4. जीवन पा लेना क्या है और जीवन का न होना क्या है

परमेश्वर के प्रासंगिक वचन :

जब लोग सत्य को समझते हैं, और इसके साथ यों जीते हैं मानो यह उनका जीवन हो, तो इसका तात्पर्य किस तरह के जीवन से है? इसका तात्पर्य, परमेश्वर के वचनों के अनुसार जीवनयापन कर पाने की उनकी योग्यता से है; इसका अर्थ है कि उन्हें परमेश्वर के वचनों का सच्चा ज्ञान है और सत्य की समझ है। जब लोगों के अंदर यह नया जीवन होता है, तो उनका जीवनयापन परमेश्वर के वचन-सत्य की नींव पर स्थापित होता है, और वे सत्य के क्षेत्र में जी रहे हैं। लोगों का जीवन सत्य को समझना और अनुभव करना होता, और इस आधार के साथ, उस दायरे से बाहर न जाना; सत्य-जीवन प्राप्त करने की बात करते समय, इसी जीवन की चर्चा की जा रही है। तुम सत्य के साथ इस तरह जी सको मानो यह तुम्हारा जीवन है, इसके लिए ऐसा नहीं है कि जीवन का सत्य तुम्हारे अंदर हो, न ही ये बात है कि अगर सत्य तुम्हारे अंदर जीवन की तरह हो, तो तुम सत्य बन जाते हो, और तुम्हारा आंतरिक जीवन सत्य का जीवन बन जाता है, यह तो और भी नहीं कहा जा सकता कि तुम सत्य-जीवन हो। आखिरकार, तुम्हारा जीवन इंसान का जीवन ही है। बात केवल इतनी है कि मनुष्य परमेश्वर के वचनों पर निर्भर रहकर जी सकता है, सत्य का ज्ञान रख सकता है, और इसे गहराई तक समझ सकता है; इस समझ को तुमसे छीना नहीं जा सकता। तुम इन बातों को पूरी तरह से अनुभव करते हो और समझते हो, तुम्हें लगता है कि ये चीजें अच्छी हैं, बहुत कीमती हैं, और तुम उन्हें अपने जीवन के आधार के रूप में स्वीकार करने लगते हो; साथ ही, तुम इन चीजों पर निर्भर रहते हुए जीते हो, और कोई इसे बदल नहीं सकता : तो, तुम्हारा जीवन यह है। यानी, तुम्हारे जीवन में केवल—समझ, अनुभव और सत्य की अंतर्दृष्टि—यही बातें होती हैं, तुम चाहे कुछ भी करो, तुम अपने जीने का तरीका इन्हीं चीज़ों पर ही आधारित करोगे, और तुम इस दायरे या इन सीमाओं से परे नहीं जाओगे; तुम्हारा जीवन इसी प्रकार का होगा। परमेश्वर के कार्य का अंतिम उद्देश्य यही है कि लोगों को इस तरह का जीवन मिले।

— "अंत के दिनों के मसीह की बातचीत के अभिलेख" में 'क्या तुम जानते हो कि सत्य वास्तव में क्या है?' से उद्धृत

परमेश्वर के वचनों को मानते हुए स्थिरता के साथ उनकी व्याख्या करने के योग्य होने का अर्थ यह नहीं है कि तुम्हारे पास वास्तविकता है; बातें इतनी भी सरल नहीं हैं जितनी तुम सोचते हो। तुम्हारे पास वास्तविकता है या नहीं, यह इस बात पर आधारित नहीं है कि तुम क्या कहते हो; अपितु यह इस पर आधारित है कि तुम किसे जीते हो। जब परमेश्वर के वचन तुम्हारा जीवन और तुम्हारी स्वाभाविक अभिव्यक्ति बन जाते हैं, तभी कहा जा सकता है कि तुममें वास्तविकता है और तभी कहा जा सकता है कि तुमने वास्तविक समझ और असल आध्यात्मिक कद हासिल कर लिया है। तुम्हारे अंदर लम्बे समय तक परीक्षा को सहने की क्षमता होनी चाहिए, और तुम्हें उस समानता को जीने के योग्य होना अनिवार्य है, जिसकी अपेक्षा परमेश्वर तुम से करता है; यह मात्र दिखावा नहीं होना चाहिए; बल्कि यह तुम में स्वाभाविक रूप से प्रवाहित होना चाहिए। तभी तुम में वस्तुतः वास्तविकता होगी और तुम जीवन प्राप्त करोगे। मैं सेवाकर्मियों के परीक्षण का उदाहरण देना चाहता हूँ, जिससे सभी अच्छी तरह से अवगत हैं: सेवाकर्मियों के विषय में कोई भी बड़े-बड़े सिद्धांत बता सकता है। इस विषय के बारे में सभी को अच्छा ज्ञान है; वे लोग इस विषय पर बोलते हैं और हर भाषण पिछले से बेहतर होता है, जैसे कि यह कोई प्रतियोगिता हो। परन्तु, यदि मनुष्य किसी बड़े परीक्षण से न गुजरा हो, तो यह कहना कठिन होगा कि उसके पास देने के लिए अच्छी गवाही है। संक्षेप में, मनुष्य के जीवन जीने में अभी भी बहुत कमी है, यह पूरी तरह से उसकी समझ के विपरीत है। इसलिए इसका, मनुष्य का वास्तविक आध्यात्मिक कद बनना अभी शेष है, और यह अभी मनुष्य का जीवन नहीं है। क्योंकि मनुष्य के ज्ञान को वास्तविकता में नहीं लाया गया है, उसका आध्यात्मिक कद रेत पर निर्मित एक किले के समान है जो हिल रहा है और ढह जाने की कगार पर है। मनुष्य में बहुत कम वास्तविकता है। मनुष्य में कोई भी वास्तविकता पाना लगभग असम्भव है। मनुष्य से स्वाभाविक रूप से बहुत ही अल्प वास्तविकता प्रवाहित हो रही है और उसके जीवन में समस्त वास्तविकता ज़बरदस्ती लाई गई है। इसीलिए मैं कहता हूँ कि मनुष्य में कोई वास्तविकता नहीं है। हालाँकि लोग ये दावा करते हैं कि परमेश्वर के प्रति उनका प्रेम कभी परिवर्तित नहीं होता, लेकिन वे ऐसा परीक्षणों का सामना होने से पहले कहते हैं। एक दिन अचानक परीक्षणों से सामना हो जाने पर जो बातें वे कहते हैं, वे फिर से वास्तविकता से मेल नहीं खाएँगी और यह फिर से प्रमाणित करेगा कि मनुष्य में वास्तविकता नहीं है। यह कहा जा सकता है कि जब कभी तुम्हारा सामना उन बातों से होता है, जो तुम्हारी धारणाओं से मेल नहीं खातीं और यह माँग करती हैं कि तुम स्वयं को दरकिनार कर लो, ये ही तुम्हारी परीक्षाएँ होती हैं। परमेश्वर की इच्छा को प्रकट किए जाने से पहले, प्रत्येक मनुष्य एक कठोर परीक्षण, एक बहुत बड़े परीक्षण से गुज़रता है। क्या तुम इस विषय को सुस्पष्टता से समझ सकते हो? जब परमेश्वर मनुष्य की परीक्षा लेना चाहता है, तो वह हमेशा सत्य के तथ्यों को प्रकट करने से पहले मनुष्य को चुनाव करने देता है। कहने का अर्थ यह है कि परमेश्वर जब मनुष्य का परीक्षण ले रहा होता है, तो वह कभी भी तुम्हें सत्य नहीं बताएगा; और इसी प्रकार मनुष्य को उजागर किया जाता है। यह एक विधि है, जिससे परमेश्वर यह जानने के लिए अपना कार्य करता है कि क्या तुम आज के परमेश्वर को जानते हो और साथ ही तुम में कोई वास्तविकता है या नहीं।

— "वचन देह में प्रकट होता है" में 'केवल सत्य का अभ्यास करना ही इंसान में वास्तविकता का होना है' से उद्धृत

मनुष्य परमेश्वर के कार्य का अनुभव करता है, स्वयं को जान लेता है, अपने भ्रष्ट स्वभाव को शुद्ध करता है और जीवन में विकास की तलाश करता है, यह सब परमेश्वर को जानने के वास्ते करता है। यदि तुम केवल अपने आप को जानने और अपने भ्रष्ट स्वभाव से निपटने का प्रयास करते हो, मगर तुम्हें इसका कोई ज्ञान नहीं है कि परमेश्वर मनुष्य पर क्या कार्य करता है, उसका उद्धार कितना महान है या इसका कोई ज्ञान नहीं है कि तुम परमेश्वर के कार्य का अनुभव कैसे करते हो और उसके कर्मों की गवाही कैसे देते हो, तो तुम्हारा यह अनुभव अनर्गल है। यदि तुम सोचते हो कि किसी के जीवन में केवल इसलिए परिपक्वता आई है क्योंकि वह सत्य को व्यवहार में लाने और सहन करने में समर्थ है, तो इसका मतलब है कि तुमने अभी भी जीवन का सच्चा अर्थ या मनुष्य को पूर्ण करने का परमेश्वर का उद्देश्य नहीं समझा है। एक दिन, जब तुम पश्चाताप कलीसिया (रिपेंटेंस चर्च) या जीवन कलीसिया (लाइफ़ चर्च) के सदस्यों के बीच, धार्मिक कलीसियाओं में होगे, तो तुम कई धर्मपरायण लोगों से मिलोगे, जिनकी प्रार्थनाएं "दर्शनों" से युक्त होती हैं और जो जीवन की अपनी खोज में, स्पर्श किए गए और वचनों द्वारा मार्गदर्शित महसूस करते हैं। इसके अलावा, वो कई मामलों में सहने और स्वयं का त्याग करने और देह द्वारा अगुआई न किए जाने में समर्थ हैं। उस समय, तुम अंतर बताने में समर्थ नहीं होगे: तुम विश्वास करोगे कि वो जो कुछ करते हैं, सही है, जीवन की प्राकृतिक अभिव्यक्ति है और यह कितनी दयनीय बात है कि जिस नाम में वो विश्वास रखते हैं, वही ग़लत है। क्या ऐसे विचार मूर्खतापूर्ण नहीं हैं? ऐसा क्यों कहा जाता है कि कई लोगों का कोई जीवन नहीं है? क्योंकि वो परमेश्वर को नहीं जानते और इसीलिए ऐसा कहा जाता है कि उनके हृदय में कोई परमेश्वर नहीं है और उनका कोई जीवन नहीं है। यदि परमेश्वर में तुम्हारा विश्वास एक स्थिति तक पहुँच गया है, जहां तुम परमेश्वर के कर्मों, परमेश्वर की वास्तविकता और परमेश्वर के कार्य के प्रत्येक चरण को पूरी तरह जानने में सक्षम हो, तो तुम सत्य के अधीन हो।

— "वचन देह में प्रकट होता है" में 'केवल परमेश्वर को जानने वाले ही परमेश्वर की गवाही दे सकते हैं' से उद्धृत

जिन लोगों में सत्य-जीवन प्रदर्शित करने का अभाव होता है, वे क्या अभिव्यक्त करते हैं? स्वाभाविक है कि बिना सत्य के, वे अपनी शैतानी प्रकृति के नियंत्रण और बंधनों के अधीन होंगे; स्वाभाविक है कि वे ऐसे स्वभाव को प्रकट करेंगे जो अहंकारी और दंभी है, स्वार्थी और नीच, धृष्ट और दुराग्रही है और अकेले ही निर्णय और कार्य करने के लिए उत्तरदायी है। ऐसे लोग झूठ बोलेंगे और धोखा देंगे, धोखेबाज और धूर्त होंगे और दूसरों के प्रति संदेह करने और दूसरों पर आक्षेप लगाने और राय बनाने की भावना से प्रवृत्त होंगे; वे हमेशा दूसरों का आकलन अपने पूर्वाग्रहों और इरादों की दूरबीन से करेंगे। ऐसे लोग वचन और कर्मों दोनों में, हमेशा अपनी प्राथमिकताओं पर भरोसा करेंगे और जब उनका सामना रुकावटों और असफलताओं से होगा, वे नकारात्मक बन जाएँगे। कभी-कभी वे अत्यधिक अहंकारी होंगे और कभी-कभी वे ऐसी नकारात्मकता में धँस जाएँगे कि वे वास्तव में ज़मीन में एक बिल खोद देंगे। ये लोग हर बात की अति करते हैं और कभी सामान्य नहीं होते हैं। जब वे अपने ज़हर के दांत नहीं दिखा रहे होते हैं, वे भोले-भाले होने का स्वांग रचते हैं। इस समय तुम लोग इसी तरह की स्थिति में होः तुम यातना भुगतने और कीमत चुकाने को तैयार हो; तुम्हारे संकल्प और दृढ़ता पूर्ण है—लेकिन अभी भी तुम्हारे पास सत्य-वास्तविकता नहीं है। जिन लोगों के पास अपने जीवन को सेवा में लगाने के लिए सत्य-वास्तविकता है, वे कैसे स्वयं को अभिव्यक्त करते हैं? मैं तुम लोगों को कुछ प्रमुख संकेत देता हूँ। जब लोगों के पास सत्य-वास्तविकता होती है, तो एक तरफ, वे कुछ सत्य को समझ गए होते हैं; दूसरी तरफ, वे स्वभाव में कुछ बदलाव प्रदर्शित करना शुरू कर देते हैं। स्वभाव में बदलाव की एक विशेषता होती है। अर्थात्, उन चीज़ों को मानने में सक्षम होना जो सही हैं और सत्य के अनुरूप हैं। चाहे कोई भी तुम्हें सुझाव दे—चाहे वे युवा हों या बूढ़े, चाहे तुम्हारी उनसे अच्छी तरह से पटती हो, चाहे तुम लोगों के बीच का संबंध अच्छा हो या बुरा—जब तक कि वे कुछ ऐसा कहते हैं जो सही है, सत्य के अनुरूप है, और परमेश्वर के परिवार के कार्य के लिए फायदेमंद है, तब तक तुम इसे सुन, ग्रहण और स्वीकार कर सकते हो, और किन्हीं भी अन्य कारकों से प्रभावित नहीं हो सकते हो। यह उस विशेषता का पहला पहलू है। सबसे पहले तुम सत्य को, और साथ ही उन चीज़ों को स्वीकार कर सकते हो जो सही हैं और सत्य के अनुरूप हैं। दूसरा यह है कि किसी समस्या का सामना होने पर सत्य की खोज करने में सक्षम होना। तुम न केवल सत्य को स्वीकार कर सकते हो; तुम्हें इसकी तलाश करने में भी समर्थ अवश्य होना चाहिए। उदाहरण के लिए, यदि तू किसी नई समस्या का सामना करता है जिसे कोई भी नहीं समझ सकता है, तो तू सत्य की तलाश कर सकता है, यह देख सकता है कि बातों को सत्य के सिद्धांतों के अनुरूप बनाने के लिए और परमेश्वर की अपेक्षाओं को पूरा करने के लिए तुझे क्या करना और किस चीज़ का अभ्यास करना चाहिए। एक और विशेषता है परमेश्वर की इच्छा के बारे में मननशील होने की योग्यता पाना। तुझे परमेश्वर की इच्छा के बारे में कैसे मननशील होना चाहिए? यह इस बात पर निर्भर करता है कि तू कौन से कर्तव्य को कर रहा है और इस कर्तव्य में परमेश्वर की क्या अपेक्षाएँ हैं। तुझे इस सिद्धांत को अच्छी तरह समझ लेना चाहिए। अपना कर्तव्य परमेश्वर की अपेक्षानुसार पूरा करना चाहिए, और इसे परमेश्वर को संतुष्ट करने के लिए करना चाहिए। तुझे परमेश्वर की इच्छा भी समझनी चाहिए, और तेरे कर्तव्य का वांछित परिणाम क्या है, एवं तुझे ज़िम्मेदारी और आस्थापूर्ण रूप से कार्य करना चाहिए। ये सभी परमेश्वर की इच्छा के प्रति विचारशील होने के तरीके हैं। यदि तू यह नहीं जानता है कि जो तू कर रहा है, उसमें परमेश्वर की इच्छा पर कैसे मननशील हुआ जाए, तो उसे पूरा करने के लिए, और परमेश्वर को संतुष्ट करने के लिए तुझे कुछ खोज अवश्य करनी चाहिए। अगर तुम सब इन तीन सिद्धांतों को अमल में ला सको, तुम उनके सहारे जिस तरह वास्तव में जी रहे हो, उसे माप सको, और अभ्यास के मार्ग को खोज सको, तो फिर तुम सैद्धांतिक तरीके से मामलों को संभाल रहे होगे। चाहे तुम्हारा सामना जिस किसी भी बात से हो, या चाहे तुमको जिस किसी भी समस्या से निपटना पड़ रहा हो, तुमको हमेशा तलाश करनी चाहिये कि तुमको किन सिद्धांतों के अनुसार अभ्यास करना चाहिए, उनमें से प्रत्येक में क्या विवरण शामिल हैं, उन्हें अमल में कैसे लाया जाये ताकि तुम सिद्धांतों का उल्लंघन न करो। एक बार जब तुम में इन बातों की स्पष्ट समझ होगी, तो तुम स्वाभाविक रूप से सत्य पर अमल कर पाओगे।

— "अंत के दिनों के मसीह की बातचीत के अभिलेख" में 'केवल सत्य को अभ्यास में ला कर ही तू भ्रष्ट स्वभाव के बंधनों को त्याग सकता है' से उद्धृत

एक बार जब सत्य तुम्हारा जीवन बन जाता है, उसके बाद अगर कोई परमेश्वर की निंदा करता है, उसके प्रति कोई श्रद्धा नहीं रखता, वह लापरवाह होता है और अपना काम करने में सिर्फ़ खानापूर्ति करता है, परमेश्वर के घर के काम में रुकावट या गड़बड़ी का कारण बनता है, तो यह सब देखकर तुम समझदारी से, जिस बात को समझना चाहिए उसे समझते हुए और जिसे उजागर करना चाहिए उसे उजागर करते हुए, सत्य के सिद्धांतों के अनुसार इसे सुलझाने में सक्षम होगे। अगर सत्य तुम्हारा जीवन नहीं बना है और तुम अभी भी अपने शैतानी स्वभाव के भीतर रहते हो, तो जब तुम्हारा सामना दुष्ट लोगों और शैतानों से होगा जो परमेश्वर के घर के कार्य में रुकावट डालते हैं और बाधाएँ खड़ी करते हैं, तुम उन पर ध्यान नहीं दोगे और उन्हें अनसुना कर दोगे; अपने विवेक द्वारा धिक्कारे जाए बिना, तुम उन्हें नज़रअंदाज़ कर दोगे। यहाँ तक कि तुम यह भी सोचोगे कि वह जो परमेश्वर के घर के कार्य में बाधाएँ खड़ी कर रहा है, तुम्हारा उससे कोई लेना-देना नहीं है। चाहे परमेश्वर के कार्य और उनके घर के हितों को कितना भी बड़ा नुकसान हो जाए, तुम अपने विवेक से कोई धिक्कार महसूस नहीं करोगे, जिसका अर्थ है कि तुम कोई ऐसे व्यक्ति बनोगे जो अपने शैतानी स्वभाव से जीता हो। शैतान तुम्हें नियंत्रित करता है और तुम्हें कुछ इस तरह से जीने के लिए प्रेरित करता है जो न तो पर्याप्त रूप से मानवीय होता है, और न ही पूरी तरह से दानवीय। तुम परमेश्वर का दिया हुआ खाते हो, पीते हो, और जो कुछ भी उससे मिलता है, उसका आनंद लेते हो, फिर भी जब परमेश्वर के घर के कार्य का कोई नुकसान होता है, तो तुम सोचोगे कि तुम्हारा इससे कोई लेना-देना नहीं है, और जब तुम इसे होते हुए देखते हो, तो तुम "अपनी कोहनी को बाहर की ओर मोड़ लेते हो",[क] और तुम परमेश्वर का पक्ष नहीं लेते, न ही परमेश्वर के कार्य को या परमेश्वर के घर के हितों को थामते हो। इसका मतलब है कि तुम पर शैतान का प्रभाव है, क्या ऐसा नहीं है? क्या ऐसे लोग मानव की तरह जीते हैं? जाहिर है, वो दुष्टात्मा हैं, मानव नहीं! हालाँकि, जब सत्य का तुम्हारे दिल में बोलबाला होता है और यह तुम्हारा जीवन बन गया होता है, तो जब भी तुम किसी निष्क्रिय, नकारात्मक, या बुराई को उभरते हुए देखते हो, तो तुम्हारे दिल में पूरी तरह से अलग प्रतिक्रिया होती है। पहले, तुम्हें धिक्कार और एक बेचैनी का अनुभव होता है जिसके तुरंत बाद यह भावना होती है, "मैं यूँ ही अकर्मण्य बना नहीं रह सकता और और न ही इसे अनदेखा कर सकता हूँ। मुझे उठना और बोलना चाहिए, मुझे खड़े होकर जिम्मेदारी लेनी चाहिए।" फिर तुम उठ सकते हो और इन बुरे कामों पर रोक लगा सकते हो, उनका पर्दाफ़ाश करते हुए, परमेश्वर के घर के हितों की रक्षा करने का प्रयास करते हुए, परमेश्वर के कार्य को बाधित होने से रोक सकते हो। न केवल तुममें यह साहस और संकल्प होगा, और तुम इस मामले को पूरी तरह से समझने में सक्षम होगे, बल्कि तुम परमेश्वर के कार्य और उसके घर के हितों के लिए भी उस ज़िम्मेदारी को पूरा करोगे जो तुम्हें उठानी चाहिए, और उससे तुम्हारे कर्तव्य की पूर्ति हो जाएगी। यह पूर्ति कैसे होगी? यह पूर्ति तुम पर सत्य का प्रभाव पड़ने और तुम्हारा जीवन बन जाने के माध्यम से होगी। इस तरह से, एक बार जब तुम्हारे कर्तव्य की पूर्ति हो गई, तुम यह नहीं पूछोगे कि परमेश्वर तुम्हें पुरस्कार दे सकता है या नहीं, उसने तुम्हारे कार्य देखे या नहीं या वह उन्हें स्वीकारता है कि नहीं। बल्कि, तुम केवल यह विश्वास करोगे कि यह ज़िम्मेदारी है जिसे तुम्हें उठाना ही चाहिए। इस तरह से तुम क्या विवेक, तर्क, मानवता, ईमानदारी और सम्मान को नहीं जी रहे होगे? तुम्हारा कर्म और व्यवहार "परमेश्वर का भय मानो और बुराई से दूर रहो" होगा, जिसके बारे में वह बोलता है। तुम इन वचनों के सार का पालन कर रहे होगे और उनकी वास्तविकता को जी रहे होगे। जब सत्य किसी व्यक्ति का जीवन बन जाता है, तब वह इस वास्तविकता को जीने में सक्षम होता है। लेकिन अगर तुमने अभी तक इस वास्तविकता में प्रवेश नहीं किया है, तो जब तुम धोखा, छल दिखाते हो या जब तुम स्वांग रचते हो या जब तुम दुष्ट लोगों को बुरे काम करते देखते हो या बुरी शक्तियों को परमेश्वर के कार्य में बाधाएँ और रुकावटें डालते देखते हो, तो तुम्हें कुछ भी महसूस नहीं होता और कुछ भी अनुभव नहीं होता। चाहे ये चीज़ें ठीक तुम्हारे सामने हो रही हों, तुम फिर भी हँस पाते हो और सहज अंतरात्मा के साथ खा और सो पाते हो और तुम्हें थोड़ा-सा भी खेद नहीं होता। इन दोनों जीवन में से तुम कोई भी जीवन जी सकते हो, तुम लोग कौन-सा चुनते हो? किस जीवन में एक वास्तविक मानवीय साम्यता है, जिसके साथ तुम सकारात्मक चीज़ों की वास्तविकता को जीते हो और कौन-सा जीवन एक बुरा, शैतान जैसा है? जवाब स्पष्ट है। जब सत्य लोगों की वास्तविकता या जीवन नहीं बना है, तो जो वो जीते हैं वह काफी दयनीय और दुखद होता है और वो अपने जीवन के लिए उत्तरदायी नहीं होते। क्योंकि सत्य उनके भीतर जीवन नहीं बना है, वो जो करते हैं वह उनके नियंत्रण में नहीं होता है और हालाँकि हो सकता है इसके बारे में उन्हें थोड़ा दुख महसूस हो, लेकिन यह अहसास बहुत जल्दी खत्म हो जाता है और चाहे जो भी हो उन्हें कोई पछतावा नहीं होता है। इस तरह से दो तरह के जीवन के बीच इतना ज़्यादा अंतर है।

— "अंत के दिनों के मसीह की बातचीत के अभिलेख" में 'जो सत्य का अभ्यास करते हैं केवल वही परमेश्वर का भय मानने वाले होते हैं' से उद्धृत

यदि कोई अपना कर्तव्य पूरा करते हुए परमेश्वर को संतुष्ट कर सकता है, और अपने कार्यों और क्रियाकलापों में सैद्धांतिक है और सत्य के समस्त पहलुओं की वास्तविकता में प्रवेश कर सकता है, तो वह ऐसा व्यक्ति है जो परमेश्वर द्वारा पूर्ण किया गया है। यह कहा जा सकता है कि परमेश्वर का कार्य और उसके वचन ऐसे लोगों के लिए पूरी तरह से प्रभावी हो गए हैं, कि परमेश्वर के वचन उनका जीवन बन गए हैं, उन्होंने सच्चाई को प्राप्त कर लिया है, और वे परमेश्वर के वचनों के अनुसार जीने में समर्थ हैं। इसके बाद, उनके देह की प्रकृति—अर्थात, उनके मूल अस्तित्व की नींव—हिलकर अलग हो जाएगी और ढह जाएगी। जब लोग परमेश्वर के वचन को अपने जीवन के रूप में धारण कर लेंगे, तो वे नए लोग बन जाएंगे। अगर परमेश्वर के वचन उनका जीवन बन जाते हैं; परमेश्वर के कार्य का दर्शन, मानवता से उसकी अपेक्षाएँ, मनुष्यों को उसके प्रकाशन, और एक सच्चे जीवन के वे मानक जो परमेश्वर अपेक्षा करता है कि वे प्राप्त करें, उनका जीवन बन जाते हैं, अगर वे इन वचनों और सच्चाइयों के अनुसार जीते हैं, और वे परमेश्वर के वचनों द्वारा सिद्ध बनाए जाते हैं। ऐसे लोग परमेश्वर के वचनों के माध्यम से पुनर्जन्म लेते हैं और नए लोग बन गए हैं। यह वह मार्ग है जिसके द्वारा पतरस ने सत्य का अनुसरण किया; यह सिद्ध बनाए जाने, परमेश्वर के वचनों से पूर्ण बनाए जाने, और परमेश्वर के वचनों से जीवन को पाने का मार्ग था। परमेश्वर द्वारा व्यक्त किया गया सत्य उसका जीवन बन गया, और केवल तभी वह एक ऐसा व्यक्ति बना जिसने सत्य को प्राप्त किया।

— "अंत के दिनों के मसीह की बातचीत के अभिलेख" में 'पतरस के मार्ग पर कैसे चलें' से उद्धृत

यदि लोगों को परमेश्वर के स्वभाव की वास्तविक समझ होती है, और वे उसकी पवित्रता और धार्मिकता की हृदयस्पर्शी प्रार्थना दे सकते हैं, तो इसका मतलब है कि वे सच में उसे जानते और सत्य को धारण करते हैं, और केवल तभी वे प्रकाश में जीते हैं। केवल जब दुनिया और जीवन के बारे में एक व्यक्ति का दृष्टिकोण बदलता है, तभी उसमें आधारभूत रूपान्तरण होता है। जब किसी का कोई जीवन लक्ष्य होता है और वह सत्य के अनुसार आचरण करता है, जब वह पूरी तरह से खुद को परमेश्वर के प्रति समर्पण कर देता है और उसके वचनों के अनुसार जीता है, जब वह अपनी आत्मा में गहराई से शान्त महसूस करता है और रोशन हो उठता है, जब उसका दिल अंधकार से मुक्त होता है, और जब वह पूरी तरह से स्वतंत्र और बाधा मुक्त होकर परमेश्वर की उपस्थिति में जी पाता है, केवल तभी वह एक सच्चा मानव जीवन व्यतीत करता है और सत्य धारण करने वाला व्यक्ति बन जाता है। इसके अलावा, जो भी सत्य तुम्हारे पास हैं वह परमेश्वर के वचनों से आए हैं और स्वयं परमेश्वर से आए है। समस्त ब्रह्मांड और सभी चीज़ों का शासक—परमेश्वर जो सबसे ऊँचा है—तुम्हें वास्तविक मानव जीवन जी रहे एक वास्तविक मनुष्य के रूप में अनुमोदित करता है। परमेश्वर के अनुमोदन से अधिक सार्थक और क्या हो सकता है? सत्य धारण करने का अर्थ यही है।

— "अंत के दिनों के मसीह की बातचीत के अभिलेख" में 'मनुष्य का स्वभाव कैसे जानें' से उद्धृत

लोग प्रायः परमेश्वर को ही अपना जीवन समझने की बात करते हैं, परंतु उनका अनुभव अभी उस बिंदु तक नहीं पहुंचा है। तुम बस कह भर रहे हो कि परमेश्वर तुम्हारा जीवन है, कि वह प्रतिदिन तुम्हारा मार्गदर्शन करता है, कि तुम प्रतिदिन उसके वचन खाते और पीते हो, और तुम प्रतिदिन उससे प्रार्थना करते हो, इसलिए वह तुम्हारा जीवन बन गया है। जो ऐसा कहते हैं, उनका ज्ञान बहुत उथला है। कई लोगों में कोई नींव ही नहीं होती; परमेश्वर के वचन उनमें बोए तो गए हैं, किंतु उन्हें अभी अंकुरित होना है, उन पर फल लगना तो और भी दूर की बात है। आज, तुमने किस सीमा तक अनुभव किया है? परमेश्वर द्वारा तुम्हें यहाँ तक आने के लिए बाध्य करने के बाद ही, अब तुम्हें लगता है कि तुम परमेश्वर को नहीं छोड़ सकते। एक दिन, जब तुम्हारा अनुभव एक निश्चित बिंदु तक पहुँच गया होगा, तब यदि परमेश्वर तुम्हें छोड़कर जाने के लिए कहे, तो तुम नहीं जा पाओगे। तुम हमेशा महसूस करोगे कि तुम अपने भीतर परमेश्वर के बिना हो ही नहीं सकते; तुम पति, पत्नी या बच्चों के बिना, परिवार के बिना, माता या पिता के बिना, देह के आनंदों के बिना हो सकते हो, परंतु तुम परमेश्वर के बिना नहीं हो सकते। परमेश्वर के बिना होना अपना जीवन खो देने जैसा होगा; तुम परमेश्वर के बिना नहीं जी पाओगे। जब तुम इस बिंदु तक अनुभव कर लोगे, तो तुमने परमेश्वर में अपने विश्वास का लक्ष्य पा लिया होगा, और इस प्रकार परमेश्वर तुम्हारा जीवन बन गया होगा, वह तुम्हारे अस्तित्व का आधार बन गया होगा। तुम फिर कभी भी परमेश्वर को नहीं छोड़ पाओगे। जब तुम इस सीमा तक अनुभव कर लोगे, तब तुमने परमेश्वर के प्रेम का सचमुच आनंद ले लिया होगा, और जब परमेश्वर के साथ तुम्हारा पर्याप्त निकट संबंध होगा, तब वह तुम्हारा जीवन, तुम्हारा प्रेम होगा, और उस समय तुम परमेश्वर से प्रार्थना करोगे और कहोगे : "हे परमेश्वर! मैं तुझे नहीं छोड़ सकता, तू मेरा जीवन है, मैं अन्य हर चीज के बिना रह सकता हूँ—पर तेरे बिना मैं नहीं जी सकता।" यही लोगों की सच्ची कद-काठी है; यही वास्तविक जीवन है। कुछ लोग आज जितनी दूर आए हैं, वहाँ तक आने के लिए उन्हें बाध्य किया गया है : वे चाहें या न चाहें उन्हें चलते जाना है, और उन्हें हमेशा लगता है कि वे दो पाटों के बीच फँस गए हैं। तुम्हें ऐसा अनुभव करना चाहिए कि परमेश्वर तुम्हारा जीवन है, कि यदि परमेश्वर को तुम्हारे हृदय से दूर ले जाया जाए, तो यह जीवन खो देने जैसा होगा; परमेश्वर अवश्य ही तुम्हारा जीवन होना चाहिए, और तुम्हें उसे छोड़ने में अवश्य ही असमर्थ होना चाहिए। इस तरह, तुमने वास्तव में परमेश्वर का अनुभव कर लिया होगा, और इस समय, जब तुम परमेश्वर से प्रेम करोगे, तब तुम परमेश्वर से सचमुच प्रेम करोगे, और यह एक विलक्षण, विशुद्ध प्रेम होगा। एक दिन, जब तुम्हारे अनुभव ऐसे होंगे कि तुम्हारा जीवन एक निश्चित बिंदु पर पहुँच चुका होगा, जब तुम परमेश्वर से प्रार्थना करोगे, और परमेश्वर के वचनों को खाओगे और पीओगे, तब तुम अंदर से परमेश्वर को नहीं छोड़ पाओगे, न ही तुम उसे चाहकर भी भूल पाओगे। परमेश्वर तुम्हारा जीवन बन चुका होगा; तुम संसार को भूल सकते हो, तुम अपनी पत्नी, पति या बच्चों को भूल सकते हो, किंतु परमेश्वर को भूलने में तुम्हें कष्ट होगा—ऐसा करना असंभव होगा, यही तुम्हारा सच्चा जीवन और परमेश्वर के प्रति सच्चा प्रेम है। जब परमेश्वर के प्रति लोगों का प्रेम एक निश्चित बिंदु पर पहुँच जाता है, तब किसी भी दूसरे के प्रति उनका प्रेम परमेश्वर के प्रति उनके प्रेम के बराबर नहीं होता; परमेश्वर से उनका प्रेम सबसे पहले आता है। इस तरह तुम अन्य सब कुछ छोड़ पाते हो, और परमेश्वर से सारे व्यवहार और काट-छाँट स्वीकार करने के इच्छुक होते हो। जब तुमने परमेश्वर के प्रति ऐसा प्रेम प्राप्त कर लिया जो अन्य सबसे बढ़कर हो, तब तुम वास्तविकता में और परमेश्वर के प्रेम में जिओगे।

— "वचन देह में प्रकट होता है" में 'परमेश्वर से प्रेम करने वाले लोग सदैव उसके प्रकाश के भीतर रहेंगे' से उद्धृत

फुटनोट :

क. "अपनी कोहनी को बाहर की ओर मोड़ लेना" एक चीनी मुहावरा है, जिसका अर्थ है कि कोई किसी दूसरे व्यक्ति की मदद, उसी व्यक्ति के करीब के लोगों की, उदाहरण के लिए उसके माता-पिता, बच्चे, रिश्तेदार या भाई-बहन की, कीमत पर कर रहा है।

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अब बड़ी-बड़ी विपत्तियाँ आ रही हैं और वह दिन निकट है जब परमेश्वर भलाई का प्रतिफल देगें और बुराई को दण्ड देंगे। हमें एक सुंदर गंतव्य कैसे मिल सकता है?

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वचन देह में प्रकट होता है न्याय परमेश्वर के घर से शुरू होता है अंत के दिनों के मसीह, सर्वशक्तिमान परमेश्वर के अत्यावश्यक वचन परमेश्वर के दैनिक वचन परमेश्वर का आगमन हो चुका है, वह राजा है सर्वशक्तिमान परमेश्वर के वचनों का संकलन सत्य का अभ्यास करने के 170 सिद्धांत मेमने का अनुसरण करो और नए गीत गाओ राज्य का सुसमाचार फ़ैलाने के लिए दिशानिर्देश परमेश्वर की भेड़ें परमेश्वर की आवाज को सुनती हैं परमेश्वर की आवाज़ सुनो परमेश्वर के प्रकटन को देखो राज्य के सुसमाचार पर अत्यावश्यक प्रश्न और उत्तर मसीह के न्याय के आसन के समक्ष अनुभवों की गवाहियाँ विजेताओं की गवाहियाँ मैं वापस सर्वशक्तिमान परमेश्वर के पास कैसे गया

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