21. परमेश्‍वर का प्रकाश विपत्ति में मेरा मार्गदर्शन करता है

झाओ शिन, शिचुआन प्रान्‍त

मैं बचपन में पहाड़ों पर रहती थी। मैंने बहुत ज्‍़यादा दुनिया नहीं देखी थी और मेरी कोई बड़ी महत्‍वाकांक्षाएँ नहीं थीं। मेरा विवाह हुआ, बच्‍चे हुए, बड़े होकर मेरे दोनों बेटे समझदार और आज्ञाकारी निकले, और मेरे पति बहुत मेहनती थे। हालाँकि हमारे पास बहुत पैसा कभी नहीं रहा, तब भी हमारा परिवार मिलजुल कर साथ रहता था, और मैं बहुत सुखी और सन्‍तुष्‍ट महसूस करती थी। 1996 में मुझे अचानक एक गम्‍भीर बीमारी हो गई जिसकी वजह से मैं प्रभु यीशु में आस्‍था हासिल करने की ओर अग्रसर हुई। उसके बाद से मैं अक्‍सर बाइबल पढ़ने लगी और कलीसिया के समागमों में शामिल होने लगी। मुझे इस बात से आश्चर्य हुआ कि मेरी बीमारी धीरे-धीरे ठीक होने लगी, और इसलिए प्रभु यीशु का अनुसरण करने की मेरी आस्‍था और भी प्रबल हो गयी।

लेकिन 1999 में ऐसा कुछ हुआ जिसकी कल्‍पना भी मैं नहीं कर सकती थी – प्रभु यीशु में मेरी आस्‍था की वजह से मुझे पुलिस द्वारा गिरफ़्तार कर लिया गया। मुझे पूरे दिन हवालात में बन्‍द रखा गया और मुझ पर 240 युआन का जुर्माना लगाया गया। हालाँकि सुनने में यह शायद बहुत बड़ी रकम न लगे, लेकिन निर्धन पहाड़ी इलाक़े में रहने वाले हम जैसे ग़रीब किसानों के लिए यह उतनी छोटी रकम भी नहीं है! पर्याप्‍त पैसा इकट्ठा करने के लिए मैंने वो सारी मूँगफलियाँ बेच डालीं जो मैंने कड़ी मेहनत से अपने छोटे-से खेत में बोयी थीं। जो बात मैं सचमुच नहीं समझ सकी वह यह थी कि सीसीपी सरकार ने मुझ पर "प्रतिक्रान्तिकारी संगठनों में भाग लेने" के अपराध का इल्‍ज़ाम क्‍यों लगाया था। उन्‍होंने मेरे पूरे परिवार को भी यह कहते हुए धमकाया कि अगर मेरे बेटे किसी तरह कॉलेज की पढ़ाई पूरी भी कर लें, तब भी वे नौकरी हासिल नहीं कर पाएँगे। इसलिए, मेरे पति, मेरे माँ-बाप, मेरे रिश्‍तेदारों और मेरे दोस्‍तों, सभी ने मेरे ऊपर दबाव डालना शुरू कर दिया, उन्‍होंने मेरी आस्‍था को कुचलने और उसके आड़े आने की कोशिश की। उन्‍होंने मुझे तमाम तरह के कठिन और थका देने वाले काम करने को मजबूर किया, और मेरे पास खामोश रह कर इस को सहने के सिवा और कोई चारा नहीं था।

मैं सौभाग्‍यशाली थी कि 2003 में मुझे सर्वशक्तिमान परमेश्‍वर के अंत के दिनों के कामों को स्वीकारने का अवसर मिला। परमेश्‍वर के वचनों को पढ़ने से मुझे इस बात का पक्‍का यकीन हो गया कि सर्वशक्तिमान परमेश्‍वर ही वापस आया प्रभु यीशु है। मैं पूरी तरह से रोमांचित हो उठी, और मुझे लगा कि अपने जीवन-काल में परमेश्‍वर के साथ पुनर्मिलन, निश्चय ही जीवन का महानतम अनुग्रह है! लेकिन उसके बाद से सीसीपी सरकार और स्‍वयं मेरे परिवार द्वारा मुझ पर डाला जा रहा दबाव और भी बढ़ गया। इस तरह की परिस्थिति को सामने पाकर मैंने परमेश्‍वर के समक्ष संकल्‍प किया: "परिस्थिति कितनी ही मुश्किल क्‍यों न हो जाए या मुझे कितना ही दुख क्‍यों न झेलना पड़े, मैं अन्‍त तक तेरा अनुसरण करूँगी!" बाद में सीसीपी पुलिस मेरे घर आयी और उसने यह कहते हुए मुझे धमकाया, "क्‍या तुझे मालूम है कि परमेश्‍वर में तेरा विश्‍वास ग़ैरक़ानूनी है, और इस मुल्‍क में इसकी इजाज़त नहीं है? अगर तूने अपनी आस्‍था जारी रखी, तो तुझे जेल की हवा खानी पड़ेगी!" जब मेरे पति ने यह सुना, तो उन्‍होंने मुझ पर और भी ज्‍़यादा दबाव डालना शुरू कर दिया। वे अक्‍सर मुझे पीटते और कोसते थे, नौबत तो यहाँ तक आ गयी कि वे मुझे हमारे घर में भी रखने को तैयार नहीं थे। सीसीपी सरकार की गिरफ़्तारी और उत्‍पीड़न से बचने के लिए मेरे पास अपनी अन्‍दरूनी पीड़ा को दबा कर घर छोड़ देने के सिवा और कोई विकल्‍प नहीं बचा। हालाँकि उस समय मैं सीसीपी सरकार के उत्‍पीड़न की वजह से अपना शहर छोड़कर खानाबदोशी की ज़िन्‍दगी जीने को विवश कर दी गयी थी, तब भी इसके पीछे जो दुराचारी ताक़त काम कर रही थी, जिसके कारण मेरा परिवार बिखर गया था, मैं उसे ठीक से पहचान नहीं पायी थी। जब मैंने जेल के जीवन और सीसीपी सरकार द्वारा किये गये निरंकुश हमलों और उसके द्वारा मेरे खिलाफ़ लगाये गये झूठे आरोपों को निजी तौर पर अनुभव किया तब जाकर ही मुझमें उसके विकृत और प्रतिक्रियावादी सार की कुछ वास्‍तविक समझ पैदा हुई, और मुझे अहसास हुआ कि सीसीपी सरकार ही वह मुख्‍य अपराधी है जो लोगों के सुखी परिवारों को उजाड़ती है और लोगों पर भयावह कहर ढाती है!

16 दिसम्‍बर 2012 को मैं और कलीसिया के पाँच भाई-बहन सुसमसचार का उपदेश दे रहे थे जब एक कार को तेज़ी से भगाते हुए चार पुलिसवाले हमारी ओर आये और उन्‍होंने हमें गिरफ़्तार कर लिया। वे हमें पुलिस थाने ले गये और, मुझे हथक‍ड़ियाँ पहनाने के बाद उन में से एक चिल्‍लाया, "मैं तुम लोगों को बता दूँ कि तुम चाहो तो चोरी और डकैती कर सकते हो, तुम हत्‍या और आगजनी कर सकते हो, और तुम अपने शरीरों को बेच सकते हो, हमें इसकी परवाह नहीं है। लेकिन परमेश्‍वर में विश्‍वास एक ऐसी चीज़ है जो तुम नहीं कर सकते! परमेश्‍वर में विश्‍वास कर तुम खुद को कम्युनिस्ट पार्टी के खिलाफ़ खड़ा कर रहे हो, और तुम्‍हें सज़ा देना ज़रूरी है!" यह कहते हुए उसने मुझे ज़ोर से थप्‍पड़ मारा और बेरहमी के साथ लात मारी। उस पिटाई के बाद मुझे लगा कि मैं और अधिक नहीं सह पाऊँगी, इसलिए मैं अपने हृदय में बार-बार परमेश्‍वर को पुकारने लगी: "हे परमेश्‍वर! मैं नहीं जानती कि ये दुराचारी पुलिसवाले मुझे कब तक यातना देते रहेंगे, मुझे ऐसा लग रहा है कि मैं बहुत देर तक टिकी नहीं रह पाऊँगी। लेकिन यहूदा बनने की बजाय मैं मर जाना पसन्‍द करूँगी—मैं तेरे साथ विश्‍वासघात नहीं करूँगी। मुझ पर निगाह रख, मेरी रक्षा कर और मुझे राह दिखा।" प्रार्थना करने के बाद, मैंने मन ही मन अपने हृदय में संकल्‍प लिया: "मैं अन्तिम साँस तक परमेश्‍वर के प्रति वफ़ादार रहूँगी, मैं आखिरी पल तक शैतान से लड़ूँगी, और मैं परमेश्‍वर को सन्‍तुष्‍ट करने के लिए उसकी गवाही दूँगी!" बाद में एक पुलिसवाले ने मेरी तलाशी ली जिसमें उसको मेरे पास से नगद 230 युआन मिले। उसने दुष्‍टता से मुस्‍कराते हुए कहा, "यह पैसा चोरी का माल है और इसको जब्‍त किया जाना ज़रूरी है।" यह कहते हुए उसने वो पैसा अपना मानकर अपनी जेब में ठूँस लिया। उसके बाद उन्‍होंने हमसे सवाल पूछने शुरू कर दिये। "तुम लोग कहाँ के रहने वाले हो? तुम्‍हारे नाम क्‍या हैं? तुम्‍हें यहाँ किसने भेजा है?" जब मैंने उनको अपना नाम और पता बताया, तो उन्‍होंने फुर्ती से अपने कम्‍प्‍यूटर पर मेरे पूरे परिवार के ब्‍यौरे खोज लिये। मैंने उनको महज़ अपनी कुछ निजी जानकारी दी थी, लेकिन कलीसिया के बारे में उनके एक भी सवाल का जवाब देने से मना कर दिया।

इसके बाद पुलिस ने अपनी एक चाल चली। वे सड़क से ऐसे दस लोगों को ढूँढ़ लाये जो परमेश्‍वर में विश्‍वास नहीं करते थे और उनसे गवाही दिलायी कि मैं सर्वशक्तिमान परमेश्‍वर के राज्‍य के सुसमाचार का उपदेश कर रही थी। उसके बाद उन्‍होंने उन लोगों को मेरे बारे में कई सारे झूठ बताए और मुझ पर लगे नकली आरोपों की जानकारी दी। उन सारे लोगों ने मेरा मज़ाक उड़ाया, मुझ पर थू-थू की और मेरी बेइज्‍़ज़ती की; मुझे महसूस हुआ कि मेरे साथ बहुत ही अन्‍याय हो रहा है। मुझे समझ में नहीं आ रहा था कि मैं उस स्थिति से कैसे बाहर निकलूँ, इसलिए मैंने सिर्फ़ अपने हृदय में परमेश्‍वर से आस्‍था और शक्ति की याचना करना जारी रखा। तभी परमेश्‍वर के वचनों का एक भजन मेरे दिमाग़ में आया: "देहधारी परमेश्वर की होती है आलोचना, निंदा, उपहास। शैतान उसका पीछा करते हैं। धार्मिक जगत ने ठुकराया है उसे। उसकी चोट की भरपाई नहीं कर सकता कोई। परमेश्वर धीरज से बचाता भ्रष्ट इन्सान को, चोट खाए दिल से प्रेम करता है इन्सान को। सबसे कष्टमय है ये, सबसे कष्टमय काम है ये। इन्सान द्वारा उग्र विरोध, पीछा करना, लगाना लांछन और झूठे आरोप, डालते हैं परमेश्वर के देह को बड़े खतरे में। कौन उसके दर्द को समझ सकता है? कौन मरहम लगा सकता है?" (मेमने का अनुसरण करना और नए गीत गाना में "घावों से मनुष्य को प्रेम करता है परमेश्वर")। इसके पहले मैं उस पीड़ा का सिर्फ़ अनुमान ही लगा सकती थी जो परमेश्वर मानव-जाति की रक्षा की खातिर झेलता है, और स्‍वयं को उस तरह की वास्‍तविक स्थिति में पाने के बाद ही मैंने अन्‍तत: इस बात को सराहा कि परमेश्‍वर का दुख कितना बड़ा रहा होगा! पवित्र और धार्मिक परमेश्‍वर ने हम गन्‍दे और भ्रष्ट लोगों का साथ देने के लिए शरीर धारण किया है; उसने हमारी रक्षा की खातिर तमाम तरह के उपहास और अपमान, निन्‍दा और कलंक, पीछा किया जाना और अत्‍याचार सहे हैं। यहाँ तक कि हममें से जो लोग परमेश्‍वर में विश्‍वास करते हैं, वे तक अक्‍सर उसको नहीं समझते, और हम उसको ग़लत तक समझ बैठते हैं और उस पर दोषारोपण करते हैं। ये सारे आघात परमेश्‍वर के लिए बहुत पीड़ादायी हैं, और तब भी वह अपने घावों को धारण किये रहता है और मानव-जाति से प्रेम करता है – उसका स्‍वभाव इतना महान, इतना सम्‍माननीय है! हालाँकि पहले बाइबल में मैंने यह पढ़ा था: "क्योंकि जैसे बिजली आकाश के एक छोर से कौंधकर आकाश के दूसरे छोर तक चमकती है, वैसे ही मनुष्य का पुत्र भी अपने दिन में प्रगट होगा। परन्तु पहले अवश्य है कि वह बहुत दु:ख उठाए, और इस युग के लोग उसे तुच्छ ठहराएँ" (लूका 17:24-25)। लेकिन सिर्फ़ आज ही मुझे यह बात समझ में आयी कि ये वचन वास्‍तव में घटित हुए थे! इस बात से मैं उदासहो गयी, मुझे पछतावा हुआ कि मैंने इसके पहले कभी परमेश्‍वर की इच्‍छा को महत्‍व नहीं दिया था…। इसके पहले कि मैं खुद को फिर से संयत कर पाती, पुलिस ने मेरे गले में एक तख्‍ती लटका दी जिस पर "शी जियाओ की सदस्‍य" अंकित था, और मेरी तस्‍वीर खींच ली। उसके बाद उन्‍होंने मुझे उकड़ू बैठने का और सुसमाचार-सम्‍बन्‍धी कुछ सामग्री की ओर इशारा करने का आदेश दिया, जिस दौरान उन्‍होंने मेरी कई और तस्‍वीरें खीचीं। उकड़ू बैठने से मेरे पैरों में इतना दर्द हो रहा था कि मैं बैठी रह पा रही थी। ठीक उसी पल मेरा सेलफ़ोन घनघनाने लगा, मैंने चौंकते हुए सोचा: "ज़रूर कलीसिया का कोई भाई या बहन है मुझे फ़ोन कर रहा है। मैं उनको किसी भी हालत में नहीं फँसा सकती!" मैंने जल्‍दी से अपने सेल फ़ोन को पकड़ा और उसे पूरी ताक़त से फ़र्श पर पटक दिया, जिससे वह टूट कर टुकड़े-टुकड़े हो गया। इस कारण तुरन्‍त ही पुलिसवाले आगबबूला हो गये। लगा जैसे वे पगला गये हों – उन्‍होंने मेरा कॉलर पकड़ कर मुझे उठाया, और उसके बाद मेरे चेहरे पर तड़ातड़ थप्‍पड़ जड़ दिये। तुरन्‍त ही मेरा चेहरा आग की तरह जलने लगा और मेरे कान इस क़दर सनसनाने लगे कि मुझे कुछ भी सुनाई नहीं दे रहा था। फिर वे पूरी ताक़त से मुझे लात मारने लगे और, उसके बाद भी जब उन दुराचारी पुलिसवालों का ग़ुस्‍सा शान्‍त नहीं हुआ, तो वे मुझे घसीटते हुए एक अँधेरे कमरे में ले गये जहाँ उन्‍होंने मुझे एक दीवार से पीठ टिका कर खड़ा कर दिया और मेरे चेहरे पर थप्‍पड़ जड़ने लगे। इसके बाद उन्‍होंने एक बार फिर से मेरी खासी पिटाई की। जब यह सब चल रहा था तो मैं किसी तरह अपने आँसू रोके हुए थी, और मन ही मन परमेश्‍वर से प्रार्थना कर रही थी: "हे सर्वशक्तिमान परमेश्‍वर, मेरा विश्‍वास है कि इस समय मेरे साथ जो कुछ भी हो रहा है उस सब के पीछे तेरी भली इच्छा ही काम कर रही है। ये दुराचारी पुलिसवाले मुझे कितना ही क्‍यों न सताएँ, मैं सदा तेरी गवाही देती रहूँगी और मैं शैतान के सामने समर्पण नहीं करूँगी!" मुझे आश्‍चर्य हुआ कि जब मैंने यह प्रार्थना की, तो मेरी सुनने की शक्ति वापस लौट आयी, और मुझे एक दुराचारी पुलिसवाले के ये शब्‍द सुनायी दिये "यह औरत वाक़ई बहुत जिद्दी है। इसने न तो एक भी आँसू टपकाया है और न एक बार चूँ की है। शायद हमने इसकी अच्छे से मरम्‍मत नहीं की है। बिजली का डण्‍डा लेकर आओ और फिर हम देखते हैं कि यह कुछ आवाज़ निकालती है या नहीं!" एक अन्‍य पुलिसवाले ने एक बिजली का डण्‍डाउठाया और उसको ज़ोर से मेरी जाँघ से सटा दिया। मेरे पूरे बदन में तीखा दर्द दौड़ गया, जिससे मुझे इतनी पीड़ा हुई कि मैं तुरंत फ़र्श पर गिर पड़ी। मेरा सिर दीवार से टकरा गया और उससे खून बहने लगा। पुलिसवाले मुझे उंगली दिखाते हुए चिल्‍लाये, "नाटक करना बन्‍द कर। खड़ी हो जा! हम तुझे तीन मिनट देंगे। अगर तू खड़ी नहीं हुई, तो हम तुझे फिर से पीटेंगे। मरे होने का नाटक करने के बारे में सोचना भी मत!" लेकिन उनके चिल्‍लाने का कोई फ़र्क नहीं पड़ा, मैं वाक़ई हिल-डुल नहीं पा रही थी, और इसलिए अन्‍त में पिटाई के इस सिलसिले को बन्‍द करने से पहले उन्‍होंने मुझे एक और क्रूर ठोकर मारी।

उन पुलिसवालों की निर्दयतापूर्ण और अमानवीय यातना के सामने मैं और अधिक टिकी रह पाने में खुद को वाक़ई असमर्थ पा रही थी। मैंने गम्‍भीरता के साथ परमेश्‍वर से प्रार्थना की: "हे सर्वशक्तिमान परमेश्‍वर! मैं अब और ज्‍़यादा बरदाश्‍त नहीं कर सकती। मुझे आस्‍था और शक्ति दे!" मेरी उस सघन पीड़ा के बीच परमेश्‍वर के वचनों का एक भजन मेरे मन में कौंध उठा: "क्योंकि तुम परमेश्वर पर विश्वास करते हो, इसलिए तुम्हें अपने हृदय को परमेश्वर के समक्ष सौंप देना होगा। यदि तुम अपने हृदय को परमेश्वर के समक्ष चढ़ा दो और सौंप दो, तो शोधन के दौरान तुम्हारे लिए परमेश्वर का इनकार करना या परमेश्वर को त्याग देना असंभव होगा। ... जब वह दिन आएगा और परमेश्वर की परीक्षाएँ अचानक तुम पर आ पड़ेंगी, तो न केवल तुम परमेश्वर की ओर खड़े रह पाओगे बल्कि परमेश्वर की गवाही भी दे पाओगे। उस समय तुम अय्यूब, और पतरस के सामान होगे। परमेश्वर की गवाही देने के बाद तुम सच्चाई के साथ उससे प्रेम करोगे, और ख़ुशी-ख़ुशी उसके लिए अपना जीवन बलिदान कर दोगे; तुम परमेश्वर के गवाह होगे, और ऐसे व्यक्ति होगे जो परमेश्वर का प्रिय हो। वह प्रेम जिसने शोधन का अनुभव किया हो, निर्बल नहीं बल्कि शक्तिशाली होता है। इस बात की परवाह किए बिना कि परमेश्वर कब और कैसे तुम्हें अपनी परीक्षाओं के अधीन लाता है, तुम इस बात की चिंता नहीं करोगे कि तुम जीओगे या मरोगे, तुम ख़ुशी-ख़ुशी परमेश्वर के लिए सब कुछ त्याग दोगे, और परमेश्वर के लिए किसी भी बात को ख़ुशी-ख़ुशी सहन कर लोगे—और इस प्रकार तुम्हारा प्रेम शुद्ध होगा, और तुम्हारा विश्वास वास्तविक होगा। केवल तभी तुम एक ऐसे व्यक्ति बनोगे जिसे सचमुच परमेश्वर के द्वारा प्रेम किया जाता है, और जिसे सचमुच परमेश्वर के द्वारा सिद्ध बनाया गया है" (मेमने का अनुसरण करना और नए गीत गाना में "यदि तुम परमेश्वर पर विश्वास करते हो, तो उसके सामने अपने हृदय को अर्पित कर")। परमेश्‍वर की प्रबुद्धता ने मुझे उसकी इच्‍छा को समझने में सक्षम बनाया, और उसने मुझे अक्षय आस्‍था और शक्ति भी प्रदान की। मैंने फिर से परमेश्‍वर से प्रार्थना की: "हे परमेश्‍वर! मेरा विश्‍वास है कि आज मेरे साथ जो कुछ भी हो रहा है वह सब तेरी सहमति से हो रहा है, और इस सब कुछ के पीछे तेरी भली इच्छा है, इन दैत्‍यों द्वारा किये जा रहे कृत्‍यों के माध्‍यम से मैं अन्‍तत: देख रही हूँ कि सीसीपी सरकार के अधीन कार्यरत क़ानून का पालन कराने वाली एजेंसियाँ हिंसक संस्‍थाएँ हैं और मैं उनके सामने आत्‍मसमर्पण नहीं कर सकती। मैं तो सिर्फ़ तुझे अपना हृदय सौंपना चाहती हूँ और तेरे पक्ष में बनी रहना चाहती हूँ। हे परमेश्‍वर! मैं जानती हूँ कि सिर्फ़ इस तरह की परीक्षाओं और शुद्धिकरण के अनुभव के माध्‍यम से ही तेरे प्रति मेरा प्रेम मजबूत हो सकता है। अगर आज शैतान मेरी जान भी ले ले, तब भी मैं शिकायत का एक शब्‍द भी मुँह से नहीं निकालूँगी। तेरी गवाही देने के काबिल होना एक रचित प्राणी के रूप में मेरा सम्‍मान है। अतीत में मैंने अपने कर्तव्‍य का ठीक से पालन नहीं किया और मैं तेरी बहुत ज्‍़यादा ऋणी हूँ। आज तेरी खातिर मर जाने का अवसर मिलना सबसे अधिक सार्थक है। मैं तेरी आज्ञा का पालन करने की कामना करती हूँ!" इस प्रार्थना के बाद मैंने बहुत प्रेरित महसूस किया, और मुझे लगा कि परमेश्‍वर का अनुसरण करने की खातिर इस पीड़ा को सहना बहुत ही सार्थक है, और अगर मैं इस कारण मर भी जाती हूँ तो यह मौत भी मूल्‍यवान है!

लगभग 10-15 मिनट के बाद एक महिला पुलिस अधिकारी आई, उसने मुझे सहारा देकर बैठाया, और दयालुता का ढोंग करती हुई वह बोली, "ज़रा अपनी उम्र का ख्याल करो, ज़रा सोचो तुम्हारे दोनों बच्‍चे कॉलेज में हैं। क्‍या यह सब भोगने का वाकई कोई मूल्य है? बस हमें उतना भर बता दो जो हम जानना चाहते हैं, फिर तुम तुरन्‍त जा सकती हो।" उसने देखा कि मैंने कोई प्रतिक्रिया नहीं की, इसलिए उसने अपनी बात जारी रखी, "तुम तो एक माँ हो, इसलिए तुम्हें अपने बेटों के बारे में सोचना चाहिए। हम कम्युनिस्ट पार्टी के अधिकार-क्षेत्र में रहते हैं, और सीसीपी सरकार तमाम धार्मिक विश्‍वासों का विरोध और दमन करती है। वह ख़ासतौर से उन लोगों से नफ़रत करती है जो सर्वशक्तिमान परमेश्‍वर में विश्‍वास करते हैं। अगर तुम सरकार के खिलाफ़ के जाने की जिद पर अड़ी रही, तो क्‍या तुम्हें इस बात की चिन्‍ता नहीं है कि तुम्हारे कारण तुम्हारा पूरा परिवार लपेटे में आ जाएगा? किसी मुकाम पर, तुम्हारे माँ-बाप और पति को भी फँसा लिया जाएगा, तुम्हारे बेटे और पोते कभी भी फौज में भर्ती होने, काडर बनने या जन सेवक बनने के बारे में सोच भी नहीं सकेंगे। उनको कोई सुरक्षाकर्मी के रूप में भी नौकरी पर नहीं रखेगा। क्‍या तुम चाहती हो कि तुम्हारे बेटे बड़े होकर महज़ मज़दूर बन कर रह जाएँ, और तुम्हारी तरह मेहनत-मजदूरी करें और अपनी पूरी जिन्‍दगी भर ग़रीब बने रहें?" ठीक जिस वक्‍़त शैतान अपनी चालाक योजनाओं को अंजाम दे रहा था, परमेश्‍वर के ये वचन मेरे दिमाग़ में कौंधे: "संसार में जो कुछ भी होता है, उसमें से ऐसा कुछ भी नहीं है जिस पर अंतिम बात मेरी न हो। ऐसा क्या मौजूद है जो मेरे हाथों में नहीं? जो कुछ मैं कहता हूँ वही होता है, और मनुष्यों के बीच ऐसा कौन है जो मेरे मन को बदल सकता है?" ("वचन देह में प्रकट होता है" में संपूर्ण ब्रह्मांड के लिए परमेश्वर के वचन के "अध्याय 1")। परमेश्‍वर के वचनों ने मुझे शैतान की चालाक योजना की असलियत को समझने की गुंजाइश दी, और मुझे समझ में आ गया कि वे मेरे बच्‍चों के भविष्‍य का लालच देकर मुझ पर बोलने के लिए फुसलाने की कोशिश कर रहे हैं। लेकिन मैं जानती थी कि मनुष्‍य होने के नाते हमारी नियति हमारे हाथों में नहीं है, न ही वो पुलिस के हाथों में है, बल्कि वो परमेश्‍वर के हाथों में है। भविष्‍य में मेरे बच्‍चे जो भी काम करेंगे, वे अमीर होंगे या ग़रीब, यह सब परमेश्‍वर की मरजी पर है। यह सब सोचते हुए मैंने पुलिस के सामने रत्‍ती भर भी लाचार महसूस नहीं किया। परमेश्‍वर के वचनों के मार्गदर्शन ने मुझे इस बात को सच्‍चे अर्थों में समझने दिया कि परमेश्‍वर मेरे साथ है, मेरी रक्षा कर रहा है, और मैं और भी ज़्यादा दृढ़तापूर्वक परमेश्‍वर में भरोसा करने लगी। और इसलिए मैंने अपना सिर एक तरफ़ मोड़ लिया और खामोश बनी रही। उस अधिकारी ने मुझे खरी-खोटी सुनाई और पैर पटकती हुई वहाँ से चली गयी।

शाम ढल रही थी। जब उन्‍होंने देखा कि वे मुझसे या कलीसिया की मेरी बहनों से कुछ भी नहीं उगलवा पा रहे हैं, तो वे हमें काउण्‍टीहिरासत-केन्‍द्र में भेजने के अलावा कुछ न कर सके। लेकिन वहाँ की पुलिस ने कहा कि हमारा मामला बहुत गम्‍भीर है, और इसलिए हमें नगरपालिका के हिरासत-केन्‍द्र में जाना होगा। जब तक हम वहाँ पहुँचे, तब तक रात के 1 बच चुके थे, और मुझे वहाँ सिर्फ़ लोहे की सलाखों से बने एक के बाद एक कई फाटक ही नज़र आ रहे थे – वह सारा माहौल बहुत मनहूस और भयावह लग रहा था। पहले फाटक पर हमें अपने बदन से एक-एक कपड़े को हटाकर अपने शरीर की तलाशी के लिए पेश होना पड़ा। उसके बाद उन्‍होंने मेरे सारे बटन और जिपर काट डाले और मुझे फटे-चिथे कपड़े पहनने पड़े; मैं खुद को किसी भिखारी जैसा महसूस कर रही थी। दूसरे फाटक पर हमारी शारीरिक जाँच की गयी। उन्‍होंने मेरे पैरों पर पुलिस द्वारा पीटे जाने की वजह से आए घाव देखे और यह भी देखा कि मुझे चलने में कठिनाई हो रही थी, लेकिन वे महज़ घूरते रहे और झूठ बोलने लगे "यह सब पूरी तरह सामान्‍य है। चिन्‍ता की कोई बात नहीं है।" जेल की नियमावली में साफ़ तौर पर कहा गया है कि अगर शारीरिक परीक्षण के दौरान किसी तरह की बीमारी या घाव का पता चले तो चिकित्‍सा की व्‍यवस्‍था की जानी चाहिए, लेकिन असलियत में उनको इसकी कोई परवाह नहीं होती कि क़ैदी जीवित रहते हैं या मरते हैं। उन्‍होंने मुझसे व्‍यंगात्‍मक ढंग से कहा, "सर्वशक्तिमान परमेश्‍वर में विश्‍वास करने वाले तुम लोगों की रक्षा तो परमेश्‍वर करता है। तुम इससे निपट सकते हो।" मुझे एक कोठरी में ले जाया गया और एक क़ैदी चादर से अपना सिर निकाल कर चिल्‍लायी, "अपने सारे कपड़े उतार दे!" मैंने उससे अनुरोध किया कि वह मेरे अंदर के कपड़े न उतरवाये, लेकिन वह मेरी ओर दुर्भावनापूर्वक देख कर हँस दी और बोली, "अगर तू इस जगह आ गयी है, तो तुझे यहाँ के नियम भी मानने पड़ेंगे।" उसके बाद दूसरे सारे क़ैदियों ने अपनी चादरों से सिर निकाले और तमाम तरह की डरावनी आवाज़ें करने लगे। उस महज़ 20 वर्गमीटर के बराबर की कोठरी में अठारह क़ैदी बन्‍द थे: वे नशीले पदार्थों की खरीद-फरोख्‍त करने वाले, हत्‍यारे, गबनकर्ता और चोर थे। "बॉस", यानी गिरोह की मुखिया, का काम लोगों को हर दिन तरह-तरह की सज़ाएँ देना था – वह महज़ मज़े की खातिर लोगों को सताती थी। सुबह, उसकी करीबी सहायिका ने मुझे नियम समझाये और मुझसे कहा कि मुझे दिन में दो बार फर्श पर झाड़ू-पोंछा करना होगा। वह मुझसे कराने के लिए लगातार कोई न कोई काम ढूँढ़ती रहती थी, और उसने मुझसे कहा कि मुझे उत्पादन का अपने हिस्‍सेका काम हमेशा करना होगा और मुझे जल्‍दी–जल्‍दी काम करना होगा, अन्‍यथा मुझे सज़ा दी जाएगी। जेल के सुरक्षाकर्मी भी जंगली पशुओं की तरह व्‍यवहार करते थे और अकारण ही क़ैदियों को पीटते रहते थे। उनमें से एक ने मुझे यह कहते हुए धमकाया कि "यहाँ मेरा हुक्‍म चलता है। अगर तू मेरी शिकायत करेगी तो मुझे इसकी परवाह नहीं। अगर तू चाहे तो जाकर मेरी शिकायत कर, और फिर नतीजा भोगने के लिए तैयार रह! ..." जेल के ये दुराचारी अधिकारी निहायत ही बेलगाम थे। वहाँ दुनिया पैसों के इशारों पर नाचती है, और जब तक आप जेल के अधिकारियों को पैसा खिलाते रहते थे, तब तक आपको "क़ानून" का पालन करने की ज़रूरत नहीं थी। एक क़ैदी किसी अधिकारी की बीवी थी जिसने बड़ी तादाद में पैसा गबन किया था। वह अक्‍सर जेल के सुरक्षाकर्मियों को पैसे देती थी, और वह हर दिन "बॉस" को नाश्‍ते में कुछ तली हुई चीज़ें खरीद कर देती थी। इसके बदले में उसको पूरे दिन कोई काम नहीं पड़ता था, और वह दूसरी क़ैदियों से अपने बर्तन साफ़ कराती थी तथा अपने चादरों की घड़ी करवाती थी। भले ही मैं जेल की इस नारकीय कोठरी में मुझे हर दिन तमाम तरह की दादागिरी और प्रताड़ना बरदाश्‍त करनी पड़ती थी, लेकिन तब भी मेरे लिए राहत देने वाली जो एकमात्र चीज थी वह यह थी कि वहाँ कलीसिया की दो बहनें मेरे साथ थीं। हम एक परिवार की तरह थे। इस मुश्किल वक्‍़त के बीच जब भी कभी हमें मौक़ा मिलता था हम एक दूसरे से मिलती-जुलती थीं; एक दूसरे को सहारा देती थीं, एक दूसरे की मदद करती थीं। हम हर समय परमेश्‍वर पर भरोसा रखते हुए उससे आस्‍था और शक्ति प्रदान करने का अनुरोध करती थीं। हममें से हर एक दूसरों को सहारा देती थी और उनकी मदद करती थी। हम मिलजुल कर यह भयानक समय गुज़ार रहे थे।

हिरासत-गृह में रहने के दौरान मुझसे चार बार और पूछताछ की गयी। इनमें से एक बार मुझसे सवाल पूछने आये आदमियों ने अपना परिचय म्‍यूनिसिपिल पब्लिक सेक्‍युरिटी ब्‍यूरो और नेशनल सेक्‍युरिटी टीम से आये व्‍यक्तियों के रूप में दिया। मैंने मन ही मन सोचा: "म्‍यूनिसिपिल पब्लिक सेक्‍युरिटी ब्‍यूरो से आया व्‍यक्ति निश्‍चय ही आला दर्जे का और मेरे स्‍थानीय पुलिस थाने की पुलिस के मुक़ाबले ज्‍़यादा पढ़ा-लिखा होगा। वे निश्‍चय ही न्‍यायपूर्ण ढंग से क़ानून का पालन कराएँगे।" लेकिन वास्‍तविकता वैसी नहीं थी जैसी मेरी कल्‍पना थी। जैसे ही म्‍यूनिसिपिल पब्लिक सेक्‍युरिटी ब्‍यूरो का यह आदमी कमरे में दाखिल हुआ वह मेज़ पर पैर फैला कर कुर्सी पर पसर गया। उसके पूरे बदन से अहंकार टपक रहा था और उसने मुझ पर अपनी तिरस्कार भरी नज़रें घुमायीं। इसके बाद वह खड़ा हुआ और मेरे पास आया। उसने अपनी सिगरेट का एक लम्‍बा कश खींचा और फिर मेरे चेहरे पर उसका धुआँ उगल दिया। यह देखकर मुझे अन्‍तत: यह बात समझ में आ गयी कि सीसीपी की सारी पुलिस एक जैसी है, और मुझे बरबस ही अपनी इस सोच पर हँसी आ गयी कि यह आदमी अलग किस्‍म का होगा। मैं नहीं जानती थी कि वे मेरे साथ कौन-सी अगली चाल आज़माने की कोशिश करेंगे, इसलिए मैंने मन ही मन परमेश्‍वर से प्रार्थना की: "हे सर्वशक्तिमान परमेश्‍वर। मुझे शैतान को पराजित करने की बुद्धि दे और मुझे तेरी महिमा को बढ़ाने तथा तेरी गवाही देने में सक्षम बना!" तभी नेशनल सेक्‍यूरिटी टीम से आये पुलिसवाले ने कहा, "हमें तेरे बारे में पहले से ही सब कुछ पता है। हमारे साथ सहयोग करेगी, तो हम तुझे यहाँ से जाने देंगे।" मैंने उसकी ओर नज़र डाली और उदास ढंग से हँस दी। यह सोचकर कि मैं समझौते के लिए इच्‍छुक हूँ, उन्‍होंने कहा, "क्‍या तू अब सहयोग के लिए तैयार है?" मैंने जवाब दिया, "मुझे जो कुछ कहने की ज़रूरत थी वह मैं बहुत पहले ही कह चुकी हूँ।" इससे उन दुराचारी पुलिसवालों का गुस्‍सा तुरन्‍त भड़क उठा, और वे मुझ पर गंदे-गंदे शब्‍दों की बौछार करने लगे। "हम तुझे बाहर निकलने का एक इज्ज़त भरा रास्‍ता मुहैया कराने की कोशिश कर रहे हैं और तू मना कर रही है! अगर तूने आज मुँह नहीं खोला, तो तेरे लिए हमारे पास समय की कोई कमी नहीं है। मैं तेरे बेटों को स्‍कूल से बाहर कर दूँगा और पक्का करूँगा कि वे अपनी पढ़ाई पूरी न कर पाएँ।" इसके बाद उन्‍होंने मेरा सेलफ़ोन निकाला और मुझे धमकाते हुए कहा, "तेरे सिम कार्ड में ये किसके नम्‍बर हैं? अगर आज ही तूने हमें नहीं बताया तो तुझे सात या आठ साल की सज़ा मिलेगी। हम तुझ पर दूसरे क़ैदियों से लगातार अत्‍याचार कराएँगे, और तू मरने को तरसेगी!" जवाब देने के लिए मुझ पर बहुत दबाव डालने का कोई फ़र्क नहीं पड़ा, मैंने कोई प्रतिक्रिया नहीं की। मैंने खौफ़ तक महसूस नहीं किया, क्‍योंकि मुझे बहुत अन्‍दर से परमेश्‍वर के ये वचन प्रबुद्ध कर रहे थे: "क्योंकि बचाए जाने और जीवित रहने के लिए तुम्हें ऐसे दुखों का सामना करना ही होगा, और यह पूर्वनिर्धारित है। इसलिए इस दुख का तुम्हारे पर आ पड़ना तुम्हारे लिए आशीर्वाद है। ... इसके पीछे का अर्थ बहुत गहन है, बहुत महत्वपूर्ण है" ("मसीह की बातचीतों के अभिलेख" में "पवित्र आत्मा के कार्य को गँवा चुके अधिकांश लोग जोखिम में हैं")। पूछताछ का वह दौर ढाई घण्‍टे तक जारी रहा। जब उन्‍होंने देखा कि उनको मुझसे कुछ भी हासिल नहीं हुआ, तो उन्‍होंने मुझे और भी धमकियाँ दीं और फिर लटका हुआ चेहरा लिये वहाँ से चले गये।

6 जनवरी 2013 को पुलिस ने एक अलग दाँव खेला और बोले कि वे मुझे घर ले जा रहे हैं। उन्‍होंने मुझे क़ैदियों की वर्दी पहना दी और हथक‍ड़ियाँ डाल दीं, और फिर मुझे जेल की गाड़ी से स्‍थानीय पुलिस थाने में वापस ले जाया गया। जब मैं वहाँ पहुँची, तो मुझे बताया गया कि उन्‍होंने मेरे बेटों और सास-ससुर को ढूँढ़ निकाला है। उन्होंने हमारे घर की तलाशी ली थी, और आसपास पूछताछ करके इस बात की खासी जानकारी हासिल कर ली थी कि मैं पिछले कुछ सालों से क्‍या करती रही थी। वहाँ के एक पुलिसवाले ने कहा, "हम इस औरत की सालों से तलाश करते रहे थे और उसको कभी पकड़ नहीं पाये थे। जब इसका पति मर गया, तो यह सिर्फ़ एक रात ही घर पर रुकी थी। हमने इसके मकान पर इसका इन्‍तज़ार करते हुए कई दिन बरबाद किये। जब इसके बेटे के दिल का ऑपरेशन हुआ, तो हम इसको पकड़ने अस्‍पताल गये, लेकिन वह वहाँ कभी नहीं दिखी। वह परमेश्‍वर में इतना ज़बरदस्‍त विश्‍वास करती है कि उसने अपने पूरे परिवार को ही छोड़ दिया है। अब जबकि वह हमारे कब्‍ज़े में है, हम हमेशा हमेशा के लिए इसका निपटारा कर देंगे!" जब मैंने उसको यह कहते सुना तो मेरा हृदय विह्वल होकर पुकार उठा: "ऐसा कब हुआ जब मैं घर नहीं जाना चाहती रही थी? मेरे पति की मृत्‍यु से मैं सदमे में आ गयी थी, और जब मेरे बेटे का दिल का ऑपरेशन हुआ था तब मैं हद से ज़्यादा परेशान थी। अपने बेटे के साथ होने की मेरी बहुत इच्‍छा थी। ऐसा नहीं था कि मैंने उनको त्‍याग दिया था, बात यह थी कि सीसीपी सरकार मुझ पर निरन्‍तर अत्‍याचार कर रही थी, मेरे पीछे पड़ी हुई थी, जिससे मेरा घर लौटना असम्‍भव हो गया था!" राजमार्ग पर गाड़ी मेरे घर की ओर भागी जा रही थी, मैं अन्‍दर ही अन्‍दर रोये जा रही थी। मैं परमेश्‍वर से अविराम प्रार्थना कर रही थी: "हे परमेश्‍वर! मैं सीसीपी सरकार के अत्‍याचार की वजह से वर्षों से अपने घर से दूर रही हूँ। मैं जल्‍दी ही अपने परिवार से मिलूँगी, और मुझे डर है कि जब मैं उन लोगों से मिलूँगी, तो मैं कमज़ोर पड़ जाऊँगी और मैं शैतान की चालाक योजनाओं की शिकार हो जाऊँगी। मेरी मदद कर और मुझे इतनी शक्ति दे कि मैं शैतान के सामने भी परमेश्‍वर के वफादार व्यक्ति की गरिमा के साथ तन कर रह सकूँ। वे मुझे बेवकूफ़ न बना पाएँ। मैं तो तुझे सन्‍तुष्‍ट करने के लिए सिर्फ़ तेरी गवाही देते रहने की याचना करती हूँ!" जब मेरी प्रार्थना समाप्‍त हो गयी, तो मैंने काफी तनाव-मुक्‍त अनुभव किया और मुझे एक मुक्ति का अहसास हुआ। मैं जानती थी कि यह परमेश्‍वर था जो मेरे साथ था और मुझे शक्ति प्रदान कर रहा था। जब हम लगभग मेरे घर के क़रीब पहुँच गये, तो पुलिस ने गाड़ी राजमार्ग के एक किनारे खड़ी कर दी। वे मुझे क़ैदी की वर्दी और हथक‍ड़ियां पहनाकर मेरे घर की ओर ले गये। मेरे सारे पड़ोसी दूर खड़े मुझे ताक रहे थे और मेरी तरफ़ इशारे कर रहे थे; मैं सुन पा रही थी कि वे मेरी पीठ पीछे मेरी बेइज्‍़ज़ती कर रहे थे और मेरा मज़ाक उड़ा रहे थे। जब हम उस फाटक के अन्‍दर घुसे जो आँगन की ओर खुलता था, तो मुझे तुरन्‍त वहाँ कपड़े धोता हुआ अपना बेटा दिखा। उसने मेरे अन्‍दर आने की आहट सुन ली थी लेकिन तब भी सिर नहीं उठाया, और मैं समझ गयी कि वह मुझसे नफ़रत करता था। मेरे सास-ससुर के बाल सफ़ेद हो गये थे, मेरी सास ने बाहर आकर उन दुराचारी अधिकारियों को नमस्‍कार किया, लेकिन उसके बाद वे खामोश बनी रहीं। एक दुराचारी पुलिसवाले ने पूछा, "क्‍या यह औरत तुम्‍हारी बहू है?" मेरी सास ने हल्‍के-से सिर हिला दिया। उसके बाद उसने मेरे ससुर को धमकाते हुए कहा, "अगर यह हमारे साथ सहयोग नहीं करेगी, तो हमें स्‍कूल को फ़ोन करना पड़ेगा और बहुत जल्‍दी इसके बेटे वहाँ से निकाल बाहर कर दिये जाएँगे। हम तुम्‍हारे सामाजिक सुरक्षा भुगतान और उनके साथ वे सारी सुविधाएँ तक रद्द कर देंगे जो तुम लोग प्राप्‍त करते हो।" जब उसने मेरे बूढ़े सास-ससुर को धमकाया, तो उनके चेहरे पीले पड़ गये, और बोलते समय उनकी आवाज़ काँपने लगी। उन्‍होंने फ़ौरन उसे बताया कि मैं छह-सात वर्षों से घर से दूर रही थी और मैं कहीं और अपनी आस्‍थाकी साधना कर रही थी। इस पर पुलिस उन पर गरज पड़ी, "इन तमाम वर्षों में पार्टी और जनता ने तुम लोगों का बहुत अच्‍छी तरह खयाल रखा है। हमें बताओ कि क्‍या कम्युनिस्ट पार्टी अच्छी है?" मेरी सास इस क़दर डरी हुई थीं कि उन्‍होंने तुरन्‍त जवाब दिया, "हाँ, वह अच्‍छी है।" इसके बाद पुलिस ने पूछा, "और क्‍या उसकी मौजूदा नीतियाँ अच्‍छी हैं?" उन्‍होंने जवाब दिया, "हाँ वे अच्‍छी हैं।" पुलिसवाले ने पूछना जारी रखा, "और तुम्‍हारे परिवार में जो तबाहियाँ हुई हैं, साथ ही" "तुम्‍हारे बेटे की मौत, क्‍या ये सब तुम्‍हारी बहू की वजह से नहीं हुई हैं? क्‍या यह तुम्‍हारे परिवार की बदकिस्‍मती लाने वाली नहीं है?" मेरी सास ने अपना सिर झुका कर हल्‍के से हिला दिया। अपनी योजना को कामयाब होते देख पुलिस मुझे खींच कर अन्‍दर ले गयी और मुझे दीवार पर जड़े हुए वे सारे पुरस्‍कार दिखाये जो मेरे बेटे ने जीते थे। उसके बाद उनमें से एक ने श्रेष्‍ठता का दिखावा करते हुए, मेरी तरफ़ अंगुली दिखाकर मुझे धिक्‍कारते हुए कहा, "मुझे अपनी ज़िन्‍दगी में कभी कोई ऐसा इन्‍सान नहीं मिला जिसमें तेरी तरह इन्‍सानियत का अभाव रहा हो। इतना अच्‍छा बेटा और तू उसको छोड़कर परमेश्‍वर में विश्‍वास करने के लिए भाग खड़ी हुई! ऐसा करके तुझे क्‍या हासिल हुआ?" दीवार को ढँके उन सारे पुरस्‍कारों को देखते हुए जो मेरे बेटे ने जीते थे, मेरे मन में यह खयाल आया कि किस तरह मेरी आस्‍था आज उसकी पढ़ाई पर बुरा असर डाल रही है, और किस तरह मेरे सास-ससुर को डराया-धमकाया जा रहा है – मेरा पूरा परिवार बिखर गया था। लेकिन इस सब की वजह कौन था? क्‍या यह महज़ मेरी आस्‍था की वजह से हुआ? परमेश्‍वर में मेरा विश्‍वास सत्‍य की खोज करना और जीवन में सही रास्‍ते पर चलना है। इसमें ग़लत क्‍या है? अगर सीसीपी सरकार मेरा पीछे न पड़ी होती और मुझ पर अत्‍याचार न कर रही होती, तो क्‍या मैं उन तमाम वर्षों तक अपने घर से दूर, छिपकर रही होती? तब भी वे मुझ पर अपने परिवार की चिन्‍ता न करने और अपना जीवन न जीने का झूठा आरोप लगा रहे हैं। क्‍या इस तरह वे साफ़ तौर पर तथ्‍यों को तोड़-मरोड़ नहीं रहे हैं और सत्‍य को उलट नहीं रहे हैं? ठीक उसी क्षण, शैतान के इन दैत्‍यों के प्रति मेरी जो अंदरूनी नफ़रत थी, वो भड़क उठी और मेरे भीतर से ज्‍वालामुखी की तरह फट पड़ने को हुई – मैं ज़ोर से चिल्‍लाना चाहती थी: "शैतान के दैत्‍यो! मैं तुमसे नफ़रत करती हूँ! मैं तुमसे दिल की गहराई से घृणा करती हूँ! क्‍या ये सीसीपी सरकार का उत्‍पीड़न नहीं था जिसने मुझे उन तमाम वर्षों के दौरान मेरे घर से दूर रखा था? क्‍या मैं अपने बेटे को माँ का प्‍यार और दुलार देने के लिए उसके साथ नहीं होना चाहती थी? क्‍या मैं शान्ति और सुखपूर्वक अपने खुद के परिवार के साथ नहीं रहना चाहती थी? और तब भी शैतान के दैत्‍यो, तुम अचानक रूप बदलकर भले मानुष होने का ढोंग कर रहे हो, हमसे बहस कर रहे हो और हमारे परिवार के साथ जो कुछ भी बुरा हुआ है उस सबका दोष परमेश्‍वर के दरवाज़े पर डाल रहे हो, और इस सब कुछ की जिम्‍मेदारी मेरे कन्‍धों पर डाल रहे हो। तुमने वाक़ई सत्‍य को बिल्कुल पलट दिया है और निहायत ही बेवकूफ़ाना बातों की बौछार किये जा रहे हो! दुराचारी आत्‍माओ, तुम बहुत विकृत हो, और तुम सबसे ज्‍़यादा गुनहगार होते हुए भी मासूम होने का नाटक करतेहो। तुम सच्‍चे अर्थों में बदकिस्‍मती लाने वाले ताबीज़ की तरह हो, अपशकुन हो, दुर्भाग्‍य लाने वाले हो! सीसीपी सरकार वह मुख्‍य गुनहगार है जो मेरे परिवार को बरबाद करने के लिए जिम्‍मेदार है! इस देश में रहने वाले लोगों के जीवन में कहने के लिए कौन सा सुख है?" जब उन्‍होंने अपना ढकोसला निपटा लिया, तो वे मेरी ओर देखकर चिल्‍लाये "चलो यहाँ से" और मुझे घर से बाहर निकलने का हुक्‍म दिया। मैं सर्वशक्तिमान परमेश्‍वर की शुक्रगुज़ार हूँ जिसने मेरी रक्षा की और मुझे शैतान की चालाक योजनाओं को समझने में, दुराचारी सीसीपी की प्रतिक्रियावादी दुष्‍टता को साफ़ तौर पर देखने में, और अपनी गवाही के लिए दृढ़ बने रहने में सक्षम बनाया!

12 जनवरी को पुलिस ने मुझसे अन्तिम बार पूछताछ की। दो पुलिसवालों ने एक बार फिर मुझ पर अपने भाई-बहनों के साथ गद्दारी करने के लिए ज़ोर डालने की कोशिश की, लेकिन उनकी तमाम धमकियों और बलप्रयोग के बावजूद, मैंने सिर्फ़ इतना ही कहा कि मैं कुछ नहीं जानती। जब उन्‍होंने मुझे यह कहते सुना कि मैं कुछ नहीं जानती, तो तुरन्‍त ही उनका ग़ुस्‍सा भड़क उठा और उन्‍होंने पागलों की तरह मेरे चेहरे पर ज़ोर के थप्‍पड़ मारने शुरू कर दिये, और मेरे बाल खींचने लगे। वे मेरे दोनों ओर खड़े हुए थे, मुझे इस तरफ़ से उस तरफ़ धकेल रहे थे और मेरे पैरों पर भरसक ज़ोर की ठोकरें मार रहे थे। उसके बाद वे ताँबे की एक छड़ से मेरे सिर पर प्रहार करते हुए चिल्‍लाये, "क्‍या तू सोचती है कि मैं तुझे मारूँगा नहीं? वैसे भी तू इसके बारे में क्‍या कर सकती है? देखते हैं तू कितनी मजबूत है!" तेरी शुक्रगुज़ार हूँ सर्वशक्तिमान परमेश्‍वर कि तूने मेरी रक्षा की। हालाँकि उन्‍होंने मुझे इस क़दर यातना दी, लेकिन मुझे सिर्फ़ अपने शरीर के सुन्‍न होते जाने की ही अनुभूति हुई; मुझे बहुत कम दर्द महसूस हुआ। वे दो दुराचारी पुलिसवाले मुझे चार घण्‍टे तक यातना देते रहे, वे तब तक नहीं रूके जब तक कि वे पूरी तरह से थक कर चूर और पसीना-पसीना नहीं हो गये। वे हाँफते हुए एक सोफ़े पर बैठ गये और बोले, "ठीक है, तू देखती जा अब तेरा बाक़ी का जीवन जेल में गुज़रेगा। उसके बाद तू दोबारा कभी आज़ाद नहीं होगी, भले ही तू मर क्‍यों न जाए!" जब मैंने उनको यह कहते सुना, तो मैंने कुछ भी महसूस नहीं किया, क्‍योंकि मैं पहले ही अपना दिल कड़ा कर चुकी थी और कसम खा चुकी थी कि मेरी जान भी चले जाये तो भी मैं इन दैत्‍यों के सामने नहीं झुकूँगी। मैंने मन ही मन परमेश्‍वर से प्रार्थना की: "हे परमेश्‍वर, मैं खुद को तेरे प्रति समर्पित करना चाहती हूँ। अगर यह दुराचारी पुलिस मुझे बाक़ी के जीवन के लिए मुझे जेल में बन्‍द भी कर देती है, तब भी मैं अन्‍त तक तेरा अनुसरण करती रहूँगी। अगर मुझे नर्क में भी डाल दिया जाए, तब भी मैं तेरी स्‍तुति करती रहूँगी!" जब मैं वापस अपनी कोठरी में पहुँची, तो मुझे पूरी उम्‍मीद थी कि मुझे अब बाक़ी जीवन भर के लिए जेल भेज दिया जाएगा, इसलिए मुझे आश्‍चर्य हुआ जब परमेश्‍वर ने मेरे लिए इस मुश्किल परिस्थिति से बाहर निकलने का एक रास्‍ता खोल दिया। 16 जनवरी की दोपहर, पुलिस ने मुझ पर बिना कोई आरोप लगाये मुझे जाने दिया।

यह हृदयविदारक अनुभव एक ऐसे दु:स्‍वप्‍न की तरह था जिसकी ओर मुड़ कर देखना मैं सह नहीं सकती। अपने सबसे भयावह सपनों के दौरान भी मैं कभी यह कल्‍पना नहीं कर सकती थी कि मेरे जैसी एक साधारण औरत महज़ परमेश्‍वर में विश्‍वास करने के नाते पुलिस की "दिलचस्‍पी का विषय" बन जाएगी, या मुझे सीसीपी सरकार की एक दुश्‍मन की तरह देखा जाएगा और इस तरह के जान के ख़तरे में डाल दिया जाएगा। एक बार, एक पूछताछ के दौरान, मैंने उनसे पूछा था, "मैंने क्‍या ग़लती की है? मैंने कौन-सा क़ानून तोड़ा है? मैंने पार्टी या लोगों के खिलाफ़ क्‍या कहा है? मुझे गिरफ़्तार क्‍यों किया गया है?" पुलिसवाले मेरे सवालों का जवाब देने में असमर्थ थे, इसलिए वे सिर्फ़ मुझ पर चिल्‍लाये, "तू चोरी और डकैती कर सकती है, तू हत्‍या और आगजनी कर सकती है, और तू अपना शरीर बेच सकती है, हमें परवाह नहीं है। लेकिन परमेश्‍वर में विश्‍वास करके तू खुद को पार्टी के खिलाफ़ खड़ा कर रही है, और तुझे सज़ा मिलनी चाहिए!" इस तरह के कठोर, अत्‍याचारी, सच्चाई को तोड़ने-मरोड़ने वाले शब्‍द उस दैत्‍य के मुँह से सीधे-सीधे निकले थे! परमेश्‍वर में विश्‍वास करना और परमेश्‍वर की आराधना करना एक अटल सिद्धान्‍त है; यह स्वर्ग की इच्‍छा के अनुरूप है और लोगों के दिलों की सहमति में है। सीसीपी सरकार परमेश्‍वर का प्रतिरोध करती है, और लोगों को सच्‍चे मार्ग पर चलने से रोकती है। इसकी बजाय, वह अपने शिकारों पर आरोप लगाती है और बेशर्मी के साथ दावा करती है कि हम उसके दुश्‍मन हैं। ऐसा करते हुए वह अपने राक्षसी तत्‍व को पूरी तरह से उजागर करती है! सीसीपी सरकार न सिर्फ़ निरंकुश ढंग से परमेश्‍वर के कामों का प्रतिरोध करती है और आस्‍थावानों को गिरफ़्तार करती है, बल्कि वह लोगों को छलने के उद्देश्‍य से अफ़वाहें भी गढ़ती है ताकि हर कोई उसके झूठों पर विश्‍वास करे और परमेश्‍वर का तिरस्‍कार करे, परमेश्‍वर का प्रतिरोध करे; वह लोगों के सच्‍ची मुक्ति प्राप्‍त करने के अवसरों को भी नष्‍ट करती है। सीसीपी सरकार ने जो दुराचार किये हैं वे इतने सारे हैं कि उनकी फेहरिस्‍त नहीं बनायी जा सकती, और वो मनुष्‍य और परमेश्‍वर, दोनों के कोप की भागी है! उन राक्षसों द्वारा दिये गये दुख से गुज़रने के बाद, मैंने पूरी स्पष्टता के साथ सीसीपी सरकार के उस परमेश्‍वर-विरोधी, प्रतिक्रियावादी तत्‍व को देख लिया है जो परमेश्‍वर की इच्‍छा के विपरीत काम करता है, और मैंने सच्‍चे अर्थों में परमेश्‍वर के प्रेम और वात्‍सल्‍य को अनुभव कर लिया है। मैंने देखा है कि सुन्‍दरता और भलाई परमेश्‍वर का सत्‍व है; हर बार जब भी मैं सबसे ज्‍़यादा पीड़ा की हालत में रही या मैंने स्‍वयं को असहनीय दुख की अवस्‍था में पाया, परमेश्‍वर के वचन मेरे भीतर मौजूद रहे थे, उन्होंने मुझे राह दिखायी और प्रबुद्ध किया, मुझे शक्ति और आस्‍था प्रदान की, और मुझे शैतान की चालाक योजनाओं को समझने और दृढ़ रुख अपनाने में सक्षम बनाया। मैंने वास्‍तव में परमेश्‍वर की उपस्थिति और मार्गदर्शन को अनुभव किया था, और सिर्फ़ तभी मैं हर मुश्किल पर विजय पा सकी और अपनी गवाही देते हुए दृढ़तापूर्वक खड़ी रह सकी – परमेश्‍वर का प्रेम इतना महान है! इस दिन के बाद से मैं परमेश्‍वर के प्रेम का प्रतिदान करने के लिए अपना सब कुछ समर्पित कर दूँगी, और मैं सत्‍य को हासिल करने और एक सार्थक जीवन जीने की कोशिश करूँगी।

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