11. परमेश्वर के वचन जीवन के चमत्कारों को जन्म देते हैं

यांग ली, जियांगशी प्रांत

जब मैं छोटी बच्ची थी, तभी मेरी माँ चल बसी थी। इस तरह, छोटी उम्र से ही मुझ पर घर की ज़िम्मेदारियों का बोझ आ गया। शादी के बाद, मेरी ज़िम्मेदारियाँ इतनी बढ़ गईं कि उनके बोझ तले मेरे लिए साँस लेना भी दूभर हो गया। अपनी मुश्किलों और मुसीबतों को झेलकर, वक्त के साथ मैं खिन्न, मायूस, शांत हो गई और अपने आप में सिमट गई, और एक-एक दिन यूँ ही ज़ाया करने लगी। 2002 में, जब कुछ भाई-बहनों ने मुझसे सर्वशक्तिमान परमेश्वर के अंत के दिनों के कार्य का सुसमाचार साझा किया, तो मैंने उसे प्रसन्नता से स्वीकार कर लिया। मैं अपने साथ अपने पति और बच्चों को भी परमेश्वर के सामने लेकर आई। तब से, भाई-बहन सभाओं के लिए अक्सर हमारे घर पर आने लगे। हम लोग परमेश्वर के वचनों पर सहभागिता करते, नाचते-गाते और परमेश्वर की स्तुति करते; इससे मुझे बेहद ख़ुशी मिलती और मेरा दुखी और चिंतित रहना बंद हो गया। मेरे बच्चों का कहना था कि मैं अब ज़्यादा युवा दिखती हूँ और हर समय ज़्यादा प्रसन्न रहने लगी हूँ। हम लोग परिवार में अक्सर परमेश्वर के वचनों को पढ़ते। परमेश्वर के वचनों से हमें बहुत से सत्य और इंसान को तुरंत बचाने की परमेश्वर की इच्छा समझ में आई। मैं हर जगह घूम-घूमकर सुसमाचार का प्रचार और परमेश्वर की गवाही देने लगी ताकि परमेश्वर के प्रेम का प्रतिदान दे सकूँ और जो लोग मेरी तरह शैतान के उत्पीड़न का शिकार हुए हैं, उन्हें परमेश्वर के समक्ष लाऊँ जिससे कि वे भी उसके द्वारा जल्दी से जल्दी बचाए जा सकें। मैंने कभी सोचा नहीं था कि मैं अपने इस काम से, सीसीपी सरकार के क्रूर उत्पीड़न का शिकार बन जाऊँगी ...

23 नवम्बर, 2005 को, शाम को करीब 7 बजे मैं बहनों के साथ एक सभा में थी, तभी मैंने ज़ोर-ज़ोर से दरवाज़ा खटखटाने की आवाज़ सुनी, मुझे पुलिस का अंदेशा हुआ। मैंने फ़ौरन परमेश्वर के वचनों की सारी पुस्तकें इकट्ठी कर लीं। जैसी कि मुझे उम्मीद थी, सामने का दरवाज़ा फ़ौरन लात मारकर तोड़ दिया गया; पाँच पुलिसवाले धड़धड़ाते हुए अंदर आए और हमें पागलों की तरह घेर लिया। उनका लीडर चिल्लाया: "बचने का कोई रास्ता नहीं है! तलाशी लो!" तुरंत ही, घर का सारा सामान बुरी तरह से उलट-पलट कर दिया गया। उन्होंने हमारे बैग और भजनों की सारी पुस्तकें ज़ब्त कर लीं, और हमें हथकड़ियाँ लगाकर पुलिस स्टेशन ले गए। इस तरह की ज़ोर-ज़बर्दस्ती से मैं बेहद घबरा गयी। मैंने हताश होकर परमेश्वर से हमारी रक्षा की गुहार लगायी। उसी समय, मेरे मन में परमेश्वर के वचनों के ये अंश आए: "तुम्हें पता होना चाहिए कि तुम्हारे परिवेश में सभी चीज़ें मेरी अनुमति से हैं, मैं इन सभी की व्यवस्था करता हूँ। स्पष्ट रूप से देखो और तुम्हें दिए गए वातावरण में मेरे दिल को संतुष्ट करो। डरो नहीं, सेनाओं का सर्वशक्तिमान परमेश्वर निश्चित रूप से तुम्हारे साथ होगा; वह तुम लोगों के पीछे है और तुम्हारा रक्षक है" ("वचन देह में प्रकट होता है" में आरम्भ में मसीह के कथन के "अध्याय 26")। परमेश्वर के वचनों ने मुझे भरपूर शक्ति और आस्था दी, मेरा भय दूर करके मुझे आत्मिक-संतुलन और ठहराव दिया। यह बात सही है! सभी घटनाएँ और चीज़ें परमेश्वर के हाथों में हैं, पुलिस भी परमेश्वर की मुट्ठी में है और उसके आयोजन के तहत है। चूंकि मुझे परमेश्वर का सहारा था, इसलिए मेरे लिए डरने की कोई बात नहीं थी। मुझे केवल परमेश्वर की इच्छा को जानने पर ध्यान देना था और उस पर निर्भर रहना था ताकि मैं हर स्थिति का सामना करते हुए उसकी गवाही दे सकूँ।

पुलिस स्टेशन में, नगर-निगम सार्वजनिक सुरक्षा ब्यूरो और स्थानीय पुलिस स्टेशन के दस अधिकारी दो-दो के समूह में हमसे बारी-बारी से पूछताछ कर रहे थे। वे हमसे हमारा नाम, पता और हमारी कलीसिया के अगुवाओं के बारे में पूछने लगे। जब हमने उन्हें कुछ नहीं बताया, तो उनकी कुंठा गुस्से में बदल गयी और उन्होंने हमें हथकड़ियों समेत लोहे की टाइगर बेंचों से बाँध दिया। उन पुलिसवालों के खूँखार चेहरे देखकर, मेरे मन में खौफ़ पैदा हो गया; मैं सोच रही थी कि पता नहीं ये लोग हमारे साथ किस तरह की नीच चालबाज़ियाँ चलेंगे और पता नहीं मैं टिक भी पाऊँगी या नहीं। जब एक अधिकारी ने देखा कि मैं कुछ बोल नहीं रही हूँ, तो उसने चापलूसी वाले लहजे में कहा, "देखिए बहुत देर हो रही है। आप अपना नाम-पता बता दीजिए, हम आपको तुरंत घर भेज देंगे।" उस समय मेरा दिमाग एकदम स्पष्ट था क्योंकि मुझे परमेश्वर की सुरक्षा मिली हुई थी। मैंने मन ही मन सोचा, "यह शैतान की कोई चाल है। अगर मैं इन्हें अपना नाम-पता बता दूँ, तो ये लोग यकीनन मेरे घर जाकर वहाँ की तलाशी लेंगे जिससे कलीसिया को बहुत नुकसान होगा।" इसलिए, ये दुष्ट पुलिसवाले जैसे चाहें मुझसे पूछताछ करें, लेकिन मैं अपनी ज़बान नहीं खोलूँगी। मैं बस परमेश्वर से यही प्रार्थना करने लगी कि वह मुझे बोलने के लिए उपयुक्त शब्द दे। अगले दिन, वे लोग आकर फिर वही सवाल करने लगे, और मैं फिर खामोश रही। उस शाम, एक महिला अधिकार अजीब से कपड़े पहनकर आयी, उसने मेरी ओर घूरकर देखा और भयभीत करने वाले अंदाज़ में मुझसे पूछा, "तेरा नाम क्या है? कहाँ रहती है?" मैं कुछ नहीं बोली, तो वो गुस्से से चिल्लाकर बोली: "तुम लोग पैसा कमाने के लिए काम-धंधा तो कुछ करते नहीं, बस खा-पीकर पड़े रहते हो। तुम लोगों के अंदर किसी परमेश्वर में विश्वास रखने की क्या खुजली है?" कहते हुए, वह मेरी तरफ कदम बढ़ाते हुए आई और अपनी ऊँची एड़ी के सैंडलों से मेरे पैरों पर ठोकर मारने लगी और चिल्लाती भी जा रही थी, "आस्था का अभ्यास करना है कमीनों को! अगर मुझे सही जवाब नहीं दिया, तो तेरी जान ले लूँगी!" मेरी टांगों में भयंकर पीड़ा और दिल में कमज़ोरी महसूस होने लगी, पता नहीं आगे ये लोग मेरे साथ क्या करेंगे। मैंने तुरंत परमेश्वर से याचना की कि वह मेरे दिल की रक्षा करे। प्रार्थना करने के बाद, मेरा डर निकल गया। चूँकि पूछताछ से उन्हें कुछ हासिल नहीं हुआ था, इसलिए हम तीनों को पुलिस ने नज़रबंदी गृह भेज दिया गया।

उस रात, भारी बर्फबारी हो रही थी और जमा देने वाली ठंड थी। हमारे बैग में ठंड से बचने के लिए जो कपड़े थे, वो सारे उन सनकी पुलिसवालों ने ज़ब्त कर लिए, और हमें एक महीन-सा कपड़ा पहनने के लिए मजबूर किया गया, पूरे सफ़र में हम लोग ठंड से काँपते रहे। नज़रबंदी गृह पहुँचने पर, हम लोगों को तहखाने की मनहूस और खौफ़नाक जेल वार्ड में रखा गया। बीच-बीच में दूसरे कैदियों की गालियाँ देने और चिल्लाने की आवाज़ें आ रही थीं जिससे कि मेरे रौंगटे खड़े हो रहे थे—मुझे लग रहा था जैसे मैं धरती के किसी नरक में आ गई हूँ। हम तीनों को एक ऐसी कोठरी में ठूँस दिया गया, जहाँ पर पहले से ही बीस कैदी और थे, उनसे भयंकर दुर्गंध आ रही थी। कोठरी के अंदर दोनों ओर सोने के लिए सीमेंट के प्लेटफॉर्म बने हुए थे और एक लम्बी मेज़ थी जिस पर एक बल्ब लटक रहा था। उस मेज़ के चारों तरफ कैदी बैठते थे। जैसे ही हम लोग अंदर गए, अधिकारी मुखिया कैदी से बोला, "इनका ज़रा अच्छा-सा स्वागत कर दो!" मादक द्रव्यों के अपराध में सज़ा काट रही मुखिया कैदी मुश्किल से तीस साल की रही होगी; अधिकारी का हुक्म सुनना था कि मेरे संभलने से पहले ही उसने मुझे बुरी तरह लातें मारी और ज़मीन पर पटक दिया। दर्द इतना भयंकर हुआ कि मैं चीखकर फर्श पर लोटपोट होने लगी। उसके बाद, उन्होंने हमारे सारे कपड़े फाड़ डाले, हमें बाथरूम में घसीटकर ले गए और ठंडे पानी से नहला दिया। हड्डियों को कँपा देने वाले ठंडे पानी से मेरे पूरे शरीर में ऐंठन होने लगी और लगातार मेरे दाँत किटकिटाने लगे। मेरे पूरे बदन में असह्य पीड़ा हो रही थी जैसे मुझे चाकू से काटा गया हो, देखते-देखते मैं बेहोश हो गयी। जब होश में आयी, तो मुझे ज्ञात हुआ कि मुझे घसीटकर वापस कोठरी में डाल दिया गया है। जब मुखिया कैदी ने मुझे होश में देखा, तो रहम करने के बजाय, मुझ पर फिर से लात-घूँसे बरसाने लगी। जब वो थक गयी, तो उसने मुझे एक तरफ फेंक दिया। दो बहनों ने आकर मुझे बाहों में भर लिया, उनके आँसू मुझ पर गिर रहे थे। अपने दिल में कमज़ोरी महसूस करते हुए, मैंने सोचा: "परमेश्वर मुझे मरने क्यों नहीं देता? अगर मैं मर गयी, तो मुझे छुटकारा मिल जाएगा, लेकिन अगर ज़िंदा रही, तो पता नहीं ये दरिंदे मुझे किस-किस तरह से मारेंगे और यातना देंगे, और पता नहीं मैं ये सब सह भी पाऊँगी या नहीं।" मैं इस पर जितना सोचती, उतनी ही ज़्यादा परेशान हो जाती। मेरी आँखों से झर-झर आँसू बहने लगे। इन कष्टों के बीच, परमेश्वर के वचनों ने मुझे प्रबुद्ध किया जिससे मुझे उसके वचनों का एक भजन याद आ गया: "तुम लोग निश्चय ही, मेरी रोशनी के नेतृत्व में, अंधकार की शक्तियों के गढ़ को तोड़ोगे। तुम अंधकार के मध्य निश्चय ही मार्गदर्शन करने वाली ज्योति से वंचित नहीं रहोगे। ... तुम लोग निश्चय ही पाप के देश में दृढ़ और अटूट खड़े रहोगे। तुम सब जो कष्ट सह रहे हो, उनके मध्य तुम मेरे द्वारा आने वाली आशीषों को प्राप्त करोगे और मेरी महिमा के भीतर के ब्रह्माण्ड में निश्चय ही जगमगाओगे" ("मेमने का अनुसरण करना और नए गीत गाना" में "विजेताओं का गीत")। मेरा दिल उसी समय स्नेह से भर गया—परमेश्वर की प्रतिज्ञा और प्रेम ने मुझे अंदर तक द्रवित कर दिया, मुझे यह एहसास कराया कि भले ही शैतान मुझ पर ज़ुल्म कर रहा था, लेकिन अगर मुझे परमेश्वर पर सच्चा भरोसा है और मैं उसे सम्मान की दृष्टि से देखती हूँ, तो परमेश्वर निश्चित रूप से मुझे अंधेरी ताकतों के दमन से बचाने और प्रकाश में आने में मेरा मार्गदर्शन करेगा। मैं जो कष्ट सह रही थी, वह मूल्यवान और सार्थक था; यह परमेश्वर का आशीष था, सत्य का अनुसरण करने और परमेश्वर का उद्धार पाने की प्रक्रिया में मुझे यह कष्ट तो झेलना ही था। यह परमेश्वर द्वारा शैतान की पराजय की मज़बूत गवाही भी था। शैतान चाहता था कि मैं परमेश्वर को नकार दूँ, उसे धोखा दूँ, इसलिए वह मुझे यातना और कष्ट दे रहा था; परमेश्वर के प्रति अपनी अटूट भक्ति रखकर, परमेश्वर की गवाही देने के लिए मुझे जो कष्ट उठाने चाहिए उन कष्टों को सहकर ही मैं शैतान की साज़िशों पर पलटकर प्रहार कर सहती हूँ, शैतान को अपमानित करते हुए परमेश्वर को गौरवान्वित कर सकती हूँ। इन तमाम बातों पर गहराई से सोचने के बाद, मैंने सच्चे मन से परमेश्वर के आगे प्रायश्चित किया और एक संकल्प किया: "हे परमेश्वर! हम जैसे पूरी तरह से भ्रष्ट हो चुके लोगों का उद्धार करने के लिए, एक सामान्य व्यक्ति जितना कष्ट सह सकता है, तूने उससे ज़्यादा कष्ट सहे। तूने हमारे लिए इतने कष्टसाध्य प्रयास किए, हमारे लिए तेरा प्रेम सचमुच महान है! मुझे तेरे प्रेम का प्रतिदान देना चाहिए, लेकिन आज, इन परीक्षणों के चलते, जब मुझे शैतान के सामने गवाही देनी चाहिए थी, तो मैं भाग खड़ी हुई। जब मेरी देह को थोड़ा-सा कष्ट हुआ, तो मैंने नकारात्मक होकर प्रतिरोध किया, सब-कुछ छोड़कर मरना चाहा ताकि इन चीज़ों से मेरा पिंड छूटे। मैं कितनी कायर हूँ, मुझमें ज़मीर है ही नहीं! अब से, चाहे कितने भी मुश्किल हालात आएँ, मैं तेरी गवाही देने की प्रतिज्ञा करती हूँ।" मुझे अपनी आस्था मज़बूत होती महसूस हुई, परमेश्वर के लिए गवाही देने की खातिर जीते रहने की इच्छा करते हुए, मैंने अपनी बहन का हाथ कसकर थाम लिया।

मुझे बीस दिनों तक नज़रबंदी गृह में रखने के बाद, पुलिसवाले मुझे काउंटी पब्लिक सेक्युरिटी ब्यूरो में ले आए। उन्होंने मुझे टाइगर बेंच से बाँधकर पूछताछ शुरू की। चूँकि मैंने एक भी शब्द बोलने से दृढ़तापूर्वक इंकार कर दिया था, इसलिए उन्होंने मुझे जड़ी हुई हथकड़ी पहनाकर, लोहे की जालीदार खिड़की से लटका दिया। मेरा शरीर हवा में इस तरह झूल रहा था कि मैं अपने पैरों की उंगलियों से ज़मीन को केवल छू भर पा रही थी। एक अधिकार मुझसे बड़े अहंकार से बोला, "मेरे पास अगर कुछ है, तो वो है धैर्य। मैं तेरी ऐसी हालत कर दूँगा कि तू मेरे आगे गिड़गिड़ाएगी और अपने आप बताएगी कि तेरा अगुवा कौन है!" और फिर, वह कमरे को तेज़ी से खोलकर बाहर निकल गया। तुरंत ही, मेरी कलाइयों में बहुत दर्द होने लगा जिसे बयाँ करना मुश्किल है। उस पल, मुझे परमेश्वर के वचनों का एक भजन याद आया: "क्या तुम सबने मिलने वाली आशीषों को स्वीकार किया है? क्या कभी तुम सबने मिलने वाले वायदों को पाया है? तुम लोग निश्चय ही, मेरी रोशनी के नेतृत्व में, अंधकार की शक्तियों के गढ़ को तोड़ोगे। तुम अंधकार के मध्य निश्चय ही मार्गदर्शन करने वाली ज्योति से वंचित नहीं रहोगे। तुम सब निश्चय ही सम्पूर्ण सृष्टि पर स्वामी होगे। तुम लोग शैतान पर निश्चय ही विजयी बनोगे। तुम सब निश्चय ही बड़े लाल अजगर के राज्य के पतन को देखोगे और मेरी विजय की गवाही के लिए असंख्य लोगों की भीड़ में खड़े होगे। तुम लोग निश्चय ही पाप के देश में दृढ़ और अटूट खड़े रहोगे। तुम सब जो कष्ट सह रहे हो, उनके मध्य तुम मेरे द्वारा आने वाली आशीषों को प्राप्त करोगे और मेरी महिमा के भीतर के ब्रह्माण्ड में निश्चय ही जगमगाओगे" ("मेमने का अनुसरण करना और नए गीत गाना" में "विजेताओं का गीत")। आँखों में आँसू लिए, मैं बार-बार उस भजन को गाती रही। मैं जितना गाती, मुझे उतनी ही ज़्यादा ऊर्जा मिलती, मैंने परमेश्वर के वचनों की ताकतवर जीवन शक्ति को महसूस किया जिसने मेरे दिल को मज़बूती दी और एक सशक्त आस्था दी कि अंधेरी ताकतों के दमन पर विजय पाने में परमेश्वर निश्चित रूप से मेरा मार्गदर्शन करेगा, और मुझे अपनी गवाही में मज़बूती से खड़ा रहने के लिए इन तमाम क्रूर अत्याचारों को सहन करने में मेरी मदद करेगा। परमेश्वर के वचनों के हौसले से, मेरी शारीरिक पीड़ा गायब हो गयी, मुझे महसूस हुआ कि मैं सचमुच परमेश्वर के करीब आ गयी हूँ और उसकी ज़्यादा अंतरंग बन गयी हूँ। मुझे लगा परमेश्वर ठीक मेरी बगल में है, मेरे साथ ही है। उसके वचनों ने मेरे दिल को द्रवित कर दिया। मैंने संकल्प लिया कि मैं परमेश्वर को संतुष्ट करने के लिए उसकी गवाही दूँगी और शैतान के आगे कभी हार नहीं मानूँगी!

उसके बाद, मुझे पूछताछ कक्ष में लाया गया, वहाँ सबसे पहले जो चीज़ें नज़र आयीं, वे थीं यातना देने के तरह-तरह के उपकरण: पुलिस के ढेरों छोटे-बड़े डंडे दीवार से लटक रहे थे, दीवारे की बगल में चमड़े के डंडे, चमड़े के कोड़े और टाइगर बेंच रखे थे। कुछ अधिकारी करीब बीस साल के एक पुरुष कैदी को बिजली के डंडों और चमड़े के कोड़ों से पीट रहे थे। उसके शरीर पर जगह-जगह कटने और ज़ख्म के निशान थे, वो इतना क्षत-विक्षत हो गया था कि पहचान में भी नहीं आ रहा था। तभी एक महिला अधिकारी अंदर आयी, और बिना कुछ बोले, मुझ पर लात-घूँसे बरसाने लगी, फिर उसने मुझे बालों से पकड़ा और मेरा सिर दीवार से दे मारा, ज़ोर से धम्म की आवाज़ आयी। मेरा सिर घूमने लगा, मुझे चक्कर आ गए, मेरा सिर इतना भयानक दर्द कर रहा था कि लगा अभी फट जाएगा। पीटते-पीटते वो गुर्राने लगी, "अगर आज तूने ज़बान नहीं खोली, तो तू कल का सूरज नहीं देख पाएगी!" दो पुरुष अधिकारी धमकी भरे अंदाज़ में बोले, "हमने आसपास के सारे पुलिस स्टेशनों से अधिकारियों को बुला लिया है। तुझसे पूछताछ करने के लिए हमारे पास समय ही समय है, एक महीना, दो महीने…। हमें तुझसे जो उगलवाना है, उसमें अब भले ही हमें कितना भी समय लग जाए।" उनकी यह बात सुनकर, और इन कमीनों ने मुझे जो क्रूर यातनाएं दी थीं, साथ ही अभी-अभी हुए उस पुरुष कैदी के उत्पीड़न के दृश्य को याद करके, मेरा दिल तेज़ी से धड़कने लगा, मेरे अंदर भय और खौफ़ की एक लहर दौड़ गयी। मैं बस तत्काल परमेश्वर से प्रार्थना ही कर सकती थी। उस पल, परमेश्वर के वचनों ने मेरा मार्गदर्शन किया, "जब लोग अपने जीवन का त्याग करने के लिए तैयार होते हैं, तो सब कुछ तुच्छ हो जाता है, और कोई भी उनका लाभ नहीं उठा सकता। जीवन से अधिक महत्वपूर्ण क्या हो सकता है? इस प्रकार, शैतान लोगों में अधिक कार्य करने में असमर्थ हो जाता है, वह मनुष्य के साथ कुछ भी नहीं कर सकता। हालांकि, 'देह' की परिभाषा में यह कहा जाता है कि देह शैतान द्वारा दूषित है, अगर लोग वास्तव में स्वयं को अर्पित कर देते हैं, और शैतान से प्रेरित नहीं रहते हैं, तो कोई भी उनसे लाभ नहीं प्राप्त कर सकता—और इस समय, देह अपने दूसरे कार्य का प्रदर्शन करेगा, और आधिकारिक तौर पर परमेश्वर के आत्मा द्वारा दिशा प्राप्त करना शुरू कर देगा" ("वचन देह में प्रकट होता है" में संपूर्ण ब्रह्मांड के लिए परमेश्वर के वचनों के रहस्य की व्याख्या के "अध्याय 36")। परमेश्वर ने मुझे एक अभ्यास का मार्ग दिया। मैंने सोचा, "शैतान ने वाकई मेरी इस कमज़ोरी का, मेरे मौत के भय का फायदा उठाया है ताकि मैं परमेश्वर से धोखा करूँ, और परमेश्वर इस स्थिति का इस्तेमाल अपने प्रति मेरी आस्था की ईमानदारी का इम्तहान लेने के लिए कर रहा है। अगर मैं सचमुच इस बारे में सोचूँ कि मेरा जीवन परमेश्वर के हाथों में है, तो मैं शैतान से क्यों डरूँ? यही समय है कि मैं परमेश्वर की गवाही दूँ; मैं अपने जीवन को अर्पित करके, मौत के भय से निकलकर ही मैं शैतान के प्रभाव से मुक्त हो सकती हूँ और परमेश्वर की गवाही दे सकती हूँ।" इन बातों पर विचार करके, मेरे मन से मौत का भय निकल गया और मैंने तय किया कि मैं परमेश्वर की संतुष्टि के लिए अपने जीवन को अर्पित करूँगी। जब इनमें से एक दुष्ट पुलिसवाले ने देखा कि मेरे अंदर कोई डर नहीं है, तो वो गुस्से में चिल्लाया, "अगर अब हमने तुझे सबक नहीं सिखाया, तो तू समझेगी कि हमें पता ही नहीं कि हम तेरे साथ क्या करें!" और उन्होंने मुझे फिर से काँटों जड़ी हथकड़ियाँ लगाकर, उसके सहारे मुझे ऊँचाई पर खिड़की की लोहे की जाली से लटका दिया, और मुझे बिजली के डंडे से कोंचने लगे। बिजली का तेज़ प्रवाह मेरे शरीर में दौड़ने लगा, जिससे कि मेरा शरीर लगातार काँपने और ऐंठने लगा। मैं जितना कसमसाती, हथकड़ियाँ मेरी कलाइयों में उतनी ही कसती जातीं; दर्द इतना भयानक था, लगा अभी मेरे हाथ टूटकर गिर जाएँगे, मेरा पूरा बदन बहुत ज़्यादा दर्द कर रहा था। दोनों दुष्ट पुलिसवाले बारी-बारी से बिजली के डंडे से मुझे यातना दे रहे थे, उन डंडों से लगातार चटचटाहट की आवाज़ निकल रही थी। जब भी वो मुझे डंडा चुभाते, मेरा पूरा शरीर मरोड़ खाने और चीखने लगता। धीरे-धीरे मैं सुन्न होने लगी और होश खोने लगी, आखिरकार, मेरी चेतना चली गयी। कुछ समय बाद, पता नहीं कितनी देर बाद, ठंड के मारे मेरी आँख खुल गयी। जब दुष्ट अधिकारियों के गिरोह ने देखा कि मैंने महीन-सा कपड़ा पहना हुआ है, तो उन्होंने जानबूझकर सारी खिड़कियाँ खोल दीं ताकि मुझे और ज़्यादा ठंड लगे। मेरी खिड़की से एक शीत लहर लगातार अंदर आ रही थी; मुझे इतनी ज़्यादा ठंड लग रही थी कि मेरा शरीर अकड़ गया, और मुझे लगा कि मैं फिर से बेहोश हो रही हूँ, लेकिन तब मुझे स्पष्ट विचार आया: "मैं टूट नहीं सकती। मुझे परमेश्वर की गवाही देनी होगी, फिर भले ही चाहे मेरी मौत हो जाए!" तभी मेरे ज़हन में इंसान को बचाने की खातिर प्रभु यीशु के सूली पर चढ़ने का दृश्य आया: इंसान के छुटकारे के कार्य को पूरा करने के लिए प्रभु यीशु को बुरी तरह से क्षत-विक्षत करके, सूली पर चढ़ा दिया गया था। अगर इंसान को बचाने के लिए परमेश्वर अपनी जान दे सकता है, तो मैं परमेश्वर के प्रेम का थोड़ा-सा प्रतिदान क्यों नहीं दे सकती? परमेश्वर के प्रेम ने मुझे हौसला दिया और मैंने परमेश्वर से प्रार्थना की: "हे परमेश्वर! मैं जो साँसें लेती हूँ, वो मुझे तूने दी हैं, इसलिए अगर तू इन्हें वापस लेना चाहे, तो मैं लौटाने को तैयार हूँ। तेरे लिए मरना मेरे लिए गौरव और सम्मान की बात होगी!" धीरे-धीरे मेरी पूरी चेतना लौट आयी। यह सोचकर कि किस तरह पतरस, स्टीवन और अन्य अनुयायी शहीद हुए थे, मैं उस कलीसिया भजन को गाने लगी जो मुझे अच्छी तरह से याद था: "उनकी पवित्र योजना और प्रभुसत्ता से, मैं अपने इम्तहानों का सामना करता हूँ। मैं कैसे हार मान लूँ या छिपने की कोशिश करूं? सबसे पहले जो है वो है परमेश्वर की महिमा। संकट की घड़ियों में, परमेश्वर के वचन राह दिखायें मुझे और पूरी करें मेरी आस्था मैं हूँ पूरा निष्ठा में डूबा हुआ, परमेश्वर को समर्पित, मौत के भय के बिना। हमेशा सबसे ऊपर है उनकी इच्छा। अपने भविष्य से बेपरवाह, नुकसान-नफ़े का ध्यान नहीं। मैं बस इतना चाहूँ कि परमेश्वर को संतुष्टि मिले। मैं दूं गूँज-भरी गवाही परमेश्वर के गौरवगान की, शैतान को लज्जित करने की। शपथ लेता हूँ परमेश्वर को प्रेम के बदले प्रेम देने की । मैं गुणगान करता हूँ उनका दिल में। मैंने देखा है धार्मिकता के सूर्य को, सत्य करता है काबू धरती की हर चीज़ को। परमेश्वर का स्वभाव है धर्मी और मानवता द्वारा गुणगान के लायक है मेरा दिल सदा-सदा करेगा प्रेम सर्वशक्तिमान परमेश्वर से, और मैं उनके नाम को करूँगा बुलंद।" ("मेमने का अनुसरण करना और नए गीत गाना" में "मैं बस इतना चाहूँ कि परमेश्वर को संतुष्टि मिले")। मैं जितना गाती गयी, उतनी ही द्रवित होती गयी, मुझे उतना ही ज़्यादा हौसला मिला, मेरा गला रुँध गया और आँसू बह निकले। मैंने परमेश्वर को अपने साथ महसूस किया, मैंने जब उसे अपने मन की बात बतायी तो वो बड़े ध्यान से सुन रहा था। मुझे अपने दिल में स्नेह का एहसास हुआ, मुझे पता था कि परमेश्वर मुझे अपने सशक्त हाथों से लगातार सहारा देता रहा है ताकि मैं ठंड से और अपनी मौत से न डरूँ। मैंने मन ही मन यह संकल्प किया: चाहे मुझे किसी भी तरह के उत्पीड़न और कष्टों का सामना करना पड़े, मैं अपनी जान की कसम खाती हूँ कि मैं अंत तक निष्ठावान रहूँगी और परमेश्वर के प्रेम के प्रतिदान की गवाही दूँगी!

अगले दिन सुबह, एक पुलिसवाले ने मुझे ज़ोरदार ढंग से डाँटते हुए कहा, "तेरी तकदीर अच्छी है कि कल रात तू ठंड से मरी नहीं, लेकिन अगर आज तूने ज़बान नहीं खोली, तो तेरा परमेश्वर भी तुझे बचा नहीं पाएगा!" मैं विचलित हुए बिना, मन ही मन हँसी। मैंने सोचा, "परमेश्वर ही स्वर्ग, धरती और हर चीज़ का सृष्टिकर्ता है, वही सभी चीज़ों पर शासन करता है, सर्व-समर्थ है और अधिकार से परिपूर्ण है। 'क्योंकि जब उसने कहा, तब हो गया; जब उसने आज्ञा दी, तब वास्तव में वैसा ही हो गया।' मेरा जीवन भी परमेश्वर के हाथों में है; अगर अब वह मुझे बचाना चाहे, तो क्या यह उसके लिए एकदम आसान नहीं होगा? बात केवल इतनी है कि वह अपने सेवाकार्य के लिए तुझ जैसे शैतान का इस्तेमाल करना चाहता है।" तभी उस दुष्ट पुलिसवाले ने बिजली के डंडे से मुझे फिर से कोंचना शुरु कर दिया, एक ज़ोरदार करंट मेरे पूरे शरीर में दौड़ गया, दर्द इतना भयानक था कि न चाहते हुए भी मैं कसमसाकर चीख उठी। वो दुष्ट पुलिसवाला अट्टहास करते हुए बोला, "जितना चिल्लाना है चिल्ला! बुला अपने परमेश्वर को कि आकर तुझे बचाए! अगर तू मेरे आगे बचाने की भीख माँगेगी, तो मैं वादा करता हूँ तुझे जाने दूँगा!" पुलिसवाले की इस पाशविक हिमाकत देखकर मेरा मन अत्यंत घृणा से भर गया और मैंने मन ही मन परमेश्वर से प्रार्थना की: "हे परमेश्वर! दुष्ट शैतान कितना वहशी है! यह तुझे कलंकित और निंदित कर रहा है; यह तेरा कट्टर शत्रु है तो मेरा भी कट्टर दुश्मन है। यह जैसे चाहे मुझे यातना दे, लेकिन मैं तुझे धोखा नहीं दूँगी। मेरी एकमात्र इच्छा है कि मुझे तेरा हृदय प्राप्त हो। ये हैवान मेरे तन को नुकसान पहुँचा सकते हैं, लेकिन तुझे संतुष्ट करने के मेरे संकल्प को कभी नष्ट नहीं कर सकते। मैं चाहती हूँ कि तू मुझे शक्ति प्रदान करे।" वो पत्थर दिल और पागल पुलिसवाला अपने डंडे से मुझे लगातार कोंचता रहा; जब पहले वाले बिजली के डंडे की बैटरी खत्म हो गयी, तो वो नए डंडे से मुझे कोंचता रहा। मुझे याद नहीं कुल मिलाकर उसने कितने डंडों का प्रयोग किया होगा। मुझे लगने लगा कि मौत मेरे करीब है और अब बचना मुश्किल है। इस नकारात्मकता और मायूसी में, मैं हताश होकर केवल परमेश्वर को ही पुकार सकती थी, याचना कर सकती थी कि वह मेरी रक्षा करे और मुझे बचाए। उस पल, मेरे दिमाग में परमेश्वर के वचनों का यह अंश आया: "परमेश्वर की जीवन शक्ति किसी भी शक्ति पर प्रभुत्व कर सकती है; इसके अलावा, वह किसी भी शक्ति से अधिक है। उसका जीवन अनन्त काल का है, उसकी सामर्थ्य असाधारण है, और उसके जीवन की शक्ति आसानी से किसी भी प्राणी या शत्रु की शक्ति से पराजित नहीं हो सकती। परमेश्वर की जीवन-शक्ति का अस्तित्व है, और अपनी शानदार चमक से चमकती है, चाहे वह कोई भी समय या स्थान क्यों न हो। परमेश्वर का जीवन सम्पूर्ण स्वर्ग और पृथ्वी की उथल-पुथल के मध्य हमेशा के लिए अपरिवर्तित रहता है। हर चीज़ का अस्तित्व समाप्त हो जायेगा, परन्तु परमेश्वर का जीवन फिर भी अस्तित्व में रहेगा। क्योंकि परमेश्वर ही सभी चीजों के अस्तित्व का स्रोत है, और उनके अस्तित्व का मूल है" ("वचन देह में प्रकट होता है" में "केवल अंतिम दिनों का मसीह ही मनुष्य को अनन्त जीवन का मार्ग दे सकता है")। परमेश्वर के वचनों ने मुझे असीम शक्ति से भर दिया और उन कमज़ोर पलों में तुरंत ही मुझे बेहद मज़बूत आस्था दी। मैंने सोचा: "हाँ, मुझे एकमात्र सर्वशक्तिमान परमेश्वर में आस्था है। परमेश्वर ही शाश्वत और अलौकिक है, परमेश्वर की जीवन शक्ति सभी चीज़ों से श्रेष्ठ है और उन पर विजय हासिल करती है। जो कुछ है सब परमेश्वर के वचनों से आता है। इंसान के सभी पहलू, जिनमें उसका जीवन और मृत्यु भी शामिल है, परमेश्वर के पंच-निर्णय के अधीन हैं। मेरा जीवन तो और भी अधिक परमेश्वर के हाथों में है, इसलिए शैतान मेरी मौत पर अपना अंकुश कैसे रख सकता है? मिसाल के तौर पर, जब लाज़ारुस अपनी कब्र में सड़ने लगा था, तो किस तरह प्रभु ने उसे पुकारा था, 'हे लाज़र, निकल आ!' (यूहन्ना 11:43)। और लाज़ारुस कब्र से प्रकट हो गया था, मौत के मुँह से बाहर आ गया था। परमेश्वर के वचनों में अधिकार और सामर्थ्य होती है; उसने अपने वचनों से विश्व की रचना की है, वह अपने वचनों से हर युग में राह दिखाता है। आज, परमेश्वर अपने वचनों के ज़रिए हमें बचाता और पूर्ण करता है। अब मुझे अपनी धारणाओं और कल्पनाओं के अनुसार चीज़ों की व्याख्या नहीं करनी चाहिए, बल्कि परमेश्वर के वचनों के अनुसार जीना चाहिए। आज, अगर परमेश्वर मुझे नहीं मरने देता है, तो शैतान चाहे जितनी पाशविकता से पेश आए, वो मुझे मार नहीं सकता। अगर मैं परमेश्वर को सम्मान दे पायी, तो मैं खुशी-खुशी मरने को तैयार हो जाऊँगी।" जब मैंने परमेश्वर के वचनों के अनुसार जीना शुरू कर दिया, और अपनी मौत की चिंता करनी बंद कर दी, तो एक चमत्कार हुआ: वह दुष्ट पुलिसवाला भले ही कैसे भी झटके देता रहा, लेकिन मुझे कोई कष्ट या दर्द महसूस नहीं हुआ। मेरा दिमाग एकदम स्पष्ट था। मुझे यकीन था कि यह परमेश्वर की सुरक्षा और देखभाल है—ये परमेश्वर के सशक्त हाथ हैं जो मुझे संभाल रहे हैं। मैंने सचमुच प्रत्यक्ष रूप से परमेश्वर के वचनों के भरपूर सामर्थ्य का अनुभव किया, साथ ही परमेश्वर की जीवन शक्ति की अलौकिक और असाधारण प्रकृति का अनुभव किया। परमेश्वर के वचन सत्य और जीवन की वास्तविकता हैं। उसकी जीवन शक्ति को अंधेरे की कोई भी ताकत दबा नहीं सकती। दुष्ट पुलिसवालों ने मुझ पर चाहे जैसे ज़ुल्म और अत्याचार किए हों, बारी-बारी से मुझे क्रूर यातनाएँ दी हों, लेकिन मैं वो सब कुछ झेल पायी। यह मेरी अपनी क्षमता नहीं थी, बल्कि यह पूरी तरह से परमेश्वर की शक्ति और अधिकार था। अगर मुझे परमेश्वर के वचनों ने शक्ति और आस्था न दी होती, तो मैं बहुत पहले ही टूट गयी होती। मुझे इस बात का गहरा बोध था कि, जब मेरा तन एकदम कमज़ोर था और मैं कष्टों की गहराई में डूबी हुई थी, तो परमेश्वर हमेशा मेरे साथ था, अपने सशक्त और सामर्थ्यवान जीवन-वचनों से मुझे सहारा दे रहा था, हर समय मेरी रक्षा कर रहा था, ताकि मेरी आस्था और मज़बूत हो और मेरा संकल्प और दृढ़ हो।

उस रात, उन्होंने मुझे यातना देने का एक अलग तरीका आज़माया। वे मुझे हथकड़ी लगाकर खिड़की के सामने ले आए, जहाँ से बाहर की ज़बर्दस्त ठंड़ी हवा आ रही थी और फिर बारी-बारी से मुझ पर नज़र रखते रहे कि कहीं मैं सो तो नहीं रही। जैसे ही मुझे झपकी आने लगती, वे लोग मेरे गाल पर तमाचा मारते। मैंने दो दिनों से न तो पानी की एक बूंद पी थी, न ही खाने का एक निवाला लिया था, मेरे तन में ज़रा-सी भी शक्ति नहीं थी, मेरी आँखें इतनी सूज गई थीं कि मैं उन्हें खोल नहीं पा रही थी। मेरे पूरे शरीर में भयंकर कष्ट हो रहा था, मैं सोच रही थी कि पता नहीं यह यंत्रणा और कितने समय तक चलेगी। हड्डियों को गला देने वाली ठंडी हवा लगातार मेरे ऊपर आ रही थी और मैं निरंतर सर्दी से काँप रही थी। पुलिसवाला घुटनों तक जैकेट पहनकर, कुर्सी पर मेरे सामने बैठा था, और इंतज़ार कर रहा था कि मैं हार मान लूँ। उस पल, ऐसा लग रहा था जैसे मेरे सामने नरक में दुष्टात्मा के द्वारा किसी को यातना देने का दृश्य चल रहा हो। मैं अपना गुस्सा दबा नहीं पायी: इंसान को परमेश्वर ने बनाया है, इसलिए उसकी आराधना करना सहज और सही है, लेकिन यह नीच और निर्लज्ज सीसीपी सरकार, लोगों को सच्चे परमेश्वर की आराधना नहीं करने देती। पूरी दुनिया को नास्तिक बनाने और हमेशा के लिए लोगों को नियंत्रित करने के अपने पैशाचिक मकसद को पूरा करने, अपना अनुसरण और पूजा करवाने के लिए, यह परमेश्वर के कार्य का विरोध करती है, उसमें पूरी ताकत से बाधा पहुँचाती है और उसे तबाह करती है, सर्वशक्तिमान परमेश्वर के अनुयायियों का क्रूर उत्पीड़न करने के लिए हर घृणित तरीका अपनाती है। उस पुराने हैवान ने बहुत ही भयानक अपराध किए हैं—उसे धिक्कारा और उसकी निंदा की जानी चाहिए! अचानक मेरे मन में परमेश्वर के वचनों का यह भजन आया: "हज़ारों सालों से यह गंदगी की भूमि रही है, यह असहनीय रूप से मैली है, दुःख से भरी हुई है, प्रेत यहाँ हर कोने में घूमते हैं, चालें चलते हुए और धोखा देते हुए, निराधार आरोप लगाते हुए, क्रूर और भयावह बनते हुए, इस भूतिया शहर को कुचलते हुए और मृत शरीरों से भरते हुए; क्षय की बदबू ज़मीन को ढक चुकी है और हवा में शामिल हो गई है, और इसे बेहद संरक्षित रखा जाता है। आसमान से परे की दुनिया को कौन देख सकता है? ऐसे भूतिया शहर के लोग कैसे कभी परमेश्वर को देख सकते हैं? क्या उन्होंने कभी परमेश्वर की प्रियता और सुंदरता का आनंद लिया है? ... परमेश्वर के कार्य के सामने ऐसी अभेद्य बाधा क्यों डालना? परमेश्वर के लोगों को धोखा देने के लिए विभिन्न चालों को क्यों आज़माना? वास्तविक स्वतंत्रता और वैध अधिकार और हित कहां हैं? निष्पक्षता कहां है? आराम कहाँ है? स्नेह कहाँ है? धोखेबाज़ योजनाओं का उपयोग करके परमेश्वर के लोगों को क्यों छलना? परमेश्वर के आगमन को दबाने के लिए बल का उपयोग क्यों? क्यों परमेश्वर को तब तक परेशान किया जाए जब तक उसके पास आराम से सिर रखने के लिए जगह न रहे? ऐसा कैसे हो सकता है कि यह रोष उत्तेजित न करे? दिल में हज़ारों वर्ष की घृणा भरी हुई है, पापमयता की सहस्राब्दियाँ दिल पर अंकित हैं—यह कैसे घृणा को प्रेरित नहीं करेगा? परमेश्वर का बदला लो, अपने शत्रु को पूरी तरह समाप्त कर दो। यही समय है: मनुष्य अपनी सभी शक्तियों को लंबे समय से इकट्ठा करता आ रहा है, उसने इसके लिए अपने सभी प्रयासों को समर्पित किया है। ताकि वह इस दानव के घृणित चेहरे को तोड़ सके और जो लोग अंधे हो गए हैं, जिन्होंने हर प्रकार की पीड़ा और कठिनाई सही है, उन्हें अनुमति दे कि वे अपने दर्द से उठें और इस दुष्ट प्राचीन शैतान को अपनी पीठ दिखाएं" ("मेमने का अनुसरण करना और नए गीत गाना" में "अंधेरे में हैं जो उन्हें ऊपर उठना चाहिये")। मैंने भजन को मन ही मन बार-बार गाया। भजन गाते-गाते मेरी नसों में खून उबाल लेने लगा और मेरे अंदर ज़बर्दस्त क्रोध उफन पड़ा; मैंने उस पुराने हैवान, शैतान को त्याग देने की कसम खायी, मैं दिल में चीखी: "हैवान! अगर तुझे लगता है कि मैं परमेश्वर को धोखा दूँगी, सत्य मार्ग को त्याग दूँगी, तो तू एकदम गलत है!" मुझे अच्छी तरह पता था कि परमेश्वर ने मुझे शक्ति प्रदान की है, सर्वशक्तिमान परमेश्वर ने मेरी आत्मा को सहारा दिया है।

पाँचवें दिन, हथकड़ियों की वजह से मेरे हाथों की नसों में खून उतर आया, वे सुन्न हो गए और बुरी तरह सूज गए। मुझे लगा जैसे जोड़ों के स्थान पर मेरा शरीर अलग हो रहा है, जैसे अंदर से हज़ारों कीड़े मुझे खा रहे हैं। उस दर्द और पीड़ा को बयाँ नहीं किया जा सकता। मैं मन ही मन निरंतर प्रार्थना कर रही थी, परमेश्वर के आगे गिड़गिड़ा रही थी कि मुझे शक्ति दे ताकि मैं अपनी देह की कमज़ोरी पर काबू पा सकूँ। समय इतनी धीमी गति से चल रहा था कि मर्मांतक पीड़ा दे रहा था, धीरे-धीरे अंधेरा छाने लगा। मैं भूखी-प्यासी थी, सर्दी के कारण ठिठुर रही थी, शरीर से ऊर्जा की एक-एक बूंद निचुड़ गयी थी—मुझे लगा कि मैं इस सब को और नहीं झेल पाऊँगी। अगर यह और चला, तो मैं निश्चित रूप से भूख और प्यास से मर जाऊँगी। तब जाकर मुझे उस दुष्ट अधिकारी की इस बात का मतलब समझ में आया, "मैं तुझे अपने आगे गिड़गिड़ाने के लिए मजबूर कर दूँगा।" वह अपनी घृणित चालों से मुझे परमेश्वर को धोखा देने के लिए मजबूर करने की कोशिश कर रहा था। लेकिन मैं उसकी चाल में नहीं आयी; मुझे परमेश्वर पर निर्भर होना पड़ा। इस तरह, मैंने बार-बार परमेश्वर को पुकरा: "हे सर्वशक्तिमान परमेश्वर! मैं तुझसे विनती करती हूँ कि तू मुझे शक्ति दे, ताकि मैं शैतान के क्रूर दंड और यातना को सहने के लिए तुझ पर निर्भर रह सकूँ। अगर मुझे मरना भी पड़े, तो भी मैं धोखा देकर यहूदा न बनूँ।" उस पल, परमेश्वर के वचनों ने मुझे प्रबुद्ध किया: "मनुष्य का जीवन परमेश्वर से निकलता है, स्वर्ग का अस्तित्व परमेश्वर के कारण है, और पृथ्वी का अस्तित्व भी परमेश्वर की जीवन शक्ति से ही उद्भूत होता है। कोई वस्तु कितनी भी महत्वपूर्ण हो, परमेश्वर के प्रभुत्व से बढ़कर श्रेष्ठ नहीं हो सकती, और कोई भी वस्तु शक्ति के साथ परमेश्वर के अधिकार की सीमा को तोड़ नहीं सकती है" ("वचन देह में प्रकट होता है" में "केवल अंतिम दिनों का मसीह ही मनुष्य को अनन्त जीवन का मार्ग दे सकता है")। परमेश्वर के अधिकारपूर्ण वचनों ने मुझे आस्था और शक्ति प्रदान की। "यह सच है," मैंने सोचा, "परमेश्वर मेरे जीवन का स्रोत है: जब तक परमेश्वर मेरी इन साँसों को वापस नहीं ले लेता, शैतान मुझे जितना चाहे सताए, चाहे खाने-पीने को न दे, मैं मरने वाली नहीं। मेरा जीवन परमेश्वर के हाथों में है, इसलिए मुझे किस बात का डर है?" उस पल मुझे परमेश्वर में अपनी आस्था और समझ को लेकर शर्मिंदगी और लज्जा महसूस हुई। मुझे यह भी एहसास हुआ कि परमेश्वर इस मुश्किल परिस्थिति के ज़रिए मेरे अंदर सत्य स्थापित कर रहा है: "मनुष्य केवल रोटी ही से नहीं, परन्तु हर एक वचन से जो परमेश्‍वर के मुख से निकलता है, जीवित रहेगा" (मत्ती 4:4)। इसलिए मैंने परमेश्वर से प्रार्थना की: "हे सर्वशक्तिमान परमेश्वर, सर्वस्व के शासक, मेरा जीवन का प्रबंधन तेरे हाथों में है, मैं तेरे आयोजनों और व्यवस्थाओं के प्रति समर्पित होने को तैयार हूँ। मैं चाहे मरूँ या जिऊँ, मैं तेरे सारे आयोजनों को स्वीकार करूँगी।" प्रार्थना करने के बाद, मैंने अपने शरीर में शक्ति का संचार महसूस किया। मुझे पहले जितनी भूख और प्यास भी महसूस नहीं हुई। रात आठ बजे, एक दुष्ट पुलिसवाला लौटकर आया। उसने मेरी ठोड़ी में चुटकी काटी और फिर कुटिल मुस्कराहट फेंकता हुआ बोला, "तो कैसा चल रहा है? मज़ा आ रहा है? तू मेरे आगे गिड़गिड़ाकर सब-कुछ बताने को तैयार है जो मैं जानना चाहता हूँ? अगर तू ज़बान नहीं खोलेगी, तो तुझसे पेश आने के मेरे पास और भी बहुत से तरीके हैं!" मैंने आँखें बंद करके उसे नज़रंदाज़ कर दिया, इससे वो बहुत भड़क गया—गाली-गलौच करते हुए उसने एक हाथ से मेरा गिरेबान पकाड़ा और दूसरे हाथ से मेरे दोनों गालों पर तड़ातड़ तमाचे मारने लगा। तुरंत ही मेरे गाल सूज गए, और डर के मारे उनमें जलन होने लगी। दुष्ट पुलिसवाले के वहशीपन से उसका हैवानी सार साफ़ तौर पर ज़ाहिर हो रहा था; मुझे उससे और भी ज़्यादा नफ़रत हो गयी, शैतान की निरंकुशता के आगे न झुकने का मेरा इरादा और भी मज़बूत हो गया। परमेश्वर की गवाही देने और उसे संतुष्ट करने के लिए मेरा संकल्प दृढ़ हो गया। उस पल, मैंने अपने तन की पीड़ा की परवाह नहीं की, बल्कि मैंने यह सोचते हुए दुष्ट पुलिसवाले को घूरकर देखा, "तुझे लगता है कि तू मुझे परमेश्वर को धोखा देने के लिए मजबूर कर देगा? यह सपना देखना छोड़ दे!" परमेश्वर के मार्गदर्शन से, मेरा दिल आस्था और शक्ति से भर गया था; अधिकारी के हाथों हर तरह की मार खाने के बावजूद, मैं उसके आगे नहीं झुकी। अंत में, जब अधिकारी थककर चूर हो गया, तो उसने पीटना छोड़ दिया।

उसके बाद, पुलिसवालों ने मुझ पर और भी ज़्यादा कड़ी नज़र रखनी शुरू कर दी। वे शिफ्ट में काम करते हुए, मुझ पर हर वक्त नज़र रखने लगे। अगर कभी ज़रा भी मेरी आँख लगने लगती, तो वे लोग मुझे जगाकर मोड़कर गोल की हुई पत्रिका से पीटते। मैं अच्छी तरह समझ गयी कि वे लोग मेरे संकल्प को तोड़ने के लिए ऐसा कर रहे थे, मुश्किल हालात से गुज़र रही मेरी मानसिक स्थिति का फायदा उठाकर मुझसे कलीसिया के बारे में जानकारी हासिल करना चाहते थे। उस मुकाम पर, मैं पहले से ही शारिरिक रूप से बेहद कमज़ोर हो चुकी थी और बेहोश होने की स्थिति में आ गयी थी। सर्दी, भूख और थकान ने कुल मिलाकर मुझे इस मुकाम पर पहुँचा दिया कि मैं मरने की कामना करने लगी। मुझे लगा कि अब मैं और नहीं टिक सकूँगी; मुझे लग रहा था कि मैं इस पीड़ा को झेल नहीं पाऊँगी और अनजाने में ही परमेश्वर को धोखा दे बैठूँगी। इस विचार के आते ही, मैं यह सोचकर मृत्यु की इच्छा करने लगी कि अगर मैं मर गयी, तो कम से कम कलीसिया से गद्दारी और परमेश्वर को धोखा तो नहीं दूँगी। इसलिए मैंने परमेश्वर से प्रार्थना की: "प्यारे परमेश्वर, अब मैं यह सब और ज़्यादा बर्दाश्त नहीं कर सकती। मुझे डर है कि कहीं मैं तुझे धोखा न दे दूँ। मैं तुझसे प्रार्थना करती हूँ कि तू मेरे दिल की रक्षा कर। मैं यहूदा बनने के बजाय मरना पसंद करूँगी।" उसके बाद, मैं धीरे-धीरे होश खोने लगी, बेहोशी की उस स्थिति में मुझे अपना शरीर बहुत ही हल्का महसूस हुआ, मानो ठंडी हवा ने इसे सुखा दिया हो। लगा जैसे हथकड़ियाँ मेरी कलाइयों में ढीली हो गयी हों, मुझे समझ में नहीं आया कि मैं ज़िंदा हूँ कि मर गयी। छठे दिन की सुबह, किसी अधिकारी ने मुझे झिंझोड़ कर उठाया; तब मुझे एहसास हुआ कि मैं ज़िंदा हूँ, और मैं अभी भी वहाँ हथकड़ियों के सहारे लटकी हुई हूँ। वह दुष्ट पुलिसवाला दहाड़ा, "तूने वाकई हमारी नींद उड़ा दी है। हम में से एक भी ढंग से सो नहीं पाया है, हम लोग तेरे साथ इस चूहे-बिल्ली के खेल में ही उलझे हुए हैं। अगर आज तूने मुँह नहीं खोला, तो मैं तेरी यह हालत कर दूँगा कि तू फिर कभी अपना मुँह नहीं खोल पाएगी!" चूँकि अब मैं मरना ही चाहती थी, मैंने बेधड़क होकर उसे जवाब दिया: "अगर तुम मेरी जान लेना चाहते हो या मेरे टुकड़े-टुकड़े करना चाहते हो, तो लो अभी कर दो!" वह दुष्ट पुलिसवाला तंज़ कसते हुए बोला, "अच्छा, तो तू मरना चाहती है? तेरी ऐसी तकदीर नहीं है! फिर तो तेरे लिए आसान हो जाएगा! मैं तुझे प्यार से, धीरे-धीरे यातना दूँगा जब तब कि तू पागल न हो जाए, ताकि हर कोई जान जाए कि सर्वशक्तिमान परमेश्वर में विश्वास रखना तुम्हें पागल कर देगा, तब हर कोई तेरे परमेश्वर को छोड़ भागेगा!" जब मैंने उसे शैतानी ज़हर उगलते देखा, तो मैं भौंचक्की और अवाक रह गयी: यह दुष्टात्मा तो बहुत ही बेरहम और कुटिल है! उसके तुरंत बाद, उस दुष्ट पुलिसवाले ने अपने मातहत को कटोरे में काला तरल पदार्थ लाने का हुक्म दिया। उसे देखते ही मेरा कलेजा मुँह को आ गया और मैंने तत्काल परमेश्वर से प्रार्थना की: "हे परमेश्वर! यह दुष्ट पुलिसवाला मुझे कोई मादक द्रव्य पिलाकर मुझे पागल कर देना चाहता है। मैं तुझसे याचना करती हूँ, मेरी रक्षा कर। मैं पागल होने से बेहतर ज़हर खाकर मरना पसंद करूँगी।" उसी पल, मेरे मन में परमेश्वर के ये वचन आए: "उसके कार्य सभी जगह हैं, उसका सामर्थ्य सभी जगह है, उसका ज्ञान चारों ओर है, और उसका अधिकार भी सभी जगह है। ... प्रत्येक चीज़ उसकी निगाह में है और सभी कुछ उसकी अधीनता में है उसके कार्य और शक्ति मनुष्य के पास सिवाय यह मानने के और कोई विकल्प नहीं छोड़ते कि वास्तव में उसका अस्तित्व है और हर चीज़ पर उसी का अधिकार है। उसके अलावा कोई और ब्रह्मांड को नियंत्रित नहीं कर सकता, उसके अलावा कोई और तो मानवजाति को अथक पोषण प्रदान कर ही नहीं कर सकता" ("वचन देह में प्रकट होता है" में "केवल परमेश्वर के प्रबंधन के मध्य ही मनुष्य बचाया जा सकता है")। परमेश्वर के वचनों ने एक बार फिर मेरे अंदर आस्था और मज़बूती का संचार कर दिया। मुझे एहसास हुआ कि परमेश्वर का अधिकार, सामर्थ्य और कर्म सर्वव्यापी हैं। पूरी कायनात पर उसका प्रभुत्व है, इसके अलावा, वह कायनात में हर जीव की वृद्धि पर शासन करता है। परमेश्वर हर चीज़ का शाश्वत शासक है और वह जिस ढंग से हर चीज़ पर अपने सामर्थ्य का उपयोग करता है, वह मानव-मात्र की समझ से परे है। जो जीवन परमेश्वर इंसान को प्रदान करता है, वह स्थान या समय से बँधा हुआ नहीं है। दुष्ट शैतान केवल इंसान के शरीर को नुकसान पहुँचा सकता है, लेकिन हमारे जीवन और आत्माओं पर उसका नियंत्रण नहीं है। अय्यूब के इम्तहान के दौरान, शैतान केवल अय्यूब और उसकी देह को हानि पहुँचा सका, लेकिन चूँकि परमेश्वर ने उसे अय्यूब की जान लेने की इजाज़त नहीं दी थी, इसलिए शैतान उसकी जान लेने में पूरी तरह से नाकाम रहा। मैंने सोचा: "आज, शैतान की दुष्टात्माएँ अपनी कुटिल चालों से मेरे शरीर को मिटाना चाहती हैं, मुझसे परमेश्वर को धोखा दिलवाना और उसका त्याग करवाना चाहती हैं। ये लोग मुझे मादक द्रव्य पिलाकर बक-बक करने वाली पगली या मूर्ख बना देना चाहते हैं ताकि मैं परमेश्वर के नाम को शर्मिंदा करूँ, लेकिन शैतान के पास क्या अधिकार है? परमेश्वर की इजाज़त के बगैर, इनकी सारी चालें बेअसर हैं—परमेश्वर के हाथों पराजित होने के लिए ही शैतान अभिशप्त है!" इसका एहसास करते ही मैंने शांति और सुकून महसूस किया। तभी, उस पागल पुलिसवाले ने मेरा जबड़ा दबोच लिया और ज़बर्दस्ती कड़वा और खट्टा द्रव्य मेरे गले में उतार दिया। जल्दी ही उसने असर दिखाया; मुझे ऐसा लगा जैसे मेरे अंदर के सारे अंग जकड़ते जा रहे हैं, एक-दूसरे को निचोड़ रहे हैं, मानो उन्हें फाड़कर अलग किया जा रहा है। बहुत ही मर्मांतक पीड़ा हो रही थी। मुझे साँस लेने में दिक्कत होने लगी, मैंने बड़ी और गहरी साँसें लीं, मेरा दम घुट रहा था। मैं अपनी आँखें नहीं घुमा पा रही थी, मुझे दो-दो चीज़ें दिखाई देने लगीं। जल्दी ही मेरी चेतना चली गयी। कुछ समय के बाद, पता नहीं कितने समय के बाद, मैं अंतत: होश में आयी, और ऐसा लगा जैसे कोई कह रहा है, "यह दवा लेने के बाद, यह कुतिया या तो पागल हो जाएगी या फिर इसकी बुद्धि भ्रष्ट हो जाएगी।" मैंने जब यह सुना, तो मुझे लगा कि मैं एक बार फिर ज़िंदा बच गयी। मुझे सुखद आश्चर्य हुआ कि मैं बिल्कुल भी पागल नहीं हुई थी; मेरा दिमाग एकदम स्पष्ट था। यह निश्चित रूप से परमेश्वर की सर्वशक्तिमत्ता और अद्भुतता के कारण था। मुझे लगा कि मेरे अंदर परमेश्वर के वचन कार्य कर रहे हैं। एक बार फिर, परमेश्वर ने अपना सर्वशक्तिमान हाथ बढ़ाकर मुझे शैतान के पंजे से खींच लिया है, और मुझे इस संकटपूर्ण स्थिति से बचाकर जीने में सक्षम बनाया है। उस पल, मैंने स्वयं परमेश्वर के वचनों की विश्वसनीयता और सच्चाई का अनुभव किया, उसके सर्वोच्च सामर्थ्य और अधिकार को देखा। इसके अलावा, मैंने देखा कि किस तरह परमेश्वर सभी चीज़ों का सृष्टिकर्ता है, और वही एकमात्र स्वयं परमेश्वर, सभी चीज़ों का शासक है। मैंने देखा कि किस तरह मेरा जीवन, मेरा सर्वस्व, जिसमें मेरे शरीर की आखिरी धमनी तक शामिल है, सब परमेश्वर के नियंत्रण में हैं। परमेश्वर की अनुमति के बिना, मेरे सिर से एक बाल भी टूटकर नहीं गिर सकता। परमेश्वर मेरा सहारा है और हर पल, हर जगह मेरा उद्धार है। उस दिन हैवान की अंधेरी माँद में, सर्वशक्तिमान परमेश्वर के वचनों ने मुझे अपने अद्भुत सामर्थ्य के दर्शन कराए थे, यह दिखाया था कि परमेश्वर किस तरह बार-बार जीवन में चमत्कार करता है, उन्हीं के कारण मैं मौत के कगार से बची थी। मैंने मन ही मन पूरे जोश से सर्वशक्तिमान परमेश्वर का गुणगान किया और कसम खायी कि मैं जीवन-मृत्यु के इस युद्ध में निरंतर परमेश्वर की गवाही देने के लिए उस पर निर्भर रहूँगी।

पुलिस ने छ: दिनों तक दिन-रात मेरा उत्पीड़न किया। उस दौरान न तो मैंने खाना खाया, न पानी पिया, मैं एकदम जर्जर हो गयी थी। जब उन्होंने देखा कि मैं आखिरी साँसें गिन रही हूँ, तो उन्होंने मुझे जेल की एक कोठरी में बंद कर दिया। यातना के वो छ: दिन नरक की यात्रा की तरह थे, और अगर मैं बच पायी तो ऐसा परमेश्वर की कृपा और सुरक्षा के कारण ही हुआ। यह उसके वचनों का सामर्थ्य और अधिकार का मूर्त रूप था। कुछ दिनों के बाद, पुलिस फिर से पूछताछ के लिए मेरे पास आयी। चूँकि मैंने अनेक अवसरों पर परमेश्वर के अद्भुत कर्मों के दर्शन कर लिए थे, और यह अनुभव कर लिया था कि परमेश्वर ही मेरा सहारा है, सभी चीज़ें परमेश्वर के हाथों में हैं, तो एक और पूछताछ के दौरान मैंने शांति और निर्भयता का एहसास किया। पूछताछ कक्ष में मुझे एक अधिकारी से पता चला कि उन्होंने पहले ही मेरा नाम-पता जान लिया है और मेरे घर की तलाशी ले ली है। लेकिन चूँकि मेरे पति बहुत पहले ही बच्चों के साथ घर छोड़ चुके थे, इसलिए उन्हें वहाँ कुछ नहीं मिला। उसने फिर से मुझसे कलीसिया के बारे में जानकारी हासिल करने की कोशिश की, लेकिन चूँकि मैंने अब भी उसे कुछ नहीं बताया, तो वह क्रोधित हो उठा और बोला, "तू अगुवा है और बहुत ही टेढ़ी खीर है! तेरी वजह से ही, मैं पिछले छ: दिनों से ढंग से सो नहीं पाया हूँ और तूने अभी तक भी हमें कोई जानकारी नहीं दी है जिस पर हम काम कर सकें।" यह देखते हुए कि उसे मुझसे कुछ हासिल होने वाला नहीं है, उसकी दिलचस्पी जाती रही और उसने बाकी की पूछताछ जल्दबाज़ी और लापरवाही से पूरी की, उन लोगों के पास सिर्फ मुझे कोठरी में भेजने का ही रास्ता बचा था। यह देखकर मेरी खुशी का ठिकाना नहीं रहा कि परमेश्वर की विजय हुई है और शैतान परास्त हुआ है—मैंने परमेश्वर को धन्यवाद दिया और उसकी स्तुति की। मैं अगर शैतान के सामने गवाही दे सकी तो उसका कारण यह था कि कदम-कदम पर परमेश्वर ने मेरा मार्गदर्शन किया था, परमेश्वर के वचनों ने बार-बार मुझे प्रबुद्ध किया था, मुझे शक्ति और बुद्धि दी थी, शैतान को पराजित करने और उसकी निरंकुशता के आगे हार न मानने का सामर्थ्य दिया था।

चार महीनों तक नज़रबंदी गृह में रहने के बाद, सीसीपी सरकार ने मुझ पर शी जियाओ में विश्वास रखने का इल्ज़ाम लगाकर मुझे एक साल की जेल की सज़ा सुनाई। 2006 में सज़ा काटने के लिए मुझे महिला जेल में भेज दिया गया। हालाँकि जेल में वो लोग मेरे साथ जानवरों की तरह पेश आते थे, और अक्सर मैंने देखा कि कैदियों को अकारण ही पीट-पीटकर मार दिया जाता था, लेकिन उस दौरान, परमेश्वर के वचनों की सुरक्षा, देखभाल और मार्गदर्शन की वजह से, मैं डेढ़ साल की यातना को झेल पायी और उस नारकीय जेल से ज़िंदा बच पायी। मेरे जेल से रिहा होने के बाद, दुष्ट पुलिसवाले लगातार मुझ पर नज़र रखने के लिए अधिकारियों को भेजते रहे। वे आकर मुझे परेशान करते, जिसकी वजह से मेरे परिवार में कोई भी न तो अपनी आस्था का अभ्यास कर पाता था, न ही हम लोग सामान्य ढंग से अपने कर्तव्य निभा पाते थे। बाद में, कलीसिया के भाई-बहनों की देखभाल और सहायता की बदौलत, हम लोग अपना घर छो‌ड़ कर एक बहन के नए घर में जा पाए। परमेश्वर से प्राप्त बुद्धि पर निर्भर रहकर, हम लोग फिर से अपने कर्तव्य निभा पाए।

सीसीपी सरकार के क्रूर उत्पीड़न से गुज़रते हुए, मैंने शैतान की निर्मम निरंकुशता, कुटिल छल, और उन्मत्त प्रतिरोध के हैवानी सार को साफ तौर पर और पूरी तरह से देखा। इसके अलावा, मैंने परमेश्वर की अलौकिक और विस्मयकारी जीवन-शक्ति को प्रत्यक्ष रूप से देखा। भले ही दुष्ट पुलिसवालों ने मुझे बार-बार निर्ममता से पीटा, यातना दी, दंडित किया और चोट पहुँचायी, मुझसे मेरा जीवन छीनने की कोशिश की, लेकिन सर्वशक्तिमान परमेश्वर के वचनों ने अपनी अलौकिक जीवन-शक्ति को प्रकट करके, चमत्कारिक रूप से मुझे जीवित रखा। इन तमाम मुश्किलों और उत्पीड़न के चलते, मैंने सचमुच अनुभव किया कि किस तरह परमेश्वर मेरे जीवन का स्रोत है, परमेश्वर का अनुग्रह और पोषण मेरे जीवन को चलाते रहने के मूल में हैं। परमेश्वर के सशक्त हाथों की सहायता के बिना, वे दुष्टात्माएँ मुझे बहुत पहले ही निगल गयी होतीं। परमेश्वर लगातार मेरे साथ रहा, बार-बार शैतान को हराने के लिए और परमेश्वर की गवाही देने के लिए मुझे मार्गदर्शन देता रहा! हालाँकि उन दुष्टात्माओं ने मुझ पर अमानवीय अत्याचार किए और मेरी देह को भयंकर कष्ट पहुँचाए, लेकिन यह सब मेरे जीवन के लिए बहुत ही लाभकारी था। इसकी वजह से मैं न केवल यह देख पायी कि परमेश्वर ही इंसान के जीवन का पोषण है, बल्कि वह हमें निरंतर सहायता और सहारा भी देता है। जब तक हम परमेश्वर के वचनों के सहारे जीते हैं, हम शैतानी अंधेरी ताकतों को परास्त कर सकते हैं। परमेश्वर के वचन सचमुच सत्य, मार्ग और जीवन हैं! उनमें सर्वोच्च अधिकार और सर्वाधिक विस्मयकारी सामर्थ्य है, वे जीवन के चमत्कार कर सकते हैं! सारी महिमा, सम्मान और प्रशंसा सर्वशक्तिमान बुद्धि के परमेश्वर को प्राप्त हो!

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