68. लोगों को विकसित करने और उनका उपयोग करने के सिद्धांत

(1) अगुआओं और कार्यकर्ताओं के रूप में ऐसे योग्य लोगों को चुनना और विकसित करना आवश्‍यक है, जो सत्‍य से प्रेम करते हों और न्‍यायप्रिय हों। ऐसा करना कलीसिया के कार्य के हित में है।

(2) पहले हटाए जा चुके जिन लोगों ने सच्‍चा पश्‍चाताप कर लिया है और इसके बाद व्‍यावहारिक कार्य करने में सक्षम हो चुके हैं, उन्‍हें दोबारा चुना जा सकता है, फिर से पदोन्नत किया जा सकता है, और उपयोग में लाया जा सकता है।

(3) एक-दो वर्ष पहले नए-नए विश्‍वासी बने लोगों को, अगर वे अच्छी मानवता और क्षमता वाले मनुष्‍य हैं और सत्य से प्रेम करते हैं, तो मानक प्रक्रिया का अनुसरण किए बगैर, उन्हें तत्‍काल विकसित करके उपयोग में लाया जा सकता है।

(4) जो लोग, अपने अहंकार और आत्म-तुष्टि के बावजूद, बुरे नहीं हैं, वे अगर योग्य हैं और सत्‍य को स्‍वीकार कर सकते हैं, तो उन्‍हें विकसित किया जाना चाहिए और उनका उपयोग किया जाना चाहिए।

परमेश्वर के प्रासंगिक वचन :

संपूर्ण जगत में अपने कार्य की शुरुआत से ही, परमेश्वर ने अनेक लोगों को अपनी सेवा के लिए पूर्वनिर्धारित किया है, जिसमें हर सामाजिक वर्ग के लोग शामिल हैं। उसका प्रयोजन स्वयं की इच्छा को पूरा करना और पृथ्वी पर अपने कार्य को सुचारु रूप से पूरा करना है। परमेश्वर का लोगों को अपनी सेवा के लिए चुनने का यही प्रयोजन है। परमेश्वर की सेवा करने वाले हर व्यक्ति को परमेश्वर की इच्छा को अवश्य समझना चाहिए। उसका यह कार्य परमेश्वर की बुद्धि और सर्वशक्तिमत्ता को तथा पृथ्वी पर उसके कार्य के सिद्धांतों को लोगों के समक्ष बेहतर ढंग से ज़ाहिर करता है। वास्तव में परमेश्वर अपना काम करने और लोगों के संपर्क में आने के लिए पृथ्वी पर आया है, ताकि वे उसके कर्मों को अधिक स्पष्ट रूप से जान सकें। आज तुम लोग, लोगों का यह समूह, भाग्यशाली है कि तुम व्यावहारिक परमेश्वर की सेवा कर रहे हो। यह तुम लोगों के लिए एक अनंत आशीष है। वास्तव में, परमेश्वर ने तुम लोगों का स्तर बढ़ा दिया है। अपनी सेवा के लिए किसी व्यक्ति को चुनने में, परमेश्वर के सदैव अपने स्वयं के सिद्धांत होते हैं। परमेश्वर की सेवा करना मात्र एक उत्साह की बात नहीं है, जैसा कि लोग कल्पना करते हैं। आज तुम लोग देखते हो कि वे सभी जो परमेश्वर के समक्ष उसकी सेवा करते हैं, ऐसा इसलिए करते हैं क्योंकि उनके पास परमेश्वर का मार्गदर्शन और पवित्र आत्मा का कार्य है; और इसलिए क्योंकि वे सत्य का अनुसरण करने वाले लोग हैं। ये परमेश्वर की सेवा करने वाले सभी लोगों के लिए न्यूनतम शर्तें हैं।

— "वचन देह में प्रकट होता है" में 'धार्मिक सेवाओं का शुद्धिकरण अवश्य होना चाहिए' से उद्धृत

कलीसिया का अगुआ होने के लिए, न केवल यह जानना जरूरी है कि समस्याओं को सुलझाने के लिए सत्य का इस्तेमाल कैसे करें, बल्कि यह भी कि प्रतिभा का पता लगाकर उसे बढ़ावा कैसे दें, प्रतिभाशाली लोगों को न तो दबाएँ और न ही उनसे ईर्ष्या करें। कर्तव्य का ऐसा निर्वहन मानक के अनुसार होता है, ऐसा करने वाले अगुआ और कर्मी मानक के अनुरूप होते हैं। यदि तुम हर चीज में सिद्धांतों के अनुसार काम कर सको, तो तुम अपनी निष्ठा के अनुरूप जी रहे होगे। कुछ लोग हमेशा इस बात डरे रहते हैं कि दूसरे लोग उनसे बेहतर और ऊँचे हैं, दूसरों का सम्मान होगा और उनको अनदेखा कर दिया जाएगा। इसी वजह से वे दूसरों पर हमला करते हैं और उन्हें अलग कर देते हैं। क्या यह अपने से ज़्यादा सक्षम लोगों से ईर्ष्या करने का मामला नहीं है? क्या ऐसा व्यवहार स्वार्थी और घिनौना नहीं है? यह किस तरह का स्वभाव है? यह दुर्भावनापूर्ण है! केवल अपने हितों के बारे में सोचना, सिर्फ़ अपनी इच्छाओं को संतुष्ट करना, दूसरों के कर्तव्यों पर कोई ध्यान नहीं देना, या परमेश्वर के घर के हितों के बारे में नहीं सोचना—इस तरह के लोग बुरे स्वभाव वाले होते हैं, और परमेश्वर के पास उनके लिये कोई प्रेम नहीं है। अगर तुम वाकई परमेश्वर की इच्छा का ध्यान रखने में सक्षम हो, तो तुम दूसरे लोगों के साथ निष्पक्ष व्यवहार कर पाने में सक्षम होगे। अगर तुम किसी अच्छे व्यक्ति के पक्ष में दलील देते हो और उसे योग्य बनाते हो, उसके बाद परमेश्वर के घर में एक और प्रतिभाशाली व्यक्ति होगा, तब क्या तुम्हारा काम और आसान नहीं हो जाएगा? तब क्या इस कर्तव्य के निर्वहन में तुमने अपनी निष्ठा के अनुरूप काम नहीं किया होगा? यह परमेश्वर के समक्ष एक अच्छा कर्म है; कम से कम एक अगुआ में इतना विवेक और सूझ-बूझ तो होनी ही चाहिए। जो लोग सत्य को व्यवहार में लाने में सक्षम हैं, वे अपने कार्यों में परमेश्वर की जाँच को स्वीकार कर सकते हैं। जब तुम परमेश्वर की जाँच को स्वीकार करते हो, तो तुम्हें गलती का एहसास होता है। यदि तुम हमेशा दूसरों को दिखाने के लिए ही काम करते हो और परमेश्वर की जाँच को स्वीकार नहीं करते, तो क्या तुम्हारे हृदय में परमेश्वर है? इस तरह के लोगों के हृदय में परमेश्वर के प्रति श्रद्धा नहीं होती। हमेशा अपने लिए कार्य मत कर, हमेशा अपने हितों की मत सोच, और अपनी स्वयं की हैसियत, प्रतिष्ठा और साख पर विचार मत कर। इंसान के हितों पर गौर मत कर। तुझे सबसे पहले परमेश्वर के घर के हितों पर विचार करना चाहिए और उसे अपनी पहली प्राथमिकता बनाना चाहिए। तुझे परमेश्वर की इच्छा की परवाह करनी चाहिए, इस पर चिंतन करने के द्वारा आरंभ कर कि तू अपने कर्तव्य को पूरा करने में अशुद्ध रहा है या नहीं, क्या तूने वफादार होने के लिए अपना अधिकतम किया है, क्या अपने उत्तरदायित्वों को पूरा करने के लिए अपना सर्वोत्तम प्रयास किया है और अपना सर्वस्व दिया है, साथ ही क्या तूने अपने कर्तव्य, और परमेश्वर के घर के कार्य के प्रति पूरे दिल से विचार किया है। तुझे इन चीज़ों के बारे में विचार करने की आवश्यकता है। इन चीज़ों पर बार-बार विचार कर, और तू आसानी से अपने कर्तव्य को अच्छी तरह से निभा पाएगा। जब तेरी क्षमता कमज़ोर होती है, तेरा अनुभव उथला होता है, या जब तू अपने पेशे में दक्ष नहीं होता है, तब सारी ताकत लगा देने के बावजूद तेरे कार्य में कुछ गलतियाँ या कमियाँ हो सकती हैं, और परिणाम बहुत अच्छे नहीं हो सकते हैं। जब तू कार्यों को करते हुए अपनी स्वयं की स्वार्थी इच्छाओं या अपने स्वयं के हितों के बारे में विचार नहीं करता है, और इसके बजाय हर समय परमेश्वर के घर के कार्य पर विचार करता है, परमेश्वर के घर के हितों के बारे में लगातार सोचता रहता है, और अपने कर्तव्य को अच्छी तरह से निभाता है, तब तू परमेश्वर के समक्ष अच्छे कर्मों का संचय करेगा। जो लोग ये अच्छे कर्म करते हैं, ये वे लोग हैं जिनमें सत्य-वास्तविकता होती है; इन्होंने गवाही दी है। यदि तू हमेशा देह के अनुसार जीता है, हमेशा अपनी स्वार्थी इच्छाओं को संतुष्ट करता है, तो ऐसे व्यक्ति में सत्य-वास्तविकता नहीं होती। यह परमेश्वर को लज्जित करने का चिह्न है।

— "अंत के दिनों के मसीह की बातचीत के अभिलेख" में 'अपना सच्चा हृदय परमेश्वर को दो, और तुम सत्य को प्राप्त कर सकते हो' से उद्धृत

परमेश्वर के चुने हुए लोग जानते हैं कि जब परमेश्वर का घर विभिन्न प्रकार के लोगों को उन्नत और विकसित करता है, तो यह किसी प्रकार का उच्च-तकनीक का निर्माण-चमत्कार करने या मानव-विकास के इतिहास में अनुसंधान करने के लिए नहीं होता, और इसलिए तो बिलकुल भी नहीं होता कि परमेश्वर का घर मानवजाति के भविष्य के लिए किसी प्रकार की योजनाएँ बना रहा है। तो फिर, परमेश्वर का घर विभिन्न प्रकार की प्रतिभाओं को उन्नत और विकसित क्यों करता है? (यह राज्य के सुसमाचार को फैलाने के लिए किया जाता है।) (यह उन सभी के लिए प्रशिक्षण का एक अवसर बनाने के लिए किया जाता है, जो सत्य का अनुसरण करते हैं।) दोनों सही हैं। अंशत: यह परमेश्वर के कार्य से संबंधित है, और अंशत: इसमें व्यक्तिगत खोज और जीवन में प्रवेश शामिल है। ये दोनों व्यापक विषय हैं। विशिष्ट रूप से कहें तो, जब परमेश्वर का घर लोगों को उन्नत और विकसित करता है, तो इसका बाहरी स्वरूप किसी व्यक्ति को किसी समूह का मुखिया बनने या निरीवेक्षक के रूप में कार्य करने, किसी कलीसिया या जिले का अगुआ या निर्णयकर्ता समिति का सदस्य बनने इत्यादि के लिए उन्नत और विकसित करने के लिए होता है। क्या यह किसी आधिकारिक भूमिका में पदोन्नति के समान है? (नहीं।) जिन लोगों को उन्नत और विकसित किया जाता है, वे विभिन्न प्रकार के कार्यों से संबंधित विशिष्ट परियोजनाओं या कार्यों के लिए जिम्मेदार होते हैं। उदाहरण के लिए, वह सुसमाचार फैलाने का कार्य हो सकता है, या पाठ-आधारित कार्य, या कलीसियाई जीवन से संबंधित कार्य, या सामान्य कार्य, इत्यादि। तो, वे विशिष्ट कार्य कैसे करते हैं? वे उसे परमेश्वर की अपेक्षाओं के साथ-साथ उसके वचनों में निहित सत्य-सिद्धांतों के अनुसार करते हैं; इसलिए, वे लोग परमेश्वर के घर के विभिन्न कार्य का कार्यभार भी उसकी कार्य-व्यवस्थाओं के अनुसार लेते हैं, ताकि उसके द्वारा अपेक्षित मानक और सिद्धांत पूरे किए जा सकें। जिन्हें उन्नत और विकसित किया गया है, उनके द्वारा किए जाने वाले कार्यों से देखा जा सकता है कि उनके पास पदनाम या आधिकारिक पद नहीं हैं; बल्कि, उन्होंने जिम्मेदारियाँ ली हैं और विशेष कार्य या विशेषज्ञतापूर्ण कार्य के दायित्व लिए हैं। यह भी कहा जा सकता है कि वे ऐसे विशेष आदेश लेते हैं, या वे उन कर्तव्यों या दायित्वों को लेते हैं जो कुछ हद तक जिम्मेदारी से युक्त होते हैं। यह विभिन्न प्रकार की प्रतिभाओं को उन्नत और विकसित करने का विशिष्ट अर्थ और महत्व है। ऐसे लोगों को उन्नत और विकसित करने में उन्हें विशेष कार्य करने के लिए प्रशिक्षित करना, उन्हें परमेश्वर के घर की अपेक्षाओं और कार्य-व्यवस्थाओं के अनुसार विभिन्न कार्यों को व्यवस्थित रूप से निष्पादित करने में सक्षम बनना सिखाना, और उन्हें यह सीखने के लिए शिक्षित करना शामिल है कि परमेश्वर के घर का कार्य परमेश्वर के वचनों और सत्य-सिद्धांतों के अनुसार कैसे निष्पादित किया जाए। बेशक, उनकी उन्नति और विकास में अर्थ का एक और स्तर है : एक ओर, वे परमेश्वर के घर की कार्य-व्यवस्थाओं को मिलकर पूरा करने में सभी की अगुआई करते हैं; और दूसरी ओर, अपने अनुभव, ज्ञान, प्रतिबद्धता और जिम्मेदारी का उपयोग कर वे उन सभी की, जिनके लिए वे जिम्मेदार हैं, उन सिद्धांतों में प्रवेश करने में अगुआई करते हैं, जिनमें प्रवेश करने की परमेश्वर उनसे अपेक्षा करता है। यह विभिन्न प्रकार की प्रतिभाओं की उन्नति और विकास में शामिल विशिष्ट कार्य है।

— "अंत के दिनों के मसीह की बातचीत के अभिलेख" में 'नकली अगुआओं की पहचान करना (5)' से उद्धृत

विभिन्न प्रकार की प्रतिभाओं की परिभाषाएँ बहुत व्यापक हैं, है ना? पहला उस प्रकार का व्यक्ति है, जिसे विभिन्न कार्यों का प्रभारी बनाया जा सकता है। ऐसे लोगों के लिए कौन-से मानक अपेक्षित हैं? सबसे बढ़कर, उन्हें सत्य समझने में सक्षम होना चाहिए; उनमें सत्य समझने की क्षमता होनी चाहिए। ये सबसे महत्वपूर्ण चीजें हैं। अधिक विशेष रूप से, उन्हें आध्यात्मिक चीजें समझनी चाहिए, बिना सहायता के परमेश्वर के वचनों को खाने और पीने में सक्षम होना चाहिए, उसके वचनों में अभ्यास के लिए सिद्धांतों को खोजने में सक्षम होना चाहिए, और परमेश्वर के वचनों को पढ़ने के माध्यम से उन विभिन्न अवस्थाओं को समझने में सक्षम होना चाहिए, जिनमें लोग खुद को पाते हैं। उन्हें अपने आप अनुभव करने में सक्षम होना चाहिए; कोई समस्या सामने आने पर उन्हें अपने बारे में चिंतन करने, और परमेश्वर द्वारा निर्धारित किए जाने वाले परिवेशों का अनुभव करने और वे सबक सीखने में, जो उन्हें सीखने चाहिए, परमेश्वर के वचनों का उपयोग करने में उपयुक्त होना चाहिए। सत्य समझने की योग्यता और क्षमता का होना पहली चीज है, जो उनसे अपेक्षित है। निस्संदेह, ऐसे लोगों में विवेक और समझ भी होनी चाहिए और उनकी मानवता अपेक्षित स्तर की होनी चाहिए। दूसरे, उन्हें कोई दायित्व उठाना चाहिए। यदि वे केवल अच्छी क्षमता के हैं और सत्य समझने में सक्षम हैं, लेकिन आलसी हैं और दैहिक सुखों की लालसा करते हैं, यदि वे केवल तभी काम करते हैं जब जरूरत होती है या जब उच्च संकेत करता है, और जब वे काम करते भी हैं तो केवल बेमन से करते हैं और शायद ही कभी मूलभूत स्तर पर संलग्न होते हैं, और यदि वे पीड़ा सहने या कीमत चुकाने के लिए तैयार नहीं होते और कोई बोझ नहीं उठाते, तो क्या उन्हें ऐसी प्रतिभाएँ माना जा सकता है, जो विकसित किए जाने योग्य हैं? (नहीं।) तो, यह दूसरी अपेक्षा है : ऐसे लोगों को बोझ उठाना चाहिए। तीसरी बात यह है कि उन्हें अपने काम में सक्षम होना चाहिए। अर्थात्, परमेश्वर के घर की कार्य-व्यवस्थाओं के अनुसार कार्य निष्पादित करने के अलावा, उन्हें कोई विशेष कार्य करते समय समस्याओं की पहचान करने और उन्हें तुरंत हल करने में सक्षम होना चाहिए; उन्हें अपना काम प्रभावी ढंग से और गहराई से करना चाहिए, और उसे लापरवाही से नहीं करना चाहिए; साथ ही, उन्हें यह तय करने में सक्षम होना चाहिए कि परमेश्वर के घर की कार्य-व्यवस्थाओं में उन्हें कौन-सा कार्य करना चाहिए, और साथ ही उन कार्य-व्यवस्थाओं को लागू करना और उन्हें सही ढंग से पूरा करना चाहिए। यदि उन्हें कोई कार्य करते समय किसी समस्या का पता चले, तो उन्हें परमेश्वर के घर की कार्य-व्यवस्थाओं के विनियमों के संदर्भ में उसे सँभालने में सक्षम होना चाहिए। उन्हें विशेष चीजों या परिस्थितियों को उनके वास्तविक रूप में समझने में भी सक्षम होना चाहिए, और उस आधार पर सटीक निर्णय लेने और फिर सही समाधान प्रदान करने में सक्षम होना चाहिए। अपने काम में सक्षम होने का यही मतलब है। अपने काम में सक्षम होने का अर्थ मुख्य रूप से कार्य के प्रमुख बिंदुओं को समझने, समस्याओं की तुरंत पहचान करने और उन्हें सिद्धांत के अनुसार हल करने में सक्षम होना है—अर्थात् अपने पैरों पर खड़े होने में सक्षम होना। जब उच्च ने कोई कार्य सौंप दिया है और कुछ सिद्धांत भी संप्रेषित कर दिए हैं, तो इन लोगों को सिद्धांतों को समझने और उनके अनुसार कार्य निष्पादित करने में सक्षम होना चाहिए; उन्हें मूलत: बहुत अधिक विचलनों या बहुत अधिक चूकों के बिना सही कार्य-प्रणाली का अनुसरण करने में सक्षम होना चाहिए। सक्षम होने का यही अर्थ है। उदाहरण के तौर पर : जब परमेश्वर का घर सिद्धांत के अनुसार लोगों को परिष्कृत और निष्कासित करने के लिए और मसीह-विरोधियों और दुष्टों को पहचानने के लिए कहता है, तो सक्षम लोग मूलत: इस कार्य को करते समय विचलित नहीं होते। मसीह-विरोधियों के प्रकट होने पर उन्हें उजागर और निष्कासित किए जाने में देर नहीं लगती; जो सक्षम हैं, वे मसीह-विरोधियों की जल्दी से पहचान करने में सक्षम होते हैं, साथ ही अपने भाई-बहनों की भी उन्हें पहचानने और ठगे न जाने में मदद करते हैं। एक-साथ मिलकर हर कोई मसीह-विरोधियों को उजागर करने और त्यागने, और अंततः उन्हें निकालने में सफल होता है। जब सक्षम लोगों का अपने काम के दायरे में मसीह-विरोधियों या दुष्टों से सामना होता है, तो उनके कम से कम पंचानवे प्रतिशत भाई-बहन ठगे नहीं जाते या प्रभावित नहीं होते; कभी-कभी तो एक भी धोखा नहीं खाता या गुमराह नहीं होता। अच्छी क्षमता वाले और अपने काम में सक्षम लोग ऐसे ही होते हैं; ऐसे लोग सत्य-वास्तविकता से युक्त अगुआ और कार्यकर्ता होने के योग्य होते हैं।

— "अंत के दिनों के मसीह की बातचीत के अभिलेख" में 'नकली अगुआओं की पहचान करना (5)' से उद्धृत

कुछ लोग एक विशेष प्रकार होते हैं, जो शायद किसी भी चीज में विशेष रूप से प्रतिभाशाली नहीं होते—वे थोड़ा लिख सकते हैं, और जब वे गाना गाते या रिकॉर्ड करते हैं तो वे लय में गा सकते हैं, लेकिन वे इन चीजों में सर्वश्रेष्ठ नहीं होते। वे किस चीज में सर्वश्रेष्ठ होते हैं? उनके पास कुछ क्षमता होती है, उनमें कुछ न्याय की भावना होती है, और उनके पास इस बात की थोड़ी समझ होती है कि लोगों का आकलन और उनका उपयोग कैसे किया जाए। इसके अतिरिक्त, उनकी मुख्य ताकत उनकी संगठनात्मक क्षमता होती है। अगर तुम ऐसे व्यक्ति को कोई काम या दायित्व दो, तो वे उसे करने के लिए लोगों को संगठित कर सकते हैं। साथ ही, वे अपने काम में सक्षम होते हैं। अगर तुम उन्हें कोई काम दो, तो वे उसे पूरा करने और यह सुनिश्चित करने की क्षमता रखते हैं कि वह ठीक से किया गया है। उनके मन में हमेशा एक योजना होती है, जिसमें विभिन्न चरण और क्रमबद्ध प्रगति होती है। वे जानते हैं कि लोगों का उपयोग कैसे करना है, समय कैसे आवंटित करना है और किन लोगों का किन कार्यों के लिए उपयोग करना है। अगर कोई समस्या आती है, तो वे जानते हैं कि सभी के साथ उसके समाधान पर चर्चा कैसे की जाए। वे इन सभी चीजों को सँभालना और सुलझाना जानते हैं। ऐसा व्यक्ति न केवल अपने काम में सक्षम होता है, बल्कि बोलता भी अपेक्षाकृत अच्छा है। उनके शब्द स्पष्ट और व्यवस्थित होते हैं, और वे लोगों को भ्रमित नहीं करते। जब वे काम सौंपते हैं, तो हर कोई स्पष्ट रूप से समझता है कि हर व्यक्ति को क्या करना चाहिए; न देखने के कारण कोई भूल नहीं होती, और कोई बेकार नहीं बैठता। काम के विवरण के बारे में उनकी व्याख्या भी स्पष्ट और व्यवस्थित होती है, और विशेष रूप से जटिल मुद्दों के लिए वे विश्लेषण, सहभागिता और विवरणों के उदाहरण पेश करते हैं, जिससे सभी मुद्दे को समझ जाते हैं, जान जाते हैं कि कैसे काम करना है और कैसे आगे बढ़ना है। इसके अतिरिक्त, वे इस बात पर सहभागिता कर सकते हैं कि काम करने के कौन-से तरीके दोषपूर्ण हो सकते हैं, काम करने के विभिन्न तरीके दक्षता को कैसे प्रभावित करते हैं, लोगों को अपने काम के दौरान किन बातों का पता होना चाहिए, इत्यादि। काम शुरू करने से पहले वे दूसरों की तुलना में अधिक सोचते हैं—वे दूसरों की तुलना में अधिक विस्तार से सोचते हैं, और वे दूसरों की तुलना में अधिक यथार्थवादी ढंग से सोचते हैं। उनके पास दिमाग होता है और वे इस क्षेत्र में वाक्पटु होते हैं। उनके पास दिमाग होने का मतलब है कि वे चीजों को व्यवस्थित ढंग से, व्यवस्थित कदमों के साथ, एक योजना के अनुसार और बड़ी स्पष्टता के साथ करते हैं। उनके वाक्पटु होने का मतलब है कि वे अपने मन के विचारों, योजनाओं और गणनाओं को स्पष्ट रूप से और समझ में आने लायक ढंग से व्यक्त करने के लिए भाषा का उपयोग कर सकते हैं। वे सरल और संक्षिप्त रूप से बोलना जानते हैं, ताकि उनके श्रोता भ्रमित न हों। वे स्वयं को स्पष्ट, सटीक, सच्चे और उपयुक्त ढंग से व्यक्त करते हैं। वाक्पटु होने का यही अर्थ है। इस तरह का व्यक्ति वाक्पटु होता है, उसमें काम करने की क्षमता होती है, व्यवस्था करने की क्षमता होती है, और इससे भी बढ़कर, जिम्मेदारी की भावना, न्याय की भावना होती है। वे हर कीमत पर हाँ में हाँ मिलाने वाले या शांति बनाए रखने वाले नहीं होते। जब वे दुष्ट लोगों को विघ्न और बाधाएँ उत्पन्न करते देखते हैं, या मुफ्तखोरों और आलसी लोगों को मक्कारी और छल-कपट करके काम निकालते देखते हैं या अपने काम की उपेक्षा करने वाले नासमझ और घटिया किस्म के व्यक्ति को देखते हैं, तो वे क्रोधित हो जाते हैं। यह बात उन्हें परेशान करती है, और वे तुरंत समस्या का समाधान करते हैं और परमेश्वर के घर के काम और हितों की रक्षा करते हैं। ये व्यवहार इस तरह के व्यक्ति की मानवता की उत्कृष्ट विशेषताएँ हैं, हैं ना? (हाँ।) हो सकता है, इस तरह के लोग मिलनसार न हों, या किसी विशेष कार्य या तकनीक में कुशल न हों, लेकिन अगर उनमें वे गुण हैं, जिनका मैंने अभी वर्णन किया है तो उन्हें अगुआओं और कार्यकर्ताओं के रूप में विकसित किया जा सकता है।

— "अंत के दिनों के मसीह की बातचीत के अभिलेख" में 'नकली अगुआओं की पहचान करना (6)' से उद्धृत

उन्नत और विकसित किए जा सकने वाले एक अन्य प्रकार के व्यक्ति वे हैं, जिनमें विशेष प्रतिभा या गुण हैं और जिन्होंने किसी विशेषज्ञता या कौशल में महारत हासिल की है। ऐसे लोगों से परमेश्वर का घर किस मानक की अपेक्षा करता है? पहले, अपनी मानवता के संबंध में, इस प्रकार के व्यक्ति को सकारात्मक चीजों के प्रति अपेक्षाकृत उत्साही होना चाहिए; ऐसे लोग दुष्ट नहीं होने चाहिए। कुछ लोग पूछ सकते हैं, "यह क्यों नहीं कह सकते कि वे सत्य से प्रेम करने वाले व्यक्ति होते हैं?" ऐसे लोगों से सत्य से प्रेम करने की अपेक्षा करना कुछ ज्यादा है। ये लोग, जिनके पास कुछ कौशलों या कार्यों में विशेषज्ञता और कुछ खूबियाँ होती हैं, जब ऐसा काम करते हैं जिसके लिए थोड़े कौशल की जरूरत होती है और जो परमेश्वर के घर में उनके पेशे से संबंधित होता है, तो उन्हें केवल अपेक्षाकृत समझदार होना चाहिए, दुष्ट और अपनी समझ में गलत या बेतुका नहीं, उन्हें कठिनाई सहने में सक्षम, और कीमत चुकाने के लिए तैयार होना चाहिए। अतः ऐसे लोगों से पहली अपेक्षा यह है कि वे सकारात्मक चीजों के प्रति अपेक्षाकृत उत्साही हों। कुछ लोग पूछ सकते हैं, "तो क्या सत्य समझने की उनकी क्षमता उच्च मानी जा सकती है? सत्य सुनने के बाद क्या वे सत्य-वास्तविकता के प्रति जाग सकते हैं? क्या वे सत्य-वास्तविकता में प्रवेश करने में सक्षम हैं?" ऐसा करने की जरूरत नहीं है; ऐसे लोगों को सत्य की अपनी समझ में गलत या बेतुका नहीं होना चाहिए, बस। जब ऐसे लोग अपना काम करते हैं, तो एक लाभ यह होता है कि उनके व्यवधान पैदा करने या कुछ हास्यास्पद करने की संभावना नहीं होती। उदाहरण के लिए, अभिनेताओं की वेशभूषा का रंग लो : परमेश्वर के घर ने इसके लिए बार-बार अपेक्षाएँ जारी की हैं और प्रासंगिक सिद्धांतों पर संगति की है, फिर भी ऐसे लोग हैं जो यह समझ ही नहीं पाते कि उनसे क्या कहा गया है, वे जो सुनते हैं उसे समझते नहीं, जो समझने में अक्षम हैं, और जो परमेश्वर के घर की इन अपेक्षाओं के भीतर सिद्धांत खोज पाने में असमर्थ हैं—और जो अंतत: स्लेटी रंग के परिधानों का चयन कर डालते हैं। गलत और बेतुकी समझ होने का यही अर्थ है। तो, सकारात्मक चीजों के प्रति अपेक्षाकृत उत्साही होने का क्या अर्थ है? इसका अर्थ है सही वचनों और चीजों के प्रति, एक शुद्ध समझ, और लाभदायक कथनों और सिद्धांतों के प्रति ग्रहणशील होना। चाहे वे इन चीजों के अनुसार कार्य कर सकते हों या नहीं, लेकिन कम से कम, अंतर्मन में उन्हें अवज्ञाकारी या प्रतिरोधी नहीं होना चाहिए। ऐसे लोग सभ्य लोग होते हैं। सभ्य लोगों के क्या लक्षण बताए जाते हैं? वे अविश्वासियों द्वारा किए जाने वाले बुरे कामों के साथ-साथ लोगों द्वारा अपनाई जाने वाली दुष्ट प्रवृत्तियों के प्रति भी अरुचि, विकर्षण और घृणा महसूस करते हैं। उदाहरण के लिए, जब दुष्ट प्रवृत्तियों से ग्रस्त लोग इस बात की वकालत करते हैं कि महिलाओं को शादी करने या रखैल बनने के लिए किसी अमीर आदमी को ढूँढ़ना चाहिए, तो सकारात्मक चीजों से प्रेम करने वाले लोग यह कहते हुए घृणा महसूस करते हैं, "भले ही मुझे शादी करने के लिए कोई न मिले, भले ही मैं गरीबी से मर जाऊँ, लेकिन मैं कभी भी उन लोगों की तरह काम नहीं करूँगा।" वे ऐसे लोगों के प्रति घृणा और तिरस्कार से भरे होते हैं। सकारात्मक चीजें पसंद करने वालों की एक विशेषता यह है कि वे बुरी प्रवृत्तियों को वीभत्स और घिनौना पाते हैं, और उन लोगों से घृणा करते हैं जो इस तरह की प्रवृत्तियों में फँस गए हैं। ये लोग अपेक्षाकृत सभ्य हैं; परमेश्वर में विश्वास करने और एक अच्छा इंसान बनने, सही रास्ते पर चलने, परमेश्वर का भय मानने, बुराई से दूर रहने, बुरी प्रवृत्तियों से दूर रहने और दुनिया के सभी दुष्ट व्यवहारों से दूर रहने का उल्लेख किए जाने पर अंतर्मन में उन्हें लगता है कि ये अच्छी चीजें हैं। वे इस पथ पर कदम रख पाएँ या नहीं, और चाहे परमेश्वर में विश्वास करने और सही रास्ते पर चलने की उनकी आकांक्षा कितनी भी बड़ी हो, कुल मिलाकर अपने अंतर्मन में वे प्रकाश में रहने और उस स्थान पर होने के लिए तरसते हैं, जहाँ धार्मिकता की सत्ता होती है। ऐसे लोग सभ्य होते हैं, और सभ्य लोग ऐसे होते हैं जो सकारात्मक चीजों के प्रति अपेक्षाकृत उत्साही होते हैं। परमेश्वर के घर द्वारा उन्नत और विकसित किए जाने वाले लोगों में कम से कम यह मानवीय गुण अवश्य होना चाहिए।

दूसरी अपेक्षा इस मानक का उपयोग करती है कि ऐसे लोगों को कठिनाई झेलने और कीमत चुकाने में सक्षम होना चाहिए। अर्थात्, जब उन कारणों या कार्यों की बात आती है, जिनके बारे में वे जुनूनी होते हैं, तो वे अपनी इच्छाएँ अलग रखने में सक्षम होते हैं, दैहिक सुख या आरामदायक जीवन-शैली छोड़ देते हैं, यहाँ तक कि अपनी भविष्य की संभावनाएँ भी छोड़ देते हैं। इसके अलावा, थोड़ी-सी कठिनाई या कुछ हद तक थका हुआ महसूस करना उनके लिए कोई बड़ी बात नहीं होती; अगर वे कुछ सार्थक और कुछ ऐसा कर रहे हों, जिसे वे सही मानते हैं, तो वे खुशी-खुशी भौतिक सुख और लाभ त्याग देते हैं—या कम से कम ऐसा करने की इच्छा या आकांक्षा रखते हैं। कुछ लोग कहते हैं, "कभी-कभी वे लोग अभी भी दैहिक सुखों का लालच करते हैं : वे सोना चाहते हैं, या अच्छा खाना खाना चाहते हैं, कभी-कभी वे बाहर घूमने जाना या खेलते-कूदते समय बिताना चाहते हैं—लेकिन अधिकांश समय वे कठिनाई सहने और कीमत चुकाने में सक्षम होते हैं; बस कभी-कभी उनकी मन:स्थिति उन्हें वैसे विचारों की ओर ले जाती है। क्या इसे समस्या माना जाएगा?" इसे समस्या नहीं माना जाएगा। उनसे यह माँग करना बहुत अधिक होगा कि वे विशेष परिस्थितियों को छोड़कर दैहिक सुखों को पूरी तरह से अलग रख दें। सामान्य तौर पर, जब तुम ऐसे लोगों को कोई काम करने के लिए देते हो, चाहे वह कोई बड़ा काम हो या नहीं, और चाहे वे उसे करना चाहते हों या नहीं, अगर तुम उसे उन्हें सौंप देते हो, तो चाहे उन्हें कितनी भी बड़ी कठिनाई झेलनी पड़े, कितनी भी कीमत चुकानी पड़े, और चाहे काम कितना भी मुश्किल क्यों न हो, तुम्हें उन पर नजर रखने की जरूरत नहीं पड़ती, क्योंकि उनके द्वारा उसे ठीक से किए जाने की गारंटी होती है। ऐसे लोगों को सभ्य भी माना जा सकता है; कठिनाई सहने और कीमत चुकाने की क्षमता सभ्य लोगों की एक और अभिव्यक्ति है। कठिनाई सहने और कीमत चुकाने में सक्षम होने का क्या अर्थ है? इसका अर्थ समाज में ऐसे निठल्ले व्यक्ति न होना है, जो लालची और आलसी होते हैं, और जो आराम से प्रेम और श्रम से घृणा करते हैं—ऐसे लोग सभ्य नहीं होते। कठिनाई सहने और कीमत चुकाने में सक्षम होना : यह उस व्यक्ति की एक अभिव्यक्ति और साथ ही एक विशेषता है, जिसे परमेश्वर के घर द्वारा उन्नत और विकसित किया जाता है।

तीसरा बिंदु अपनी समझ में सटीक होना है। अर्थात्, परमेश्वर के वचनों को सुनने के बाद लोग कम से कम इस बात से अवगत हों कि वे शब्द क्या कहते हैं, उनमें जो कहा जा रहा है उसे समझने में सक्षम हों, और उसे बिना किसी विकृति के समझ सकें। उदाहरण के लिए, तुम अगर नीला कहो, तो वे उसे काला न समझें, और अगर तुम स्लेटी कहो तो वे उसे हल्का बैंगनी न समझें। यह न्यूनतम है।

चौथे, ऐसे लोगों को दुष्ट नहीं होना चाहिए। क्या यह समझना आसान है? दुष्ट न होने का मतलब कम से कम यह है : परमेश्वर के घर द्वारा उनसे जो कहा गया था, उसे हासिल करने में विफल रहने पर या उसे गलत तरीके से करने के बाद ऐसे लोग काट-छाँट किए जाने या निपटे जाने पर समर्पण करने और आज्ञापालन करने में सक्षम होते हैं; वे नकारात्मकता और धारणाएँ नहीं फैलाते, और प्रतिरोधी नहीं होते। इसके अलावा, चाहे वे किसी भी समूह में हों, वे अधिकांश लोगों के साथ मिलजुलकर रहते हैं और उनके साथ सद्भाव से काम कर सकते हैं; यहाँ तक कि जब कोई अप्रिय बात कहता है, तो भी वे धैर्यवान और सहज रहते हैं। यदि कोई उन्हें धौंस देने की कोशिश करता है, तो जैसे ही वे देखते हैं कि यह व्यक्ति नीच है, वे उससे दूरी बनाकर रखने में सक्षम होते हैं और उसे दंडित करने का प्रयास नहीं करते। हालाँकि ऐसे लोगों को निष्कपट नहीं कहा जा सकता, लेकिन कम से कम वे दूसरों को दंडित करने या नीचा दिखाने की कोशिश नहीं करते। इसके अलावा, ऐसे लोग अपना राज्य स्थापित करने, परमेश्वर के घर के विरोध में कार्य करने, परमेश्वर के बारे में धारणा फैलाने, या उसकी आलोचना करने का प्रयास नहीं करते, या कुछ भी विध्वंसकारी या गड़बड़ी पैदा करने का प्रयास नहीं करते।

ऊपर दिए गए चार बिंदु उन लोगों को उन्नत और विकसित करने के लिए बुनियादी मानदंड हैं, जिनमें कुछ खूबियाँ हैं और जो किसी कौशल या पेशे को समझते हैं। अगर वे ये चार मानदंड पूरे करते हैं, तो वे मूलत: कुछ कर्तव्यों का पालन करने और कुछ कार्य उचित तरीके से करने के योग्य होते हैं।

— "अंत के दिनों के मसीह की बातचीत के अभिलेख" में 'नकली अगुआओं की पहचान करना (5)' से उद्धृत

एक अन्य प्रकार का व्यक्ति भी होता है, जिसमें कोई विशेष प्रतिभा नहीं होती, या विशेषज्ञता या तकनीकी कौशल नहीं होता, और जिसके काम में कोई उन्नत प्रौद्योगिकी शामिल नहीं होती। ये लोग कलीसिया में कुछ रोजमर्रा के काम करते हैं, और कलीसिया के काम से बाहर के कुछ मामले निपटाते हैं। वे उस श्रेणी के लोग होते हैं, जो रोजमर्रा के काम करते हैं। ऐसे लोगों से परमेश्वर के घर की मुख्य अपेक्षा क्या है? सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि वे परमेश्वर के घर के हितों की रक्षा करने में सक्षम हैं, परमेश्वर के घर की कीमत पर बाहरी लोगों की मदद नहीं करते, और बाहरी लोगों के अनुग्रह का पात्र बनने के लिए परमेश्वर के घर के हितों से विश्वासघात करने के सिद्धांत पर काम नहीं करते। बस इतना ही। भले ही उनकी मानवता कैसी भी हो—वे कोई परिचारिका या समाज के सर्वोत्तम लोग या कोई असाधारण प्रतिभाएँ हो सकती हैं—उन्हें परमेश्वर के घर के लिए कुछ विशेष कार्य या बाहरी दुनिया से संबंधित मामले निपटाते समय परमेश्वर के घर के हितों की रक्षा करने में सक्षम होना चाहिए। परमेश्वर के घर के हितों में क्या-क्या शामिल है? धन, सामग्री, परमेश्वर के घर और कलीसिया की प्रतिष्ठा, और भाई-बहनों की सुरक्षा। इनमें से प्रत्येक बहुत महत्वपूर्ण है। जो कोई भी इसे प्राप्त करने में सक्षम होता है, उसमें मानवता होती है, और वह पर्याप्त ईमानदार होता है, और वह सत्य का अभ्यास करने के लिए तैयार होता है। कुछ लोगों में दुष्ट मानवता होती है : क्या वे परमेश्वर के घर के कार्य की रक्षा करने में सक्षम हैं? (नहीं।) क्या वे ऐसे लोग हैं, जो परमेश्वर के घर के कार्य की रक्षा के लिए बहुत-कुछ करते हैं, फिर भी उनमें दुष्ट मानवता होती है? (नहीं।) इस प्रकार, अगर कोई वास्तव में परमेश्वर के घर के हितों की रक्षा करने में सक्षम है, तो उनके अच्छे चरित्र और मानवता वाले होने की गारंटी है; यह गलत नहीं हो सकता। अगर कोई परमेश्वर के घर की ओर से कार्य करते हुए, उसकी कीमत पर बाहरी लोगों की मदद करता है, और उसके हितों के साथ विश्वासघात करता है, और न केवल परमेश्वर के घर को बहुत बड़ा आर्थिक और भौतिक नुकसान पहुँचाता है, बल्कि परमेश्वर के घर और कलीसिया की प्रतिष्ठा को भी भारी नुकसान पहुँचाता है, तो क्या वह कोई अच्छा आदमी है? ऐसे लोग हमेशा परेशानी खड़ी करने वाले होते हैं। वे इस बात की परवाह नहीं करते कि परमेश्वर के घर को कितना भौतिक और वित्तीय नुकसान होता है; उनके लिए सबसे ज्यादा महत्वपूर्ण उनकी अपनी संतुष्टि के लिए काम करना और अविश्वासियों के अनुग्रह का पात्र बनना होता है, जिन्हें वे उपहार भेजते हैं, और जिन्हें वे सौदेबाजी के दौरान लगातार रियायतें देते हैं, उन्हें यह ख्याल ही नहीं आता कि वे परमेश्वर के घर के हितों के लिए लड़ें। फिर भी वे परमेश्वर के घर से झूठ बोलते हुए कहते हैं कि उन्होंने कैसे काम पूरा किया, और परमेश्वर के घर का नुकसान होने से रोका—जबकि वास्तव में, परमेश्वर के घर को बहुत नुकसान हुआ होता है, और अविश्वासियों द्वारा उसका बहुत फायदा उठाया गया होता है। अगर कोई व्यक्ति, हर दृष्टि से, बाहरी मामलों को सँभालने के दौरान परमेश्वर के घर के हितों की रक्षा करने में सक्षम है, तो क्या वह एक अच्छा व्यक्ति है? और इसलिए, अगर इस प्रकार के व्यक्ति परमेश्वर के घर में कोई अन्य कार्य करने में असमर्थ हैं, और केवल इस प्रकार के रोजमर्रा के कार्य के लिए ही उपयुक्त हैं, तो क्या उन्हें परमेश्वर के घर द्वारा पदोन्नत किया जाता है? (किया जाता है।) अगर, सक्षम होने और अपना काम परमेश्वर के घर द्वारा अपेक्षित सिद्धांतों के अनुसार करने में समर्थ होने के अलावा, वे परमेश्वर के घर के हितों की रक्षा करने में भी समर्थ हैं, तो वे एक स्वीकार्य मानक के हैं, और ऐसे लोगों को पदोन्नत किया जाना चाहिए। दूसरी ओर, जो परमेश्वर के घर के हितों को नुकसान पहुँचाते हैं, जो भाई-बहनों की सुरक्षा खतरे में डालते हैं, और परमेश्वर के घर और कलीसिया की प्रतिष्ठा पर प्रतिकूल प्रभाव डालते और प्रतिकूल परिणाम देते हैं—ऐसे लोगों को पदोन्नत या विकसित नहीं किया जाना चाहिए; अगर उनका उपयोग किया जाता है, तो उन्हें जल्दी से बदला जाना चाहिए। जो लोग रोजमर्रा के काम करने में सक्षम होते हैं, वे एक प्रकार की विशेष प्रतिभा होते हैं।

— "अंत के दिनों के मसीह की बातचीत के अभिलेख" में 'नकली अगुआओं की पहचान करना (5)' से उद्धृत

लोग एक और प्रकार के होते हैं : वे जिन्हें बरखास्त कर दिया गया है। कुछ लोगों को उनके अपमानजनक व्यवहार के कारण बरखास्त कर दिया गया है, क्योंकि वे मसीह-विरोधी हैं। कुछ दूसरे लोगों को इसलिए बरखास्त कर दिया गया है, क्योंकि उनके पास अनुभव की कमी है और वे काम नहीं कर सकते। कुछ और लोगों को इसलिए बरखास्त कर दिया गया है, क्योंकि उनकी क्षमता इतनी खराब है कि वे अगुआ नहीं बन सकते, और वे कार्य करने में सक्षम नहीं हैं। जिन लोगों को बरखास्त कर दिया गया है, उन्हें यथोचित रूप से दूसरा काम दिया जाना चाहिए, उनकी निंदा या नहीं की जानी चाहिए, न उन्हें सीमा में बांधना चाहिए। उन्हें वह करना है जो वे कर सकते हैं और उन्हें वैसे सँभाला जाना है जैसे सँभाला जाना चाहिए। क्या अत्यधिक खराब क्षमता के कारण बरखास्त किए गए लोगों को फिर से अगुआ और कार्यकर्ता या पर्यवेक्षक के रूप में चुना जा सकता है? (नहीं।) क्यों नहीं? क्योंकि इसे पहले ही आजमाया जा चुका है। उन्हें उजागर किया जा चुका है और उनकी असलियत देखी जा चुकी है। ऐसे लोगों की क्षमता और कार्य-योग्यताएँ अगुआ होने लायक नहीं होतीं। अगर वे अगुआओं के रूप में उपयुक्त नहीं हैं, तो क्या इसका मतलब यह है कि वे किसी भी और चीज के लिए उपयुक्त नहीं हैं? ऐसा जरूरी नही। अगर उनकी क्षमता इतनी खराब है कि वे अगुआ नहीं बन सकते लेकिन अन्य काम कर सकते हैं, तो अगर बुरी मानवता जैसी कोई अन्य समस्या उन्हें पदोन्नत होने के लिए अयोग्य नहीं ठहराती, तो उन्हें वह सब करना चाहिए जिसे करने के लिए वे उपयुक्त हैं। उन्हें अपने कर्तव्य निभाने के अधिकार से वंचित नहीं किया जाना चाहिए। उन्हें अभी भी उपयोग में लाया जा सकता है। कुछ लोगों को इसलिए बरखास्त कर दिया जाता है, क्योंकि उनमें काम करने की क्षमता की कमी होती है, या उन्होंने पहले कलीसिया का काम नहीं किया होता, या वे इसके अभ्यस्त नहीं होते और कुछ समय तक काम करने के बाद भी वे अपना रास्ता नहीं खोज पाते और नहीं जानते कि क्या करें। या वे बहुत छोटे हैं और उनके पास अनुभव की कमी है, इसलिए वे काम नहीं कर पाते और अंततः उन्हें बरखास्त कर दिया जाता है। ऐसे लोगों के लिए गुंजाइश है। अगर उनकी क्षमता पर्याप्त है, तो उन्हें आसानी से पदावनत किया जा सकता है या ऐसे किसी काम पर लगाया जा सकता है जो उनके लिए उपयुक्त हो। जब सत्य के बारे में उनकी समझ स्पष्ट हो जाए, और जब उन्हें कलीसिया के काम की थोड़ी जानकारी और अनुभव हो जाए, तो ऐसे लोगों को उनकी क्षमता के आधार पर दोबारा पदोन्नत और विकसित किया जा सकता है।

किस तरह के लोगों को बरखास्त किए जाने के बाद दोबारा पदोन्नत नहीं किया जा सकता? एक तो उन्हें, जो मसीह-विरोधी हैं; दूसरे वे, जिनकी क्षमता बहुत कम है; और तीसरे वे, जो मसीह-विरोधी तो नहीं हैं लेकिन जिनकी मानवता तुच्छ है, जो स्वार्थी या धोखेबाज हैं, जो आलसी हैं या शारीरिक आराम की लालसा रखते हैं और कड़ी मेहनत करने में असमर्थ हैं। भले ही ऐसे लोग अच्छी क्षमता वाले हों, फिर भी उन्हें दोबारा पदोन्नत नहीं किया जा सकता। उनके पास जो कुछ भी करने की क्षमता हो, उन्हें वही करना चाहिए। इसके लिए उपयुक्त व्यवस्थाएँ की जा सकती हैं—लेकिन वे दोबारा अगुआ या कार्यकर्ता नहीं हो सकते। काम करने की योग्यता और क्षमता के अतिरिक्त, अगुआओं और कार्यकर्ताओं को जिम्मेदारी लेने, कड़ी मेहनत करने और कष्ट सहन करने में सक्षम होना आवश्यक है। उन्हें मेहनती होना चाहिए, आलसी नहीं, और उन्हें अपेक्षाकृत ईमानदार और सच्चा होना चाहिए, और बहुत चालाक नहीं होना चाहिए। जो लोग बहुत धोखेबाज या चालाक होते हैं, वे हमेशा अपने भाई-बहनों, अपने उच्च अधिकारियों और परमेश्वर के घर के खिलाफ षड्यंत्र रचते हैं। वे अपने दिन केवल कुटिल विचार सोचते हुए ही काटते हैं। ऐसे व्यक्तियों से व्यवहार करते समय तुम्हें हमेशा अनुमान लगाना चाहिए कि वे वास्तव में क्या सोच रहे हैं, तुम्हें पता होना चाहिए कि वे हर समय क्या कर रहे हैं, और तुम्हें हमेशा उन पर नजर रखनी चाहिए। उन्हें उपयोग में लाना बहुत थकाऊ है। अगर इस तरह के व्यक्ति को कर्तव्य निभाने के लिए पदोन्नत किया जाता है, तो भले ही वे थोड़ा सिद्धांत समझते हों, पर वे उसका अभ्यास नहीं करेंगे, और वे अपने हर छोटे से छोटे काम के लिए लाभ और पुरस्कार पाने की उम्मीद करेंगे। ऐसे लोगों का उपयोग करना बहुत थका देने वाला और बहुत परेशान करने वाला होता है, इसलिए ऐसे लोगों को पदोन्नत नहीं किया जा सकता। इसलिए, मसीह-विरोधी, अत्यधिक खराब क्षमता वाले, बुरी मानवता वाले, आलसी, शारीरिक आराम चाहने वाले, कड़ी मेहनत न कर सकने वाले, और चालाक और धोखेबाज—इस प्रकार के लोग जिस क्षण उजागर और बरखास्त किए जाते हैं, वे दूसरी पदोन्नति के लिए अयोग्य हो जाते हैं। एक बार उनकी असलियत देख लेने के बाद उनका दोबारा गलत उपयोग न करो।

— "अंत के दिनों के मसीह की बातचीत के अभिलेख" में 'नकली अगुआओं की पहचान करना (6)' से उद्धृत

चूँकि तुम्हें परमेश्वर के घर द्वारा पदोन्नत किया गया है, इसलिए कुछ चीजें हैं जो तुमसे अपेक्षित हैं। और वे चीजें क्या हैं? तुम्हें परमेश्वर के घर के सिद्धांतों और अपेक्षाओं के अनुसार कार्य करने की आवश्यकता है; तुमसे जिसका अनुरोध किया गया है वह तुम्हें करना चाहिए, और उसी रूप में करना चाहिए जिस रूप में करने का अनुरोध किया गया है, इस प्रकार तुम्हें परमेश्वर की आज्ञा मानने और सत्य के प्रति समर्पण करने का प्रशिक्षण दिया जाता है। तुम्हें विकसित किए जाने के दौरान, कभी-कभी परमेश्वर का घर तुमसे निपटेगा और तुम्हारी काट-छाँट करेगा; कभी-कभी वह तुम्हें कड़ी फटकार लगाएगा; कभी-कभी वह तुम्हारे कार्यों की प्रगति के बारे में पूछताछ करेगा; कभी-कभी वह तुमसे पूछेगा कि वास्तव में काम कैसा चल रहा है, और तुम्हारे काम की जाँच करेगा; और कभी-कभी वह परीक्षा लेगा कि कुछ चीजों के प्रति तुम लोगों का दृष्टिकोण क्या है। इन परीक्षाओं का उद्देश्य तुम लोगों को कठिन स्थिति में डालना नहीं है, बल्कि तुम लोगों को वे सत्य समझाना है जो तुम्हें समझने चाहिए, और तुम्हें क्या रवैया रखना चाहिए, और ऐसे मामलों में परमेश्वर की इच्छा क्या है। लोगों को प्रशिक्षित करने और निर्देश देने का यही अर्थ है। और लोगों को निर्देश देने का लक्ष्य और उद्देश्य क्या है? उन्हें सत्य समझाना। सत्य समझने का उद्देश्य क्या है? लोगों को सत्य का पालन करने, सिद्धांत के अनुसार कार्य करने, और इस बात में सक्षम बनाना है कि वे परमेश्वर की इच्छा समझने में भाई-बहनों की अगुआई कर सकें और कर्तव्य ठीक से निभाने, स्थान पर बने रहने, और कर्तव्य के प्रति वफादार रहने में भाई-बहनों का मार्गदर्शन कर सकें; यह उन्हें भाई-बहनों का विभिन्न सत्यों में प्रवेश करने और अपने कर्तव्य का पालन करते हुए अपने स्वभाव में परिवर्तन हासिल करने में अगुआई करने देना भी है। यह अगुआओं और कार्यकर्ताओं की जिम्मेदारी है, जो उन्हें पूरी करनी चाहिए। जब कोई अगुआ या कार्यकर्ता सत्य समझता है, तो जिनकी वह अगुआई करता है, वे भी सत्य समझ जाते हैं; जब कोई अगुआ या कार्यकर्ता कई सत्यों को समझने में सक्षम होता है, तो जिनकी वह अगुआई करता है, वे भी कई सत्यों को समझने में सक्षम होते हैं; जब कोई अगुआ या कार्यकर्ता किसी कार्य में सत्य-सिद्धांतों को समझ लेता है, तो जिनकी वह अगुआई करता है, वे भी इस कार्य के सिद्धांत और सत्य-वास्तविकता में प्रवेश करते हैं। अगुआओं और कार्यकर्ताओं को निर्देश देने का यही उद्देश्य है। चूँकि निर्देश से गुजरने वाले अगुआ और कार्यकर्ता अन्य लोगों की तुलना में काम करने में अधिक सक्षम होते हैं, चूँकि उनकी क्षमता थोड़ी बेहतर होती है, इसलिए यह सही है कि उन्हें निर्देश दिया जाना चाहिए। उन्हें पहले सत्य-सिद्धांतों को समझने और सत्य-वास्तविकताओं में प्रवेश करने योग्य बनाया जाता है—और फिर, उनके द्वारा दूसरों की सत्य-वास्तविकताओं में प्रवेश करने में अगुआई के माध्यम से, अधिक लोग सत्य-सिद्धांतों को समझ पाते हैं। तुम इस तरह के दृष्टिकोण के बारे में क्या सोचते हो? (यह अच्छा है।) ऐसे लोग सुशिक्षित या सुस्पष्ट वक्ता नहीं होते, न ही वे प्रौद्योगिकी या सामयिक घटनाओं और राजनीति के बारे में ज्यादा समझते हैं। संभव है, वे विशिष्ट कार्यों में अत्यधिक कुशल भी न हों। लेकिन वे सत्य समझने में सक्षम होते हैं, और परमेश्वर के वचनों को सुनने के बाद वे उन्हें क्रियान्वित करने में भी सक्षम होते हैं—वे जानते हैं कि उन्हें कैसे क्रियान्वित करना है—और वे सत्य-सिद्धांतों की पहचान करने में सक्षम होते हैं, और परमेश्वर के वचनों की वास्तविकता में प्रवेश करने और सत्य-सिद्धांतों का पालन करने में अधिक लोगों की अगुआई कर सकते हैं।

— "अंत के दिनों के मसीह की बातचीत के अभिलेख" में 'नकली अगुआओं की पहचान करना (5)' से उद्धृत

जब कोई व्यक्ति भाई-बहनों द्वारा अगुआ के रूप में चुना जाता है, या परमेश्वर के घर द्वारा कोई निश्चित कार्य करने या कोई निश्चित कर्तव्य निभाने के लिए उन्नत किया जाता है, तो इसका यह मतलब नहीं कि उसकी कोई विशेष हैसियत या पहचान है, या वह जिन सत्यों को समझता है, वे अन्य लोगों की तुलना में अधिक गहरे और संख्या में अधिक हैं—तो ऐसा बिलकुल भी नहीं है कि यह व्यक्ति परमेश्वर के प्रति समर्पण करने में सक्षम है और उसे धोखा नहीं देगा। इसका यह मतलब भी नहीं है कि ऐसे लोग परमेश्वर को जानते हैं और परमेश्वर का भय मानते हैं। वास्तव में उन्होंने इसमें से कुछ भी हासिल नहीं किया है; उन्नति और विकास का सीधे-सीधे अर्थ केवल उन्नति और विकास ही है। उनकी उन्नति और विकास का सीधा-सा अर्थ है कि उन्हें उन्नत किया गया है, और वे विकसित किए जाने की प्रतीक्षा कर रहे हैं। और इस विकसित किए जाने का अंतिम परिणाम इस बात पर निर्भर करता है कि व्यक्ति किस रास्ते पर चलता है और किस चीज का अनुसरण करता है। इस प्रकार, जब कलीसिया में किसी को अगुआ बनने के लिए उन्नत और विकसित किया जाता है, तो उसे सीधे अर्थ में उन्नत और विकसित किया जाता है; इसका यह मतलब नहीं कि वह पहले से ही योग्य अगुआ है, या सक्षम अगुआ है, कि वह पहले से ही अगुआ का काम करने में सक्षम है, और वास्तविक कार्य कर सकता है—ऐसा नहीं है। जब किसी को अगुआ के रूप में उन्नत और विकसित किया जाता है, तो क्या उसमें सत्य-वास्तविकता होती है? क्या वह सत्य-सिद्धांतों को समझता है? क्या वह व्यक्ति परमेश्वर के घर की कार्य-व्यवस्थाओं को साकार करने में सक्षम है? क्या उसमें प्रतिबद्धता और जिम्मेदारी की भावना है? जब उसके सामने कोई समस्या आती है, तो क्या वह सत्य की खोज करने और परमेश्वर के प्रति समर्पित होने में सक्षम होता है? यह सब अज्ञात है। क्या उस व्यक्ति के अंदर परमेश्वर का भय मानने वाला हृदय है? और परमेश्वर से उसका भय आखिर कितना बड़ा है? क्या काम करते समय उसके द्वारा अपनी इच्छा का पालन करने की संभावना रहती है? अगुआ का कार्य करने के दौरान क्या वह लोग परमेश्वर की इच्छा की खोज करने के लिए नियमित रूप से और अकसर परमेश्वर के सामने आता है? क्या वह लोगों का सत्य-वास्तविकता में प्रवेश करने के लिए मार्गदर्शन करने में सक्षम है? यह और इसके अलावा बहुत-कुछ, विकसित किए जाने और खोजे जाने की प्रतीक्षा कर रहा है; यह सब अज्ञात रहता है। किसी को उन्नत और विकसित करने का यह मतलब नहीं कि वह पहले से ही सत्य को समझता है, और न ही इसका अर्थ यह है कि वह पहले से ही अपना कर्तव्य संतोषजनक ढंग से करने में सक्षम है। तो किसी को उन्नत और विकसित करने का क्या उद्देश्य और मायने हैं? वह यह है कि ऐसे व्यक्ति को, एक व्यक्ति के रूप में, प्रशिक्षित किए जाने, विशेष रूप से सिंचित और निर्देशित करने के लिए उन्नत किया जाता है, जिससे वह सत्य-सिद्धांतों, और विभिन्न कामों को करने के सिद्धांतों, और विभिन्न समस्याओं को हल करने के सिद्धांतों, साधनों और तरीकों को समझने में सक्षम हो जाए, साथ ही यह भी, कि जब वह विभिन्न प्रकार के परिवेश और लोगों का सामना करे, तो परमेश्वर की इच्छा के अनुसार और उस रूप में, जिससे परमेश्वर के घर के हितों की रक्षा हो सके, उन्हें कैसे सँभालना और उनके साथ कैसे व्यवस्थित होना है। क्या यह इंगित करता है कि परमेश्वर के घर द्वारा उन्नत और विकसित की गई प्रतिभा उन्नत और विकसित किए जाने की अवधि के दौरान या उन्नत और विकसित किए जाने से पहले अपना काम करने और अपना कर्तव्य निभाने में पर्याप्त सक्षम है? बेशक नहीं। इस प्रकार, यह अपरिहार्य है कि विकसित किए जाने की अवधि के दौरान ये लोग निपटे जाने, काट-छाँट किए जाने, न्याय किए जाने और ताड़ना दिए जाने, उजागर किए जाने, यहाँ तक कि बदले जाने का भी अनुभव करेंगे; यह सामान्य बात है, उन्हें प्रशिक्षित और विकसित किया जा रहा है। जिन्हें उन्नत और विकसित किया जाता है, लोगों को उनसे उच्च अपेक्षाएँ या अवास्तविक उम्मीदें नहीं करनी चाहिए; यह अनुचित होगा, और उनके साथ अन्याय होगा। तुम लोग उन पर नजर रख सकते हो, और उनके उन कामों की शिकायत कर सकते हो, जिन्हें तुम लोग समस्या पैदा करने वाले मानते हो, लेकिन वे भी विकसित किए जाने की अवधि में हैं, और उन्हें ऐसे लोगों के रूप में नहीं देखा जाना चाहिए जिन्हें पूर्ण बना दिया गया है, निर्दोष या ऐसे लोगों के रूप में तो बिलकुल भी नहीं, जो सत्य-वास्तविकता से युक्त हैं। वे तुम लोगों जैसे ही हैं : यह वह समय है, जब उन्हें प्रशिक्षित किया जा रहा है। अंतर केवल इतना है कि वे साधारण लोगों की तुलना में अधिक काम करते और अधिक जिम्मेदारियाँ निभाते हैं। उनके पास अधिक काम करने की जिम्मेदारी और दायित्व है; वे अधिक कीमत चुकाते हैं, अधिक कठिनाई सहते हैं, अधिक कष्ट झेलते हैं, अधिक समस्याएँ हल करते हैं, अधिक लोगों की निंदा सहन करते हैं, और निस्संदेह, सामान्य लोगों की तुलना में अधिक प्रयास करते हैं, कम सोते हैं, कम अच्छा भोजन करते हैं, और कम गपशप हैं। यह है उनके बारे में खास; इसके अतिरिक्त वे किसी भी अन्य व्यक्ति के समान होते हैं। मेरे यह कहने का क्या मतलब है? सभी को यह बताना कि उन्हें परमेश्वर के घर के द्वारा विभिन्न प्रकार की प्रतिभाओं की उन्नति और विकास की गलत व्याख्या नहीं करनी चाहिए, और इन लोगों से अपनी अपेक्षाओं में कठोर नहीं होना चाहिए। स्वाभाविक रूप से, लोगों को उनके बारे में अपनी राय में अयथार्थवादी भी नहीं होना चाहिए। उनकी अत्यधिक सराहना या सम्मान करना मूर्खता है, तो उनके प्रति अपनी अपेक्षाओं में अत्यधिक कठोर होना भी मानवीय या यथार्थवादी नहीं है। तो उनके साथ व्यवहार कार्य करने का सबसे तर्कसंगत तरीका क्या है? उन्हें सामान्य लोगों की तरह ही समझना, और जब कोई ऐसी समस्या आए जिसे खोजने की आवश्यकता हो, तो उनके साथ संगति करना और एक-दूसरे की क्षमताओं से सीखना और एक-दूसरे का पूरक होना। इसके अतिरिक्त, यह निगरानी रखना सभी की जिम्मेदारी है कि अगुआ और कार्यकर्ता वास्तविक कार्य कर रहे हैं या नहीं, और वे अपने कर्तव्यों का पालन करने में सक्षम हैं या नहीं। यदि वे सक्षम न हों, और तुम लोगों ने उनकी असलियत देख ली हो, तो उनकी शिकायत करने या उन्हें हटाने में समय नष्ट न करो; किसी दूसरे को चुन लो, और परमेश्वर के घर के काम में देरी न करो। परमेश्वर के घर के काम में देरी करना खुद को और दूसरों को चोट पहुँचाना है, इसमें किसी का भला नहीं है।

— "अंत के दिनों के मसीह की बातचीत के अभिलेख" में 'नकली अगुआओं की पहचान करना (5)' से उद्धृत

पिछला: 67. अगुआओं और कार्यकर्ताओं को पदच्‍युत करने के सिद्धांत

अगला: 69. कलीसिया को ए और बी समूहों में बाँटने के सिद्धांत

सभी विश्वासी यीशु मसीह की वापसी के लिए तरस रहे हैं। क्या आप उनमें से एक हैं? हमारी ऑनलाइन सहभागिता में शामिल हों और आपको परमेश्वर से फिर से मिलने का अवसर मिलेगा।

संबंधित सामग्री

775 तुम्हारी पीड़ा जितनी भी हो ज़्यादा, परमेश्वर को प्रेम करने का करो प्रयास

1समझना चाहिये तुम्हें कितना बहुमूल्य है आज कार्य परमेश्वर का।जानते नहीं ये बात ज़्यादातर लोग, सोचते हैं कि पीड़ा है बेकार:अपने विश्वास के...

610 प्रभु यीशु का अनुकरण करो

1पूरा किया परमेश्वर के आदेश को यीशु ने, हर इंसान के छुटकारे के काम को,क्योंकि उसने परमेश्वर की इच्छा की परवाह की,इसमें न उसका स्वार्थ था, न...

वचन देह में प्रकट होता है न्याय परमेश्वर के घर से शुरू होता है अंत के दिनों के मसीह, सर्वशक्तिमान परमेश्वर के अत्यावश्यक वचन परमेश्वर के दैनिक वचन परमेश्वर का आगमन हो चुका है, वह राजा है सर्वशक्तिमान परमेश्वर के वचनों का संकलन सत्य का अभ्यास करने के 170 सिद्धांत मेमने का अनुसरण करो और नए गीत गाओ राज्य का सुसमाचार फ़ैलाने के लिए दिशानिर्देश परमेश्वर की भेड़ें परमेश्वर की आवाज को सुनती हैं परमेश्वर की आवाज़ सुनो परमेश्वर के प्रकटन को देखो राज्य के सुसमाचार पर अत्यावश्यक प्रश्न और उत्तर मसीह के न्याय के आसन के समक्ष अनुभवों की गवाहियाँ विजेताओं की गवाहियाँ मैं वापस सर्वशक्तिमान परमेश्वर के पास कैसे गया

सेटिंग्स

  • इबारत
  • कथ्य

ठोस रंग

कथ्य

फ़ॉन्ट

फ़ॉन्ट आकार

लाइन स्पेस

लाइन स्पेस

पृष्ठ की चौड़ाई

विषय-वस्तु

खोज

  • यह पाठ चुनें
  • यह किताब चुनें