22. परमेश्वर का वचन मेरी जीवन शक्ति है

जू झिगांग, तियानजिन नगरपालिका

अतीत में, मैं चीन के पारंपरिक संस्कारों से अत्यधिक प्रभावित था, और अपने बच्चों और पोते-पोतियों के लिए जमीन-जायदाद खरीदना मेरे जीवन का लक्ष्य था। यह लक्ष्य पूरा करने के लिए, मैंने दिल लगाकर मोटरवाहन की मरम्मत करने की तकनीक सीखी। मैंने एक मरम्मत गैराज भी खोली, और कारोबार बहुत अच्छा चल रहा था। उस समय अपने जीवन में, मेरा विश्वास था कि मैं अपनी नियति को स्वयं नियंत्रित करता हूँ, इसलिए जब मेरी सलहज ने मुझे प्रभु यीशु के सुसमाचार का प्रवचन दिया, तो मैंने न केवल उसे स्वीकार करने से इंकार कर दिया, बल्कि उसका मजाक भी उड़ाया, क्योंकि मुझे लगता था कि मैं प्रभु पर विश्वास किए बिना भी जीवन का आनंद ले सकता हूँ। लेकिन फिर, अच्छा समय ज़्यादा नहीं टिका। मेरी गैराज का कारोबार खराब होता चला गया, और पूरी जान लगा देने के बावजूद मैं परिस्थितियों को बदल नहीं पाया। मैं परिस्थिति को बदलने का प्रयास करते हुए अत्यधिक थक गया, और मैं शक्तिहीन और अत्यंत दुखी हो गया, इसलिए मैंने अपनी चिंता से छुटकारा पाने के लिए पूरे दिन शराब पीना शुरु कर दिया। फलस्वरूप, एक दिन, नशे में ड्राइविंग करते समय दुर्घटना हो गई। मेरी कार चकना-चूर हो गई, लेकिन सौभाग्यवश और चमत्कारपूर्ण ढंग से, मैं जीवित बच गया। फिर उसके कुछ ही समय बाद, 1999 के वसंत में, मेरी पत्नी ने मुझे सर्वशक्तिमान परमेश्वर के अंत के दिनों के सुसमाचार का प्रवचन दिया। मैं सर्वशक्तिमान परमेश्वर के वचनों को पढ़कर कुछ सत्यों को समझ पाया, और मैंने जाना कि मेरा जीवन इतनी दयनीय, निस्‍सहाय अवस्‍था में इसलिए था कि मैंने जीवन के उन प्रमुख नियमों को स्वीकार कर लिया था जिनका शैतान लोगों को यकीन दिलाता है। मैंने अपने लिए एक सुखी घर का निर्माण करने के लिए अपने प्रयासों पर निर्भर रहना चाहा था, और परिणाम यह था कि मुझे उस हद तक मूर्ख बनाया गया जब तक मैं बहुत कष्टदायी अवस्था में नहीं पहुँच गया, मैंने अपना जीवन लगभग गंवा दिया था। यह सर्वशक्तिमान परमेश्वर थे जो मुझे मृत्यु के कगार से वापस खींचा और मुझे अपने घर में लाए, और मुझ पर दया दिखाने के लिए मैं उनका अत्यंत आभारी हूँ। तब से, प्रत्‍येक दिन मैंने परमेश्वर के वचनों को पढ़ा, अपने भाइयों और बहनों के साथ सभाओं में भाग लिया और संवाद किया, और रोशनी मेरे हृदय में समा गई। मुझे इसमें आनंद मिला, मैं प्रसन्न था कि मुझे जीवन में सत्य मार्ग मिल गया है। लेकिन कुछ ही समय बाद, मैं परमेश्वर में अपने विश्वास के कारण सीसीपी सरकार के लिए गिरफ्तारी का निशाना बन गया, मैं अपने परिवार को छोड़ने और छिपने के लिए मजबूर हो गया। उस समय, हालांकि मुझे कमज़ोरी के दौर से गुजरना पड़ा था, लेकिन फिर भी यह मेरा विश्वास था कि भले मैं कहीं भी जाऊं और भले शैतान के अपदूत मेरा कितना भी पीछा क्यों न करें, परमेश्वर के वचन मेरा मार्गदर्शन करेंगे। दस सालों से भी अधिक समय के बाद, परमेश्वर के वचनों के मार्गदर्शन और पोषण के माध्‍यम से, मैं धीरे-धीरे कुछ सत्यों को समझने लगा और मेरा जीवन अत्यंत संतोषप्रद बन गया। उसके बाद आने वाले समय में, जिस दौरान मुझे गिरफ्तार किया गया और मुझ पर अत्याचार किया गया, मैंने और अधिक व्यवहारिक रूप से अनुभव किया कि परमेश्वर के वचन मेरी जीवन शक्ति हैं जिन्होंने मुझे शैतान की क्रूर यातना और संताप के बीच दृढ़ता से, सच्चाई से और बिना भय के खड़ा होने दिया, ताकि मैं शैतान को पूरी तरह शर्मिंदा करने में समर्थ हो पाया। इस अनुभव के पश्‍चात, मैं परमेश्वर के वचनों को और अधिक संजोकर रखने लगा, और मैं एक पल के लिए परमेश्वर के वचनों से अलग नहीं हो सकता था।

2013 की फरवरी में एक दिन, मैं कई भाई-बहनों के साथ सुसमाचार का प्रसार कर रहा था, लेकिन वापस लौटते समय, हमें एक मोटरकार ने रोक लिया। कार से तीन पुलिस अफसर उतरे और हमारे बारे में पूछताछ करने लगे, और जब उन्होंने मेरे परदेशी लहजे को सुना तो उन्होंने बिना कोई कारण बताए ज़बरदस्ती मेरी तलाशी ली। उन्होंने मेरी जेबों से एग्रीकल्‍चरल बैंक ऑफ चाइना का एक कार्ड जिसमें 700 से अधिक युआन थे, 300 से अधिक नकद युआन, एक सेल फोन, एक एमपी 5 प्लेयर, और सुसमाचार संबंधी कुछ सूचना जब्त की। जिस क्षण एक अफसर को यह पता चला कि मैं सर्वशक्तिमान परमेश्वर पर विश्वास करता हूँ, उसी क्षण उसका व्यवहार अति क्रूर हो गया, और उसने ज़बरदस्ती मुझे हथकड़ी पहनाई और मुझे कार में धकेल दिया। पुलिस थाने में, उन्होंने मुझे दीवार से सटकर खड़ा होने का हुक्म दिया, जहां एक अफसर ने कड़ाई से मुझसे पूछा, "तुम्हारा नाम क्या है? तुम्हारा घर कहाँ है? तुम्हें परमेश्वर पर विश्वास का प्रवचन किसने दिया था?" जब उसने देखा कि मैं जवाब नहीं दूँगा, तो वह तुरंत आग बबूला हो गया, उसने मेरा फेदर कोट फाड़कर उतार दिया, फिर मुझे उल्टा घुमाया और मेरी पीठ से स्वेटर को सिर के ऊपर से खींचकर उतार दिया, और अपने डंडे से मेरी पीठ पर क्रूरतापूर्वक पिटाई करने लगा। मारते हुए थोड़ी-थोड़ी देर में वो मुझसे पूछता था, "क्या अब तू अपनी जुबान खोलेगा?" पंद्रह बार मुझे मारने के बाद, मेरी पीठ सुन्न महसूस होने लगी थी, और मेरी रीढ़ ऐसी महसूस हो रही थी कि मानो टूट चुकी है, इससे बहुत अधिक कष्ट हो रहा था। लेकिन उसके बहुत मारने के बाद भी मैंने बोलने से इंकार कर दिया। आखिरकार, गुस्से में वह चिल्लाया, बोला, "ठीक हैं, मैं हारा! तेरी इस तरह पिटाई करके मेरी कलाई दुखने लगी है, और तू अभी तक जुबान नहीं खोल रहा है!" अपने हृदय में, मैं जानता था परमेश्वर मेरी रक्षा कर रहा है। इतनी हिंसात्मक पिटाई को मैं अपने से झेल नहीं सकता था। मैंने मन ही मन परमेश्वर का धन्यवाद किया।

उन्होंने देखा कि पिटाई का मुझ पर असर नहीं हो रहा था, इसलिए उन्होंने अपनी चाल बदल दी। उनमें से एक दुष्ट अफसर लगभग एक मीटर लंबा और छह सेंटीमीटर मोटा डंडा लाया, और कुटिल हंसी के साथ बोला, "चलो, इसे इस पर घुटने टेकने के 'मज़े' लेने देते हैं और फिर देखते हैं कि ये अपनी जुबान खोलता है या नहीं!" मैंने सुना था कि 30 मिनट तक ऐसे डंडे पर घुटने टेकने के बाद व्यक्ति खड़ा नहीं हो सकता है या चल नहीं सकता है। इस प्रकार की यातना के सामने, मुझे लगा कि मेरी आध्यात्मिक कद-काठी बहुत छोटी थी, और मेरी देह इसे सहन नहीं कर पाएगी। मैं डरा हुआ था, इसलिए मैंने परमेश्वर को अपनी पूरी शक्ति से पुकारा, "हे परमेश्वर! मेरी आध्यात्मिक कद-काठी बहुत छोटी है, और मुझे डर है मैं ऐसी यातना सहन नहीं कर पाऊंगा। कृपया मेरे हृदय की रक्षा कीजिए और मुझे यह यातना सहन करने और आपके साथ विश्वासघात नहीं करने की शक्ति प्रदान कीजिए।" मैंने बार-बार परमेश्वर को पुकारा। परमेश्वर जानता था कि मेरी देह कमजोर है। उसने मेरी प्रार्थना को सुना, क्योंकि अंत में, उस दुष्ट पुलिस ने उस यातना का प्रयोग न करने का निर्णय लिया। मेरी दृष्टि के सामने मौजूद इन तथ्यों ने परमेश्वर की दया और सुरक्षा का प्रदर्शन किया, इससे परमेश्वर में मेरा विश्वास भी बढ़ा और मेरा डर भी बहुत कम हो गया। हालांकि, उन्होंने उस यातना का प्रयोग नहीं करने का निर्णय लिया, लेकिन फिर भी, वो अब भी मुझे रिहाई नहीं करना चाहते थे। उसकी बजाय, उन्होंने एक दूसरी यातना देने की सोची। उन्होंने मेरी कमर को सीधा रखते हुए बलपूर्वक मुझे जमीन पर घुटनों के बल बिठा दिया, और फिर 6 फुट लंबे विशालकाय पुलिस अफसर को मेरी जांघों पर खड़ा होकर अपने दोनों पांवों से पूरी ताकत के साथ कुचलने के लिए बोला। जिस क्षण वह मेरी जांघों पर खड़ा हुआ, उसी क्षण मुझे बहुत तेज दर्द महसूस हुआ, फिर मैंने अपनी पूरी शक्ति के साथ परमेश्वर को पुकारा, "हे परमेश्वर! मैं ऐसी अमानुषी यातना सहन नहीं कर सकता, लेकिन मैं आपको संतुष्ट करना चाहता हूँ, इसलिए मैं आपसे यातना सहन करने का विश्वास, ताकत और इच्छाशक्ति प्रदान करने की विनती करता हूँ। मैं आपके लिए अपने साक्ष्‍य में दृढ़ रहना चाहता हूँ।" एक बार फिर परमेश्वर का धन्यवाद कि उन्होंने मेरी प्रार्थना सुनी। वह मोटा पुलिस अफसर मेरी जांघों पर एक स्थिर मुद्रा बनाए रखने में असफल रहा, इसलिए वो मेरी जांघों से उतर गया। उसका साथी दुष्ट अफसर गुस्से में आग-बबूला हो गया और बोला, "निकम्मे बेवकूफ! इतनी जल्दी क्यों उतर गए?" ये शैतान सचमुच तलना से परे, दुष्ट और क्रूर थे। उन्होंने मुझे यातना देने का हर संभव तरीका सोचा, और उन्हें तो बस मेरी हत्या करने की खुजली हो रही थी, मानो केवल मेरी मृत्यु से ही उन्हें संतुष्टि मिलेगी। उन्होंने मुझे घुटने मोड़कर सीधा खड़ा होने के लिए मजबूर किया और मुझे हिलने नहीं दे रहे थे। बाद में, एक पुलिस अफसर ने दूसरों पर एक अर्थपूर्ण नजर डाली, और फिर वे सभी बाहर चले गए, कमरे में उस पुलिस अफसर के साथ अकेला छोड़कर जो मुझ पर नजर रखे हुए था। वो मेरे पास आया और मुझ पर अपनी दया दिखाने की कोशिश की, झूठी मुस्कान के साथ वो बोला, "मेरी माँ भी परमेश्वर पर विश्वास करती है। मुझे बताओ तुमने कैसे विश्वास करना शुरु किया। मैं भी तुम्हारे साथ परमेश्वर पर विश्वास करना चाहता हूँ, इसलिए मुझे अपने वरिष्ठों के पास ले चलो।" उसके झूठ को सुनकर और उसकी कपटी मुस्‍कान को देखकर, अचानक मुझे पूर्ण रूप से घृणा महसूस हुई। जब मैं उसकी पोल खोलने ही वाला था, तब अचानक मुझे परमेश्वर के वचनों का स्‍मरण हुआ: "तुम में मेरी हिम्‍मत होना चाहिए...। परन्तु मेरी वजह से तुम किसी भी अन्धकार की शक्ति के अधीन ना होओगे। पूर्ण मार्ग पर चलने के लिए मेरी बुद्धि पर भरोसा रखो; शैतान के षडयंत्रों को काबिज़ न होने दो" ("वचन देह में प्रकट होता है" में आरम्भ में मसीह के कथन के "अध्याय 10")। परमेश्वर के वचनों ने समय पर मेरा मार्गदर्शन किया, मुझे समझाया कि शैतान की उपस्थिति में मुझे साहस से कहीं अधिक बुद्धि की आवश्यकता है। शैतान से लड़ने के लिए, हमें बुद्धि प्रदान करने के लिए, हमें हर समय परमेश्वर पर निर्भर रहना चाहिए। परमेश्वर के वचनों की प्रबुद्धता और मार्गदर्शन के द्वारा, मैं जानता था कि क्या करना है, इसलिए मैंने कहा, "यदि आप वास्तव में विश्वास करना चाहते हैं, तो आपको केवल परमेश्वर के वचनों को घर में पढ़ने की आवश्यकता है। आपको बाहर निकलने और किसी से मिलने की ज़रूरत नहीं है।" जैसे ही मैंने ये कहा, उस दुष्ट पुलिस अफसर ने, जिसने मेरी पिटाई थी, प्रवेश किया और दुष्टता से मुझसे बोला, "तू बहुत बड़ा सिरदर्द है!" मैं जानता था शैतान असफल हो गया है और अपमानित है, इसलिए मैंने मौन रहकर परमेश्वर का धन्यवाद किया। मैंने देखा कि परमेश्वर सदा मेरे साथ थे, मेरा मार्गदर्शन कर रहे थे, मुझे प्रोत्साहन दे रहे थे, और चमत्कारपूर्ण ढंग से शैतान के काले हाथ की हिंसा को रोक रहे थे। मेरे लिए परमेश्वर का स्नेह इतना महान है! उस क्षण, भले ही मैं एक कोठरी में कैद था, मैंने महसूस किया कि परमेश्वर के साथ मेरा संबंध पहले से कहीं अधिक घनिष्‍ट हो गया है, और मैंने सहारे और सहजता का अनुभव किया। उन्होंने मुझे दो से अधिक घंटे तक घुटने मोड़कर सीधा खड़ा रखा। अंतत:, सुबह एक बजे के बाद, जब उन्‍हें आभास हुआ कि पूछताछ से कोई परिणाम हासिल नहीं हो रहा है, तो वो निराशा में वहाँ से चले जाने के सिवाय कुछ नहीं कर पाए।

दूसरे दिन सुबह, पुलिस मुझे सार्वजनिक सुरक्षा ब्यूरो के एक शाखा कार्यालय में लाई। पूछताछ कक्ष में मेरे पहुँचने के बाद, आपराधिक पुलिस के प्रमुख ने गुस्से में मुझसे पूछा, "तुम्हारा क्या नाम है? तुम्हारा घर कहाँ है? किसने तुम्हें परमेश्वर पर विश्वास करने के बारे में बताया? तुम कितने समय से परमेश्वर पर विश्वास कर रहे हो? तुम्हारे परिचित कौन हैं? सबकुछ मुझे बताओ, नहीं तो मेरा वायदा है कि तुम पछताओगे!" लेकिन उसके कुछ भी पूछने पर, मैंने उसे कुछ नहीं बताया। पूरे दिन उसने कठोर और नरम, दोनों तरह की चालें इस्तेमाल करते मुझसे पूछताछ की, लेकिन वो मुझसे कुछ हासिल नहीं कर पाया, और अंतत:, गुस्‍से में आकर, वह चिल्लाया, "तुम जुबान नहीं खोलोगे?! चलो, देखते हैं कि तुम्हें नजरबंदी गृह में जिंदगी कितनी पसंद आएगी! अगर तुम हालात को मुश्किल बनाना चाहते हो, तो हम निश्चित तौर पर ऐसा कर सकते हैं! अगर तुम हमें वो जवाब नहीं दोगे जो हमें चाहिए, तो हम तुम्हें वहां हमेशा के लिए कैद करके रखेंगे!" और इसलिए, मुझे नजरबंदी गृह में ले जाया गया और उस कोठरी में बंद कर दिया गया जिसमें सबसे बड़ी संख्‍या में दुर्दांत अपराधी कैद थे। जिस क्षण मैंने कोठरी में प्रवेश किया, उसी क्षण उस जगह के अंधकारपूर्ण और भयानक वातावरण के कारण मेरा खून जम गया। कोठरी की दीवारें चार मीटर ऊँची थीं, वहां अंधेरा और सीलन थी, केवल एक छोटी खिड़की से सूरज की रोशनी की छुटपुट किरणें अंदर आ रही थीं, और वहाँ एक घनी, बासी बदबू थी जिससे सांस लेना लगभग असंभव हो रहा था। यह छोटी सी तंग कोठरी अपराधियों से भरी पड़ी थी; वहां हत्‍यारे, नशीली दवाएं लेने वाले, और चोर थे, सभी दुर्दांत अपराधी। उनमें से प्रत्‍येक कैदी वहशी और पैशाचिक दिखाई दे रहा था, और अनेक कैदी कसे हुए, बदसूरत चेहरे के साथ लंबी, सुडौल कद-काठी वाले थे, और उनके शरीर अजगर, अमरपक्षी, सांपों, और इन जैसे गोदनों से ढके हुए थे। कुछ कैदी शोहदे इतने पतले थे, जीवित कंकाल जैसे दिखाई दे रहे थे, और उन्‍हें बस देखने से ही मेरी कंपकंपी छूट रही थी। वहाँ कैदियों के बीच एक सामाजिक प्रतिष्‍ठाक्रम था, और सर्वशक्तिमान परमेश्वर के विश्वासी एकदम निचले स्थान पर थे, जिन्हें बोलने का बिलकुल भी अधिकार नहीं था। दीवार पर लगा हुआ आपातकाल बटन मूल रूप से आपात स्थितियों में सुधार अधिकारी को बुलाने के लिए था, लेकिन सर्वशक्तिमान परमेश्वर के विश्वासियों को इसे प्रयोग करने का "आनंद" लेने का अधिकार बिलकुल नहीं था। भले कितना अमानुषी दुर्व्‍यवहार क्यों न हो रहा हो, कोई भी कभी उसका प्रत्‍युत्तर नहीं देता था।

कोठरी में मेरे पहले दिन, कैदियों के सरदार को जब मेरी परिस्थिति के बारे में पता चला तो वह मेरा मजाक उड़ाते हुए बोला, "तू सर्वशक्तिमान परमेश्‍वर पर विश्‍वास करता है, उससे बोलकर खुद को बाहर निकलवा। अगर तेरा परमेश्‍वर इतना दयालु है तो भला वो तुझे इस जगह पर क्‍यों पहुँचाता?" उसके साथ के दुष्‍ट कैदी भी मेरा मजाक उड़ाने लगे, "तुझे कौन बेहतर लगता है, हमारा सरदार या तेरा परमेश्‍वर?" उनसे परमेश्‍वर का अनादर और अपमान सुनकर मैं अति क्रुद्ध हो गया। मैं उनसे बहस करना चाहता था, लेकिन ऐसा कर नहीं सकता था। मैंने जीवन में प्रवेश पर धर्मोपदेश और संगति का स्‍मरण किया, जिसमें लिखा है कि कुकर्मियों का गुण अपदूतों का गुण होता है, और यह शाश्‍वत सत्‍य है! ये अपदूत पूर्णतया अविवेकी थे, और अभिशाप के पात्र हैं! जब मैंने उत्तर नहीं दिया, तो कैदियों का सरदार आगबबूला हो गया और उसने क्रूरतापूर्वक मुझे दो बार थप्‍पड़ मारा, उसके बाद उसने मुझे कसकर मुक्‍का मारा, जिससे मैं फर्श पर गिर गया। मैं इन बदमाशों के सामने पड़कर बहुत भयभीत हो गया था और मैं परमेश्वर को पुकारने के सिवाय कुछ नहीं कर सकता था, "हे परमेश्‍वर! आप जानते हैं कि मैं डरता हूँ और दुर्बल हूँ, और मुझे डकैतों एवं गुंडों से बहुत डर लगता है। कृपया मेरी रक्षा कीजिए, मुझे विश्‍वास और शक्ति प्रदान दीजिए, और मुझे इस परिस्थिति में अपने साक्ष्‍य को बचाए रखने की अनुमति प्रदान कीजिए।" उन दुष्टों ने देखा कि मैं नहीं बोलूँगा, इसलिए उन्‍होंने मुझे यातना देने का अलग तरीका सोचा। कंकाल जैसा दिखाई देने वाला एक अपराधी मेरे पास आया और उसने बलपूर्वक मेरी पीठ को दीवार से सटा दिया। फिर उसके कहने पर दो दूसरे कैदियों ने मेरे कंधों को दीवार पर जकड़ दिया, इसके बाद उसने मेरी जांघ के अंदरूनी भाग पर अपनी पूरी ताकत से चिकोटी काटी, पहले बायीं तरफ, फिर दांयी तरफ, और प्रत्‍येक बार मुझे तीव्र वेदना की अनुभूति हुई, जो अत्‍यधिक पीड़ादायक थी। (उसके बाद, मेरे पैर में बड़ी-बड़ी गांठें पड़ गईं, जो आज तक वैसी ही हैं)। फिर, उसने क्रूरतापूर्वक मेरी जांघों पर मुक्‍के मारे। उसके बाद जल्‍दी ही, मैं फर्श पर ढेर हो गया, क्योंकि मेरे लिए फिर से खड़ा होना लगभग असंभव था। इसके बाद भी, उन्‍होंने मुझे यातना देना बंद नहीं किया। सर्दी का मौसम था और कड़ाकेदार ठंड थी, लेकिन इन दुष्‍ट व्‍यक्तियों ने मुझे कपड़े उतारकर एक नल के नीचे दीवार से सटकर बैठने का हुक्‍म दिया। वे मेरे ऊपर लगातार पानी उड़ेलते रहे और जानबूझकर खिड़की को खोल दिया, जिससे मुझे इतनी ठंड लगने लगी कि मेरी कंपकंपी बंद नहीं हो रही थी। जब एक कैदी ने देखा कि मैं यातना को सहन करने के लिए अपने दांतों को किटकिटा रहा था, तो उसने एक गत्ता थामा और एक पंखे की तरह उसे झालने लगा ताकि ठंडी हवा मेरी ओर आए, तुरंत मुझे ऐसी अनुभूति हुई मानो मेरा रक्‍त जमकर ठोस हो गया है, और मेरे दांत किटकिटाना बंद नहीं हो रहे थे। मैं निस्‍सहाय था लेकिन मन ही मन परमेश्‍वर से प्रार्थना कर रहा था, "हे परमेश्‍वर! मुझे ज्ञात है कि अब जो कुछ मेरे साथ हो रहा है उसके पीछे आपकी नेक नीयत मौजूद है, इसलिए मैं आपकी इच्‍छा को समझने के लिए आपके मार्गदर्शन की याचना करता हूँ, क्‍योंकि मैं अकेले इन बदमाशों की यातना को सच में सहन नहीं कर सकता हूँ। हे परमेश्वर! कृपया मुझे अधिक विश्‍वास और शक्ति प्रदान करने का अनुग्रह कीजिए, ताकि मेरे पास इन कठिनाइयों पर विजय पाने की इच्‍छाशक्ति और दृढ़ निश्‍चय हो।" प्रार्थना पूरी करने के बाद, मुझे परमेश्‍वर के वचनों का स्मरण हुआ: "'क्योंकि हमारा पल भर का हल्का सा क्लेश हमारे लिये बहुत ही महत्वपूर्ण और अनन्त महिमा उत्पन्न करता जाता है।' अतीत में तुम सबने यह बात सुनी है, तो भी किसी ने इन वचनों का सही अर्थ नहीं समझा। आज, तुम सभी अच्छे से जानते हो कि उनका वास्तविक महत्व क्या है। ये वही वचन हैं जिन्हें परमेश्वर अंतिम दिनों में पूरा करेगा। और ये वचन उन लोगों में पूरे होंगे जो बड़े लाल अजगर द्वारा निर्दयतापूर्वक पीड़ित किये गए हैं, उस देश में जहां वह रहता है। यह बड़ा लाल अजगर परमेश्वर को सताता है और परमेश्वर का शत्रु है, इसलिए इस देश में, जो परमेश्वर पर विश्वास करते हैं, उन्हें अपमानित किया जाता और सताया जाता है। इस कारण ये वचन तुम्हारे समूह के लोगों में वास्तविकता बन जाएंगे" ("वचन देह में प्रकट होता है" में "क्या परमेश्वर का कार्य उतना सरल है, जितना मनुष्य कल्पना करता है?")। परमेश्‍वर के वचनों पर मनन करके, मैं परमेश्‍वर की इच्‍छा को समझ पाया। मैं जो अब परमेश्‍वर में अपने विश्‍वास के लिए कष्‍ट उठा रहा था, वह यशस्‍वी था और यह मेरे लिए सम्मान की बात थी। शैतान मुझसे परमेश्‍वर के साथ विश्‍वासघात और उनके अस्तित्‍व से इंकार करवाने के लक्ष्‍य के साथ मुझे यातना दे रहा था क्‍योंकि मैं दैहिक यंत्रणा को सहन नहीं कर सकता था, इसलिए मैं शैतान के समक्ष समर्पण बिल्‍कुल नहीं कर सकता था। उस क्षण, अचानक मुझे स्‍मरण हुआ कि कैसे उस दुष्‍ट पुलिस अफसर ने मुझे नजरबंदी गृह में जान की धमकी दी थी, और फिर मुझे अचानक बोध हुआ —कैदी इतनी क्रूरता से मुझे यातना और हानि इसलिए पहुँचा रहे थे क्‍योंकि उस दुष्‍ट पुलिस अफसर ने उन्‍हें ऐसा करने का हुक्‍म दिया था! तब जाकर मुझे समझ आया कि पाखंडी "लोगों की पुलिस" वास्तव में बहुत ही कपटी और घृणा योग्य है। वे अपने कुत्सित कर्म करने के लिए इन कैदियों को इस्‍तेमाल कर रहे थे। वे बिल्कुल भीतर तक हद से ज़्यादा पतित थे, वे ऐसे दुष्ट थे जो खुद रक्‍त की बूँद छलकाये बिना भी हत्‍या कर सकते थे! शैतान उनके सामने मुझसे समर्पण करवाने के लिए प्रत्‍येक तरीका आजमा रहा था, लेकिन शैतान की चालों से परमेश्‍वर की बुद्धि आगे रहती है। परमेश्‍वर अपने प्रति सच्‍ची आस्‍था प्रदान करने के लिए इस वातावरण को प्रयोग कर रहे थे, ताकि मैं शैतान के कुरूप चेहरे और पापी सार को स्‍पष्‍ट देख सकूँ, और इसके द्वारा उनके प्रति अपने हृदय में सच्‍ची घृणा जाग्रत कर सकूँ। परमेश्‍वर की इच्‍छा को समझ लेने के बाद, मेरा हृदय रोशनी से भर गया और मुझे मेरी शक्ति मिल गई। मैं शैतान के हाथों बेवकूफ नहीं बन सकता। भले ही मुझे कितनी भी दैहिक पीड़ा या निर्बलता की अनुभूति क्‍यों न हो रही हो, मुझे परमेश्‍वर के लिए अपने साक्ष्‍य में दृढ़ खड़ा होना ही था। मैं उन दुष्‍ट मनुष्‍यों की यातना और पीड़ा पर जीत पाने, और शैतान को एक बार पुन: पराजित करने की शक्ति मुझे प्रदान करने के लिए परमेश्‍वर का आभारी था।

नजरबंदी गृह में, हमारे दैनिक भोजन में पानी में उबाली गई बासी गोभी, सब्जियों के आचार, और भाप से पकी एक छोटी कार्नब्रेड शामिल थे, जिनसे किसी भी तरह से पेट नहीं भरता था। रात को, कैदियों का सरदार और उसके चेले तख्‍त पर सोते थे, जबकि हम बाकी लोगों को फर्श पर सोना पड़ता था। जब मैं अपने चारों ओर के कैदियों को देखते हुए, बहुत ठंडे फर्श पर लेटा, तब मेरे मन में अपनी दयनीय परिस्थितियों को लेकर ख़्याल आया और मुझे तुरंत अपने हृदय में अकेलेपन की जकड़न महसूस हुई। मेरे मन में उस समय का ख्‍याल आया जब मैं अपने भाइयों और बहनों के साथ था, और हर दिन खुशनुमा और आनंदोल्‍लास से भरपूर था। लेकिन अब, मैं हर दिन इन अपराधियों के साथ बिता रहा था, और मुझे उनकी दादागिरी और अपमान भी सहना था, और मुझे अकथनीय, असहनीय दुख महसूस हुआ...। मैं परमेश्‍वर के सामने गया और मैंने उनसे प्रार्थना की, "हे परमेश्‍वर! मुझे नहीं पता कि मैं कितने समय तक इस प्रकार जीवन जी पाऊँगा, और मुझे नहीं मालूम कि आने वाले दिनों को कैसे काट पाऊँगा। अब, मेरी देह निर्बल है, और मैं इस परिस्थिति का और अधिक सामना नहीं करना चाहता। हे परमेश्‍वर! कृपया मुझे यह कष्‍ट सहन करने की दृढ़ता प्रदान कीजिए, और मेरा मार्गदर्शन कीजिए कि मैं आपकी इच्छा समझ सकूँ, ताकि मैं इस परिस्थिति में आपको संतुष्‍ट कर सकूँ।" मेरी प्रार्थना के बाद, मेरे मन में परमेश्‍वर के वचनों का स्‍पष्‍ट प्रकाश फैल गया: "मानव जाति के कार्य के लिए परमेश्वर ने बहुत सारी रातों को बिना नींद के गुजारना सहन किया है। बहुत ऊपर से सबसे नीची गहराई तक, जीवित नरक में जहाँ मनुष्य रहता है, वह मनुष्य के साथ अपने दिन गुजारने के लिए उतर आया है, कभी भी मनुष्य के बीच फटेहाली की शिकायत नहीं की है, उसकी अवज्ञा के लिए कभी भी मनुष्य को तिरस्कृत नहीं किया है, बल्कि वह व्यक्तिगत रूप से अपने कार्य को करते हुए सबसे बड़ा अपमान सहन करता है। ... समस्त मानव जाति के लिए, पूरी मानवजाति को जल्द ही आराम मिल सके इसके लिए, उसने अपमान को सहन किया और पृथ्वी पर आने के अन्याय का सामना किया, और मनुष्य को बचाने की खातिर व्यक्तिगत रूप से 'नरक' और 'अधोलोक' में, बाघ की माँद में, प्रवेश किया। परमेश्वर का विरोध करने के लिए मनुष्य कैसे योग्य हो सकता है? परमेश्वर के बारे में एक बार और शिकायत करने के लिए उसके पास क्या कारण है? कैसे वह फिर से परमेश्वर की ओर नज़र उठाकर देखने की हिम्मत कर सकता है? स्वर्ग का परमेश्वर बुराई की इस सबसे गंदी भूमि में आया है, और कभी भी उसने अपने कष्टों के बारे में शिकायत नहीं की है, या मनुष्य के बारे में गिला नहीं किया है, बल्कि वह चुपचाप मनुष्य द्वारा किये गए विनाश[1] और अत्याचार को स्वीकार करता है। कभी भी उसने मनुष्य की अनुचित मांगों का प्रतिकार नहीं किया, कभी भी उसने मनुष्य से अत्यधिक मांगें नहीं की, और कभी भी उसने मनुष्य से ग़ैरवाजिब तकाज़े नहीं किये; वह केवल बिना किसी शिकायत के मनुष्य द्वारा अपेक्षित सभी कार्य करता है: शिक्षा देना, ज्ञान प्रदान करना, डाँटना-फटकारना, शब्दों का परिशोधन करना, याद दिलाना, प्रोत्साहन देना, सांत्वना देना, न्याय करना, और प्रकट करना" ("वचन देह में प्रकट होता है" में "कार्य और प्रवेश (9)")। मैंने परमेश्‍वर के वचनों पर मनन किया, और उस कष्‍ट के बारे में सोचा जोपरमेश्‍वर ने तब सहे थे जब उन्होंने मानवजाति के लिए संसार में दो बार देहधारण किया था, और मेरी आंखें अनजाने में ही आँसुओं से भीग गई। प्रभु यीशु को कीलों से सूली पर लटका दिया गया था। उन्‍होंने शैतान द्वारा पतित की जा चुकी मानव जाति को पाप से मुक्‍त करने के लिए अपने जीवन का प्रयोग किया था। आज, सर्वशक्तिमान परमेश्‍वर पुन: देहधारी हुए हैं और परमेश्‍वर का सर्वाधिक प्रतिरोध करने वाले राष्‍ट्र, चीन में आए हैं, जहां वह अपने वचन अभिव्‍यक्‍त करने और हमें बचाने के लिए अपने जीवन का जोखिम उठा रहे हैं। यह करने के लिए उन्होंने जो कठिनाइयां और कष्‍ट सहे हैं, उसे कौन जान सकता है? उसे कौन समझ सकता है? जबकि, मैं, पतित मानव जाति का एक सदस्‍य, असहनीय ढंग से दुखी महसूस करने लगा और इन अपराधियों के साथ केवल कुछ ही दिन बिताने के बाद अपनी परिस्थितियों से बाहर निकलने के सिवाय कुछ नहीं चाहता था। परमेश्‍वर, जो पवित्र और धार्मिक हैं, दशकों से इस पापी, पतित संसार में हमारे साथ रहे हैं। क्‍या परमेश्‍वर ने कहीं अधिक कष्‍ट नहीं उठाया है? इसके अतिरिक्‍त, मैं नैतिक पतन से स्‍वयं को मुक्ति दिलाने और सच्‍चा मोक्ष प्राप्‍त करने के लिए कष्‍ट उठा रहा था। लेकिन परमेश्‍वर पापरहित हैं और इस संसार के नहीं हैं, न ही पृथ्‍वी पर इस नरक के हैं, लेकिन फिर भी केवल मानव जाति के लिए अपने प्रेमके कारण, मानव जाति की रक्षा करने के लिए अपने जीवन का बलिदान करने की इच्‍छा के साथ, बड़े लाल अजगर की मांद में आए हैं। परमेश्‍वर का प्रेम सच में अविश्‍वसनीय है! यदि मुझे परमेश्‍वर से थोड़ा भी प्रेम है, तो मुझे यह महसूस नहीं करना चाहिए कि मेरी अपनी परिस्थितियां असहनीय हैं, और मुझे बहुत अधिक व्‍यथित महसूस नहीं करना चाहिए। परमेश्‍वर के प्रेम के समक्ष, मुझे बस पश्‍चाताप और शर्मिंदगी महसूस हुई। और जब मैंने परमेश्‍वर के प्रेम पर मनन किया, तब मुझे अपने हृदय में स्नेह की लहरें महसूस हुईं। परमेश्‍वर सच में महान है, और मानव-जाति के लिए उनका प्रेम इतना प्रगाढ़ और इतना सत्‍य है! यदि मैंने व्‍यक्तिगत रूप से ऐसी परिस्थितियों को अनुभव नहीं किया होता, तो मैं परमेश्‍वर की प्रियता और मनोरमता को जान नहीं पाता। भले ही ऐसी परिस्थितियों को अनुभव करने से मेरी देह तहस-नहस हो गई है, फिर भी यह मेरे जीवन के लिए अविश्‍वसनीय रूप से हितकारी है। यह सोचकर, मेरा हृदय परमेश्‍वर के प्रति आभार से भर गया, और मुझे चरम पीड़ा के बावजूद परमेश्‍वर के लिए अपने साक्ष्‍य में दृढ़ खड़ा रहने का संकल्प प्राप्‍त हुआ।

नजरबंदी गृह में, कैदियों का सरदार अक्‍सर उन सभी तरीकों के बारे में बताता था, जो सुधार अधिकारी परमेश्‍वर पर विश्‍वास करने वाले "अपराधियों" को यातना देने के लिए इस्‍तेमाल करते थे: वो विश्‍वासियों की अंगुलियों में छोटी कीलें घोंप देते थे, जिससे बयां न की जा सकने वाली पीड़ा होती थी; वो पानी की एक बोतल में उबलता पानी भरते थे और विश्‍वासी की एक अंगुली को बलपूर्वक उसमें घुसा देते थे, और त्‍वचा के जल जाने के बाद, वो विश्‍वासी की अंगुली बाहर निकलाते थे और फिर फफोलों पर लाल मिर्च का पाउडर मसल देते थे…. जब मैंने रक्‍त को सर्द कर देने वाली इन यातनाओं के बारे में सुना, तो मैं आग बबूला हो गया, और चीनी कॉम्‍युनिस्‍ट पार्टी की सरकार के लिए, इस शैतानी शासन के लिए मेरी घृणा और अधिक गहरा गई। यह प्रत्‍येक दुष्‍ट कर्म करते समय हर सकारात्‍मक तरीके से अपना वर्णन करती है। यह "धार्मिक आस्‍था की स्‍वतंत्रता," और "सभी मनुष्‍यों को नागरिकों के विधिसम्‍मत अधिकार और हित मिले हुए हैं," और "कैदियों के साथ परिवार जैसा व्‍यवहार किया जाता है," की घोषणा करती है, जबकि गुप्‍त रूप से लोगों के साथ दुर्व्‍यवहार करती और यातना देती है, मनुष्‍य जीवन के लिए कोई परवाह प्रदर्शित नहीं करती है, और मनुष्‍यों के साथ मनुष्‍यों के रूप में व्‍यवहार नहीं करती है। परमेश्‍वर पर विश्‍वास करने वाले के लिए, उनके संसार में प्रवेश करना नरक में प्रवेश करने की भांति है, एक ऐसा स्‍थान जहां उन्‍हें कष्‍ट दिया और नीचा दिखाया जाएगा, और जहां उन्हें यह कभी पता नहीं होता है कि क्‍या वे वहां से जीवित निकल पाएंगे। इस विचार ने मुझे भयभीत कर दिया, क्‍योंकि मुझे भय था कि मुझे ये यातनाएं दी जाएंगी। प्रत्‍येक बार जब सुधार अधिकारी द्वारा धातु के दरवाजे पर छोटी खिड़की खोलने की आवाज़ सुनाई देती थी तो मेरी सांसें थम जाती थीं, क्‍योंकि मैं भयभीत था कि मुझे खींचकर बाहर निकाला जाएगा और यातना दी जाएगी। मैं पूरा दिन भय में डूबा रहता था, और मुझे लगता था कि मैं बुरी तरह फंस गय हूँ। अपने दुख में, मैं परमेश्‍वर से केवल मन ही मन प्रार्थना कर सकता था: "हे परमेश्‍वर! अब मेरा हृदय निर्बल हो गया है, और मुझे बहुत डर लगता है, लेकिन मैं आपको संतुष्‍ट करना चाहता हूँ, इसलिए कृपया मुझे विश्‍वास और शक्ति प्रदान कीजिए। मैं शैतान के प्रलोभन पर जीत पाने के लिए आप पर विश्‍वास करना चाहता हूँ!" अपनी प्रार्थना के बाद, मुझे परमेश्‍वर के वचनों में मार्गदर्शन प्राप्‍त हुआ: "डरो नहीं, सेनाओं का सर्वशक्तिमान परमेश्वर निश्चित रूप से तुम्हारे साथ होगा; वह तुम लोगों के पीछे है और तुम्हारा रक्षक है" ("वचन देह में प्रकट होता है" में आरम्भ में मसीह के कथन के "अध्याय 26")। "जब लोग अपने जीवन का त्याग करने के लिए तैयार होते हैं, तो सब कुछ तुच्छ हो जाता है, और कोई भी उनका लाभ नहीं उठा सकता। जीवन से अधिक महत्वपूर्ण क्या हो सकता है? इस प्रकार, शैतान लोगों में अधिक कार्य करने में असमर्थ हो जाता है, वह मनुष्य के साथ कुछ भी नहीं कर सकता" ("वचन देह में प्रकट होता है" में संपूर्ण ब्रह्मांड के लिए परमेश्वर के वचनों के रहस्य की व्याख्या के "अध्याय 36")। परमेश्‍वर के वचनों ने मुझे अविश्‍वसनीय सुकून और प्रोत्‍साहन प्रदान किया। मैंने सोचा, "हाँ, मैं जिस परमेश्‍वर पर विश्‍वास करता हूँ, वो सृष्टिकर्ता के प्रभु हैं जिन्‍होंने स्‍वर्ग एवं पृथ्‍वी और उसमें उपस्थित प्रत्‍येक वस्‍तु का सृजन किया है, जो सभी के प्रधान हैं, और सभी चीजों को और सभी लोगों को नियंत्रित करते हैं। इसके अतिरिक्‍त, क्‍या प्रत्‍येक मनुष्‍य का जीवन और मृत्‍यु परमेश्‍वर के हाथों में नहीं है? परमेश्‍वर की अनुमति के बिना, दुष्‍ट शैतान मेरे साथ कुछ भी करने का साहस नहीं करेगा। क्‍या यह सत्‍य नहीं है कि मैंने सिर्फ मृत्‍यु और शारीरिक कष्‍ट के अपने भय के कारण ही अपना हर दिन डर और आतंक में बिता रहा था? शैतान मुझ पर हमला करने, मुझे वशीभूत करने और परमेश्‍वर के साथ विश्‍वासघात करवाने के लिए इस निर्बलता को प्रयोग कर रहा था। यह लोगों का भक्षण करने के लिए शैतान की चाल है। लेकिन यदि मैं अपने जीवन का परित्‍याग करने की इच्‍छा रखता हूँ, तो क्‍या सच में ऐसी कोई चीज होगी जिसे मैं सहन नहीं कर पाऊँगा?" मैंने अय्यूब के अनुभव पर मनन किया: जब शैतान ने परमेश्‍वर के साथ शर्त लगाई थी, तब अय्यूब को दैहिक कष्‍ट अनुभव करना पड़ा था, लेकिन परमेश्‍वर की अनुमति के बिना, भले ही शैतान ने अय्यूब को कितनी यातना दी हो, लेकिन वो उसका जीवन नहीं ले पाया था। अब, मैं अय्यूब के उदाहरण का अनुसरण करना चाहता था और परमेश्‍वर में सच्‍चा विश्‍वास रखना चाहता था, क्‍योंकि भले ही अपदूत मेरी देह को मृत्‍यु तक यातना दें, मेरी आत्‍मा परमेश्‍वर के हाथों में थी। भले ही ये अपदूत मुझे कैसे भी यातना और कष्‍ट क्‍यों न दें, मैं इनके अत्‍याचारपूर्ण दुर्व्‍यवहार से कभी हार नहीं मानूँगा। मैंने प्रतिज्ञा की, मैं विश्‍वासघाती कभी नहीं बनूँगा! मैं परमेश्‍वर के वचनों में मिले समयोचित मार्गदर्शन के लिए आभारी हूँ जिसने दासता और मृत्‍यु के बंधनों से मुझे बाहर निकाला और मुझे शैतान की योजना का शिकार नहीं बनने दिया। परमेश्‍वर द्वारा सुरक्षा के कारण, मैंने उस तरह की यातनाएं नहींझेलीं, और इसमें, मुझे पुन: अपने लिए परमेश्‍वर का प्रेम और दया दिखाई दी।

कुछ दिन बाद, मुझसे कलीसिया के अगुवाओं के बारे में जानकारी प्राप्‍त करने की उम्‍मीद में, वह दुष्‍ट पुलिस अफसर मुझसे पूछताछ करने के लिए दुबारा आया, लेकिन जब मैंने उत्तर नहीं दिया तो वह अत्‍यधिक हिंसक हो गया। उसने मेरी ठोढ़ी को पकड़कर मुझे घूरा और मेरे सिर को बायें और दायें झुकाया, फिर दांतों को पीसते हुए बोला, "क्‍या तेरे अंदर इंसानों जैसा कुछ भी है? ठीक है, तू परमेश्‍वर पर विश्‍वास कर! मैं तेरी एक पिक्‍चर इंटरनेट पर डालूँगा और तेरे बारे में कुछ कहानियां बना दूँगा, और मैं सर्वशक्तिमान परमेश्‍वर के सभी विश्‍वासियों को यकीन दिला दूँगा कि तूने परमेश्‍वर के साथ विश्‍वासघात किया है और अपने भाइयों और बहनों को धोखा दे दिया है। फिर कोई भी तेरे साथ बात नहीं करेगा। और फिर, मैं तुझे ऐसी जगह ले जाऊँगा जिसके बारे में कोई नहीं जानता, एक गड्ढा खोदूँगा, और तुझे जिंदा दफना दूँगा, और कोई भी तुझे कभी खोज नहीं पाएगा।" अपने गुस्‍से में, इस दुष्‍ट इंसान ने अपनी निर्लज्‍ज गुप्‍त चालें और षडयंत्र बता दिए, और यह लोगों से चालाकी से अपना काम निकलवाने का उनका ठेठ तरीका भी था—फंसाना, झूठ के सहारे बदनाम करना, अपराधों के झूठे आरोप लगाना, और हत्‍या। उन्हें एक इंसान की जान की ज़रा-भी परवाह नहीं थी, और कहा नहीं जा सकता था कि उन्‍होंने गुप्‍त रूप से कितने अमानुषी, क्रूर कर्म किए हैं! इस बार, उसकी धमकियों को सुनकर, मैं शांत था, और मुझे बिल्‍कुल भी भय महसूस नहीं हुआ, क्‍योंकि परमेश्‍वर मेरा मजबूत सहारा थे। परमेश्‍वर मेरे साथ थे, इसलिए मुझे किसी चीज से भयभीत होने की आवश्‍यकता नहीं थी। शैतान जितना अधिक हिसंक बनता है, वह अपनी कुरूपता और शक्तिहीनता को उतना ही अधिक प्रकट करता है; वह विश्‍वासियों को जितना अधिक कष्‍ट देता है, वह अपनी दुष्‍टता, परमेश्‍वर का शत्रु बनने के प्रतिक्रियावादी सार, अनैतिक कर्म करने, और स्‍वर्ग एवं प्रकृति के विरुद्ध जाने को उतना ही अधिक प्रकट करता है; वह परमेश्‍वर के विश्‍वासियों को जितनी अधिक हानि पहुँचाता है, वह परमेश्‍वर पर विश्‍वास करने और अंत तक परमेश्‍वर का अनुसरण करने के मेरे दृढ़ निश्‍चय को उतना ही अधिक प्रेरित करता है: मैं अपना जीवन परमेश्‍वर को समर्पित करना और शैतान का सदा के लिए त्‍याग देना चाहता हूँ! जैसा कि परमेश्‍वर के वचन हैं: "मनुष्य अपनी सभी शक्तियों को लंबे समय से इकट्ठा करता आ रहा है, उसने इसके लिए अपने सभी प्रयासों को समर्पित किया है, हर कीमत चुकाई है, ताकि वह इस दानव के घृणित चेहरे को तोड़ सके और जो लोग अंधे हो गए हैं, जिन्होंने हर प्रकार की पीड़ा और कठिनाई सही है, उन्हें अनुमति दे कि वे अपने दर्द से उठें और इस दुष्ट प्राचीन शैतान को अपनी पीठ दिखाएं" ("वचन देह में प्रकट होता है" में "कार्य और प्रवेश (8)")। उस समय, मेरा रक्‍त गुस्‍से से उबल रहा था, और मैंने मन ही मन एक प्रतिज्ञा की: भले ही मुझे यहाँ कितने भी समय तक क्‍यों न रहना पड़े, और भले ही ये दुष्‍ट मनुष्‍य मुझे कैसे भी यातना दें, मैं परमेश्‍वर के साथ विश्‍वासघात कभी नहीं करूँगा। उस पुलिस अफसर ने देख लिया कि मैं उत्तर नहीं दूँगा, और आखिर में, मुझे वापस कोठरी में ले गया। और इस तरह, परमेश्‍वर के वचन के कारण, मैं उन अपदूतों के मुझसे जबरन अपराध स्वीकार करवाने के बार-बार के प्रयासों और उनके अत्‍याचार पर जीत प्राप्‍त कर पाया। मैंने कलीसिया के बारे में कोई जानकारी नहीं दी, और नजरबंदी गृह में 50 से अधिक दिन बिताने के बाद, पुलिस मुझे बिना किसी आरोप के रिहा करने को मजबूर हो गई।

गिरफ्तारी का अनुभव हो जाने के बाद, मैंने सीसीपी के पैशाचिक सार को स्‍पष्‍ट देखा। यह स्‍वर्ग के विरुद्ध युद्ध करती है और परमेश्‍वर की शत्रु है। यह परमेश्‍वर की आराधना करने से इंकार करती है, और लोगों के साथ छल करने और उन्‍हें नियंत्रित करने, लोगों को परमेश्‍वर पर विश्‍वास करने या उनकी आराधना करने से रोकने के लिए सभी संभव साधनों को प्रयोग भी करती है। यह लोगों को परमेश्‍वर से दूर करने और उनसे परमेश्‍वर का प्रतिरोध करवाने का प्रयास करती है, ताकि वे उसके साथ अंतत: नरक में नष्ट हो जाएं। यह इतनी कुत्सित, अनैतिक, और दुष्‍ट है! लेकिन इससे भी महत्‍वपूर्ण, इस अनुभव ने मुझे परमेश्‍वर की चमत्‍कारिकता और बुद्धि, तथा उसके वचनों के अधिकार और सामर्थ्‍य की सच्‍ची समझ प्रदान की। एक ऐसे देश में, जहाँ परमेश्‍वर को घोर शत्रु के रूप में देखा जाता है, वहाँ परमेश्‍वर के विश्‍वासी अनीश्‍वरवादी सरकार की आँखों और देह में चुभते कांटों के समान हैं। लेकिन फिर भी, यह उन्‍हें दबा पाने में सर्वथा असमर्थ है जो परमेश्‍वर पर सच्‍चा विश्‍वास करते हैं। भले ही यह कैसे भी दमन करे, कैदी बनाये, और हमारी देह को हानि पहुँचाए, यह रोशनी की दिशा में आगे बढ़ने और सत्‍य का अनुसरण करने की हमारी इच्‍छा को दूर नहीं कर सकती है, और यह परमेश्‍वर में विश्‍वास और उनका अनुसरण करने के हमारे निश्‍चय को डिगा नहीं सकती है। मुझे गिरफ्तार किया गया था और मैंने इन अपदूतों की हिंसक क्रूरता को व्‍यक्तिगत रूप से अनुभव किया था। शैतान मुझे गिरफ्तार कर और मुझ पर अत्‍याचार करके अपने अत्‍याचारी शासन के वशीभूत करने की व्‍यर्थ इच्‍छा रखता था, लेकिन परमेश्‍वर के वचनों ने निरंतर मेरा मार्गदर्शन किया, और उन्होंने मुझे बुद्धि, विश्‍वास, और शक्ति प्रदान की, जिससे मैं शैतान के क्रूर अत्‍याचार के बीचोबीच दृढ़ खड़ा रह पाया। अपने यथार्थ अनुभव के द्वारा, मैंने परमेश्‍वर के चमत्‍कारिक कर्मों को देखा, परमेश्‍वर में मेरी आस्‍था अत्‍यधिक बढ़ गई, और मुझे परमेश्‍वर के वचन की अधिक व्‍यावहारिक समझ प्राप्‍त हुई। मैंने अनुभव किया कि परमेश्‍वर के वचन सत्‍य हैं, और यही मनुष्‍यों के जीवन की शक्ति और स्रोत हैं। परमेश्‍वर के वचनों के मार्गदर्शन के साथ, मुझे किसी चीज से भयभीत होने की आवश्‍यकता नहीं है, और भले ही मुझे आगे के मार्ग पर कितनी भी कठिनाइयों और बाधाओं का सामना क्‍यों न करना पड़े, मैं अंत तक परमेश्‍वर का अनुसरण करने की इच्‍छा रखता हूँ!

फुटनोट:

1. मानव जाति की अवज्ञा को सामने लाने के लिए "विनाश" का प्रयोग किया गया है।

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