24. परमेश्वर के वचनों ने मुझे बदल दिया

2018 की सर्दियों में, कलीसिया ने मुझे लिखने का काम सौंपा था। मैंने सोचा कि मैं यह काम पहले भी कर चुकी हूँ और मुझे बुनियादी बातों की जानकारी है, इसलिए मैं अच्छा काम करूँगी। जब मैं टीम में आयी, तो मैंने देखा कि दस्तावेज़ अलग थे। मुझे उन दस्तावेज़ों को संपादित करने से जुड़े सिद्धांतों की समझ नहीं थी, इसलिए मैं परमेश्वर से प्रार्थना करती और हर बार दस्तावेज़ पर काम करते समय सत्य को खोजती, इस पर सिद्धांतों के आधार पर विचार करती, दुविधा होने पर मैं दूसरी बहनों से राय लेती। मैं अपने संपादित किये गए लेखों के बारे में उनके सुझाव भी मानती थी। थोड़े ही समय में, मैं सिद्धांतों को समझने लगी और मेरे संपादित लेख मिसाल के तौर पर इस्तेमाल किये जाने लगे। मेरी टीम की बहनें मेरी सराहना करतीं और मैं खुश होती। मैंने सोचा, "थोड़े समय में ही मैंने कितना-कुछ हासिल कर लिया है। लगता है मेरा कौशल दूसरी बहनों से कोई कम नहीं है और लिखने के मामले में मेरी नींव कहीं बेहतर है।" एक दिन, हमारी टीम-अगुआ ने मुझे कुछ मुश्किल दस्तावेज़ों पर काम करने के लिए कहा। मैं निश्चिंत भी थी और खुश भी कि मुझे ज़्यादा मुश्किल दस्तावेज़ मिले हैं, क्योंकि मैं दूसरी बहनों की तुलना में ज़्यादा सक्षम हूँ और मेरी कद्र भी ज़्यादा है। लेकिन वक्त ने मुझे घमंडी बना दिया। परेशानी आने पर अब मैंने उन्हीं बहनों से राय लेनी बंद कर दी जिनसे मैं पहले सलाह लेती थी, यह सोचकर कि वैसे भी उनके पास कोई अच्छा विचार तो होगा नहीं। मैं सब कुछ ख़ुद ही करने लगी। बहनों द्वारा संशोधित दस्तावेज़ों की जाँच करते समय, मैं अपने आप फैसला लेने लगी। एक बार, एक बहन द्वारा संशोधित दस्तावेज़ की जाँच करते समय, मैंने एक हिस्से को संपादित करने का फैसला कर लिया, उससे पूछे बिना, मुझे वो हिस्सा ठीक नहीं लगा। वह मुझे एक अलग नज़रिए पर चर्चा करना चाहती थी, लेकिन मैंने उसे नीची नज़र से देखा और सोचा, "तुम यहाँ ज़्यादा वक्त नहीं रही और सोचती हो कि तुम सिद्धांतों को मुझसे बेहतर जानती हो? मैं इसे बिना कारण कभी नहीं बदलूँगी, बेहतर होगा कि तुम मेरी बात मानो।" मैंने उससे कठोरता से कहा, "मैंने ऐसे बहुत से दस्तावेज़ संपादित किए हैं और कभी गलती नहीं की।" मुझे अडिग देख, वो कुछ नहीं बोली। हमारी टीम-अगुआ ने इस दस्तावेज़ की समीक्षा करने पर कहा कि मेरे किए बदलाव सिद्धांतों के अनुसार गलत हैं, और आगे से मुझे सिद्धांतों को ज़्यादा गंभीरता से लेने को कहा। इसके बाद भी मैंने खुद पर विचार नहीं किया, बल्कि ये सोचा कि मुझे बस थोड़ा और ध्यान देने की ज़रूरत है।

दो महीनों बाद, हमारी टीम-अगुआ का ट्रांसफर हो गया और कलीसिया की अगुआ ने हमारी टीम का काम मुझे सौंप दिया। मैं सहमति जताई और अपने हिसाब से काम शुरू कर दिया: "मैं टीम में सबसे ज़्यादा उपयोगी हूँ और सिद्धांतों से अच्छी तरह परिचित हूँ। सिर्फ़ मैं ही इस काम को कर सकती हूँ।" तब से, टीम में बहनों को कोई समस्या आती, तो मैं उनकी मदद करती। मुझे लगता मैं कोई भी समस्या सुलझा सकती हूँ। एक बार बहन यांग को कोई दस्तावेज़ समझने में थोड़ी परेशानी हुई, तो मैं गई, तो मैंने उसका उत्साह बढ़ाते हुए कहा, "ये तो मामूली-सी समस्या है। बस समझो और हल कर लो।" थोड़ी ही देर में वो वापस आयी और कहने लगी, "आपके बताए तरीके से समस्या हल नहीं हुई। समस्या सत्य पर की गयी सतही सहभागिता की है।" यह सुनकर मुझे अच्छा नहीं लगा, "मैंने ही यह लेख चुना था। इसमें क्या गलत हो सकता है? ये थोड़ी सतही ज़रूर है, लेकिन ये लेख व्यवहारिक और उपयोगी है। जाहिर है, तुम सिद्धांतों को नहीं समझती और सही निर्णय नहीं ले सकती। मैं ये काम काफी समय से कर रही हूँ। क्या मैं वास्तव में इस तरह के स्पष्ट लेख को गलत समझ लूँगी? तुम मेरी योग्यता पर संदेह कर रही हो ना?" नाराज़ होकर, मैं उसके कंप्यूटर के पास गयी, उसका माउस लिया, लेख को अच्छी तरह से देखा, और फ़िर तुरंत उसे अपने विचार बताये। उसकी त्योरियाँ चढ़ गईं और धीरे से बोली, "आपके दृष्टिकोण से समस्या बनी रहेगी। हमें अपनी अगुआ से पूछना चाहिए।" मैंने सोचा, "तुम्हें अब भी बात समझ नहीं आ रही। क्या कोई तुम्हारी काबिलियत वाला ये काम ठीक से कर पायेगा?" मैंने बड़ी बेरुखी से जवाब दिया, "तुम इतनी छोटी सी बात के लिए अगुआ के पास जाओगी? अगर तुम इसे साथ मिलकर नहीं कर सकती, तो मुझे करने दो।" मैंने देखा वो बिना चुपचाप सिर लटकाये खड़ी है। मुझे बुरा तो लग रहा था, और ये किसी बहन के साथ कोई अच्छा बर्ताव भी नहीं था, पर मैंने कभी सत्य की खोज नहीं की या अपनी समस्या सुलझाने के लिये आत्म-मंथन नहीं किया। बहनों ने अपने सवाल लेकर मेरे पास आना बंद कर दिया, दस्तावेज़ों पर चर्चा करते समय, मेरे कहे बिना कोई ज़बान खोलने की हिम्मत नहीं करता था। वो एक बेहद कठोर माहौल था। मेरा मन गिरता जा रहा था, मैं समझ नहीं पा रही थी कि उन दस्तावेज़ों का क्या करूँ, हमारी टीम का काम भी बहुत कम हो गया।

एक बार सभा में, बहन यांग ने मुझसे कहा, "मैं आपकी कमियाँ बताना चाहती हूँ। आप अहंकारी ढंग से मेरी मदद करती हैं करती हैं, मेरे ज़्यादा सवाल पूछने पर आप बेचैन हो जाती हैं। मैं आपके सामने खुद को लाचार महसूस करती हूँ।" दूसरी बहन बोली, "ये सच है।" आप किसी से चर्चा नहीं करतीं, ख़ुद ही फ़ैसले लेती हैं, आप अपने विचारों पर ही अड़ी रहती हैं। किसी और के सुझाव नहीं सुनतीं। जब हम असहमत होते हैं, तो आप हमें हमारी अगुआ से बात नहीं करने देतीं। आप बहुत आत्मविश्वासी हैं।" मैं उनकी बातों से बिल्कुल सहमत नहीं थी। मैंने सोचा, "तुम कहती हो मैं तुम्हारे सुझाव स्वीकार नहीं करती, लेकिन शायद आत्म-मंथन तुम्हें करना चाहिये, कहीं ऐसा तो नहीं कि तुम सिद्धांतों को नहीं समझती और तुम्हारे विचार सही नहीं हैं। अगर तुम सही होती, तो मैं इनकार कैसे कर सकती थी?"

अगले दिन, अगुआ ने हमारी टीम की सभा में हिस्सा लिया। उन्होंने देखा कि वो दो बहनें मुझसे बेबस हो चुकी हैं, इसलिए वह मुझसे निपटते हुए बोली, "तुम बहुत ही अहंकारी हो। मैंने तुम्हें टीम के काम में लगाया, लेकिन तुम न तो दूसरों की मदद कर रही हो और न ही उनकी समस्याएँ सुलझा रही हो। बल्कि, उनका दम घोंट रही हो और उन पर हुक्म चला रही हो। जब लोग तुम्हारे संपादित दस्तावेज़ों में गलतियाँ निकालते हैं, तो तुम इसे गंभीरता से लेने के बजाय, ख़ुद को सही ठहराती हो। तुम दबंग और घमंडी हो, तुम हमारे लेखन के काम को बिगाड़ रही हो। टीम के सदस्यों की हालत ख़राब है और कुछ काम नहीं कर पाए हैं। अगर तुमने आत्म-मंथन करके प्रायश्चित नहीं किया, तो तुम्हें हटा दिया जाएगा।" अगुआ के सख्त व्यवहार ने मुझे तोड़कर रख दिया, खास तौर पर यह सुनकर कि मैंने परमेश्वर के घर के कार्य में रुकावट डाली है। मेरा दिल कांप उठा और मैं रोने लगी। मैं अपना कर्तव्य अच्छे से निभाकर परमेश्वर को संतुष्ट करना चाहती थी। मैंने कभी नहीं सोचा था कि मैं बुरा काम करने लगूँगी। कुछ दिनों तक, अगुआ की फटकार और आलोचनाओं के ख़्याल से ही, मैं परेशान हो जाती, लगता जैसे दिल में नश्तर चुभ रहा है। कभी सोचा भी नहीं था कि मेरा अहंकारी स्वभाव मेरे काम में आड़े आएगा, या मैं बहनों का दिल दुखाकर हमारे काम को खराब करूँगी। जितना मैं इसके बारे में सोचती, मुझे उतना ही अफसोस और बुरा महसूस होता। मैं खुद पर विचार करने के लिए परमेश्वर के सामने आयी।

फ़िर मैंने परमेश्वर के इन वचनों को पढ़ा: "ऐसा मत सोचो कि तुम एक अंतर्जात प्रतिभा हो, जो स्वर्ग से थोड़ी ही निम्न, किंतु पृथ्वी से बहुत अधिक ऊँची है। तुम किसी भी अन्य से ज्यादा होशियार नहीं हो—यहाँ तक कि यह भी कहा जा सकता है कि पृथ्वी पर जितने भी विवेकशील लोग हैं, तुम उनसे कहीं ज्यादा मूर्ख हो, क्योंकि तुम खुद को बहुत ऊँचा समझते हो, और तुममें कभी भी हीनता की भावना नहीं रही; ऐसा लगता है कि तुम मेरे कार्यों को बड़े विस्तार से अनुभव करते हो। वास्तव में, तुम ऐसे व्यक्ति हो, जिसके पास विवेक की मूलभूत रूप से कमी है, क्योंकि तुम्हें इस बात का कुछ पता नहीं है कि मैं क्या करूँगा, और उससे भी कम तुम्हें इस बात की जानकारी है कि मैं अभी क्या कर रहा हूँ। इसीलिए मैं कहता हूँ कि तुम जमीन पर कड़ी मेहनत करने वाले किसी बूढ़े किसान के बराबर भी नहीं हो, ऐसा किसान, जिसे मानव-जीवन की थोड़ी भी समझ नहीं है और फिर भी जो जमीन पर खेती करते हुए स्वर्ग के आशीषों पर निर्भर करता है। तुम अपने जीवन के संबंध में एक पल भी विचार नहीं करते, तुम्हें यश के बारे में कुछ नहीं पता, और तुम्हारे पास कोई आत्म-ज्ञान तो बिलकुल नहीं है। तुम इतने 'उन्नत' हो!" ("वचन देह में प्रकट होता है" में 'जो लोग सीखते नहीं और अज्ञानी बने रहते हैं : क्या वे जानवर नहीं हैं?')। "तुम लोगों के लिए यह सबसे अच्छा होगा कि तुम सब स्वयं को जानने की सच्चाई पर ज़्यादा प्रयास करो। तुम लोगों ने परमेश्वर की कृपा प्राप्त क्यों नहीं की है? तुम्हारा स्वभाव उसके लिए घिनौना क्यों है? तुम्हारे शब्द उसके अंदर जुगुप्ता क्यों उत्पन्न करते हैं? तुम लोग थोड़ी-सी निष्ठा दिखाते ही खुद ही अपनी तारीफ करने लगते हो और अपने छोटे से बलिदान के लिए प्रतिफल चाहते हो; जब तुम सब थोड़ी-सी आज्ञाकारिता दिखाते हो तो तुम लोग दूसरों को नीची दृष्टि से देखते हो, और कुछ छोटे छोटे-कार्यों को करके तुम लोग परमेश्वर का तिरस्कार करने लग जाते हो। ... निश्चित रूप से तुम लोग जानते हो कि तुम सब परमेश्वर पर विश्वास करते हो, फिर भी तुम सभी परमेश्वर के अनुरूप नहीं हो सकते हो। अच्छी तरह से यह जानते हुए कि तुम सब बिल्कुल अयोग्य हो, फिर भी तुम लोग डींग मारते ही रहते हो। क्या तुम्हें महसूस नहीं होता है कि तुम्हारी समझ ऐसी हो गई है कि अब तुम्हारे पास और आत्म-संयम नहीं है?" ("वचन देह में प्रकट होता है" में 'वे जो मसीह से असंगत हैं निश्चय ही परमेश्वर के विरोधी हैं')। परमेश्‍वर के वचनों पर विचार करने पर देखा कि वे मेरी सही स्थिति को प्रकट कर रहे हैं। थोड़ी कामयाबी मिलने पर, मैं खुद को दूसरों से अलग समझने लगी थी। मैं लोगों को हिकारत से देखती और उनकी बातों पर ध्यान नहीं देती थी, मैं मनमर्जी करती थी और परमेश्वर में कोई श्रद्धा न थी। मैं देखा कि मेरी प्रकृति अहंकारी है। उस काम को करते वक्त, मैंने सिद्धांतों को समझा और संपादित लेखों को संदर्भ के तौर पर इस्तेमाल किया; इसलिए मेरा अहंकार नियंत्रण से बाहर चला गया। मुझे लगा मुझमें प्रतिभा है और मैं दूसरों से बेहतर हूँ। मैंने काम में सत्य के सिद्धांतों की खोज छोड़ दी, मैं सिर्फ़ अपने अनुभव और बुद्धिमत्ता पर भरोसा करती थी। एक बहन के ये कहने पर कि मेरा संशोधन सिद्धांतों के अनुरूप नहीं है, तो मैंने कोई खोज नहीं की, मैंने अपने अनुभव और बुद्धि परविचार किया कि मैं गलत नहीं हो सकती। मैंने उसके सुझाव को अनदेखा कर दिया। एक बहन का नज़रिया अलग था और वह हमारी अगुआ से मिलना चाहती थी, लेकिन मैंने रोक दिया। समस्याएँ हल न होने पर, कलीसिया के काम में देरी हुई। इस विचार से, मैं अहंकारी थी, गलत थी और मुझमें परमेश्वर के लिए श्रद्धा नहीं थी। मेरा स्वभाव शैतानी था। मैंने सिर्फ कलीसिया के काम को ही नुकसान नहीं पहुँचाया, बल्कि अपनी कई बहनों को दबाया और उनका दिल भी दुखाया। ये तो मेरा कर्तव्य नहीं था? इससे पता चलता है कि मैं बुरा काम कर रही थी!

मेरे मन में परमेश्वर के वचनों का एक और अंश आया : "अगर तुम्हारे भीतर वाकई सत्य है, तो जिस मार्ग पर तुम चलते हो वह स्वाभाविक रूप से सही मार्ग होगा। सत्य के बिना, बुरे काम करना आसान है और तुम यह अपनी मर्जी के बिना करोगे। उदाहरण के लिए, यदि तुममें अहंकार और दंभ हुआ, तो तुम परमेश्वर की अवहेलना करने से खुद को रोकना असंभव पाओगे; तुम्हें महसूस होगा कि तुम उसकी अवहेलना करने के लिए मज़बूर किये गये हो। तुम ऐसा जानबूझ कर नहीं करोगे; तुम ऐसा अपनी अहंकारी और दंभी प्रकृति के प्रभुत्व के अधीन करोगे। तुम्हारे अहंकार और दंभ के कारण तुम परमेश्वर को तुच्छ समझोगे और उसे ऐसे देखोगे जैसे कि उसका कोई महत्व ही न हो, वे तुमसे स्वयं की प्रशंसा करवाने की वजह होंगे, निरंतर तुमको दिखावे में रखवाएंगे और अंततः परमेश्वर के स्थान पर बैठाएंगे और स्वयं के लिए गवाही दिलवाएंगे। अंत में तुम आराधना किए जाने हेतु सत्य में अपने स्वयं के विचार, अपनी सोच, और अपनी स्वयं की धारणाएँ बदल लोगे। देखो लोग अपनी उद्दंडता और अहंकारी प्रकृति के प्रभुत्व के अधीन कितनी बुराई करते हैं! अपने बुरे कर्मों के समाधान के लिए, पहले उन्हें अपनी प्रकृति की समस्या को हल करना होगा। स्वभाव में बदलाव किए बिना, इस समस्या का मौलिक समाधान हासिल करना संभव नहीं है" ("मसीह की बातचीत के अभिलेख" में 'केवल सत्य की खोज करके ही स्वभाव में बदलाव लाया जा सकता है')। परमेश्वर के वचनों में, मैंने देखा कि मेरी असफलता की जड़ मेरे अभिमानी, शैतानी स्वभाव में समाई थी। काम में थोड़ी-सी सफलता और अनुभव मिल जाने पर, मेरा दिमाग खराब हो गया, यह सोचकर कि मैं दूसरों से बेहतर हूँ। मैं सबको हिकारत से देखने लगी। मैं अहंकारी हो गयी। मैं अपने दृष्टिकोण को ही सही मानकर, दूसरों को अपने सामने झुकने के लिए मजबूर करती थी। मैंने सत्य की खोज या परमेश्वर के आज्ञापालन का कोई प्रयास नहीं किया। मैं अपने काम में मनमानी करने वाली और दबंग थी, बहुत ही घमंडी और उपेक्षापूर्ण थी, मेरे दिल में परमेश्वर के लिए कोई जगह नहीं थी। मैं अपना काम अहंकारी होकर करती और परमेश्वर के घर के काम में रुकावट डालती। जब अगुआ सख्ती से मेरे साथ पेश आयी और मेरी कांट-छांट की मैंने बुराई का रास्ता छोड़ दिया। ये मेरे लिए परमेश्वर की सुरक्षा और उद्धार था। मैंने उन मसीह विरोधियों के बारे में सोचा जिन्हें कलीसिया से निकाल दिया गया था। वे सब घमंडी प्रकृति के थे, अपने अनुभव के कारण वे प्रभारी बनकर मनमर्ज़ी करना चाहते थे। उन्होंने सत्य के सिद्धांतों की अवहेलना करते हुए काम किया। उन्हें किसी की परवाह नहीं थी। वे आपत्ति करने वाले को दबाकर बाहर निकाल देते थे। बुरे कामों के कारण उन्हें कलीसिया से निकाल दिया गया। मैं जान गयी कि मेरा स्वभाव मसीह-विरोधी है और मैं मसीह विरोध के रास्ते पर ही जा रही हूँ। अगर मैंने पश्चाताप करके अपने अहंकारी स्वभाव को नहीं सुधारा, तो मैं वैसी ही बन जाऊँगी। जिसका मतलब है परमेश्वर द्वारा दंडित और शापित होना। इस ख्याल से मैं डर से कांपने लगी। मुझे उस भयानक स्वभाव को महसूस किया, अपने निरंकुश आचरण के बारे में सोचकर, मुझे चिढ़ हुई। अपने पाप स्वीकारने और प्रायश्चित करने के लिये, मैंने झुककर परमेश्वर से प्रार्थना की। मैं अब अपने घमंडी स्वभाव के साथ जीना नहीं चाहती थी।

अगली सभा में, मैंने अपने अनुभव और समझ के बारे में सभी को खुल कर बताया, मैंने कहा कि मैं हमारा कर्तव्य अच्छी तरह से निभाने के लिए सभी के साथ सहयोग करना चाहती हूँ। मैंने उनसे मेरे ऊपर नज़र रखने के लिए कहा, मुझमें कुछ खराबी दिखे तो मुझे बताएं, और मेरी कांट-छांट करें। उसके बाद, जब दूसरे सुझाव देते या उनके विचार मुझसे अलग होते, तब भी मुझे लगता मैं सही हूँ, लेकिन मैं पहले जैसी नहीं बनना चाहती थी। मैं खुद को नज़रंदाज़ करती और सत्य खोजती। एक बार मैं एक बहन के साथ किसी दस्तावेज़ पर काम कर रही थी, तो हम एक-दूसरे से सहमत नहीं थे, मैं इस बात पर अड़ी थी कि मेरा दृष्टिकोण सही है। उसने मुझसे पूछा, "आपकी नज़रिया किस सिद्धांत पर आधारित है?" मैं एक पल के लिए अवाक रह गयी और मेरा चेहरा लाल होने लगा। मैंने सोचा, "सही बात है। मैं किस सिद्धांत पर विचार कर रही हूँ?" लेकिन फिर मैंने सोचा, "तुम मुझे गंभीरता से नहीं ले रही। खैर, मैं यह काम तुमसे पहले से करती आ रही हूँ। तुम मुझसे इस तरह से कैसे बात कर सकती हो?" मैं बहस करना चाहती थी, लेकिन तभी मैंने सोचा कि मैं हमेशा से कितनी अभिमानी और अड़ियल रही हूँ, हमेशा यही कहती हूँ "मुझे ही ये मिलना चाहिए," "जैसा कि मुझे लगता है", और "जैसा मैं कहती हूँ वैसा ही करो"। इससे हमारे काम को नुकसान पहुँचता था। मुझे सबक सीखने और अहंकारी बनकर काम न करने की ज़रूरत है। मैंने परमेश्वर के वचनों के बारे में सोचा: "इस संसार में जीते हुए, लोगों का दिमाग़ क्या कर सकता है या वे स्वयं क्या अनुभव कर सकते हैं, इसकी सीमाएं होती हैं। तुम हरफनमौला नहीं हो सकते; तुम हर चीज़ को नहीं जान सकते, हर चीज़ को नहीं समझ सकते, सब-कुछ हासिल नहीं कर सकते, सब-कुछ नहीं सीख सकते— यह नामुमकिन है, कोई भी यह नहीं कर सकता। यह वो तर्कशक्ति है जो सामान्य इंसान में होनी चाहिए। इसलिए तुम चाहे जो काम करो, वह महत्वपूर्ण हो या न हो, वहां हमेशा तुम्हारी मदद करने वाले लोग होने चाहिए, तुम्हें सुझाव और सलाह देनेवाले, काम में तुम्हारी सहायता करने वाले लोग होने चाहिए। इस प्रकार तुम काम को ज़्यादा सही ढंग से कर पाओगे, ग़लतियाँ करना मुश्किल होगा, और तुम कम भटकोगे—जो सब अच्छे के लिए होता है" ("मसीह की बातचीत के अभिलेख" में 'नायकों और कार्यकर्ताओं के लिए, एक मार्ग चुनना सर्वाधिक महत्वपूर्ण है VIII')। यह सही है कि कोई भी सब कुछ नहीं समझ सकता, चाहे कोई कितना भी ज्ञानी हो, उसमें कमज़ोरियाँ तो होंगी, और दूसरों की मदद की ज़रूरत पड़ेगी। भले ही मैंने उस काम में कुछ अनुभव हासिल किया हो, लेकिन सत्य की मेरी समझ सतही और सिद्धांतों की समझ सीमित थी। मैं अक्सर अपने काम के लिए अपनी सोच और अनुभव पर भरोसा करती थी। मुझे लगता था मैं बहुत ज्ञानी हूँ और मुझे दूसरों की सुनने की ज़रूरत नहीं। मुझे अपने बारे में न जानकारी थी ज्ञान था। जब मैंने अपनी बहनों को देखा, तो लगा वे अपने काम में वाकई खोज करना चाहती हैं, जिन बातों की उन्हें समझ नहीं थी उन पर वे अहंकार छोड़कर दूसरों के साथ खोज और चर्चा करने के लिए तैयार थीं। उनका जीवन-यापन मुझसे कहीं बेहतर था। मुझे अपना अहम छोड़कर एक समझदार बनना सीखना था, दूसरों के सुझाव सुनने थे, और दूसरों के साथ मिलकर काम करना था। जब मैंने अपने अहम को छोड़कर सिद्धांतों पर विचार किया, तो मैंने देखा वो बहन सही थी। मैंने उसे शांत भाव से कहा, "बहन, तुम्हारा विचार सत्य के अनुरूप है। चलो इसे इसी तरह से करते हैं। तुम्हारी सहभागिता ने मेरी गलतियाँ सुधार दीं। मैं घमंडी हूँ और अपने तरीके से काम करती हूँ। अगर तुम्हें मुझमें कोई दोष दिखे तो ज़रूर बताओ।" इस तरह मुझे बड़ी राहत मिली। मुझे ऐसा नहीं लगा कि मैंने कुछ खोया है। बल्कि लगा मैंने सहभागिता से कुछ हासिल किया है, मुझे सिद्धांत पहले से ज्यादा स्पष्ट हो गये हैं। उसके बाद कोई भी बिना दबाव महसूस किये अपने विचार व्यक्त कर सकता था और हमारी टीम का काम भी बेहतर होने लगा। परमेश्वर का धन्यवाद! परमेश्वर के न्याय के कारण मेरे अहंकारी स्वभाव में यह छोटा सा बदलाव आ सका। मेरे उद्धार के लिये परमेश्वर का धन्यवाद!

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