23. परमेश्वर मुझे राह दिखाता है ताकि मैं शैतान की क्रूरता पर काबू पर सकूँ

लेखिका: वांग हुआ, हेनान प्रांत

मैं और मेरी बेटी सर्वशक्तिमान परमेश्वर की कलीसिया से जुड़े ईसाई हैं। परमेश्वर का अनुसरण करने के दौरान, सीसीपी सरकार ने हम दोनों को गिरफ़्तार करके सश्रम पुनर्शिक्षा की सज़ा सुना दी। मुझे तीन साल की सज़ा हुई और मेरी बेटी को एक साल की। हालाँकि सीसीपी सरकार ने मुझे अमानवीय यातनाएँ दीं, और काफ़ी नुकसान पहुँचाया, लेकिन जब भी मैं मायूसी का शिकार हुई और मैंने ख़ुद को ख़तरे में पाया, परमेश्वर ने अदृश्य रहकर मुझ पर नज़र रखी, मेरी रक्षा की और मुझे राह दिखाई। सर्वशक्तिमान परमेश्वर के वचनों ने मुझे जीने के लिए हौसला और प्रेरणा दी, जिसकी वजह से मैं यातनाओं और क्रूर अत्याचारों को सह पाई, और तीन साल के नारकीय कारावास में भी मैं डटी रही। इन मुश्किल हालात में, मैंने सर्वशक्तिमान परमेश्वर का प्रेम और उद्धार देखा, परमेश्वर के वचनों के अधिकार और सामर्थ्य का अनुभव किया। मैं अपने आपको बहुत भाग्यशाली मानती हूँ कि मैंने इतना कुछ पाया। मैंने संकल्प लिया है कि मैं अचल रहकर, परमेश्वर का अनुसरण करूँगी और जीवन के सही मार्ग पर चलूँगी।

परमेश्वर में आस्था रखने से पहले, मैं कारोबार चलाती थी। मेरा कारोबार ठीक-ठाक चल रहा था और मैं अच्छा-‌खासा कमा लेती थी। रोज़ी-रोटी में व्यस्त रहने के दौरान, मैंने ज़िंदगी में उतार-चढ़ाव भी बहुत देखे। दिन-रात पैसे कमाने के लिए बुद्धि खपाने के अलावा, हर चीज़ (मद) की जाँच के लिए सारे सरकारी विभागों से भी निपटना पड़ता था। दिन भर बातचीत में झूठ बोलना पड़ता था, लोगों से मेल-जोल में झूठा आडंबर खड़ा करना पड़ता था। इस तरह की ज़िंदगी से मैं दुखी हो गई थी, ऊब गई थी, लेकिन मेरे पास कोई विकल्प नहीं था। जब नौबत यह आ गई कि मैं भावनात्मक और शारीरिक रूप से टूट गई, तो मैंने सर्वशक्तिमान परमेश्वर के अंत के दिनों के सुसमाचार को स्वीकार कर लिया। मैंने देखा कि सर्वशक्तिमान परमेश्वर द्वारा व्यक्त वचनों में जीवन के रहस्यों को प्रकट किया गया है, इंसान के दुखों के मूल को, और शैतान द्वारा इंसान की भ्रष्टता के सत्य को भी उजागर किया गया है। ये वचन वह मार्ग भी दिखाते हैं इंसान को जिसका अनुसरण आजीवन करना चाहिये। मेरे दिल ने परमेश्वर के इन वचनों को तुरंत आत्मसात कर लिया। मुझे तहे-दिल से यकीन हो गया कि यह सच्चे परमेश्वर का कार्य है, और परमेश्वर में आस्था रखना जीवन का एकमात्र सही मार्ग है। परमेश्वर के अंत के दिनों के कार्य को स्वीकार कर पाने की वजह से मैंने स्वयं को बहुत ही खुशनसीब समझा। मुझे उन तमाम लोगों का ख़्याल आया जो मेरी ही तरह, एक निरर्थक जीवन जी रहे थे, जिन्हें कोई दिशा नहीं मिली थी, जिन्हें सर्वशक्तिमान परमेश्वर के अंत के दिनों के उद्धार की ज़रूरत थी। मेरी इच्छा हुई कि मैं सत्य की खोज में भटक रहे लोगों के बीच अंत के दिनों के सुसमाचार का प्रचार-प्रसार करूँ, ताकि और अधिक लोग परमेश्वर के उद्धार को पा सकें। परमेश्वर के प्रेम से मैं इतनी भावुक और द्रवित हो गई थी कि मैं परमेश्वर के कार्य और उसके उद्धार के बारे में जितना बताती वो कम ही होता था। इन उपदेशों को सुनकर, मुझे कुछ सच्चे सत्य-खोजी मिल गए, मैं रोमाँचित थी। उस दौरान, मेरी बेटी ने हाई स्कूल की पढ़ाई बस पूरी की ही थी। सर्वशक्तिमान परमेश्वर का अनुसरण करने के बाद से, मेरी बेटी को मेरे चेहरे की ख़ुशी साफ़ दिखाई देती थी। उसने यह भी महसूस किया कि हमारे घर आने वाले भाई-बहन भी बड़े ही निर्मल और सज्जन इंसान हैं, सब लोग परस्पर खुलकर बातचीत करते हैं, भजन गाते हैं, भाव-विभोर होकर नाचते हैं, हर तरफ़ एक ऐसी ऊर्जा बिखर जाती है जिसमें सकारात्मकता होती है, आनंद होता है। फलस्वरूप, इस तरह का जीवन जीने के लिए वो भी ललचाने लगी, उसकी भी इच्छा हुई कि परमेश्वर में विश्वास रखे, उसका अनुसरण करे। तब से, हम लोग दिन में कारोबार करते, और फिर रात के वक्त मिल-जुलकर प्रार्थना करते, परमेश्वर के वचन पढ़ते, भजन याद करते और परमेश्वर के वचनों को समझने के लिए सहभागिता करते; हम सब एक आनंदपूर्ण जीवन जी रहे थे।

जिस दौरान हम परमेश्वर के प्रेम की गरमाहट में आकंठ डूबने की अनुभूति कर रहे थे, उसी दौरान सीसीपी सरकार के शैतानी पँजों ने हम माँ-बेटी को दबोच लिया। हम पर दुखों का पहाड़ दूट पड़ा—यह एक ऐसा लम्हा था जिसे मैं आजीवन नहीं भूल सकती। 7 दिसम्बर, 2007 की बात है, मेरी बेटी घर पर कपड़े धो रही थी, और मैं कलीसिया के काम के लिए जाने की तैयारी कर रही थी, तभी अचानक, सादे कपड़ों में पाँच-छह पुलिसकर्मी घुस आए। उनमें से एक चिल्लाया, "तुम लोग सर्वशक्तिमान परमेश्वर के विश्वासी हो! ऊपर से, इधर-उधर जा-जाकर प्रचार-प्रसार भी करते हो!" फिर उसने मेरी बेटी की ओर इशारा करते हुए दूसरी दो पुलिसकर्मियों से कहा, "पहले इसे ले जाओ!" वे दोनों पुलिसकर्मी मेरी बेटी को तुरंत उठाकर ले गई। बाकी पुलिसवालों ने मेरे पूरे घर को ऊपर से नीचे तक छान डाला, बक्सा, अलमारी, हमारे कपड़ों की एक-एक जेब छान मारी। पल भर में, बेड, फ़र्श तहस-नहस कर डाला, अपने चमड़े के जूतों से बिस्तर रौंद डाले। आख़िर में, वे लोग परमेश्वर के वचनों की किताबें, डिस्क, सीडी प्लेअर, दो एमपी3 प्लेअर, दो हज़ार युआन नकद और कानों की सोने की बालियाँ ले गए। उसके बाद मुझे भी उन्होंने पुलिस की गाड़ी में ठूँस दिया। मैंने उन्हें ज़िम्मेदार ठहराते हुए सवाल किया, "परमेश्वर में विश्वास रखकर हमने क्या गुनाह किया है? आप लोग हमें गिरफ़्तार क्यों कर रहे हैं?" मैं देखती रह गई जब उन्होंने सबके सामने बड़ी ढिठाई से कहा, "तुम परमेश्वर के विश्वासियों को पकड़ना तो हमारी खासियत है!" मैं गुस्से में थी। ये कोई "लोगों की पुलिस नहीं थी।" ये तो डाकू-बदमाशों का गिरोह था, अपराध की दुनिया के गुंडे थे जिन्हें ख़ासतौर से धार्मिकता पर कड़ी कार्रवाई करने का काम सौंपा गया है!

जब हम लोग सार्वजनिक सुरक्षा ब्यूरो पहुँचे, तो मुझे हथकड़ियाँ डालकर पूछताछ कक्ष में ले जाया गया। उनके खूँखार चेहरे देखकर मैं डर गई, मैंने सोचा: "अब चूँकि मैं इन दरिंदों के हत्थे चढ़ गई हूँ, इन्हें मेरे घर से परमेश्वर के वचनों की पुस्तकें और डिस्क भी बरामद हो गई हैं, तो अब ये लोग यकीनन मुझे छोड़ेंगे नहीं। अगर मैं इनके उत्पीड़न से टूटकर यहूदा बन गई, तो गद्दार और परमेश्वर से दगा करने वाली कहलाऊँगी!" मैंने मन ही मन परमेश्वर से प्रार्थना की कि वो मेरी रक्षा करे और मुझे राह दिखाए। तभी मुझे परमेश्वर के ये वचन याद आ गए: "मैं उन लोगों पर और अधिक दया नहीं करूँगा जिन्होंने गहरी पीड़ा के दिनों में मुझ पर रत्ती भर भी निष्ठा नहीं दिखाई है, क्योंकि मेरी दया का विस्तार केवल इतनी ही दूर तक है। साथ ही साथ, मुझे ऐसा कोई इंसान पसंद नहीं है जिसने कभी मेरे साथ विश्वासघात किया हो, ऐसे लोगों के साथ संबद्ध होना तो मुझे बिल्कुल भी पसंद नहीं है जो अपने मित्रों के हितों को बेच देते हैं। यही मेरा स्वभाव है, इस बात की परवाह किए बिना कि व्यक्ति कौन हो सकता है" ("वचन देह में प्रकट होता है" में "अपनी मंज़िल के लिए पर्याप्त संख्या में अच्छे कर्मों की तैयारी करो")। परमेश्वर के वचनों से मुझे एहसास हुआ कि उसका धार्मिक स्वभाव किसी अपराध को बर्दाश्त नहीं करता, परमेश्वर उनसे प्रेम नहीं करता जो उसके साथ धोखा करते हैं। फिर मैंने परमेश्वर के इन वचनों पर विचार किया: "सत्ता में रहने वाले लोग बाहर से दुष्ट लग सकते हैं, लेकिन डरो मत, क्योंकि ऐसा इसलिए है तुम सब का विश्वास बहुत कम है। जब तक तुम सभी का विश्वास बढ़ता है, तब तक कुछ भी मुश्किल नहीं होगा" ("वचन देह में प्रकट होता है" में आरम्भ में मसीह के कथन के "अध्याय 75")। "हाँ!" मैंने सोचा। "मुझे इनसे डरना नहीं चाहिए। ये दुष्ट पुलिसवाले कितने भी भयावह हों, लेकिन इनकी डोर भी परमेश्वर के हाथों में ही है, ये लोग कितने भी दुर्दांत क्यों न हों, लेकिन परमेश्वर की अनुमति के बिना ये लोग मेरा बाल भी बाँका नहीं कर सकते।" परमेश्वर के वचनों से मुझे विश्वास और हौसला मिला, मैंने परमेश्वर से एक संकल्प किया: "हे परमेश्वर! तेरे द्वारा मेरी परीक्षा का समय आ गया है। मैं चाहती हूँ कि मैं तेरी गवाही दूँ, मैं कसम खाती हूँ कि मैं कभी भी यहूदा नहीं बनूँगी।" प्रार्थना करने के बाद, मेरा मन शांत हो गया। उस वक्त, एक दुष्ट पुलिसवाला जो उनका सरगना लग रहा था, मुझे डाँटने लगा, "बेवकूफ़ औरत! तुझे जो करना था करती, लेकिन अपनी बेटी को तो परमेश्वर की आस्था के चक्कर में न डालती, है कि नहीं? कितनी ख़ूबसूरत है वो। अगर उससे तू धंधा करवाती, तो रईसों से हज़ारो-लाखों युआन हर साल लूट लेती, वो भी मूर्खों की तरह परमेश्वर में विश्वास रखती है! अच्छा बता, तूने कब से परमेश्वर में विश्वास रखना शुरू किया है? तुझे इसमें किसने डाला? वो किताबें तुझे कहाँ से मिलीं?" उसकी बकवास सुनकर मुझे गुस्सा आ गया। मुझे यकीन नहीं हुआ कि एक सम्मानित सरकारी अधिकारी इस तरह की घिनौनी और बेशर्मी की बातें भी कर सकता है! उनकी नज़रों में, देह-व्यापार एक अच्छा काम है, ऐसे इंसान लोगों को इस तरह के नीच काम करने के लिए प्रोत्साहित भी करते हैं। जबकि हम जैसे परमेश्वर में विश्वास रखने वाले, परमेश्वर की आराधना करने वाले, ईमानदारी से जीने वाले लोगों को गलत काम करने वाला अपराधी करार दिया जाता है, हम जैसे लोग इनके निशाने पर होते हैं, हम पर ये लोग कठोर कार्रवाई करते हैं, गिरफ़्तार करते हैं। ऐसी हरकतें करके, क्या ये लोग बुराई को बढ़ावा और अच्छाई का दमन नहीं कर रहे, इंसाफ़ का गला नहीं घोंट रहे? सीसीपी सरकार बेहद दुष्ट और भ्रष्ट है! जिस ढंग से ये लोग बकवास कर रहे थे, और कोई तर्क सुनने को तैयार नहीं हैं, उससे मैं समझ गई कि कुछ भी समझाने का कोई फायदा नहीं, इसलिए मैं चुप हो गई। यह देखकर कि मैं ज़बान खोलने को तैयार नहीं हूँ, ये लोग मुझे फिर से पुलिस की गाड़ी के पास ले गए और धमकाने लगे, "हमें तेरे घर से बहुत सारे सबूत मिले हैं, अगर तू ढंग से पेश नहीं आई हमें सब-कुछ सच-सच नहीं बताया, तो हम तुझे घसीटकर लाएँगे और गोली मार देंगे!" उनकी यह बात सुनकर, मैं डर गई, मैंने सोचा: "ये लोग कुछ भी कर सकते हैं। अगर इन लोगों ने सचमुच मुझे गोली मार दी, तो मैं अपनी बेटी को फिर कभी नहीं देख पाऊँगी।" सोच-सोचकर मैं परेशान हो गई। मैं लगातार परमेश्वर को पुकारती रही, उससे याचना करती रही कि मेरी रक्षा करे, मेरे डर और चिंता को दूर करे। तभी मुझे परमेश्वर के ये वचन याद आए: "संसार में जो कुछ भी होता है, उसमें से ऐसा कुछ भी नहीं है जिस पर अंतिम बात मेरी न हो। ऐसा क्या मौजूद है जो मेरे हाथों में नहीं?" ("वचन देह में प्रकट होता है" में संपूर्ण ब्रह्मांड के लिए परमेश्वर के वचन के "अध्याय 1")। "विश्वास लकड़ी के इकलौते लट्ठे के पुल की तरह है, जो लोग अशिष्टापूर्वक जीवन से लिपटे रहते हैं उन्हें इसे पार करने में परेशानी होगी, परन्तु जो खुद का त्याग करने को तैयार रहते हैं वे बिना किसी फ़िक्र के उसे पार कर सकते हैं। अगर हम में कायरता और भय के विचार हैं तो जान लें कि शैतान हमें मूर्ख बना रहा है जो कि इस बात से डरता है कि हम विश्वास का पुल पार कर परमेश्वर के राज्य में प्रवेश कर जायेंगे" ("वचन देह में प्रकट होता है" में आरम्भ में मसीह के कथन के "अध्याय 6")। उसी वक्त, सब-कुछ स्पष्ट हो गया: "हाँ," मैंने सोचा। "मेरा और मेरी बेटी का जीवन परमेश्वर के हाथों में है, हमारा मरना-जीना परमेश्वर की मर्ज़ी पर है। हमारी नियति पर इन शैतान के गुर्गों का कोई नियंत्रण नहीं है। परमेश्वर की अनुमति के बिना हमारी ज़िंदगी लेने की कोई सोच भी नहीं सकता। शैतान मेरी दुखती रग पर हाथ रखकर, मुझे डराने की कोशिश कर रहा है, उसे लग रहा है कि मैं उसकी धूर्त चाल में आकर, हथियार डाल दूँगी। लेकिन मैं बेवकूफ़ नहीं बनूँगी। मैं मरूँ या जिऊँ, परमेश्वर का आज्ञापालन करूँगी, परमेश्वर को धोखा देने के बजाय मैं मरना पसंद करूँगी।" ऐसा विचार आते ही, मैंने तुरंत फैसला कर लिया कि मैं आख़िरी साँस तक शैतान से लडूँगी, अब मेरे मन से भय समाप्त हो गया था।

पुलिस मुझे नज़रबंदी गृह ले गई। जैसे ही मैं बरामदे में पहुँची, तो सुधार अधिकारियों ने बहुत ही भद्दे तरीके से मेरी तलाशी ली, मुझे अपने जूते और कपड़े उतारने के लिए कहा। उन्होंने मुझे आधा घंटे तक कड़कती ठंड में बरामदे में खड़ा रखा। मुझे इतनी ठंड लग रही थी कि मैं ठीक से खड़ी भी नहीं रह पा रही थी और ठंड से बुरी तरह काँप रही थी, मेरे दाँत लगातार किटकिटा रहे थे। जब सुधार अधिकारियों को मेरे पास कुछ नहीं मिला, तो एक सुधार अधिकारी मुझे एक कोठरी में ले गई, और सरगना कैदी को यह कहकर उकसाने लगी, "यह सर्वशक्तिमान परमेश्वर की विश्वासी है...।" जैसे ही उसने यह बात कही, सारी कैदी मुझ पर टूट पड़ीं, उन्होंने मेरी पैंट टखनों तक नीचे खींचने और फिर ऊपर करने को कहा दी और मुझसे कहा कि मैं बार-बार ऐसा करूँ। मेरे ऐसा करने पर सब हँसने लगीं। मेरा मज़ाक उड़ाने और अपमान करने के बाद, सरगना कैदी ने मुझे बताया कि चूज़ों के पँखों से चीज़ें कैसे बनाई जाती हैं। लेकिन चूँकि इन कामों के लिए कुशलता और अभ्यास की ज़रूरत होती है, इसलिए दूसरे दिन तक भी मैं उस काम में महारथ हासिल नहीं कर पाई। इसका नतीजा या हुआ कि सरगना कैदी ने बाँस के एक डंडे से मेरे हाथों पर इतनी बुरी तरह से मारा कि मेरे हाथ दर्द से सुन पड़ गए। मेरे लिए पँखों को उठा पाना भी मुश्किल हो रहा था। जब मैं पँखों को समेटने लगी, तो सरगना कैदी ने अपने पैरों से मेरे हाथ को कुचल दिया, मेरी उँगलियों में भयंकर दर्द हुआ, लगा जैसे उँगलियाँ टूटकर अलग हो गईं हैं। उसने इतने पर ही सब्र नहीं किया, उसने मेरे सिर पर डंडे बरसाने शुरू कर दिये, मेरा सिर चकराने लगा, आँखों के आगे अंधेरा छा गया। अंत में, बेरहमी से बोली, "तेरी सज़ा यह है कि तू आज रात पाली करेगी। कल पुलिस तुझसे सवाल-जवाब करेगी, इसलिये कल का काम भी तुझे आज ही करना होगा। अगर तूने यह सारा काम नहीं किया, तो कल रात को मैं तुझे रात भर खड़ा रखूँगी!" उस वक्त की अपनी पीड़ा और दबाव को मैं बयाँ नहीं कर सकती। मैंने सोचा, एक तो मैं पहले ही यह सब सह नहीं पा रही हूँ, ऊपर से, मुझे यातना देने के लिए दुष्ट पुलिस इन कैदियों के साथ मिल गई है, मेरे आगे के दिन कैसे कटेंगे? दुखी होकर, मैं इस नाइंसाफ़ी पर रो पड़ी, आँसुओं में डूबा चेहरा लेकर, मैंने मन ही मन परमेश्वर से अपनी व्यथा कह दी: "हे परमेश्वर! हैवानों के इस गिरोह में, जहाँ मेरा मज़ाक बनाया गया है, मेरा उत्पीड़न किया गया है, मैं ख़ुद को बहुत अकेली, बेबस और डरी हुई महसूस कर रही हूँ, मुझे समझ में नहीं आ रहा कि मैं इससे कैसे पार पाऊँ। हे परमेश्वर, मुझे राह दिखा, मुझे शक्ति दे।" प्रार्थना के बाद, मुझे प्रबुद्ध करने के लिए, परमेश्वर ने मुझे अपने वचनों के इस अंश की याद दिलाई: "जिन लोगों को परमेश्वर विजेताओं के रूप में संदर्भित करता है ये वे लोग हैं जो अभी भी गवाह बनने, और शैतान के प्रभाव में होने और शैतान की घेराबंदी में होने पर, अर्थात्, जब अंधकार की शक्तियों के भीतर हों, तो अपना आत्मविश्वास और परमेश्वर के प्रति अपनी भक्ति बनाए रखने में सक्षम हैं। यदि तुम अभी भी परमेश्वर के लिए पवित्र दिल और अपने वास्तविक प्यार को बनाए रखने में सक्षम हो, तो चाहे कुछ हो जाए, तुम परमेश्वर के सामने गवाह बनते हो, और यही वह है जिसे परमेश्वर एक विजेता होने के रूप में संदर्भित करता है" ("वचन देह में प्रकट होता है" में "तुम्हें परमेश्वर के प्रति अपनी भक्ति अवश्य बनाए रखनी चाहिए")। मुझे परमेश्वर के वचनों से बहुत सुकून मिला, उनके कारण मैं परमेश्वर की इच्छा को समझ पाई। परमेश्वर इंसान को पूर्ण बनाने के लिए, उसे शैतान के प्रभाव से मुक्त करने के लिए शैतान की घेरेबंदी और यातनाओं का इस्तेमाल करता है, ताकि परमेश्वर हमें पूर्ण बना सके और हम उसके राज्य में प्रवेश कर सकें। सीसीपी द्वारा शासित इस अंधकारपूर्ण दुष्ट देश में, लोगों को सिर्फ़ कुमार्ग पर चलने की छूट है, सही मार्ग पर नहीं। ऐसा करने में सीसीपी की मंशा है कि लोगों को इतना भ्रष्ट कर दिया जाए कि वे अच्छाई-बुराई और सही-गलत में अंतर ही न कर पाएँ, ताकि लोग दुष्टता की वकालत करें, इंसाफ़ का त्याग कर दें, और ऐसा तब तक किया जाए जब तक कि वे परमेश्वर का विरोध करने के कारण तबाह न हो जाएँ। इंसान अगर अंधेरी ताकतों से घिरकर हार नहीं मानता, परमेश्वर के आगे अपनी आस्था, भक्ति और प्रेम पर कायम रहता है, और परमेश्वर की गवाही देता है, तभी वह सच्चा विजेता बन सकता है, ऐसा करके ही वह शैतान को शर्मिंदा कर सकता है, और परमेश्वर को गौरवान्वित कर सकता है। फिर मैंने परमेश्वर से प्रार्थना की: "हे परमेश्वर! तू शैतान के इन दरिंदों की सेवा इसलिए ले रहा है ताकि तू मेरी आस्था की परीक्षा ले सके और मैं तेरी गवाही दे सकूँ। ऐसा करके, तू मुझे उन्नत कर रहा है, मुझे पता है कि मेरे साथ जो कुछ भी हो रहा है, वह सब तेरा आयोजन है, तू अदृश्य रहकर हर चीज़ की छानबीन कर रहा है। मैं इस परीक्षण में तेरी गवाही देकर तुझे संतुष्ट करना चाहती हूँ। मैं तुझसे केवल इतनी याचना करती हूँ कि मुझे विश्वास और शक्ति प्रदान कर, इन दुखों को सहन करने का संकल्प प्रदान कर, ताकि मैं किसी भी उत्पीड़न के आगे न झुकूँ, न ही अपने मार्ग से भटकूँ!"

तीसरे दिन सुबह नौ बजे, पुलिस मुझे एक पूछताछ कक्ष में ले गई। मेरी बेटी का सेल फ़ोन दिखाते हुए, सवाल करने लगी। "इस फ़ोन तूने मैसेज भेजे हैं। तूने अपनी बेटी से कहा कि तू एक घर खरीदने वाली है, इसका मतलब यह है कि तेरे पास पैसों की कमी नहीं है।" ये दुष्ट पुलिसकर्मी वाकई नीच थे—उन लोगों ने मेरी एक-एक पाई झपट लेने के लिए कोई कोर-कसर बाकी नहीं रखी। मैंने कहा, "मैं तो उससे सिर्फ़ मज़ाक कर रही थी।" अचानक उस पुलिसवाले के हाव-भाव बदल गए, उसने नोटपैड उठाया और मेरे सिर और चेहरे पर तब तक मारता रहा जब तक कि मुझे चक्कर न आ गए और मेरा चेहरा दर्द से कराह न उठा। वो दाँत भींचकर बोला, "बता! तेरा पैसा कहाँ है? अगर तूने नहीं बताया न, तो हम तुझे घसीटकर बाहर निकालेंगे और गोली मार देंगे! या फिर आठ-दस साल के लिए हवालात में डाल देंगे!" मैंने कहा कि मुझे कुछ नहीं पता। एक लंबा, रोबीला पुलिसकर्मी उखड़ गया, वो मेरी तरफ़ आया, उसने पीछे से मेरा ऊपरी हिस्सा दबोचा और मुझे कुछ गज दूर फ़र्श पर उछाल दिया। फिर वह मेरे सिर, पैर और कमर पर लात-घूँसे बरसाते हुए बोला, "ऐसी हरकतें करने का अंजाम यही होता है! तू कह रही है न तुझे कुछ नहीं पता, तुझे लगता है हम बेवकूफ़ हैं! अगर तूने सच नहीं उगला, तो मैं आज ही तेरी कब्र खोद दूँगा!" मैंने दाँत भींचकर दर्द को बर्दाश्त किया और मन ही मन लगातार परमेश्वर को पुकारती रही: "हे परमेश्वर! ये दरिंदे बेहद क्रूर हैं। मुझे इनकी मार को झेलने की शक्ति दे और मेरी रक्षा कर ताकि मैं तेरी गवाही दे सकूँ।" तभी मुझे परमेश्वर के इन वचनों का ख़्याल आया: "मसीह के अच्छे सैनिकों को बहादुर होना चाहिए और आध्यात्मिक रूप से मजबूत होने के लिए मुझ पर निर्भर होना चाहिए; उन्हें योद्धा बनने के लिए लड़ना होगा और शैतान का सामना मौत तक करना होगा" ("वचन देह में प्रकट होता है" में आरम्भ में मसीह के कथन के "अध्याय 12")। "अगर तुम्हारी एक भी सांस बाकी है तो, परमेश्वर तुम्हें मरने नहीं देगा" ("वचन देह में प्रकट होता है" में आरम्भ में मसीह के कथन के "अध्याय 6")। परमेश्वर ने मुझे विश्वास और शक्ति दी, इनसे मुझे सिर पर मँडराती मौत के खौफ़ को दूर करने का हौसला मिला। उस पल मैंने परमेश्वर के प्रेम को महसूस किया, मैंने जाना कि परमेश्वर मेरे साथ है। मैंने सोचा: "तुम लोग मुझे जितना मारोगे, मुझे तुम्हारा परमेश्वर-विरोधी असली रंग उतना ही ज़्यादा नज़र आएगा। अगर मुझे मौत भी आई, तो भी तुम्हारे सामने कभी झुकूँगी नहीं। अगर तुम यह सोचते हो कि मैं परमेश्वर को धोखा दे दूँगी, तो यह तुम्हारी गलतफ़हमी है!" इस विचार के बाद, मेरा पूरा शरीर शांत होता चला गया। उस सुबह उनका कभी मुझे मारने और कभी सवाल-जवाब करने का सिलसिला चलता रहा, और दोपहर को उन लोगों ने मुझे ठंडे और कठोर फर्श पर घुटनों के बल बैठा दिया। वे लोग रात तक मुझे यातना देते रहे, आख़िर में उन्होंने मुझे इस हद तक पीटा कि मेरा दर्द बर्दाश्त से बाहर हो गया, मेरे अंदर खड़े होने की ताकत भी नहीं बची थी। उन्होंने देख लिया कि सवाल-जवाब करके वो मुझसे कुछ भी नहीं उगलवा सके थे, इसलिए वे लोग मुझे वापस नज़रबंदी गृह ले आए।

नज़रबंदी गृह में, संग-दिल सुधार अधिकारी ने मुझे कभी ज़्यादा खाने की इजाज़त नहीं दी, लेकिन मेरा काम का बोझ बढ़ा दिया। वो हर दिन मुझसे 15 घंटे काम करवाती, और अगर मैं काम पूरा न कर पाती, तो वो सरगना कैदी से मेरा उत्पीड़न करवाती। चूँकि ये काम मैंने अभी शुरू ही किया था, मैं उस तेज़ी से काम नहीं कर पाती थी, तो सरगना कैदी उसी स्टील के हथौड़ को मेरे सिर पर मारती जिसका इस्तेमाल मैं काम के लिए करती थी। मेरे सिर पर एक बड़ा-सा गोला निकल आया, उसके बाद उसने मेरे ऊपर लात-घूँसों की बरसात कर दी, वो मुझे तब तक पीटती रही जब तक कि मेरा पूरा जिस्म दर्द से कराहने न लगा और मेरे मुँह से खून न निकल आया। इस क्रूर अत्याचार को सहते हुए, मुझे अपनी बेटी का ही ख़्याल आता रहा। जब से उसे गिरफ़्तार किया था, न जाने वो दरिंदे उस पर क्या अत्याचार कर रहे होंगे, जेल में उसकी क्या हालत होगी। तभी, मुझे मेरी कोठरी से लगी मर्दों की कोठरी से अचानक चीखने की आवाज़ सुनाई दी, मेरी कोठरी की महिला ने मुझे बताया, "यहाँ किसी की जान लेना, एक मच्छर मारने के बराबर है। यहाँ एक पुरुष कैदी यातना बर्दाश्त नहीं कर पाया और वो जेल के पीछे से पहाड़ियों की तरफ़ भाग गया। जब वो पुलिसवालों के हत्थे चढ़ गया, तो उन्होंने उसे पीट-पीटकर मार डाला और उसके घरवालों से कह दिया कि उसने खुदकुशी कर ली। सारी सच्चाई छुपा ली गई।" इस कहानी ने मुझे डरा दिया, मैं अपनी बेटी को लेकर और भी ज़्यादा डर गई। वह अभी 19 साल की ही थी, उसने जीवन में कभी कोई दुख नहीं देखा था, इस तरह की मुश्किल का सामना तो उसने कभी किया ही नहीं था। ये दरिंदे जो पलक झपकते ही किसी भी हत्या कर सकते हैं, घिनौनी से घिनौनी हरकत करने से भी बाज़ नहीं आएँगे, पता नहीं मेरी बेटी इन दरिंदों की यातना और क्रूरता को सह भी पाएगी या नहीं। मुझे तो यह भी नहीं पता था कि मेरी बेटी ज़िंदा भी है या नहीं। मेरा मन व्यथा से भर गया, मुझे सपने में भी इन दरिंदों के हाथों अपनी बेटी को भयंकर यातना दिए जाने के दृश्य दिखाई देते थे। मैं अक्सर सपने शुरू होते ही जाग जाती, और इतनी डर जाती कि फिर मुझे रातभर नींद न आती।

अगले दिन, सुधार अधिकारी ने कोई बहाना बनाकर कहा कि मैं काम में मेहनत नहीं कर रही हूँ और बिना किसी कारण के ही उसने मेरे चेहरे पर डंडे का प्रहार कर दिया। मुझे इतना ज़्यादा दर्द हुआ कि मेरे कान बजने लगे। जैसे इतना काफ़ी नहीं था, वह ज़ोर से चिल्लाई, "मैं तेरी अकड़ ढीली करके रहूँगी, मैं अभी तुझे खौफ़नाक 'आयरन मेडन' (लोहे की ज़ंजीर) का मज़ा चखाती हूँ!" उसने हुक्म दिया और पाँच-छह महिलाओं ने आकर मेरे ढेरों बाल काट दिए, मैं अपने आपको पहचान नहीं पा रही थी और फिर मुझे फ़र्श पर पटककर, जेल का सबसे ख़तरनाक यातना-उपकरण "आयरन मेडन" पहनाने लगे। उन्होंने लोहे का एक रिंग मेरे सिर में पहना दिया, एक-एक मेरे पैरों में पहना दिया, जो आपस में एक छड़ से जुड़े हुए थे। इस यातना-उपकरण से जकड़ दिए जाने के बाद, मैं खड़ी भी नहीं रह पा रही थी, मुझे दीवार का सहारा लेना पड़ा। सुधार अधिकारी मुझे इन यातना-उपकरणों को सुबह पाँच से लेकर आधी रात तक पहनाए रखती थी (मुझे पूरे उन्नीस घंटे तक खड़े रहना पड़ता था), उसने सरगना कैदी से कह रखा था, "इस पर नज़र रखना। अगर यह सोने की कोशिश करे, तो लात मारना!" उसके बाद से सरगना कैदी हर रोज़ मुझ पर नज़र रखने लगी और एक पल के लिए भी मुझे झपकी नहीं लेने देती थी। चूँकि ये रिंग लोहे के बने थे, और मेरे पूरे बदन पर थे, इसलिए मुझे ऐसा लगता था जैसे ये मेरी रगों में खून के बहाव को रोकते हैं। मेरे लिए आँखें खुली रखना बेहद मुश्किल होता था, और ऐसा होने पर सरगना कैदी मुझे गाली देती थी, एक बार तो उसने मुझे लात भी मारी। मेरा पूरा शरीर काँपने लगा, मैं उस पीड़ा को सह नहीं पायी। रात को सोने के वक्त, चार कैदी मुझे उठाकर उसी बड़े तख्त पर पटक देतीं जिस पर मैं दिन में काम किया करती थी, दूसरे दिन सुबह आकर वे मुझे वापस नीचे पटक देतीं। उस दौरान कई दिनों तक बाहर बर्फ़ीला तूफ़ान आता रहा, मौसम कुछ ज़्यादा ही सर्द था। मुझे पीड़ा देने के लिए, उस घिनौनी सुधार अधिकारी ने मुझे वो रिंग सात दिन और सात रातों तक पहनाकर रखे। न मैं खा पाती थी, न पी पाती थी, न शौचालय जा पाती थी। मुझे शौचालय जाने के लिए उन कैदियों की मदद लेनी पड़ती थी, जो अपना काम पूरा नहीं कर पाती थी। हर कैदी सारा दिन व्यस्त रहती थी, इसलिए वे मुझे बड़ी लापरवाही से खाना खिलाती थीं, पानी तो शायद ही कभी पिलाती। मैं दिन भर भूख और ठंड से दुखी रहती थी, एक-एक दिन मुझे युगों के बराबर लगता था। सुबह-सुबह जब वो लोग मुझे उठाते थे, तो मुझे भयंकर तकलीफ़ होती थी, समझ में नहीं आता था कि अगला दिन कैसे कटेगा। मैं बस यही कामना करती थी कि जल्दी से रात हो जाए और सूरज कभी न निकले। लोहे के रिंग इतने भारी थे कि अगले दिन उन्हें पहने रहने से मेरे हाथों का रंग काला और बैंगनी पड़ गया था, चमड़ी ऐसी हो चुकी थी कि लगता था जैसे अभी फट जाएगी। मेरा पूरा शरीर गुब्बारे की तरह फूल गया था, दस महीनों के बाद भी सूजन पूरी तरह से हटी नहीं थी। ऐसी भयानक यातना से गुज़रते हुए इच्छा होती थी कि इससे अच्छा तो मौत आ जाए। पीड़ा को बर्दाश्त करने की मेरी सारी सीमाएँ टूट चुकी थीं। इसलिए, मैं परमेश्वर से यही प्रार्थना करती: "हे परमेश्वर! अब यह तकलीफ़ सही नहीं जाती, मैं अब जीना नहीं चाहती, लेकिन मर भी नहीं सकती। मैं तुझसे यही विनती करती हूँ कि तू मेरी चलती साँसों को ले ले, मैं अब एक पल भी नहीं चाहती।" जब मैं परमेश्वर से यह अनुचित अनुरोध कर रही थी, अपने दर्द से बचने के लिए मरने की दुआ कर रही थी, तो मुझे परमेश्वर के ये वचन याद आए: "आज अधिकाँश लोगों के पास यह ज्ञान नहीं है। वे मानते हैं कि दुःख उठाने का कोई महत्व नहीं है...। कुछ लोगों के कष्ट एक विशेष बिंदु तक पहुँच जाते हैं, और उनके विचार मृत्यु की ओर मुड़ जाते हैं। यह परमेश्वर के लिए सच्चा प्रेम नहीं है; ऐसे लोग कायर होते हैं, उनमें बिलकुल धीरज नहीं होता, वे कमजोर और शक्तिहीन होते हैं! ... इस प्रकार, इन अंतिम दिनों में, तुम्हें परमेश्वर के प्रति गवाही देनी है। इस बात की परवाह किए बिना कि तुम्हारे कष्ट कितने बड़े हैं, तुम्हें अपने अंत की ओर बढ़ना है, अपनी अंतिम सांस तक भी तुम्हें परमेश्वर के प्रति विश्वासयोग्य बने रहना आवश्यक है, और परमेश्वर की कृपा पर रहना चाहिए; केवल यही वास्तव में परमेश्वर से प्रेम करना है और केवल यही मजबूत और सामर्थी गवाही है" ("वचन देह में प्रकट होता है" में "केवल पीड़ादायक परीक्षाओं का अनुभव करने के द्वारा ही तुम परमेश्वर की मनोहरता को जान सकते हो")। "एक मनुष्य के रूप में, तुम्हें परमेश्वर में बढ़ना और समस्त दुखों को सहना चाहिए। तुम्हें थोड़ा दुःख, जो तुम्हें प्राप्त होना ही है, प्रसन्नतापूर्वक और निश्चित ही स्वीकार करना चाहिए और अय्यूब और पतरस के समान एक अर्थपूर्ण जीवन जीना चाहिए। ... तुम सब वे लोग हो, जो सही मार्ग पर चलते हो, वे लोग जो उन्नति को खोजते हो। तुम सब वे लोग हो, जो बड़े लाल अजगर के देश में ऊपर उठते हो, वे लोग जिन्हें परमेश्वर धर्मी बुलाता है। क्या यही सब से अर्थपूर्ण जीवन नहीं है?" ("वचन देह में प्रकट होता है" में "अभ्यास (2)")।परमेश्वर के वचन मेरे सूखे हुए दिल पर किसी ओस की बूंद की तरह पड़े। "हाँ," मैंने सोचा। "यही वो पल है जब परमेश्वर को अपनी गवाही के लिए मेरी ज़रूरत है। मैं केवल इसलिए मर जाऊँ क्योंकि मुझसे दुख झेले नहीं जा रहे, क्या यह कायरता नहीं होगी? भले ही मैं इस वक्त इन दरिंदों के हाथों क्रूरता और उत्पीड़न झेल रही हूँ, लेकिन क्या परमेश्वर के लिए गवाही देना और परमेश्वर के द्वारा धार्मिक कहा जाना बेहद अर्थपूर्ण और सार्थक कार्य नहीं होगा? मैं इतने सालों तक परमेश्वर का अनुसरण करती रही, उसके अनुग्रह और उसके बहुत से आशीषों का आनंद लेती रही, इसलिए मुझे आज शैतान के आगे परमेश्वर की गवाही देनी चाहिये—ऐसा करना मेरे लिए सम्मान की बात है। मुझे चाहे जितने कष्ट उठाने पड़ें या कितनी भी मुश्किलें आएँ, मैं जीना नहीं छोड़ूँगी ताकि परमेश्वर के दिल को संतुष्टि मिले।" परमेश्वर के वचनों ने मेरे दिल और आत्मा दोनों को जगा दिया जिससे मैं उसकी इच्छा को समझ पाई। अब मैं मरना नहीं चाहती थी, बल्कि मैं तकलीफ़ सहते हुए, परमेश्वर के आयोजनों और व्यवस्थाओं को प्रति समर्पित होना चाहती थी। आख़िरकार, सात दिन और सात रातों के शारीरिक उत्पीड़न का अंत हुआ। मुझे उनके उत्पीड़न ने मौत के कगार पर पहुँचा दिया था, मेरी एड़ी की चमड़ी उतर गई थी, मुँह की त्वचा की कई परतें छिल गईं थीं। बाद में मैंने अपनी बगल वाली कोठरी से एक पुरुष कैदी को यह कहते सुना, "तीस साल के करीब का एक हट्टा-कट्टा पुरुष कैदी उत्पीड़न से मर गया।" यह सुनकर, मैंने मन ही मन परमेश्वर को धन्यवाद दिया, क्योंकि मैं जानती थी कि अगर मैं ज़िंदा हूँ तो इसलिए नहीं मैं भाग्यशाली हूँ, बल्कि इसलिए कि मुझे परमेश्वर का मार्गदर्शन और सुरक्षा मिली। जीवन-शक्ति से भरपूर परमेश्वर के वचनों ने मुझे ज़िंदा रखा, वरना तो एक स्त्री की ऐसी नाज़ुक देह लेकर मैं उत्पीड़न से कब की मर गई होती।

क्रूर यातना से गुज़रकर, मैंने सचमुच परमेश्वर की सर्वव्यापकता को देखा, साथ ही मैंने इस बात को समझा कि मैं कितनी शक्तिहीन हूँ। परीक्षण के दौरान मैं अपनी देखभाल भी नहीं कर पाती थी, उसके बावजूद मैं यह चिंता करती थी कि मेरी बेटी मज़बूती से टिक पाएगी या नहीं—क्या मैं महज़ अपनी कल्पनाओं से उपजी चीज़ों पर अपनी खीज नहीं निकाल रही थी? मेरी बेटी की नियति परमेश्वर के हाथों में थी, उसके लिए मेरा चिंता करना उसकी ज़रा भी मदद नहीं कर पा रहा था। इससे शैतान को मुझे कमज़ोर करने, अपने कपट-जाल में लेने और मेरा अनिष्ट करने का मौका मिल रहा था। हर चीज़ का आयोजन और व्यवस्था परमेश्वर करता है, मुझे उस वक्त पता था कि मुझे अपनी बेटी की देखभाल की ज़िम्मेदारी परमेश्वर को सौंप देनी चाहिए, परमेश्वर पर विश्वास करना चाहिए कि परमेश्वर मुझे इस प्रतिकूलता में राह दिखाने के साथ, मेरी बेटी को भी उस खौफ़नाक दौर में राह दिखाएगा। इसलिए, मैंने परमेश्वर से प्रार्थना की और मुझे परमेश्वर के ये वचन याद आए: "तुम उन्हें मेरे हाथों में क्यों नहीं सौंप देते हो? क्या तुम मुझ पर पर्याप्त विश्वास नहीं करते हो? या क्या तुम्हें डर है कि मैं तुम्हारे लिए अनुचित व्यवस्था करूंगा? तुम्हें हमेशा अपने घर की याद क्यों आती है? और अन्य लोगों को याद करते हो! क्या मेरा तुम्हारे दिल में एक निश्चित स्थान है?" ("वचन देह में प्रकट होता है" में आरम्भ में मसीह के कथन के "अध्याय 59")। परमेश्वर ने मेरी स्थिति का निवारण किया। "यह बात सही है," मैंने सोचा। "लोग जिन मुश्किलों और तकलीफ़ों का सामना करते हैं, वे सब परमेश्वर द्वारा पूर्वनियत की हुई होती हैं। मेरी बेटी ने जो यातनाएँ सहीं, उनकी अनुमति परमेश्वर ने ही दी है। भले ही मैं इस बात को न समझूँ, यह न जानूँ कि क्या हो रहा है, लेकिन इस सब के पीछे ज़रूर परमेश्वर का प्रेम है, क्योंकि इंसान के लिए परमेश्वर का प्रेम वास्तविक और सच्चा है। मैं अपनी बेटी को परमेश्वर के हाथों में सौंपना चाहती हूँ, उसी का प्रभुत्व हो, वही व्यवस्था करे, मैं परमेश्वर से आने वाली हर बात का आज्ञापालन करने को तैयार हूँ।" मैंने अपनी बेटी को कोर्ट में देखा, उसने चुपके से मुझसे कहा कि मुश्किलों और तकलीफ़ों पर काबू पाने के लिए परमेश्वर ने उसका मार्गदर्शन किया, उसने परमेश्वर के आशीषों को देखा था: परमेश्वर ने उसकी मदद करने के लिए कुछ रईस कैदियों को इकट्ठा किया था, उन लोगों ने उसके लिए कुछ कपड़े और खाने-पीने का सामान खरीद दिए थे; जब सरगना कैदी ने कोई फ़िज़ूल का बहाना बनाकर धमकाने की कोशिश की, तो कुछ कैदी उसकी मदद को आ गई थीं। जेल में मेरी बेटी को परमेश्वर के कुछ इस तरह के आशीष प्राप्त हो गए थे। इन अनुभवों से, मेरी बेटी को परमेश्वर के अद्भुत और विवेकपूर्ण कार्यों की समझ प्राप्त हुई, वह इस बात की सराहना कर पाई कि परमेश्वर के कार्यों को कभी शब्दों में बयाँ नहीं किया जा सकता। इन बातों को सुनकर मुझे बेहद खुशी हुई, परमेश्वर के प्रति कृतज्ञता से मेरी आँखें नम हो गईं। मैंने अपनी बेटी में, परमेश्वर की सर्वशक्तिमान प्रभुता और उसके अद्भुत कर्मों को देखा, मैंने देखा कि परमेश्वर ने हमेशा ही हम दोनों का मार्गदर्शन किया था और हमारी रक्षा की थी ताकि हम इन मुश्किलों और यातनाओं से पार पा सकें। इस तरह परमेश्वर में मेरी आस्था और भी मज़बूत हो गई।

आने वाले दिनों में, सुधार अधिकारी ने इस बात की कोई परवाह नहीं की कि मेरा पूरा शरीर सूजा हुआ था और दर्द कर रहा था लेकिन वो मुझसे ज़बर्दस्ती काम करवाती रही। थोड़े ही समय में, मैं इतनी ज़्यादा थक गई कि मेरी मौजूदा चोटों के अलावा और नई चोटें उभर आईं, मेरी कमर का निचला हिस्सा इतना दुखने लगा कि मैं सीधी भी ख‌ड़ी नहीं हो पा रही थी। मैं ज़रा भी हिलती-डुलती तो इतना भयंकर दर्द होता कि मेरी एक-एक हड्डी, एक-एक जोड़ दुखता, जैसे उनको चीरा जा रहा हो। इसकी वजह से रात को सोना भी मुश्किल हो गया। उसके बावजूद, सुधार अधिकारी मुझे ज़रा भी ढील नहीं देती थी, बल्कि उसे जब भी मौका मिलता, वह सरगना कैदी से मुझे तंग करवाती। चूँकि मेरे पास उन लोगों के लिए खाने-पीने का सामान खरीदने के लिए पैसे नहीं थे, सरगना कैदी मेरे शरीर के निचले हिस्से में बुरी तरह से लात मारती, उस समय मैं बचने और छिपने की कोशिश करती। वह और भी ज़्यादा गुस्से में आकर खुलकर लात-घूँसे मारती, मुझे रौंदती। चूँकि हमारे खाने में वो लोग तेल-घी का प्रयोग नहीं करते थे, इस वजह से मुझे अक्सर कब्ज़ की शिकायत हो जाती थी, अगर मैं शौचालय में ज़्यादा देर तक बैठती, तो वो लोग मुझे गालियाँ बकते, मुझसे दस दिनों तक पूरा शौचालय साफ़ करवाने की सज़ा देते। मुझे दूसरों की शिफ़्ट करवाने और रात भर खड़े रहकर पहरा देने जैसी सज़ा देने के लिए कोई भी मनचाहा कारण ढूँढ़ लेते। वो लोग ये भी कहते कि मैं काम करने के लिए बहुत ज़्यादा कच्चे माल का इस्तेमाल करती हूँ, इसलिए मुझ पर 50 युआन का जुर्माना ठोक दिया। सुधार अधिकारी इस अवसर का लाभ उठाकर मुझे ऑफिस में ले गए, और मुझे लुभाने की कोशिश करते हुए कहने लगे, "अगर तू हमें यह बता दे कि तेरे साथ और कौन लोग परमेश्वर में आस्था रखते हैं, तो हम तुझे कोर्ट के अध्यक्ष से कहकर तेरी सज़ा कम करवा सकते हैं, और हम तेरे ऊपर 50 युआन का जुर्माना भी नहीं लगाएँगे" उन दुष्ट पुलिसकर्मियों के पास एक से एक नरम-गर्म धूर्त षड्यंत्र थे, जिन्हें वे अदल-बदल कर इस्तेमाल करते रहते थे, वे लोग परमेश्वर से धोखा करवाने लिए हर चाल आज़माते थे, लेकिन उनकी सारी चालें नाकाम होती थीं! मैंने उनका प्रस्ताव ठुकरा दिया।

25 अगस्त, 2008 को, सीसीपी ने मुझ पर "शी जियाओ संगठन में शामिल होने और कानून-व्यवस्था में बाधा पहुँचाने" का आरोप लगाया और मुझे तीन साल की सश्रम पुनर्शिक्षा की सज़ा सुनाई। उसके बाद, वे लोग मुझे प्रांतीय महिला श्रम शिविर में सज़ा काटने के लिए ले गए। मेरी बेटी को एक साल की सश्रम पुनर्शिक्षा की सज़ा दी गई, उसे वह सज़ा स्थानीय नज़रबंदी गृह में काटनी थी।

जेल में दो हफ़्तों के बाद, जेल सुरक्षाकर्मी कैदियों को अलग-अलग कार्यसमूहों में बांटना चाहते थे। मैंने सुना कि वरिष्ठ कैदियों को थोड़ा हल्का काम दिया जाता था, मैंने अपने बारे में सोचा, मेरा शरीर बुरी तरह से खराब हो चुका था, नज़रबंदी गृह में रहकर लगभग बेकार हो चुका था, मेरे शरीर में मेहनत वाला काम करने की ताकत नहीं बची थी। मैंने परमेश्वर से इस बारे में प्रार्थना की, मैंने याचना की कि वो मेरे लिए कोई रास्ता ढूँढ़े। अगर वो वाकई चाहता है कि मैं इस तरह के हालात का अनुभव करूँ, तो मैं उसके आज्ञापालन के लिए तैयार हूँ। परमेश्वर ने मेरी प्रार्थना सुन ली, और मुझे वरिष्ठ कैदियों के कार्य समूह में भेज दिया गया। सबने कहा कि ऐसा कभी सुना नहीं गया, लेकिन मैं अपने दिल में जानती थी कि यह सारा आयोजन परमेश्वर द्वारा किया जा रहा था, परमेश्वर मेरी कमज़ोरी के प्रति करुणा दिखा रहा था। वरिष्ठ कैदियों के कार्य समूह में, सुरक्षाकर्मियों ने प्रसन्नता से बात की, "जो लोग मेहनत करेंगे और अच्छा काम करेंगे, उनकी सज़ा कर कर दी जाएगी। हम किसी से कोई पक्षपात नहीं करेंगे...।" मैंने उनकी बात पर भरोसा कर लिया, मुझे लगा कि ये सुरक्षाकर्मी नज़रबंदी गृह के सुधार अधिकारियों से बेहतर हैं। और इसलिये, मैंने जान लगाकर किया, और मैं करीब 300 लोगों में से दस सबसे अच्छे कर्मियों में आ गई। लेकिन जब उन लोगों की सूची का ऐलान करने की बात आई जिनकी सज़ा को कम किया जाना था, तो जेल सुरक्षाकर्मियों ने केवल उन लोगों के नामों का ऐलान किया जो लड़ना पसंद करते थे और उन्हें उपहार देते थे—मेरी सज़ा को एक दिन भी कम नहीं किया गय। एक कैदी तो अपनी सज़ा कम करवाने के लिए जी-तोड़ मेहनत करती थी, लेकिन उसे आश्चर्य हुआ जब सुरक्षाकर्मी बोले, "तेरे जैसी काबिल को तो यहाँ हमें ज़िंदगी भर रखना चाहिए!" जब मैंने यह बात सुनी, तो मूर्ख बन जाने, सीसीपी सरकार के क्रूर और नृशंस सार को न समझ पाने और उनकी झूठ पर भरोसा करने के लिए मैंने अपने आपको बहुत कोसा। दरअसल, परमेश्वर ने बहुत पहले कहा था: "मानवजाति के ऊपर का आसमान, स्पष्टता की जगमगाहट के बिना, झुका हुआ, उदास और अँधकारमय है, और मानव दुनिया स्याह अंधेरे में डूबी हुई है, कुछ इस तरह कि उसमें रहने वाला कोई व्यक्ति अपने चेहरे के सामने फैले हाथ को या अपना सिर उठाने पर सूरज को भी नहीं देख सकता है" ("वचन देह में प्रकट होता है" में "एक वास्तविक मनुष्य होने का क्या अर्थ है")। वास्तविकता के तथ्यों से परमेश्वर के वचनों के प्रकाशन की तुलना करते हुए, आख़िरकार मैंने देखा कि सीसीपी सरकार ऊपर से नीचे तक अंधकार और मलिनता के अलावा कुछ नहीं है, उसमें किंचित-मात्र भी न सच्चाई है, न न्याय है। वे दुष्ट पुलिसकर्मी लोगों के साथ सिर्फ़ कपट कर सकते थे, झूठ बोलकर उन्हें मूर्ख बना सकते थे, वे लोग हमसे इंसानों की तरह पेश आने के काबिल नहीं थे। उनके लिए, कैदी पैसा बनाने की मशीन से ज़्यादा कुछ नहीं थे—जो कैदी जितना ज़्यादा योग्य होता, उसकी सज़ा कम होने के अवसर उतने ही कम होते। जेल के सुरक्षाकर्मी चाहते थे कि लोग हर वक्त उनकी सेवा में लगे रहें, गधों की तरह काम करते रहें ताकि वे उनके ज़रिए और ज़्यादा पैसा कमा सकें। ज़्यादा से ज़्यादा काम करवाने की फ़िराक में, वे दुष्ट पुलिसकर्मी शौचालय तक नहीं जाने देते थे, कितनी ही बार ऐसा हुआ कि दबाव को रोक न पाने के कारण मैंने अपने कपड़ों में ही पेशाब कर दिया। चूँकि काम करने के मामले में मेरा प्रदर्शन श्रेष्ठ था, इसलिए मुख्य कार्यदल ने मेरा तबादला "गति निर्धारक" (पेससैटर) में कर दिया गया। मैंने पहले ही उनके कुरूप चेहरों को अच्छी तरह से देख लिया था, मुझे पता था कि अगर मेरा तबादला कर दिया गया, तो वे लोग सचमुच मेरे ऊपर और ज़्यादा मेहनत करने का दबाव बनाएँगे। मुझे तबादला कर दिए जाने का डर था, इसलिए मैं निरंतर परमेश्वर से प्रार्थना करती रही: "हे परमेश्वर! मैं जानती हूँ कि इन दरिंदों ने मुझे फँसाने की चाल चली है, लेकिन इससे बचने का कोई उपाय नहीं है। प्लीज़ मुझे कोई रास्ता दिखाइये।" मेरे आश्चर्य का ठिकाना न रहा, जब प्रार्थना करने के बाद, गर्मी के मौसम के बावजूद, मेरे हाथ ठंडे पड़ गए और मेरी उँगलियाँ इस कदर एक-दूसरे में गुँथ गईं और अलग होने का नाम नहीं ले रही थी, और नीली पड़ गई थी। मुख्य कार्यदल की सुधार अधिकारी ने कहा मैं नाटक कर रही हूँ, उसने दो लोगों को मुझे काम के लिए ऊपर ले जाने के लिए मजबूर किया। मैं मायूस होकर परमेश्वर को पुकारती रही, नतीजा यह हुआ कि मैं तीसरी मंज़िल से दूसरी मंज़िल पर आ गिरी। यह देखकर, वे लोग डर गए, इसलिए उन्होंने मुझे वापस वरिष्ठ कार्य समूह में भेज दिया। बाद में मैंने देखा कि दरअसल मेरे शरीर में कहीं भी चोट नहीं लगी थी—एक बार फिर मैंने देखा कि परमेश्वर मेरी रक्षा कर रहा है।

जेल में, सर्वशक्तिमान परमेश्वर में विश्वास रखने वालों को राजनैतिक कैदी कहा जाता है और सीसीपी के दरिंदे हम पर हर वक्त नज़र रखते हैं, जिसका अर्थ है कि हमें बोलने का भी अधिकार नहीं है। अगर सुरक्षाकर्मी ने मुझे किसी से बात करते देख लिया, तो वो सवाल करेगी कि हम लोग क्या बातें कर रहे थे। रात के वक्त, सरगना कैदी मुझ पर नज़र रखती थी कि मैं कहीं लोगों से आस्था को लेकर बात तो नहीं कर रही थी। जब कभी मेरे घर से कोई मुझसे मिलने आता, तो जेल सुरक्षाकर्मी मुझे कुछ ऐसे वाक्य रटा देती जिससे परमेश्वर की निंदा होती है, और अगर मैं उन वाक्यों को न बोलती, तो वो लोग जानबूझकर हमारी बातचीत में बाधा डालते (इसका मतलब था कि मुझे बातचीत का कम समय मिले)। चूँकि मुझे पता था कि उन बातों को कहने से परमेश्वर की निंदा होती है, इसलिए जब कभी ऐसी स्थिति आती, तो मैं मन ही मन परमेश्वर से प्रार्थना, "हे परमेश्वर! शैतान मुझे लुभाने की कोशिश कर रहा है। प्लीज़ मेरी रक्षा कर और मुझे ऐसी बातें कहने से बचा जिससे तेरे स्वभाव का अपमान हो।" चूँकि मैं वो सब बातें नहीं बोलती थी जो वो लोग मुझसे बुलवाना चाहते थे, अंत में इस मामले में जेल सुरक्षाकर्मी कुछ नहीं कर पाते थे।

तीन साल तक जेल में रहकर मैंने साफ़ तौर पर सीसीपी सरकार का असली रंग देख लिया था। लोगों के सामने उनका चेहरा अलग था और उनकी पीठ पीछे अलग; दुनिया के सामने यह "धर्म की आज़ादी" की बड़ी-बड़ी बातें करती है, लेकिन पीछे से यह उत्पीड़न करती है और परमेश्वर के कार्य में हर तरह से बाधा डालती है, परमेश्वर के विश्वासियों को अंधाधुंध गिरफ़्तार करती है, उन पर अत्याचार करके उनसे अपराध स्वीकार करवाती है, और उनके साथ क्रूरता से पेश आती है। यह लोगों को परमेश्वर को नकारने, उससे धोखा करने के लिए के लिए ऐसे-ऐसे घिनौने तरीके अपनाती है कि जिनकी कल्पना नहीं की जा सकती। वो चाहती है कि लोग उसके तानाशाही शासन के आगे समर्पण कर दें ताकि लोगों को हमेशा के लिए अपने वश में रखने और उन पर नियंत्रण रखने के अपने दुष्ट मंसूबों में कामयाब हो जाए। परमेश्वर को बनाने वाला परमेश्वर है, इंसान को उसी की आराधना करनी चाहिए। फिर भी सीसीपी सरकार परमेश्वर के आगमन को पाबंदी लगाने के लिए कोई कसर नहीं छोड़ती, यह परमेश्वर में विश्वास रखने से लोगों को रोकती है, सुसमाचार के प्रचार-प्रसार और परमेश्वर की गवाही देने से रोकती है, ऐसा करके, यह पूरी तरह से अपने विकृत और स्वर्ग-विरोधी दुष्ट सार को उजागर करती है। हालाँकि इस उत्पीड़न और मुश्किल का अनुभव करके, मेरी देह को ज़रूर कुछ पीड़ा हुई, लेकिन मुझे न कोई शिकायत है, न पछतावा, क्योंकि मैंने परमेश्वर से बहुत कुछ पाया है। जब मैं कमज़ोर और शक्तिहीन महसूस कर रही थी, तो परमेश्वर ने ही मुझे बार-बार आस्था और मज़बूती दी थी, जिसकी वजह से मैं अंत तक शैतान से लड़ पाई; मैं दुखी और खिन्न थी, उदास और मायूस हुई, तो परमेश्वर ने ही अपने वचनों से मुझे दिलासा और हौसला दिया; जब मैं मौत के कगार पर खड़ी थी, परमेश्वर के वचनों ने ही मुझे जीने की प्रेरणा दी, ज़िंदा रहने का हौसला दिया; जब कभी मुझे खतरा महसूस हुआ, तो परमेश्वर ने सही समय पर अपना उद्धार का हाथ आगे बढ़ाया, मेरी रक्षा की, खतरे से निकलने में मेरी मदद की और मुझे सुरक्षित जगह पहुँचाया। इस अनुभव से, मैंने न केवल दरिंदे शैतान के परमेश्वर-विरोधी सार को साफ़ तौर पर देखा, जिससे कि मुझे उससे और अधिक गहराई से और पूरी तरह से नफ़रत हो गई, बल्कि साथ ही मुझे परमेश्वर के अद्भुत कर्मों की, परमेश्वर के प्रेम और उद्धार की भी थोड़ी-बहुत सच्ची समझ प्राप्त हुई। मैं मसीह की नेकी और विनम्रता, और इंसान को बचाने के लिए उसने जो कष्ट सहे, उनकी भी समझ हासिल कर पाई, परमेश्वर में मेरी आस्था और उसके लिए मेरा प्रेम और भी अधिक गहरा हो गया।

जब मैं जेल से रिहा हुई, तो मेरे दोस्तों और परिवार वालों ने मुझे नकार दिया, मुझसे किनारा कर लिया, क्योंकि सीसीपी के दरिंदों ने हमारे बीच वैमनस्य की दीवार खड़ी कर दी थी। लेकिन कलीसिया के मेरे भाई-बहनों ने मेरी परवाह और मेरी देखभाल की, एक नई ज़िंदगी शुरू करने के लिए उन्होंने हर तरह से मेरी मदद की—ऐसा करके, उनसे मुझे ऐसा स्नेह मिला जो आसानी से कहीं नहीं मिल सकता। मुझे बचाने के लिए परमेश्वर का धन्यवाद: आगे का रास्ता कितना भी मुश्किल क्यों न हो, मैं अंत तक परमेश्वर का अनुसरण करूँगी, उसके प्रेम के प्रतिदान के लिये मैं एक सार्थक जीवन जीने का प्रयास करूँगी।

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