9. परमेश्वर के वचनों ने मुझे वैवाहिक जीवन की त्रासदी से बचा लिया

मेरा एक खुशहाल, हँसता-खेलता परिवार था, मैं एक कंपनी में ऑफिस प्रबंधक और मानव संसाधन प्रबंधक थी। मेरे पति इलेक्ट्रिसिटी ब्यूरो में ऑफिस प्रबंधक थे और अपने ब्यूरो की एक सहायक कंपनी के प्रमुख थे। जल्दी ही ब्यूरो के उप-निदेशक के पद पर उनकी तरक्की होने वाली थी। हमारा बेटा भी बहुत स्मार्ट था। तीन जनों का हमारा परिवार सुखी जीवन जी रहा था, हमारे सभी परिचित हमारी प्रशंसा करते थे। जब मैं इस खुशहाली और मिठास का आनंद ले ही रही थी, तभी कुछ बहुत बुरा घट गया। मेरे पति अपने निजी ड्राइवर की पत्नी के चक्कर में पड़ गये। इस अचानक धक्के ने मेरी दुनिया पूरी तरह से हिला कर रख दी। कई दिनों तक मैं न तो कुछ खा पायी, न ही सो पायी। मैं गुस्से और रोष से भर उठी, मैंने बहुत अपमानित महसूस किया। मुझे भयंकर पीड़ा हो रही थी, यहाँ तक कि मर जाने का मन करने लगा। मैं अपने हाथ में ज़हर की शीशी लेकर मौत की दहलीज़ से होकर गुज़रने ही वाली थी कि मुझे अपनी माँ और अपने छोटे बेटे का ख़याल आया। मैं मर गयी, तो मेरी बूढ़ी माँ अपनी बेटी को दफनाने का सदमा कैसे झेल पायेगी? मेरा बेटा, जो अभी बहुतछोटा है, उसे ज़िंदगी में बहुत-सी मुश्किलों का सामना करना पड़ेगा। उसके पिता पर अब भरोसा नहीं किया जा सकता, अगर उसकी माँ गुज़र गयी, तो क्या वह बिल्कुल अनाथ नहीं हो जाएगा? इन ख़यालों से मेरा दिल पिघल गया। मैं घुटनों पर बैठी रोने लगी, मैंने ज़हर की उन गोलियों को फर्श पर बिखेर दिया।

थोड़ी देर बाद, ज़िंदगी और मौत के बीच कहीं से, मैं उस दर्द से बाहर निकल आयी, मगर मेरी सुकून-भरी ज़िंदगी मुझे वापस नहीं मिली। मैं उस औरत से बेइंतहा नफ़रत करने लगी, मुझे लगा मेरे तमाम दुख-दर्द का कारण वही है, उसने हमारे अच्छे-खासे खुशहाल परिवार को तबाह कर दिया। मैंने सोचा, "अगर तू मुझे अच्छी ज़िंदगी नहीं जीने दे रही, तो मैं भी तुझे सुकून से नहीं जीने दूंगी। तू मुझे इस तरह मुश्किल में झोंक रही है, तो यकीन जान, तुझे उसकी दोगुनी कीमत चुकानी पड़ेगी।" मैंने उसे मारा-पीटा, लोगों को उसके घर भेजकर तोड़-फोड़ करवायी, ताकि वह वापस घर जाने से भी डरे। मैंने उसे डरा कर भयंकर दुविधा में तो डाल दिया, पर मेरी पीड़ा बरकरार थी। मैं अपने टूटे हुए घर की परछाईँ से बच कर नहीं निकल पायी।

तभी, एक परिचित ने मेरे साथ प्रभु यीशु का सुसमाचार साझा किया, मुझे बाइबल की एक प्रति दी। इसे पढ़कर, प्रभु यीशु की सहनशीलता, सब्र और क्षमाशीलता ने वाकई मेरे दिल को छू लिया। मैंने प्रभु के बार में पढ़ा, कोई पाप किये बिना, इंसानों के छुटकारे के लिए उसे सूली पर चढ़ा दिया गया, मेरे मन में विचार कौंधा कि मैं अपने पति और उस औरत को, एक बार ही सही, माफ़ क्यों न कर दूं। मैंने प्रभु से मुझे शक्ति देने की प्रार्थना की, उन्हें माफ़ करने के लिए सहनशीलता और सब्र देने की विनती की। फिर मैंने और मेरे पति ने झगड़ा करना बंद कर दिया, उस औरत को देखने पर भी मैंने उस पर गुस्सा नहीं दिखाया। लेकिन उसके खिलाफ अपने द्वेष को मैं नहीं छोड़ पायी। मैं अपने परिवार, अपने बेटे और अपनी ज़िंदगी को आगे बढ़ाने के लिए, इन हालात को जबरन सहन करने लगी। मगर मुझे हैरानी हुई कि मेरे पति ने संयम दिखाना तो दूर, चीज़ों को बदतर बना डाला। उन्होंने अपनी नौकरी छोड़ दी और उस औरत के साथ भाग गये। इसे भला मैं कैसे झेल पाती? अपने पति का ऐसा विश्वासघात मैं कैसे बर्दाश्त कर पाती? मैंने प्रोक्युरेटोरेट में पहुंच कर तरक्की पाने का मौका अपने पति की खातिर छोड़ दिया था, मैंने अपने बच्चे की देखभाल की, खाना बनाया, अपने पति के लिए घर का सारा काम करती रही, अपने पति की तरक्की के लिए मैंने हर जगह तालमेल बिठाया। लेकिन बदले में मुझे क्या मिला, सिर्फ अपने पति की ओर से विश्वासघात और दर्द। मैं अब इसे बर्दाश्त नहीं कर सकती थी। इतने निर्दयी और विवेकहीन होने के कारण, मैं अपने पति से नफ़रत करने लगी। मैं उस औरत से भी नफ़रत करने लगी, मैं उसका मरा हुआ मुंह देखना चाहती थी, भले ही इसकी कीमत मेरी मौत ही क्यों न हो। मैंने उन दोनों की आमदनी के तमाम साधनों को ख़त्म कर देने की भरसक कोशिश की, ताकि वे गुज़र-बसर न कर सकें। जल्दी ही, वे शहर लौट आये, क्योंकि उनको खाने-पीने के लाले पड़ गये थे। एक दिन, मेरे पति मेरे सामने फूट-फूट कर रोने लगे, उन्होंने माना कि वे गलत थे, वे माफी मांगने लगे, उन्होंने कसम खायी कि वे नये सिरे से ज़िंदगी शुरू करेंगे और एक नया इंसान बन कर दिखाएँगे। उन्होंने मुझसे कहा कि कुछ दोस्तों से कह कर शहर से बाहर के एक कस्बे में उनके काम का तबादला करवाने में मदद करूं, ताकि वे एक अलग माहौल में एक नयी ज़िंदगी शुरू कर सकें। उनका दुख देख कर और उनके सच लगने वाले माफीनामे को सुनकर, मेरा दिल पसीज गया। मैं भी बीते दिनों की दुख भरी बातें भुलाकर एक नयी शुरुआत करना चाहती थी, इसलिए मैंने उनका अनुरोध मान लिया। मैंने तुरंत अपने दोस्तों से संपर्क साधा ताकि हम दोनों का तबादला हो सके। हम फिर से एक साथ रहने लगे, हालांकि उन्होंने मुझे खुश करने और सुखी बनाने की भरसक कोशिश की, पर मुझे लगा कि मेरे पास उनसे कहने को कुछ भी नहीं है। इसके बावजूद, मैं हमारी शादी को लेकर भ्रम पाले हुए थी, यह सोच कर कि घाव को भरने में वक्त लगता है। लेकिन एक बात ने मुझे और भी ज़्यादा चौंका दिया कि जब मैं हमारे तबादले करवाने के काम में लगी हुई थी, तभी मुझे संयोग से पता चला कि वे फिर उस औरत से मिलने गये थे। अब मैं अपना गुस्सा रोक नहीं पायी, मैंने चीख कर उनसे चले जाने को कहा। दो दिन बाद, वे एक भी शब्द बोले बिना चले गये, और फिर कभी नहीं लौटे। इस मुकाम पर पहुँचने के बाद मेरी नींद खुली। मुझे एहसास हुआ कि वे कभी भी सच में प्रायश्चित नहीं करना चाहते थे। वे सिर्फ इसलिए लौट आये थे क्योंकि वे पाई-पाई के मोहताज हो चुके थे और गुज़र-बसर के लिए उनके पास कुछ भी नहीं था। उन्होंने मुझे बहला-फुसला कर फिर तिनके जोड़ने की इच्छा जतायी, लेकिन यह सब सिर्फ एक दिखावा था। वे अपना तबादला करवाने के लिए बस मेरा इस्तेमाल करना चाहते थे। इस बात का एहसास होने पर मेरा दिल टूट गया। मैं अपने पति से, और उस औरत से भी, बेइंतहा नफ़रत करने लगी। मैं उस औरत को लूली-लंगड़ी और बदसूरत बना देने की योजना बनाने लगी।

जब मैं दुष्टता में डूबती जा रही थी, तभी सर्वशक्तिमान परमेश्वर ने उद्धार का अपना हाथ मेरी तरफ बढ़ाया, और मैंने परमेश्वर के अंत के दिनों के कार्य को स्वीकार कर लिया। परमेश्वर के वचनों को पढ़कर, मैंने दुनिया के अँधेरे और बुराई, समाज के दुख-दर्द और वीरानी के पीछे की वजहों को जाना। सर्वशक्तिमान परमेश्वर कहते हैं, "ऐसी गन्दी जगह में जन्म लेकर, मनुष्य समाज के द्वारा बुरी तरह संक्रमित किया गया है, वह सामंती नैतिकता से प्रभावित किया गया है, और उसे 'उच्च शिक्षा के संस्थानों' में सिखाया गया है। पिछड़ी सोच, भ्रष्ट नैतिकता, जीवन पर मतलबी दृष्टिकोण, जीने के लिए तिरस्कार-योग्य दर्शन, बिल्कुल बेकार अस्तित्व, पतित जीवन शैली और रिवाज—इन सभी चीज़ों ने मनुष्य के हृदय में गंभीर रूप से घुसपैठ कर ली है, और उसकी अंतरात्मा को बुरी तरह खोखला कर दिया है और उस पर गंभीर प्रहार किया है। फलस्वरूप, मनुष्य परमेश्वर से और अधिक दूर हो गया है, और परमेश्वर का और अधिक विरोधी हो गया है। दिन-प्रतिदिन मनुष्य का स्वभाव और अधिक शातिर बन रहा है, और एक भी व्यक्ति ऐसा नहीं है जो स्वेच्छा से परमेश्वर के लिए कुछ भी त्याग करे, एक भी व्यक्ति नहीं जो स्वेच्छा से परमेश्वर की आज्ञा का पालन करे, इसके अलावा, न ही एक भी व्यक्ति ऐसा है जो स्वेच्छा से परमेश्वर के प्रकटन की खोज करे। इसकी बजाय, इंसान शैतान की प्रभुता में रहकर, कीचड़ की धरती पर बस सुख-सुविधा में लगा रहता है और खुद को देह के भ्रष्टाचार को सौंप देता है। सत्य को सुनने के बाद भी, जो लोग अन्धकार में जीते हैं, इसे अभ्यास में लाने का कोई विचार नहीं करते, यदि वे परमेश्वर के प्रकटन को देख लेते हैं तो इसके बावजूद उसे खोजने की ओर उन्मुख नहीं होते हैं। इतनी पथभ्रष्ट मानवजाति को उद्धार का मौका कैसे मिल सकता है? इतनी पतित मानवजाति प्रकाश में कैसे जी सकती है?" "मानवजाति मेरी शत्रु के अलावा और कुछ नहीं है। मानवजाति ऐसी दुष्ट है जो मेरा विरोध और मेरी अवज्ञा करती है। मानवजाति मेरे द्वारा श्रापित दुष्ट की संतान के अतिरिक्त और कोई नहीं है। मानवजाति उस प्रधान दूत की वंशज ही है जिसने मेरे साथ विश्वासघात किया था। मानवजाति और कोई नहीं बल्कि उस शैतान की विरासत है जो बहुत पहले ही मेरे द्वारा ठुकराया गया था और हमेशा से मेरा कट्टर विरोधी शत्रु रहा है। चूँकि सारी मानवजाति के ऊपर का आसमान, बगैर स्पष्टता की ज़रा-सी झलक क, मलिन और अँधकारमय है, और मानव दुनिया स्याह अंधेरे में डूबी हुई है, कुछ इस तरह कि उसमें रहने वाला कोई व्यक्ति अपने चेहरे के सामने हाथ को या अपना सिर उठाने पर सूरज को नहीं देख सकता है। उसके पैरों के नीचे की कीचड़दार और गड्ढों से भरी सड़क, घुमावदार और टेढ़ी-मेढ़ी है; पूरी जमीन पर लाशें बिखरी हुई हैं। अँधेरे कोने मृतकों के अवशेषों से भरे पड़े हैं जबकि ठण्डे और छाया वाले कोनों में दुष्टात्माओं की भीड़ ने अपना निवास बना लिया है। मनुष्यों के संसार में हर कहीं, दुष्टात्माएँ जत्थों में आती-जाती रहती हैं। सभी तरह के जंगली जानवरों की गन्दगी से ढकी हुई संतानें घमासान युद्ध में उलझी हुई हैं, जिनकी आवाज़ दिल में दहशत पैदा करती है। ऐसे समयों में, इस तरह के संसार में, एक ऐसे 'सांसारिक स्वर्गलोक' में, कोई व्यक्ति जीवन के आनंद की खोज करने कहाँ जा सकता है? अपने जीवन की मंजिल की खोज करने के लिए कोई कहाँ जाएगा?" "परमेश्वर की दृष्टि में, लोग पशु की दुनिया में जानवरों की तरह हैं। वे एक दूसरे के साथ लड़ते हैं, एक-दूसरे का वध करते हैं, और एक-दूसरे के साथ असाधारण बातचीत करते हैं। परमेश्वर की दृष्टि में, वे इस तरह के वानर हैं, जो उम्र या लिंग की परवाह किए बिना, एक दूसरे के विरूद्ध षडयंत्र रचते हैं" (वचन देह में प्रकट होता है)। परमेश्वर के वचनों को पढ़कर मेरा दिल सचमुच रोशन हो गया। मैं समझ गयी कि जब से शैतान ने इंसान को भ्रष्ट किया है, हमने अपनी अंतरात्मा और समझ खो दी है, हममें इंसानियत नहीं रही। हममें कोई मर्यादा और सच्चाई नहीं रही। हम सभी कपटी, स्वार्थी, घिनौने, कुटिल और दुर्भावना से भरे हैं। हम हमेशा निजी फायदे के लिए चाल चलते रहते हैं, दूसरों के बारे में जोड़-तोड़ करते रहते हैं। हम सिर्फ खुद के आनंद की परवाह करते हैं, दूसरे ज़िंदा रहें या मर जाएं, हमें कोई परवाह नहीं। हम दूसरों की तकलीफों पर अपनी खुशी के महल खड़े करते हैं। हर मोड़ पर लड़ाई और मार-काट होती है। जानवरों की दुनिया की तरह जंगल राज चलता है। अगर तुम मुझे न खा जाओ, तो मैं तुम्हें मार डालूँगा। सारे इंसान पाप की ज़िंदगी जी रहे हैं, नैतिक मूल्य ज़्यादा-से-ज्यादा गिरते जा रहे हैं। सबके-सब दुराचार में लिप्त हैं, पाप में मज़े ले रहे हैं। पति पत्नियों को धोखा दे रहे हैं, पत्नियां पतियों से विश्वासघात कर रही हैं, पति-पत्नी दोनों एक-दूसरे को धोखा दे रहे हैं। सभी लोग बुराई की जय करते हैं, अपनी हवस पूरी करते हैं, महिला और पुरुष एक-दूसरे की प्यास बुझाते हैं। दुनिया पर शैतान की मजबूत पकड़ है, यह अधिक से अधिक अंधेरी और दुष्ट होती जा रही है। यह पाप और व्यभिचार का अड्डा बन गयी है। लोग ज़्यादा से ज़्यादा नीचे गिरते जा रहे हैं, अधिक दुष्ट और नीच होते जा रहे हैं। मुझे एहसास हुआ कि मेरे पति का विश्वासघात शैतान के ज़हर का नतीजा है। मैं भी कुछ अलग नहीं हूँ। मैं भी उन तरीकों को छोड़ नहीं पायी, जिनसे शैतान ने मुझे भ्रष्ट कर नुकसान पहुँचाया था। जब दूसरे लोगों ने मेरे हितों को लांघा, तो मैं रोष से भर गयी, बुरी तरह चाहने लगी कि मेरे दुश्मन मर जाएं। मैं काम या ज़िंदगी की प्रेरणा लिये बिना हर पल अपनी नफ़रत की आग में जल रही थी। अपने बेटे को भी मैंने इसमें घसीट लिया। क्या ये तमाम विपत्तियाँ शैतान की गढ़ी हुई नुकसानदेह चीज़ें नहीं थीं? बाद में, प्रार्थना करके और परमेश्वर के वचन पढ़कर मैंने जीवन के बारे में थोड़ी अंतर्दृष्टि हासिल की। मैंने समझ लिया कि इंसान दुष्ट और भ्रष्ट है, हम सभी एक-दूसरे का शोषण करते हैं, एक-दूसरे को धोखा देते हैं, सच्चा प्यार जैसी कोई चीज़ है ही नहीं। धीरे-धीरे मैंने अपने पति और उस औरत के लिए अपनी नफ़रत छोड़ दी, मैंने बदला लेने की अपनी योजना भी रद्द कर दी। जब मैंने इन चीज़ों को छोड़ दिया, तो मुझे एक ज़बरदस्त आज़ादी और राहत का एहसास हुआ। यही वो पड़ाव था जब मैंने एक बिल्कुल नयी ज़िंदगी शुरू की, हर दिन भाई-बहनों से सभाओं में मिलने लगी, परमेश्वर के वचनों को खाने-पीने और उनकी संगति करने में लग गयी, परमेश्वर के गुणगान के भजन गाने लगी। मुझे बहुत आज़ादी और राहत का एहसास हो रहा था। धीरे-धीरे मुझे बेहतर लगने लगा और मैं फिर से मुस्करा सकी।

फिर एक दिन, अपनी एक करीबी सहेली से अचानक मेरी मुलाक़ात हो गयी। वह बहुत दुबली-पतली और थकी-मांदी लग रही थी। मैं चौंक गयी। उसने मुझे बताया कि उसके पति ने उसे धोखा दिया, तलाक की बातों के दौरान उसने कोई रास्ता न देख ज़हर पीकर जान देने की कोशिश की, मगर आखिर उसे बचा लिया गया। अपने विवाहित जीवन में हम दोनों को एक-जैसा दुर्भाग्य मिला था। परमेश्वर ने मेरी रक्षा न की होती, तो मैं कब की मर चुकी होती, और किसे पता अब तक मेरी कब्र पर कितनी ऊंची-घनी घास उग चुकी होती। फिर मैंने परमेश्वर के ये वचन पढ़े : "पति अपनी पत्नी से क्यों प्रेम करता है? पत्नी अपने पति से क्यों प्रेम करती है? बच्चे क्यों माता-पिता के प्रति कर्तव्यशील रहते हैं? और माता-पिता क्यों अपने बच्चों से अतिशय स्नेह करते हैं? लोग वास्तव में किस प्रकार के अभिप्रायों को आश्रय देते हैं? क्या यह किसी की अपनी योजनाओं और स्वार्थी अभिलाषाओं को संतुष्ट करने के लिए नहीं है?" (वचन देह में प्रकट होता है)। परमेश्वर के वचनों से मैं समझ सकी कि पति-पत्नी के रूप में करीब बीस साल बिताने के बावजूद, एक-दूसरे के प्रति हमारी भावनाएं इतनी कच्ची क्यों थीं कि हल्का-सा झटका भी नहीं झेल पायीं। इसकी वजह यह है कि इंसानों के बीच सच्चा प्यार या स्नेह नहीं होता। यह सिर्फ निजी इच्छाओं की तृप्ति के लिए या फिर एक-दूसरे का इस्तेमाल करने के लिए होता है। जब कोई इस्तेमाल के लायक होता है, तो हम मीठी-मीठी बातों से उसकी चापलूसी करते हैं, लेकिन इस्तेमाल पूरा हो जाने पर हम उसे धक्के देकर बाहर निकाल देते हैं, मानो वह कोई पुरानी कमीज़ या कूड़े का ढेर हो। "सुखी परिवार" और "पति-पत्नी के बीच प्यार" की बातें लोगों को बेवकूफ बनाने के लिए सिर्फ झूठ हैं, ये वो जाल हैं जो शैतान हमें धोखा देने के लिए इस्तेमाल करता है। दुर्भाग्य से, मेरे पास सत्य नहीं था और इस बात को नहीं समझ सकी, इसलिए मैं शैतान की चालों को नहीं समझ पायी। मेरे पति के कुछ कुटिल झूठ और नकली आंसुओं ने मुझे धोखा दे दिया। मैं खुशी के झूठे एहसास में पूरी तरह अंधी हो गयी थी, इन खोखली भावनाओं के खिलवाड़ में मेरी मति मारी गयी थी। इनके पीछे मैंने अपनी ज़िंदगी गँवा ही दी थी। मैं कितनी बेवकूफ थी! तमाम इंसान शैतान द्वारा भ्रष्ट किये गये हैं। हम चालबाज़, कपटी, स्वार्थी, घिनौने, लालची और दुष्ट हैं। सच्चा स्नेह या प्यार भला कैसे हो सकता है? इस मुकाम पर मुझे एहसास हुआ कि इंसान के लिए सिर्फ परमेश्वर का प्रेम ही सच्चा है, जब मुझमें नफ़रत का लावा बह रहा था, तब परमेश्वर के वचनों ने ही मेरे दिल से नफ़रत को दूर किया और मेरा दर्द मिटा कर मुझे सुकून दिया, मेरी आत्मा में शांति और आनंद का भाव पैदा किया। दुनिया में भला और कौन मुझे इस तरह प्रेम कर सकता है? किसका प्यार परमेश्वर के प्रेम से बढ़ कर हो सकता है? क्या परमेश्वर का प्रेम पाना किसी इंसान के प्रेम को हासिल करने से ज़्यादा खुशी नहीं देता? इन विचारों ने मुझे सुकून पहुंचाकर परमेश्वर के उद्धार के लिए आभारी बनाया।

फिर मैंने परमेश्वर के वचनों के कुछ अंश पढ़े। "वे घातक प्रभाव, जो हज़ारों वर्षो की 'राष्ट्रवाद की बुलंद भावना' ने मनुष्य के हृदय में गहरे छोड़े हैं, और साथ ही सामंती सोच, जिसके द्वारा लोग बिना किसी स्वतंत्रता के, बिना महत्वाकांक्षा या आगे बढ़ने की इच्छा के, बिना प्रगति की अभिलाषा के, बल्कि निष्क्रिय और प्रतिगामी रहने और गुलाम मानसिकता से घिरे होने के कारण बँधे और जकड़े हुए हैं, इत्यादि—इन वस्तुगत कारकों ने मनुष्यजाति के वैचारिक दृष्टिकोण, आदर्शों, नैतिकता और स्वभाव पर अमिट रूप से गंदा और भद्दा प्रभाव छोड़ा है। ऐसा प्रतीत होता है, जैसे मनुष्य आतंक की अँधेरी दुनिया में जी रहे हैं, और उनमें से कोई भी इस दुनिया के पार नहीं जाना चाहता, और उनमें से कोई भी किसी आदर्श दुनिया में जाने के बारे में नहीं सोचता; बल्कि, वे अपने जीवन की सामान्य स्थिति से संतुष्ट हैं, बच्चे पैदा करने और पालने-पोसने, उद्यम करने, पसीना बहाने, अपना रोजमर्रा का काम करने; एक आरामदायक और खुशहाल परिवार के सपने देखने, और दांपत्य प्रेम, नाती-पोतों, अपने अंतिम समय में आनंद के सपने देखने में दिन बिताते हैं और शांति से जीवन जीते हैं...। सैकड़ों-हजारों साल से अब तक लोग इसी तरह अपना समय व्यर्थ गँवाते आ रहे हैं, कोई पूर्ण जीवन का सृजन नहीं करता, सभी इस अँधेरी दुनिया में केवल एक-दूसरे की हत्या करने के लिए तत्पर हैं, प्रतिष्ठा और संपत्ति की दौड़ में और एक-दूसरे के प्रति षड्यंत्र करने में संलग्न हैं। किसने कब परमेश्वर की इच्छा जानने की कोशिश की है? क्या किसी ने कभी परमेश्वर के कार्य पर ध्यान दिया है? एक लंबे अरसे से मानवता के सभी अंगों पर अंधकार के प्रभाव ने कब्ज़ा जमा लिया है और वही मानव-स्वभाव बन गए हैं, और इसलिए परमेश्वर के कार्य को करना काफी कठिन हो गया है, यहाँ तक कि जो परमेश्वर ने लोगों को आज सौंपा है, उस पर वे ध्यान भी देना नहीं चाहते" (वचन देह में प्रकट होता है)। "मनुष्य का सारा जीवन शैतान के प्रभुत्व के अधीन बीतता है, और ऐसा एक भी इंसान नहीं है जो अपने बलबूते पर अपने आपको शैतान के प्रभाव से आज़ाद कर सकता है। सभी लोग भ्रष्टता और खालीपन में, बिना किसी अर्थ या मूल्य के, एक गन्दे संसार में रहते हैं; वे शरीर के लिए, वासना के लिए और शैतान के लिए ऐसी लापरवाह ज़िन्दगियाँ बिताते हैं। उनके अस्तित्व का जरा सा भी मूल्य नहीं है। मनुष्य उस सत्य को खोज पाने में असमर्थ है जो उसे शैतान के प्रभाव से मुक्त कर देगा। यद्यपि मनुष्य परमेश्वर पर विश्वास करता है और बाइबल पढ़ता है, फिर भी वह यह नहीं जानता है कि वह अपने आपको शैतान के नियन्त्रण से आज़ाद कैसे करे। विभिन्न युगों के दौरान, बहुत ही कम लोगों ने इस रहस्य को जाना है, और बहुत ही कम लोगों ने इसे समझा है। वैसे तो, मनुष्य शैतान से और देह से घृणा करता है, फिर भी वह नहीं जानता है कि अपने आपको शैतान के फँसानेवाले प्रभाव से कैसे बचाए" (वचन देह में प्रकट होता है)। परमेश्वर के वचन इंसान के तौर पर हमारी ज़िंदगी की हकीकत का खुलासा करते हैं। क्या मैं इतने दुख-दर्द का अनुभव इसलिए नहीं कर रही थी क्योंकि मैं तथाकथित "सुखी जीवन" की तलाश में भाग रही थी? मैंने अतीत के बारे में सोचा। मैंने अपना अच्छा-खासा करियर छोड़ दिया था, ताकि मेरे पति आगे बढ़ सकें। मैंने घर का सारा काम और बच्चों की देखभाल अपने जिम्मे ले लिया, मैं इस सोच के साथ जीने लगी कि पुरुष बाहरी दुनिया से निपटते हैं और महिलाएं घर संभालती हैं। अपने पति की अच्छी पत्नी बनने की कोशिश में, मैं उन्हें अपना खून, पसीना और आंसू देने को तैयार थी, भले ही इसकी कीमत मेरी अपनी ज़िंदगी ही क्यों न हो। मैं घड़ी के साथ चलनेवाली मशीन जैसी बन गयी थी, अपने पति और परिवार के लिए लगातार कड़ी मेहनत करती रहने वाली। अपने पति की तरक्की पर मैं बहुत खुश हुई। उसके धोखा देने पर, मैं तबाह होकर घर पर खूब रोती-सुबकती रही, फिर भी बाहर जाने पर, मुझे दूसरों के लिए जबरन मुस्कान बिखेरनी पड़ती। मेरे हमेशा दो चहरे होते—जीने का यह बहुत थकाऊ और दर्दनाक तरीका था। अपने टूटे हुए परिवार को वापस संजोने के संघर्ष में, मैं अपनी मर्यादा और सच्चाई का ख़याल किये बिना उस औरत के साथ मार-पीट पर उतर आयी। मुझे अपने दिल में भरे बैर को दबा कर अपने पति को पश्चाताप का मौक़ा देना पड़ा। अब मैं समझ पायी हूँ कि मैं शैतान के अधिकार-क्षेत्र में जी रही थी, शैतान के हाथों की कठपुतली बनी हुई थी, इंसानियत के बिना जी रही थी। मैं नरक वाली ज़िंदगी जी रही थी। लेकिन मैं इससे सम्मोहित थी, यह सोचने लगी थी कि सार्थक जीवन जीने का यही एकमात्र तरीका है। परमेश्वर के वचनों ने मेरे दिल को खोल दिया, मुझे यह समझने दिया कि जिस तथाकथित "सुखी जीवन" के पीछे मैं भाग रही थी, वह बेकार है, इसका कोई अर्थ ही नहीं है। मैं वे चीज़ें हासिल कर भी लूँ, तो क्या हो जाएगा? क्या ये बिल्कुल खोखली नहीं हैं?

मैंने परमेश्वर के ये वचन पढ़े : "तुम एक सृष्ट प्राणी हो—तुम्हें निस्संदेह परमेश्वर की आराधना करनी चाहिए और एक अर्थपूर्ण जीवन जीना चाहिए। यदि तुम परमेश्वर की आराधना नहीं करते हो बल्कि अपने अशुद्ध शरीर में जीवनयापन करते रहते हो, तो क्या तुम बस मानव भेष में एक जानवर नहीं हो? चूँकि तुम एक मनुष्य हो, तुम्हें परमेश्वर के लिए खुद को खपाना और समस्त दुखों को सहना चाहिए! तुम्हें जो थोड़ा दुःख आज दिया जाता है, उसे तुम्हें प्रसन्नतापूर्वक और निश्चित ही स्वीकार करना चाहिए, अय्यूब और पतरस के समान एक अर्थपूर्ण जीवन जीना चाहिए। इस संसार में, मनुष्य शैतान का भेष धारण करता है, शैतान के द्वारा दिया गया भोजन खाता है, और शैतान के अधीन कार्य और सेवा करता है, और उसकी अशुद्धता में पूरी तरह कुचला जा रहा है। यदि तुम जीवन का अर्थ नहीं समझते हो या सच्चा मार्ग प्राप्त नहीं करते हो, तो इस तरह जीने का क्या महत्व है? तुम सब वे लोग हो, जो सही मार्ग का अनुसरण करते हो, सुधार को खोजते हो। तुम सब वे लोग हो, जो बड़े लाल अजगर के देश में ऊपर उठते हो, वे लोग जिन्हें परमेश्वर धर्मी बुलाता है। क्या यही सब से अर्थपूर्ण जीवन नहीं है?" (वचन देह में प्रकट होता है)। परमेश्वर के वचनों ने उसका अनुसरण करने के मेरे संकल्प को और मज़बूत कर दिया। पृथ्वी पर हमारे जीवन में, हमारी आस्था, परमेश्वर के प्रति हमारी श्रद्धा और सृजित प्राणियों के रूप में अपना कर्तव्य निभाना ही, मूल्यों और सार्थकता से अपना जीवन जीने का एकमात्र तरीका है। अपनी दुनिया में मैं थक चुकी थी, अपनी शादी को लेकर लोगों के साथ झगड़े-फसाद में उलझ गयी थी, अपने अंदर शैतान द्वारा डाली गयी नुकसान की मैल को बहा रही थी। सर्वशक्तिमान परमेश्वर ने ही मुझे बचाया और परमेश्वर के घर में लौटने का सौभाग्य दिया। परमेश्वर के वचनों ने मेरा पोषण और सिंचन किया, ताकि मैं सत्य को कुछ हद तक समझ पाऊँ, दुनिया की बुराई और अँधेरे की कुछ समझ हासिल कर सकूं, लोगों की भ्रष्टता के सत्य को समझ सकूं, और अपने दर्द को पीछे छोड़ सकूं। मेरे लिए परमेश्वर का प्रेम बहुत महान है। मुझे परमेश्वर के प्रेम का मूल्य चुकाने के लिए अपना कर्तव्य सही ढंग से निभाना होगा। वरना, मैं इंसान कहलाने या परमेश्वर के सामने जीने के लायक भी नहीं हूँ। फिर, मैंने सुसमाचार का प्रचार करना और भाई-बहनों के साथ अपना कर्तव्य निभाना शुरू किया, इससे मेरे दिल को सुकून और खुशी मिली।

अब जब कभी मैं अपने लिए परमेश्वर के उद्धार के बारे में सोचती हूँ, तो मैं बस यह भजन गाने लगती हूँ – "यदि परमेश्वर ने मुझे बचाया न होता।" "यदि परमेश्वर ने मुझे बचाया न होता, तो मैं संसार में अब तक भटक रहा होता, पापों के दलदल में जूझ रहा होता, और निराशा में जी रहा होता। यदि परमेश्वर ने मुझे न बचाया होता, दुष्ट आत्माएँ मुझे अब तक कुचलतीँ, पाप के सुखों को भोगते हुए, न जानते हुए कि मानव-जीवन की राह है कहाँ। सर्वशक्तिमान परमेश्वर मेरे प्रति दयालु है, उसके वचन मुझे पुकारते हैं, मैं सुनता हूँ परमेश्वर की आवाज़, उसके सिंहासन के सामने मैं उठाया गया हूँ। परमेश्वर के वचनों को रोज खाता-पीता हूँ, कई सत्यों को समझता हूँ, मैं देखता हूँ कितनी भ्रष्ट है मानवजाति, हमें वास्तव में परमेश्वर के उद्धार की ज़रूरत है" (मेमने का अनुसरण करो और नए गीत गाओ)।

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5. उत्पीड़न और पीड़ा ने मेरे भीतर परमेश्वर के प्रति प्रेम को और बढ़ा दिया

लेखिका लियु झेन, शैंडॉन्ग प्रांतमेरा नाम लियु झेन है। मेरी आयु 78 बरस की है, और मैं सर्वशक्तिमान परमेश्वर की कलीसिया की एक सामान्य ईसाई भर...

वचन देह में प्रकट होता है न्याय परमेश्वर के घर से शुरू होता है अंत के दिनों के मसीह, सर्वशक्तिमान परमेश्वर के अत्यावश्यक वचन परमेश्वर के दैनिक वचन सर्वशक्तिमान परमेश्वर के वचनों का संकलन मेमने का अनुसरण करो और नए गीत गाओ जीवन में प्रवेश पर उपदेश और वार्तालाप राज्य का सुसमाचार फ़ैलाने के लिए दिशानिर्देश अंत के दिनों के मसीह—उद्धारकर्ता का प्रकटन और कार्य परमेश्वर की भेड़ें परमेश्वर की आवाज को सुनती हैं (नये विश्वासियों के लिए अनिवार्य चीजें) परमेश्वर की आवाज़ सुनो परमेश्वर के प्रकटन को देखो राज्य के सुसमाचार पर अत्यावश्यक प्रश्न और उत्तर (संकलन) मसीह के न्याय के आसन के समक्ष अनुभवों की गवाहियाँ विजेताओं की गवाहियाँ (खंड I) मैं वापस सर्वशक्तिमान परमेश्वर के पास कैसे गया

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