68. लोगों को सुधारने और उनका उपयोग करने के सिद्धान्‍त

(1) अगुआओं और कार्यकर्ताओं के रूप में ऐसे काबिल लोगों को चुनना और सुधारना आवश्‍यक है, जो सत्‍य से प्रेम करते हों और न्‍यायशील हों। ऐसा करना कलीसिया के कार्य के हित में है;

(2) पहले हटाये जा चुके जिन लोगों ने सच्‍चा पश्‍चाताप कर लिया है और बाद में व्‍यावहारिक कार्य करने में सक्षम हो चुके हैं, उन्‍हें दोबारा चुना जा सकता है, फिर से पदोन्नत किया जा सकता है, और उपयोग में लाया जा सकता है;

(3) एक-दो वर्ष पहले नये-नये विश्‍वासी बने लोगों को, अगर वे अच्‍छे और काबिल मनुष्‍य हैं तो, मानक प्रक्रिया का अनुसरण किये बग़ैर, उन्‍हें तत्‍काल सुधार कर उपयोग में लाया जा सकता है;

(4) जो लोग, अपने अहंकार और दम्‍भ के बावजूद, बुरे नहीं हैं, वे अगर क़ाबिल हैं और सत्‍य को स्‍वीकार करते हैं, तो उन्‍हें सुधारा जाना चाहिए और उनका उपयोग किया जाना चाहिए।

परमेश्वर के प्रासंगिक वचन:

संपूर्ण जगत में अपने कार्य की शुरुआत से ही, परमेश्वर ने अनेक लोगों को अपनी सेवा के लिए पूर्वनिर्धारित किया है, जिसमें हर सामाजिक वर्ग के लोग शामिल हैं। उसका प्रयोजन स्वयं की इच्छा को पूरा करना और पृथ्वी पर अपने कार्य को सुचारु रूप से पूरा करना है। परमेश्वर का लोगों को अपनी सेवा के लिए चुनने का यही प्रयोजन है। परमेश्वर की सेवा करने वाले हर व्यक्ति को परमेश्वर की इच्छा को अवश्य समझना चाहिए। उसका यह कार्य परमेश्वर की बुद्धि और सर्वशक्तिमत्ता को तथा पृथ्वी पर उसके कार्य के सिद्धांतों को लोगों के समक्ष बेहतर ढंग से ज़ाहिर करता है। वास्तव में परमेश्वर अपना काम करने और लोगों के संपर्क में आने के लिए पृथ्वी पर आया है, ताकि वे उसके कर्मों को अधिक स्पष्ट रूप से जान सकें। आज तुम लोग, लोगों का यह समूह, भाग्यशाली है कि तुम व्यावहारिक परमेश्वर की सेवा कर रहे हो। यह तुम लोगों के लिए एक अनंत आशीष है। वास्तव में, परमेश्वर ने तुम लोगों का स्तर बढ़ा दिया है। अपनी सेवा के लिए किसी व्यक्ति को चुनने में, परमेश्वर के सदैव अपने स्वयं के सिद्धांत होते हैं। परमेश्वर की सेवा करना मात्र एक उत्साह की बात नहीं है, जैसा कि लोग कल्पना करते हैं। आज तुम लोग देखते हो कि वे सभी जो परमेश्वर के समक्ष उसकी सेवा करते हैं, ऐसा इसलिए करते हैं क्योंकि उनके पास परमेश्वर का मार्गदर्शन और पवित्र आत्मा का कार्य है; और इसलिए क्योंकि वे सत्य का अनुसरण करने वाले लोग हैं। ये परमेश्वर की सेवा करने वाले सभी लोगों के लिए न्यूनतम शर्तें हैं।

— "वचन देह में प्रकट होता है" में 'धार्मिक सेवाओं का शुद्धिकरण अवश्य होना चाहिए ' से उद्धृत

कलीसिया के अगुआ होने के नाते, तुम लोगों को मालूम होना चाहिए कि प्रतिभा का पता कैसे लगाएं, उसे कैसे बढ़ावा दें, और कैसे प्रतिभाशाली लोगों से ईर्ष्या न करें। इस प्रकार, तुम अपना कर्तव्य संतोषजनक ढंग से निभा सकोगे, अपनी ज़िम्मेदारी पूरी कर सकोगे; तुम निष्ठावान बनने के लिए अपना पूरा प्रयास भी कर सकोगे। कुछ लोग हमेशा इस बात डरे रहते हैं कि दूसरे लोग उनकी प्रसिद्धि को चुरा लेंगे और उनसे आगे निकल जाएंगे, अपनी पहचान बना लेंगे जबकि उनको अनदेखा कर दिया जाएगा। इसी वजह से वे दूसरों पर हमला करते हैं और उन्हें अलग कर देते हैं। क्या यह अपने से ज़्यादा सक्षम लोगों से ईर्ष्या करने का मामला नहीं है? क्या ऐसा व्यवहार स्वार्थी और घिनौना नहीं है? यह किस तरह का स्वभाव है? यह दुर्भावनापूर्ण है! सिर्फ़ खुद के बारे में सोचना, सिर्फ़ अपनी इच्छाओं को संतुष्ट करना, दूसरों के कर्तव्यों पर कोई ध्यान नहीं देना, और सिर्फ़ अपने हितों के बारे में सोचना और परमेश्वर के घर के हितों के बारे में नहीं सोचना—इस तरह के लोग बुरे स्वभाव वाले होते हैं, और परमेश्वर के पास उनके लिये कोई प्रेम नहीं है। अगर तुम वाकई परमेश्वर की इच्छा का ध्यान रखने में सक्षम हो, तो तुम दूसरे लोगों के साथ निष्पक्ष व्यवहार कर पाने में सक्षम होगे। अगर तुम किसी व्यक्ति की सिफ़ारिश करते हो, और वह व्यक्ति एक प्रतिभाशाली इंसान बन जाता है, जिससे परमेश्वर के घर में एक और प्रतिभाशाली व्यक्ति का प्रवेश होता है, तो क्या ऐसा नहीं है कि तुमने अपना काम अच्छी तरह पूरा किया है? तब क्या तुम अपने कर्तव्य के निर्वहन में वफ़ादार नहीं रहे हो? यह परमेश्वर के समक्ष एक अच्छा कर्म है, यह एक तरह का विवेक और सूझ-बूझ है जो इंसानों में होनी चाहिए। जो लोग सत्य को व्यवहार में लाने में सक्षम हैं, वे अपने कार्यों में परमेश्वर की जाँच को स्वीकार कर सकते हैं। जब तुम परमेश्वर की जाँच को स्वीकार करते हो, तो तुम्हें गलती का एहसास होता है। यदि तुम हमेशा दूसरों को दिखाने के लिए ही काम करते हो और परमेश्वर की जाँच को स्वीकार नहीं करते, तो क्या तुम्हारे हृदय में परमेश्वर है? इस तरह के लोगों के हृदय में परमेश्वर के प्रति श्रद्धा नहीं होती। हमेशा अपने लिए कार्य मत कर, हमेशा अपने हितों की मत सोच, और अपनी स्वयं की हैसियत, प्रतिष्ठा और साख पर विचार मत कर। इंसान के हितों पर गौर मत कर। तुझे सबसे पहले परमेश्वर के घर के हितों पर विचार करना चाहिए और उसे अपनी पहली प्राथमिकता बनाना चाहिए। तुझे परमेश्वर की इच्छा के बारे में मननशील होना चाहिए, इस पर चिंतन करने के द्वारा आरंभ कर कि तू अपने कर्तव्य को पूरा करने में अशुद्ध रहा है या नहीं, क्या तूने वफादार होने के लिए अपना अधिकतम किया है, क्या अपने उत्तरदायित्वों को पूरा करने के लिए अपना सर्वोत्तम प्रयास किया है और अपना सर्वस्व दिया है, साथ ही क्या तूने अपने कर्तव्य, और परमेश्वर के घर के कार्य के प्रति पूरे दिल से विचार किया है। तुझे इन चीज़ों के बारे में विचार करने की आवश्यकता है। इन चीज़ों पर बार-बार विचार कर, और तू आसानी से अपने कर्तव्य को अच्छी तरह से निभा पाएगा। जब तेरी क्षमता कमज़ोर होती है, तेरा अनुभव उथला होता है, या जब तू अपने पेशे में दक्ष नहीं होता है, तब सारी ताकत लगा देने के बावजूद तेरे कार्य में कुछ गलतियाँ या कमियाँ हो सकती हैं, और परिणाम बहुत अच्छे नहीं हो सकते हैं। जब तू कार्यों को करते हुए अपनी स्वयं की स्वार्थी इच्छाओं या अपने स्वयं के हितों के बारे में विचार नहीं करता है, और इसके बजाय हर समय परमेश्वर के घर के कार्य पर विचार करता है, परमेश्वर के घर के हितों के बारे में लगातार सोचता रहता है, और अपने कर्तव्य को अच्छी तरह से निभाता है, तब तू परमेश्वर के समक्ष अच्छे कर्मों का संचय करेगा। जो लोग ये अच्छे कर्म करते हैं, ये वे लोग हैं जिनमें सत्य-वास्तविकता होती है; इन्होंने गवाही दी है। यदि तू हमेशा देह के अनुसार जीता है, हमेशा अपनी स्वार्थी इच्छाओं को संतुष्ट करता है, तो ऐसे व्यक्ति में सत्य-वास्तविकता नहीं होती। यह परमेश्वर को लज्जित करने का चिह्न है।

— "मसीह की बातचीत के अभिलेख" में 'अपना सच्चा हृदय परमेश्वर को दो, और तुम सत्य को प्राप्त कर सकते हो' से उद्धृत

वास्तव में, परमेश्वर के घर के कई लोगों में से, कुछ में विशेष कौशल होते हैं, और कुछ में थोड़ी-सी कमी होती है लेकिन फिर भी वे कुछ कर्तव्यों का पालन करने में सक्षम होते हैं। वे एक कर्तव्य के निष्पादन के लिए उपयुक्त होते हैं, वे कर्तव्य को निभाने वाले किसी व्यक्ति के सिद्धांतों के साथ मेल खाते हैं— लेकिन मसीह-विरोधियों की नजरों में यह क्या होता है? वे क्या मानते हैं? “क्या मैं अपनी आँखों में रेत रगड़ दूँगा? तुम मेरे साथ प्रतिस्पर्धा करने के लिए मेरे समूह में एक भूमिका चाहते हो। यह तो असंभव है, इसके बारे में सोचो भी मत। तुम मुझसे अधिक सक्षम हो, मुझसे अधिक सधे हुए हो, मुझसे अधिक शिक्षित, और मुझसे अधिक लोकप्रिय हो। यदि तुम मेरी गड़गड़ाहट चुरा लेते हो तो मैं क्या करूँगा? तुम चाहते हो कि मैं तुम्हारे समकक्ष होकर काम करूँ? इसके बारे में सोचो भी मत!" क्या वे परमेश्वर के घर के हितों पर विचार कर रहे हैं? नहीं। वे तो बस इसी के बारे में सोचते हैं कि क्या उनकी अपनी स्थिति को संरक्षित रखा जा सकता है, इसलिए वे इन लोगों के उपयोग के बजाय परमेश्वर के घर के हितों को नुकसान पहुँचाना पसंद करेंगे। यह बहिष्कार करना है। इसके अलावा, वे बिना किसी क्षमता वाले मूर्खों को पनपाते हैं, ऐसे लोगों को जो किसी काम के नहीं होते, जिन्हें आसानी से यहाँ-वहाँ भगाया जा सके, जो दब्बू और अज्ञानी होते हैं, जिन लोगों में अंतर्दृष्टि की कमी होती है, जो खुद के लिए नहीं सोच पाते हैं, जो सत्य को नहीं समझते हैं—केवल ऐसे ही लोगों को वे तैयार करते हैं। अविश्वासियों के पास एक कहावत हुआ करती है: "मैं एक मूर्ख व्यक्ति का पूर्वज बनने के बजाय एक सच्चे आदमी के घोड़े की रकाब थामकर उसे चलाना चाहता हूँ।" लेकिन मसीह-विरोधी इसके ठीक विपरीत होते हैं: वे इन निकम्मों के पूर्वज होंगे। क्या यह अयोग्यता की अभिव्यक्ति नहीं है? उदाहरण के लिए, वे किसी ऐसे व्यक्ति का उल्लेख करते हैं जो अभिमानी नहीं है, और जो योगदान करने में सक्षम होता है। जब तुम उनसे पूछते हो कि यह व्यक्ति सत्य को समझने में कैसा है, तो वे कहते हैं, "वह इसे ठीक-ठाक समझता है, उसके पास कुछ योग्यता है।" वास्तव में, यह व्यक्ति जिसका उन लोगों ने उल्लेख किया, एक छोटी-सी समस्या का सामना करते ही छुप जाता है, उसमें कोई विश्वास नहीं होता है। ऐसे लोगों में वे भी हैं जो सत्य को नहीं समझते, जो आध्यात्मिक मामलों को नहीं समझते, जो अकेले में शिकायत किया करते हैं, और जो हमेशा गलतियाँ करते हैं। वे मूर्खों का एक झुण्ड होते हैं, मसीह-विरोधी उनके पूर्वज होते हैं, और वे वही हैं जिन्हें ये मसीह-विरोधी पालते हैं। ये वे लोग हैं जिन्हें विकसित करने को परमेश्वर के घर में "अगुवा" बनने पर मसीह-विरोधी उत्सुक होते हैं, और क्या इसके परिणामस्वरूप परमेश्वर के घर का काम विलंबित नहीं होता है? उन्हें ऐसे व्यक्तियों की कोई कद्र नहीं होती जिनके पास थोड़ी योग्यता होती है, जो सत्य को समझने में थोड़े सक्षम होते हैं, जो सत्य की तलाश करते हैं, जो कुछ सच्चाइयों का अभ्यास करते हैं, और जो परमेश्वर के घर के काम का दायित्व उठा सकते हैं। ऐसा क्यों है? ऐसे लोग कभी भी उनके गुलाम और अनुयायी नहीं बनेंगे, वे कभी उनकी मर्जी के अनुसार नहीं रहेंगे, इसलिए वे ऐसे लोगों का एक दल बनाते हैं जो मूर्ख, डरपोक, अज्ञानी, बेवकूफ़, धीमे होते हैं, और जिनके पास अपना दिमाग नहीं होता है—इसी तरह के कचरे को वे विकसित करते हैं। क्या काम करने का यह तरीका परमेश्वर के घर के काम के लिए लाभदायक होता है? नहीं। और क्या वे इस पर कोई विचार करते हैं? वे किस बारे में सोच रहे होते हैं? "मैं जिस किसी के साथ काम कर सकूँ और निभा सकूँ, जो भी मुझे महत्वपूर्ण होने का एहसास कराता है, और मेरे मूल्य को उजागर कर सकता है, मैं उसे ढूँढ रहा हूँ।" उनका दल उन मूर्खों का एक समूह होता है जो आध्यात्मिक मामलों को नहीं समझते हैं। किसी समस्या का सामना करने पर उनमें से कोई भी सत्य की तलाश नहीं करता है, उनमें से कोई भी सत्य को नहीं समझता है, उनमें से कोई भी सत्य-सिद्धांतों के अनुसार चीज़ों को नहीं संभालता है। हालांकि, उनके बारे में एक बात है जिसे मसीह-विरोधी पसंद करते हैं: जब ऐसे लोग किसी समस्या का सामना करते हैं, तो वे मसीह-विरोधियों की तलाश करते हैं और जैसा वे कहें, वैसा ही करते हैं। यही वो सिद्धांत है जिसके द्वारा मसीह-विरोधी साथ काम करने वाले लोगों को पाते हैं। वे मूर्खों का एक दल, कचरे का एक ढेर, काम करने के लिए और उनके कदम चूमने के लिए ढूँढ निकालते हैं—और अंततः, परमेश्वर के घर का कुछ काम रुक जाता है। कलीसिया के हित और काम की गति प्रभावित हो जाती है, लेकिन इन लोगों को इसकी कोई समझ नहीं होती है, और यहाँ तक कि, वे कहते हैं, "यह केवल मेरी ज़िम्मेदारी नहीं है।" अगर हर कोई कहे कि यह उनकी अपनी ज़िम्मेदारी नहीं है, तो आख़िर यह किसकी है? यदि किसी समस्या के होने पर कोई भी ज़िम्मेदारी न ले, तो इन सभी वर्षों में उनके द्वारा उपदेशों को सुनने का क्या मतलब था? तथ्य उनकी आंखों के सामने ही हैं, फिर भी वे उन्हें पहचान नहीं पाते हैं। ये किस तरह के लोग हैं? यह बात साबित करती है कि वे लोग जिन्हें मसीह-विरोधी चुनते हैं, अच्छे नहीं होते हैं; वे सत्य को स्वीकार नहीं करते हैं। मसीह-विरोधी जान-बूझकर मूर्खों, घिनौने कमबख्तों, और मूर्खों को, जो सत्य को स्वीकार नहीं करते या सत्य से प्रेम नहीं करते हैं, साथी बनाते हैं। वे उन्हें फँसाते हैं, उनके दिलों में जगह बनाते हैं जब तक कि वे अनुकूल और अन्तरंग नहीं हो जाते, और वे अच्छी तरह से आपस में हिल-मिल जाते हैं। यह क्या है? क्या यह एक मसीह-विरोधी गिरोह नहीं है? जब तुम उनके "पूर्वजों" की जगह बदलते हो, तो वे, उनके वफ़ादार वंशज बनकर, निर्णय पारित करते हुए कहते हैं कि ऊपर वाला अन्यायी है, और उनका साथ देने के लिए वे मिल जाते हैं। क्या मसीह-विरोधी सिर्फ़ बुरे लोग होते हैं? कुछ मसीह-विरोधी बिना किसी महत्वपूर्ण प्रतिभा के उड़ाऊ व्यक्ति होते हैं, लेकिन उनके बारे में एक बात होती है: पद के प्रति उनका विशेष झुकाव। यह मत सोचो कि प्रतिभाहीन और अशिक्षित होने के नाते, उन्हें पदवी से कोई प्यार नहीं; वह गलत है, और यह दर्शाता है कि तुमने मसीह-विरोधियों के सार को अच्छी तरह से नहीं समझा है। किसी भी व्यक्ति को जो मसीह-विरोधी हो, ओहदा पसंद होता है। जब मसीह-विरोधी किसी के साथ भी मिलकर काम करने में असमर्थ होते हैं, तो वे किस तरह से सड़े अण्डों और पैर चाटने वालों के एक समूह को जुटाने में सक्षम होते हैं? क्या वे ऐसे लोगों के साथ काम करना चाहते हैं? यदि वे वास्तव में इन लोगों के साथ काम करने में सक्षम होते, तो वो शब्द सच नहीं होंगे। वे किसी के भी साथ काम करने में असमर्थ होते हैं—और "किसी" में वे लोग भी शामिल हैं, जिनको वे विकसित करते हैं। तो उन्हें विकसित करके, वे क्या कर रहे हैं? वे एक ऐसे समूह को तैयार करते हैं, जिन्हें आदेश देना और जिनके साथ हेराफेरी करना आसान हो, जो अपने लिए नहीं सोच सकते हैं, जो वो सब करें जो उन्हें बताया जाता है, जो उनकी स्थिति की रक्षा के लिए उनके साथ काम करें। बिना किसी सहायता के अपनी स्थिति की रक्षा करना उनके लिए थोड़ा कठिन, थोड़ा दुष्कर होगा, और इसलिए वे ऐसे लोगों के एक समूह को तैयार करते हैं—एक ऐसा समूह, जो उनकी नज़रों में, "आध्यात्मिक" माना जाए—ऐसे लोग जो खुशी से कठिनाई सहन करते हों और “परमेश्वर के घर के हितों की” रक्षा करने में सक्षम हों। उनमें से प्रत्येक कई अलग-अलग कार्यों को करता है, और वे हर बार सवाल पूछने या किसी समस्या का सामना करने पर उन मसीह-विरोधियों के पास जाते हैं। उन्हें लगता है कि लोगों के साथ मिलकर काम करने का यही मतलब होता है। पर क्या ऐसा है? वे आदेश देने के लिए, अपना काम करवाने के लिए, अपनी स्थिति को मजबूत करने के लिए, लोगों का एक समूह ढूँढ निकालते हैं। यह सहयोग नहीं होता है—यह तो अपना निजी क्रिया-कलाप चलाना है।

— "मसीह की बातचीत के अभिलेख" में 'नायकों और कार्यकर्ताओं के लिए, एक मार्ग चुनना सर्वाधिक महत्वपूर्ण है (8)' से उद्धृत

संदर्भ के लिए धर्मोपदेश और संगति के उद्धरण:

कलीसिया में लोगों का पोषण और इस्तेमाल करने का कार्य सीधे तौर पर परमेश्वर द्वारा लोगों को पूर्ण किये जाने से संबंधित है। कलीसिया को ऐसे लोगों का पोषण और इस्तेमाल करना चाहिए जिन्हें परमेश्वर द्वारा पूर्ण किया जा सकता है। हम सभी जानते हैं कि जिस तरह के लोगों को परमेश्वर पूर्ण बनाता है वे वही लोग हैं जो सत्य का अनुसरण करते हैं और जिनमें न्याय की समझ होती है। वे ऐसे लोग हैं जिनके पास बाध्यकारी दायित्व है और जो परमेश्वर की आज्ञा को पूरा करने के लिए सब कुछ पीछे छोड़ देते हैं। वे विश्वसनीय तरीके से खुद को परमेश्वर के लिए खपा सकते हैं; ताकि परमेश्वर को संतुष्ट कर सकें, वे मुश्किलों का सामना करने और कीमत चुकाने के लिए तैयार होते हैं और वे देह-सुख के पीछे नहीं भागते हैं। जो लोग अपने कर्तव्यों के निर्वहन में मुश्किलों का सामना करने में सक्षम हैं और कठिनाइयों और खतरों से नहीं डरते हैं, जो सिर्फ़ परमेश्वर की आज्ञा को पूरा करना और परमेश्वर को संतुष्ट करना चाहते हैं, जो रुतबे, नाम, लाभ और शारीरिक सुख का लालच नहीं करते हैं; जो अपने कर्तव्यों के निर्वहन में भ्रष्टता का ख़ुलासा होने पर कांट-छांट और निपटारे को स्वीकार कर सकते हैं, जो खुद को जानने, खुद से नफ़रत करने, देह-सुख का त्याग करने और सत्य पर अमल करने में सक्षम हैं; जो किसी भी समस्या का सामना होने पर या कोई अपराध करने पर खुद को जानने और आत्मचिंतन करने में सक्षम हैं, जो गलतियों को सुधारने के लिए सत्य की खोज कर सकते हैं और जो परमेश्वर के लिए लगातार खुद को खपा सकते हैं, और जो परमेश्वर की आज्ञा और उन्हें जो कर्तव्य करना चाहिए उन पर कायम रहने में सक्षम हैं, ऐसे लोग अपने जीवन में आगे बढ़ सकते हैं। खुद को लगातार सत्य से सुसज्जित करके, वे परमेश्वर के कार्य को समझ सकते हैं और अपने जीवन स्वभाव में बदलाव ला सकते हैं। जितना अधिक वे परमेश्वर की सेवा करेंगे, उतना ही वे परमेश्वर की इच्छा को समझ पाएंगे; जितना अधिक वे सेवा करेंगे उतना ही वे सत्य पर अमल कर पाएंगे; जितना अधिक वे सेवा करेंगे उतना ही वे परमेश्वर के प्रति समर्पित हो पाएंगे, जब तक कि वे अंततः परमेश्वर की इच्छा के अनुरूप नहीं हो पाते। यही वह प्रक्रिया है जिसके माध्यम से परमेश्वर की सेवा करने वाला व्यक्ति अपनी सेवा में सत्य का अनुसरण करता है, कांट-छांट और निपटारे को स्वीकार करता है, धीरे-धीरे अपने अपराधों को कम करता है और समय के साथ ऐसा व्यक्ति बन जाता है जो परमेश्वर के इस्तेमाल के लिए उपयुक्त है। यह ऐसे व्यक्ति को पूर्ण किये जाने का व्यावहारिक अनुभव भी है जो परमेश्वर की सेवा करता है। भीषण आपदाओं के दौरान, अगर परमेश्वर की सेवा करने वाले लोग सत्य का अनुसरण करने की हर संभव कोशिश करते हैं, तो उन्हें पवित्र आत्मा का कार्य प्राप्त होगा। उनका जीवन अनुभव निरंतर गहरा होगा, उनका जीवन स्वभाव बदलेगा और उन्हें पूर्ण किया जाएगा।

— 'कार्य व्यवस्था' से उद्धृत

यह पता लगाना कि कोई व्यक्ति पोषण के लायक है या नहीं और क्या उसे इस्तेमाल किया जा सकता है, मुख्य रूप से दो पहलुओं पर निर्भर करता है: पहला, यह देखना ज़रूरी है कि क्या वह व्यक्ति सत्य का अनुसरण करता है या नहीं, वह सत्य पर अमल कर सकता है या नहीं, और क्या उसने वास्तविकता में प्रवेश किया है या नहीं; दूसरा, व्यक्ति को साफ़ तौर पर देखना चाहिए वह जिस काम के लिए है उसके लिए ज़रूरी गुण उसमें हैं, उसे यह जानना चाहिए कि उसमें सामान्य इंसानियत है या नहीं, उसमें विवेक और समझ है या नहीं, वह किस तरह का इंसान है और वह किस तरह के मार्ग पर चल रहा है। कलीसिया द्वारा लोगों का पोषण और इस्तेमाल मुख्य रूप से इस बात पर निर्भर करता है कि वे सत्य का अनुसरण करते हैं या नहीं; यह सबसे बुनियादी सिद्धांत है। इसका कारण यह है कि कोई व्यक्ति सत्य का अनुसरण करता है या नहीं, इससे कई समस्याओं का पता चलता है; इससे यह ख़ुलासा होता है कि क्या वे जिस मार्ग पर चल रहे हैं वह सही मार्ग है या गलत, परमेश्वर में उनकी आस्था व्यावहारिक है या नहीं और उनमें किस तरह के गुण मौजूद हैं। अगर वे सचमुच ऐसे व्यक्ति हैं जो सत्य का अनुसरण करते हैं, तो उनमें निश्चित रूप से अपेक्षाकृत बेहतर इंसानियत होगी, वे यकीनन सही मार्ग पर चल रहे होंगे और वे निस्संदेह अपेक्षाकृत उदार व्यक्ति होंगे। इसलिए, परमेश्वर का घर बार-बार ऐसे लोगों को अगुआ चुनने और अगुआ के तौर पर इस्तेमाल करने पर ज़ोर देता है जो वास्तव में सत्य का अनुसरण करते हैं; यह एक महत्वपूर्ण बात है। कोई व्यक्ति पूर्ण नहीं है; सभी लोगों में कमियां होती हैं। किसी व्यक्ति का मूल्यांकन करते समय, तुम्हें मुख्य पहलुओं पर विचार करना चाहिए: वह व्यक्ति सत्य का अनुसरण करता है या नहीं, क्या उसमें अच्छी काबिलियत है, क्या वह कृतसंकल्प है और क्या उसमें न्याय की समझ है। अगर कोई व्यक्ति सत्य का अनुसरण कर सकता है, तो उसमें छोटी-मोटी कमियां होने या उसके द्वारा कुछ मामूली अपराध किये जाने को समस्या नहीं माना जाता है। अगर वह सचमुच ऐसा व्यक्ति जो सत्य का अनुसरण कर सकता है, तो उसके सभी अपराधों का समाधान किया जा सकता है। किसी व्यक्ति का मूल्यांकन करते समय बाल की खाल मत निकालो या उसके बाहरी स्वरूप को देखकर फ़ैसला मत करो; तुम्हें उसके सार को देखना होगा। यही महत्वपूर्ण है। सबसे ज़रूरी काम है ऐसे लोगों को ढूंढना जिनमें सचमुच अच्छी काबिलियत है, जो सत्य का अनुसरण करते हैं और जो काम करने में सक्षम हैं; और फिर, कलीसिया में उनके लिए उपयुक्त स्थान की व्यवस्था करो, उनका अच्छी तरह से पोषण और आपूर्ति करो। जब सभी स्तरों पर कलीसिया के अगुआ और कार्यकर्ता परमेश्वर पर विश्वास करने के सही मार्ग पर कदम रखते हैं, वे परमेश्वर के चुने हुए लोगों को भी सही मार्ग पर लाने में अगुआई कर सकते हैं।

— 'कार्य व्यवस्था' से उद्धृत

क्या एक नया विश्वासी, जिसके पास अपेक्षाकृत अच्छी इंसानियत है, लेकिन जो सत्य को नहीं समझता है या जिसके पास सत्य वास्तविकता नहीं है, एक अगुआ बन सकता है? वह अगुआ नहीं बन सकता। जो परमेश्वर में विश्वास करते हैं सिर्फ़ वे ही करीब एक साल तक उसके कार्य का अनुभव करने के बाद कुछ सत्य को समझ सकते हैं। अगर यह पता चलता है कि कोई नया विश्वासी जिसने छह महीने या एक साल तक परमेश्वर में विश्वास किया है और उसके पास अच्छी इंसानियत है, वह उत्साह से सत्य का अनुसरण करता है, तो उसका पोषण किया जाना चाहिए और उसे उसका कर्तव्य पूरा करने के लिए प्रशिक्षित किया जाना चाहिए। अगर किसी ने पाँच या छह साल, या फिर सात या आठ साल तक परमेश्वर में विश्वास किया है और उसके पास अच्छी इंसानियत है, वह निष्कपट है और उसका व्यवहार अच्छा है लेकिन उसकी काबिलियत औसत दर्जे की है, उसने कई सालों तक सभाओं में हिस्सा लिया है, मगर फिर भी अधिक सत्य को नहीं समझता है और उसमें वास्तविकता की कमी है, तो क्या ऐसा व्यक्ति एक अगुआ होने के लिए उपयुक्त है? अगर उसमें बहुत कम काबिलियत है, तो वह सत्य को नहीं समझ सकता है और अगुआई करने में असमर्थ होगा; अधिक से अधिक, वह किसी न किसी तरह कोई एक कर्तव्य निभा सकता है। इसलिए, ऐसे लोग जो अगुआ के रूप में काम करते हैं उन्हें सत्य को समझने में सक्षम होना चाहिए, उनमें अच्छी काबिलियत होनी चाहिए और कम से कम औसत इंसानियत होनी चाहिए; इसके अलावा, उनका एक या दो साल तक, या संभवतः दो या तीन साल तक परमेश्वर में विश्वास रखा ज़रूरी है; साथ ही, उन्हें निश्चित रूप से कुछ सत्य वास्तविकता में प्रवेश करने में सक्षम होना चाहिए। सिर्फ़ इसी तरह के लोग पोषण के लायक होते हैं। यह कैसे पता लगाया जा सकता है कि किसी व्यक्ति में अच्छी काबिलियत है? अगर तुम उनके साथ सत्य पर सहभागिता करते हो या वे अपनी मर्ज़ी से परमेश्वर के वचनों को खाते और पीते हैं, वे हमेशा जानकार जानकार होते हैं और सत्य को समझते हैं, आध्यात्मिक बातों से अपेक्षाकृत परिचित होते हैं और जब भी तुम किसी बात की ओर इशारा करते हो तो वे उसका मतलब समझ सकते हैं, फिर उनमें अच्छी काबिलियत है। ऐसे बहुत से लोग हैं जिनकी काबिलियत बुरी नहीं है; जब तुम उनके साथ सत्य पर सहभागिता करते हो, तो वे उसे समझते हैं, लेकिन फिर भी सत्य को स्वीकार नहीं करते हैं या उस पर अमल नहीं करते हैं। क्या ऐसे लोग अगुआ की भूमिका निभाने के योग्य हैं? बिल्कुल नहीं। ऐसे ज़्यादातर अगुआ और कर्मी जिन्हें पहले हटा दिया गया था, उनमें कहीं अच्छी काबिलियत थी, लेकिन उन लोगों ने सत्य पर अमल नहीं किया, उनमें कमज़ोर इंसानियत थी और वे बहुत कपटी थे; वे लगातार झूठी गवाही और लोगों को धोखा दे रहे थे, उनमें ज़रा सी भी सत्य वास्तविकता नहीं थी। इसके अलावा, वे चाहे किसी भी कर्तव्य का निर्वहन कर रहे हों, वे हमेशा उसमें मिलावट और अपनी अप्रकट मंशाओं को शामिल करते थे। अगर उन्हें परमेश्वर के घर के लिए कोई कार्य करने की जिम्मेदारी सौंपी जाती है, तो वे कभी-कभी परमेश्वर के घर के बजाय बाहरी लोगों के पक्ष में काम करते हैं; वे उन बाहरी लोगों की गुप्त रूप से मदद करते हुए, परमेश्वर के घर से दूर रहते हैं। इस तरह के लोगों में अच्छी इंसानियत नहीं होती है। वे ईमानदारी से बात नहीं करते हैं, वे ऐसे काम करते हैं जिससे परमेश्वर के घर को चिंता होती है, इसके बजाय वे अपने निजी फायदे के लिए परमेश्वर के घर के हितों को नुकसान पहुंचाते हैं। ये सभी बहुत स्वार्थी और नीच लोग हैं, ऐसे स्वार्थी और नीच लोग अगुआ की भूमिका निभाने या कर्तव्य निर्वहन के लिए उपयुक्त नहीं हैं। इस तरह के लोग उद्धार प्राप्त नहीं कर सकते हैं। व्यक्ति को सत्य का अनुसरण करना चाहिए, सच्चा और ईमानदार होना चाहिए, उसे न्याय की समझ होनी चाहिए और सत्य सिद्धांतों को कायम रखने में सक्षम होना चाहिए; सिर्फ़ तभी वह व्यक्ति पोषण प्राप्त करने और अगुआ बनने के लिए उपयुक्त है।

— 'जीवन में प्रवेश पर धर्मोपदेश और संगति' से उद्धृत

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