2. सब-कुछ छोड़ देने वाले और परमेश्वर के लिए खपने वाले कुछ लोग सेवाकर्ता क्यों बन जाते हैं

परमेश्वर के प्रासंगिक वचन :

कुछ लोगों के लिए, भले ही वे अपने कर्तव्यों का पालन करते समय किसी भी समस्या का सामना क्यों न करें, वे सत्य की तलाश नहीं करते हैं और हमेशा अपने विचारों, अपनी अवधारणाओं, कल्पनाओं और इच्छाओं के अनुसार कार्य करते हैं। वे निरंतर अपनी स्वार्थी इच्छाओं को संतुष्ट करते हैं और उनके भ्रष्ट स्वभाव हमेशा उनके कार्यों पर नियंत्रण करते हैं। भले ही वे उन्हें सौंपे गए कर्तव्य को पूरा कर दें, फिर भी वे किसी सत्य को प्राप्त नहीं करते हैं। तो ऐसे लोग अपने कर्तव्य को करते समय किस पर निर्भर करते हैं? ऐसे व्यक्ति न तो सत्य पर निर्भर करते हैं, न ही परमेश्वर पर। जिस थोड़े से सत्य को वे समझते हैं, उसने उनके हृदयों में संप्रभुत्व हासिल नहीं किया है; वे इन कर्तव्यों को पूरा करने के लिए अपनी स्वयं की योग्यताओं और क्षमताओं पर, उस ज्ञान पर जो उन्होंने प्राप्त किया है और अपनी प्रतिभा पर, और साथ ही अपनी इच्छाशक्ति पर या नेक इरादों पर भरोसा कर रहे हैं। क्या यह अपना कर्तव्य अच्छे से निभाना है? क्या यह अपना कर्तव्य संतोषजनक ढंग से निभाना है? यद्यपि कभी-कभी तू अपने कर्तव्य को निभाने के लिए अपनी स्वाभाविकता, कल्पना, अवधारणाओं, ज्ञान और शिक्षा पर भरोसा करे, तेरे द्वारा की जाने वाली कुछ चीज़ों में सिद्धांत का कोई मुद्दा नहीं उभरता है। सतह पर ऐसा लगता है जैसे कि तूने गलत मार्ग नहीं अपनाया है, लेकिन एक ऐसी चीज़ है जिसे नजरअंदाज नहीं किया जा सकता है: अपने कर्तव्य को निभाने की प्रक्रिया के दौरान, यदि तेरी अवधारणाएँ, कल्पनाएँ और व्यक्तिगत इच्छाएँ कभी नहीं बदलती हैं और कभी भी सत्य के साथ प्रतिस्थापित नहीं की जाती हैं, यदि तेरे कार्य और कर्म कभी भी सत्य के सिद्धांतों के अनुसार नहीं किए जाते हैं, तो अंतिम परिणाम क्या होगा? तू एक सेवा करने वाला बन जाएगा। और ठीक यही बाइबल में लिखा है: "उस दिन बहुत से लोग मुझ से कहेंगे, 'हे प्रभु, हे प्रभु, क्या हम ने तेरे नाम से भविष्यद्वाणी नहीं की, और तेरे नाम से दुष्‍टात्माओं को नहीं निकाला, और तेरे नाम से बहुत से आश्‍चर्यकर्म नहीं किए?' तब मैं उनसे खुलकर कह दूँगा, 'मैं ने तुम को कभी नहीं जाना। हे कुकर्म करनेवालो, मेरे पास से चले जाओ'" (मत्ती 7:22-23)। परमेश्वर अपने प्रयास लगाने वालों और सेवा प्रदान करने वालों को "अधर्म करने वाले" क्यों कहता है? एक बात पर हम निश्चित हो सकते हैं, और वह यह कि ये लोग चाहे कोई भी कर्तव्य निभाएँ या कोई भी काम करें, इन लोगों की अभिप्रेरणाएँ, बल, इरादे और विचार पूरी तरह से उनकी स्वार्थपूर्ण इच्छाओं से पैदा होते हैं, पूरी तरह से उनके अपने विचारों और व्यक्तिगत हितों पर आधारित होते हैं, और उनके विचार और योजनाएँ पूरी तरह से उनकी शोहरत, रुतबे, अहंकार और भविष्य की संभावनाओं के चारों ओर घूमती हैं। उनके अंतरतम में, कोई सत्य नहीं होता, न ही वे सत्य के सिद्धांतों के अनुसार कार्य करते हैं। इस प्रकार, अब तुम लोगों के लिए क्या खोजना अतिमहत्वपूर्ण है? (हम लोगों को सत्य की खोज करनी चाहिए और परमेश्वर की इच्छा और अपेक्षाओं के अनुसार अपना कर्तव्य निभाना चाहिए।) परमेश्वर की अपेक्षाओं के अनुसार अपना कर्तव्य निभाते समय तुम्हें विशेष रूप से क्या करना चाहिए? कोई काम करते समय तुम्हारे अंदर जो इरादे और विचार होते हैं, उनके संबंध में तुम्हें यह भेद करना ज़रूर सीखना चाहिए कि वे सत्य के अनुरूप हैं या नहीं, साथ ही तुम्हारे इरादे और विचार तुम्हारी अपनी स्वार्थपूर्ण इच्छाओं की पूर्ति के लिए हैं या परमेश्वर के परिवार के हितों के लिए। अगर तुम्हारे इरादे और विचार सत्य के अनुरूप हैं, तो तुम अपनी सोच के अनुसार अपना कर्तव्य निभा सकते हो; लेकिन अगर वे सत्य के अनुरूप नहीं हैं, तो तुम्हें तुरंत पलटकर उस मार्ग का त्याग कर देना चाहिए। वह मार्ग सही नहीं है और तुम उस तरह से अभ्यास नहीं कर सकते; अगर तुम उस रास्ते पर चलते रहे, तो तुम अंत में दुष्टता कर बैठोगे।

— "अंत के दिनों के मसीह की बातचीत के अभिलेख" में 'अपने कर्तव्यों में परमेश्वर के वचनों का अनुभव कैसे करें' से उद्धृत

लोग चाहे जो भी प्रतिभा, योग्यता, या कौशल धारण करते हों, यदि वे केवल चीज़ों को करते हैं और अपने कर्तव्य का पालन करने में ही अपनी ताक़त का उपयोग करते हैं; यदि वे चाहे जो कुछ भी करें, उसमें वे अपनी कल्पनाओं, अवधारणाओं या अपने सहज ज्ञान पर भरोसा करते हैं; यदि वे केवल अपनी ताक़त लगाते हैं, और कभी भी परमेश्वर की इच्छा की तलाश नहीं करते हैं, और उनके मन में कोई धारणा या आवश्यकता नहीं होती है, तो कहते हैं कि, "मुझे सत्य को व्यवहार में अवश्य लाना चाहिए। मैं अपना कर्तव्य कर रहा हूँ"; उनके विचार केवल अपने कार्य को अच्छी तरह से करने और अपने कार्य को पूरा करने से शुरू होते हैं, तो वे ऐसे लोग हैं जो पूरी तरह से अपनी योग्यता, प्रतिभा, क्षमता और कौशल के अनुसार जीते हैं? क्या इस तरह के बहुत से लोग हैं? विश्वास में, वे केवल स्वयं को परिश्रम में लगाने, अपने स्वयं के श्रम को बेचने, और अपने स्वयं के कौशलों को बेचने के बारे में सोचते हैं। विशेष रूप से जब परमेश्वर का घर उन्हें सामान्य कार्य करने के लिए देता है तब ज्यादातर लोग इस दृष्टिकोण से चीज़ों को करते हैं। वे बस खुद का बल लगाते हैं। कभी इसका अर्थ होता है अपने मुँह का उपयोग करना, कभी अपने हाथों का और शारीरिक शक्ति का उपयोग करना, और कभी इसका अर्थ दौड़-भाग करना होता है। ऐसा क्यों कहा जाता है कि उन चीज़ों के अनुसार जीना अपनी ताक़त का उपयोग करना है, न कि सत्य को अभ्यास में लाना? किसी को परमेश्वर के घर द्वारा कोई कार्य दिया जाता है, और इसे प्राप्त करने पर, वह केवल यह सोचता है कि इस कार्य को कैसे यथाशीघ्र पूरा किया जाए ताकि वह कलीसिया के अगुवाओं को विवरण दे सके और उनकी प्रशंसा प्राप्त कर सके। ऐसे लोग एक कदम-दर-कदम योजना बना सकते हैं। वे बहुत ईमानदार प्रतीत होते हैं, लेकिन वे दिखावे के वास्ते कार्य को पूरा करने से ज्यादा किसी अन्य चीज़ पर ध्यान केंद्रित नहीं करते हैं, या जब वे ऐसा कर रहे होते हैं, तो वे स्वयं के लिए अपने मानक निर्धारित करते हैं: इसे कैसे करें ताकि वे खुश और संतुष्ट महसूस करें, पूर्णता के उस स्तर को प्राप्त करना जिसके लिए वे प्रयास करते हैं। भले ही वे किसी भी मानक को निर्धारित करते हों, यदि इसका सत्य से कोई संबंध नहीं है, यदि वे सत्य की तलाश करने या इस बात को समझने और इसकी पुष्टि करने के बाद कि परमेश्वर उनसे क्या माँग करता है, कार्रवाई नहीं करते हैं, बल्कि इसके विपरीत, वे, उलझन में, आँखें मूँदकर कार्य करते हैं, तो यह केवल स्वयं का बल लगाना है। वे अपनी इच्छाओं के अनुसार, अपने दिमाग या योग्यता के अनुसार, या अपनी क्षमताओं और कौशलों के अनुसार कार्य कर रहे हैं। और इस तरह से उनके कार्य करने का परिणाम क्या होता है? हो सकता है कि कार्य पूरा हो गया हो, किसी ने कोई दोष नहीं निकाला हो, और हो सकता है कि तू इससे बहुत खुश हो। लेकिन ऐसा करने के दौरान, सबसे पहले तो: तूने परमेश्वर के इरादे को नहीं समझा; और उसके बाद: तूने इसे अपने पूरे हृदय से, अपने पूरे मन से, और अपनी पूरी ताक़त के साथ नहीं किया—तूने इसमें अपना पूरा हृदय नहीं लगाया। यदि तूने सत्य के सिद्धांतों की तलाश की होती, यदि तूने परमेश्वर की इच्छा की तलाश की होती, तो तू इसे पूरा करने में 90% प्रभावी होता, तू सत्य की वास्तविकता में प्रवेश करने में भी समर्थ होता, और तू ठीक से समझ गया होता कि तू जो कर रहा था वह परमेश्वर की इच्छा के अनुरूप है। लेकिन यदि तू लापरवाह और बेतरतीब होता, तो भले ही कार्य पूरा हो गया हो, तब भी अपने हृदय में तू इस बारे में स्पष्ट नहीं होता कि तूने इसे कितनी अच्छी तरह से किया है। तेरे पास कोई मानदण्ड नहीं होगा, तुझे पता नहीं लगेगा कि यह परमेश्वर की इच्छा के अनुरूप है या नहीं, या यह सत्य के अनुरूप है या नहीं। इसलिए, जब भी इस तरह की स्थिति में कर्तव्यों का पालन किया जाता है, तो इसका चार शब्दों में उल्लेख किया जा सकता है—स्वयं का बल लगाना।

— "अंत के दिनों के मसीह की बातचीत के अभिलेख" में 'जीवन जीने के लिए लोग ठीक-ठीक किस पर भरोसा करते रहे हैं' से उद्धृत

मैंने पहले जो कुछ भी कहा है—परमेश्वर से प्रेम करने में अपना पूरा हृदय, मन, आत्मा और शक्ति लगा देना—उनमें से तुम लोग केवल अपनी शक्ति लगाते हो; अभी तक तुम लोग अपना पूरा हृदय, मन और आत्मा लगाने में सफल नहीं हुए हो। तुम्हें इन तीनों पहलुओं में सफलता नहीं मिली है। तुम लोग अपने कर्तव्य निर्वहन में केवल अपनी शक्ति लगाना जानते हो। परमेश्वर की नज़र में तुम किस प्रकार के इंसान हो? (एक सेवाकर्मी।) क्या तुम लोग सेवाकर्मी बनना चाहते हो? तुम लोगों में सेवाकर्मी बनने की कोई इच्छा नहीं है, फिर भी तुम सेवा कर रहे हो—इसके अलावा, तुम्हें इसमें आनंद भी आता है और तुम थकते भी नहीं। इस प्रकार के पथ पर हो तुम लोग। तुम सेवाकर्मी नहीं बनना चाहते, फिर भी पूरे जोश से सेवा करते हो—क्या इसमें विरोधाभास नहीं है? ऐसा क्यों हुआ? तुम्हारा मार्ग इसकी वजह है, जो यह तय करता है अंतत: तुम किस लक्ष्य को प्राप्त करोगे। आम बोलचाल में, इसका मतलब है कि "जैसा बोओगे, वैसा काटोगे।" तुम जिस मार्ग पर चल रहे हो, वह सेवाकर्मी का मार्ग है, और जो मार्ग तुमने चुना है, वह सेवाकर्मी का मार्ग है, इसका अर्थ है कि तुम्हारा अंत सेवा करते हुए ही होगा। चूँकि तुम शक्ति लगाने से ही अपना सरोकार रखते हो, तुम ऊर्जा नहीं खपाना चाहते, तुम कोई विचार नहीं करते, तुम अपने प्रभु यानी परमेश्वर से प्रेम करने में अपना हृदय, मन, आत्मा नहीं लगाना चाहते, तो अंतत: परिणाम यही हो सकता है कि तुम अपनी शक्ति का उपयोग करो; परिणाम स्वरूप तुम अंत तक सेवा ही करते रहते हो। यहाँ कोई विरोधाभास नहीं है। विरोधाभास क्या है? ये तो बस लोग हैं, जो सेवाकर्मी नहीं होना चाहते और जब वे किसी को इस प्रकार से उन पर यह ठप्पा लगाते हुए सुनते हैं, तो वे नाराज़ हो जाते हैं। वे सोचते हैं, "क्या यह मेरा अपमान नहीं है? क्या मेरे महत्व को कम नहीं किया जा रहा है? यह दूसरों के प्रति पक्षपात है, है न? मैंने इतनी मेहनत और शक्ति लगाई है। मैं सेवाकर्मी कैसे हो सकता हूँ?" तुम सही हो; तुमने इतनी मेहनत की है-और यही चीज़ तुम्हें पूरी तरह से सेवाकर्मी बनाती है। तुम्हें इस बारे में सोचना चाहिए कि तुम केवल शक्ति खर्च न करो, बल्कि उसमें अपना पूरा मन भी लगाओ। इसे एक मानक की तरह देखो। अपने प्रभु परमेश्वर को पूरे दिल, दिमाग और आत्मा से प्रेम करो। तुम्हें इन्हें किसके लिए इस्तेमाल करना चाहिए? तुम्हें अपने दिल, दिमाग और आत्मा का इस्तेमाल अपने कर्तव्य को अच्छी तरह से निभाने में करना चाहिए। इस तरह तुम परमेश्वर की नज़र में एक अच्छे इंसान बन जाओगे।

— "अंत के दिनों के मसीह की बातचीत के अभिलेख" में 'मानव सदृशता पाने के लिए आवश्यक है अपने समूचे हृदय, मन और आत्मा से अपना कर्तव्य सही-सही पूरा करना' से उद्धृत

जब तुम कोई काम पूरा करते हो या किसी कर्तव्य का निर्वाह करते हो, तो खुद उस चीज़ की बात करें तो, उसे उस तरह कैसे किया जाता है जैसे सत्य का अभ्यास करना हो और उसे उस तरह कैसे किया जाता है जैसे सत्य का अभ्यास न करना हो? सत्य का अभ्यास न करने का सत्य से कोई संबंध नहीं है। तुम अपना कर्तव्य निभा रहे होगे, लेकिन इसका सत्य से कोई लेना-देना नहीं है; यह केवल एक प्रकार का अच्छा व्यवहार है और इसे एक सत्कर्म भी कहा जा सकता है, किंतु इसके और सत्य का अभ्यास करने के बीच अभी भी कुछ दूरी है। वे अलग हैं। तो उन्हें किस आधार पर अलग किया जा सकता है? जब तुम यह काम कर रहे होते हो, तो तुम एक निश्चित दायरा बनाए रखते हो और कुछ नियमों का पालन करते हो। उनमें से एक यह है कि तुम परमेश्वर के घर के हितों को नुकसान नहीं पहुँचाते; दूसरा यह है कि तुम थोड़ा और दौड़-भाग करते हो और नियमित समय पर खाने और सोने में असफल रहते हुए थोड़ा पीड़ित होते हो। तुमने ये सब चीज़ें पूरी कर ली हैं और यदि तुम पर कोई सख्त मापदंड लागू नहीं किए जाते, तो तुम्हारा कर्तव्य अभी भी संतोषजनक ढंग से पूरा हो सकता है। किंतु एक चीज़ और है : क्या तुमने पता लगाया और खोजा है कि जब तुम यह काम करते हो, तो तुम्हारे भीतर कौन-से भ्रष्ट स्वभाव होते हैं? अर्थात्, क्या तुमने पता लगाया और खोजा है कि जब यह मुद्दा तुम्हारे सामने आता है, तो तुम्हारे पास ऐसे कौन-से विचार होते हैं और तुम्हारे भीतर ऐसी कौन-सी चीज़ें होती हैं, जिनसे परमेश्वर असंतुष्ट होता है? इस कर्तव्य को निभाकर और इस काम को करके क्या तुम अपने बारे में एक नई समझ प्राप्त करते हो और क्या तुमने कोई ऐसा सत्य पाया है, जिसे तुम्हें अभ्यास में लाना चाहिए और प्रवेश करना चाहिए? (यह शायद ही कभी होता है। कभी-कभी मुझे अपने अहंकार की केवल एक सतही समझ प्राप्त होती है और फिर मैं उसे आगे नहीं बढ़ाता।) तब अधिकांश समय तुम्हारे पास एक सूत्रबद्ध और सैद्धांतिक समझ ही होती है, कोई वास्तविक समझ नहीं। यदि तुम सत्य का अनुसरण नहीं करते, तो भले ही तुमने कोई भयंकर गलती या बुराई न की हो और भले ही तुमने मुख्य सिद्धांतों का उल्लंघन न किया हो और बाहरी तौर पर तुम कुछ मानवता से युक्त एक अच्छे व्यक्ति की तरह लगते हो, किंतु अभी भी तुम सत्य का अभ्यास नहीं कर रहे हो, न ही तुमने कोई सत्य प्राप्त किया है। तुम्हारे द्वारा "कुछ भी गलत न किया होना" और बाहरी तौर पर तुम्हारा मानवता से युक्त व्यक्ति दिखाई देना सत्य के अनुसार होने या सत्य का अभ्यास करने के बराबर नहीं है। इसके और सत्य का अभ्यास करने के बीच एक अंतराल है, एक अंतर है। इसलिए बहुत-से लोग परमेश्वर में विश्वास करते हैं और एक अवधि के बाद वे पाते हैं कि वे ऐसे लोग बन गए हैं, जो सिर्फ जबरन प्रयास करते हैं। जब उन्होंने पहली बार शुरुआत की थी, तो उन्होंने इस तरह से विश्वास करने की योजना नहीं बनाई थी, तो फिर वे ऐसे व्यक्ति कैसे बन गए, जो सिर्फ शारीरिक परिश्रम के माध्यम से काम करते हैं? "शारीरिक परिश्रम के माध्यम से काम करने" का क्या निहितार्थ है? इसका अर्थ है सेवा प्रदान करना, एक साधन बन जाना। तुम ऐसे लोग क्यों बन गए हो, जो सेवा प्रदान करते हैं? क्या तुम इसी तरह से सेवा प्रदान करना चाहते हो? जब तुमने विश्वास करना शुरू किया था, तो तुमने सेवा प्रदान करने की योजना नहीं बनाई थी; तुम्हारी योजना यह थी : "मुझे ईमानदारी से विश्वास करना चाहिए, मुझे सत्य को समझना चाहिए और अंत में, मुझे स्वर्ग तक उन्नत होना चाहिए। कम से कम मुझे मरना नहीं चाहिए।" और फिर थोड़ी देर विश्वास करने के बाद तुमने सोचा, "मुझे परमेश्वर से डरना चाहिए और बुराई से दूर रहना चाहिए और मुझे परमेश्वर का आज्ञापालन करना चाहिए।" लेकिन तुम अनजाने ही ऐसे लोग कैसे बन गए हो, जो जोर लगाकर प्रयास करते हैं? ऐसा इसलिए है क्योंकि तुम उन परिवेशों में, जिनकी परमेश्वर तुम्हारे लिए व्यवस्था करता है या अपने कर्तव्यों के निष्पादन के दौरान सत्य में कभी प्रवेश नहीं कर सकते और तुम हमेशा अपना कर्तव्य पूरा करने के लिए अपने शारीरिक परिश्रम का एक स्थानापन्न के रूप में उपयोग कर रहे हो—यही कारण है।

— "अंत के दिनों के मसीह की बातचीत के अभिलेख" में 'सत्‍य का अभ्‍यास करना क्‍या है?' से उद्धृत

जब मनुष्य दूसरों को आँकता है, तो वह उनके योगदान के अनुसार उन्हें आँकता है। जब परमेश्वर मनुष्य को आँकता है, तो वह मनुष्य की प्रकृति के अनुसार उन्हें आँकता है। उन लोगों में जो जीवन की तलाश करते हैं, पौलुस ऐसा व्यक्ति था जो स्वयं अपना सार नहीं जानता था। वह किसी भी तरह विनम्र या आज्ञाकारी नहीं था, न ही वह अपना सार जानता था, जो परमेश्वर के विरुद्ध था। और इसलिए, वह ऐसा व्यक्ति था जो विस्तृत अनुभवों से नहीं गुज़रा था, और ऐसा व्यक्ति था जो सत्य को अभ्यास में नहीं लाया था। पतरस भिन्न था। वह परमेश्वर का सृजित प्राणी होने के नाते अपनी अपूर्णताएँ, कमज़ोरियाँ, और अपना भ्रष्ट स्वभाव जानता था, और इसलिए उसके पास अभ्यास का एक मार्ग था जिसके माध्यम से वह अपने स्वभाव को बदल सके; वह उन लोगों में से नहीं था जिनके पास केवल सिद्धांत था किंतु जो वास्तविकता से युक्त नहीं थे। वे लोग जो परिवर्तित होते हैं नए लोग हैं जिन्हें बचा लिया गया है, वे ऐसे लोग हैं जो सत्य का अनुसरण करने की योग्यता से संपन्न हैं। वे लोग जो नहीं बदलते हैं उन लोगों में आते हैं जो स्वभाविक रूप से पुराने और बेकार हैं; ये वे लोग हैं जिन्हें बचाया नहीं गया है, अर्थात्, वे लोग जिनसे परमेश्वर घृणा करता है और जिन्हें ठुकरा चुका है। उनका कार्य चाहे जितना भी बड़ा हो, उन्हें परमेश्वर द्वारा याद नहीं रखा जाएगा। जब तुम इसकी तुलना स्वयं अपने अनुसरण से करते हो, तब यह स्वतः स्पष्ट हो जानना चाहिए कि तुम अंततः उसी प्रकार के व्यक्ति हो या नहीं जैसे पतरस या पौलुस थे। यदि तुम जो खोजते हो उसमें अब भी कोई सत्य नहीं है, और यदि तुम आज भी उतने ही अहंकारी और अभद्र हो जितना पौलुस था, और अब भी उतने ही बकवादी और शेखीबाज हो जितना वह था, तो तुम बिना किसी संदेह के पतित व्यक्ति हो जो विफल होता है। यदि तुम पतरस के समान खोज करते हो, यदि तुम अभ्यासों और सच्चे बदलावों की खोज करते हो, और अहंकारी या उद्दंड नहीं हो, बल्कि अपना कर्तव्य निभाने की तलाश करते हो, तो तुम परमेश्वर के सृजित प्राणी होगे जो विजय प्राप्त कर सकता है। पौलुस स्वयं अपना सार या भ्रष्टता नहीं जानता था, वह अपनी अवज्ञाकारिता तो और भी नहीं जानता था। उसने मसीह के प्रति अपनी कुत्सित अवज्ञा का कभी उल्लेख नहीं किया, न ही वह बहुत अधिक पछतावे से भरा था। उसने बस एक स्पष्टीकरण दिया, और, अपने हृदय की गहराई में, उसने परमेश्वर के प्रति पूर्ण रूप से समर्पण नहीं किया था। यद्यपि वह दमिश्क के रास्ते पर गिर पड़ा था, फिर भी उसने अपने भीतर गहराई से झाँककर नहीं देखा था। वह मात्र काम करते रहने से ही संतुष्ट था, और वह स्वयं को जानने और अपना पुराना स्वभाव बदलने को सबसे महत्वपूर्ण विषय नहीं मानता था। वह तो बस सत्य बोलकर, स्वयं अपने अंतःकरण के लिए औषधि के रूप में दूसरों को पोषण देकर, और अपने अतीत के पापों के लिए अपने को सांत्वना देने और अपने को माफ़ करने की ख़ातिर यीशु के शिष्यों को अब और न सताकर ही संतुष्ट था। उसने जिस लक्ष्य का अनुसरण किया वह भविष्य के मुकुट और क्षणिक कार्य से अधिक कुछ नहीं था, उसने जिस लक्ष्य का अनुसरण किया वह भरपूर अनुग्रह था। उसने पर्याप्त सत्य की खोज नहीं की थी, न ही उसने उस सत्य की अधिक गहराई में जाने की खोज की थी जिसे उसने पहले नहीं समझा था। इसलिए स्वयं के विषय में उसके ज्ञान को झूठ कहा जा सकता है, और उसने ताड़ना और न्याय स्वीकार नहीं किया था। वह कार्य करने में सक्षम था इसका अर्थ यह नहीं है कि वह स्वयं अपनी प्रकृति या सार के ज्ञान से युक्त था; उसका ध्यान केवल बाहरी अभ्यासों पर था। यही नहीं, उसने जिसके लिए कठिन परिश्रम किया था वह बदलाव नहीं, बल्कि ज्ञान था। उसका कार्य पूरी तरह दमिश्क के मार्ग पर यीशु के प्रकटन का परिणाम था। यह कोई ऐसी चीज़ नहीं थी जिसे उसने मूल रूप से करने का संकल्प लिया था, न ही यह वह कार्य था जो उसके द्वारा अपने पुराने स्वभाव की काँट-छाँट स्वीकार करने के बाद हुआ था। उसने चाहे जिस प्रकार कार्य किया, उसका पुराना स्वभाव नहीं बदला था, और इसलिए उसके कार्य ने उसके अतीत के पापों का प्रायश्चित नहीं किया बल्कि उस समय की कलीसियाओं के मध्य एक निश्चित भूमिका मात्र निभाई थी। इस जैसे व्यक्ति के लिए, जिसका पुराना स्वभाव नहीं बदला था—कहने का तात्पर्य यह, जिसने उद्धार प्राप्त नहीं किया था, तथा सत्य से और भी अधिक रहित था—वह प्रभु यीशु द्वारा स्वीकार किए गए लोगों में से एक बनने में बिलकुल असमर्थ था।

— "वचन देह में प्रकट होता है" में 'सफलता या विफलता उस पथ पर निर्भर होती है जिस पर मनुष्य चलता है' से उद्धृत

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अब बड़ी-बड़ी विपत्तियाँ आ रही हैं और वह दिन निकट है जब परमेश्वर भलाई का प्रतिफल देगें और बुराई को दण्ड देंगे। हमें एक सुंदर गंतव्य कैसे मिल सकता है?

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