46. परमेश्वर का संरक्षण

सर्वशक्तिमान परमेश्वर कहते हैं, "लोग अपना स्वभाव स्वयं परिवर्तित नहीं कर सकते; उन्हें परमेश्वर के वचनों के न्याय, ताड़ना, पीड़ा और शोधन से गुजरना होगा, या उसके वचनों द्वारा निपटाया, अनुशासित किया जाना और काँटा-छाँटा जाना होगा। इन सब के बाद ही वे परमेश्वर के प्रति विश्वसनीयता और आज्ञाकारिता प्राप्त कर सकते हैं और उसके प्रति बेपरवाह होना बंद कर सकते हैं। परमेश्वर के वचनों के शोधन के द्वारा ही मनुष्य के स्वभाव में परिवर्तन आ सकता है। केवल उसके वचनों के संपर्क में आने से, उनके न्याय, अनुशासन और निपटारे से, वे कभी लापरवाह नहीं होंगे, बल्कि शांत और संयमित बनेंगे। सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि वे परमेश्वर के मौजूदा वचनों और उसके कार्यों का पालन करने में सक्षम होते हैं, भले ही यह मनुष्य की धारणाओं से परे हो, वे इन धारणाओं को नज़रअंदाज करके अपनी इच्छा से पालन कर सकते हैं" ("वचन देह में प्रकट होता है" में 'जिनके स्वभाव परिवर्तित हो चुके हैं, वे वही लोग हैं जो परमेश्वर के वचनों की वास्तविकता में प्रवेश कर चुके हैं')। पहले जब मैंने परमेश्वर के इन वचनों को पढ़ा था, "लोग अपना स्वभाव स्वयं परिवर्तित नहीं कर सकते; उन्हें परमेश्वर के वचनों के न्याय, ताड़ना, पीड़ा और शोधन से गुजरना होगा, या उसके वचनों द्वारा निपटाया, अनुशासित किया जाना और काँटा-छाँटा जाना होगा। इन सब के बाद ही वे परमेश्वर के प्रति विश्वसनीयता और आज्ञाकारिता प्राप्त कर सकते हैं और उसके प्रति बेपरवाह होना बंद कर सकते हैं।" मैं समझ नहीं पायी थी कि लोग अपना स्वभाव क्यों नहीं बदल पाते। मैंने रोज़ ईमानदारी से परमेश्वर के वचन पढ़े, सभाओं में हमेशा समय से भाग लिया, और मैंने कलीसिया द्वारा सौंपे गये किसी भी काम को स्वीकार किया। मेरा अनुमान था कि यदि मैं पाप न करूं, अपना कर्तव्य ठीक से निभाऊं, तो कई साल से विश्वासी होने और परमेश्वर के वचनों को बहुत पढ़ने के कारण, यकीनन मेरा भ्रष्ट स्वभाव बदल जाएगा। फिर अभी भी क्यों परमेश्वर द्वारा मेरा न्याय, ताड़ना, काँट-छाँट और निपटान किया जाएगा? जब तक कई बार मेरी सख्ती से काँट-छाँट कर मेरा निपटान नहीं किया गया, और मैंने आत्मचिंतन नहीं किया, तब तक मैं परमेश्वर के इन वचनों को पढ़कर सच्चाई से कुछ समझ नहीं पायी। तभी मैं जान पायी कि मैं शैतान द्वारा कितनी गहराई से भ्रष्ट की जा चुकी हूँ, कि मेरी अहंकारी और दंभी शैतानी प्रकृति मुझमें गहराई से जड़ें जमाये हुए है, और शुद्ध होने या परिवर्तित होने की बात तो दूर, परमेश्वर द्वारा न्याय, ताड़ना, काँट-छाँट और निपटान के बिना मैं स्वयं को कभी नहीं जान पाती।

सन् 2016 की शुरुआत में, मैं एक कलीसिया की अगुआ का काम कर रही थी। शुरू-शुरू में, मुझे लगा कि मुझमें वाकई बड़ी कमियाँ हैं, इसलिए मैं परमेश्वर से निरंतर प्रार्थना करती और अपने काम में उनका सहारा लेती। जब मेरी समझ से बाहर का कोई मसला सामने आता, तो मैं सहकर्मियों के साथ खोजबीन और सहभागिता करती, और मैं दूसरे लोगों के सुझाव स्वीकार कर लेती। मैं बहुत विनम्र थी। छह महीनों से भी अधिक के अभ्यास के बाद, कुछ सिद्धांतों में मेरी पकड़ अच्छी हो गयी और सत्य के बारे में सहभागिता करते हुए, मैं कुछ भाई-बहनों की दिक्कतों को सुलझा पाती थी। मैं धीरे-धीरे आत्मतुष्ट होती गयी, यह सोच कर कि "भले ही मैं पहले कभी कलीसिया की अगुआ नहीं रही हूँ, पर मुझमें अच्छी क्षमता है, और मैं परमेश्वर के वचनों को शीघ्रता से समझ लेती हूँ। अधिक अभ्यास के बाद मैं अवश्य और भी बेहतर हो जाऊंगी।" बाद में मुझे एक महत्वपूर्ण कार्य की जिम्मेदारी सौंपी गयी तो मैं और भी अधिक आत्मतुष्ट हो गयी। मैं अपने सहकर्मियों के बीच सबसे छोटी थी, और आस्था रखते हुए मुझे थोड़ा समय ही हुआ था, लेकिन मुझे लगा कि इतना महत्वपूर्ण काम लेने में समर्थ होने का अर्थ है कि मैं वाकई प्रतिभाशाली हूँ! कुछ समय तक, चलते वक्त भी मैं अपना सिर ऊंचा उठा कर चलती, यह सोच कर कि सब में से सिर्फ़ मेरे ही पास सर्वाधिक महत्वपूर्ण काम है, मानो कोई भी मेरी बराबरी न कर पाया हो। वक्त के साथ मैं और अधिक अहंकारी होती गयी। कलीसिया के कार्य की चर्चाओं में, जब सहकर्मी सुझाव देते, तो मैं अपने ही विचारों पर अड़ जाती, यह सोच कर कि "क्या आप सचमुच इस बारे में यही समझते हैं? मैंने पहले ऐसे काम अच्छी तरह से निपटाए हैं, तो क्या मुझे सिद्धांतों की बेहतर समझ नहीं है? इस मामले को निपटाने का सबसे अच्छा तरीका मैं जानती हूँ।" कभी-कभी मैं जिस बहन के साथ काम करती थी, वह किसी चीज़ को कुछ ज़्यादा ही गंभीरता से ले लेती थी, तो मैं आपा खो बैठती, इस सोच में कि इतने सरल मामले को आसानी से निपटाया जा सकता था और इस बारे में बार-बार सहभागिता करने और खोज करने की कोई ज़रूरत नहीं थी। कभी-कभी सहकर्मियों की बैठकों में, मैं सुनिश्चित करती कि उसके सुझावों को दूसरे भाई-बहन मंज़ूर न करें, और मैं उसे नीची नज़र से देखती। मैंने सोचा, "भले ही तुम मुझसे अधिक समय से अगुआ रही हो, पर तुम मुझसे बढ़ कर नहीं।" एक बार उसने मुझसे कहा कि मैं अपने काम में बहुत धीमी हूँ, मेरी तरक्की धीमी है। मैं इसे झेल नहीं पायी और मैंने उल्टा जवाब दिया, "मैं तुमसे यह सहभागिता मंज़ूर नहीं कर सकती। क्या तुम भी इस काम में शामिल नहीं हो? क्या इस काम के लिए तुम्हारी भी जिम्मेदारी नहीं है? तुम अपने बारे में इतना कम कैसे जानती हो और फिर तुम सारा काम मुझ पर कैसे थोप सकती हो?" यह कह कर मैं उठ खड़ी हुई और बाहर आ गयी। बाद में अगुआ को मेरे बर्ताव के बारे में पता चला और वे मुझसे निपटे, यह कह कर कि मैं बहुत अहंकारी हूँ। मैंने इसे मौखिक रूप से मान लिया, यह कह कर कि "मैं बहुत अहंकारी हूँ, और मैं सत्य को स्वीकार नहीं करती।" मैंने न आत्मचिंतन किया और न ही अपनी प्रकृति और सार को समझने की कोशिश की, लेकिन मैं अपने काम में मनमानी करते हुए अकड़ दिखाती रही। उस वक्त मेरे कुछ सहकर्मियों को क्षमता की कमी और व्यावहारिक कार्य न कर पाने के कारण हटा दिया गया था। मगर मुझे कभी भी हटाये जाने की चिंता नहीं रही। मैंने सोचा, "मैं अब कलीसिया की वास्तविक प्रतिभा हूँ और काफी सारे कामों के लिए जिम्मेदार हूँ। मेरे बिना, क्या वे थोड़े समय में दूसरा उपयुक्त व्यक्ति ढूंढ़ पायेंगे?" जब मैं बेवजह अहंकारी होती जा रही थी, तभी मेरी काँट-छाँट की गयी और मेरे साथ बड़ी सख्ती से निपटा गया।

एक बार, मैंने भाई-बहनों के अनुभव और गवाही के कुछ आलेख पढ़े जो मुझे थोड़े सतही लगे। मैंने किसी से भी चर्चा किये बिना उन सभी को नामंज़ूर कर दिया। जब अगुआ को पता चला तो वे वाकई क्रोधित हुए। उन्होंने मुझसे पूछा, "आपने इतने अच्छे आलेखों को नामंजूर कैसे कर दिया? क्या आपने सहकर्मियों के साथ इस बारे में चर्चा तक की?" मैंने कहा, "नहीं, उस वक्त मुझे लगा था कि ये कुछ सतही-से हैं।" जैसे ही मैंने यह कहा, अगुआ मुझसे सख्ती से निपटे और कहा, "भले ही ये आलेख थोड़े सतही हों, उनके अनुभव सच्चे हैं और वे व्यावहारिक समझ प्रदर्शित करते हैं। ये लोगों के लिए शिक्षाप्रद हैं। यही है जो एक अच्छे निजी अनुभव को गवाही बनाता है। आप अपने कार्य में सत्य को नहीं खोजतीं, आप ढीठ और अहंकारी हैं। आप सत्य को नहीं समझतीं या दूसरों के साथ मामलों पर चर्चा नहीं करतीं। पूर्णतया अच्छे आलेखों को निरस्त कर देना, परमेश्वर के कार्य के अनुभव की गवाहियों को दबा देना, क्या यह मूर्खता नहीं है? क्या यह ऐसा कुछ नहीं है जो शैतान करेगा? आप सिर्फ विध्वंसकारी हो रही हैं!" पहले भी मेरी काँट-छाँट हुई थी और मेरे साथ निपटा गया था, लेकिन कभी भी इतनी सख्ती से नहीं। "मूर्ख", "शैतान", "विध्वंसकारी", "दंभी", "अहंकारी" जैसे शब्द मेरे दिमाग में बार-बार गूँज रहे थे, और मैं अपने आंसुओं को रोक नहीं पायी। मुझे लगा जैसे सांस लेने भी दिक्कत हो रही है। फिर भी मुझे लगा कि मेरे साथ गलत हुआ है। भले ही मैंने उस वक्त अपने सहकर्मियों के साथ इस पर चर्चा नहीं की थी, क्या मैंने बाद में उन्हें नहीं बताया था? परमेश्वर वाकई हमारे हृदय के अंतरतम में देखता है। मैं बहानों के बारे में सोच ही रही थी कि अगुआ ने सख्ती से अपनी बात जारी रखी, "आप अपने कार्यों में स्वयं ही एक क़ानून हैं। जब आप किसी चीज़ को नहीं समझ पातीं तो पूछ सकती हैं या दूसरों से चर्चा कर सकती हैं, मगर आप वह भी नहीं करतीं। आप बेहद अहंकारी हैं और आपके दिल में परमेश्वर का भय बिल्कुल भी नहीं है!" यह सुन कर मैंने अनिच्छा से मान लिया। अगर वाकई मुझमें थोड़ा भी परमेश्वर का भय मानने वाला हृदय होता, तो मैं कर्म करने से पहले थोड़ी खोज करती, लेकिन इसके बजाय मैंने दूसरों की राय जाने बिना मनमानी की। मैं वाकई अहंकारी और आत्मतुष्ट थी।

अगुआ ने मेरे बारे में जांच-पड़ताल की, और पता लगाया कि मैं बहुत ज़्यादा अहंकारी हूँ, मैं सत्य को नहीं समझती, मैं ऐसे महत्वपूर्ण काम करने के योग्य नहीं हूँ, और इसलिए मुझे हटा दिया गया। मैं वाकई नकारात्मकता की स्थिति में पहुँच गयी। मुझे लगा कि इस मसले से अगुआ ने मुझे अंदर तक जान लिया है और सोचा कि मैं सत्य का अनुसरण करने वालों में से नहीं हूँ, मैं बेहद अहंकारी हूँ, और पोषण के काबिल भी नहीं हूँ। मुझे लगा कि अब परमेश्वर के घर में मेरे लिए कोई अवसर नहीं रहा। मैं और भी अधिक नकारात्मक होती गयी, और बहुत सारी गलतफहमियों से भर गयी। मुझे लगा मैं शैतान बन गयी हूँ। मुझे बचाया भी कैसे जा सकेगा? मैं समझ गयी कि भाई-बहन यकीनन सोचते होंगे कि मैं सही इंसान नहीं हूँ, तो अनुसरण करते रहने से क्या लाभ होगा? उस दौरान, हालांकि मैं अनिच्छा से कुछ काम करती रही, मगर मैं सत्य का अनुसरण नहीं करना चाहती थी। एक जिम्मेदार महिला ने परमेश्वर की इच्छा के बारे में मेरे साथ कई बार सहभागिता की, लेकिन मैं खुद को बदल न सकी। उन्होंने फिर मेरी काँट-छाँट की और मुझसे निपटीं, यह कह कर कि मैं अपने काम में जानबूझकर मुश्किल खड़ी कर रही हूँ, मैं नकारात्मक हूँ, मैं परमेश्वर का विरोध कर रही हूँ, और यदि मैंने बदलाव नहीं किया, तो देर-सबेर परमेश्वर मुझे हटा देगा। यह सुन कर मैं डर गयी और स्थिति की गंभीरता को समझ गयी। मैं प्रार्थना करने, खोजने और आत्मचिंतन करने के लिए शीघ्रता से परमेश्वर के सामने आ गयी। उन छह महीनों में, काँट-छाँट और निपटान को मैं क्यों ठीक ढंग से समझ नहीं पायी? आत्मचिंतन करते हुए, मैंने परमेश्वर के ये वचन पढ़े: "कुछ लोग काट-छाँट किए जाने और निपटे जाने के बाद निष्क्रिय हो जाते हैं; वे अपना कर्तव्य निभाने के लिए सारी ऊर्जा गँवा देते हैं, और अंत में अपनी वफ़ादारी को भी गँवा देते हैं। ऐसा क्यों होता है? यह आंशिक तौर पर लोगों का उनके कृत्यों के सार के प्रति जागरूकता की कमी के कारण होता है, और इसके कारण वे काट-छाँट और निपटारे को ग्रहण करने में असमर्थ हो जाते हैं। यह आंशिक तौर पर इसलिए भी होता है कि वे अभी-भी नहीं समझते काट-छाँट किए जाने और निपटे जाने का क्या महत्व है। लोग यह मानते हैं कि काट-छांट और निपटारा किए जाने का अर्थ है कि उनका परिणाम निर्धारित कर दिया गया है। परिणामस्वरूप, वे गलत ढंग से विश्वास करते हैं कि यदि उनके पास परमेश्वर के प्रति कुछ वफ़ादारी होगी, तो उनके साथ निपटा नहीं जाना चाहिए या उनकी काट-छाँट नहीं की जानी चाहिए; और यदि उनके साथ निपटा जाता है, तो यह परमेश्वर के प्रेम और उसकी धार्मिकता का संकेत नहीं है। ऐसी गलतफहमी के कारण कई लोग परमेश्वर से 'वफ़ादारी' न करने का साहस करते हैं। वास्तव में, जब सब हो जाता है तो यह इसलिए होता है क्योंकि वे बहुत अधिक कपटी हैं; वे कठिनाई सहना नहीं चाहते हैं। वे बस आसान तरीके से आशीषों को प्राप्त करना चाहते हैं। लोग परमेश्वर की धार्मिकता के बारे में नहीं जानते हैं। ऐसा नहीं है कि परमेश्वर ने कोई धार्मिक चीज़ नहीं की है या वह कुछ धार्मिक नहीं कर् रहा है; बात मात्र इतनी ही है कि लोग कभी भी विश्वास नहीं करते हैं कि परमेश्वर जो करता है वह धार्मिक है। मानव की दृष्टि में, यदि परमेश्वर का कार्य मनुष्य की कामनाओं के अनुसार नहीं है या यदि यह उन्हें जिसकी अपेक्षा थी, उसके अनुसार नहीं है, तो परमेश्वर अवश्य धार्मिक नहीं हो सकता। लेकिन, लोग कभी यह नहीं जानते हैं कि उनके कृत्य अनुचित हैं और सत्य के अनुरूप नहीं हैं, न ही उन्हें यह समझ आता है कि उनके कार्य परमेश्वर का विरोध करते हैं" ("मसीह की बातचीत के अभिलेख" में 'परमेश्वर द्वारा लोगों के प्रदर्शन के अनुसार उनके परिणाम के निर्धारण का अर्थ')। परमेश्वर के वचनों के इस प्रकाशन को पढ़ने के बाद, मैं आखिरकार समझ पायी कि मेरे इतने नकारात्मक होने का कारण मेरा बेहद अहंकारी और दंभी होना था और अपने व्यवहार की प्रकृति को मैं पहचान नहीं पायी थी। मैंने सोचा कि मैंने सिर्फ एक गलती की, और मेरे साथ उस तरह का व्यवहार बहुत ज़्यादा बुरा था। इसी वजह से मैं परमेश्वर को गलत समझते हुए और अपना बचाव करते हुए नकारात्मकता में डूबी रही। परमेश्वर के वचनों को पढ़ते समय मैंने अपने आपसे पूछा कि क्या वाकई सिर्फ उस एक गलती के लिए इतनी सख्ती से मेरी काँट-छाँट कर मुझसे निपटा गया। परमेश्वर के घर में लोगों से निपटने के कुछ सिद्धांत हैं। ये सब, लोगों की प्रकृति और सार, और उनके सामान्य व्यवहार पर आधारित होते हैं। अगुआ बिना किसी खास वजह के मेरे साथ नहीं निपटे थे। तो फिर, मेरे अंदर वाकई कौन-सी समस्याएँ थीं, जिनके कारण इतनी सख्ती से मेरी काँट-छाँट कर मुझसे निपटा गया?

बाद में मैंने परमेश्वर के ये वचन पढ़े: "अगर तुम्हारे भीतर वाकई सत्य है, तो जिस मार्ग पर तुम चलते हो वह स्वाभाविक रूप से सही मार्ग होगा। सत्य के बिना, बुरे काम करना आसान है और तुम यह अपनी मर्जी के बिना करोगे। उदाहरण के लिए, यदि तुममें अहंकार और दंभ हुआ, तो तुम परमेश्वर की अवहेलना करने से खुद को रोकना असंभव पाओगे; तुम्हें महसूस होगा कि तुम उसकी अवहेलना करने के लिए मज़बूर किये गये हो। तुम ऐसा जानबूझ कर नहीं करोगे; तुम ऐसा अपनी अहंकारी और दंभी प्रकृति के प्रभुत्व के अधीन करोगे। तुम्हारे अहंकार और दंभ के कारण तुम परमेश्वर को तुच्छ समझोगे और उसे ऐसे देखोगे जैसे कि उसका कोई महत्व ही न हो, वे तुमसे स्वयं की प्रशंसा करवाने की वजह होंगे, निरंतर तुमको दिखावे में रखवाएंगे और अंततः परमेश्वर के स्थान पर बैठाएंगे और स्वयं के लिए गवाही दिलवाएंगे। अंत में तुम आराधना किए जाने हेतु सत्य में अपने स्वयं के विचार, अपनी सोच, और अपनी स्वयं की धारणाएँ बदल लोगे। देखो लोग अपनी उद्दंडता और अहंकारी प्रकृति के प्रभुत्व के अधीन कितनी बुराई करते हैं! अपने बुरे कर्मों के समाधान के लिए, पहले उन्हें अपनी प्रकृति की समस्या को हल करना होगा। स्वभाव में बदलाव किए बिना, इस समस्या का मौलिक समाधान हासिल करना संभव नहीं है" ("मसीह की बातचीत के अभिलेख" में 'केवल सत्य की खोज करके ही तू अपने स्वभाव में परिवर्तन को प्राप्त कर सकता है')। ऐसे धर्मोपदेश भी हैं जिनमें उल्लेख है कि जब कुछ लोगों के पास कोई-न-कोई गुण या कोई क्षमता होती है, तो वे दूसरों को नीची नज़र से देखते हैं। वे किसी और की बात सुनना नहीं चाहते, और सोचते हैं कि वे बाकी सभी लोगों से बेहतर हैं। इस प्रकार का व्यक्ति अहंकारी, दंभी और आत्म-तुष्ट होता है। मैंने सोचा कि किस तरह विश्वासी बनने के बाद से, मैंने सत्य का अनुसरण करने पर ध्यान नहीं दिया था, बल्कि अपनी क्षमता और अहंकारी स्वभाव के भरोसे काम किया था। मुझे लगा कि लोग मुझे अच्छा मानते हैं, मेरे काम में छोटी-मोटी सफलताएं भी मिली थीं, तो अगुआ वाकई मेरी कद्र करते हैं। मैंने सोचा कि मैं बहुत अच्छी और काम में दूसरों से कहीं ज़्यादा सक्षम हूँ, इसलिए अपने साथी भाई-बहनों को मैं ज़्यादा कुछ नहीं समझती थी। मैं अपने ही ढंग से काम करने पर जोर देती, और मेरा अहंकारी स्वभाव मज़बूत होता चला गया। बाद में, कलीसिया के काम के प्रति मेरा रवैया वाकई ढीला हो गया। मैंने कभी भी सत्य के सिद्धांतों की खोज नहीं की या दूसरों के साथ खोजने या सहभागिता करने नहीं गयी। इसके बजाय, मैं मनमाने ढंग से काम करती रही, और कलीसिया के कार्य को बिगाड़ने लगी। मैं हमेशा महसूस करती कि मैं बहुत सक्षम हूँ, और सत्य को कुछ हद तक समझती हूँ, लेकिन उजागर किये जाने के बाद ही मैं आखिरकार समझ पायी कि मैंने जो समझा था वह सिद्धांत का महज एक मामूली अंश था, मुझे सत्य की वास्तविकता की लेशमात्र भी समझ नहीं थी, न ही मैं व्यावहारिक मसलों को सुलझाने के लिए सत्य के बारे में सहभागिता कर सकती थी। इसके बावज़ूद, मैं बेहद अहंकारी थी और हर काम एकतरफा ढंग से करती थी। मैं इतनी ज़्यादा अहंकारी थी कि मैं सारी समझ खो चुकी थी और परमेश्वर से मेरी दृष्टि हट गयी थी। मेरा मामला सिर्फ़ तभी उजागर हुआ जब अगुआ मेरे काम की समीक्षा करने आये। मैंने सोचा कि मैं इतने समय तक अपना काम इस तरह कैसे कर रही थी। न केवल मैंने अपने भाई-बहनों की मदद नहीं की थी या उन्हें लाभ नहीं पहुंचाया था, बल्कि मैंने इतने भ्रष्ट स्वभाव भी प्रकट किये थे कि वे बेबस हो गये थे। मैं अपना कर्तव्य नहीं निभा रही थी, बस दुष्टता कर रही थी! इस बारे में मैंने जितना सोचा, उतनी ही ज़्यादा चिंतित हो गयी। मुझे मालूम था कि जब कोई अहंकार से काम करता है, तो उसके लिए परमेश्वर का विरोध करने और दुष्टता करने से बचना नामुमकिन होता है। मैंने कुछ भाई-बहनों के बारे में सोचा जो मुझसे कम सक्षम लगते थे, मगर अपने काम में ज़्यादा सावधान थे और उस पर ध्यान देते थे। वे जानते थे कि सत्य को कैसे खोजें और दूसरों के विचारों को स्वीकार करें, जबकि मैं इतनी अहंकारी थी कि मुझमें आत्मबोध की बेहद कमी थी। सत्य को कैसे खोजा जाए, इस बात से मैं बिल्कुल अनजान थी। मैंने जितना आत्मचिंतन किया, उतना ही मुझे लगा कि मेरा रास्ता सत्य के अनुसरण का नहीं है। मैं बहुत अहंकारी थी और परमेश्वर को कुछ नहीं समझती थी, इसलिए जब मेरी काँट-छाँट हुई और मुझसे निपटा गया, काम से निकाल दिया गया, तो यह वास्तव में परमेश्वर द्वारा मेरा संरक्षण और मुझे बचाया जाना था। उसके बिना किसे पता मैं और कितनी दुष्टता कर बैठती। मैं उस स्थान तक पहुँच गयी होती जहां से लौटना मुमकिन न होता और मुझे हटा दिया जाता। तब अफसोस करने को बहुत देर हो चुकी होती। परमेश्वर के नेक इरादों को समझने के बाद, मुझमें पश्चाताप की भावना उमड़ आयी। मुझे लगा कि पिछले छह महीनों से मैं परमेश्वर को गलत समझ कर उसे दोष दे रही थी, नकारात्मक होकर काम में पिछड़ गयी थी। मेरे साथ कोई तर्क काम नहीं कर रहा था! उसके बाद से, मैं अपने पुराने अपराधों की भरपाई करने के लिए बस अपना काम ठीक से करना चाहती थी।

छह महीने बाद, मुझे टीम की अगुआ (टीम लीडर) के रूप में चुना गया। उस वक्त, मुझे वाकई डर था कि मैं अपनी अहंकारी प्रकृति के कारण फिर से लड़खड़ा कर विफल हो जाऊंगी। मेरे काम में जब मसले उठते, तो मैं बहुत सतर्क हो जाती, और मैं अक्सर अपने साथ काम करने वाले भाई-बहनों के साथ विचार-विमर्श और सहभागिता करती, और कलीसिया के अंदर की समस्याओं का हल ढूँढ़ने के लिए सत्य की खोज करती। अपना काम इस तरह से करके मुझे बहुत ज़्यादा सुकून मिल रहा था और भाई-बहनों के साथ मेरे संबंध पहले से बेहतर थे। कुछ महीने बाद, मुझे अपने काम में थोड़ी सफलता मिली और मैं मन-ही-मन आनंद का अनुभव करने लगी, यह सोच कर कि मैं सचमुच प्रतिभाशाली हूँ, और मैं चाहे जो काम करूं, उसे शीघ्रता से निपटा सकती हूँ। वक्त के साथ, मेरा अहंकारी स्वभाव फिर से सिर उठाने लगा। कभी-कभी जब भाई-बहन किन्हीं मसलों पर अगुआ की सलाह लेना चाहते, तो मैं उनके साथ धैर्य खो बैठती। मैं सोचती, "क्या हमने पहले इस बारे में खोज नहीं की है? और अधिक खोजने की क्या ज़रूरत है? मुझे सिद्धांतों की जानकारी है, तो मेरी सहभागिता काफी होनी चाहिए।" कोई विचार किये बिना मैं भाई-बहनों के साथ अपनी समझ साझा करती और उनसे स्वीकार करने को कहती, लेकिन उन्हें ठीक नहीं लगता और वे इस मामले के बारे में अगुआ से पूछते। बाद में अगुआ हम लोगों के साथ अभ्यास के सिद्धांतों के बारे में सहभागिता करते, जो मेरी समझी हुई बातों से अलग होतीं। मुझे आश्चर्य हुआ, और मैंने सोचा, "पूछने के लिए धन्यवाद, वरना हमारे काम पर असर पड़ता।" लेकिन इस तथ्य को जानने के बाद, न तो मैंने आत्मचिंतन किया और न ही खुद को जानने की कोशिश की। मैं अहंकारी और नासमझ बनी रही। जब मैं भाई-बहनों के काम में गलतियाँ देखती, मैं उन्हें घमंड से डांटती, यह सोच कर कि "अगर आप इतनी छोटी-सी चीज़ ठीक से नहीं कर सकते, तो फिर क्या कर सकेंगे? मुझे नहीं लगता आप इसमें मन लगा रहे हैं।" वक्त के साथ, दूसरे लोग मेरे कारण बेबस महसूस करने लगे और मुझसे दूरी बनाने लगे। मैंने एक बहन को इतना बेबस कर दिया कि वह अब अपना काम करना ही नहीं चाहती थी। मैं जानती थी मैं गलत हूँ, मगर जब भी कोई बात उठती, मैं अपना अहंकारी स्वभाव प्रकट किये बिना रह नहीं पाती। अपने लड़खड़ा कर विफल होने की पहले की बात सोच कर मैंने हल्का-सा डर महसूस किया, लेकिन तब मैंने समस्या को सुलझाने के लिए सत्य को नहीं खोजा।

बाद में मैंने एक बहन को एक महत्वपूर्ण काम सौंपने का एकतरफा फैसला कर लिया। एक भाई ने मुझे चेताया कि वह कपटी है, वह किसी महत्वपूर्ण काम के लिए ठीक नहीं है। मैंने सोचा, "उसके साथ कुछ दिक्कत ज़रूर है, पर इतनी बड़ी नहीं जितनी तुम कहते हो। भ्रष्टता और कमियाँ किस इंसान में नहीं होतीं?" मैंने उस भाई के सुझाव को बिल्कुल गंभीरता से नहीं लिया, बल्कि उस बहन को सहभागिता के लिए बुला कर उसे उसकी दिक्कतों के बारे में बताया। मगर मुझे यह देख कर बड़ा झटका लगा कि वो पूरी तरह दोमुंही और अपने काम में लापरवाह थी। इससे परमेश्वर के घर को गंभीर नुकसान हुआ। जब अगुआ को इस बारे में पता चला, तो वे मेरे साथ सख्ती से निपटे और कहा: "आपने अपनी मर्जी चलायी, एक कपटी व्यक्ति को बढ़ावा दिया। एक भाई ने आपको चेताया, लेकिन आपने उनकी बात नहीं सुनी या आत्मचिंतन नहीं किया। और अब इसके गंभीर नतीजे सामने आये हैं और इतनी बड़ी गड़बड़ी हुई है। यह अपने काम को लेकर आपमें जिम्मेदारी का अभाव है। आप सत्य को नहीं समझतीं और अहंकारी हैं। आपको हटाना होगा।" इतनी सख्ती से काँट-छाँट और निपटान मेरे लिए बहुत पीड़ादायक था। इतने सारे भाई-बहनों के सामने मुझे अपने काम से निकाल बाहर किया गया था, और अगुआ ने जोर देकर बताया था कि मेरे कारण कितनी बड़ी गड़बड़ी है, और मुझे हटाना ज़रूरी था। मुझे लगा कि मेरे मार्ग का अंत हो गया और मैं परमेश्वर द्वारा अवश्य हटा दी जाऊंगी, और अब आगे प्रयास करना बेकार है। काम से हटाये जाने के बाद मैं वाकई नकारात्मक हो गयी। हर रात बिस्तर पर पड़ी मैं घटी हुई घटनाओं के बारे में सोचती और रोना शुरू कर देती। मैं इतनी ज़्यादा शर्मिंदा थी कि लंबे वक्त तक किसी के सामने आना नहीं चहती थी। मैंने देखा कि भाई-बहन खुशी-खुशी अपना काम कर रहे थे और मुझे लगा कि अपनी अहंकारी प्रकृति के कारण मैं उन जैसी हूँ ही नहीं। किसी के साथ चर्चा किये बिना या सलाह लिये बिना, मैंने एक कपटी इंसान को आगे बढ़ाया था, जिससे कलीसिया के काम में गंभीर गड़बड़ी हुई। क्या अब भी परमेश्वर मुझे बचायेंगे? मैंने कभी कल्पना भी नहीं की थी कि आस्था का मेरा मार्ग इतनी कम उम्र में बंद हो जाएगा। मुझे ऐसा भी संदेह होने लगा कि परमेश्वर का यह वचन कि काँट-छाँट और निपटान से उद्धार मिलता है, हटाया नहीं जाता, मुझ पर लागू नहीं होता। मेरा दिल गलतफहमियों से भरा हुआ था। जब एक बार अगुआ कार्य के बारे में हमारे साथ सहभागिता करने आये, तो मैं सबसे दूर के कोने में छुप गयी। मैं तब वाकई चौंक गयी जब उन्होंने मेरा नाम पुकारा और पूछा कि मैंने हाल में क्या तरक्की की है। उन्होंने आगे पूछा कि काँट-छाँट और निपटान के बाद क्या मैं नकारात्मक हो गयी हूँ, और तब उन्होंने ईमानदारी से मेरे साथ सहभागिता की और यह कहते हुए मुझे प्रेरित किया, "आप अभी युवा हैं। आपको सत्य का अनुसरण करना चाहिए और स्वभाव में परिवर्तन लाने पर ध्यान देना चाहिए।" अगुआ से दिल को छू लेने वाली बात सुन कर मुझे इतना सुकून और प्रोत्साहन मिला कि मैं खुद को बिलखने से रोक नहीं पायी। मैं अपने काम में बहुत ज़्यादा अहंकारी और दंभी, गैर-जिम्मेदार और लापरवाह थी, और कलीसिया के काम को मैंने बहुत गंभीर नुकसान पहुंचाया था। अगुआ ने काँट-छाँट और निपटान कर और मुझे हटा कर ठीक ही किया था, मगर मैंने कभी कल्पना भी नहीं की थी कि वे मुझे प्रोत्साहन भी देंगे। मैंने परमेश्वर को उसकी कृपा के लिए दिल से धन्यवाद दिया। उस रात मैंने रो-रो कर परमेश्वर से प्रार्थना की और संकल्प किया कि मैं वाकई सच्चाई से आत्मचिंतन करूंगी और अपने अहंकारी स्वभाव से छुटकारे के लिए सत्य को खोजूँगी।

बाद में मैंने परमेश्वर के वचनों के इस अंश को पढ़ा: "अहंकार मनुष्‍य के भ्रष्‍ट स्‍वभाव की जड़ है। लोग जितने ही ज्‍़यादा अहंकारी होते हैं, उतनी ही अधिक संभावना होती है कि वे परमेश्‍वर का प्रतिरोध करेंगे। यह समस्‍या कितनी गम्‍भीर है? अहंकारी स्‍वभाव के लोग न केवल बाकी सभी को अपने से नीचा मानते हैं, बल्कि, सबसे बुरा यह है कि वे परमेश्‍वर को भी हेय दृष्टि से देखते हैं। भले ही कुछ लोग, बाहरी तौर पर, परमेश्‍वर में विश्‍वास करते और उसका अनुसरण करते दिखायी दें, तब भी वे उसे परमेश्‍वर क़तई नहीं मानते। उन्‍हें हमेशा लगता है कि उनके पास सत्‍य है और वे अपने बारे में बहुत ऊँचा सोचते हैं। यही अहंकारी स्वभाव का सार और जड़ है और इसका स्रोत शैतान में है। इसलिए, अहंकार की समस्‍या का समाधान अनिवार्य है। यह भावना कि मैं दूसरों से बेहतर हूँ–एक तुच्‍छ मसला है। महत्‍वपूर्ण बात यह है कि एक व्‍यक्ति का अहंकारी स्‍वभाव उसको परमेश्‍वर के प्रति, उसके विधान और उसकी व्‍यवस्‍था के प्रति समर्पण करने से रोकता है; इस तरह का व्‍यक्ति हमेशा दूसरों पर सत्‍ता स्‍थापित करने की ख़ातिर परमेश्‍वर से होड़ करने की ओर प्रवृत्‍त होता है। इस तरह का व्‍यक्ति परमेश्‍वर में तनिक भी श्रद्धा नहीं रखता, परमेश्‍वर से प्रेम करना या उसके प्रति समर्पण करना तो दूर की बात है। जो लोग अहंकारी और दंभी होते हैं, खास तौर से वे, जो इतने घमंडी होते हैं कि अपनी सुध-बुध खो बैठते हैं, वे परमेश्वर पर अपने विश्वास में उसके प्रति समर्पित नहीं हो पाते, यहाँ तक कि बढ़-बढ़कर खुद के लिए गवाही देते हैं। ऐसे लोग परमेश्वर का सबसे अधिक विरोध करते हैं। यदि लोग परमेश्वर का आदर करने की स्थिति में पहुँचना चाहते हैं, तो पहले उन्हें अपने अहंकारी स्वभावों का समाधान करना होगा। जितना अधिक तुम अपने अहंकारी स्वभाव का समाधान करोगे, उतना अधिक आदर तुम्हारे भीतर परमेश्वर के लिए होगा, और केवल तभी तुम उसके प्रति समर्पित हो सकते हो, सत्य को प्राप्त कर सकते हो और उसे जान सकते हो" (परमेश्‍वर की संगति)। केवल परमेश्वर के वचनों के प्रकाशन से ही मैं जान पायी कि अपनी अहंकारी प्रकृति के आधार पर काम करना महज थोड़ी-सी भ्रष्टता को प्रकट करने का मसला नहीं था, बल्कि इस कारण मुख्य रूप से मैं दूसरों और परमेश्वर तक की उपेक्षा कर रही थी। इसने मुझे खुद के बजाय परमेश्वर के खिलाफ विद्रोह और विरोध करने को उकसाया। अपने काम के दिनों के बारे में सोचने पर, मुझे हमेशा लगा कि मैं एक चालाक और सक्षम इंसान थी, इसलिए अपना काम करने के लिए मैं अपने गुणों और क्षमता पर भरोसा करती थी। मुझे खुद पर इतना ज़्यादा विश्वास था कि मैं शायद ही कभी परमेश्वर से प्रार्थना करती या सत्य के सिद्धांतों को जानने का प्रयास करती। मेरे दिल में परमेश्वर के लिए कोई स्थान नहीं था। जब मेरा काम सफल नहीं हुआ तब मुझमें शिष्टता आयी, लेकिन जिस पल मैंने सिद्धांतों को थोड़ा-बहुत समझ लिया और थोड़ी सफलता पा ली, तो मैंने इसे अपनी पूंजी की तरह इस्तेमाल किया। मुझे लगने लगा कि मैं जो भी करूंगी अच्छा ही होगा, मैं कुछ भी कर सकती हूँ, मैं लोगों और परिस्थितियों को परख सकती हूँ, इसमें कोई दिक्कत नहीं, इसलिए मैं और भी अधिक अहंकारी, दंभी और आत्मतुष्ट हो गयी, और हर चीज़ में अपनी मर्ज़ी चलाने लगी, निरंकुश हो गयी। अगुआ के साथ भाई-बहनों द्वारा सत्य की खोज में भी मैं आड़े आयी और उन पर अपनी सोच थोपी, मानो वही सत्य हो, उनसे इसे स्वीकार करवाया और मनवाया। तथ्यों से मैं जान पायी कि मैं अपनी अहंकारी प्रकृति के अनुसार कर्म कर रही थी, मैंने भाई-बहनों को बेबस कर उन्हें नुकसान पहुंचाने और कलीसिया के कार्य में विघटन करने के अलावा कुछ नहीं किया, मैंने शैतान के नौकर की भूमिका भी निभायी थी। अगुआ का मेरे साथ निपटना, इस गंभीर विघटन को उजागर करना पूरी तरह सही था। मेरा अपने काम से निकाला जाना पूरी तरह से परमेश्वर की धार्मिकता थी। आखिरकार मैंने देखा उस प्रकार की अहंकारी प्रकृति कितनी भयावह और कितनी घातक है। अगर इसे ठीक नहीं किया जाता, तो मैं दुष्टता करने और किसी भी समय परमेश्वर का विरोध करने की आदी हो जाती, और मैं परमेश्वर के घर के काम को विघटित कर देती, परमेश्वर के स्वभाव को अपमानित करती, उसके द्वारा हटा दी जाती और दंडित की जाती। मुझे हटाये जाने के बाद मेरे काम की दूसरी समस्याएँ प्रकाश में आयीं। भाई-बहनों की उलाहना और मेरे काम की समस्याओं के उजागर होने से, मुझे बहुत ज़्यादा खेद और आत्म-निंदा का एहसास हुआ। मैं वाकई खुद से घृणा करने लगी। मैं इतनी अहंकारी क्यों थी? मुझे हमेशा लगता था कि मैं प्रतिभाशाली हूँ, मेरा किया कोई भी काम अच्छा होता है, लेकिन क्या मैंने थोड़े-से भी ऐसे काम किये जिनसे परमेश्वर को संतुष्टि मिली हो? मेरा किया काम पूरी तरह से घाल-मेल वाला था, और मैं विघटनकारी के सिवाय कुछ नहीं थी। यदि मुझमें परमेश्वर के प्रति ज़रा भी आदर होता, यदि मैंने प्रार्थना की होती या खोजने का अधिक प्रयास किया होता, या अगर मैंने दूसरों के साथ सहभागिता और विचार-विमर्श किया होता, यदि मैं थोड़ी और सतर्क रही होती, तो मैं परमेश्वर की इतनी अधिक अवज्ञा करने की हद तक नहीं पहुँची होती।

अपनी अहंकारी प्रकृति को ठीक करने के प्रयास में, मैंने बाद में परमेश्वर के कुछ वचनों को पढ़ा और थोड़ी सहभागिता की। "लोग अपना स्वभाव स्वयं परिवर्तित नहीं कर सकते; उन्हें परमेश्वर के वचनों के न्याय, ताड़ना, पीड़ा और शोधन से गुजरना होगा, या उसके वचनों द्वारा निपटाया, अनुशासित किया जाना और काँटा-छाँटा जाना होगा। इन सब के बाद ही वे परमेश्वर के प्रति विश्वसनीयता और आज्ञाकारिता प्राप्त कर सकते हैं और उसके प्रति बेपरवाह होना बंद कर सकते हैं। परमेश्वर के वचनों के शोधन के द्वारा ही मनुष्य के स्वभाव में परिवर्तन आ सकता है। केवल उसके वचनों के संपर्क में आने से, उनके न्याय, अनुशासन और निपटारे से, वे कभी लापरवाह नहीं होंगे, बल्कि शांत और संयमित बनेंगे। सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि वे परमेश्वर के मौजूदा वचनों और उसके कार्यों का पालन करने में सक्षम होते हैं, भले ही यह मनुष्य की धारणाओं से परे हो, वे इन धारणाओं को नज़रअंदाज करके अपनी इच्छा से पालन कर सकते हैं" ("वचन देह में प्रकट होता है" में 'जिनके स्वभाव परिवर्तित हो चुके हैं, वे वही लोग हैं जो परमेश्वर के वचनों की वास्तविकता में प्रवेश कर चुके हैं')। इस अंश को दोबारा पढ़ कर, मैं वाकई समझ पायी कि किसी इंसान की अहंकारी प्रकृति को ठीक करने का एकमात्र मार्ग परमेश्वर के न्याय, ताड़ना, काँट-छाँट, और निपटान को स्वीकार करना है। शैतान द्वारा हमारी भ्रष्टता बेहद गहरी होती है, इसलिए अगर हम सिर्फ परमेश्वर के वचन पढ़ने और निजी आत्मचिंतन के भरोसे रहें, तो अपने बारे में हमारी समझ सतही होगी और शायद हमारे भ्रष्ट स्वभाव नहीं बदलेंगे। परमेश्वर द्वारा बार-बार मुझे उजागर किये बिना, काँट-छाँट और निपटान के बिना, मैं अब भी अति-आत्मविश्वासी होती और सोचती कि मैं वाकई कोई हस्ती हूँ। मैं खुद को बिल्कुल भी नहीं जान पाती। मुझे वाकई पता नहीं चल पाता कि मैं कितनी अहंकारी हूँ या मेरा शैतानी स्वभाव कितना गंभीर है। अब, अपने किये हर काम के बारे में सोचती हूँ, तो मुझे बहुत शर्मिंदगी और खेद महसूस होता है। मैं यह सोच कर दुबक जाती हूँ और अपना सिर तक ऊपर नहीं उठा पाती। लेकिन ठीक उसी तरह की दर्द-भरी सीख ने मुझे अपनी अहंकारी प्रकृति की थोड़ी समझ हासिल करने दी, और यह जानने दिया कि मैं कहाँ लड़खड़ा कर विफल हो सकती हूँ। इससे मुझमें परमेश्वर के प्रति थोड़ा आदर पैदा हुआ। मैंने यह भी जाना कि मुझमें सत्य की वास्तविकता के साथ ही अपने काम में सत्य की खोज करने वाले दिल का बिल्कुल अभाव था। मैं ढीठ, मनमानी करने वाली और विघटनकारी थी। औसत क्षमता वाले, मगर समझदारी से अपना काम काने वाले उन भाई-बहनों की तुलना में, मैं कुछ भी नहीं थी। मेरा अहंकार आधारहीन था। यह सब जानने के बाद, मैं अपने काम में अधिक विनम्र हो गयी और अब अति-आत्मविश्वासी नहीं रही। मैंने सचेतन होकर खुद को परे रखने और नकारने का अभ्यास किया, मैंने सत्य के सिद्धांतों की अधिक खोज की और भाई-बहनों की बात अधिक सुनी। कलीसिया की किसी भी समस्या को सुलझाने के लिए, मैं खुली चर्चाएँ करने लगी। कभी-कभार जब मैं फिर से अपना अहंकार दिखाती, या अपने काम में सिद्धांतों का उल्लंघन करती, तो मैं खुद को परे रखने का अभ्यास करती, काँट-छाँट और निपटान के साथ ही दूसरों के मार्गदर्शन और सहायता को स्वीकार करती। समय के साथ, मुझे लगा कि इस प्रकार अभ्यास करना वाकई लाभकारी है। चूंकि सत्य की मेरी समझ सतही थी, और कई चीजों के बारे में मैं गहराई से नहीं जानती थी, इसलिए भाई-बहनों के साथ काम कर के और सभी के विचारों कोसाथ लेकर, मैं चीज़ों के बारे में अधिक समझ हासिल कर सकी थी। इस प्रकार अपना कर्तव्य निभाते हुए, मेरे जानने से पहले ही, मुझे परमेश्वर का संरक्षण मिल गया। मैं अब बड़ी गलतियाँ नहीं करती थी, न ही बड़े मसलों से मेरा सामना हुआ, और भाई-बहनों के पर्यवेक्षण में, कुछ हद तक मेरी अहंकारी प्रकृति नियंत्रण में रही। इसे अभ्यास में लाने से मुझे सुकून और आराम मिला, और धीरे-धीरे, अपने काम में मैं अहंकार को घटाती जा रही थी। एक बार, मेरे साथ काम कर रही एक बहन ने कहा, "मैं आपको लगभग दो साल से जानती हूँ। आप बेहद अहंकारी हुआ करती थीं और दूसरे लोग आपके सामने बेबस महसूस करते थे, लेकिन अब आप वाकई बदल गयी हैं।" उस पल मुझे लगा मैं बस रो पडूँगी। मैं इतनी ज़्यादा अहंकारी थी। ये थोड़ा-सा बदलाव भी आसानी से नहीं आया। पिछले कुछ सालों के बारे में सोचूँ, तो काँट-छाँट और निपटान के वे दो न भुलाये जाने वाले अनुभव मेरे लिए सबसे अधिक मददगार और लाभकारी थे। यदि मैं उन अनुभवों से नहीं गुज़री होती, तो अब भी अवश्य मुझमें उचित इंसानियत नहीं होती, और मैं बिल्कुल भी परमेश्वर के बारे में नहीं सोचती। मैं संकट के खतरनाक ढलान पर होती, किसी भी पल परमेश्वर का विरोध करने के कगार पर होती। मैं अब सच्चाई के साथ जानती हूँ कि काँट-छाँट और निपटान मेरे लिए परमेश्वर की सुरक्षा और उद्धार हैं।

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