1. परमेश्वर सृष्टि का प्रभु है, उसका अधिकार अद्वितीय है

परमेश्वर के प्रासंगिक वचन :

परमेश्वर सभी चीज़ों की सृष्टि करने के लिए वचनों को प्रयोग करता है

उत्पत्ति 1:3-5 जब परमेश्‍वर ने कहा, "उजियाला हो," तो उजियाला हो गया। और परमेश्‍वर ने उजियाले को देखा कि अच्छा है; और परमेश्‍वर ने उजियाले को अन्धियारे से अलग किया। और परमेश्‍वर ने उजियाले को दिन और अन्धियारे को रात कहा। तथा साँझ हुई फिर भोर हुआ। इस प्रकार पहला दिन हो गया।

उत्पत्ति 1:6-7 फिर परमेश्‍वर ने कहा, "जल के बीच एक ऐसा अन्तर हो कि जल दो भाग हो जाए।" तब परमेश्‍वर ने एक अन्तर बनाकर उसके नीचे के जल और उसके ऊपर के जल को अलग अलग किया; और वैसा ही हो गया।

उत्पत्ति 1:9-11 फिर परमेश्‍वर ने कहा, "आकाश के नीचे का जल एक स्थान में इकट्ठा हो जाए और सूखी भूमि दिखाई दे," और वैसा ही हो गया। परमेश्‍वर ने सूखी भूमि को पृथ्वी कहा, तथा जो जल इकट्ठा हुआ उसको उसने समुद्र कहा: और परमेश्‍वर ने देखा कि अच्छा है। फिर परमेश्‍वर ने कहा, "पृथ्वी से हरी घास, तथा बीजवाले छोटे छोटे पेड़, और फलदाई वृक्ष भी जिनके बीज उन्हीं में एक एक की जाति के अनुसार हैं, पृथ्वी पर उगें," और वैसा ही हो गया।

उत्पत्ति 1:14-15 फिर परमेश्‍वर ने कहा, "दिन को रात से अलग करने के लिये आकाश के अन्तर में ज्योतियाँ हों; और वे चिह्नों, और नियत समयों और दिनों, और वर्षों के कारण हों; और वे ज्योतियाँ आकाश के अन्तर में पृथ्वी पर प्रकाश देनेवाली भी ठहरें," और वैसा ही हो गया।

उत्पत्ति 1:20-21 फिर परमेश्‍वर ने कहा, "जल जीवित प्राणियों से बहुत ही भर जाए, और पक्षी पृथ्वी के ऊपर आकाश के अन्तर में उड़ें।" इसलिये परमेश्‍वर ने जाति जाति के बड़े बड़े जल-जन्तुओं की, और उन सब जीवित प्राणियों की भी सृष्‍टि की जो चलते फिरते हैं जिन से जल बहुत ही भर गया, और एक एक जाति के उड़नेवाले पक्षियों की भी सृष्‍टि की: और परमेश्‍वर ने देखा कि अच्छा है।

उत्पत्ति 1:24-25 फिर परमेश्‍वर ने कहा, "पृथ्वी से एक एक जाति के जीवित प्राणी, अर्थात् घरेलू पशु, और रेंगनेवाले जन्तु, और पृथ्वी के वनपशु, जाति जाति के अनुसार उत्पन्न हों," और वैसा ही हो गया। इस प्रकार परमेश्‍वर ने पृथ्वी के जाति जाति के वन-पशुओं को, और जाति जाति के घरेलू पशुओं को, और जाति जाति के भूमि पर सब रेंगनेवाले जन्तुओं को बनाया: और परमेश्‍वर ने देखा कि अच्छा है।

पहले दिन, परमेश्वर के अधिकार के कारण, मानव-जाति के दिन और रात उत्पन्न हुए और स्थिर बने हुए हैं

आओ, हम पहले अंश को देखें : "जब परमेश्‍वर ने कहा, 'उजियाला हो,' तो उजियाला हो गया। और परमेश्‍वर ने उजियाले को देखा कि अच्छा है; और परमेश्‍वर ने उजियाले को अन्धियारे से अलग किया। और परमेश्‍वर ने उजियाले को दिन और अन्धियारे को रात कहा। तथा साँझ हुई फिर भोर हुआ। इस प्रकार पहला दिन हो गया" (उत्पत्ति 1:3-5)। यह अंश सृष्टि की शुरुआत में परमेश्वर के पहले कार्य का विवरण देता है, और पहला दिन जिसे परमेश्वर ने गुज़ारा, उसमें एक शाम और एक सुबह थी। पर वह एक असाधारण दिन था : परमेश्वर ने सभी चीज़ों के लिए उजाला तैयार करना शुरू किया, और इतना ही नहीं, उजाले को अँधेरे से अलग किया। इस दिन, परमेश्वर ने बोलना शुरू किया, और उसके वचन और अधिकार साथ-साथ मौजूद रहे। उसका अधिकार सभी चीज़ों के बीच दिखाई देने लगा, और उसके वचनों के परिणामस्वरूप उसका सामर्थ्‍य सभी चीज़ों में फैल गया। इस दिन से परमेश्वर के वचनों, परमेश्वर के अधिकार, और परमेश्वर के सामर्थ्‍य के कारण सभी चीज़ें बन गई और स्थिर हो गईं, और उन्होंने परमेश्वर के वचनों, परमेश्वर के अधिकार, और परमेश्वर के सामर्थ्‍य की वजह से काम करना शुरू कर दिया। जब परमेश्वर ने ये वचन कहे "उजियाला हो," तो उजियाला हो गया। परमेश्वर कार्यों के किसी क्रम में शामिल नहीं हुआ; उजाला उसके वचनों के परिणामस्वरूप प्रकट हुआ था। इस उजाले को परमेश्वर ने दिन कहा, जिस पर आज भी मनुष्य अपने अस्तित्व के लिए निर्भर रहता है। परमेश्वर की आज्ञा से उसका सार और मूल्य कभी नहीं बदले, और वह कभी ग़ायब नहीं हुआ। उसका अस्तित्व परमेश्वर के अधिकार और सामर्थ्‍य को दर्शाता है, और सृष्टिकर्ता के अस्तित्व की घोषणा करता हैकरता है। यह सृष्टिकर्ता की पहचान और हैसियत की बारंबार पुष्टि करता है। यह अमूर्त या आभासी नहीं, बल्कि वास्तविक प्रकाश है, जिसे मनुष्य द्वारा देखा जा सकता है। उस समय के बाद से इस खाली संसार में, जिसमें "पृथ्वी बेडौल और सुनसान पड़ी थी, और गहरे जल के ऊपर अन्धियारा था," पहली भौतिक चीज़ पैदा हुई। यह चीज़ परमेश्वर के मुँह से निकले वचनों से आई, और परमेश्वर के अधिकार और कथनों के कारण सभी चीज़ों की सृष्टि के पहले कार्य में दिखाई दी। इसके तुरंत बाद, परमेश्वर ने उजाले और अँधेरे को अलग-अलग-अलग होने की आज्ञा दी...। परमेश्वर के वचनों के कारण हर चीज़ बदल गई और पूर्ण हो गई...। परमेश्वर ने उजाले को "दिन" कहा और अंअँधेरे को उसने "रात" कहा। उस समय, संसार में, जिसे परमेश्वर सृजित करना चाहता था, पहली शाम और पहली सुबह उत्पन्न की गईं, और परमेश्वर ने कहा कि यह पहला दिन है। सृष्टिकर्ता द्वारा सभी चीज़ों की सृष्टि का यह पहला दिन था, और यह सभी चीज़ों की सृष्टि का प्रारंभ था, और यह पहली बार था, जब सृष्टिकर्ता का अधिकार और सामर्थ्‍य उसके द्वारा सृजित इस इस संसार में दिखाया गया था।

इन वचनों के माध्यम से मनुष्य परमेश्वर और उसके वचनों के अधिकार, और साथ ही परमेश्वर के सामर्थ्‍य को देखने में सक्षम हुआ। चूँकि केवल परमेश्वर के पास ही ऐसा सामर्थ्‍य है, अत: केवल परमेश्वर के पास ही ऐसा अधिकार है; चूँकि परमेश्वर के पास ही ऐसा अधिकार है, अत: केवल परमेश्वर के पास ही ऐसा सामर्थ्‍य है। क्या किसी मनुष्य या वस्तु के पास ऐसा अधिकार और सामर्थ्‍य हो सकता है? क्या तुम लोगों के दिल में इसका कोई उत्तर है? परमेश्वर को छोड़, क्या किसी सृजित या गैर-सृजित प्राणी के पास ऐसा अधिकार है? क्या तुम लोगों ने किसी पुस्तक या प्रकाशन में कभी ऐसी चीज़ का उदाहरण देखा है? क्या ऐसा कोई अभिलेख है कि किसी ने स्वर्ग और पृथ्वी और सभी चीज़ों की सृष्टि की हो? यह किसी अन्य पुस्तक या अभिलेखों में नहीं पाया नहीं जाता; निस्संदेह, ये परमेश्वर द्वारा दुनिया की भव्य सृष्टि के बारे में एकमात्र आधिकारिक और शक्तिशाली वचन हैं, जो बाइबल में दर्ज हैं; ये वचन परमेश्वर के अद्वितीय अधिकार और पहचान के बारे में बताते हैं। क्या इस तरह के अधिकार और सामर्थ्‍य को वे परमेश्वर की अद्वितीय पहचान का प्रतीक कहा जा सकता है? क्या यह कहा जा सकता है कि उन्हें सिर्फ और सिर्फ परमेश्वर ही धारण करता है? निस्संदेह, सिर्फ परमेश्वर ही ऐसा अधिकार और सामर्थ्‍य धारण करता है! यह अधिकार और सामर्थ्य किसी अन्य सृजित या गैर-सृजित प्राणी द्वारा धारण या प्रतिस्थापित नहीं किया जा सकता! क्या तुम लोगों ने इसे देखा है? इन वचनों से लोग शीघ्रता और स्पष्टता से इस तथ्य को समझ जाते हैं कि परमेश्वर अद्वितीय अधिकार, अद्वितीय सामर्थ्‍य, सर्वोच्च पहचान और हैसियत धारण करता है। उपर्युक्त बातों की संगति से, क्या तुम लोग कह सकते हो कि वह परमेश्वर, जिस पर तुम लोग विश्वास करते हो, अद्वितीय परमेश्वर है?

दूसरे दिन परमेश्वर के अधिकार ने जल का प्रबंध किया और आसमान बनाया तथा मनुष्य के जीवित रहने के लिए जगह बनाई

आओ, हम बाइबल के दूसरे अंश को पढ़ें : "फिर परमेश्‍वर ने कहा, 'जल के बीच एक ऐसा अन्तर हो कि जल दो भाग हो जाए।' तब परमेश्‍वर ने एक अन्तर बनाकर उसके नीचे के जल और उसके ऊपर के जल को अलग अलग किया; और वैसा ही हो गया" (उत्पत्ति 1:6-7)। कौन-से परिवर्तन हुए, जब परमेश्वर ने कहा "जल के बीच एक ऐसा अन्तर हो कि जल दो भाग हो जाए"? पवित्र शास्त्रमें कहा गया है : "तब परमेश्‍वर ने एक अन्तर बनाकर उसके नीचे के जल और उसके ऊपर के जल को अलग अलग किया।" जब परमेश्वर ने ऐसा कहा और किया, तो क्या परिणाम हुआ? इसका उत्तर अंश के आखिरी भाग में हैं : "और वैसा ही हो गया।"

इन दोनों छोटे वाक्यों में एक भव्य घटना दर्ज है, और ये वाक्य एक अद्भुत दृश्य का वर्णन करते हैं—एक जबरदस्त उपक्रम, जिसमें परमेश्वर ने जल को नियंत्रित किया और एक जगह बनाई, जिसमें मनुष्य जीवित रह सके ...

इस तसवीर में, जल और आकाश परमेश्वर की आँखों के सामने तत्क्षण प्रकट होते हैं, और वे परमेश्वर के वचनों के अधिकार द्वारा विभाजित हो जाते हैं, और परमेश्वर द्वारा निर्धारित तरीके से "ऊपर" और "नीचे" के रूप में अलग हो जाते हैं। दूसरे शब्दों में, परमेश्वर द्वारा बनाए गए आकाश ने न केवल नीचे के जल को ढक लिया, बल्कि ऊपर के जल को भी सँभाला...। इसमें मनुष्य कुछ नहीं कर सकता, सिवाय टकटकी लगाकर देखने, भौचक्का होने, और उसके अधिकार की शक्ति और उस दृश्य की भव्यता की तारीफ में ठिठककर रह जाने के, जिसमें सृष्टिकर्ता ने जल को स्थानांतरित किया और उसे आज्ञा दी, और आकाश को बनाया। अपने वचनों और सामर्थ्‍य तथा अधिकार द्वारा परमेश्वर ने एक और महान उपलब्धि हासिल की। क्या यह सृष्टिकर्ता की शक्ति नहीं है? आओ, हम परमेश्वर के कर्मों को स्पष्ट करने के लिए पवित्र शास्त्र का प्रयोग करें : परमेश्वर ने अपने वचन कहे, और परमेश्वर के इन वचनों के कारण जल के मध्य में आकाश बन गया। और उसी समय परमेश्वर के इन वचनों के कारण इस स्थान में एक ज़बरदस्त परिवर्तन हुआ, और यह कोई सामान्य अर्थों में परिवर्तन नहीं था, बल्कि एक प्रकार का प्रतिस्थापन था, जिसमें कुछ नहीं बदलकर कुछ बन गया। यह सृष्टिकर्ता के विचारों से उत्पन्न हुआ था और सृष्टिकर्ता द्वारा बोले गए वचनों के कारण कुछ नहीं से कुछ बन गया, और, इतना ही नहीं, इस बिंदु से आगे यह सृष्टिकर्ता की ख़ातिर अस्तित्व में रहेगा और स्थिर बना रहेगा, और सृष्टिकर्ता के विचारों के अनुसार स्थानांतारित, परिवर्तित और नवीकृत होगा। यह अंश संपूर्ण संसार की सृष्टि में सृष्टिकर्ता के दूसरे कार्य का वर्णन करता है। यह सृष्टिकर्ता के अधिकार और सामर्थ्‍य की दूसरी अभिव्यक्ति और सृष्टिकर्ता का एक और अग्रणी उपक्रम था। यह दिन जगत की नींव रखने के सृष्टिकर्ता द्वारा बिताया गया दूसरा दिन था, और यह उसके लिए एक और अद्भुत दिन थाः वह उजाले के बीच में चला, आकाश को लाया, उसने जल का प्रबंध और नियंत्रण किया और उसके कार्य, उसका अधिकार और उसका सामर्थ्‍य एक नए दिन के काम में लग गए ...

क्या परमेश्वर के द्वारा अपने वचन कहे जाने से पहले जल के मध्य में आकाश था? बिलकुल नहीं! और परमेश्वर के यह कहने के बाद क्या हुआ "जल के बीच एक अन्तर हो जाए"? परमेश्वर द्वारा इच्छित चीज़ें प्रकट हो गईं; जल के मध्य में आकाश उत्पन्न हो गया, और जल विभाजित हो गया, क्योंकि परमेश्वर ने कहा "इस अंतर के कारण जल दो भाग हो जाए।" इस तरह से, परमेश्वर के वचनों का अनुसरण करके, परमेश्वर के अधिकार और सामर्थ्‍य के परिणामस्वरूप दो नए पदार्थ, दो नई जन्मी चीज़ें सभी चीज़ों के मध्य प्रकटहो गईं। इन दो नई चीज़ों के प्रकटीकरण से तुम लोग कैसा महसूस करते हो? क्या तुम लोग सृष्टिकर्ता के सामर्थ्‍य की महानता महसूस करते हो? क्या तुम लोग सृष्टिकर्ता का अद्वितीय और असाधारण बल महसूस करते हो? इस बल और सामर्थ्‍य की महानता परमेश्वर के अधिकार के कारण है, और यह अधिकार स्वयं परमेश्वर का प्रतिनिधित्व करता है और स्वयं परमेश्वर की एक अद्वितीय विशेषता है।

क्या यह अंश तुम लोगों को एक बार और परमेश्वर की अद्वितीयता का गहरा बोध कराता है? वास्तव में यह पर्याप्त से बहुत कम है; सृष्टिकर्ता का अधिकार और सामर्थ्‍य इससे कहीं परे है। उसकी अद्वितीयता मात्र इसलिए नहीं है, क्योंकि वह किसी अन्य प्राणी से अलग सार धारण करता है, बल्कि इसलिए भी है कि उसका अधिकार और सामर्थ्‍य असाधारण, असीमित, सर्वोत्कृष्ट है, और इससे भी बढ़कर, उसका अधिकार और उसके सार स्वरूप जीवन की सृष्टि कर सकता है, चमत्कार कर सकता है, और प्रत्येक भव्य और असाधारण मिनट और सेकंड की सृष्टि कर सकता है। साथ ही वह स्वयं द्वारा सृजित जीवन पर शासन करने में सक्षम है और स्वयं द्वारा सृजित चमत्कारों और हर मिनट और सेकंड पर संप्रभुता रखता है।

तीसरे दिन परमेश्वर के वचनों ने पृथ्वी और समुद्रों की उत्पत्ति की, और परमेश्वर के अधिकार ने संसार को जीवन से लबालब भर दिया

आओ, हम उत्पत्ति 1:9–11 का पहला वाक्य पढ़ें : "फिर परमेश्‍वर ने कहा, 'आकाश के नीचे का जल एक स्थान में इकट्ठा हो जाए और सूखी भूमि दिखाई दे।'" परमेश्वर बस इतना कहने के बाद कि, "आकाश के नीचे का जल एक स्थान में इकट्ठा हो जाए और सूखी भूमि दिखाई दे।" क्या परिवर्तन हुए? और उजाले और आकाश के अलावा इस जगह पर क्या था? पवित्र शास्त्र में लिखा है : "परमेश्‍वर ने सूखी भूमि को पृथ्वी कहा, तथा जो जल इकट्ठा हुआ उसको उसने समुद्र कहा: और परमेश्‍वर ने देखा कि अच्छा है।" दूसरे शब्दों में, अब इस जगह में भूमि और समुद्र थे, और भूमि और समुद्र विभाजित हो गए थे। इन नई चीज़ों का प्रकटीकरण परमेश्वर के मुँह से निकली आज्ञा के अनुसरण में हुआ था, "और वैसा ही हो गया।" क्या पवित्र शास्त्र यह वर्णन करता है कि परमेश्वर जब यह सब कर रहा था, तो बहुत व्यस्त था? क्या वह उसके शारीरिक श्रम में संलग्न होने का वर्णन करता है? तो फिर परमेश्वर ने यह कैसे किया गया? परमेश्वर ने इन नई चीज़ों को कैसे उत्पन्न किया? स्वतः स्पष्ट है कि परमेश्वर ने यह सब हासिल करने के लिए, इसकी संपूर्णता सृजित करने के लिए वचनों का प्रयोग किया।

उपर्युक्त तीन अंशों में, हमने तीन बड़ी घटनाओं के घटित होने के बारे में जाना। ये तीन घटनाएँ परमेश्वर के वचनों द्वारा प्रकट हुईं और अस्तित्व में लाई गईं, और उसके वचनों के कारण एक के बाद एक ये घटनाएँ परमेश्वर की आँखों के सामने घटित हो गईं। इस प्रकार यह देखा जा सकता है कि "परमेश्वर कहेगा, और वह पूरा हो जाएगा; वह आज्ञा देगा, और वह बना रहेगा" खोखले वचन नहीं हैं। परमेश्वर के इस सार की पुष्टि तत्क्षण हो जाती है जब वह विचार धारण करता है, और जब परमेश्वर बोलने के लिए अपना मुँह खोलता है, तो उसका सार पूर्णत: प्रतिबिंबित हो जाता है।

आओ, हम इस अंश का अंतिम वाक्य पढ़ें : "फिर परमेश्‍वर ने कहा, 'पृथ्वी से हरी घास, तथा बीजवाले छोटे छोटे पेड़, और फलदाई वृक्ष भी जिनके बीज उन्हीं में एक एक की जाति के अनुसार हैं, पृथ्वी पर उगें,' और वैसा ही हो गया।" जब परमेश्वर बोल रहा था, तो ये सभी चीज़ें परमेश्वर के विचारों का अनुसरण करके अस्तित्व में आ गईं, और एक क्षण में ही, विभिन्न प्रकार के नाजुक छोटे जीवन-रूप डगमगाते हुए मिट्टी से अपने सिर बाहर निकालने लगे, और अपने शरीर से मिट्टी के कण झाड़ने से पहले ही वे एक-दूसरे का अभिनंदन करने लगे तथा सिर हिला-हिलाकर ससार के प्रति मुस्कराने लगे। उन्होंने सृष्टिकर्ता द्वारा स्वयं को प्रदान किए गए जीवन के लिए उसे धन्यवाद दिया, और संसार के सामने घोषणा की कि वे सभी चीज़ों का अंग हैं और उनमें से प्रत्येक प्राणी सृष्टिकर्ता के अधिकार को दर्शाने के लिए अपना जीवन समर्पित करेगा। जैसे ही परमेश्वर ने वचन कहे, भूमि हरी-भरी, हो गई, मनुष्य के काम आ सकने वाला समस्त प्रकार के साग-पात अंकुरित हो गए और जमीन फोड़कर निकल आए, और पर्वत और मैदान वृक्षों एवं जंगलों से पूरी तरह से भर गए...। यह बंजर संसार, जिसमें जीवन का कोई निशान नहीं था, तेजी से प्रचुर घास, साग-पात वृक्षों एवं उमड़ती हुई हरियाली से भर गया...। तथा घास की सुगंध और मिट्टी की महक हवा के माध्यम से फैल गई, और पौधों की कतार हवा के चक्र के साथ मिलकर साँस लेने लगी और उनके बढ़ने की प्रक्रिया शुरू हो गई। उसी समय, परमेश्वर के वचनों के कारण और परमेश्वर के विचारों का अनुसरण करके, सभी पौधों ने अपने शाश्वत जीवन-चक्र शुरू कर दिए, जिनमें वे बढ़ते हैं, खिलते हैं, फलते हैं और अपनी वंश-वृद्धि करते हैं। उन्होंने सख्ती से अपने-अपने जीवन-चक्रों का पालन करना शुरू कर दिया और सभी चीज़ों के मध्य अपनी-अपनी भूमिका निभानी प्रारंभ कर दी...। वे सब सृष्टिकर्ता के शब्दों के कारण पैदा हुए थे और जी रहे थे। वे सृष्टिकर्ता की अनंत आपूर्ति और पोषण प्राप्त करेंगे, और परमेश्वर के अधिकार और सामर्थ्‍य को दर्शाने के लिए हमेशा भूमि के हर कोने में दृढ़ता से जीवित रहेंगे और वे हमेशा सृष्टिकर्ता द्वारा स्वयं को प्रदान की गई जीवन-शक्ति को दर्शाते रहेंगे ...

सृष्टिकर्ता का जीवन असाधारण है, उसके विचार असाधारण हैं, और उसका अधिकार असाधारण है और इसलिए, जब उसके वचन उच्चरित हुए, तो उसका अंतिम परिणाम था "और वैसा ही हो गया।" स्पष्ट रूप से, जब परमेश्वर कार्य करता है, तो उसे अपने हाथों से काम करने की आवश्यकता नहीं होती; वह बस आज्ञा देने के लिए अपने विचारों का और आदेश देने के लिए अपने वचनों का प्रयोग करता है, और इस तरह काम पूरे हो जाते हैं। इस दिन, परमेश्वर ने जल को एक साथ एक जगह पर इकट्ठा किया और सूखी भूमि प्रकट होने दी, जिसके बाद परमेश्वर ने भूमि से घास को उगाया, और बीज उत्पन्न करने वाले पौधे साग-पात और फल देने वाले पेड़ उग गए, और परमेश्वर ने उनकि किस्म के अनुसार वर्गीकृत किया तथा प्रत्येक को अपने खुद के बीज धारण करने के लिए कहा। यह सब परमेश्वर के विचारों और उसके वचनों की आज्ञा के अनुसार साकार हुआ और इस नए संसार में हर चीज़ एक के बाद एक प्रकट होती गई।

अपना काम शुरू करने से पहले ही परमेश्वर के मस्तिष्क में तस्वीर थी, जिसे वह अपने हासिल करना चाहता था, और जब परमेश्वर ने इन चीज़ों को हासिल करना शुरू किया, ऐसा तभी हुआ जब परमेश्वर ने इस तसवीर की विषयवस्तु के बारे में बोलने के लिए अपना मुँह खोला था, तो परमेश्वर के अधिकार और सामर्थ्‍य के कारण सभी चीज़ों में बदलाव आना प्रारंभ हो गया। इस पर ध्यान न देते हुए कि परमेश्वर ने इसे कैसे किया या किस प्रकार अपने अधिकार का इस्तेमाल किया, सब-कुछ परमेश्वर की योजना और उसके वचनों की बदौलत क्रमिक रूप से हासिल होता गया परमेश्वर के वचनों और अधिकार की बदौलत स्वर्ग और पृथ्वी में क्रमिक रूप से बदलाव आते गए। इन सभी बदलावों और घटनाओं ने सृष्टिकर्ता के अधिकार और उसकी जीवन-शक्ति की असाधारणता और महानता को दर्शाया। उसके विचार कोई मामूली विचार या खाली तसवीर नहीं हैं, बल्कि जीवन-शक्ति और असाधारण ऊर्जा से भरे हुए अधिकार हैं, वे ऐसे सामर्थ्‍य हैं जो सभी चीज़ों को परिवर्तित कर सकते हैं, पुनर्जीवित कर सकते हैं, फिर से नया बना सकते हैं और नष्ट कर सकते हैं। इसकी वजह से, उसके विचारों के कारण सभी चीज़ें कार्य करती हैं और उसके मुँह से निकले वचनों के कारण, उसी समय हासिल हो जाती हैं ...

सभी चीजों के प्रकट होने से पहले, परमेश्वर के विचारों में एक संपूर्ण योजना बहुत पहले से ही बन चुकी थी, और एक नया संसार बहुत पहले ही आकार ले चुका था। यद्यपि तीसरे दिन भूमि पर हर प्रकार के पौधे प्रकट हुए, किंतु परमेश्वर के पास इस संसार की सृष्टि के चरणों को रोकने का कोई कारण नहीं था; वह लगातार अपने वचनों को बोलने का इरादा रखता था, ताकि वह हर नई चीज़ की सृष्टि करना जारी रख सके सके। वह बोलता गया, अपनी आज्ञाएँ जारी करता गया, और अपने अधिकार का इस्तेमाल करता गया तथा अपना सामर्थ्‍य दिखाता गया, और उसने सभी चीज़ों और मानव-जाति के लिए, जिनके निर्माण का उसका इरादा था, वह सब-कुछ बनाया, जिनका निर्माण करने की उसने योजना बनाई थी ...

चौथे दिन, जब परमेश्वर एक बार फिर से अपने अधिकार का उपयोग करता है तो मानवजाति के लिए मौसम, दिन, और वर्ष अस्तित्व में आते हैं

सृष्टिकर्ता ने अपनी योजना को पूरा करने के लिए अपने वचनों का इस्तेमाल किया और इस तरह से उसने अपनी योजना के पहले तीन दिन गुज़ारे। इन तीन दिनों के दौरान, परमेश्वर व्यस्त, या खुद को थकाता हुआ दिखाई नहीं दिया; बल्कि इसके विपरीत, उसने अपनी योजना के बेहतरीन तीन पहले दिन गुज़ारे और संसार के विलक्षण रूपान्तरण के महान कार्य को पूरा किया। एक बिलकुल नया संसार उसकी आँखों के सामने प्रकट हुआ और अंश-अंश करके वह ख़ूबसूरत तस्वीर जो उसके विचारों में मुहरबन्द थी, अंततः परमेश्वर के वचनों में प्रगट हो गई। हर नयी चीज़ का प्रकटीकरण एक नवजात बच्चे के जन्म के समान था और सृष्टिकर्ता उस तस्वीर से आनंदित हुआ जो एक समय उसके विचारों में थी लेकिन जिसे अब जीवन्त कर दिया गया था। इस वक्त, उसके दिल को यह देखकर बहुत संतुष्टि मिली, परन्तु उसकी योजना अभी शुरू ही हुई थी। पलक झपकते ही एक नया दिन आ गया था—और सृष्टिकर्ता की योजना में अगला पृष्ठ क्या था? उसने क्या कहा? उसने अपने अधिकार का इस्तेमाल कैसे किया? उस दौरान इस नए संसार में कौन सी नई चीज़ें आईं? सृष्टिकर्ता के मार्गदर्शन का अनुसरण करते हुए, हमारी निगाहें परमेश्वर द्वारा सभी चीज़ों की सृष्टि के चौथे दिन पर आ टिकतीं हैं, एक ऐसा दिन जिसमें एक और नई शुरूआत होने वाली थी। सृष्टिकर्ता के लिए यह निःसन्देह एक और बेहतरीन दिन था, और आज की मानवजाति के लिए यह एक और अति महत्वपूर्ण दिन था। यह निश्चय ही एक बहुमूल्य दिन था। वह इतना बेहतरीन कैसे था, वह इतना महत्वपूर्ण कैसे था और वह इतना बहुमूल्य कैसे था? आओ पहले सृष्टिकर्ता के द्वारा बोले गए वचनों को सुनें ...

"फिर परमेश्‍वर ने कहा, 'दिन को रात से अलग करने के लिये आकाश के अन्तर में ज्योतियाँ हों; और वे चिह्नों, और नियत समयों और दिनों, और वर्षों के कारण हों; और वे ज्योतियाँ आकाश के अन्तर में पृथ्वी पर प्रकाश देनेवाली भी ठहरें'" (उत्पत्ति 1:14-15)। सूखी भूमि और उस पर के पौधों की सृष्टि के बाद यह परमेश्वर के अधिकार का एक बार फिर से उपयोग था जो प्राणियों के द्वारा दिखाया गया था। परमेश्वर के लिए ऐसा कार्य उतना ही सरल था जितना कि उसके द्वारा पहले किए गए कार्य थे, क्योंकि परमेश्वर के पास बड़ी सामर्थ्‍य है; परमेश्वर अपने वचन का पक्का है, और उसके वचन पूरे होंगे। परमेश्वर ने ज्योतियों को आज्ञा दी कि वे आकाश में प्रगट हों, और ये ज्योतियाँ न केवल पृथ्वी के ऊपर आकाश में रोशनी देती थीं, बल्कि दिन और रात और ऋतुओं, दिनों और वर्षों के लिए भी चिह्न के रूप में कार्य करती थीं। इस प्रकार, जब परमेश्वर ने अपने वचनों को कहा, हर एक कार्य जिसे परमेश्वर पूरा करना चाहता था वह परमेश्वर के अभिप्राय और जिस रीति से परमेश्वर ने उन्हें नियुक्त किया था, उसके अनुसार पूरा हो गया।

आकाश में जो ज्योतियाँ हैं, वे आसमान के तत्व हैं जो प्रकाश को बिखेर सकती हैं; वे आकाश, भूमि और समुद्र को प्रकाशमय कर सकती हैं। वे परमेश्वर की आज्ञा के अनुसार तय की गयी लय एवं तीव्रता में परिक्रमा करती हैं और विभिन्न समयकाल में भूमि पर प्रकाश देती हैं और इस रीति से, ज्योतियों की परिक्रमा के चक्र के कारण भूमि के पूर्व और पश्चिम में दिन और रात होते हैं, वे न केवल दिन और रात के चिह्न हैं, बल्कि ये विभिन्न चक्र मानवजाति के लिए त्योहारों और विशेष दिनों को भी चिन्हित करते हैं। वे चारों ऋतुओं—बसंत ऋतु, ग्रीष्म ऋतु, शरद ऋतु, और शीत ऋतु—की पूर्ण पूरक और सहायक हैं, जिन्हें परमेश्वर के द्वारा भेजा जाता है, जिनके साथ ज्योतियाँ एकरूपता से मानवजाति के लिए चन्द्रमा की स्थितियों, दिनों, और सालों के लिए एक निरन्तर और सटीक चिह्न के रूप में कार्य करती हैं। यद्यपि यह केवल कृषि के आगमन के बाद ही हुआ कि मानवजाति ने परमेश्वर द्वारा बनाई गई ज्योतियों द्वारा चन्द्रमा की स्थितियों, दिनों और वर्षों के विभाजन को देखा और समझा, लेकिन वास्तव में चन्द्रमा की स्थितियों, दिनों और वर्षों को जिन्हें मनुष्य आज समझता है, वे बहुत पहले ही, परमेश्वर द्वारा सभी वस्तुओं की सृष्टि के चौथे दिन से प्रारम्भ हो चुके थे और इसी प्रकार परस्पर बदलने वाले बसंत, ग्रीष्म, शरद, और शीत ऋतु के चक्र भी जिन्हें मनुष्य के द्वारा अनुभव किया जाता है, वे बहुत पहले ही, परमेश्वर द्वारा सभी वस्तुओं की सृष्टि के चौथे दिन प्रारम्भ हो चुके थे। परमेश्वर के द्वारा बनाई गई ज्योतियों ने मनुष्य को इस योग्य बनाया कि वे लगातार, सटीक ढंग से और साफ-साफ दिन और रात के बीच अन्तर कर सकें, दिनों को गिन सकें, साफ-साफ चन्द्रमा की स्थितियों और वर्षों का हिसाब रख सकें। (पूर्ण चन्द्रमा का दिन एक महीने की समाप्ति को दर्शाता था और इससे मनुष्य जान गया कि ज्योतियों का प्रकाशन एक नए चक्र की शुरूआत करता है; अर्द्ध-चन्द्रमा का दिन आधे महीने की समाप्ति को दर्शाता था, जिसने मनुष्य को यह बताया कि चन्द्रमा की एक नई स्थिति शुरू हो रही है, इससे यह अंदाज़ा लगाया जा सकता था कि चन्द्रमा की एक स्थिति में कितने दिन और रात होते हैं और एक ऋतु में चन्द्रमा की कितनी स्थितियाँ होती हैं, एक साल में कितनी ऋतुएँ होती हैं, यह सब कुछ बड़ी नियमितता के साथ प्रदर्शित होता था।) इस प्रकार, मनुष्य ज्योतियों की परिक्रमाओं के चिन्‍हांकन से आसानी से चन्द्रमा की स्थितियों, दिनों, और सालों का पता लगा सकता था। यहाँ से, मानवजाति और सभी चीज़ें अनजाने ही दिन-रात के क्रमानुसार परस्पर परिवर्तन और ज्योतियों की परिक्रमाओं से उत्पन्न ऋतुओं के बदलाव के मध्य जीवन बिताने लगे। यह सृष्टिकर्ता द्वारा चौथे दिन ज्योतियों की सृष्टि का महत्व था। उसी प्रकार, सृष्टिकर्ता के इस कार्य के उद्देश्य और महत्व अभी भी उसके अधिकार और सामर्थ्‍य से अविभाजित थे। इस प्रकार, परमेश्वर के द्वारा बनाई गई ज्योतियाँ और वह मूल्य जो वे शीघ्र ही मनुष्य तक लाने वाले थे, सृष्टिकर्ता के अधिकार के इस्तेमाल में एक और महानतम कार्य था।

इस नए संसार में, जिसमें मानवजाति अभी तक प्रकट नहीं हुई थी, सृष्टिकर्ता ने साँझ और सवेरे, आकाश, भूमि और समुद्र, घास, सागपात और विभिन्न प्रकार के वृक्षों, और ज्योतियों, ऋतुओं, दिनों, और वर्षों को उस नए जीवन के लिए बनाया जिसका वह शीघ्र सृजन करने वाला था। सृष्टिकर्ता का अधिकार और सामर्थ्‍य, हर उस नई चीज़ में प्रगट हुआ जिसे उसने बनाया था और उसके वचन और उपलब्धियाँ लेश-मात्र भी बिना किसी असंगति या अन्तराल के एक साथ घटित हुए। इन सभी नई चीज़ों का प्रकटीकरण और जन्म सृष्टिकर्ता के अधिकार और सामर्थ्‍य के प्रमाण थे वह अपने वचन का पक्का है और उसका वचन पूरा होगा और जो पूर्ण हुआ है वो हमेशा बना रहेगा। यह सच्चाई कभी नहीं बदली है : भूतकाल में भी ऐसा था, वर्तमान में भी ऐसा है और पूरे अनंतकाल के लिए ऐसा ही बना रहेगा। जब तुम लोग पवित्र-शास्त्र के उन वचनों को एक बार फिर देखते हो, तो क्या वे तुम्हें तरोताज़ा दिखाई देते हो? क्या तुम लोगों ने नई विषय-वस्‍तु देखी है और नई नई खोज की है? यह इसलिए है क्योंकि सृष्टिकर्ता के कार्यों ने तुम लोगों के हृदय को द्रवित कर दिया है, और उसके अधिकार और सामर्थ्‍य के बारे में तुम सबके ज्ञान की दिशा का मार्गदर्शन किया है और सृष्टिकर्ता की तुम्हारी समझ के लिए द्वार खोल दिया है और उसके कार्य और अधिकार ने इन वचनों को जीवन दे दिया है। इस प्रकार इन वचनों में मनुष्य ने सृष्टिकर्ता के अधिकार का एक वास्तविक, सुस्पष्ट प्रकटीकरण देखा और सचमुच में सृष्टिकर्ता की सर्वोच्चता को देखा है, और उसने सृष्टिकर्ता के अधिकार और सामर्थ्‍य की असाधारणता को देखा है।

सृष्टिकर्ता के अधिकार और सामर्थ्‍य चमत्कार पर चमत्कार करते हैं; वह मनुष्य के ध्यान को आकर्षित करता है। मनुष्य उसके अधिकार के उपयोग से पैदा हुए आश्चर्यजनक कर्मों को टकटकी लगाकर देखने के सिवाए कुछ नहीं कर सकता है। उसका असीमित सामर्थ्‍य अत्यंत प्रसन्नता लेकर आता है और मनुष्य भौंचक्का हो जाता है। वह अतिउत्साह से भर जाता है और प्रशंसा में हक्का-बक्का-सा देखता है। वह विस्मयाभिभूत और हर्षित हो जाता है; और इससे अधिक, मनुष्य ज़ाहिर तौर पर द्रवित हो जाता है, और उसमें आदर, सम्मान, और लगाव उत्पन्न होने लग जाते हैं। सृष्टिकर्ता के अधिकार और कर्मों का मनुष्य की आत्मा पर एक बड़ा अपमार्जक प्रभाव होता है और इसके अलावा यह मनुष्य की आत्मा को संतुष्ट कर देता है। परमेश्वर के हर एक विचार, हर एक बोल, उसके अधिकार का हर एक प्रकाशन, सभी चीज़ों में अति उत्तम रचना हैं। यह एक महान कार्य है जो सृजी गई मानवजाति की गहरी समझ और ज्ञान के बहुत ही योग्य है। जब हम सृष्टिकर्ता के वचनों से सृजित किए गए हर एक जीवधारी की गणना करते हैं तो हमारी आत्मा परमेश्वर की सामर्थ्‍य की अद्भुतता की ओर खिंची चली जाती है और हम खुद को सृष्टिकर्ता के कदमों के निशानों के पीछे-पीछे चलते हुए अगले दिन की ओर जाता हुआ पाते हैं : परमेश्वर द्वारा सभी चीज़ों की सृष्टि का पाँचवा दिन।

आओ, सृष्टिकर्ता के और अधिक कर्मों को देखने के साथ हम एक-एक अंश करके पवित्र शास्त्र को पढ़ना जारी रखें।

पाँचवे दिन, जीवन के विविध और विभिन्न रूप अलग-अलग तरीकों से सृष्टिकर्ता के अधिकार को प्रदर्शित करते हैं

पवित्र-शास्त्र कहता है, "फिर परमेश्‍वर ने कहा, 'जल जीवित प्राणियों से बहुत ही भर जाए, और पक्षी पृथ्वी के ऊपर आकाश के अन्तर में उड़ें।' इसलिये परमेश्‍वर ने जाति जाति के बड़े बड़े जल-जन्तुओं की, और उन सब जीवित प्राणियों की भी सृष्‍टि की जो चलते फिरते हैं जिन से जल बहुत ही भर गया, और एक एक जाति के उड़नेवाले पक्षियों की भी सृष्‍टि की: और परमेश्‍वर ने देखा कि अच्छा है" (उत्पत्ति 1:20-21)। पवित्र-शास्त्र साफ-साफ कहता है कि इस दिन, परमेश्वर ने जल के जन्तुओं और आकाश के पक्षियों को बनाया, कहने का तात्पर्य है कि उसने विभिन्न प्रकार की मछलियों और पक्षियों को बनाया और उनकी प्रजाति के अनुसार उन्हें वर्गीकृत किया। इस तरह, परमेश्वर की सृष्टि से पृथ्वी, आकाश और जल समृद्ध हो गए ...

जैसे ही परमेश्वर के वचन कहे गए, बिलकुल नई ज़िन्दगियाँ, हर एक अलग आकार में, सृष्टिकर्ता के वचनों के मध्य तत्काल जीवित हो गईं। वे इस संसार में अपने स्थान के लिए एक-दूसरे को धकेलते, कूदते और आनंद से खेलते हुए आ गईं...। हर रूप एवं आकार की मछलियाँ जल के एक छोर से दूसरे छोर को तैरने लगीं; और सभी किस्मों की सीपियाँ रेत में उत्पन्न होने लगीं, शल्क वाली, कवचधारी, और बिना रीढ़ वाले जीव-जन्तु, चाहे बड़े हों या छोटे, लम्बे हों या ठिगने, विभिन्न रूपों में जल्दी से विकसित हो गए। विभिन्न प्रकार के समुद्री पौधे शीघ्रता से उगना शुरू हो गए, विविध प्रकार के समुद्री जीवन के बहाव में बहने लगे, लहराते हुए, स्थिर जल को उत्तेजित करते हुए, मानो उनसे कह रहे हों : "नाचो! अपने मित्रों को लेकर आओ! क्योंकि अब तुम लोग कभी अकेले नहीं रहोगे!" उस घड़ी जब परमेश्वर के द्वारा बनाए गए जीवित प्राणी जल में प्रगट हुए, प्रत्येक नए जीवन ने उस जल में जीवन-शक्ति डाल दी जो इतने लम्बे समय से शांत था और एक नए युग का सूत्रपात किया...। और तब से, वे एक-दूसरे के आस-पास रहते हुए एक-दूसरे का साथ देने लगे और वे आपस में कोई दूरी नहीं रखते थे। जल के भीतर जो भी जीवधारी थे, जल उनका पोषण करने के लिए मौजूद था, और प्रत्येक जीवन, जल और उसके पोषण के कारण अस्तित्व में बना रहा। प्रत्येक जीव, दूसरे को जीवन देता था, और साथ ही, हर एक, उसी रीति से, सृष्टिकर्ता की सृष्टि की अद्भुतता, महानता और सृष्टिकर्ता के अधिकार के सर्वोत्कृष्ट सामर्थ्‍य की गवाही दी ...

अब जबकि समुद्र शांत न रहा, उसी प्रकार जीवन ने आकाश को भरना प्रारम्भ कर दिया। एक के बाद एक, छोटे-बड़े पक्षी, भूमि से आकाश में उड़ने लगे। समुद्र के जीवों से भिन्न, उनके पास पंख और पर थे, जो उनके दुबले और आकर्षक रूप को ढंके हुए थे। वे अपने पंखों को फड़फड़ाते हुए, गर्व और अभिमान से अपने परों के आकर्षक आवरण को और अपनी विशेष क्रियाओं और कुशलताओं को प्रदर्शित करने लगे जिन्हें सृष्टिकर्ता के द्वारा उन्हें प्रदान किया गया था। वे स्वतन्त्रता के साथ हवा में लहराने लगे और कुशलता से आकाश और पृथ्वी के बीच, घास के मैदानों और जंगलों के आर-पार यहाँ वहाँ उड़ने लगे...। वे हवा के प्रिय थे, वे हर चीज़ के प्रिय थे। वे जल्द ही स्वर्ग और पृथ्वी के बीच में एक सेतु बनकर सभी चीज़ों तक संदेश पहुँचाने वाले बनने को थे...। वे गीत गाते, आनंद के साथ यहाँ-वहाँ झपट्टा मारते, उन्होंने कभी ख़ाली पड़े संसार में हर्ष, हँसी व कम्पन पैदा कर दिया...। उन्होंने अपने स्पष्ट एवं मधुर गीतों से और अपने हृदय के भीतर के शब्दों से उस जीवन के लिए सृष्टिकर्ता की प्रशंसा की जो उसने उन्हें दिया था। उन्होंने सृष्टिकर्ता की पूर्णता और अद्भुतता को प्रदर्शित करने के लिए हर्षोल्लास के साथ नृत्य किया, और वे उस विशेष जीवन के द्वारा जो सृष्टिकर्ता ने उन्हें दिया था, उसके अधिकार की गवाही देने में अपने सम्पूर्ण जीवन को समर्पित कर देंगे ...

जीवित प्राणी चाहे जल में थे या आकाश में, सृष्टिकर्ता की आज्ञा के द्वारा, जीवित प्राणियों की यह अधिकता जीवन के विभिन्न रूपों में मौजूद थी, और सृष्टिकर्ता की आज्ञा के द्वारा, वे अपनी-अपनी प्रजाति के अनुसार इकट्ठे हो गए—और यह व्यवस्था, यह नियम किसी भी जीवधारी के लिए अपरिवर्तनीय था। सृष्टिकर्ता के द्वारा जो भी सीमाएँ बनाई गई थीं, उसके पार जाने की हिम्मत उन्होंने कभी नहीं की और न ही वे ऐसा करने में समर्थ थे। सृष्टिकर्ता के द्वारा आदेश के अनुसार वे जीते और बहुगुणित होते रहे और सृष्टिकर्ता के द्वारा बनाए गए जीवन-क्रम और व्यवस्था का कड़ाई से पालन करते रहे और सजगता से उसकी अनकही आज्ञाओं, स्वर्गीय आदेशों और नियमों में बने रहे जो उसने उन्हें तब से लेकर आज तक दिये थे। वे सृष्टिकर्ता से अपने एक विशेष अन्दाज़ में बात करते थे और सृष्टिकर्ता के अर्थ की प्रशंसा करने लगे और वे उसकी आज्ञा मानते थे। किसी ने कभी भी सृष्टिकर्ता के अधिकार का उल्लंघन नहीं किया और उनके ऊपर उसकी संप्रभुता और आज्ञाओं का उपयोग उसके विचारों के तहत हुआ था; कोई वचन जारी नहीं किए गए थे, परन्तु सृष्टिकर्ता का अद्वितीय अधिकार ख़ामोशी से सभी चीज़ों का नियन्त्रण करता था जिसमें भाषा की कोई क्रिया नहीं थी और जो मानवजाति से भिन्न था। इस विशेष रीति से उसके अधिकार के इस्तेमाल ने मनुष्य को नया ज्ञान प्राप्त करने के लिए बाध्य किया और सृष्टिकर्ता के अद्वितीय अधिकार की एक नई व्याख्या करने को मजबूर किया। यहाँ मैं तुम्हें एक बात बता दूँ कि इस नए दिन में, सृष्टिकर्ता के अधिकार के इस्तेमाल ने एक बार और सृष्टिकर्ता की अद्वितीयता का प्रदर्शन किया।

आगे, आओ हम पवित्र-शास्त्र के इस अंश के अंतिम वाक्य पर एक नज़र डालें : "परमेश्‍वर ने देखा कि अच्छा है।" तुम लोगों को क्या लगता है कि इसका क्या है? इन वचनों में परमेश्वर की भावनाएं निहित हैं। परमेश्वर ने उन सभी चीज़ों को देखा जिन्हें उसने बनाया था जो उसके वचनों के कारण अस्तित्व में आईं और मजबूत बनी रहीं और धीरे-धीरे परिवर्तित होने लगीं। उस समय, परमेश्वर ने अपने वचनों के द्वारा जो विभिन्न चीज़ें बनाई थीं, और जिन विभिन्न कार्यों को पूरा किया था, क्या वह उनसे सन्तुष्ट था? उत्तर है कि "परमेश्‍वर ने देखा कि अच्छा है।" तुम लोग यहाँ क्या देखते हो? "परमेश्‍वर ने देखा कि अच्छा है" इससे क्या प्रकट होता है? यह किसका प्रतीक है? इसका अर्थ है कि परमेश्वर ने जो योजना बनाई थी और जो निर्देश दिये थे, उन्हें और उन उद्देश्यों को पूर्ण करने के लिएपरमेश्वर के पास सामर्थ्‍य और बुद्धि थी, जिन्हें पूरा करने का उसने मन बनाया था। जब परमेश्वर ने हर एक कार्य को पूरा कर लिया, तो क्या उसे पछतावा हुआ? उत्तर अभी भी यही है "परमेश्‍वर ने देखा कि अच्छा है।" दूसरे शब्दों में, उसने कोई खेद महसूस नहीं किया, बल्कि वह सन्तुष्ट था। इसका मतलब क्या है कि उसे कोई खेद महसूस नहीं हुआ? इसका मतलब है कि परमेश्वर की योजना पूर्ण है, उसकी सामर्थ्‍य और बुद्धि पूर्ण है, और यह कि सिर्फ उसकी सामर्थ्‍य के द्वारा ही ऐसी पूर्णता को प्राप्त किया जा सकता है। जब मुनष्य कोई कार्य करता है, तो क्या वह परमेश्वर के समान देख सकता है कि सब अच्छा है? क्या हर काम जो मनुष्य करता है वो पूर्णता पा सकता है? क्या मनुष्य किसी काम को एक ही बार में पूरी अनंतता के लिए पूरा कर सकता है? जैसा कि मनुष्य कहता है, "कुछ भी पूर्ण नहीं होता, बस बेहतर होता है," ऐसा कुछ भी नहीं है जो मनुष्य करे और वह पूर्णता को प्राप्त कर ले। परमेश्वर ने देखा कि जो कुछ उसने बनाया और पूरा किया वह अच्छा है, परमेश्वर के द्वारा बनाई गई हर वस्तु उसके वचन के द्वारा स्थिर हुई, कहने का तात्पर्य है कि, जब "परमेश्‍वर ने देखा कि अच्छा है," तब जो कुछ भी उसने बनाया, उसने एक चिरस्थायी रूप ले लिया, उसकी किस्म के अनुसार उसे वर्गीकृत किया गया, और उसे पूरी अनंतता के लिए एक नियत स्थिति, उद्देश्य, और कार्यप्रणाली दी गई। इसके अतिरिक्त, सब वस्तुओं के बीच उनकी भूमिका, और वह यात्रा जिनसे उन्हें परमेश्वर की सभी वस्तुओं के प्रबन्धन के दौरान गुज़रना था, उन्हें परमेश्वर के द्वारा पहले से ही नियुक्त कर दिया गया था और वे अपरिवर्तनीय थे। यह सृष्टिकर्ता द्वारा सभी वस्तुओं को दिया गया स्वर्गीय नियम था।

"परमेश्‍वर ने देखा कि अच्छा है," ये सरल, कम समझे गए वचन, जिनकी कई बार उपेक्षा की जाती है, ये स्वर्गीय नियम और स्वर्गीय आदेश हैं जिन्हें सभी प्राणियों को परमेश्वर के द्वारा दिया गया है। यह सृष्टिकर्ता के अधिकार का एक और मूर्त रूप है, जो अधिक व्यावहारिक और अधिक गंभीर है। अपने वचनों के जरिए, सृष्टिकर्ता न केवल वह सब-कुछ हासिल करने में सक्षम हुआ जिसे उसने हासिल करने का बीड़ा उठाया था, और वह सब-कुछ प्राप्त किया जिसे वह प्राप्त करने निकला था, बल्कि जो कुछ भी उसने सृजित किया था, वह उसका नियन्त्रण कर सकता था, और जो कुछ उसने अपने अधिकार के अधीन बनाया था उस पर शासन कर सकता था और इसके अतिरिक्त, सब-कुछ व्यवस्थित और नियमित था। सभी वस्तुएँ उसके वचन के द्वारा बढ़ती, अस्तित्व में रहती और नष्ट होती थीं और उसके अतिरिक्त उसके अधिकार के कारण वे उसके द्वारा बनाई गई व्यवस्था के मध्य अस्तित्व में बनी रहती थींऔर कोई भी वस्तु इससे छूटी नहीं थी! यह व्यवस्था बिलकुल उसी घड़ी शुरू हो गई थी जब "परमेश्‍वर ने देखा कि अच्छा है," और वह बना रहेगा और जारी रहेगा और परमेश्वर की प्रबंधकीय योजना के लिए उस दिन तक कार्य करता रहेगा जब तक वह सृष्टिकर्ता के द्वारा रद्द न कर दिया जाए! सृष्टिकर्ता का अद्वितीय अधिकार न केवल सब वस्तुओं को बनाने और सब वस्तुओं को अस्तित्व में आने की आज्ञा देने की काबिलियत में प्रकट हुआ, बल्कि सब वस्तुओं पर शासन करने और सब वस्तुओं पर संप्रभुता रखने और सब वस्तुओं में चेतना और जीवन देने और इसके अतिरिक्त, उन सब वस्तुओं को जिन्हें वो अपनी योजना में सृजित करेगा, उन्हें पूरी अनंतता के लिए उसके द्वारा बनाए गए संसार में एक उत्तम आकार, उत्तम संरचना, उत्तम भूमिका में प्रकट और मौजूद होने के लिए बनाने की उसकी योग्यता में भी प्रकट हुआ था। यह इस बात से प्रकट हुआ कि सृष्टिकर्ता के विचार किसी विवशता के अधीन नहीं थे और समय, अंतरिक्ष और भूगोल के द्वारा सीमित नहीं थे। उसके अधिकार के समान, सृष्टिकर्ता की अद्वितीय पहचान सदा-सर्वदा तक अपरिवर्तनीय बनी रहेगी। उसका अधिकार सर्वदा उसकी अद्वितीय पहचान का एक निरूपण और प्रतीक बना रहेगा और उसका अधिकार हमेशा उसकी पहचान के साथ-साथ बना रहेगा!

छठे दिन, सृष्टिकर्ता ने बोला और हर प्रकार के जीवित प्राणी जो उसके मस्तिष्क में थे एक के बाद एक प्रगट होने लगे

अलक्षित रूप से, सब वस्तुओं को बनाने का सृष्टिकर्ता का कार्य लगातार पाँचवे दिन तक चलता रहा, उसके तुरन्त बाद सृष्टिकर्ता ने सब वस्तुओं की सृष्टि के छठे दिन का स्वागत किया। यह दिन एक और नई शुरूआत थी तथा एक और असाधारण दिन था। इस नए दिन की शाम को सृष्टिकर्ता की क्या योजना थी? कौन से नए जीव जन्तुओं को वह उत्पन्न करेगा, उनकी सृष्टि करेगा? ध्यान से सुनो, यह सृष्टिकर्ता की वाणी है ...

"फिर परमेश्‍वर ने कहा, 'पृथ्वी से एक एक जाति के जीवित प्राणी, अर्थात् घरेलू पशु, और रेंगनेवाले जन्तु, और पृथ्वी के वनपशु, जाति जाति के अनुसार उत्पन्न हों,' और वैसा ही हो गया। इस प्रकार परमेश्‍वर ने पृथ्वी के जाति जाति के वन-पशुओं को, और जाति जाति के घरेलू पशुओं को, और जाति जाति के भूमि पर सब रेंगनेवाले जन्तुओं को बनाया: और परमेश्‍वर ने देखा कि अच्छा है" (उत्पत्ति 1:24-25)। इन में कौन-कौन से जीवित प्राणी शामिल हैं? पवित्र-शास्त्र कहता हैः मवेशी और रेंगने वाले जन्तु और पृथ्वी के जाति-जाति के जंगली पशु। कहने का तात्पर्य है कि उस दिन वहाँ पृथ्वी के सब प्रकार के जीवित प्राणी ही नहीं थे, बल्कि उन सभी को प्रजाति के अनुसार वर्गीकृत किया गया था और उसी प्रकार, "परमेश्‍वर ने देखा कि अच्छा है।"

पिछले पाँच दिनों की तरह, उसी सुर में, सृष्टिकर्ता ने अपने इच्छित प्राणियों के जन्म का आदेश दिया और हर एक अपनी-अपनी प्रजाति के अनुसार पृथ्वी पर प्रकट हुआ। जब सृष्टिकर्ता अपने अधिकार का इस्तेमाल करता है तो उसके कोई भी वचन व्यर्थ में नहीं बोले जाते और इस प्रकार, छ्ठे दिन हर जीवित प्राणी, जिसको उसने बनाने की इच्छा की थी, नियत समय पर प्रकट हो गया। जैसे ही सृष्टिकर्ता ने कहा "पृथ्वी से एक-एक जाति के प्राणी, उत्पन्न हों," पृथ्वी तुरन्त जीवन से भर गई और पृथ्वी के ऊपर अचानक ही हर प्रकार के प्राणियों की श्वास प्रकट हुई...। हरे-भरे घास के जंगली मैदानों में, हृष्ट-पुष्ट गाएँ अपनी पूंछों को इधर-उधर हिलाते हुए, एक के बाद एक प्रगट होने लगीं, मिमियाती हुई भेड़ें झुण्डों में इकट्ठी होने लगीं, और हिनहिनाते हुए घोड़े सरपट दौड़ने लगे...। एक पल में ही, शांत घास के मैदानों की विशालता में जीवन का विस्फोट हुआ...। निश्चल घास के मैदान पर पशुओं के इन विभिन्न झुण्डों का प्रकटीकरण एक सुन्दर दृश्य था जो अपने साथ असीमित जीवन शक्ति लेकर आया था...। वे घास के मैदानों के साथी और स्वामी होंगे और प्रत्येक दूसरे पर निर्भर होगा; वे इन घास के मैदानों के संरक्षक और रखवाले भी होंगे, जो उनका स्थायी निवास होगा, जो उन्हें उनकी सारी ज़रूरतों को प्रदान करेगा और उनके अस्तित्व के लिए अनंत पोषण का स्रोत होगा ...

उसी दिन जब ये विभिन्न मवेशी सृष्टिकर्ता के वचनों द्वारा अस्तित्व में आए थे, ढेर सारे कीड़े-मकौड़े भी एक के बाद एक प्रगट हुए। भले ही वे सभी जीवधारियों में सबसे छोटे थे, परन्तु उनकी जीवन-शक्ति सृष्टिकर्ता की अद्भुत सृष्टि थी और वे बहुत देरी से नहीं आए थे...। कुछ ने अपने पंखों को फड़फड़ाते थे, जबकि कुछ अन्य धीरे-धीरे रेंगते थे; कुछ उछलते और कूदते थे और कुछ अन्य लड़खड़ाते थे, कुछ आगे बढ़ गए, जबकि अन्य जल्दी से पीछे लौट गए; कुछ दूसरी ओर चले गए, कुछ अन्य ऊँची-नीची छलांग लगाने लगे...। वे सभी अपने लिए घर ढूँढ़ने के प्रयास में व्यस्त हो गए : कुछ ने घास में घुसकर अपना रास्ता बनाया, कुछ ने भूमि खोदकर छेद बनाना शुरू कर दिया, कुछ उड़कर पेड़ों पर चढ़ गए और जंगल में छिप गए...। यद्यपि वे आकार में छोटे थे, परन्तु वे खाली पेट की तकलीफ को सहना नहीं चाहते थे और अपने घरों को बनाने के बाद, वे अपना पोषण करने के लिए भोजन की तलाश में दौड़ पड़े। कुछ घास के कोमल तिनकों को खाने के लिए उस पर चढ़ गए, कुछ ने धूल से अपना मुँह भर लिया और अपना पेट भरा और स्वाद और आनंद के साथ खाने लगे (उनके लिए, धूल भी एक स्वादिष्ट भोजन है); कुछ जंगल में छिप गए, परन्तु आराम करने के लिए नहीं रूके, क्योंकि चमकीले गहरे हरे पत्तों के भीतर के रस ने उनके लिये रसीला भोजन प्रदान किया...। सन्तुष्ट होने के बाद भी कीड़े-मकौड़ों ने अपनी गतिविधियों को नहीं रोका, भले ही वे आकार में छोटे थे, फिर भी वे भरपूर ऊर्जा और असीमित उत्साह से भरे हुए थे और उसी प्रकार सभी जीवधारियों में, वे सबसे अधिक सक्रिय और सबसे अधिक परिश्रमी होते हैं। वे कभी आलसी न हुए और न कभी आराम से पड़े रहे। एक बार संतृप्त होने के बाद, उन्होंने फिर से अपने भविष्य के लिए परिश्रम करना प्रारम्भ कर दिया, अपने आने वाले कल के लिए अपने आपको व्यस्त रखा और जीवित बने रहने के लिए भाग-दौड़ करते रहे...। उन्होंने मधुरता से विभिन्न प्रकार की धुनों और सुरों को गुनगुनाकर अपने आपको आगे बढ़ने के लिए प्रेरित किया। उन्होंने घास, वृक्षों और ज़मीन के हर इन्च में आनंद का समावेश किया और हर दिन और हर वर्ष को अद्वितीय बना दिया...। अपनी भाषा और अपने तरीकों से, उन्होंने भूमि के सभी प्राणियों तक जानकारी पहुँचायी। और अपने विशेष जीवन पथक्रम का उपयोग करते हुए, उन्होंने सब वस्तुओं को जिनके ऊपर उन्होंने निशान छोड़े थे, चिन्हित किया...। उनका मिट्टी, घास और जंगलों के साथ घनिष्ठ संबंध था और वे मिट्टी, घास और वनों में शक्ति और जीवन चेतना लेकर आए, उन्होंने सभी प्राणियों तक सृष्टिकर्ता का प्रोत्साहन और अभिनंदन पहुँचाया ...

सृष्टिकर्ता की निगाहें उन सब वस्तुओं पर पड़ीं जिन्हें उसने बनाया था और इस पल उसकी निगाहें जंगलों और पर्वतों पर आकर ठहर गईं और उसका मस्तिष्क में कई विचार घूम रहे थे। जैसे ही उसके वचन बोले गए, घने जंगलों में और पहाड़ों के ऊपर, इस प्रकार के पशु प्रकट हुए जो पहले कभी नहीं आए थे : वे "जंगली जानवर" थे जो परमेश्वर के वचन के द्वारा बोले गए थे। लम्बे समय से प्रतीक्षारत, उन्होंने अपने अनोखे चेहरों के साथ अपने-अपने सिरों को हिलाया और हर एक ने अपनी-अपनी पूँछ को लहराया। कुछ के पास रोंएदार लबादे थे, कुछ कवचधारी थे, कुछ के खुले हुए ज़हरीले दाँत थे, कुछ के पास घातक मुस्कान थी, कुछ लम्बी गर्दन वाले थे, कुछ के पास छोटी पूँछ थी, कुछ के पास ख़तरनाक आँखें थीं, कुछ डर के साथ देखते थे, कुछ घास खाने के लिए झुके हुए थे, कुछ के मुँह में ख़ून लगा हुआ था, कुछ दो पाँव से उछलते थे, कुछ चार खुरों से धीरे-धीरे चलते थे, कुछ पेड़ों के ऊपर लटके दूर तक देखते थे, कुछ जंगलों में इन्तज़ार में लेटे हुए थे, कुछ आराम करने के लिए गुफाओं की खोज में थे, कुछ मैदानों में दौड़ते और उछलते थे, कुछ शिकार के लिए जंगलों में गश्त लगा रहे थे...; कुछ गरज रहे थे, कुछ हुँकार भर रहे थे, कुछ भौंक रहे थे, कुछ रो रहे थे...; कुछ ऊँचे सुर, कुछ नीचे सुर वाले, कुछ खुले गले वाले, कुछ साफ-साफ और मधुर स्वर वाले थे...; कुछ भयानक थे, कुछ सुन्दर थे, कुछ बड़े अजीब से थे और कुछ प्यारे-से थे, कुछ डरावने थे, कुछ बहुत ही आकर्षक भोले-भाले थे...। सब एक-एक कर आने लगे। देखो कि वे गर्व से कितने फूले हुए थे, उन्मुक्त-जीव थे, एक-दूसरे से बिलकुल उदासीन थे, एक-दूसरे को एक झलक देखने की भी परवाह नहीं करते थे...। सभी उस विशेष जीवन को जो सृष्टिकर्ता के द्वारा उन्हें दिया गया था, और अपने जंगलीपन और क्रूरता को धारण किए हुए, जंगलों में और पहाड़ियों के ऊपर प्रकट हो गए। सबसे घृणित, पूरी तरह ढीठ—किसने उन्हें पहाड़ियों और जंगलों का सच्चा स्वामी बना दिया था? उस घड़ी से जब से सृष्टिकर्ता ने उनके प्रकटन को स्वीकृति दी थी, उन्होंने जंगलों और पहाड़ों पर "दावा किया," क्योंकि सृष्टिकर्ता ने पहले से ही उनकी सीमाओं को कस दिया था और उनके अस्तित्व के दायरे को निश्चित कर दिया था। केवल वे ही जंगलों और पहाड़ों के सच्चे स्वामी थे, इसलिए वे इतने प्रचण्ड और ढीठ थे। उन्हें "जंगली जानवर" सिर्फ इसीलिए कहा जाता था क्योंकि, सभी प्राणियों में वे ही थे जो वास्तव में इतने जंगली, क्रूर और वश में न आने वाले थे। उन्हें पालतू नहीं बनाया जा सकता था, इस प्रकार उनका पालन-पोषण नहीं किया जा सकता था और वे मानवजाति के साथ एकता से नहीं रह सकते थे या मानवजाति के लिए परिश्रम नहीं कर सकते थे। चूँकि उनका पालन-पोषण नहीं किया जा सकता था, और वे मानवजाति के लिए काम नहीं कर सकते थे, इसलिए उन्हें मानवजाति से दूर रहकर जीवन बिताना था। मनुष्य उनके पास नहीं आ सकते थे। चूँकि उन्हें मानवजाति से दूर रहकर जीवन बिताना था और मनुष्य उनके पास नहीं आ सकते थे इसलिए बदले में, वे उन ज़िम्मेदारियों को निभा सकते थे जो सृष्टिकर्ता के द्वारा उन्हें दी गई थी : पर्वतों और जंगलों की सुरक्षा करना। उनके जंगलीपन ने पर्वतों की सुरक्षा की और जंगलों की हिफाज़त की और उनका वही स्वभाव उनके अस्तित्व और बढ़ोत्तरी के लिए सबसे बेहतरीन सुरक्षा और आश्वासन था। साथ ही, उनके जंगलीपन ने सब वस्तुओं के मध्य सन्तुलन को कायम रखा और सुनिश्चित किया। उनका आगमन पर्वतों और जंगलों के लिए सहयोग और मजबूत सहारा लेकर आया; उनके आगमन ने शांत तथा रिक्त पर्वतों और जंगलों में शक्ति और जीवन चेतना का संचार किया। उसके बाद से, पर्वत और जंगल उनके स्थायी निवास बन गए, और वे अपने घरों से कभी वंचित नहीं रहेंगे, क्योंकि पर्वत और पहाड़ उनके लिए प्रकट हुए और अस्तित्व में आए थे; जंगली जानवर अपने कर्तव्य को पूरा करेंगे और उनकी हिफाज़त करने के लिए हर संभव प्रयास करेंगे। साथ ही, जंगली जानवर सृष्टिकर्ता के प्रोत्साहन के साथ दृढ़ता से रहेंगे ताकि अपने सीमा क्षेत्र को थामे रह सकें और सृष्टिकर्ता के द्वारा स्थापित की गयी सब वस्तुओं के सन्तुलन को कायम रखने के लिए अपने जंगली स्वभाव का निरन्तर उपयोग कर सकें और सृष्टिकर्ता के अधिकार और सामर्थ्‍य को प्रकट कर सकें!

सृष्टिकर्ता के अधिकार के अधीन, सभी चीज़ें पूर्ण हैं

परमेश्वर के द्वारा सचल और अचल समेत सब वस्तुओं की सृष्टि की गई, जैसे पक्षी और मछलियाँ, जैसे वृक्ष और फूल, जिसमें मवेशी, कीड़े-मकौड़े, और छठे दिन बनाए गए जंगली जानवर भी शामिल थे—वे सभी परमेश्वर की निगाह में अच्छे थे और इसके अतिरिक्त, परमेश्वर की निगाहों में ये वस्तुएँ उसकी योजना के अनुरूप, पूर्णता के शिखर को प्राप्त कर चुकी थीं और एक ऐसे स्तर तक पहुँच गई थीं जहाँ परमेश्वर उन्हें पहुँचाना चाहता था। कदम-दर-कदम, सृष्टिकर्ता ने उन कार्यों को किया जो वह अपनी योजना के अनुसार करने का इरादा रखता था। जिन चीज़ों की वह रचना करना चाहता था, वे एक-के-बाद-एक प्रकट होती गईं और प्रत्येक का प्रकटीकरण सृष्टिकर्ता के अधिकार का प्रतिबिम्ब था और उसके अधिकार का ठोस रूप था, इन ठोस रूपों के कारण, सभी जीवधारी सृष्टिकर्ता के अनुग्रह और प्रावधान के प्रति नत-मस्तक थे। जैसे ही परमेश्वर के चमत्कारी कर्मों ने अपने आपको प्रकट किया, यह संसार परमेश्वर के द्वारा सृजी गई सब वस्तुओं से, अंश-अंश करके फैल गया और सब अव्यवस्था और अँधकार से स्पष्टता और उजाले में बदल गया, मृत्युपरक स्थिरता से जीवन्त और असीमित जीवन चेतना में बदल गया। सृष्टि की सब वस्तुओं के मध्य, बड़े से लेकर छोटे तक और छोटे से लेकर सूक्ष्म तक, ऐसा कोई भी नहीं था जो सृष्टिकर्ता के अधिकार और सामर्थ्‍य के द्वारा सृजित किया नहीं गया था और हर एक जीवधारी के अस्तित्व की एक अद्वितीय और अंतर्निहित आवश्यकता और मूल्य था। उनके आकार और ढांचे के अन्तर के बावजूद, उन्हें सृष्टिकर्ता के द्वारा ही बनाया जाना था ताकि सृष्टिकर्ता के अधिकार के अधीन अस्तित्व में बने रहें। कई बार लोग किसी बड़े बदसूरत कीड़े को देखकर कहते हैं, "यह कीड़ा बहुत ही भद्दा है, ऐसा हो ही नहीं सकता कि ऐसे कुरूप जीव को परमेश्वर बना सकता है—ऐसा हो ही नहीं सकता कि वह इतनी भद्दी चीज़ को बनाए।" कितना मूर्ख़तापूर्ण नज़रिया है यह! इसके बजाय उन्हें यह कहना चाहिए, "भले ही यह कीड़ा इतना भद्दा है, उसे परमेश्वर के द्वारा बनाया गया है और इस लिए उसके पास उसका अपना अनोखा उद्देश्य ज़रूर होगा।" परमेश्वर के विचारों में, विभिन्न जीवित प्राणी जिन्हें उसने बनाया है, वह उन्हें हर प्रकार का और हर तरह का रूप और हर प्रकार की कार्य प्रणालियाँ और उपयोगिताएँ देना चाहता था और इस प्रकार परमेश्वर के द्वारा बनाई गई किसी भी वस्तु को एक ही साँचे में नहीं ढाला गया है। उनकी बाहरी संरचना से लेकर भीतरी संरचना तक, उनके जीने की आदतों से लेकर उनके निवास तक—हर एक चीज़ अलग है। गायों के पास गायों का रूप है, गधों के पास गधों का रूप है, हिरनों के पास हिरनों का रूप है, हाथियों के पास हाथियों का रूप है। क्या तुम कह सकते हो कि कौन सबसे अच्छा दिखता है और कौन सबसे भद्दा दिखता है? क्या तुम कह सकते हो कि कौन सबसे अधिक उपयोगी है और किसकी अस्तित्व की आवश्यकता सबसे कम है? कुछ लोगों को हाथियों का रूप अच्छा लगता है, परन्तु कोई भी खेती के लिए हाथियों का इस्तेमाल नहीं करता है; कुछ लोग शेरों और बाघों के रूप को पसंद करते हैं, क्योंकि उनका रूप सब जीवों में सबसे अधिक प्रभावकारी है, परन्तु क्या तुम उन्हें पालतू जानवर की तरह रख सकते हो? संक्षेप में, जब तमाम जीवों की बात आती है, तो मनुष्य को सृष्टिकर्ता के अधिकार को स्वीकार कर लेना चाहिये, अर्थात्, सब जीवों के लिए सृष्टिकर्ता के द्वारा नियुक्त किए गए क्रम को मान लेना चाहिये; यह सबसे बुद्धिमत्तापूर्ण रवैया है। सृष्टिकर्ता के मूल अभिप्रायों को खोजने और उसके प्रति आज्ञाकारी होने का रवैया ही सृष्टिकर्ता के अधिकार की सच्ची स्वीकार्यता और निश्चितता है। यह परमेश्वर की निगाह में अच्छा है तो मनुष्य के पास दोष ढूँढ़ने का कौन-सा कारण है?

अतः, सृष्टिकर्ता के अधिकार के अधीन सब वस्तुओं को सृष्टिकर्ता की संप्रभुता के लिए सुर में सुर मिलाकर गाना है और उसके नए दिन के कार्य के लिए एक बेहतरीन भूमिका की शुरूआत करनी है और इस समय सृष्टिकर्ता भी अपने प्रबन्ध के कार्य में एक नया पृष्ठ खोलेगा! सृष्टिकर्ता के द्वारा नियुक्त बसंत ऋतु के अँकुरों, ग्रीष्म ऋतु में परिपक्वता, शरद ऋतु में कटनी, और शीत ऋतु में भण्डारण की व्यवस्था के अनुसार, सब वस्तुएँ सृष्टिकर्ता की प्रबंधकीय योजना के साथ प्रतिध्वनित होंगी और वे अपने नए दिन, नई शुरूआत और नए जीवन पथक्रम का स्वागत करेंगी और वे सृष्टिकर्ता के अधिकार की संप्रभुता के अधीन हर दिन का अभिनन्दन करने के लिए कभी न खत्म होने वाले अनुक्रम के अनुसार जीवित रहेंगी और प्रजनन करेंगी ...

— "वचन देह में प्रकट होता है" में 'स्वयं परमेश्वर, जो अद्वितीय है I' से उद्धृत

जब से उसने सब वस्तुओं की सृष्टि की शुरूआत की, परमेश्वर की सामर्थ्‍य प्रकट और प्रकाशित होने लगी थी, क्योंकि सब वस्तुओं को बनाने के लिए परमेश्वर ने अपने वचनों का इस्तेमाल किया था। चाहे उसने जिस भी रीति से उनका सृजन किया, जिस कारण से भी उनका सृजन किया, परमेश्वर के वचनों के कारण ही सभी चीज़ें अस्तित्व में आईं थीं और मजबूत बनी रहीं; यह सृष्टिकर्ता का अद्वितीय अधिकार है। इस संसार में मानवजाति के प्रकट होने के समय से पहले, सृष्टिकर्ता ने मानवजाति के वास्ते सब वस्तुओं को बनाने के लिए अपने अधिकार और सामर्थ्‍य का इस्तेमाल किया और मानवजाति के लिए जीने का उपयुक्त वातावरण तैयार करने के लिए अपनी अद्वितीय विधियों का उपयोग किया था। जो कुछ भी उसने किया वह मानवजाति की तैयारी के लिए था, जो जल्द ही उसका श्वास प्राप्त करने वाली थी। अर्थात, मानवजाति की सृष्टि से पहले के समय में, मानवजाति से भिन्न सभी जीवधारियों में परमेश्वर का अधिकार प्रकट हुआ, ऐसी वस्तुओं में प्रकट हुआ जो स्वर्ग, ज्योतियों, समुद्रों, और भूमि के समान ही विशाल थीं और छोटे से छोटे पशु-पक्षियों में, हर प्रकार के कीड़े-मकौड़ों और सूक्ष्म जीवों में प्रकट हुआ, जिनमें विभिन्न प्रकार के जीवाणु भी शामिल थे, जो नंगी आँखों से देखे नहीं जा सकते थे। प्रत्येक को सृष्टिकर्ता के वचनों के द्वारा जीवन दिया गया था, हर एक की वंशवृद्धि सृष्टिकर्ता के वचनों के कारण हुई और प्रत्येक सृष्टिकर्ता के वचनों के कारण सृष्टिकर्ता की संप्रभुता के अधीन जीवन बिताता था। यद्यपि उन्होंने सृष्टिकर्ता की श्वास को प्राप्त नहीं किया था, फिर भी वे अपने अलग-अलग रूपों और संरचना के द्वारा उस जीवन व चेतना को दर्शाते थे जो सृष्टिकर्ता द्वारा उन्हें दिया गया था; भले ही उन्हें बोलने की काबिलियत नहीं दी गई थी जैसा सृष्टिकर्ता के द्वारा मनुष्यों को दी गयी थी, फिर भी उन में से प्रत्येक ने अपने उस जीवन की अभिव्यक्ति का एक अन्दाज़ प्राप्त किया जिसे सृष्टिकर्ता के द्वारा उन्हें दिया गया था और वो मनुष्यों की भाषा से अलग था। सृष्टिकर्ता के अधिकार ने न केवल अचल पदार्थ प्रतीत होने वाली वस्तुओं को जीवन की चेतना दी, जिससे वे कभी भी विलुप्त न हों, बल्कि इसके अतिरिक्त, प्रजनन करने और बहुगुणित होने के लिए हर जीवित प्राणियों को अंतःज्ञान भी दिया, ताकि वे कभी भी विलुप्त न हों और वे पीढ़ी-दर-पीढ़ी जीवित रहने के नियमों और सिद्धांतों को आगे बढ़ाते जाएँ जो सृष्टिकर्ता के द्वारा उन्हें दिये गए हैं। जिस रीति से सृष्टिकर्ता अपने अधिकार का इस्तेमाल करता है, वह अतिसूक्ष्म और अतिविशाल दृष्टिकोण से कड़ाई से चिपका नहीं रहता है और किसी आकार में सीमित नहीं होता; वह विश्व के परिचालन को नियंत्रित करने और सभी चीज़ों के जीवन और मृत्यु के ऊपर प्रभुता रखने में समर्थ है और इसके अतिरिक्त सब वस्तुओं को भली-भाँति सँभाल सकता है जिससे वे उसकी सेवा करें; वह पर्वतों, नदियों, और झीलों के सब कार्यों का प्रबन्ध कर सकता है, और उनके भीतर की सब वस्तुओं पर शासन कर सकता है और इसके अलावा, वह सब वस्तुओं के लिए जो आवश्यक है उसे प्रदान कर सकता है। यह मानवजाति के अलावा सब वस्तुओं के मध्य सृष्टिकर्ता के अद्वितीय अधिकार का प्रकटीकरण है। ऐसा प्रकटीकरण मात्र एक जीवनकाल के लिए नहीं है; यह कभी नहीं रूकेगा, न थमेगा और किसी व्यक्ति या चीज़ के द्वारा बदला या बिगाड़ानहीं जा सकता है और न ही उसमें किसी व्यक्ति या चीज़ के द्वारा कुछ जोड़ा या घटाया जा सकता है—क्योंकि कोई भी सृष्टिकर्ता की पहचान की जगह नहीं ले सकता और इसलिए सृष्टिकर्ता के अधिकार को किसी सृजित किए गए प्राणी के द्वारा प्रतिस्थापित नहीं किया जा सकता है; यह किसी गैर-सृजित प्राणी के द्वारा प्राप्त नहीं किया जा सकता है। उदाहरण के लिए, परमेश्वर के सन्देशवाहकों और स्वर्गदूतों को लो। उनके पास परमेश्वर की सामर्थ्‍य नहीं है और सृष्टिकर्ता का अधिकार तो उनके पास बिलकुल भी नहीं है और उनके पास परमेश्वर का अधिकार और सामर्थ्‍य क्यों नहीं है उसका कारण यह है कि उनमें सृष्टिकर्ता का सार नहीं है। गैर-सृजित प्राणी, जैसे परमेश्वर के सन्देशवाहक और स्वर्गदूत, भले ही हालाँकिपरमेश्वर की तरफ से कुछ कर सकते हैं, परन्तु वे परमेश्वर का प्रतिनिधित्व नहीं कर सकते। यद्यपि वे कुछ सामर्थ्‍य धारण किए हुए हैं जो मनुष्य के पास नहीं है, फिर भी उनके पास परमेश्वर का अधिकार नहीं है, सब वस्तुओं को बनाने, सब वस्तुओं को आज्ञा देने और सब वस्तुओं के ऊपर संप्रभुता रखने के लिए उनके पास परमेश्वर का अधिकार नहीं है। इस प्रकार परमेश्वर की अद्वितीयता की जगह कोई गैर-सृजित प्राणी नहीं ले सकता है और उसी प्रकार कोई गैर-सृजित प्राणी परमेश्वर के अधिकार और सामर्थ्‍य का स्थान नहीं ले सकता। क्या तुमने बाइबल में, परमेश्वर के किसी सन्देशवाहक के बारे में पढ़ा है जिसने सभी चीज़ों की सृष्टि की हो? परमेश्वर ने सभी चीज़ों के सृजन के लिए किसी संदेशवाहक या स्वर्गदूत को क्यों नहीं भेजा? क्योंकि उनके पास परमेश्वर का अधिकार नहीं था और इसलिए उनके पास परमेश्वर के अधिकार का इस्तेमाल करने की योग्यता भी नहीं थी। सभी जीवधारियों के समान, वे सभी सृष्टिकर्ता की प्रभुता के अधीन हैं और सृष्टिकर्ता के अधिकार के अधीन हैं और इसी रीति से, सृष्टिकर्ता उनका परमेश्वर भी है और उनका सम्राट भी। उन में से हर एक के बीच—चाहे वे उच्च श्रेणी के हों या निम्न, बड़ी सामर्थ्‍य के हों या छोटी—ऐसा कोई भी नहीं है जो परमेश्वर के अधिकार से बढ़कर हो सके और इस प्रकार उनके बीच में, ऐसा कोई भी नहीं है जो सृष्टिकर्ता की पहचान का स्थान ले सके। उन्‍हें कभी भी परमेश्वर नहीं कहा जाएगा और वे कभी भी सृष्टिकर्ता नहीं बन पाएँगे। ये न बदलने वाले सत्‍य और तथ्य हैं!

— "वचन देह में प्रकट होता है" में 'स्वयं परमेश्वर, जो अद्वितीय है I' से उद्धृत

आज मानवजाति के विकास में, मानवजाति के विज्ञान को प्रगतिशील कहा जा सकता है, मनुष्य के वैज्ञानिक अनुसन्धानों की उपलब्धियों को प्रभावशील कहा जा सकता है। मनुष्य की काबिलियत लगातार बढ़ती जा रही है, परन्तु एक अति-महत्वपूर्ण उपलब्धि है जिसे मानवजाति हासिल करने में असमर्थ है : मानवजाति ने हवाई जहाज़, मालवाहक विमान और परमाणु बम बनाया है, मानवजाति अंतरिक्ष में जा चुकी है, चन्द्रमा पर चल चुकी है, इंटरनेट का अविष्कार किया है, ऊँची तकनीक युक्त जीवन-शैली जीने लगी है, फिर भी, मानवजाति किसी प्राणी को बनाने में असमर्थ है। प्रत्येक जीवित प्राणी का सहज ज्ञान और वे नियम जिनके द्वारा वे जीते हैं, और हर प्रकार के जीवित प्राणी के जीवन और मृत्यु का जीवन चक्र—यह सब कुछ मनुष्य के विज्ञान के द्वारा असम्भव और नियन्त्रण के बाहर है। इस बिन्दु पर, ऐसा कहना होगा कि इससे कोई फर्क नहीं पड़ता कि मानवजाति कितनी ऊँचाइयों को छूती है, उसकी तुलना सृष्टिकर्ता के किसी भी विचार से नहीं की जा सकती, वे सृष्टिकर्ता की सृष्टि की अद्भुतता और उसके अधिकार की शक्ति को परखने में असमर्थ हैं। पृथ्वी के ऊपर कितने सारे महासागर हैं, फिर भी उन्होंने कभी भी अपनी सीमाओं का उल्लंघन नहीं किया, अपनी इच्छा से भूमि पर नहीं आए, ऐसा इसलिए है क्योंकि परमेश्वर ने उनमें से प्रत्येक के लिए सीमाएँ तय कर दी हैं; वे वहीं ठहर गए जहाँ उसने उन्हें ठहरने की आज्ञा दी थी, बिना परमेश्वर की आज्ञा के वे यहाँ-वहाँ स्वतन्त्रता से जा नहीं सकते हैं। बिना परमेश्वर की आज्ञा के, वे एक-दूसरे की सरहदों का अतिक्रमण नहीं सकते, वे तभी आगे बढ़ सकते हैं जब परमेश्वर ऐसा करने लिए कहेगा, वे कहाँ जाएँगे और कहाँ ठहरेंगे यह परमेश्वर के अधिकार के द्वारा निर्धारित होता है।

इसे साफ तौर पर कहें तो, "परमेश्वर के अधिकार" का अर्थ है कि यह परमेश्वर पर निर्भर है। परमेश्वर के पास यह निर्णय लेने का अधिकार है कि वह किसी कार्य को कैसे करे, और जैसा वह चाहता है उसे उसी रीति से किया जाता है। सभी चीज़ों का नियम परमेश्वर पर निर्भर है, मनुष्य पर निर्भर नहीं है; न ही उसे मनुष्य के द्वारा पलटा जा सकता है। उसे मनुष्य की इच्छा के द्वारा हिलाया नहीं जा सकता है, बल्कि उसे परमेश्वर के विचारों, परमेश्वर की बुद्धि, परमेश्वर के आदेशों द्वारा बदला जा सकता है। यह तथ्य है जिसे मनुष्य नकार नहीं सकता। स्वर्ग, पृथ्वी और सभी चीज़ें, ब्रह्मांड, सितारों से जगमगाता हुआ आसमान, साल की चार ऋतुएँ, वह जो मनुष्य के लिए दृश्य और अदृश्य हैं—वे सभी परमेश्वर के अधिकार की अधीनता में, परमेश्वर के आदेशों के अनुसार, परमेश्वर की आज्ञाओं के अनुसार और सृष्टि के आरंभ के नियमों के अनुसार बिना किसी ग़लती के अस्तित्व में बने रहते हैं, कार्य करते हैं और परिवर्तित होते हैं। कोई वस्तु या व्यक्ति अपने नियमों को नहीं बदल सकता, न ही अपने स्वाभाविक क्रम जिस के तहत वह कार्य करता है उन्हें बदल सकता है; वे परमेश्वर के अधिकार के कारण अस्तित्व में आए और परमेश्वर के अधिकार के कारण ही नष्ट होते हैं। यही परमेश्वर का अधिकार है। अब जबकि इतना सब कुछ कहा जा चुका है, क्या तुम महसूस कर सकते हो कि परमेश्वर का अधिकार परमेश्वर की पहचान और परमेश्वर की हैसियत का प्रतीक है? क्या किसी सृजित या गैर-सृजित प्राणी द्वारा परमेश्वर के अधिकार को धारण किया जा सकता है? क्या किसी व्यक्ति, वस्तु या चीज़ द्वारा उसका अनुकरण, रूप धारण या उसका स्थान लिया जा सकता है?

— "वचन देह में प्रकट होता है" में 'स्वयं परमेश्वर, जो अद्वितीय है I' से उद्धृत

परमेश्वर की सामर्थ्‍य किसी भी तरह की चीज़ की सृष्टि करने में सक्षम है जिनके पास जीवन और चेतना हो, यह परमेश्वर के जीवन के द्वारा निर्धारित होता है। परमेश्वर जीवन है, इस प्रकार वह सभी जीवित प्राणियों का स्रोत है। इसके अतिरिक्त, परमेश्वर का अधिकार सभी जीवित प्राणियों को परमेश्वर के हर एक वचन का पालन करवा सकता है, अर्थात् परमेश्वर के मुँह के वचनों के अनुसार अस्तित्व में आना, परमेश्वर की आज्ञा के अनुसार जीना और प्रजनन करना, उसके बाद परमेश्वर सभी जीवित प्राणियों पर शासन करता और आज्ञा देता है और उसमें, सदा-सर्वदा के लिए कभी भी कोई भटकाव नहीं होगा। किसी व्यक्ति या वस्तु में ये चीज़ें नहीं हैं; केवल सृष्टिकर्ता ही ऐसी सामर्थ्‍य को धारण करता और रखता है, इसलिए इसे अधिकार कहा जाता है। यह सृष्टिकर्ता की अद्वितीयता है। इस प्रकार, चाहे वह शब्द स्वयं "अधिकार" हो या इस अधिकार का सार, प्रत्येक को सिर्फ सृष्टिकर्ता के साथ ही जोड़ा जा सकता है, क्योंकि यह सृष्टिकर्ता की अद्वितीय पहचान व सार का एक प्रतीक है, यह सृष्टिकर्ता की पहचान और हैसियत को दर्शाता है; सृष्टिकर्ता के अलावा, किसी भी व्यक्ति या वस्तु को "अधिकार" शब्द के साथ जोड़ा नहीं जा सकता है। यह सृष्टिकर्ता के अद्वितीय अधिकार की एक व्याख्या है।

— "वचन देह में प्रकट होता है" में 'स्वयं परमेश्वर, जो अद्वितीय है I' से उद्धृत

"मैं ने बादल में अपना धनुष रखा है, वह मेरे और पृथ्वी के बीच में वाचा का चिह्न होगा।" ये सृष्टिकर्ता के द्वारा मनुष्यजाति को बोले गए मूल वचन हैं। जैसे ही उसने इन वचनों को कहा, एक इंद्रधनुष मनुष्य की आँखों के सामने प्रकट हो गया, जहाँ वो आज तक मौजूद है। हर किसी ने ऐसे इंद्रधनुष को देखा है और जब तुम उसे देखते हो तो क्या तुम जानते हो कि यह कैसे प्रकट होता है? विज्ञान इसे साबित करने में या उसके स्रोत को ढूँढ़ने में या उसके उद्गम स्थान को पहचानने में नाकाम है। क्योंकि इंद्रधनुष उस वाचा का चिह्न है जो सृष्टिकर्ता और मनुष्य के बीच में बांधी गयी थी; इसके लिए किसी वैज्ञानिक आधार की आवश्यकता नहीं है, यह मनुष्य के द्वारा नहीं बनाया गया था, न ही मनुष्य इसे बदलने में सक्षम है। अपने वचनों को कहने के बाद यह सृष्टिकर्ता के अधिकार की निरन्तरता है। अपनी प्रतिज्ञा और मनुष्य के साथ अपनी वाचा में बने रहने के लिए सृष्टिकर्ता ने अपनी विशिष्ट विधि का उपयोग किया और इस प्रकार उसने जो वाचा स्थापित की थी उसके चिह्न के रूप में उसके द्वारा इंद्रधनुष का उपयोग, एक स्वर्गीय आदेश और व्यवस्था है जो हमेशा अपरिवर्तनीय बना रहेगा, भले ही वह सृष्टिकर्ता के संबंध में हो या सृजित मानवजाति के संबंध में। ये कहना ही होगा कि यह अपरिवर्तनीय व्यवस्था, सभी चीज़ों की सृष्टि के बाद सृष्टिकर्ता के अधिकार का एक और सच्चा प्रकटीकरण है और यह भी कहना होगा कि सृष्टिकर्ता के अधिकार और सामर्थ्‍य असीमित हैं; उसके द्वारा इंद्रधनुष को एक चिह्न के रूप में इस्तेमाल करना सृष्टिकर्ता के अधिकार की निरन्तरता और विस्तार है। अपने वचनों को इस्तेमाल करते हुए यह परमेश्वर द्वारा किया गया एक और कार्य था और अपने वचनों को इस्तेमाल करते हुए परमेश्वर ने मनुष्य के साथ जो वाचा बाँधी थी, उसका एक चिह्न था। उसने मनुष्य को बताया कि उसने क्या करने का संकल्प लिया है और वह किस रीति से पूर्ण और प्राप्त किया जाएगा। इस तरह से परमेश्वर के मुख के वचनों से वह विषय पूरा हो गया। केवल परमेश्वर के पास ही ऐसी सामर्थ्‍य है और आज उसके द्वारा इन वचनों के बोले जाने के कई हज़ार साल बाद भी मनुष्य परमेश्वर के मुख से बोले गए इंद्रधनुष को देख सकता है। परमेश्वर के द्वारा बोले गए वचनों के कारण, इंद्रधनुष बिना किसी बदलाव और परिवर्तन के आज तक ऊपर आकाश में अस्तित्व में बना हुआ है। इस इंद्रधनुष को कोई भी हटा नहीं सकता है, कोई भी इसके नियमों को बदल नहीं सकता है। यह सिर्फ परमेश्वर के वचनों के कारण ही अस्तित्व में बना हुआ है। बिलकुल सही अर्थ में यह परमेश्वर का अधिकार है। "परमेश्वर अपने वचन का पक्का है और उसका वचन पूरा होगा और जो कुछ वो पूरा करेगा वह सर्वदा बना रहेगा।" ऐसे वचन यहाँ पर साफ-साफ अभिव्यक्त किए गए हैं और यह परमेश्वर के अधिकार और सामर्थ्‍य का स्पष्ट चिह्न और गुण हैं। ऐसा चिह्न या गुण सृजित किए गए प्राणियों में से किसी के भी पास नहीं है और न ही उनमें देखे जाते हैं और न ही इसे गैर-सृजित प्राणियों में से किसी के भी पास देखा जाता है। यह केवल अद्वितीय परमेश्वर का है और मात्र सृष्टिकर्ता के द्वारा धारण की गई पहचान और सार को अन्य जीवधारियों से पृथक करता है। साथ ही, यह ऐसा चिह्न और गुण भी है जिससे श्रेष्ठ स्वयं परमेश्वर को छोड़, कोई भी भी सृजित या गैर-सृजित प्राणी नहीं हो सकताचिह्न।

परमेश्वर के द्वारा मनुष्य के साथ वाचा बाँधना एक अति महत्वपूर्ण कार्य था। एक ऐसा कार्य था जिसका उपयोग वह मनुष्य तक एक सच पहुँचाने और मनुष्य को अपनी इच्छा बताने के लिए करना चाहता था। इस कारण उसने एक अद्वितीय विधि का इस्तेमाल करते हुए, मनुष्य के साथ वाचा बाँधने के लिए एक विशिष्ट चिह्न का उपयोग किया, जो मनुष्य के साथ बांधी गयी वाचा का एक चिह्न था। अतः क्या इस वाचा का ठहराया जाना एक बड़ी घटना थी? वह घटना आखिर कितनी बड़ी थी? यही वह बात है जो इस वाचा को विशेष बनाती है : यह एक मनुष्य और दूसरे मनुष्य के बीच या एक समूह और दूसरे समूह के बीच या एक देश और दूसरे देश के बीच ठहराई गई वाचा नहीं है, बल्कि सृष्टिकर्ता और सम्पूर्ण मानवजाति के बीच ठहराई गई वाचा है और यह तब तक प्रमाणित बनी रहेगी जब तक सृष्टिकर्ता सब वस्तुओं का उन्मूलन न कर दे। इस वाचा का प्रतिपादन करने वाला सृष्टिकर्ता है और इसको बनाए रखने वाला भी सृष्टिकर्ता ही है। संक्षेप में, मानवजाति के साथ ठहराई गई इंद्रधनुष की वाचा की सम्पूर्णता, सृष्टिकर्ता और मानवजाति के मध्य हुए संवाद के अनुसार पूर्ण और प्राप्त हुई थी और आज तक ऊपर आकाश में अस्तित्व में वैसी ही बनी हुई है। सृजित जीवधारी समर्पण करने, आज्ञा मानने, विश्वास करने, प्रशंसा करने, गवाही देने और सृष्टिकर्ता के अधिकार की स्तुति करने के सिवा और क्या कर सकते हैं? क्योंकि अद्वितीय परमेश्वर के अलावा किसी और के पास ऐसी वाचा को ठहराने का सामर्थ्य नहीं है। इंद्रधनुष का प्रकटीकरण बार-बार, मानवजाति के लिए घोषणा करता है और उसके ध्यान को सृष्टिकर्ता और मानवजाति के मध्य बांधी गयी वाचा की ओर खींचता है। सृष्टिकर्ता और मानवजाति के मध्य ठहराई गयी वाचा के निरन्तर प्रकटीकरण में, मनुष्य को, इंद्रधनुष या वाचा नहीं दिखलाए जाते, वरन सृष्टिकर्ता के अपरिर्वतनशील अधिकार को दिखाया जाता है। बार-बार इंद्रधनुष का प्रकटीकरण छिपे हुए स्थानों में सृष्टिकर्ता के ज़बर्दस्त और अद्भुत कर्मों को दर्शाता है और साथ ही यह सृष्टिकर्ता के अधिकार का अतिआवश्यक प्रतिबिम्ब है जो कभी धूमिल नहीं होगा, कभी नहीं बदलेगा। क्या यह सृष्टिकर्ता के अद्वितीय अधिकार के एक और पहलू का प्रकटीकरण नहीं है?

— "वचन देह में प्रकट होता है" में 'स्वयं परमेश्वर, जो अद्वितीय है I' से उद्धृत

जब परमेश्वर ने कहा, "मैं तेरे वंश को अनगिनत करूँगा" तो यह वह वाचा थी जो परमेश्वर ने अब्राहम के साथ बाँधी थी और इंद्रधनुष की वाचा के समान, इसे अनंतकाल के लिए पूरा किया जाएगा और यह परमेश्वर द्वारा अब्राहम को दी गई प्रतिज्ञा भी थी। केवल परमेश्वर ही ऐसी प्रतिज्ञा को पूरा करने में योग्य और सक्षम है। मनुष्य इस पर विश्वास करे या न करे, मनुष्य इसे स्वीकार करे या न करे, मनुष्य चाहे इसे किसी भी नज़रिए से देखे और इसे कैसे भी समझे, यह सब कुछ परमेश्वर के द्वारा बोले गए वचनों के अनुसार अक्षरशः पूरा हो जाएगा। मनुष्य की इच्छा और शरणा में हुए परिवर्तन के कारण परमेश्वर के वचन नहीं बदलेंगेऔर न ही किसी व्यक्ति, घटना, या वस्तु में हुए बदलाव के कारण ये बदलेंगे। सभी चीज़ें विलुप्त हो सकती हैं, परन्तु परमेश्वर के वचन सर्वदा बने रहेंगे। इसके विपरीत, जिस दिन सभी चीज़ें विलुप्त हो जाएँगी यह बिलकुल वही दिन होगा जब परमेश्वर के वचन सम्पूर्ण रीति से पूरे हो जाएँगे, क्योंकि वह सृष्टिकर्ता है, उसके पास सृष्टिकर्ता का अधिकार है, सृष्टिकर्ता की सामर्थ्‍य है, वह सब वस्तुओं और सम्पूर्ण जीवन शक्ति को नियन्त्रित करता है; वह शून्य से कुछ भी बना सकता है या किसी को भी शून्य बना सकता है और वह जीवित वस्तुओं से लेकर मृत वस्तुओं तक, सभी चीज़ों के रूपान्तरण को नियन्त्रित करता है; परमेश्वर के लिए, किसी व्यक्ति के वंश को बहुगुणित करने से अधिक आसान कुछ भी नहीं हो सकता है। यह सुनने में मनुष्य को परियों की कहानी के समान काल्पनिक लगता है, परन्तु जब परमेश्वर किसी कार्य को करने का निर्णय ले लेता है और उसे करने की प्रतिज्ञा करता है, तो यह काल्पनिक नहीं है और न ही यह परियों की कहानी है। बल्कि यह एक तथ्य है जिसे परमेश्वर ने पहले से ही देख लिया है और वह निश्चय घटित होगा। क्या तुम लोग इसे सराहते हो? क्या तथ्य प्रमाणित करते हैं कि अब्राहम के वंशज अनगिनत थे? और कितने अनगिनत थे? "आकाश के तारागण, और समुद्र के तीर की बालू के किनकों के समान" अनगिनत थे, जैसा कि परमेश्वर के द्वारा कहा गया था? क्या वे संसार में सब जातियों और प्रदेशों में फैल गए थे? और इस तथ्य को किसके द्वारा पूरा किया था? क्या यह परमेश्वर के वचनों के अधिकार के द्वारा पूरा किया गया था? परमेश्वर के वचनों के कहे जाने के सैकड़ों और हज़ारों सालों बाद भी परमेश्वर के वचन लगातार पूरे होते गए और निरन्तर तथ्य बनते रहे; यह परमेश्वर के वचनों की शक्ति और परमेश्वर के अधिकार की पहचान है। जब परमेश्वर ने आरंभ में सब वस्तुओं की सृष्टि की, परमेश्वर ने कहा उजियाला हो और उजियाला हो गया। यह बहुत जल्द हो गया और बहुत कम समय में ही पूरा हो गया और उसकी प्राप्ति और पूरे होने में कोई देरी नहीं हुई थी; परमेश्वर के वचन के प्रभाव तात्कालिक थे। दोनों ही परमेश्वर के अधिकार का प्रदर्शन थे, परन्तु जब परमेश्वर ने अब्राहम को आशीष दी तो उसने मनुष्य को परमेश्वर के अधिकार के सार के अन्य पहलू को देखने की मंजूरी दी और उसने मनुष्य को यह तथ्य देखने की अनुमति दी कि सृष्टिकर्ता का अधिकार गणना के परे है, और इसके अतिरिक्त, मनुष्य को सृष्टिकर्ता के अधिकार का एक अधिक वास्तविक, अत्‍युत्तम पहलू देखने का अवसर प्रदान किया।

जब एक बार परमेश्वर के वचन बोल दिए जाते हैं तो परमेश्वर का अधिकार इस कार्य की कमान अपने हाथ में ले लेता है और वह तथ्य जिसकी प्रतिज्ञा परमेश्वर के मुँह से की गई थी धीरे-धीरे वास्तविक होने लगता है। परिणामस्वरूप सभी चीज़ों में परिवर्तन होना शुरू हो जाता है, जैसे बसंत के आगमन पर घास हरी हो जाती है, फूल खिलने लग जाते हैं, पेड़ों में कोपलें फूटने लग जाती हैं, पक्षी गाना शुरू कर देते हैं, कलहँस लौट आते हैं, मैदान लोगों से भर जाते हैं...। बसंत के आगमन के साथ ही सभी चीज़ें नई हो जाती हैं और यह सृष्टिकर्ता का आश्चर्यकर्म है। जब परमेश्वर अपनी प्रतिज्ञाओं को पूरा करता है तो स्वर्ग और पृथ्वी में सब वस्तुएँ परमेश्वर के वचन के अनुसार नई हो जाती हैं और बदल जाती हैं—कोई भी इससे अछूता नहीं रहता है। जब परमेश्वर के मुँह से प्रतिबद्धता या प्रतिज्ञा के वचनों को बोल दिया जाता है, तो सभी चीज़ें उसे पूरा करने के लिए कार्य करती हैं, और उसकी पूर्णता के लिए कुशलता से कार्य करती हैं; सभी जीवधारियों को सृष्टिकर्ता के शासन के अधीन सावधानी से आयोजित और व्यवस्थित किया जाता है और वे अपनी-अपनी भूमिकाओं को निभाते हैं और अपने-अपने कार्य को करते हैं। यह सृष्टिकर्ता के अधिकार का प्रकटीकरण है। तुम इसमें क्या देखते हो? तुम परमेश्वर के अधिकार को कैसे जानते हो? क्या परमेश्वर के अधिकार का एक दायरा है? क्या कोई समय सीमा है? क्या इसे एक निश्चित ऊँचाई या एक निश्चित लम्बाई तक कहा जा सकता है? क्या इसे किसी कहा जा सकता है कि इसका कोई निश्चित आकार या शक्ति है? क्या इसे मनुष्य के आयामों के द्वारा नापा जा सकता है? परमेश्वर का अधिकार जलता-बुझता नहीं, ना ही वह आता-जाता है और कोई नहीं माप सकता कि उसका अधिकार कितना विशाल है। चाहे कितना भी समय बीत जाए, जब परमेश्वर किसी मनुष्य को आशीष देता है, तो यह आशीष बनी रहती है और इसकी निरन्तरता परमेश्वर के अपरिमेय अधिकार की गवाही देगीऔर मानवजाति को परमेश्वर के पुनः प्रकट होने वाले और कभी न बुझने वाली जीवन शक्ति को बार-बार देखने की अनुमति देगी। उसके अधिकार का प्रत्येक प्रकटीकरण उसके मुँह से निकले वचनों का पूर्ण प्रदर्शन है और इसे सब वस्तुओं और मानवजाति के सामने प्रदर्शित किया गया है। इससे अधिक, उसके अधिकार के द्वारा हासिल किया गया सब कुछ तुलना से परे उत्कृष्ट है और उस में कुछ भी दोष नहीं है। यह कहा जा सकता है कि उसके विचार, उसके वचन, उसका अधिकार और सभी कार्य जो वो पूरा करता है, वे अतुल्य रूप से एक सुन्दर तस्वीर हैं, जहाँ तक जीवधारियों की बात है, मानवजाति की भाषा उसके महत्व और मूल्य को बताने में असमर्थ है। जब परमेश्वर एक व्यक्ति से प्रतिज्ञा करता है तो चाहे वे जहाँ भी रहते हों या जो भी करते हों, प्रतिज्ञा को पूरा करने के पहले या उसके बाद की उनकी पृष्ठभूमि या उनके रहने के वातावरण में चाहे जितने बड़े उतार-चढ़ाव आए हों, यह सब कुछ परमेश्वर के लिए उतने ही चिरपरिचित हैं जितना उसके हाथ का पिछला भाग। परमेश्वर के वचनों को कहने के बाद कितना ही समय क्यों न बीत जाए, उसके लिए यह ऐसा है मानो उन्हें अभी-अभी बोला गया है। कहने का तात्पर्य है कि, परमेश्वर के पास सामर्थ्‍य है और उसके पास ऐसा अधिकार है, जिससे वह हर एक प्रतिज्ञा की जो वह मानवजाति से करता है, उनकी लगातार सुधि ले सकता है, उन पर नियन्त्रण कर सकता है और उन्हें पूरा कर सकता है, इससे निरपेक्ष कि प्रतिज्ञा क्या है, इसे सम्पूर्ण रीति से पूरा होने में कितना समय लगेगा, उसका वो दायरा कितना व्यापक है जिस पर उसकी परिपूर्णता असर डालती है—उदाहरण के लिए, समय, भूगोल, जाति, इत्यादि—इस प्रतिज्ञा को पूरा किया जाएगा और इसे साकार किया जाएगा और उसके पूरा होने या साकार होने में उसे ज़रा-सी भी कोशिश करने की आवश्यकता नहीं होगी। इससे क्या साबित होता है? यह साबित करता है कि परमेश्वर के अधिकार और सामर्थ्‍य की व्यापकता सम्पूर्ण विश्व और सम्पूर्ण मानवजाति को नियन्त्रित करने के लिए काफी है। परमेश्वर ने उजियाले को बनाया, इसका मतलब यह नहीं कि वह केवल उजियाले का ही प्रबन्धन करता है या यह कि वह जल का प्रबन्धन सिर्फ इसलिए करता है क्योंकि उसने जल बनाया और बाकी सब कुछ परमेश्वर से संबंधित नहीं है। क्या यह ग़लतफहमी नहीं होगी? यद्यपि सैकड़ों सालों बाद अब्राहम के लिए परमेश्वर की आशीषें धीरे-धीरे मनुष्य की यादों में धूमिल हो चुकी थीं, फिर भी परमेश्वर के लिए वह प्रतिज्ञा जस-की-तस बनी रही। यह तब भी पूरा होने की प्रक्रिया में था और कभी रूका नहीं था। मनुष्य ने न तो कभी जाना और न सुना कि परमेश्वर ने किस प्रकार अपने अधिकार का इस्तेमाल किया था और किस प्रकार सभी चीज़ों को आयोजित और व्यवस्थित किया था और इस दौरान परमेश्वर द्वारा सब वस्तुओं की सृष्टि के बीच कितनी ढेर सारी कहानियाँ घटित हुईं थीं, किन्तु परमेश्वर के अधिकार के प्रकटीकरण और उसके कार्यों के प्रकाशन के प्रत्येक बेहतरीन अंश को सभी चीज़ों तक पहुँचाया गया और उनके बीच गौरवान्वित किया गया था, सब वस्तुएँ सृष्टिकर्ता के अद्भुत कर्मों को दिखाती और उनके बारे में बात करती थी और सभी चीज़ों के ऊपर सृष्टिकर्ता की संप्रभुता की प्रत्येक लोकप्रिय कहानी को सभी चीज़ों के द्वारा सदा-सर्वदा घोषित किया जाएगा। जिस अधिकार के तहत परमेश्वर सभी चीज़ों पर शासन करता है और परमेश्वर की सामर्थ्‍य, सभी चीज़ों को दिखाते हैं कि परमेश्वर हर काल में हर जगह उपस्थित है। जब तुम परमेश्वर के अधिकार और सामर्थ्‍य की सर्वउपस्थिति के साक्षी बन जाते हो तो तुम देखोगे कि परमेश्वर हर काल में, हर जगह उपस्थित होता है। परमेश्वर का अधिकार और सामर्थ्‍य समय, भूगोल, स्थान, या किसी व्यक्ति, घटना या वस्तु के बंधन से परे है। परमेश्वर के अधिकार और सामर्थ्‍य की व्यापकता मनुष्य की कल्पनाओं से परे हैः मनुष्य इसकी थाह नहीं पा सकता, यह मनुष्य के लिए अकल्पनीय है और मनुष्य इसे कभी भी पूरी तरह से नहीं जानेगा।

— "वचन देह में प्रकट होता है" में 'स्वयं परमेश्वर, जो अद्वितीय है I' से उद्धृत

यद्यपि परमेश्वर के पास अधिकार और सामर्थ्‍य है, फिर भी वह अपने कार्यों में बहुत अधिक कठोर और सैद्धांतिक है और अपने वचनों का पक्का बना रहता है। उसकी कड़ाई और उसके कार्यों के सिद्धांत, सृष्टिकर्ता के अधिकार का अपमान न किए जाने की क्षमता को और सृष्टिकर्ता के अधिकार की अजेयता को दर्शाता है। यद्यपि उसके पास सर्वोच्च अधिकार है, सब कुछ उसके प्रभुत्व के अधीन है और यद्यपि उसके पास सभी चीज़ों पर शासन करने का अधिकार है, फिर भी परमेश्वर ने कभी भी अपनी योजना को नुकसान नहीं पहुँचाया है और न ही बाधा पहुँचाई है, जब भी वह अपने अधिकार का इस्तेमाल करता है तो यह कड़ाई से उसके अपने सिद्धांतों के अनुसार होता है, ठीक उसके अनुसार होता है जो कुछ उसके मुँह से निकला था, वह अपनी योजना के चरणों और उद्देश्य का अनुसरण करता है। यह कहने की आवश्यकता नहीं है कि जिन चीज़ों पर परमेश्वर शासन करता है वे भी सिद्धांतों का पालन करती हैं, उसके अधिकार के प्रबंधों से कोई मनुष्य या चीज़ छूटी नहीं है, न ही वे उन सिद्धांतों को बदल सकते हैं जिनके द्वारा उसके अधिकार का इस्तेमाल किया जाता है। परमेश्वर की निगाहों में, जिन्हें आशीषित किया जाता है वे उसके अधिकार द्वारा लाए गए अच्छे सौभाग्य को प्राप्त करते हैं और जो शापित हैं वे परमेश्वर के अधिकार के कारण दण्ड भुगतते हैं। परमेश्वर के अधिकार की संप्रभुता के अधीन, कोई मनुष्य या चीज़ उसके अधिकार के इस्तेमाल से बच नहीं सकती है, न ही वे उन सिद्धांतों को बदल सकते हैं जिनके द्वारा उसके अधिकार का इस्तेमाल किया जाता है। किसी भी कारक में परिवर्तन की वजह से सृष्टिकर्ता का अधिकार बदलता नहीं है और उसी प्रकार वे सिद्धांत जिनके द्वारा उसके अधिकार का इस्तेमाल लिया जाता है किसी भी वजह से परिवर्तित नहीं होते हैं। भले ही स्वर्ग और पृथ्वी किसी बड़े उथल-पुथल से गुज़रें, परन्तु सृष्टिकर्ता का अधिकार नहीं बदलेगा; सभी चीज़ें विलुप्त हो सकती हैं, परन्तु सृष्टिकर्ता का अधिकार कभी गायब नहीं होगा। यह सृष्टिकर्ता के अपरिवर्तनीय और अपमान न किए जा सकने वाले अधिकार का सार है और यही सृष्टिकर्ता की अद्वितीयता है!

— "वचन देह में प्रकट होता है" में 'स्वयं परमेश्वर, जो अद्वितीय है I' से उद्धृत

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