3. परमेश्वर-जन बनने के लिए सेवाकर्ताओं को कौन-सी शर्तें पूरी करनी चाहिए

परमेश्वर के प्रासंगिक वचन :

जब लोग परमेश्वर के घर में प्रवेश करते हैं और वे सत्य को नहीं समझते हैं, बल्कि उनके पास केवल विभिन्न आकांक्षाएँ होती हैं या सहयोग करने के लिए वे केवल कुछ संकल्प विकसित करते हैं, तो इस अवधि के दौरान वे जिस भूमिका को पूरा कर सकते हैं, वह केवल सेवाकर्मियों की ही हो सकती है। "सेवा देना" बेशक बहुत अच्छा लगने वाला वाक्यांश नहीं है। दूसरे शब्दों में कहें तो, इसका मतलब यह होता है कि लोग परमेश्वर की प्रबंधन योजना के कार्य के लिए सेवा और परिश्रम करें, अर्थात वे इसके लिए प्रयास करें। वे कुछ भी समझते या बूझते नहीं हैं, लेकिन उनके पास कुछ कौशल और प्रतिभाएँ होती हैं, और दूसरों की बातों से सीख सकते तथा उन्हें संप्रेषित कर सकते हैं, और सामान्य मामलों के कुछ कार्य करने में सक्षम होते हैं, लेकिन जब परमेश्वर के उद्धार के विशिष्ट कार्य और मानवता के प्रबंधन के विभिन्न पहलुओं की, साथ ही साथ सत्य से संबंधित कार्य के विभिन्न पहलुओं की, बात आती है वे कोई प्रयास नहीं कर सकते या कोई भी सहयोग नहीं दे सकते हैं; वे केवल कुछ प्रयास करते हैं और सामान्य मामलों के कुछ कार्य करते समय कुछ बातें कहते हैं, और सेवा से संबंधित कुछ परिधीय काम करते हैं। यदि लोगों के कर्तव्य का, या उनके द्वारा निभाई जाने वाली भूमिकाओं और परमेश्वर के घर में उनके द्वारा किए जाने वाले कार्यों का, यही सार है, तो उनके लिए "सेवाकर्मी" की पदवी को हटाना कठिन होगा। क्यों उनके लिए इसे हटाना कठिन होगा? क्या इसका सरोकार इस बात से नहीं है कि परमेश्वर इस उपाधि को किस तरह परिभाषित करता है? लोगों के लिए कुछ प्रयास करना और अपनी सहज क्षमताओं, प्रतिभाओं और बुद्धिमत्ता द्वारा चीज़ों को करना काफ़ी आसान होता है। लेकिन, सत्य से जीना, सत्य-वास्तविकता में प्रवेश करना, परमेश्वर की इच्छा के अनुसार कार्य करना—ये चीज़ें बहुत श्रमसाध्य होती हैं; वे समय की माँग करती हैं, अगुवाई करने के लिए उन्हें लोगों की आवश्यकता होती है, उन्हें परमेश्वर से प्रबोधन की आवश्यकता होती है, और उन्हें परमेश्वर के अनुशासन की आवश्यकता होती है। इसके अलावा, न्याय और ताड़ना के लिए उन्हें परमेश्वर के वचनों के आने की आवश्यकता होती है। इस प्रकार, इस लक्ष्य तक पहुँचने में लगने वाले समय के दौरान, अधिकांश लोग जो काम करने और प्रदान करने में सक्षम होते हैं, वे उन मुट्ठी भर चीज़ों तक सीमित होते हैं: परमेश्वर जिनसे बात करे उन पात्रों की भूमिका का निर्वहन करना; कुछ प्रतिभाएँ रखना और परमेश्वर के घर में कुछ उपयोगी होना; सामान्य मानवजाति की तरह सोचना, और जो भी कार्य तुम्हें आवंटित किया जाए, उसे समझने और कार्यान्वित करने में सक्षम होना; कुछ कौशल से लैस होना और परमेश्वर के घर में जो भी काम तुम्हें करने के लिए दिया जाए, उसे अपनी पूरी क्षमता के अनुसार पूरा करना; और, सबसे महत्वपूर्ण, सुनने और समर्पण करने की आकांक्षा रखना। परमेश्वर के घर में सेवा करते समय, और परमेश्वर के काम में कोशिश करते समय, यदि तुम्हारे पास सुनने और समर्पण करने के प्रति थोड़ा-सा भी झुकाव हो, तो तुम भाग जाने में या परेशानी खड़ी करने में असमर्थ होगे; बल्कि, तुम खुद को संयमित करने तथा कम बुरे और अधिक अच्छे कर्मों को करने की पूरी कोशिश करोगे। यह अधिकांश लोगों की स्थिति और अवस्था होती है, है ना? बेशक, तुम सभी में से, केवल बहुत अल्पसंख्यक लोगों ने वास्तव में इस स्थिति को, इस श्रेणी को पीछे छोड़ दिया है। तो उन बहुत कम लोगों के पास क्या होता है? वे सत्य को समझने लगे हैं, उनके पास सत्य-वास्तविकता है और जब कोई समस्या आती है, तो वे प्रार्थना करने और परमेश्वर की इच्छा की तलाश करने, तथा सत्य-सिद्धांतों के अनुसार कार्य करने में सक्षम होते हैं। सुनने और समर्पण करने की उनकी आकांक्षा अब ऐसा करने के लिए संकल्प मात्र तक सीमित नहीं होती है; वे पहले से ही परमेश्वर के वचनों को व्यवहार में लाने और उसकी आवश्यकताओं के अनुसार कार्य करने के लिए पहल करने में सक्षम हैं। किसी समस्या का सामना करते हुए, वे परमेश्वर के प्रति श्रद्धा रखते हैं, वे बिना सोचे-समझे न तो बोलते और न ही कार्य करते हैं, बल्कि वे सावधान और विवेकपूर्ण होते हैं। ख़ास तौर पर, जब वे इस तरह से काट-छाँट और निपटाए जाने का सामना कर रहे होते हैं जिससे वे व्यक्तिगत रूप से सहमत नहीं होते, तो भी वे परमेश्वर पर निर्णय पारित करने से बचने में सक्षम होते हैं, और उनमें प्रतिरोध उत्पन्न नहीं होता। जब परमेश्वर की पहचान, स्थिति और सार की बात आती है, तो अपने दिलों की गहराई में, वे सच्ची स्वीकृति को पनाह देते हैं। क्या इन लोगों और सेवाकर्मियों के बीच अंतर होते हैं? (हाँ)। क्या अंतर हैं? सबसे पहले, वे सत्य को समझते हैं; दूसरा, वे कुछ सच्चाइयों को व्यवहार में ला सकते हैं; तीसरा, उन्हें परमेश्वर का कुछ ज्ञान होता है; चौथा, उनका सुनना और समर्पण करना, ये अब केवल आकांक्षाएँ मात्र नहीं होते, बल्कि एक तरह के व्यक्तिपरक दृष्टिकोण में बदल गए होते हैं—अर्थात्, उन्होंने सच्चा समर्पण हासिल किया होता है; और पाँचवां—और सबसे महत्वपूर्ण, साथ ही सबसे मूल्यवान, अंतर होता है—उन्होंने परमेश्वर के लिए श्रद्धा विकसित की होती है। जिनके पास ये चीज़ें हैं उन्होंने "सेवाकर्मियों" की पदवी से पहले ही छुटकारा पा लिया है, ऐसा कहा जा सकता है। उनके प्रवेश के विभिन्न पहलुओं, साथ ही साथ सत्य के प्रति उनके दृष्टिकोण और परमेश्वर के बारे में उनके ज्ञान के विस्तार को देखते हुए, ये लोग अब केवल परमेश्वर के घर के काम के किसी एक अंश के लिए सेवा नहीं कर रहे होते हैं, बल्कि वे इस बात से ऊपर उठ गए होते हैं कि उन्हें सिर्फ कोई सरल काम करने के लिए कहा जाए। यानी कि, ये लोग केवल एक-बार का इनाम पाने के लिए नहीं आए हैं, और केवल परीक्षण के आधार पर कुछ अस्थायी काम करने के लिए वे भर्ती नहीं किए गए थे, निरीक्षण के तहत केवल यह देखने के लिए कि वे दीर्घकालिक काम कर सकते हैं या नहीं। इस प्रकार, इन लोगों ने पहले से ही "सेवा-कर्मियों" की इस पदवी, इस उपाधि को छोड़ दिया है।

— "मसीह-विरोधियों को उजागर करना" में 'वे अपना कर्तव्य केवल खुद को अलग दिखाने और अपने हितों और महत्वाकांक्षाओं को पूरा करने के लिए निभाते हैं; वे कभी परमेश्वर के घर के हितों की नहीं सोचते, और अपनी व्यक्तिगत महिमा के बदले उन हितों को बेच तक देते हैं (IX)' से उद्धृत

परमेश्वर के वचनों को, सत्य और परमेश्वर की इच्छा को समझने से पहले, और परमेश्वर के प्रति लेश मात्र भी श्रद्धा विकसित करने से पहले, प्रत्येक व्यक्ति जो भूमिका निभाता है, वह केवल सेवाकर्मी की हो सकती है, और कुछ नहीं। यानी कि, तुम एक सेवाकर्मी हो, भले तुम यह चाहो या न चाहो; तुम इस पदवी से बच नहीं सकते। कुछ लोग कहते हैं, "लेकिन मैंने आजीवन परमेश्वर पर विश्वास किया है; यीशु पर विश्वास करते हुए मुझे कई दशक हो गए हैं। क्या मैं सचमुच अभी भी सिर्फ एक सेवाकर्मी हूँ?" तुम इस प्रश्न के बारे में क्या सोचते हो? तुम किससे पूछ रहे हो? तुम्हें अपने आप से यह पूछना चाहिए: क्या तुम अब परमेश्वर की इच्छा को समझते हो? क्या तुम वर्तमान में केवल कुछ प्रयास कर रहे हो, या तुम सत्य का अभ्यास कर रहे हो? क्या तुमने सत्य की तलाश करने और उसे समझने के मार्ग पर कदम रखा है? क्या तुमने सत्य-वास्तविकता में प्रवेश किया है? क्या तुम्हारे मन में परमेश्वर के प्रति श्रद्धा है? यदि तुम्हारे पास ये गुण हैं, यदि तुम परमेश्वर के परीक्षणों का सामना करते समय दृढ़ रह सकते हो, और तुम परमेश्वर का भय मानने और बुराई से दूर रहने में सक्षम हो, तो निश्चित रूप से तुम अब एक सेवाकर्मी नहीं हो। बहरहाल, यदि तुम्हारे पास ये गुण नहीं हैं, तो तुम निस्संदेह अभी भी एक सेवाकर्मी ही हो। यह टाला नहीं जा सकता, और यह अपरिहार्य भी है। कुछ लोग कहते हैं, "मैं तीस वर्षों से अधिक समय से परमेश्वर में विश्वास करता रहा हूँ; मैं उस पल से उसके अनुयायियों में से एक बन गया जब वह देहधारी बनकर कार्य करने आया था और उसने पहला ही वचन बोला था। मैं परमेश्वर के कार्य का अनुभव करने वाले सबसे पहले लोगों में से एक था, और व्यक्तिगत रूप से परमेश्वर को उसके वचनों को बोलते हुए सुनने वाले पहले लोगों में से एक था। इन सभी वर्षों के बाद, मैं अभी भी परमेश्वर का अनुसरण कर रहा हूँ और परमेश्वर में विश्वास कर रहा हूँ। मेरे द्वारा सहे गए सभी उत्पीड़न के माध्यम से, कई बार मेरे गिरफ़्तार होने और मेरे द्वारा अनुभव किए गए सभी ख़तरों के माध्यम से, परमेश्वर ने हमेशा मेरी रक्षा और मेरी रहनुमाई की है। उसने मुझे कभी नहीं त्यागा। मैं अब भी अपना कर्तव्य निभा रहा हूँ, और मेरी स्थिति बेहतर और बेहतर होती जा रही है, मेरा विश्वास बढ़ता जा रहा है, और जब परमेश्वर की बात आती है, तो मुझे ज़रा भी संदेह नहीं होता है। तो क्या मैं, वास्तव में, अभी भी एक सेवाकर्मी ही हूँ?" तुम किससे पूछ रहे हो? क्या तुम्हें नहीं लगता कि तुम ग़लत व्यक्ति से पूछ रहे हो? यह तुम्हारे लिए एक पूछने योग्य सवाल नहीं है। यह देखते हुए कि तुम इतने सालों से एक विश्वासी रहे हो, तुम्हें अब इस बात का स्पष्ट अंदाजा होना चाहिए कि वास्तव में तुम क्या हो। चूँकि तुम इतने सालों से विश्वास करते आए हो, तुम यह कैसे नहीं जान सकते कि तुम अभी भी एक सेवाकर्मी हो या नहीं? तुम यह क्यों नहीं पूछते कि तुम्हारे पास सत्य-वास्तविकता है या नहीं? क्या तुमने परमेश्वर के प्रति श्रद्धा को जगाया है? क्या तुमने बुराई से दूर रहने का कोई प्रमाण दिखाया है? परमेश्वर ने इतने सालों से कार्य किया है और इतने सारे वचनों को कहा है; तुमने कितने हासिल किए हैं? तुमने कितना प्रवेश किया है? तुमने परमेश्वर की काट-छाँट और निपटने को और उसके द्वारा दिए गए परीक्षणों और शोधन को कितना स्वीकार किया है? इन बातों को स्वीकार करते समय, क्या तुमने गवाही दी है? क्या तुम परमेश्वर की गवाही दे सकते हो? यदि तुम्हें उन परीक्षणों का सामना करना पड़े जिनसे अय्यूब को गुज़रना पड़ा था, तो क्या तुम परमेश्वर को नकार दोगे? आखिर परमेश्वर में तुम्हारी कितनी आस्था है? क्या तुम्हारी वो आस्था केवल विश्वास करने की बात है, या क्या यह सच्ची आस्था है? खुद से ये सवाल पूछो। यदि तुम इन सवालों के जवाब तक नहीं जानते हो, तो तुम उलझे हुए हो। मुझे लगता है कि तुम केवल वो हो जो दूसरों के वचनों और कार्यों की नकल करता है, और जो सेवाकर्मी कहलाने के लायक भी नहीं होता।

— "मसीह-विरोधियों को उजागर करना" में 'वे अपना कर्तव्य केवल खुद को अलग दिखाने और अपने हितों और महत्वाकांक्षाओं को पूरा करने के लिए निभाते हैं; वे कभी परमेश्वर के घर के हितों की नहीं सोचते, और अपनी व्यक्तिगत महिमा के बदले उन हितों को बेच तक देते हैं (IX)' से उद्धृत

स्वभाव में परिवर्तन, परमेश्वर की आवश्यकताओं या सत्य-सिद्धांतों को किसी भी तरह से छुए बिना कुछ करना : यह सेवा करना है। तुम लोग इस समय किस अवस्था में हो? ज्यादातर समय तुम सेवा करते हो; कभी-कभी, थोड़ी-बहुत अपने कर्तव्य को निभाने की वास्तविकता भी होती है—लेकिन ऐसा कम ही होता है। सत्य का अनुसरण करने का अर्थ है इस समस्या का समाधान करना; इसका अर्थ यह है कि इसे ऐसा बनाने का प्रयास करना कि कर्तव्य का निर्वहन करना अधिक से अधिक पूर्ण का हिस्सा बन जाए, और सेवा करना एक निरंतर घटता हुआ हिस्सा हो जाए, इसे ऐसा बनाना कि सेवा करने के लिए समर्पित हिस्सा धीरे-धीरे पूरी तरह कर्तव्य निर्वहन के प्रति समर्पित हो जाए। तो सेवा करने और कर्तव्य निभाने में क्या अंतर है? सेवा-कर्म का अर्थ है कि तुम वह करो जो भी तुम करना चाहते हो, कम से कम, बशर्ते कि तुम जो करते हो उससे परमेश्वर के स्वभाव का अपमान न हो। जब तक कोई भी तुम्हारे कार्यों की जाँच-पड़ताल न करे और जब तक जो तुम करते हो वह ग्रहण करने योग्य है, तो यह काफी है। स्वभाव के बदलाव, सत्य-सिद्धांतों के अनुसार काम करने, परमेश्वर की इच्छा संतुष्ट करने, और यहाँ तक कि कैसे परमेश्वर के आयोजनों और व्यवस्थाओं के प्रति समर्पण करना है या अपने कर्तव्य का कैसे अच्छे ढंग से निर्वाह करना है और उसका लेखा-जोखा कैसे परमेश्वर को देना है, इसके साथ तुम कोई मतलब नहीं रखते हो। तुम इनमें से किसी भी चीज़ पर ध्यान नहीं देते हो और इसे ही क्या सेवा-कर्म कहा जाता है। सेवा-कर्म का अर्थ है जो भी कुछ तुम्हारे पास है, उसके साथ अत्यधिक प्रयास करना और सुबह से रात तक इस तरह काम करना मानो तुम गुलाम थे। अगर तुम ऐसे व्यक्ति से पूछोगे कि, "इतने वर्षों के पीड़ादायक, कठिन परिश्रम जिसमें तुमने स्वयं को डुबोए रखा, यह सब किसके लिए था?" तब वह कहेगा, "क्यों, ताकि मैं आशीष प्राप्त कर सकूं।" अगर तुम उससे पूछोगे कि परमेश्वर में उसके इतने वर्षों तक विश्वास करने के परिणामस्वरूप उसके स्वभाव में कुछ बदलाव आया है, क्या परमेश्वर के अस्तित्व को लेकर वह निश्चित हो गया है, क्या उसके पास सृष्टिकर्ता के आयोजनों और व्यवस्थाओं की वास्तविक समझ या अनुभव का कुछ अंश है, तो इन सबका उत्तर स्पष्ट रूप से "ना" होगा और वह इनमें से किसी भी चीज़ के बारे में बोल नहीं पाएगा। जब स्वभाव में बदलावों से संबंधित किसी भी सूचक में कोई सुधार या प्रगति नहीं होती है, ऐसा व्यक्ति केवल लगातार सेवा प्रदान करता है। अगर एक व्यक्ति अनेक वर्षों तक सेवा करता है, और इसे जाने बिना, यह समझ लेता है कि वह एक भ्रष्ट स्वभाव धारण करता है, कि वह अकसर परमेश्वर के विरुद्ध विद्रोह करता है, कि वह अकसर शिकायतें करता है, कि वह अकसर परमेश्वर की आज्ञा का पालन करने में असमर्थ है, कि वह अत्यधिक भ्रष्ट है, कि परमेश्वर की बात पर ध्यान दिए बगैर कि वह कैसे उसे उसके सामने समर्पण करने के लिए कहता है, वह ऐसा करने में असमर्थ है। वह स्वयं को संयमित करने का प्रयास करता है पर बात नहीं बनती, और न ही स्वयं को कोसने या शपथ लेने से बात बनती है। अंत में, उसे पता चलता हैः "वास्तव में मनुष्य एक भ्रष्ट स्वभाव धारण करता है और इसीलिए वह परमेश्वर के विरुद्ध विद्रोह करने में सक्षम है। जब भी कुछ होता है, लोगों के पास अपनी स्वयं की इच्छाएं होती हैं और वे हमेशा परमेश्वर के आयोजनों और व्यवस्थाओं का अन्वेषण कर रहे होते हैं। हालाँकि वे अत्यधिक प्रयास करने को तैयार होते हैं, लेकिन जैसे ही कुछ उनके स्वभाव और उनकी अनियंत्रित महत्वाकांक्षाओं और इच्छाओं, इरादों और कामनाओं में उन्हें फँसाता है, वे उन्हें त्यागने या छोड़ पाने में असमर्थ हो जाते हैं। वे हमेशा उस तरीके से चीज़ें करना चाहते हैं, जो उन्हें संतुष्ट करती हैं। यह मैं हूँ और मुझे वास्तव में संभालना कठिन है! क्या किया जा सकता है?" अगर उन्होंने इन बातों पर विचार करना शुरू कर दिया है, तो उनके पास मानव तरीकों की कुछ थोड़ी समझ पहले से ही है। वे लोग जो सेवा-कर्म में संलग्न हैं अगर किसी समय पर असली कार्य करना शुरू कर देते हैं, वे स्वभाव के बदलावों पर अपना ध्यान केंद्रित कर पाते हैं, यह समझ प्राप्त कर पाते हैं कि असल में उनका भी भ्रष्ट स्वभाव है, कि वे भी घमंडी हैं और परमेश्वर को समर्पण करने में अक्षम हैं और यह कि इस तरीके से काम नहीं चलेगा; जब समय आएगा कि वे इन चीज़ों के बारे में सोच पाएंगे, तब वे अपने में सुधार करना शुरू कर चुके होंगे और एक उम्मीद है कि हो सकता है उनका स्वभाव बदल जाए और यह कि हो सकता है उनका उद्धार हो जाए। मान लें कि कोई व्यक्ति इन सब चीज़ों के बारे में कभी भी नहीं सोचता और यह सोचकर कि उनके हाथ में जो काम है उसे समाप्त करना ही परमेश्वर के आदेश को पूरा करने के लिए आवश्यक है और इसलिए वे यही जानते हैं कि किस तरह श्रम करना है और यह कि एक बार उन्होंने अत्यधिक प्रयास कर लिया तो वे अपने कर्तव्य का निर्वाह उचित ढंग से कर चुके होंगे, इस बारे में वे कभी नहीं सोचते कि परमेश्वर की अपेक्षाएँ क्या हैं, कि सत्य क्या है या क्या उनकी गिनती ऐसे लोगों में होगी, जो परमेश्वर की आज्ञा मानते हैं—वे कभी भी इन चीज़ों के बारे में विचार नहीं करते। क्या कोई व्यक्ति जो अपने कर्तव्य की पूर्ति इस तरीके से करता है, उद्धार पा सकता है? उत्तर है नहीं। उन्होंने उद्धार के मार्ग पर चलना शुरू नहीं किया है या परमेश्वर पर विश्वास करने के सही मार्ग पर नहीं हैं, न ही उन्होंने परमेश्वर के साथ सामान्य संबंध स्थापित किए हैं और फिर भी वे अत्यधिक प्रयास करते हैं और परमेश्वर के घर में सेवा-कर्म में संलग्न रहते हैं। इस तरह का व्यक्ति परमेश्वर के घर में सेवा करता है और परमेश्वर उनकी देखभाल और उनकी रक्षा करता है, लेकिन वह उन्हें बचाने की योजना नहीं बनाता है, न ही वह उनसे निपटता है और उनकी काट-छाँट करता है, न ही उनका न्याय और उन्हें ताड़ना देता है, न ही उनका परीक्षण या शोधन करता है; वह केवल उन्हें इस जीवनकाल में आशीषों को कुछ हद तक प्राप्त करने की अनुमति देता है और इससे ज़्यादा कुछ नहीं। अगर ऐसा समय आएगा, जब ये लोग जान जाएंगे कि इन चीज़ों पर विचार करना चाहिए और जो उपदेश वे सुनते हैं उन्हें समझ लेते हैं, तो उन्हें अहसास होगाः "तो, यही सब है परमेश्वर पर विश्वास करने का मतलब। फिर तो मुझे अवश्य ही उद्धार पाने की इच्छा करनी चाहिए। अगर मैं ऐसा नहीं करता हूँ और इसके बजाय सेवा प्रदान करना ही स्वीकार करता हूँ, तो उसका परमेश्वर पर विश्वास करने से कोई लेना-देना नहीं होगा।" फिर वे विचार करते हैं: "भ्रष्ट स्वभाव के कौन-से पहलू मैं धारण करता हूँ? वास्तव में यह क्या चीज़ है, यह भ्रष्ट स्वभाव? चाहे जो हो, सबसे पहले मुझे परमेश्वर के प्रति समर्पण करना चाहिए!" ये चीज़ें सत्य से और स्वभाव के बदलावों से संबंधित हैं और उनके लिए एक उम्मीद है।

— "अंत के दिनों के मसीह की बातचीत के अभिलेख" में 'केवल सत्य के सिद्धांतों की खोज करके ही अपना कर्तव्य अच्छी तरह निभाया जा सकता है' से उद्धृत

यदि तुम एक निष्ठावान सेवाकर्ता बन सकते हो, बिल्कुल अंत तक सेवा करने में सक्षम हो, और परमेश्वर द्वारा तुम्हें दिए सौंपे आदेश को पूर्ण कर सकते हो, तो तुम एक मूल्यों वाला जीवन जियोगे। यदि तुम इसे कर सकते हो, तो तुम शेष रह पाओगे। यदि तुम थोड़ा अधिक प्रयास करते हो, यदि तुम थोड़ा अधिक परिश्रम से प्रयास करते हो, परमेश्वर को जानने के अपने प्रयासों को दोगुना कर पाते हो, परमेश्वर को जानने को लेकर थोड़ा भी बोल पाते हो, उसकी गवाही दे सकते हो, और इसके अतिरिक्त, यदि तुम परमेश्वर की इच्छा में से कुछ समझ सकते हो, परमेश्वर के कार्य में सहयोग कर सकते हो, और परमेश्वर के इरादों के प्रति कुछ-कुछ सचेत हो सकते हो, तब एक सेवाकर्ता के तौर पर तुम अपने भाग्य में बदलाव महसूस करोगे। और भाग्य में यह परिवर्तन क्या होगा? अब तुम शेष नहीं रह पाओगे। तुम्हारे आचरण और तुम्हारी व्यक्तिगत आकांक्षाओं और खोज के आधार पर, परमेश्वर तुम्हें चुने हुओं में से एक बनाएगा। यह तुम्हारे भाग्य में परिवर्तन होगा। सेवाकर्ताओं के लिए इसमें सर्वोत्तम बात क्या है? वह यह है कि वे परमेश्वर के चुने हुए लोगों में से एक बन सकते हैं। यदि वे परमेश्वर के चुने हुए लोगों में से एक बन जाते हैं तो इसका अर्थ है कि उनका अब अविश्वासियों के समान पशु के रूप में पुनर्जन्म नहीं होगा। क्या यह अच्छा है? हाँ, है, और यह भी एक अच्छा समाचार है: इसका अर्थ है कि सेवाकर्ताओं को ढाला जा सकता है। ऐसी बात नहीं है कि सेवा करने वाले के लिए, जब परमेश्वर उसे सेवा के लिए पूर्वनिर्धारित करता है, तो वह हमेशा ऐसा ही करेगा; ऐसा होना आवश्यक नहीं है। परमेश्वर उसे उसके व्यक्तिगत आचरण के आधार पर सबसे उपयुक्त तरीके से संभालेगा और उसे उत्तर देगा।

— "वचन देह में प्रकट होता है" में 'स्वयं परमेश्वर, जो अद्वितीय है X' से उद्धृत

जब परमेश्वर का कार्य समाप्त हो जाता है, अगर किसी व्यक्ति ने "सेवाकर्मी" की उपाधि से छुटकारा पा लिया है, इस पदवी को त्याग दिया है, और इस अवस्था को उसने पीछे छोड़ दिया है, तो यह उत्सव का कारण है, है ना? इसका क्या मतलब है? इसका अर्थ है कि यह व्यक्ति, परमेश्वर की दृष्टि में, एक आम आदमी या अविश्वासी नहीं है; वह अब परमेश्वर के घर और राज्य का सदस्य है। परमेश्वर के घर और राज्य का सदस्य—यह उपाधि कहाँ से आती है? लोग इसे कैसे प्राप्त करते हैं? यह एक क़ीमत चुकाने से, और सत्य को समझने के माध्यम से, आती है, तुमने सत्य का अनुसरण किया है और तुम अपने स्वभाव में परिवर्तन के एक निश्चित स्तर पर आ गए हो; अब तुम परमेश्वर को समर्पित हो सकते हो और उसका आदर कर सकते हो, और तुम उसके घर के सदस्य बन गए हो। अय्यूब और पतरस की तरह, तुम्हें अब शैतान के उत्पीड़न और भ्रष्टाचार से और नहीं गुज़रना पड़ेगा। तुम परमेश्वर के घर और उसके राज्य में स्वतंत्र रूप से रहने में सक्षम हो, और तुम्हें अब भ्रष्ट स्वभाव से लड़ने की ज़रूरत नहीं है; तुम परमेश्वर की दृष्टि में, सृष्टि की एक सच्ची वस्तु और एक वास्तविक इंसान हो। इसका अर्थ है कि शैतान द्वारा भ्रष्ट किए गए व्यक्ति के कष्ट के दिन अब पूरी तरह से समाप्त हो गए हैं; अब शांति, आनंद और खुशी का समय है, जिसमें एक व्यक्ति सृष्टिकर्ता के अनुग्रह के प्रकाश में और परमेश्वर के साथ रह सकता है। यह जश्न मनाने की बात है, है ना? (हाँ)। बहरहाल, अंत में, उन अन्य लोगों ने अभी भी "सेवाकर्मी" की पदवी का त्याग नहीं किया है और उस क्षण में जब परमेश्वर का काम समाप्त हो जाए, उन्होंने अभी भी "सेवाकर्मी" की पदवी से—उस "ख्याति के ताज" से, जिसे वे अपने सिर पर पहनते हैं, खुद को मुक्त नहीं किया है। इसका क्या मतलब है? इसका मतलब है कि वे आम आदमी बने रहेंगे; इसका मतलब है कि परमेश्वर की नज़रों में, वे अभी भी अविश्वासी होंगे। इसका मतलब ये दो चीज़ें क्यों है? इसका कारण इस तथ्य में निहित है कि वे लोग सत्य का अभ्यास नहीं करते हैं, उन्होंने स्वभाव में बदलाव को हासिल नहीं किया है, और वे परमेश्वर के प्रति समर्पण नहीं कर सकते हैं, उसके लिए श्रद्धा रखने की बात तो छोड़ ही दो; नतीजतन, परमेश्वर के घर और राज्य में उनकी कोई भूमिका नहीं होगी। वहाँ कोई हिस्सा नहीं होने से, वे कहाँ रहेंगे? वे परमेश्वर के राज्य के बाहर रहेंगे। ऐसे लोगों को अभी भी "सेवाकर्मी" कहा जाएगा, जिसका अर्थ है कि परमेश्वर उनको अनुयायी के रूप में नहीं देखेगा और वे उसके घर के सदस्य नहीं बने हैं। इसका अर्थ यह भी है कि वे कभी परमेश्वर के अनुयायी नहीं बन सकते, और वह उन्हें नहीं पहचानता है; वे फिर कभी उसका आशीर्वाद या उसकी कृपा प्राप्त नहीं कर सकते। बेशक, इसका मतलब यह भी है कि उनके पास कभी भी परमेश्वर के राज्य के अच्छे आशीर्वादों को अपने लिए साझा करने या शांति और आनंद को पाने का मौका नहीं होगा। ऐसे अवसर चले जाएँगे। तो, क्या उनके लिए, यह एक खुशी मनाने का क्षण होगा, या एक दुखद क्षण? यह दुखद होगा। जहाँ तक प्रश्न यह है कि परमेश्वर के घर और राज्य के बाहर "सेवाकर्मी" पदवी के कारण उनके साथ कैसा व्यवहार किया जाएगा, यह बात बाद में होगी, और हम इसके बारे में अभी बात नहीं करेंगे। संक्षेप में, उनके साथ जिस तरह से व्यवहार किया जाएगा, वह परमेश्वर के राज्य के लोगों के साथ किए गए व्यवहार से बहुत भिन्न होगा—यह उनकी स्थिति और उनके प्रति व्यवहार के संदर्भ में, और अन्य सभी पहलुओं में, भिन्न होगा। क्या यह तथ्य कि परमेश्वर ने जिस समय कार्य किया और जब वह मानवजाति के लिए उद्धार लेकर आया, उस दौरान इन लोगों ने सत्य को प्राप्त नहीं किया या स्वभाव में परिवर्तन हासिल नहीं किया, उन्हें दयनीय नहीं बनाता है? वे बहुत दयनीय हैं! ये कुछ बातें हैं जो "सेवाकर्मियों" की पदवी के बारे में कही गईं। कुछ लोगों ने कहा है, "जैसे ही तुम 'सेवाकर्मी' शब्द का उल्लेख करते हो, मैं प्रतिरोध महसूस करता हूँ; मेरे पास केवल यही रवैया है। यदि तुम मुझे सेवाकर्मी बनाते हो, तो मैं तैयार नहीं होऊँगा और मुझे खुशी नहीं होगी। यदि तुम कहते हो कि मैं सेवाकर्मी नहीं हूँ, और यदि तुम इसके बजाय मुझे परमेश्वर की प्रजा में से एक मान लेते हो, तो अगर मैं उनमें सबसे छोटा भी रहूँ, तो यह अच्छा होगा। जब तक तुम मुझे सेवाकर्मी नहीं कहते हो, तब तक मैं ठीक रहूँगा। मेरे पूरे जीवन के दौरान, यह मेरी एकमात्र तलाश रही है, और मेरा एकमात्र आदर्श; मुझे एक ही बात की प्रतीक्षा है, 'सेवाकर्मी' की पदवी से छुटकारा पा लेना। यह माँग कोई ज़्यादा नहीं है।" तुम इस तरह के लोगों के बारे में क्या सोचते हो? क्या यह सच्चाई की तलाश करने वाले व्यक्ति का रवैया है? (नहीं)। यह किस तरह का रवैया है? यह एक नकारात्मक रवैया है, है ना? (हाँ)। तुम्हें "सेवाकर्मी" की पदवी से खुद को छुटकारा दिलाने के लिए कठिन प्रयास करने की आवश्यकता नहीं है, क्योंकि यह तुम्हें उस हद के आधार पर दिया गया था जिस हद तक तुमने जीवन में प्रगति की है। तुम जो चाहते हो उसके आधार पर अपने लिए इसे तय नहीं कर सकते हो; यह इस बात पर निर्भर नहीं करता है कि कोई व्यक्ति क्या चाहता है, बल्कि इस बात पर कि एक व्यक्ति किस मार्ग पर है और उस व्यक्ति ने अपने स्वभाव में परिवर्तन हासिल किया है या नहीं। यदि तुम्हारा लक्ष्य केवल "सेवाकर्मी" की पदवी से खुद को छुड़ाने का प्रयास करना है, तो तुम्हें इससे कभी छुटकारा नहीं मिलेगा। मैं तुम्हें सच बताऊँगा: तुम्हारे शेष जीवन तक यह तुम्हारे पास रहेगा। यदि तुम इसके बजाय, सत्य का अनुसरण करने पर ध्यान केंद्रित करते हो और स्वभाव में परिवर्तन प्राप्त कर सकते हो, तो यह पदवी धीरे-धीरे गायब हो जाएगी। इस प्रकार, इसे इन दो बातों के प्रकाश में देखते हुए, क्या परमेश्वर ने लोगों पर "सेवाकर्मी" की यह पदवी जबरन लागू की थी? बिल्कुल नहीं! यह एक ऐसी उपाधि नहीं है जिसे परमेश्वर ने मानवता पर थोपी हो, न ही यह एक संकेत-लिपि या संबोधन का एक पद या कोई ओहदा है। यह जिस हद तक लोगों ने अपने जीवन-विकास की प्रक्रिया के दौरान जीवन में प्रगति की है, उस पर आधारित है। तुम्हारा जीवन जितना आगे बढ़ा है, और तुम्हारा स्वभाव जितना बदल गया है, उतना ही तुमने "सेवाकर्मी" का ख़िताब त्याग दिया है। यदि, एक दिन, तुम उस बिंदु तक पहुँच जाते हो जहाँ तुम परमेश्वर में श्रद्धा रख सको, और उसके प्रति समर्पण कर सको, तो तुम इस उपाधि को, चाहो तो भी, धारण नहीं करोगे। यह एक व्यक्ति की तलाश, सत्य के प्रति उसके दृष्टिकोण, और जिस मार्ग पर वह है, उस पर निर्भर करता है।

— "मसीह-विरोधियों को उजागर करना" में 'वे अपना कर्तव्य केवल खुद को अलग दिखाने और अपने हितों और महत्वाकांक्षाओं को पूरा करने के लिए निभाते हैं; वे कभी परमेश्वर के घर के हितों की नहीं सोचते, और अपनी व्यक्तिगत महिमा के बदले उन हितों को बेच तक देते हैं (IX)' से उद्धृत

पिछला: 2. सब-कुछ छोड़ देने वाले और परमेश्वर के लिए खपने वाले कुछ लोग सेवाकर्ता क्यों बन जाते हैं

अगला: 4. जीवन पा लेना क्या है और जीवन का न होना क्या है

अब बड़ी-बड़ी विपत्तियाँ आ रही हैं और वह दिन निकट है जब परमेश्वर भलाई का प्रतिफल देगें और बुराई को दण्ड देंगे। हमें एक सुंदर गंतव्य कैसे मिल सकता है?

संबंधित सामग्री

2. यह क्यों कहा जाता है कि भ्रष्ट मानवजाति को देहधारी परमेश्वर के उद्धार की अधिक आवश्यकता है

परमेश्वर के प्रासंगिक वचन :परमेश्वर द्वारा मनुष्य को सीधे पवित्रात्मा की पद्धति और पवित्रात्मा की पहचान का उपयोग करके नहीं बचाया जाता,...

5. यह क्यों कहा जाता है कि परमेश्वर के दो देहधारण, देहधारण का अर्थ पूरा करते हैं

परमेश्वर के प्रासंगिक वचन :प्रथम देहधारण मनुष्य को पाप से छुटकारा देने के लिए था, उसे यीशु की देह के माध्यम से छुटकारा देने के लिए था,...

2. स्वर्गारोहण वास्तव में क्या है, और व्यक्ति को परमेश्वर के सिंहासन के सामने कैसे उठाया जा सकता है

परमेश्वर के प्रासंगिक वचन :फ़िलाडेल्फ़िया की कलीसिया ने अपना आकार ले लिया है, और यह पूरी तरह से परमेश्वर के अनुग्रह और दया के कारण हुआ है।...

वचन देह में प्रकट होता है न्याय परमेश्वर के घर से शुरू होता है अंत के दिनों के मसीह, सर्वशक्तिमान परमेश्वर के अत्यावश्यक वचन परमेश्वर के दैनिक वचन परमेश्वर का आगमन हो चुका है, वह राजा है सर्वशक्तिमान परमेश्वर के वचनों का संकलन सत्य का अभ्यास करने के 170 सिद्धांत मेमने का अनुसरण करो और नए गीत गाओ राज्य का सुसमाचार फ़ैलाने के लिए दिशानिर्देश परमेश्वर की भेड़ें परमेश्वर की आवाज को सुनती हैं परमेश्वर की आवाज़ सुनो परमेश्वर के प्रकटन को देखो राज्य के सुसमाचार पर अत्यावश्यक प्रश्न और उत्तर मसीह के न्याय के आसन के समक्ष अनुभवों की गवाहियाँ विजेताओं की गवाहियाँ मैं वापस सर्वशक्तिमान परमेश्वर के पास कैसे गया

सेटिंग्स

  • इबारत
  • कथ्य

ठोस रंग

कथ्य

फ़ॉन्ट

फ़ॉन्ट आकार

लाइन स्पेस

लाइन स्पेस

पृष्ठ की चौड़ाई

विषय-वस्तु

खोज

  • यह पाठ चुनें
  • यह किताब चुनें