है; कहीं कोई अव्यवस्था नहीं है, हर कोई अच्छा काम कर रहा है, उन सभी में आस्था है, और वे सभी अपना कर्तव्य निभाने को तैयार हैं। उनका मानना है कि कोई भी जेल जाने या खतरा उठाने से नहीं डरता, क्योंकि सभी में सहन करने का धीरज है, और कोई भी यहूदा बनने का इच्छुक नहीं है। इन अगुआओं को लगता है कि सब-कुछ बढ़िया चल रहा है। चाहे कितनी भी गंभीर समस्याएँ उत्पन्न हो जाएँ या कितने भी बुरे लोग दिखाई दें, चाहे समस्या कितनी भी स्पष्ट क्यों न हो, वे उसे नहीं देखते। अगर वे देखते भी हैं, तो वे नहीं जानते कि यह एक समस्या है, और अगर वे जानते भी हैं कि यह एक समस्या है, तो वे नहीं जानते कि इसे कैसे हल किया जाए। इसी तरह, छद्म-आध्यात्मिक अगुआ उन असंख्य समस्याओं से और भी अधिक आँखें मूँदे रहते हैं, जो उस काम के दौरान सामने आती हैं जो सिद्धांतों के विपरीत होता है। वे कहते हैं, "मैंने उन्हें कार्य-सिद्धांत बता दिए हैं जो मुझे बताने चाहिए थे, मैंने उन्हें बार-बार समझाया है, यहाँ तक कि लोगों से उन्हें लिख लेने के लिए भी कहा है।" लेकिन क्या उन्होंने यह सब सही व्यक्ति को बताया है, क्या उनकी बताई बातें सही, सिद्धांतों के अनुरूप, परमेश्वर के वचनों के अनुरूप और व्यावहारिक हैं—यह वे नहीं जानते। जहाँ तक उनके द्वारा प्रदत्त सिद्धांत के निवाले की बात है, तो किस तरह के लोग उसे पचाकर संतुष्ट हो सकते हैं? वे, जो मूर्ख और अज्ञानी हैं, अशिक्षित हैं, मंदबुद्धि हैं, अहमक हैं, बेवकूफ हैं। ये लोग उलझ जाते हैं, वे मानते हैं कि ये सब परमेश्वर के वचन हैं, और इसमें से कुछ भी गलत नहीं हो सकता। केवल ऐसे लोग ही इस सिद्धांत से संतुष्ट हो सकते हैं। छद्म-आध्यात्मिक अगुआ काम के दौरान उत्पन्न होने वाली समस्याओं की पहचान करने में असमर्थ होते हैं; वे उनसे आँखें मूँदे रहते हैं। और बेशक, वे प्रौद्योगिकी या विशेषज्ञता से जुड़ी चीजों से और भी अधिक आँखें मूँदे रहते हैं—ये चीजें उनके वश के और भी बाहर हैं।

— "अंत के दिनों के मसीह की बातचीत के अभिलेख" में 'नकली अगुआओं की पहचान करना (8)' से उद्धृत

छद्म-आध्यात्मिक नकली अगुआओं की मुख्य विशेषता क्या है? वे उपदेश देने में माहिर होते हैं। लेकिन जिसका वे उपदेश देते हैं, वह सच्चा मार्ग नहीं है, और यह वह मार्ग नहीं है जिसका उपदेश परमेश्वर देता है। यह सत्य का मार्ग नहीं है, बल्कि यह केवल शाब्दिक सिद्धांत है। वे शाब्दिक सिद्धांत का उपदेश देने में अच्छे हैं, परमेश्वर के वचनों के मात्र शब्दों और पाठों पर कड़ी मेहनत करने में अच्छे हैं, चाहे उनका पाठ करना हो या उन पर विचार करना। संक्षेप में, जब सिद्धांत का उपदेश देने की बात आती है, तो वे विशेष रूप से मेहनती और दृढ़ निश्चयी होते हैं। बाहर से, वे जो कुछ भी करते हैं, वह सत्य के लिए प्रासंगिक प्रतीत होता है; वे बाधा पहुँचाते या हस्तक्षेप करते, अनुचित व्यवहार करते, या गलत बात कहते या गलत काम करते प्रतीत नहीं होते। और फिर भी, वे कोई व्यावहारिक कार्य करने या थोड़ी-सी भी जिम्मेदारी पूरी करने में असमर्थ होते हैं, जिसके कारण अंततः वे काम में किसी समस्या की पहचान करने में असमर्थ हो जाते हैं। वे अंधे आदमी की तरह काम करते हैं; वे अंधे होते हैं, वे समस्या को देख नहीं सकते, उसकी पहचान नहीं कर सकते, और इसलिए क्या वे तुरंत समस्या की सूचना देने और खोज में जुटने में सक्षम हैं? बिलकुल नहीं। क्या छद्म-आध्यात्मिक नकली अगुआओं की समस्या एक गंभीर समस्या है? क्या ऐसे लोग घृणित हैं, क्या वे घिनौने हैं? (वे घिनौने हैं।) वे मानते हैं कि उनके पास व्यवसाय की कुछ तरकीबें हैं क्योंकि वे सिद्धांत का कुछ उपदेश देने और परमेश्वर के कई वचनों का पाठ करने में सक्षम हैं, क्योंकि वे लोगों से परमेश्वर की अपेक्षाओं के सभी पहलुओं का अच्छी तरह से और सटीक रूप से सारांश प्रस्तुत करने में सक्षम हैं—लेकिन वे व्यावहारिक कार्य नहीं कर सकते। जिन शब्दों और सिद्धांतों से वे खुद को लैस करते हैं, जिन्हें वे समझते और जानते हैं, वे उन्हें एक अगुआ या कार्यकर्ता के कर्तव्यों का पालन करने में मदद नहीं कर सकते, काम में आने वाली समस्याओं को खोजने और उनका समाधान करने में उनकी मदद तो वे बिलकुल नहीं कर सकते। क्या इस तरह का अगुआ या कार्यकर्ता इस पद के लिए योग्य है? स्पष्ट रूप से नहीं। क्या तुम लोगों को किसी छद्म-आध्यात्मिक नकली अगुआ का चुनाव करना चाहिए, जो योग्य न हो? (नहीं।) तो क्या तुम लोगों ने कभी ऐसे अगुआओं को चुना है? (हाँ।) मुझे उम्मीद है कि तुम लोगों ने ऐसे बहुत लोगों को चुना है। जिसने भी कई वर्षों से परमेश्वर में विश्वास किया है, परमेश्वर के बहुत-से वचन पढ़े हैं, बहुत सारे उपदेश सुने हैं, जिसके पास कार्य करने और उपदेश देने का प्रचुर अनुभव है, जो घंटों उपदेश दे सकता है—तुम्हें लगता है कि इस तरह के व्यक्ति को काम करने में सक्षम होना ही चाहिए। और नतीजा? उन्हें चुनने के बाद तुम्हें एक गंभीर समस्या का पता चलता है : उनसे मिला नहीं जा सकता, उनका दरवाजा हमेशा बंद रहता है, वे भाई-बहनों से दूर हो गए हैं। लेकिन अन्य लोग मन में सोचते हैं, "वह इतने वर्षों से विश्वासी रहा है, वह सत्य को समझता है और उसके पास एक आधार है। उसके पास आध्यात्मिक कद होना चाहिए और उसे समस्याएँ हल करने में सक्षम होना चाहिए—तो वह हमेशा खुद को बंद क्यों रखता है? इससे पता चलता है कि उस पर बहुत बड़ा बोझ है! अगुआ के रूप में चुने जाने के बाद से वह मौन हो गया है, वह अलग तरह से बोलता है, और अब वह हम में से बाकी लोगों की तरह नहीं है। यही कारण है कि वह ज्यादातर नजरों से ओझल रहता है।" क्या तुम लोग यही मानते हो? क्या तुम लोग इस तरह के नकली अगुआ को दोबारा चुनोगे? (नहीं।) क्यों नहीं? तुम लोग क्या कहोगे कि किसी अंधे व्यक्ति को अपने मार्गदर्शक के रूप में चुनने के क्या परिणाम होते हैं? क्या कोई अंधा आदमी तुम्हें अच्छे रास्ते पर ले जा सकता है? जब वह अंधा है, तो वह तुम्हारा मार्गदर्शन कैसे कर सकता है? वह जहाँ भी जाता है और जो भी काम करता है, उसमें उसे मार्गदर्शन के लिए किसी और की जरूरत होती है; उसके पास स्वयं कोई दिशा या लक्ष्य नहीं होता, और जो सिद्धांत वह समझता है, उसका केवल दूसरों के सुनने के लिए उपदेश दे देता है—उसका कोई वास्तविक प्रभाव या मूल्य नहीं होता। अगर तुम शब्दों और सिद्धांतों का उपदेश दे सकने के लिए उसका सम्मान करते हो, तो तुम किस तरह के व्यक्ति हो? तुम अंधे हो, मूर्ख हो, मंदबुद्धि हो। तुम एक अंधे व्यक्ति से मिलकर खुश होते हो और उससे राह दिखाने के लिए कहते हो। तो क्या तुम भी अंधे नहीं हो? तुम्हारे पास आँखें किसलिए हैं? अविश्वासियों के बीच एक कहावत है : अंधा अंधे की अगुआई करता है। छद्म-आध्यात्मिक व्यक्तियों को अगुआओं के रूप में चुनना अंधे द्वारा अंधों की अगुआई करना है।

— "अंत के दिनों के मसीह की बातचीत के अभिलेख" में 'नकली अगुआओं की पहचान करना (8)' से उद्धृत

यदि किसी कलीसिया में मसीह-विरोधियों को आपे से बाहर हो जाने की अनुमति दी जाती है, उन्हें भाई-बहनों को नियंत्रित करने, धमकाने, छलने या भ्रमित करने के लिए मनमाने नारे लगाने और तर्क करने की खुली छूट दी जाती है, और विवेकहीन अगुवा इन मसीह-विरोधियों को तुरंत उजागर करने और उन्हें नियंत्रण में लाने में अक्षम होकर कुछ भी नहीं करते हैं, जिसके परिणामस्वरूप भाइयों और बहनों के साथ इन मसीह-विरोधियों द्वारा अपनी इच्छानुसार छेड़छाड़ की जाती है और उन्हें परेशान किया जाता है, तो फिर इस कलीसिया के अगुवा कूड़ा हैं। यदि कलीसिया में मसीह-विरोधियों और दुष्ट लोगों को भाइयों और बहनों द्वारा तिरस्कृत और घृणित किया जाता है, यदि उन्हें कलीसिया के भीतर बाँधकर रखा जाता है, और हर किसी को उनके प्रति सूझ-बूझ होती है, इस तरह से कि उनकी बातें और खोखले नारे जो भाइयों और बहनों को छलते और धोखा देते हैं कलीसिया में प्रभाव नहीं डाल पाते हैं, और उन्हें नियंत्रण में रखा जाता है, बाँधकर रखा जाता है, तो इस कलीसिया के अगुवा मानक के अनुसार हैं; वे सत्य-वास्तविकता से संपन्न अगुवा हैं। यदि किसी कलीसिया को एक मसीह-विरोधी द्वारा बाधित किया जा रहा हो, और, भाइयों और बहनों द्वारा पहचाने जाने और अस्वीकृत किए जाने के बाद, वह मसीह-विरोधी भाई-बहनों के साथ अत्याचार और दुर्व्यवहार करके बदला लेता हो, और अगुआ कुछ न करते हों, तो उस कलीसिया के अगुवा कूड़ा हैं, और उन्हें हटा देना चाहिए। एक कलीसिया के अगुवाओं के रूप में, यदि वे सत्य का उपयोग करके समस्याओं को हल करने में असमर्थ होते हैं, अगर वे कलीसिया में मसीह-विरोधियों की पहचान करने, उन्हें नियंत्रित और सीमित करने में असमर्थ हैं, भाइयों और बहनों की रक्षा करने और उन्हें संरक्षित करने में ताकि वे सामान्य रूप से अपने कर्तव्यों को पूरा कर सकें, असमर्थ होते हैं, और वे परमेश्वर के घर के काम के सामान्य निष्पादन को बनाए रखने में असमर्थ हैं, तो फिर इस कलीसिया के अगुवा कूड़ा हैं, और उन्हें हटा देना चाहिए। यदि किसी कलीसिया के अगुवा किसी मसीह-विरोधी के उग्र और क्रूर होने के कारण उसका सामना करने या उसे ललकारने से डरते हैं, और इस तरह से उस मसीह-विरोधी को कलीसिया में एक आततायी की तरह खुला छोड़ देते हैं, कि वह मनमानी करे और परमेश्वर के घर के अधिकांश कार्य कमज़ोर पड़ जाएं और इसमें गतिरोध आ जाए, तो फिर इस कलीसिया के अगुवा कूड़ा हैं, और उन्हें हटा देना चाहिए। यदि प्रतिशोध के डर से, एक कलीसिया के अगुवाओं में कभी किसी मसीह-विरोधी को उजागर करने का साहस न हो, और कभी उस मसीह-विरोधी के बुरे कृत्यों को रोकने की कोशिश न करते हों, जिससे कलीसिया के जीवन में व्यवधान पैदा होता हो, और भाइयों और बहनों को जीवन में प्रवेश करने में बहुत बाधा और नुकसान पहुँचता हो, तो फिर इस कलीसिया के अगुवा कूड़ा हैं, और उन्हें हटा देना चाहिए।

— "मसीह-विरोधियों को उजागर करना" में 'वे अपना कर्तव्य केवल खुद को अलग दिखाने और अपने हितों और महत्वाकांक्षाओं को पूरा करने के लिए निभाते हैं; वे कभी परमेश्वर के घर के हितों की नहीं सोचते, और अपनी व्यक्तिगत महिमा के बदले उन हितों को बेच तक देते हैं (VIII)' से उद्धृत

यह कैसे तय किया जा सकता है कि अगुआ अपनी जिम्मेदारियाँ निभा रहे हैं या नहीं, वे नकली अगुआ हैं या नहीं? सबसे बुनियादी बात यह देखना है कि वे व्यावहारिक कार्य करने में सक्षम हैं या नहीं, कि उनमें यह क्षमता है या नहीं। दूसरे, देखो कि क्या वे वास्तव में यह व्यावहारिक कार्य करते हैं। उनके मुख से निकले शब्दों पर ध्यान न दो, वे सत्य को कितनी अच्छी तरह समझते हैं, चाहे वे बाहरी कार्य कर रहे हों या कुछ और, उनके पास कुछ हद तक क्षमता, बुद्धि, प्रतिभा या कौशल है या नहीं—इन सब बातों को नजरअंदाज कर दो, और केवल यह देखो कि वे व्यावहारिक कार्य करते हैं या नहीं; अगर नहीं करते, तो चाहे वे कितने भी सक्षम क्यों न हों, वे नकली अगुआ हैं। कुछ लोग कहते हैं, "किसे पड़ी है कि वे व्यावहारिक कार्य करते हैं या नहीं? उनमें बड़ी क्षमता है और वे कुशल हैं; जब वे काम शुरू करते हैं, तो वे अधिकतर लोगों से बेहतर होते हैं। इसके अलावा, भले ही वे वास्तविक कार्य न करते हों और बहुत समय बेकार घूमने में लगा देते हों, लेकिन उन्होंने कुछ भी गलत नहीं किया है, न उन्होंने कोई बुराई की है, न ही कोई व्यवधान या गड़बड़ी की है। उन्होंने भाई-बहनों या कलीसिया को कोई नुकसान नहीं पहुँचाया है या उन पर कोई बुरा प्रभाव नहीं डाला है। तो तुम कैसे कह सकते हो कि वे नकली अगुआ हैं?" इसे कैसे समझाएँ? अभी, भूल जाओ कि तुम कितने प्रतिभाशाली हो, तुम्हारी क्षमता कितनी अधिक है, या तुम कितने सुशिक्षित हो; महत्वपूर्ण यह है कि तुम व्यावहारिक कार्य करते हो या नहीं, और तुम एक अगुआ की जिम्मेदारियाँ पूरी करते हो या नहीं। अगुआ के तौर पर अपने कार्यकाल के दौरान क्या तुमने अपनी जिम्मेदारी के दायरे में आने वाले प्रत्येक विशिष्ट कार्य में भाग लिया, कार्य के दौरान उत्पन्न हुई कितनी समस्याएँ तुमने प्रभावी ढंग से हल कीं, तुम्हारे कार्य, तुम्हारी अगुआई, तुम्हारे मार्गदर्शन से कितने लोग सत्य-सिद्धांतों को समझ पाए, परमेश्वर के घर का कार्य कितना विकसित किया गया और आगे बढ़ाया गया? ये चीजें हैं, जो मायने रखती हैं। भूल जाओ कि तुम कितने मंत्र दोहरा सकते हैं, कितने शब्दों और सिद्धांतों में तुमने महारत हासिल की है, भूल जाओ कि तुम प्रतिदिन कितने घंटे मेहनत करते हो, तुम कितने थके हुए हो, और भूल जाओ कि सड़क पर तुमने कितना समय बिताया है, तुम कितनी कलीसियाओं में गए हो, तुमने कितने जोखिम उठाए हैं, कितनी बार तुम भोजन नहीं कर पाए हो—यह सब भूल जाओ, और केवल उन सब कार्यों की पूर्ति पर ध्यान दो, जिनके लिए तुम जिम्मेदार हो। परमेश्वर के घर द्वारा अपेक्षित दायरे के भीतर तुम जितने कार्यों के लिए तुम जिम्मेदार हो, उसमें से कितना कार्यान्वित किया गया है, चाहे वह मानव-संसाधन हो, प्रशासनिक हो या पेशेवर कार्य से संबंधित हो; उसे कितनी अच्छी तरह से कार्यान्वित किया गया है, कितनी अच्छी तरह से उसमें आगे का कार्य किया गया है, सिद्धांत से संबंधित कितनी चूकें, विचलन, मुद्दे और गलतियाँ ठीक करने और सुधारने में तुमने मदद की है, कितनी समस्याएँ हल करने में तुमने सहायता की है, क्या तुमने उन्हें सिद्धांत और परमेश्वर के घर की अपेक्षाओं के अनुसार हल किया है, इत्यादि—ये सभी वे मानदंड हैं, जिनके द्वारा यह आकलन किया जाता है कि कोई अगुआ अपनी जिम्मेदारियाँ पूरी कर रहा है या नहीं।

— "अंत के दिनों के मसीह की बातचीत के अभिलेख" में 'नकली अगुआओं की पहचान करना (9)' से उद्धृत

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